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Saturday, June 25, 2011

चाणक्य नीति-आचरण में ज्ञान न दिखे वह निरर्थक (acharan aur gyan-chankya neeti)


       आजकल देश में धन की अधिकता के कारण धार्मिक कार्यक्रम अधिक ही होते हैं। इन कार्यक्रमों पर काला या सफेद चाहे जो भी धन खर्च होता है इस पर हम टिप्पणी नहीं करेंगे पर इनकी तादाद देखते हुए तो यह लगता है कि हमारा देश विश्व में एक आदर्श होना चाहिए पर बढ़ते अपराध, भ्रष्टाचार, व्याभिचार तथा अहंकार को देखते हुए यह नहीं लगता कि किसी को हमसे नैतिकता का उपदेश लेना चाहिए। इसका सीधा मतलब है कि लोग ज्ञान चर्चा करते हैं तो केवल यह दिखाने के लिये कि उनकी मनुष्य देह के अंदर भी एक मनुष्य है। धार्मिक सत्संग वाणी विलास तथा मनोरंजन के रूप में होते हैं। गीत संगीत और काव्य से सजे सत्संग मजा जरूर देते हैं पर उनसे ज्ञान प्राप्त नहीं होता। गीत और भजन में अब कोई अंतर नहीं दिखता। लोग यह दिखाने के लिये अधिक प्रयत्नशील हैं कि वह धर्मभीरु हैं पर आचरण पर उनके ज्ञान की छाया नहीं दिखती।
       इस विषय पर महर्षि चाणक्य अपनी नीति में कहते हैं कि
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           हतं ज्ञानं क्रियाहीनं हतश्चाऽज्ञानतो नरः।
         हतं निर्नायकं सैन्यं स्त्रियो नष्टा ह्यभर्तृकाः।।
       ‘‘अगर मनुष्य के पास ज्ञान है पर उसे आचरण में नहीं लाता तो वह व्यर्थ है। अज्ञानी पुरुष का जीवन निरर्थक है। अज्ञानी पुरुष हमेशा असफल रहता है। उसी तरह सेनापति रहित सेना और स्वामीरहित स्त्रियां नष्ट हो जाती हैं।"
           विकास के नाम पर विनाशलीला अपना रूप दिखा रही है। अपराधों के समाचारों को देखते हुए तो ऐसा लगता है कि जिस हम संस्कृति की बात करते हैं वह कभी की लुप्त हो गयी है। सामाजिक और पारिवारिक रिश्ते नाम के लिये हो गये हैं। धन हैं तो वह भी निभा लो नहीं तो भूल जाओ। पाश्चात्य सभ्यता को विकास का पर्याय माने लेने के बाद हमें भारतीय सस्कृति के प्रति मोह है पर अपनी स्वार्थ पूर्ति तक ही वह रहता है। कहने का अभिप्राय यह है कि ज्ञान हमारे पास खूब है पर आचरण में नहीं है इसलिये ही समाज अब टूटता जा रहा है। ऐसे में समूचे समाज को संबोधित कर उसे सुधरने का उपदेश देने से अच्छा है हम स्वयं आत्ममंथन करें और अपने आचरण सुधारे।
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',ग्वालियर
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com
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Wednesday, April 27, 2011

असली ‘दम’ की पहचान करें-हिन्दी धार्मिक संदेश (asali dum ki pahachan-hindi dharmik sandesh)

         किसी आदमी में कितना ‘दम’ है उसकी प्रहार क्षमता से नहीं वरन् सहने की क्षमता से प्रमाणित होता है। अक्सर हम देखते हैं कि अनावश्यक रूप से दूसरों पर हमला करने, शस्त्रों से दूसरों को डराने और ऊंचे सपंर्कों की धौंस से समाज को आतंकित करने वालों को हम दमदार आदमी कहते हैं। उसी तरह जो लोग उपभोग की प्रवृत्ति में अधिक लिप्त होते हैं उनको ताकतवर मान लिया जाता है। यह केवल भ्रम है।
इस विषय में हमारे शास्त्रों के अनुसार
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           ‘‘इन्द्रियाणां जयो लोके दम इत्यभिधीयते।
           नादान्तस्य क्रियाः काशिचद् भवन्तहि द्विजोत्तमा।।
        ‘‘इस लोक में इंद्रियों पर विजय प्राप्त करना ही ‘दम’ माना जाता है। जो मनुष्य दमयुक्त नहीं है उसकी कोई क्रिया सफल नहीं हो सकती।’’
         इन्द्रियाणां प्रसंगेन दोषमृच्छति मानवः।
        संनियभ्य तु तान्येव सिद्धिं समधिनगच्छनि।।
         ‘‘इन्द्रियों के विशेष संग से मनुष्य स्वाभाविक रूप से विकार को प्राप्त होता है परंतु इन्द्रियों को नियंत्रित रखने से उसे सिद्धि ही प्राप्त होती है।’’
               बाहर कुछ कर दिखाकर अपना दम दिखाने वालों की इस संसार में कमी नहीं है। लोग इस कदर सम्मान पाने के आतुर रहते हैं कि छल कपट और मूर्खताऐं करते हुए उनका पूरा दम निकल जाता है। इतना ही नहीं अपने से कमजोर, बालक तथा स्त्रियों के प्रति आक्रामक रवैया अपनाना हमारे देश के दमदार लोग अपनी प्रतिष्ठा और योग्यता का प्रमाण मानते हैं। सच बात तो यह है कि लोगों की वाणी वाचाल होती है जो प्रायः अपनी दमखम का प्रचार करती है। जबकि सच बात यह है कि समाज में सहिष्णुता, विद्वेष तथा लालच की भावना इस कदर बढ़ गयी है कि लोग अत्यंत कमजोर हो गये हैं। त्याग, सहयोग तथा प्रेम का भाव कमजोर लोगों का तो लूट, वैमनस्य तथा गाली गलौच करना ताकतवर लोगों की निशानी मान ली गयी है। यही कारण है कि हमारा समाज अपराध तथा घृणा के भाव का शिकार हो गया है।
            अगर हम दम या शक्ति का सही रूप समझें तो अपनी मानसिकता बदल सकते हैं। चिल्लाने में कोई दम नहीं लगता बल्कि मौन में दम का पता चलता है। लूटने में भला कैसा दम? दम तो त्याग में पता चलता है। अतः अपने दमदार रूप को दिखाने के लिये अच्छे आचरण की नीति को अपनाना चाहिए।
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लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
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Monday, January 19, 2009

कबीर के दोहे: जंग से अधिक मिल बांटकर खाने में होती है साहस की आवश्यकता

कबीर तो सांचै मतै, सहै जू सनमुख वार
कायर अनी चुभाय के, पीछे झखै अपार


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहत हैं कि सच्चा वीर तो वह है जो सामने आकर लड़ता है पर जो कायर है वर पीठ पीछे से वार करता है।

तीर तुपक सों जो लड़ैं, सो तो सूरा नाहिं
सूरा सोइ सराहिये, बांटि बांटि धन खांहि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो अस्त्र शस्त्र से लड़ते है। उनको वीर नहीं कहा जा सकता है। सच्चे शूरवीर तो हैं जो आपस में मिल बैठकर खाते हैं। वह जो भी कमाते हैं उसे समान रूप से आपस में बांटते हैं।

वर्तमान सन्दर्भ में संपादकीय व्याख्या-शूरवीर हमेशा उसे ही माना जाता है जो अस्त्र शस्त्र का उपयोग करता है। उनमें भी वही वीर है जो सामने से वार करता है पर जो कायर हैं वह पीठ पीछे वार करते हैं। वैसे अस्त्र शस्त्र से लड़ने में भी साहस की आवश्यकता कहां होती है। अगर अस्त्र शस्त्र हाथ में हों तो वेसे भी मनुष्य के मन में दुस्साहस आ ही जाता है और कोई भी उपयोग कर सकता है। कुछ लोग कहते हैं कि हथियार रखने से क्या होता है उसे चलाने के लिये साहस भी होना चाहिये-विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर लोहे से बना कोई हथियार मनुष्य के हाथ में हो तो उसमें आक्रामता आ ही जाती है।

असली साहस तो अपने कमाये धन का दूसरे के साथ बांटकर खाने में दिखाना चाहिये। आदमी जब धन कमाता है तो उसके प्रति उसका मोह इतना हो जाता है कि वह उसे किसी को थोड़ा देने में भी हिचकता है। मिलकर बांटने की बात तो छोडि़ये अपनी रोटी का छोटा टुकड़ा देने में भी आदमी की जान जाती है।

हमारे प्राचीन मनीषियों ने दान की महिमा को इसलिये प्रतिपादित किया कि समाज में सामाजिक समरसता का भाव रहे। हमारे अध्यात्म में इतना तक कहा गया है कि किसी को दान देते हुए आंखें नीची करना चाहिये ताकि दूसरे को हमारा अहंकार नहीं दिखाई दे और उसके अंदर अपने प्रति कुंठा भाव न उत्पन्न हो। मगर अब तो समाज कल्याण की बात राज्य के भरोसे छोड़ दी गयी है और वही लोग जन कल्याण के लिये मैदान में उतर रहे हैं जिनको उससे कुछ आर्थिक फायदा है। यह लोग कायर होते हैं क्योंकि दान और कल्याण क लिये प्राप्त धन का वह हरण करते हैं।

कलुषित तरीके से प्राप्त धन का भी वह दान करने का साहस नहीं कर पाते। अपने धन देने में सभी का हृदय कांपने लगता है। सच है कि जो दानी है वही सच्चा शूरवीर है। वह भी सच्चा वीर है जो अस्त्र शस्त्र लेकर कहकर सामने से प्रहार करता है पर आजकल तो कायरों की पूरी फौज है जो पीठ पीछे से वार करती है। चोर और डकैतों द्वारा किये गये और अपराध और निरंतर बम धमाकों की बढ़ती घटनायें इस बात का प्रमाण हैं।
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Monday, October 13, 2008

चाणक्य सन्देश:कभी कभी आडम्बर भी काम आता है

१. राजा, बालक, दुसरे का कुत्ता, मूर्ख व्यक्ति, सांप, सिंह और सूअर इन सात जीवों को सोते हुए से कभी नहीं जगाना चाहिए, इन्हें जगाने से मनुष्य को हानि ही हो सकती है लाभ नहीं। इनके आक्रमण करने से अपनी रक्षा करना कठिन होगा। अत: अच्छा यही है यदि वह सो रहे हैं तो उन्हें सोता छोड़ आगे बढ जाना चाहिए।
२. जो व्यक्ति निस्तेज यानी प्रभावहीन है न तो उसके प्रसन्न होने पर किसी व्यक्ति को अर्थ की प्राप्ति होती है न ही नाराजगी पर किसी सजा का भय ही प्रतीत होता है। जिसकी कृपा होने पर पुरस्कार न मिलता हो और न ही जो किसी को दण्ड देने का अधिकारी हो ऐसा व्यक्ति रुष्ट भी हो जाये तो कोई उसकी चिंता नहीं करता।
३. आज के युग में आडम्बर का अपना अलग ही महत्व है। वह झूठ भी हो तो भी आदमी को कुछ न कुछ लाभ मिल ही जाता है। सर्प के मुख में विष न हो तो भी वह मुख तो फैला ही देता है जिससे लोग भयभीत होकर पीछे जाते हैं। उसकी फुफकार ही दूसरों को डराने और अपनी रक्षा करने में पर्याप्त होती है। यदि सर्प अपने फन भी न फैलाये तो कोई बच्चा भी मार डालेगा। इसलिये कुछ न कुछ आडम्बर करना हर प्राणी के लिए आवश्यक है

४. संसार के दुखों से दुखित पुरुष को तीन ही स्थान पर थोडा विश्राम मिलता है- वह हैं संतान, स्त्री और साधू
५. राजा की आज्ञा, पंडितों का बोलना और कन्यादान एक ही बार होता है।
६. एक व्यक्ति का तपस्या करना, दो का एक साथ मिलकर पढ़ना, तीन का गाना, चार का मिलकर राह काटना, पांच का खेती करना और बहुतों का मिलकर युद्ध करना
७. पक्षियों में कोआ, पशुओं में कुत्ता और मुनियों में पापी चांडाल होता है पर निंदा करने वाला सबसे बड़ा चांडाल होता है।
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Saturday, February 16, 2008

रहीम के दोहे: कितना भी बड़ा ज्ञानी हो उसकी अनुचित बात न माने

अनुचित वचन न मानिए जदपि गुराइसु गाढ़ि
है रहीम रघुनाथ ते सुजस भरत को बाढ़ि

कविवर रहीम कहते हैं कि कोई भी कितना व्यक्ति बड़ा और गूढ़ ज्ञान वाला क्यों न हो उसके अनुचित वचनों को मत मानो क्योंकि यह जरूरी नहीं है कि वह हमेशा सत्य वचन ही कहता हो। यहाँ यह भी याद रखने वाली है कि भगवान् श्री रामचन्द्र के वचनों से ही भरतको सुयश की प्राप्ति हुई थी।

अब रही मुश्किल पड़ी, गाढे दोउ काम
सांचे से तो जग नहीं, झूठे मिलै न राम

कविवर रहीम कहते हैं कि अब तो जीवन में ऐसी कठिनाई आ गयी कि दोनों कार्य दुष्कर हो गए हैं। सत्य बोलने से संसार का काम नहीं चलता और मिथ्या भाषण से भगवान् का मिलना संभव नहीं है।

Sunday, November 11, 2007

घर में टीवी पर है क्रिकेट देखने का मजा

हमारे बुजुर्ग कहते हैं कि जब तक जरूरी न हो जहाँ भीड़ हो मत जाओ, क्योंकि उसमें समय नष्ट होता है और अकारण शारीरिक परेशानी भी झेलनी पड़ती है। मगर आजकल लोग वहीं भागते हैं जहाँ भीड़ होती है। बात क्रिकेट की कर रहा हूँ। कहीं भी मैच होता है वहाँ भारी संख्या में लोग पहुँचते हैं। होता यह है कि कई लोगों को टिकिट होने के बावजूद अन्दर प्रवेश नहीं मिल पाता-और धक्के खाकर उनको घर लौटना पड़ता है।
मैंने जितनी क्रिकेट मैदान पर खेली है उससे अधिक रेडियो पर सुनी और टीवी पर देखी है। मैदान पर ऐसे मैच देखे हैं जो अंतर्राष्ट्रीय नहीं थे और अगर थे तो अनौपचारिक और जिनमें प्रवेश मुफ्त था। एक बार एक अंतर्राष्ट्रीय एक दिवसीय मैच मैदान पर देखने का भूत सवार हुआ और हमने अपने पैसे से टिकिट खरीदी और सुबह आठ बजे घर से मैदान की तरफ रवाना हुए। वहाँ देखा तो होश फाख्ता हो गए-सभी गेटों पर घुसने वालों की लाइन लगी हुई थी और चूंकि पैसे खर्च चुके इसलिए लाइन में लग गए। इतनी बड़ी लाइन हमने कभी राशन की दुकान पर भी नहीं देखी थी। बहरहाल मैच शुरू हो चुका था और भारत की बैटिंग पहले थी और भारतीय बल्लेबाजों द्वारा रन जुटाने पर स्टेडियम के अन्दर मौजूद दर्शकों की हो-हो की आवाज हमारे कानों में गूंग रही थी और हमें पहली बार लगा कि हम पूरा मैच देखने से चूक रहे हैं। घर पर टीवी पर मैच पहली गेंद से ही देखते थे और कहाँ यह पता ही नहीं लग रहा था कि क्या स्कोर चल रहा है।
जब हम किसी तरह अन्दर पहुचे तो बीस ओवर का मैच निकल चुका था। हमने अपने लिए बड़ी मुश्किल से बैठने की जगह ढूंढी। मैच देखना शुरू किया तब लगा ही नहीं कि मैच देख रहे हैं। बल्लेबाज आउट हुआ तो यह पता ही नहीं लगता कि सही आउट हुआ या गलत-क्योंकि वहाँ रिप्ले देखने की वहाँ कोई व्यवस्था नहीं थी। भारत की इनिंग ख़त्म हुई तो हम बाहर गए। पानी के लगी टंकियों पर भारी भीड़ थी। चाय के ठेलों पर जो चाय मिल रही थी वह दूने दाम पर और बेकार- यह पहले पी चुके लोगों ने बताया। उस समय पानी के पाउच का सिस्टम शुरू नहीं हुआ था। अब तो हमारी हालत बिगडी। एक बार ख्याल लाया कि घर वापस लौट जाएं पर फिर पैसे खर्च कर घर जाकर देखना गवारा नहीं हुआ।

स्टेडियम में वापस लौटे। फिर मैच शुरू हुआ तो अपनी तकलीफे मन से गायब हो गईं-पर मैच समाप्त होते-होते वह फिर परेशान करने लगीं। भारत वह मैच हारा तो हम भी अपने को हारा अनुभव करने लगे। पैसे खरीद कर देखा गया वह हमारा पहला और आखिरी मैच रहा। इसके कम से कम पांच वर्ष और बाद और छः वर्ष पहले फ्री में वहाँ कुछ मैच देखने गए। एक बार दक्षिण अफ्रीका और भारत के युवाओं का मैच देखने गए। दूधिया रोशनी में खेले गए मैच में बड़ा आनंद आया। लोग भी परिवार समेत ऐसे आ-जा रहे थे जैसे कि पार्क में आ रहे हों। पुलिस किसी को आने-जाने से नहीं रोक रही थी। परिवार सहित उस मैच का कुछ देर आनंद लेकर हम घर लौट आये। ऐसी तसल्ली से मैच देखना अब कहीं संभव नहीं है। अब लोग जिस तरह इन मैचों को देखने के लिए टूट रहे हैं उससे तो लगता ही नहीं है कि देश में कोई गंभीर समस्या है। टीवी पर उनके साक्षात्कारों में उनकी तकलीफ देखकर कोई सहानुभूति भी नहीं होती। जिस मैच को घर पर आसानी से और रिप्ले के साथ देखा जा सकता है उसके लिए धक्के खाने जाने वालों के साथ कैसी सहानुभूति? समाचार देने वाले इसे संवेदनशील बनाने की करते हैं पर मुझे नहीं लगता कि उसकी कोई लोगों पर प्रतिक्रिया होती है। क्योंकि कई जगह ऐसा हो चुका है और लोग देखते हुए भी अगर इसका अनुमान नहीं कर चलते तो क्या कहा जाये?
सच तो यह है की जितना मजा घर पर मैच देखने में आता है हमें मैदान पर कभी नहीं आया। फिर आजकल तो वातावरण में गर्मी भी अधिक है और मैदान में अपना पसीना बहाने से कोई फायदा नजर नहीं आता।

Sunday, November 4, 2007

संत कबीर वाणी:शराब आदमी को पशु बना देती है

जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय
यह आपा तो दल दे, दया करे सब कोय

संत शिरोमणि कबीरदास जे कहते हैं की अगर व्यक्ति के मन में शांति है तो उसका कोई बैरी नहीं है, और वह घमंड करना छोड़ दे तो सब उस पर दया करेंगे।
अवगुण कहूं शराब का, आप अहमक साथ
मानुष से पशुआ कर दे, गाँठ से खात

संत शिम्रोमानी कबीरदास जी कहते हैं के शराब पीकर आदमी अपने आप पागल हो जाता है, मूर्खो और पशुओं जैसा व्यवहार करता है अपनी जेब से पैसा खर्च करता है सो अलग।

बाजीगर का बांदरा, ऐसा जीव मन के साथ
नाना नाच दिखे कर, राखे अपने साथ

कबीर दास जी कहते हैं की जिस तरह बाजीगर का अपने बन्दर से तरह-तरह के नाच दिखाकर अपने साथ रखता है उसी तरह मन भी जीव के साथ है वह भी जीव को अपने इशारे पर चलाता है।

Friday, November 2, 2007

भक्ति में विश्वास और चमत्कार की आस-चिंतन

रात का समय.......धीरे-धीरे दिन अपने कोलाहल को समेट रहा कर जा रहा है और रात का अंधियारा अपने साथ ला रहा है चिंतन के लिए अनमोल पल जो हृदय की जिज्ञासा को शांत कराने के लिए सुविधाजनक होते हैं। रात की शांति दिनभर के कोलाहल का विश्लेषण करने के करने का अवसर प्रदान करती हैं।

चिंतन नहीं करूंगा चिंता शुरू हो जायेगी। आख़िर क्या फर्क है चिंतन और चिन्ता में? दिन भर मैंने जो किया या मेरे साथ हुआ उस पर दृष्टिपात कराने का प्रयास करता हूँ। इसमें अपने 'मैं' को हटा लेता हूँ क्योंकि अगर ऐसा नहीं करूंगा तो केवल हर घटना का केवल ऐक ही पक्ष देख पाऊँगा और अपनी गलतियाँ नही दिखाईं देंगीं, हर बार अपना ही सही पक्ष देखने का प्रयास करूगा। अपने से जुडे घटना से मैं' को अलग आकर देखना चिंतन है और जब उसमें मैं जोड़ कर रखेंगें तो चिन्ता शुरू हो जायेगी। हम न भी चाहें तो दोनों में से काम तो होगा ही क्योंकि हमारे अन्दर मन, बुद्धि और अंहकार ऎसी प्रकृतियां जो अपना काम करेंगी ही हम चाहे या न चाहे।

हुआ यह कि मैं कुछ दिन पहले ऐक मंदिर में गया। उस मंदिर में अक्सर जाता हूँ। यह मंदिर शहर के मध्य भाग में स्थित है और इसके चारों और ऐक बहुत बडा पार्क है। यह मंदिर बहुत पुराना और आज भी देखने में आकर्षक है पर वहाँ लोगों कम ही आते हैं। शहर में अन्य भी अनेक आकर्षक मंदिर हैं और यह उनसे कम नहीं है, पर क्योंकि इसके पास लोगों की रिहायश कम है और शायद यही कारण है कि प्रसाद और माला के लिए दुकाने कम होने से लोग यहाँ कम आते हैं। मंदिर के चारों और बने पार्क में बहुत संख्या में घुमते हैं पर उस मंदिर में फिर भी नहीं जाते क्योंकि भगवान के दरबार में जाने वाले लोगों के मन में प्रसाद और माला ले जाने की इच्छा होती है और कोई अपने घर या बाजार से लेने की बजाय उसी जगह खरीदना चाहता है जहाँ मंदिर स्थित होता है और चूंकि इसके आसपास सरकारी नियंत्रण इतना कडा है कि कोई अतिक्रमण कर वहां दुकान बना ही नही सकता। हालांकि पार्क की दृष्टि से यह अच्छा भी है कि वहाँ किसी प्रकार का गंदगी नहीं होती।मैं अपने परिवार के साथ वहां जाता हूँ पर मंदिर में अकेला ही जाता हूँ कोई साथ नहीं चलता। क्योंकि उस मंदिर के सिद्ध होने की चर्चा कहीं भी नहीं होती है और अपने देश के लोगों का नियम है जिसमें चमत्कार कराने की शक्ति नही होती उसे नमस्कार नही करते। वैसे तो कोई चमत्कार नहीं करता पर उसके लिए प्रसिद्ध तो उसे होना ही चाहिए भले ही उसके पीछे पाखंड होता हो ।

बहरहाल उस दिन जब मैं वहाँ पहुंचा तो भारी भीड़ थी तो मुझे आश्चर्य हुआ। अचानक हमारी श्रीमती जी बोली आज इस मंदिर में भगवान जी की मूर्ति को करोडों रुपये के जेवर पहनाये जायेंगे, इसलिए लोग उसे अधिक संख्या में आ रहे हैं। यह गहने बहुत दिन से कहीं रखें हुए थे और इन्हें बरसों से पहनाया नहीं गया।'

मैं हैरान रह गया. जिनके भगवान् के दर्शन आसानी से कर लेता था उनके लिए मुझे हजार लोगों की लाइन में खडा होना था। वहाँ मेरा एक मित्र-जो अपनी पत्नी को दर्शन कराने के लिए लाया था- भी मिल गया और बोला-"चलो लाइन में लगते हैं।"
मैंने कहा-'नहीं मैं तो बाहर से हाथ जोड़कर जा रहा हूँ। मैं तो शनिवार को अक्सर आता हूँ।'

तो वह बोला-''कल तो गहने उतार लिए जायेंगे। आज खास दिन है, इसलिए गहने पहनाये गए हैं और लोग वही गहने देखने के लिए आ रहे हैं।'

मैंने कहा-''यह मेरी श्रद्धा का मामला है। मैं तो इस मंदिर में ध्यान लगाने जाता हूँ। गहनों में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है। इतनी भीड़ में खड़े होने के लिए मेरा अंतर्मन इजाजत नहीं देता।'

तब उसने मेरी और अपनी पत्नी को लाइन में खड़े होकर दर्शन करने का सुझाव दिया। मेरी स्वीकृति से पहले ही दोनों एक स्वर में बोलीं-''हाँ हम जाते हैं।"
मैंने और मेरे मित्र ने बाहर से हाथ जोड़कर अपने भाव व्यक्त किये और दूर खड़े होकर नजारा देखने लगे। इतनी भीड़ देखकर मैंने अपने मित्र से कहा-' भगवान् की मूर्ति पूजने से मानसिक लाभ होते हैं यह तो मैं भी मानता हूँ, पर इस तरह गहने पहनाना और उसे देखने के लिए लोगों की आतुरता देखकर तो यही लगता है कि लोग अपने धर्म और आध्यात्म को समझते ही नहीं।'
मेरे मित्र ने कहा-''लोगों को यह पता ही नहीं है कि धर्म है क्या? वह तो केवल कर्मकांडों को कर यही समझते हैं कि वही धर्म हैं। असल में मैं तुम्हारी इस बात से सहमत हूँ जो तुम अक्सर कहते हों कि झगडा धर्मों का नहीं बल्कि कर्मकांडों का है,इस बात से सहमत हूँ।लोग पूजा और दर्शन केवल औपचारिकतावश ही कर यह सोचते हैं कि हो गया धर्म का निर्वाह।'

लोग हजारों की संख्या में आ रहे थे और सबके जुबान पर गहनों की बात थी। उस दिन मैं पहली बार यह देख रहा था कि भक्त नहीं बल्कि दर्शक आ रहे थे। वह जो सब खेल रचता है उसे ही खिलौना समझने की गलती कर रहे थे। दोनों स्त्रियाँ लाइन के बीच में घुसकर दर्शन करे आयीं। उसके बात हम घर लौटे। सच बात है कि भगवान की मूर्तियों को पूजने का लाभ तभी है जब उसे अपने मन में धारण करें। विभिन्न धातुओं या पत्थरों को तराश कर उनमें मानवीय अंगों की आकृति रचकर मूर्तियों को इसलिए बनाया गया है कि उनमें जीवन्तता की अनुभूति हो सके और उसे धारण कर अपने मन को पवित्र कर सकें पर लोग इस बात को नहीं समझते। उन्हें तो बस चमत्कार चाहिए। अगर कोई खाली पत्थर भी चमत्कारी घोषित कर दिया जाये तो लोग उसे पूजने लगेंगे। विश्वास और श्रद्धा किसी के मन में नहीं दिखाई देती बस चमत्कार और आकर्षण की आस में इधर-उधर भटकते हैं।

Sunday, October 14, 2007

राष्ट्र कल्याण कौन कर सकता है?

  1. व्यापक दृष्टि वाले अर्थात जिनमें संकुचित दृष्टि नहीं है अपने पक्ष वालों का-अपनी जातिका ही हित करना और अपने पक्ष से भिन्न मतवालों को कुचलना- यह दुष्ट भाव जिनमें नहीं है, जो सबके हित को व्यापक दृष्टि रखते हैं उनको ' ईयचक्षसा' है। इनको व्यापक दृष्टि वाले कहते हैं। ये लोग स्वराज्य को चलाने के अधिकारी हैं।
  2. दूसरे 'मित्रवत' व्यवहार करने वाले जनता कि मित्र, जो सबका कल्याण करने में दत्तचित्त रहते हैं, वह 'मित्रवत' व्यवहार करने वाले राज्य चलाने के अधिकारी हैं।
  3. तीसरे 'सूरय' अर्थात ज्ञानी , सत्य ज्ञान से प्रकाशित होने वाले विद्वान यथार्थ धारण करने वाले-ये भी स्वराज्य-शासन करने के अधिकारी हैं।

ऐसे ही लोग राष्ट्र पर शासन कर उसका उद्धार कर सकते हैं।

(कल्याण से साभार)

Thursday, October 11, 2007

मनु स्मृति: राज्य के दण्ड से ही अनुशासन संभव

  1. देश, काल, विद्या एवं अन्यास में लिप्त अपराधियों की शक्ति को देखते हुए राज्य को उन्हें उचित दण्ड देना चाहिए।
  2. सच तो यह है कि राज्य का दण्ड ही राष्ट्र में अनुशासन बनाए रखने में सहायक तथा सभी वर्गों के धर्म-पालन कि सुविधाओं की व्यवस्था करने वाला मध्यस्थ होता है।
  3. सारी प्रजा के रक्षा और उस पर शासन दण्ड ही करता है, सबके निद्रा में चले जाने पर दण्ड ही जाग्रत रहता है।
  4. भली-भांति विचार कर दिए गए दण्ड के उपयोग से प्रजा प्रसन्न होती है। इसके विपरीत बिना विचार कर दिए गए अनुचित दण्ड से राज्य की प्रतिष्ठा तथा यश का नाश हो जाता है।
  5. यदि अपराधियों को साजा देने में राज्य सदैव सावधानी से काम नहीं लेता, तो शक्तिशाली व्यक्ति कमजोर लोंगों को उसी प्रकार नष्ट कर देते हैं, जैसे बड़ी मछ्ली छोटी मछ्ली को खा जाती है।
  6. संसार के सभी स्थावर-जंगम जीव राजा के दण्ड के भय से अपने-अपने कर्तव्य का पालने करते और अपने-अपने भोग को भोगने में समर्थ होते हैं ।

Friday, June 29, 2007

चाणक्य नीति:बेईमानी का धन दस वर्ष बाद नष्ट हो जाता है

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  1. धूर्तता, अन्याय और बैईमानी आदि से अर्जित धन से संपन्न आदमी अधिक से अधिक दस वर्ष तक संपन्न रह सकता है, ग्यारहवें वर्ष में मूल के साथ-साथ पूरा अर्जित धन नष्ट हो जाता है।

*इसका सीधा आशय यह है कि भ्रष्ट और गलत तरीके से कमाया गया पैसा दस वर्ष तक ही सुख दे सकता है, हो सकता है कि इससे पहले ही वह नष्ट हो जाय।


२. अर्थाभाव में मित्र, स्त्री, नौकर स्नेहीजन भी व्यक्ति का आदर नहीं करते, यदि वही व्यक्ति पुन: संपन्न हो जाये तो अनादर करने वाले फिर आदर करने लगते हैं।



Wednesday, June 27, 2007

चाणक्य नीति:सांप के साथ रहना ज्यादा अच्छा

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दुर्जन और सांप के साथ रहना एक जैसा दुखदायी होता है, और दोनों में से एक के साथ मजबूरीवश रहना भी पडे तो दुर्जन के साथ रहने की अपेक्षा सांप के साथ रहना ज्यादा अच्छा है। क्योंकि सांप तो अपने जीवन पर संकट आने पर ही काटता है , पर दुष्ट तो समय-असमय और कारण-अकारण कष्ट देने के लिए प्रयास करता है। दुर्जन द्वारा पहुंचायी गयी पीडा सर्पदंश से ज्यादा खतरनाक होती है। इसीलिये दुर्जन से कोई संबंध नहीं रखना चाहिऐ, वह कभी भी विश्वासघात कर सकता है।

Monday, June 25, 2007

चाणक्य नीति

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१.बुद्धिमान पुरुष को तब तक ही भय की चिंता करना चाहिए जब तक वह सामने नहीं आ जाता, अगर एक बार वह सामने आ जाये तो उसका मुकाबला करना ही बेहतर है। भय के सामने आने पर घबडा कर छिपने की कोशिश करना समझदारी का काम नहीं है।
२.बुद्धिमान व्यक्ति को सदैव यह सोचना चाहिए कि उसके मित्र कितने है, और उसका समय कैसा चल रहा है। इसके अलावा अपने निवास स्थान और अपने आय व्यय पर भी विचार करते रहना चाहिए। उसे इस बात पर भी चिन्तन करना चाहिऐ कि वह कौन है, आत्मा या शरीर , स्वाधीन है अथवा पराधीन, तथा उसकी ताकत कितनी है, उसे इन बातों पर विचार करते रहना चाहिए वर्ना वह पत्थर की तरह निर्जीव हो जाता है।

Saturday, June 23, 2007

चाणक्य नीति

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1.कुछ बातें किसी के समक्ष नहीं प्रकाशित करनी चाहिए जैसे -अपनी सिद्ध ओषधि, अपने धर्म-कर्म का रुप, घर के दोष, पति-पत्नी के आपसी संबंध, बुरा भोजन, और निंदा। दूसरों के सामने अपनी यह बातें कहने से बदनामी ही होती है, और किसी प्रकार के लाभ की आशा करना ही बेकार है।

२.मैले वस्त्र धारण करने, दांत साफ न रखने, सूर्योदय व सूर्यास्त के समय सोने , कटु वचन बोलने और अधिक भोजन करने वाले मनुष्यों को समाज में न तो धन प्राप्त होता है न यश। समाज में ऐसे व्यक्ति को ऊंची दृष्टि से नहीं देखा जाता। यदि साक्षात विष्णु भी हौं तो लक्ष्मी उन्हें छोड़ देती है, अन्यों का तो कहना ही क्या?

Thursday, May 10, 2007

वाद और नारों से देश नहीं चला करते

NARAD:Hindi Blog Aggregatorमैं नारों से उतेजित नहीं होता और किसी वाद से प्रभावित नहीं होता, इतिहास कभी पढा था पर अब उस पर यकीन नहीं करता मैं अपनी बात बता त सकता हूँ कि उस समय क्या हुआ था जो इतिहास में दर्ज तथ्यों से मेल नहीं खायेगी, इतिहास लिखा नहीं लिखवाया जाता उन लोगों द्वारा जो अपना नाम अपने हिसाब से मरने के बाद भी अपना नाम जिन्दा चाहते हैं और उसे जो दोहराते हैं वह भ्रम पैदा कर आदमी की सोच को अपने पास गिरवी रखना चाहते हैं । मैं कोई ज्ञानी नहीं हूँ पर ज्ञान के अर्थ समझता हूँ। आख़िर मैं कैसे अपनी सोच कायम करता हूँ। सरल सी बात है, एक घटना यहं कई बार दोहराती है और उस घटना को देखकर इतिहास वाली घटना पर पेस्ट कर दीजिए, और मान लीजिये कि उस समय भी वही हुआ था-आप पाएँगे जिसने इतिहास लिखा था उसने कई घटनाओं को तोड़ा-मरोडा है। आज नारद ने सोमवार से पहले ही ब्लोग को अपने यहां खींच लिया तो मुझे अपने धर्म ग्रंथों में वर्णित नारदजी की याद आयी चाहे जब जहाँ पहुच जाते थे। अपने अध्यात्म में मेरी गहरी रूचि है पर इससे मुझे पोंगा मत समझ लेना । अपने विचार व्यक्त करने का मेरा एक अपना ही तरीका है , मैं दूसरों से प्रश्न नहीं करता उनके उत्तर खुद ही ढूँढता हूँ । जैसे मैं किसी अजनबी से बात करता हूँ तो उसका परिचय नहीं पूछता और देता हूँ -मुझे मालुम है कि जब वार्तालाप का दौर चल रहा है तो दोनों एक-दुसरे को जान लेंगे-न भी जाने तो क्या? जरूरी नहीं है कि सबको जाना जाये या अपको सब जाने ?
बात चल रही थी वाद और नारों की हो रही थी। कुछ नारे इस देश में लोकप्रिय हुए जैसे -अंग्रेजों देश छोडो का नारा लगा तो पूरे देश्में एक लहर चल पडी और देश आज़ाद हो गया। आजादी के बाड़े एक नारा गूंजा "सारे जहाँ से हिदोस्तान हमारा" जो एक ऐसे शायर के गीत से लिया गया जो बाद में पाकिस्तान चला गया । उसका गीत आज भी स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस सुनने को मिल जाता है। अब बताईये क्या यह नारा मुझे प्रभावित कर सकता है? और फिर क्या देश के जो हालत सामाजिक, आर्थिक, नैतिक, और वैचारिक दृष्टि से हैं उसे देखकर हम यह दावा कर सकते हैं । धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद, और गरीबी हटाओ के नारे इस देश में बहुत लोकप्रिय हुए पर क्या हुआ उनका? इनसे भ्रमित हुए और उन लोगों को अपने सिर पर बैठाते रहे किसी वाद को ओढ़ने और नारे लगाने के आलावा और कुछ नहीं जानते थे । झूठ और भ्रष्टाचार पर आधारित चरित्र लोकप्रिय हुए और सत्य और ईमानदारी को मूर्खता का पर्याय माना जाता है। धनी, उच्च पदस्थ और प्रतिष्ठित व्यक्ति के इर्द गिर्द मंडराने का लोभ कितने लोग छोड़ पाते हैं और कभी ऐसे लोगों की असलियत जानने की कोशिश करते हैं और जान पाते हैं तो क्या उनके सामने कहने का हम में साहस होता है। इस पर भी मैं जवाब नहीं मांगूंगा क्योंकि जैसा मैं हूँ वैसे तुम भी हो और पहले भी ऐसे लोग थे। देश का बंटवारा हुआ, उस पर वही लिखा गया जो उस समय के लोग चाहते थे, उनमें भी कुछ लोग थे जिन्होंने भावावेश मैं लिखा तो कुछ ने अपने आदर्श व्यक्तित्वों के लिए लिखते हुए अति की है जैसे आज के लोग कर रहेहैं । क्या कभी किसी ने ऎसी कल्पना की कि इस देश का बंटवारा नहीं होता तो कैसा होता इस देश का परिद्रश्य ?अच्छा या बुरा ? इस बारे में आम लोग सोचें नहीं इसीलिये तमाम तरह के "वाद" और नारे रचे गये ताकी उनकी सोच में उन्हीं लोगों का व्यक्तित्व रहे जो आजादी के समय था। उद्देश्य यही था कि अब स्वदेशी नेतृत्व अब अपने संघर्ष के बदले सत्ता का सुख भोगता रहे और इसके लिए अंग्रेजों द्वारा रची गयी लार्ड मैकाले की शिक्षा पध्दती को ही बनाए रखा गया जो गुलाम पैदा करती है योध्दा नहीं । भारत की जो पुराणी गुरुकुल प्रणाली है उसे धर्मनिरपेक्षता के सिध्दांत के तहत दूर रखा गया।
आज प्रथम स्वतंत्रा संग्राम की १५०वी वर्षगांठ है यह बात मुझे यह बात लिखते लिखते याद आयी , उस संग्राम के शहीदों को मेरी श्रध्दांजलि । मैं जब आजादी के उन दीवानों के बारे में सोचता हूँ , तो एक विचार मेरे दिमाग में आता है कि क्या आजाद भारत के इस स्वरूप के उन्होने कल्पना की होगी ? जवाब भी मैं खुद ही देता हूँ नहीं । केवल किसी "वाद" या नारे पर देश नहीं चला करते यह एक सर्व मान्य तथ्य है पर यह देश चला और जो हालत है हमारे सामने हैं । सवाल अपने से करना और जवाब भी खुद देना तभी सोचने में गहराई आयेगी जो इस देश का एक बहुत बड़ा वर्ग नहीं चाहता। शेष फिर कभी

Friday, April 6, 2007

जीं हाँ, मैं बबूल को भी सहलाता हूँ!

कहा जाता है बोए पेड बबूल के तो आम कहॉ से होय। यह कहावत अपने आप में बहुत बड़ा दर्शन है इसमें कोई संदेह नहीं है , पर केवल इसी बात को लेकर बबूल से नफ़रत करना मुझे कभी नहीं अच्छा नहीं लगता। वजह! बबूल के सहारे ही उन पेड-पोधों की रक्षा की जाती है जिनके आवारा पशुओं द्वारा खाए जाने का खतरा रहता है। जहाँ भी कोइ पेड लगाया जाता है तो उसके चारों और बबूल की झाडियाँ रख जाती हैं है ताकी कोई पशु न खा सके।
मुझे याद है जब हमने कालोनी में मकान बनाया था तब एक संस्स्था द्वारा पूरी कालोनी में तमाम तरह के पेड-पोधे लगाए गए। हमारे घर के बाहर दो पोधे लगाए गए । हमने उनको दोतीन पानी दिया । एक दिन देखा कि गाय ने एक पौधा खा लिया है। तब वहां से एक मजदूर निकल रहा था। उसे हम जानते तक नहीं थे। उसने उस गाय को वहां से हटाया और हमें आवाज़ दीं। हम पति-पत्नी बाहर निकल आये। उसने गाय द्वारा एक पौधा खाने की जानकारी दीं और सुझाव दिया कि ' इस पौधे की रक्षा के लिए उसके चारों तरफ बबूल की डालियाँ लगा दें। हमारी श्रीमतीजी ने उससे कहीं से बबूल की डालियाँ लाने को कहा तो वह हंसकर बोला-"यहां बबूल की क्या कमी?"
ऐसा कहकर वह वहन से चला गया और थोडी दूर जाकर बबूल की डालियाँ ले आया और उसने उसके चारों और इस तरह लगा दीं कोइ पशु उसे न खा सके। उसके बाद हमने देखा वय पौधा फल-फूलकर एक वृक्ष के रुप में आज भी हमें शुद्ध प्राणवायु प्रदान करता है। एक गुरूजी की सलाह पर हमने अपनी ज़िन्दगी से तनाव और संभावित बिमारियों से बचने के लिए पांच वर्ष पूर्व हमने योग्साधना शुरू की। हमने देखा जब कभी हमें सुबह उठने में देरी हो जाती है तब जब हम उस पेड के नीचे बैठाकर योगासन और प्राणायाम करते है तो यह साफ समझने में आता है कि इस पेड की वजह से ही हमें शुद्ध वायू मिल रही है। फिर याद करता हूँ उस बबूल की डालियों और उसे लाने वाले उस मजदूर को जिसे न हमने पहले देखा और न उससे बाद। दोनों पेड भगवान् की तरह थे- जिन्होंने उसे जीवन दिया। फिर में सोचता होंन कि बबूल के पेड को उससे जिस दुर्गुण की वजह से सम्मान नहीं दिया जाता वही उसका गुन भी तो है वरना वह पेड की रक्षा कैसे करत। फिर मैं उस मजदूर के बारे में सोचता हूँ। लोग गरीबों को हे द्रष्टि से देखते हीं, पर अगर वह मजदूर गरीब न होता तो पैदल नहीं निकलता और हमारे पोधे की रक्षा का वह प्रयास नही करता। यकीनन कोइ स्कूटर, मोटर सायकल या कर में चलने वाला इस पच्दे में नहीं पडता।
वैसे भी मैं कभी बबूल से नफरत नहीं करता। में जनता हूँ कि चुभाना उसका गुन है। इसी तरह यहां किसी में गुन या अवगुण नहीं होता। देखने का हमारा नज़रिया होता है। हमें उस पर विचार करना चाहिऐ। दोष हमें अपने विचार में नहीं रखना चाहिऐ । हमारी द्रष्टि में दोष होता है जो हमें किसी में दोष दिखाता है। जब हम अपने विचारों को साफ करेंगे तब हमें किसी में दोष दिखाई नहीं देगा। इसीलिये मैं कभी बबूल से भी नही चिढ़ता। जब कही उसकी डाली मेरे सामने आ जाती है तो उसे सहलाता हूँ उससे बीच काँटों में उंगली रखकर - मैं यह नही भूल सकता कि उसने मेरे घर के बाहर लगे पेड की रक्षा की थी।

Wednesday, April 4, 2007

क्रिकेट पर एक फालतू संपादकीय

आख़िर सचिन प्रकट हो गये। उनके भक्त उन्हें भारत के विश्व कप से बाहर होने के बाद से से ढूँढ रहे थे। उन्हें भी इंतज़ार था कि कब मोका मिले और बयाँ देकर यह जटाएं कि भईया हम अभी क्रिकेट खेलेंगे। वह ग्रेग चैपल के ऐसे बयाँ पर प्रतिक्रिया देने के लिया बाहर आये जिसकी पुष्टि होना बाकी है कि वह उन्होने दिया भी कि नहीं। यह बयां टीवी और अखबारों में प्रकाशित हुआ था। ऐसा लगता है कि सचिन के ऐसे भक्त पत्रकारों ने लीक करवाया जो उन्हें बाहर आने का अवसर देना चाहते थे । उनकी मदद क्रिकेट से जुडे ऐसे लोगों ने की जिनके हाथ वह रिपोर्ट हाथ लग गयी जिसमें उन्होने सचिन सहित पांच खिलाड़ियों को अनुशासन हीनता में लिप्त बताया था।
ऐसा लगता है कि बोर्ड केलोगों ने शायद विदेशी कोच इसलिये रखा था कि बडे नाम वाले इन खिलाड़ियों को तो हटा नहीं सकते क्यौंकी इनके आका सभी जगह बैठें हैं और क्रिकेट उनके पैसे या ताकत के बिना चल भी नहीं सकता।
एक बात और है कि भारतीय टीम की ऎसी दुर्दशा का अंदेशा उन्हें पहले से ही था यही वजह थी कि उन्होने विदेशी कोच रखा ताकी खिलाडी उस पर बरस कर देश के लोगों का ध्यान बँटा सकें।
मैं सचिन के इस बयां के बाद टीवी चैनलों पर उनके समर्थक खेलप्रेमियों के संदेश देखकर यह समझ सकता हूँ कि अब लोगों के जज्बातों से खेलने का दूसरा दौर शुरू हो चूका है। सचिन जिस तरह बाहर आया है वह उसकी अपनी योजना का हिस्सा नहीं हो सकता। कल जब मैंने चैपल का बयां देखा था तभी यह समझ में आ गया था कि अब देशी विदेशी का मामला बनेगा। सचिन अभी भी यह सोच रहे हैं कि लोगों के वह हीरो हैं तो अपनी गलतफहमी दूर कर लें । काठ की हांडी एक बार चढ़ती है वह तो भाग्शाली हैं कि चार बार इसे चार बार चडा गये। अब कहते हैं कि मैंने देश के लिया बहुत क्रिकेट खेली है। क्रिकेट मेरा जीवन है , इसके द्वारा मैंने देश की भारी सेवा की है।
हम उनका हर दावा मान लेते हैं। पर हमारा कहना है कि आप अब दुसरे खिलाड़ियों को अवसर देने के लिए वहन से हटने की घोषणा क्यों नहीं कर देते/ जाहिर है वह ऐसा नही करेंगे क्योंकि उनके लोगों ने बढ़ी कठिनाई से उन्हें जनता के सामने आनी का मौका बनाया है इसीलिये नही कि वह सन्यास ले लें ।
बहुत कम लोगों का ध्यान इस तरफ जाएगा कि अभी भी एक मौका और आने वाला है टीम इंडिया की लुटिया डुबोने का। अभी कुछ दिनों में दखिन अफ्रीका में बीस-बीस ओवेरों का एक विश्वकप होने वाला है। यह उसकी तैयारी है। एक बात और बता दूं एक दिवसीय क्रिकेट के समय बीट गया। अब बीस-बीस ओवेरों का समय आने वाला है। अपने सचिन भईया अ ब उस पर अपनी द्रष्टि जमाये हुए हैं। उनके साथ जुडे लोगों को अभी भी उन पर भरोसा है। इस समय जो विज्ञापन आऊट देतेद हो गये भारतीय टीम के बाहर होने से वह उस समय काम आएंगे।

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