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Monday, August 10, 2009

संत कबीर के दोहे-भक्त नारी की बराबरी रानी भी नहीं कर सकती (kabir ke dohe-bhakt nari aur rani)

दुखिया भूखा दुख कीं, सुखिया सुख कौं झूरि
सदा अजंदी राम के, जिनि सुख-दुख गेल्हे दूरि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि भूख के कष्ट के कारण दुखी आदमी मर रहा है तो ढेर सारे सुख के कारण सुखी भी कष्ट उठा रहा है किंतु राम के भक्त तो हर हाल में में मजे से रहते हैं क्योंकि वह दुःख सुख के भाव से परे हो गये हैं।

हैवर गैवर सघन धन, छन्नपती की नारि
तास पटेतर ना तुलै, हरिजन की पनिहारि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि भगवान की भक्ति करने वाली गरीब नारी की बराबरी महलों में रहने वाली रानी भी नहीं कर सकती भले ही उसके राजा पति के पास हाथियों और घोड़ो का झुंड और बहुत सारी धन संपदा है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-दुनियां में तीन तरह के लोग होते हैं-दुःखी,सुखी और भक्त। अभाव और निराशा के कारण दुःखी आदमी हमेशा परेशान रहता है तो सुखी आदमी अपने सुख से उकता जाता है और वह हर ‘मन मांगे मोर’ की धारा में बहता रहता है। विश्व के संपन्न राष्ट्रों के देश भारत के अध्यात्मिक ज्ञान की तरफ आकर्षित होते हैं तो भारत के लोग उनकी भौतिक संपन्नता प्रभावित होते हैं। पश्चिम में तनाव है तो पूर्व वाले भी सुखी नहीं। कहने का तात्पर्य यह है कि लोेग इस मायावी संसार में केवल दैहिक सुख सुविधाओं के पीछे भागते हैं। जिसके भौतिक साधन नहीं है वह कर्ज वगैरह लेता है और फिर उसे चुकाते हुए तकलीफ उठाता है और अगर वह चीजें नहीं खरीदे तो परिवार के लोग उसका जीना हराम किये देता है। सुख सुविधा का सामान खरीद लिया तो फिर दैहिक श्रम से स्त्री पुरुष विरक्त हो जाते हैं और इस कारण स्वास्थ बिगड़ने लगता है।

जिन लोगों ने अध्यात्म ज्ञान प्राप्त कर लिया है वह जीवन को दृष्टा की तरह जीते हैं और भौतिकता के प्रति उनका आकर्षण केवल उतना ही रहता है जिससे देह का पालन पोषण सामान्य ढंग से हो सके। वह भौतिकता की चकाचैंध मेंे आकर अपना हृदय मलिन नहीं करते और किसी चीज के अभाव में उसकी चिंता नहीं करते। ऐसे ही लोग वास्तविक राजा है। जीवन का सबसे बड़ा सुख मन की शांति हैं और किसी चीज का अभाव खलता है तो इसका आशय यह है कि हमारे मन में लालच का भाव है और कहीं अपने आलीशान महल में भी बैचेनी होती है तो यह समझ लेना चाहिये कि हमारे अंदर ही खालीपन है। दुःख और सुख से परे आदमी तभी हो सकता है जब वह निष्काम भक्ति करे।
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Tuesday, February 17, 2009

कबीर के दोहेःपहले आदमी को परखें फिर संपर्क बढ़ायें

संत कबीर कहते हैं कि
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कबीर देखी परखि ले, परखि के मुखा बुलाय
जैसी अन्तर होयगी, मुख निकलेगी आय
जब कोई मिले तो उसे पहले अच्छी प्रकार देख परख के पश्चात् ही उससे मुख मिलाओ। जैसी उसके मन में बात होगी वैसी कहीं न कहीं मुंह से निकल ही आयेगी।
पहिले शब्द पिछानिये, पीछे कीजै मोल
पारख परखै रतन को,शब्द का मोल न तोल

पहले किसी की बात सुनकर उसके शब्द पर विचार करें फिर अपने विवेक से निर्णय ले। हीरे का मोल तो होता है इसलिये उसके लिये मोलभाव किया जाता है पर सच्चे शब्दों का कोई मोल नहीं होता-यानि दूसरे के जो शब्द हैं उनमें अगर कमी दिखाई दे तो उस पर यकीन न करें और केवल अच्छी संभावना को मानकर संपर्क न बढ़ायें।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-प्रचार माध्यमों ने आदमी की मन बुद्धि पर अधिकार कर लिया है इसलिये लोगों की अपने विवेक से काम करने की शक्ति नष्ट हो गयी है। अभिनेता,कलाकार,लेखक और बुद्धिजीवियों को उनके सुंदर शब्दों पर ही योग्य मान लिया जाता है। फिल्मों में अभिनेता और अभिनेत्रियां दूसरे लेखकों द्वारा बोले गये शब्द बोलते हैं पर यह भ्रम हो जाता है कि जैसे वह स्वयं बोल रहे हैं। अनेक विज्ञापन आते हैं जिसमें सुंदर शब्दों के साथ प्रचार होता है और लोग मान लेते हैं। शब्दों के जाल मं किसी को भी फंसाना आसान हो गया है और जो एक बार किसी के जाल में फंस गया तो उसके हितैषी चाहें भी तो उसे नहीं निकाल सकते।

इस मायावी दुनियां में पहले भी कोई कम छल नहीं था पर अब तो खुलेआम होने लगा है। अनेक ऐसे लोग हैं जो बदनाम हैं पर वह पर्दे पर चमक रहे हैं क्योंकि वह बोलते बहुत सुंदर हैं। प्रचार माध्यमों में अपराधियों का महिमा मंडन हो रहा है और वह भी अपने को पवित्र बताते हैं। तब लगता है कि जब सभी लोग पवित्र हैं तब इस दुनियां में अपराध क्यों हो रहा है? यह सब समाज की विवेक शक्ति के पतन का परिचायक हैं क्योंकि हम दूसरें के शब्दों पर विचार नहीं करते जबकि होना यह चाहिये कि जब कोई दूसरा व्यक्ति बोल रहा है तो उसके शब्दों पर विचार करें। इतना ही नहीं जब तक किसी के शब्दों को परख न लें तब तक उस पर यकीन न करें। अपना किसी से संपर्क धीरज से बढ़ायें क्योंकि बातचीत में कहीं न कहीं आदमी में मूंह से सच निकल ही आता है।
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Monday, January 26, 2009

संत कबीर वाणीः भक्त होते हैं दुःख और सुख के भाव से परे

हैवर गैवर सघन धन, छन्नपती की नारि
तास पटेतर ना तुलै, हरिजन की पनिहारि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि भगवान की भक्ति करने वाली गरीब नारी की महलों में रहने वाली रानी भी नहीं कर सकती भले ही उसके राजा पति के पास हाथियों और घोड़ो का झुंड और बहुत सारी धन संपदा है।
दुखिया भूखा दुख कीं, सुखिया सुख कौं झूरि
सदा अजंदी राम के, जिनि सुख-दुख गेल्हे दूरि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि भूख के कष्ट के कारण दुखी आदमी मर रहा है तो ढेर सारे सुख के कारण सुखी भी कष्ट उठा रहा है किंतु राम के भक्त तो हर हाल में में मजे से रहते हैं क्योंकि वह दुःख सुख के भाव से परे हो गये हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-दुनियां में तीन तरह के लोग होते हैं-दुःखी,सुखी और भक्त। अभाव और निराशा के कारण दुःखी आदमी हमेशा परेशान रहता है तो सुखी आदमी अपने सुख से उकता जाता है और वह हर ‘मन मांगे मोर’ की धारा में बहता रहता है। विश्व के संपन्न राष्ट्रों के देश भारत के अध्यात्मिक ज्ञान की तरफ आकर्षित होते हैं तो भारत के लोग उनकी भौतिक संपन्नता प्रभावित होते हैं। पश्चिम में तनाव है तो पूर्व वाले भी सुखी नहीं। कहने का तात्पर्य यह है कि लोेग इस मायावी संसार में केवल दैहिक सुख सुविधाओं के पीछे भागते हैं। जिसके भौतिक साधन नहीं है वह कर्ज वगैरह लेता है और फिर उसे चुकाते हुए तकलीफ उठाता है और अगर वह चीजें नहीं खरीदे तो परिवार के लोग उसका जीना हराम किये देता है। सुख सुविधा का सामान खरीद लिया तो फिर दैहिक श्रम से स्त्री पुरुष विरक्त हो जाते हैं और इस कारण स्वास्थ बिगड़ने लगता है।

जिन लोगों ने अध्यात्म ज्ञान प्राप्त कर लिया है वह जीवन को दृष्टा की तरह जीते हैं और भौतिकता के प्रति उनका आकर्षण केवल उतना ही रहता है जिससे देह का पालन पोषण सामान्य ढंग से हो सके। वह भौतिकता की चकाचैंध मेंे आकर अपना हृदय मलिन नहीं करते और किसी चीज के अभाव में उसकी चिंता नहीं करते। ऐसे ही लोग वास्तविक राजा है। जीवन का सबसे बड़ा सुख मन की शांति हैं और किसी चीज का अभाव खलता है तो इसका आशय यह है कि हमारे मन में लालच का भाव है और कहीं अपने आलीशान महल में भी बैचेनी होती है तो यह समझ लेना चाहिये कि हमारे अंदर ही खालीपन है। दुःख और सुख से परे आदमी तभी हो सकता है जब वह निष्काम भक्ति करे।
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Tuesday, October 28, 2008

संत कबीर संदेशः वक्ता तो बकता रहे पर श्रोता घर में न हो तो क्या फायदा?

संत शिरोमणि कबीरदास जी के अनुसार
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करनी का रजमा नहीं, कथनी मेरू समान
कथता बकता मर गया, मूरख मूढ़ अजान

कुछ लोग अपनी आत्मप्रवंचना अधिक ही करते हैं-खासतौर से वह लोग जिन्होंने धार्मिक किताबों को तोते की तरह रट लिया होता है। उनके कथन तो पहाड़ के समान होते हैं पर उनके कर्म का कुछ अता पता नहीं होता। वह अपनी बात बकते हुए इस दुनियां से विदा हो जाते हैं।
स्त्रोता तो घर ही नहीं, वक्ता बकै सो बाद
स्त्रोता वक्ता एक घर, तब कथनी को स्वाद

वक्ता अपनी बात करता रहे पर श्रोता कुछ सुने ही नहीं तो ऐसी बकवाद किस काम की। फिर जो लोग अपनी विद्वता दिखाते हैं उनके घर के लोग ही उनकी बात नहीं मानते। सही मायने में सत्संग तो तभी हो सकता है जब वक्ता और श्रोता का ध्यान अपने ठिकाने पर हो।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-देश में जगह जगह धार्मिक कार्यक्रम होते हैं पर फिर भी नफरत और हिंसा को जोर बढ़ रहा है। अनेक कथित धर्मों के आचार्य अपने धर्मों के लोगों के शांति, अहिंसा,प्रेम और दया का संदेश देते फिरते हैं पर वह निष्प्रभावी होता है क्योंकि न तो सुनने वाला हृदय से सुनता है और न कहने वाला ही अपने ज्ञान को धारण किये रहता है। समाज को अनेक भागों में बांटकर उनका नेतृत्व करने वाले सभी धर्मों के विद्वान केवल कहने के लिये कहते हैं पर उनको सुनने वालों का ध्यान कहीं अन्यत्र होता है। यही कारण है कि जितने धार्मिक कार्यक्रम होते हैं उनका परिणाम शून्य ही होता है।
कई बार तो अजीब बात होती है। कहीं तनाव होता है तो वहां समस्त समूहों के धार्मिक विद्वान सड़क पर आकर शंाति यात्रा निकालते हैं। उनसे पूछिये कि वह प्रतिदिन लोगों को शिक्षित करते हैं पर ऐसी नौबत आती क्यों है?
इसका उत्तर किसी के पास नहीं होता। वजह! ज्ञान देने वाले तोते की तरह उसे रटे होते हैं पर उसको धारण नहीं कर पाते। वह पुराने प्रसंगों को पुराने ही ढंग से सुनाते हैं। नये ढंग से नये संदर्भ में उनको व्याख्या करना ही नहीं आती। यह तभी संभव है जब वह कथित ज्ञानी विद्वान अपने किताबों के लिखे ज्ञान को धारण किये हुए हों साथ ही उनकी कथनी और करनी में अंतर श्रोताओं को नहीं दिखता हो।

धार्मिक विद्वानों की कथनी और करनी के अंतर के कारण ही जो लोग उनके कार्यक्रमों में जाते हैं उनका उद्देश्य समय पास करना होता है न कि ज्ञान प्राप्त करना। यही कारण है कि वक्ता तो अपनी बात कहते हैं पर श्रोता का दिमाग अपने घर में नहीं होता। और अच्छे खासे सत्संग केवल दिखावा बनकर रह जाते हैं।
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Friday, September 26, 2008

संत कबीर संदेशः दो मुखों से बजने वाले पर पड़ता है तमाचा

जौ मन लागै एक सों, तो निरुवारा जाय
तूरा दो मुख बाजता, घना तमाचा खाय


संत श्री कबीरदास जी कहते हैं अगर एक ही स्थान या काम में मन लगाया तो शीघ्र ही परिणाम प्राप्त हो जाता है पर अगर जो ढोल की तरह दो मुखों से काम करता है तो उसे थप्पड़ ही झेलने पड़ते हैं अर्थात उसे असफलता हाथ लगती है।

जो यह एक न जानिया, बहु जाने क्या होय
एकै ते से सब होत है, सब ते एक न होय


संत श्री कबीर जी के मतानुसार जो एक विषय का ज्ञाता नहीं हो पाता वह अनेक के बारे में क्या जानेगा। जो ज्ञानीजन अपने अभ्यास करते रहने से एक विषय के बारे में जान जाते हैंं तो अन्य विषयों का भी उनको ज्ञान हो जाता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-चाहे भगवान की भक्ति हो या अन्य कोई विषय आदमी को एकाग्रता से काम करना चाहिए। एक साथ अनेक विषयों का अध्ययन कर पारंगत होने की बजाय पहले एक विषय के विशेषज्ञता प्राप्त कर लेने से अन्य विषयों की जानकारी भी स्वतः हो जाती है। मूल रूप से कोई एक विषय होता है पर उससे अन्य विषयों की जानकारी भी किसी न किसी रूप से जुड़ी होती है। बस अंतर यह रहता है कि कहीं किसी विषय की प्रधानता होती है तो कहीं किसी अन्य की। अगर एकाग्रता से अपने एक ही विषय में अभ्यास किया जाये तो अन्य ज्ञान भी स्वतः आता है पर अगर भटकाव आया तो कोई जीवन मेें सफलता प्राप्त नहीं हो पायेगी।

यही स्थिति भक्ति के विषय में भी है। एक ही इष्ट का स्मरण करना चाहिये और उसके स्वरूप में कभी बदलाव नहीं करना चाहिये। अगर हम किसी इष्ट को बचपन से पूजते आये हैं तो उसमें बदलाव नहीं करना चाहिये। ऐसा बदलाव जीवन में भ्रम और तनाव पैदा करता है। जो लोग बचपन से भक्ति नहीं करते वह तो बाद में किसी की भी भक्ति कर सकते हैं पर जिन्होंने बचपन से ही अपने इष्ट का मानते हैं उनको बदलाव नहीं करना चाहिये।

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Thursday, September 25, 2008

संत कबीर वाणीः अधिक किताब पढ़ने ये अच्छा है योग करना

कबीर पढ़ना दूर कर, अति पढ़ना संसार
पीर न उपजै, जीव की, क्यौं पावै करतार


संत कबीर जी कहते हैं कि अधिक पढ़ना छोड़ दो क्योंकि यह सांसरिक लोगोंे का काम है। अधिक पढ़ने से लोगों के हृदय में दया का भाव उत्पन्न नहीं होता इसलिये परमात्मा को कैसे प्राप्त कर सकते हैं।

मैं जानौं पढ़ना भला, पढ़ने से भल जोग
रामनाम सो प्रीति कर, भावे निन्दो लोग


संत कबीरदास जी कहते हैं कि मै यह समझता था कि पढ़ना अच्छी बात है और पढ़े लिखे लोग भले होते हैं पर अब तो यह लगता है कि राम के नाम से ही प्रेम किया जाये भले ही लोग इसके लिये निंदा करते रहें। पढ़ने से तो अच्छा है कि योग साधना की जाये।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-संत कबीरदास जी कहते के समय में तो केवल प्राचीन साहित्य की शिक्षा दी जाती थी तब भी लोगों का यह हाल था तो अब तो केवल अंग्रेजी पद्धति के आधार पर नवीनतम विषयों की शिक्षा दी जाती है तब यह कैसे अपेक्षा की जाये कि आधुनिक समाज वास्तव में हृदय से संवदेनशील होगा। पहले तो अध्यात्म ज्ञान से परिपूर्ण शिक्षा दी जाती थी तब भी अधिक पढ़े लिखे लोग ज्ञान के अहंकार में आकर समाज को प्रति हृदय हीनता का भाव अपनाते थे तो अब तो अध्यात्म ज्ञान जैसा कोई विषय ही नहीं है तब यह कैसे अपेक्षा की जाये कि शिक्षित वर्ग में समाज के प्रति संवेदना का भाव रहे।

देखा जाये तो लिखने वाले तो आजकल भी जमकर लिख रहे हैं पर उनके पढ़े और कहे को देखकर लगता नहीं है कि उनके अंदर को का वैसे ही संवेदना का भाव हैं जो उनके शब्दों में दिख रहा है। लिखकर केवल नाम और नामा कमाना है केवल इसलिये शिक्षित लोग सक्रिय है। कई तो ऐसे विद्वान भी है जो अध्यात्म के विषय पर बोल रहे हैं पर उनको पता ही नहीं कि इसका क्या आशय है-अध्यात्म नाम का विषय है और बोल रहे हैं किसी धर्म के विषय पर। यह हास्यास्पद स्थिति कई बार देखने को मिलती है। मतलब यह है कि जितना अधिक शिक्षित उतना ही अधिक भ्रमित हो गया है। ऐसे में तो केवल यही लगता है कि भगवान की भक्ति तथा तन, मन और विचारों के विकार दूर करने के लिये योग साधना की जाये तो वही अच्छा है।
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Sunday, September 21, 2008

रहीम के दोहे: मूर्खों को दण्डित करना भी आवश्यक

खीरा सिर तें काटिए, मलियत नमक बनाय

रहिमन करुए मुखन को , चाहिअत इहै सजाय

कविवर रहीम कहते हैं कि जिस तरह खीरे का मुख काटकर उस पर नमक घिसा जाता है तभी वह खाने में स्वाद देता है वैसे ही मूर्खों को अपनी करनी की सजा देना चाहिऐ ताकि वह अनुकूल व्यवहार करें।

नये संदर्भ में व्याख्या-यह सही है कि बडों को छोटों के अपराध क्षमा करना चाहिए, पर कुछ लोग ऐसे होते हैं जो नित्य मूर्खताएं करते रहते हैं। कभी किसी की मजाक उडाएंगेतो कभी किसी को अपमानित करेंगे। कुछ तो ऐसी भी मूर्ख होते हैं जो दूसरे व्यक्ति को शारीरिक, आर्थिक और मानसिक हानि पहुँचने के लिए नित्य तत्पर रहते हैं। ऐसे लोगों को बर्दाश्त करना अपने लिए तनाव मोल लेना है। ऐसे में अपने क्रोध का प्रदर्शन कर उनको दण्डित करना चाहिए। अगर ऐसा नहीं करेंगे तो उनका साहस बढ़ता जायेगा।

व्याख्याकार स्वयं कई बार ऐसा देख चुका है कि कई लोग तो इतने नालायक होते हैं कि उनको प्यार से समझाओ तो और अधिक तंग करने लगते हैं और जब क्रोध का प्रदर्शन कर उन्हें धमकाया जाये तो वह फिर दोबारा वह बदतमीजी करने का साहस नहीं कर पाते। हालांकि इसमें अपनी सीमाओं का ध्यान अवश्य रखना चाहिऐ और क्रोध का बहाव बाहर से बाहर होना चाहिए न कि उसकी पीडा हमारे अन्दर जाये।
कुछ लोगों की आदत होती है कि वह दूसरों की मजाक उड़ाकर यह अभद्र व्यवहार कर उन्हें अपमानित करते हैं। अनेक लोग उनसे यह सोचकर झगड़ा मोल नहीं लेते कि इससे तो मूर्ख और अधिक प्रज्जवलि हो उठेगा पर देखा गया है कि जब ऐसे लोगों को किसी से कड़े शब्दिक प्रतिकार का सामना करना पड़े पर पीछे हट जाते हैं। अगर प्रतिकार नहीं किया जाये तो वह निरंतर अपमानित करते रहते हैं। अगर हमें ऐसा लगता है कि कोई हमारा निरंतर अपमान या अपेक्षा कर अपने को श्रेष्ठ साबित कर हमारे साथ बदतमीजी कर रहा है तो उसका प्रतिकार करने में अधिक सोचना नहीं चाहिये।


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Monday, September 15, 2008

संत कबीर वाणीः जिसने मन जीता उसने तीनों लोकों को जीता

सुर नर मुनि सबको ठगै, मनहिं लिया औतार
जो कोई याते बचै, तीन लोक ते न्यार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यह मन तो एक महान ठग है जो देवता, मनुष्य और मुनि सभी को ठग लेता है। यह मन जीव को बार बार अवतार लेने के लिये बाध्य करता है। जो कोई इसके प्रभाव से बच जाये वह तीनों लोकों में न्यारा हो जाता है।

अपने अपने चोर को, सब कोय डारै मार
मेरा चोर मुझको मिलै, सरबस डारूं वार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि संसार के सब तो अपने अपने चोर को मार डालते हैं, परंतु मेरा चोर तो मन है। वह अगर मुझे मिल जाये तो मैं उस पर सर्वस्व न्यौछावर कर दूंगा।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य की पहचान तो मन है और वह उसे जैसा नचाता। आदमी उसके कारण स्थिर प्रज्ञ नहीं रह पाता। कभी वह किसी वस्तु का त्याग करने का निर्णय लेता है पर अगले पर ही वह उसे फिर ग्रहण करता है। अर्थात मन हमेशा ही व्यक्ति का अस्थिर किये रहता है। कई बार तो आदमी किसी विषय पर निर्णय एक लेता है पर करता दूसरा काम है। यह अस्थिरता मनुष्य को जीवन पर विचलित किये रहती है और वह इसे नहीं समझ सकता है। यह मन सामान्य मनुष्य क्या देवताओं और मुनियों तक को धोखा देता है। इस पर निंयत्रण जिसने कर लिया समझा लो तीनों को लोकों को जीत लिया।

Thursday, September 11, 2008

संत कबीर वाणीः हृदय को भाने वाला दूर होते हुए भी निकट होता है

जल में बसै कमोदिनी, चंदा बसै अकास
जो है जाका भावता, सो ताही के पास

                         संत शिरोमणि कबीरदास जी के अनुसार जल में कमलिनी का निवास है पर उसका प्रेमी चंद्रमा उससे बहुत दूर होता है। जो हृदय को पसंद हैं वही वास्तव में पास होते हैं।

आगि आंचि सहना सुगम, सुगम खड़ग की धार
नेह निबाहन एक रस, महा कठिन ब्यौहार

                       संत शिरोमणि कबीरदास जी की मान्यता है कि आग की आंच को सहना सरल है। तलवार की धार का प्रहार भी झेला जा सकता है पर प्रेम रस के वशीभूत होकर कोई संबंध बना लिया तो उसे निभाना अत्यंत कठिन होता है।

                   संक्षिप्त संपादकीय व्याख्या-मनुष्य जब किसी प्रेम से करता है तो उस पर अपनी जान न्यौछावर करता है। उसका लगाव सब जगह जाहिर होता है। जो लोग केवल दिखावे का प्रेम करते है अपने व्यवहार से यह प्रकट कर देते हैं कि उनका प्यार नकली है। स्वार्थ के वशीभूत होकर प्रेम करने वाले अपना काम निकलते ही संबंध तोड़ देते हैं पर जो वास्तव में प्रेम करते हैं वह कभी अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिये आग्रह नहीं करते।
कई कारणों वश लोग स्वार्थों की वजह से पास जरूर आते हैं पर वह प्रेमी नहीं हो जाते। प्रेम तो हृदय में जलने वाला ज्योति पुंज है जो दूर होने पर ही प्रकाश देता है। कमलिनी चंद्रमा से प्रेम करती है पर वह उससे कितना दूर है। उसी तरह मनुष्य भी जब किसी से प्रेम करता है तो उसके दूर और पास होने की परवाह नहीं करता।
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Tuesday, September 9, 2008

संत कबीर वाणीः सोने का कलश मदिरा से भरा हो तो भी निंदनीय ही होता है

काचा सेती मति मिलै, पाका सेती बान
काचा सेमती मिलत ही, है तन धन की हान

संत शिरामणि कबीरदास जी कहते हैं कि जिनका आचरण और विचारों में परिपक्वता नहीं है उनसे मत मिलो भले ही वह अच्छी वेषभूषा धारण करते हों। ऐसे लोगों के साथ संपर्क रखने से तन और धन की हानि होती है।

ऊचे कुल की जनमिया, करनी ऊंच न होय
कनक कलश मद सों, भरा साधु निन्दा सोय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि केवल ऊंचे कुल में उत्पन्न होने से मनुष्य के कर्म ऊंचे नहीं हो जाते। सोने का कलश यदि मदिरा से भरा हो तो भी साधु लोग उसकी निंदा करते हैं।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-संत कबीरदास जी समाज में व्याप्त आडम्बरों के विरुद्ध तो थे ही वह लोगों में नैतिक आचरण का भाव जगाने के लिये भी प्रयत्नशील थे। उन्होंने समाज मेंजाति और धर्म के नाम पर बने समूहों की कार्य पद्धति को देखा था जिसमें हर व्यक्ति का अपने और अपनी जाति पर अहंकार था जिसके कारण समाज उस समय भी विकास की धारा में नहीं चल पाया। उन्होंने अपने संदेशों में स्पष्ट कहा है कि जन्म के आधार पर कोई आदमी श्रेष्ठ नहीं हो जाता। जिसके कर्म अच्छे हैं वही श्रेष्ठ है। हालांकि यह आश्चर्य की बात है कि कबीर दास जी के संदेशों को मानते थे बहुत लोग हैं पर अपने परिवार और जात के अहंकार से मुक्त नहीं हो पाते।
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Saturday, September 6, 2008

संत कबीर वाणीः उस पत्थर को क्या पूजना जो उत्तर नहीं देता

पाहन करी पूतरी, करि पूजै करतार
याहि भरोसै मति रहो, बूड़ों काली धार

संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि पत्थर का पुतला बनाकर आदमी उसे पूजने लगता है। उसे अपने इस आडम्बर के सहारे नहीं रहना चाहिए कि वह उसकी सहायता से उस पार पहुंच जायेगा। अगर कहीं उसके भरोसे रहे तो बीच धार में डूब जाओगे।

पाहन को क्या पूजिये, जो नहिं देय जवाब
अंधा नर आशा मुखी, यौ ही खौवे आब


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि उस पत्थर का पूजने से क्या लाभ जो उत्तर नहीं देता। ज्ञान रहित उसे पूजकर जीवन में प्रसन्नता चाहते हैं पर यह व्यर्थ है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मूर्तियां को पूजना बुरा नहीं है पर जिस तरह उसकी पूजा कर यह सामान्य लोग मान लेते हैं कि वह बहुत बड़े भक्त हो गये तो यह उनकी अज्ञानता है। ऐसा लगता है कि मूर्ति पूजा संभवतः इसलिये शुरू की गयी कि सामान्य आदमी के लिये एकदम निराकार और निर्गुण की उपासना संभव नहीं है और वह इन मूर्तियों के रूप को अपने ध्यान में रखकर भक्ति करते हुए निरंकार को अपने मन में धारण करे। हुआ उसके विपरीत! लोग मूर्तियों को पूजकर अपने आपको भक्त समझने लगते है। यह उनकी अज्ञानता और अविवेक का प्रतीक है। जब तक हृदय से निरंकार और निर्गुण की उपासना नहीं की जायेगी तब तक अपने अंदर स्थापित विकार बाहर नहीं निकल सकते।
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Tuesday, September 2, 2008

रहीम के दोहेःजीवन में समदर्शी होना चाहिए

सरवर के खग एक से, बाढ़त प्रीति न धीम
पै मराल को मानसर, एकै ठौर रहीम


अधिकतर पक्षी एक समान होते हैं। उनका अपने जल स्त्रोंतो से लगाव तभी तक रहता है जब तक उसमें उनके लिये सुविधानुसार जल रहता है वरना इधर उधर से डोलते रहते हैं पर हंस केवल मानसरोवर में रहता है। यह उसकी दृढ़ता का प्रतीक है।

संपादकीय व्याख्या-इस संसार में सामान्य लोग स्वार्थ के आधार पर ही अपने संबंध बनानते और बिगाड़ते है। अब तो यह हालत यह हो गयी है कि लोग उन्हीं रिश्तेदारों के नाम सुनाते हैं जो प्रतिष्ठित और धनवान हैं। आपसी वार्तालाप में लोग अपने उन रिश्तेदारों और मित्रों का जिक्र अवश्य करते हैं जो पद, प्रतिष्ठा और पैसे की दृष्टि से शिखर पर है पर उन लोगों का नाम नहीं लेते जो सामान्य जीवन व्यतीत करते हैं। इतना ही नहीं वह आते जाते भी उन लोगों के पास हैं जहां कभी उनका स्वार्थ सिद्ध होने की संभावना होती है। यह निम्न कोटि की प्रवृत्ति है। उच्च प्रवृत्ति के लोग सभी के प्रति समान दृष्टिकोण रखते हैं। ऐसे ही लोग सभी जगह सम्मान भी प्राप्त करते हैं। भगवान श्रीकृष्ण जी श्रीगीता में यह स्पष्ट कथन है कि जो प्रिय को देखकर प्रसन्न नहीं होते और जो अप्रिय को देख दुःखी नहीं होते वही स्थिरप्रज्ञ है।

यह समदर्शिता का भाव रखना अपने जीवन में ही सुख का कारण होता है। जो मनुष्य यह भाव नहीं रखते उनको ही जीवन में तनाव झेलना पड़ता है। वह प्रतिष्ठत, उच्च पदासीन और पैसे वाले रिश्तेदारों और मित्रों के यहां जाकर कोई सम्मान नहीं पाते। वह यह समझते हैं कि समय आने पर वह काम आयेंगे तो यह भी तभी संभव होता है कि जब वह स्वयं उनका स्वार्थ सिद्ध करने वाले हों। अगर वह ऐसा करने में सक्षम नहीं होते तो समय पड़ने उन्हें अपने से उच्च व्यक्ति की सहायता नहीं मिलती भले ही आश्वासन मिल जाता हो ऐसे में उनको भारी निराशा भी झेलनी पड़ती है।

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Monday, August 25, 2008

संत कबीर वाणी:दूसरे का दर्द न समझे वह बुद्धिहीन

पीर सबन की एकसी, मूरख जाने नांहि
अपना गला कटाक्ष क, भिस्त बसै क्यौं नांहि


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि सभी मनुष्यों की पीड़ा एक जैसी होती है पर मूर्ख लोग इसे नहीं समझते। ऐसे अज्ञानी और हिंसक लोग अपना गला कटाकर स्वर्ग में क्यों नहीं बस जाते।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस दोहे में अज्ञानता और हिंसा की प्रवृत्ति वाले लोगों के बारे में बताया गया है कि अगर किसी दूसरे को पीड़ा होती है तो अहसास नहीं होता और जब अपने को होती है तो फिर दूसरे भी वैसी ही संवेदनहीनता प्रदर्शित करते हैं। अनेक लोग अपने शौक और भोजन के लिये पशुओं पक्षियों की हिंसा करते हैं। उन अज्ञानियों को यह पता नहीं कि जैसा जीवात्मा हमारे अंदर वैसा ही उन पशु पक्षियों के अंदर होता है। जब वह शिकार होते हैं तो उनके प्रियजनों को भी वैसा ही दर्द होता है जैसा मनुष्यों के हृदय में होता है। बकरी हो या मुर्गा या शेर उनमें भी मनुष्य जैसा जीवात्मा है और उनको मारने पर वैसा ही पाप लगता है जैसा मनुष्य के मारने पर होता है। यह अलग बात है कि मनुष्य समुदाय के बनाये कानून में के उसकी हत्या पर ही कठोर कानून लागू होता है पर परमात्मा के दरबार में सभी हत्याओं के लिऐ एक बराबर सजा है यह बात केवल ज्ञानी ही मानते हैं और अज्ञानी तो कुतर्क देते हैं कि अगर इन जीवो की हत्या न की जाये तो वह मनुष्य से संख्या से अधिक हो जायेंगे।

आजकल मांसाहार की प्रवृत्तियां लोगोंे में बढ़ रही है और यही कारण है कि संवदेनहीनता भी बढ़ रही है। किसी को किसी के प्रति हमदर्दी नहीं हैं। लोग स्वयं ही पीड़ा झेल रहे हैं पर न तो कोई उनके साथ होता है न वह कभी किसी के साथ होते हैं। इस अज्ञानता के विरुद्ध विचार करना चाहिये ।
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Friday, August 22, 2008

संत कबीर वाणी:मन फटने पर कहीं ठिकाना नहीं मिलता

धरती फाटे मेघ मिलै, कपड़ा फाटे डौर
तन फाटे को औषधि, मन फाटे नहिं ठौर


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब पानी बरसता है तो फटी हुई धरती आपस में मिल जाती है और फटा हुआ कपडा डोरे से सिल जाता है और बीमार देह को औषधि से स्वस्थ किया जा सकता है पर अगर कही मन अगर फट गया तो उसके लिये कोई ठिकाना नहीं है।

बिना सीस का मिरग है, चहूं दिस चरने जाय
बांधि लाओ गुरुज्ञान सूं, राखे तत्व लगाय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यह मन तो तो बिना सिर के मृग की तरह है जो चारों तरफ भागता रहता है। इस पर नियंत्रण करने के लिये किसी ज्ञानी गुरू से तत्वज्ञान प्राप्त कर नियंत्रण करना चाहिए तभी जीवन का आनंद लिया जा सकता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या- सब भौतिक चीजों पर हम अपना नियंत्रण कर लेते हैं पर मन पर कोई नियंत्रण नहीं कर पाता। वह चारों तरफ आदमी की दौड़ाता है। अपने देहाभिमान के चलते हम कभी नहीं अनुभव कर पाते कि अकारण तमाम तरह की उपलब्धियों के लिये दौड़ लगा रहे हैं। भक्ति भाव से दूर रहकर हम अपने आपको बहुत तकलीफ देते हैं। कोई भौतिक चीज मिल जाती है तो उसे पाकर पुलकित हो उठते हैं पर जल्द ही उससे ऊब जाते हैं फिर किसी नयी चीज की तलाश में लग जाते हैं। फिर सब चीजों से ऊब जाते हैं उससे बचने के लिये निरर्थक बोलने लगते हैं तमाम तरह के स्वांग रचते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि हम अपने आपको धोखा देने लगते हैं।

हम अपने मन के साथ भागते हैं पर अपने अंदर बैठे जीवात्मा को नहंी देखते जो भगवान भक्ति के लिये ताकता रहता है। हम भटकते हुए ऐसे गुरूओं की शरण में जाते हैं जो स्वयं तत्वज्ञान से रहित हैं और किताबों से रटकर हमें सुनाते हैं। ज्ञान का मतलब रटने से नहीं है बल्कि उसे धारण करने से है। ऐसे में हमें निष्काम भाव से ज्ञान देने वाले गुरूओं की शरण लेकर अपने मन पर नियंत्रण करने का प्रयास करना चाहिए।
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Saturday, August 9, 2008

रहीम के दोहेःपरोपकारी लोग अपने पराये का भेद नहीं करते

रहिमन पर उपकार के, करत न यारी बीच
मांस दियो शिवि भूप ने, दीन्हो हाड़ दधीच

कविवर रहीम कहते हैं कि जिस मनुष्य का परोपकार करना है वह जरा भी नहीं हिचकता। वह परोपकार करते हुए यारी दोस्ती का विचार नहीं करते। राजा शिवि ने ने प्रसन्न मुद्रा में अपने शरीर का मांस काट कर दिया तो महर्षि दधीचि ने अपने शरीर की हड्डियां दान में दीं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-विश्व का हर बड़ा आदमी परोपकार करने का दावा करता है पर फिर भी किसी का कार्य सिद्ध नहीं होता। अभिनेता, कलाकार, संत, साहुकार तथा अन्य प्रसिद्ध लोग अनेक तरह के परोपकार के दावों के विज्ञापन करते हैं पर उनका अर्थ केवल आत्मप्रचार करना होता है। आजकल गरीबों, अपंगों,बच्चों,बीमारों और वृद्धों की सेवा करने का नारा सभी जगह सुनाई देता है और इसके लिये चंदा एकत्रित करने वाली ढेर सारी संस्थायें बन गयी हैं पर उनके पदाधिकारी अपने कर्मों के कारण संदेह के घेरे में रहते हैं। टीवी चैनल वाले अनेक कार्यक्रम कथित कल्याण के लिये करते हैं और अखबार भी तमाम तरह के विज्ञापन छापते हैं पर जमीन की सच्चाई यह है कि जो परोपकार भी एक तरह से व्यापार हो गया है और इसके माध्यम से प्रचार और आय अर्जित करने की योजनाओं को पूरा किण जाता है।

जिन लोगों को परोपकार करना है वह किसी की परवाह नहीं करते। न तो वह प्रचार करते हैं और न ही इसमें अपने पराये का भेद करते हैं। उनके लिये परोपकार करना एक नशे की तरह होता है। सच तो यह है कि यह मानव जाति अगर आज भी चैन की सांस ले रही है तो वह ऐसे लोगों की वजह से ले रही हैं ऐसे लोग न केवल बेसहारा की मदद करते हैं बल्कि पर्यावरण और शिक्षा के लिये भी निरंतर प्रयत्नशील होते हैं। वरना तो जिनके पास पद, पैसे और प्रतिष्ठा की शक्ति है वह इस धरती पर मौजूद समस्त साधनों का दोहन करते हैं पर परोपकारी लोग निष्काम भाव से उन्हीं संसाधनों में श्रीवृद्धि करते है। जिनका परोपकार करने का संकल्प लेना है उन्हें यह तय कर लेना चाहिए कि वह प्रचार और पाखंड से दूर रहेंगे।

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Wednesday, August 6, 2008

संत कबीर वाणीःनिराश्रित के ग्राहक तो दीनानाथ होते हैं।

संसारी में प्रीतड़ी, सरै न एकौ काम
दुविधा में दोनो गये, माया मिली न राम


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में लोगों से प्रेम करने पर कए भी काम नहीं बनता। इससे न तो धन का लाभ होता है और न ही भक्ति प्राप्त होती है।

माया कू माया मिले, कर लम्बे हाथ
निस्प्रेही निरधार को, गाहक दीनानाथ


संत शिरोमणि कहते हैं कि जिसके पास माया होती है उसके पास और चली आती है। वह उसके यहां विस्तार लेती है। उसी तरह मायापति भी मायापतियों से संपर्क रखते हैं। जिनका कोई सहारा नहीं है और जो निस्वार्थ और निष्काम से कार्य करते हुए भक्ति में लीन रहते हैं उनके पास तो दीनानाथ स्वयं ग्राहक बनकर जाते हैं।
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Friday, August 1, 2008

संत कबीर वाणी:जिसने जीभ को वश में किया उसने संसार जीत लिया

जिभ्या जिन बस में करी, तिन बस कियो जहान
नहिं तो औगुन ऊपजे, कहि सब संत सुजान

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैंं कि जिन्होंने अपनी जिव्हा पर नियंत्रण कर लिया यह पूरा संसार ही उनका अपना हो गया। एसा करने से तन और मन में कोई विकास उत्पन्न होता है-यह संत लोग कह गये हैं।
कागा काको धन हरै, कोयल काको देत
मीठा शब्द सुनाय के, जग अपनी करि लेत

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने मन में यह विचार करें कि कौवा किसके धन का अपहरण करता है या कोयल किसको क्या देती है। कर्कश स्वर के कारण कौवा तिरस्कार झेलता है और कोयल लोगों का सम्मान पाती है।
जिहि शब्दे दुख ना लगे, सोई शब्द उचार
तपत मिटी सीतल भया, सोई शब्द ततसार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जिन शब्दों से दूसरों को कष्ट न हो उनका ही उच्चारण करो। जिससे दुःखी मनुष्य का संतप्त मन भी प्रसन्न हो जाये ऐसी ही वाणी बोलें।

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Saturday, July 12, 2008

रहीम के दोहे:जैसी होती संगति वैसी हो जाती प्रवृति

अनकीन्ही बातें करै, सोवत जागै जोय
ताहि सिखाय जगायबो, रहिमन उचित न होय

कविवर रहीम कहते हैं कि कई लोग ऐसे हैं जो कहते कुछ और हैं और करते कुछ और हैं। ऐसे लोग जागते हुए भी सेाते हैं। ऐसे अहंकार व्यक्ति को सिखाना या जागृत करना बिल्कुल व्यर्थ है।

कदल सीप भुजंग मुख, स्वाति एक गुन तीन
जैसी संगति बैठिए, तैसोई फल दीन

कविवर रहीम कहते हैं कि कि स्वाति नक्षत्र की वर्षा की बूंदें कदली में प्रवेश कर कपूर बना जाता है, समुद्र की सीपी में जाकर मोती का रूप धारण कर लेता है और वही जल सर्प के मुख में जाकर विष बन जाता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में ऐसे व्यक्तियों की अभाव नहीं है जो अपनी कथनी और करनी में भारी भेद प्रकट करते हुए थोड़ा भी संकोच अनुभव नहीं करते। एक तरफ वह आदर्श की बात करते हुए नहीं थकते पर दिन भर वह माया के फेरे में सारी नैतिकता को तिलांजलि देते हैंं। अगर ऐसा न होता तो इस देश में इतने सारे साधु और संत और उनके करोड़ों शिष्य हैं फिर भी पूरे देश मेंे अनैतिकता, भ्रष्टाचार, गरीबों और परिश्रमियों का दोहन तथा अन्य अपराधों की प्रवृतियों वाले लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। आजकल ईमादारी से संग्रह करना कठिन हो गया है। इसका आशय यह है कि जो कमा रहे हैं वही दान कर रहे हैं और अपने गुरुओं के आश्रमों में भी उपस्थिति दिखाते हैं। हर जगह धन सम्राज्य है पर माया से दूर रहने की बात सभी करते हैं। अपराधी हो या सामान्य आदमी भक्ति जरूर करते दिखते हैं। अपराधी अपने दुष्कर्म से बाज नहीं आता और सामान्य आदमी को अपने काम से ही समय नहीं मिलता। बातें सभी आदर्श की करते हैं। यही भेद है जिसके कारण देश में अव्यवस्था फैली है।

इसके अलावा सभी लोग भले आदमी से संगति तो करना ही नहीं चाहते। जो समाज को अपनी शक्ति से आतंकित कर सकता है लोग उससे अपने संपर्क बनाने को लालायित रहते हैं। वह सोचते हैं कि ऐसे असामाजिक तत्व समय पर उनके काम में आयेंगे पर धीरे-धीरे उनके संपर्क में रहते हुए उनका स्वयं का नैतिक आचरण पतन की ओर अग्रसर हो जाता है। संगति का प्रभाव होता है-यह बात निश्चित है। अगर किसी शराबी के पास कोई व्यक्ति बैठ जाये तो उसकी बातें सुनकर उसका स्वयं का मन वितृष्णा से भर जाता है और वही व्यक्ति किसी सत्संगी के पास बैठे तो उसमें अच्छे और सुंदर भावों का प्रवाह अनभूति कर सकता है। अतः अपने लिये हमेशा अच्छी संगति ही ढूंढना चाहिए।

Wednesday, April 30, 2008

संत कबीर वाणी:प्रेम बाजार में बिकने वाली वस्तु नहीं है

प्रेम न बाड़ी ऊपजै, प्रेम न हाट विकाय
राजा परजा जो रुचे, शीश देय ले जाय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि किसी खेत में प्रेम की फसल नहीं होती न किसी बाजार में यह मिलता है। जिसे प्रेम पाना है उसे अपने अंदर त्याग की भावना रखनी चाहिए और इसमें प्राणोत्सर्ग करने को भी तैयार रहना चाहिए।

यह तो घर है प्रेम का, ऊंचा अधिक इकंत
शीश काटि पग तर धरै, तब पैठ कोई संत


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रेम का घर तो ऊंचे स्थान और एकांत में स्थित होता है जब कोई इसमें त्याग की भावना रखता है तभी वहां तक कोई पहुंच सकता है। ऐसा तो कोई संत ही हो सकता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-लोग कहते हैं कि ‘अमुक से प्रेम करते हैं’ या ‘अमुक हमसे प्रेम करता है’। यह वास्तव में बहुत बड़ा भ्रम हैं। सच देखा जाये तो अपने जिनके साथ हमारे स्वार्थों के संबंध हैं उनसे हमारा प्रेम तो केवल दिखावा है। प्रेम न तो किसी को दिखाने की चीज है न बताने की। वह तो एकांत में अनुभव करने वाली चीज है। ध्यान लगाकर उस परमपिता परमात्मा का स्मरण करें तब इस बात का आभास होगा कि वास्तव में उसने प्रेम के वशीभूत होकर ही यह हमें मानव जीवन दिया है। उसका हमारे प्रति निष्काम प्रेमभाव है जो हमारे जीवन का रास्ता सहज बनाये देता है। जब हम इसी निष्काम भाव से उसका स्मरण करेंगे तब पता लगेगा कि वास्तव में प्रेम क्या है? जो लोग एक दूसरे के प्रति प्रेमभाव का दिखावा करते हैं व न केवल स्वयं भ्रमित होते है बल्कि दूसरे को भी भ्रमित करते हैं।

Friday, March 28, 2008

रहीम के दोहे:चन्द्रमा की तरह शीतलता देने वाला राज्य ही सराहनीय

रहिमन राज सराहिए ससिसम सुखद जो होय
कहा वापुरी भानु है, तपैं तरैवन खोय

कविवर रहीम कहते है की उसी राज्य की प्रशंसा करना चाहिऐ जो चन्द्रमा के समान शीतल सुखदाई है। उस सूरज की क्या कहैं जो तपने पर शीतलता को नष्ट कर देता है।

आज के संदर्भ में व्याख्या-आजकल देश में लोकतंत्र है। अब राजा तो नहीं है पर राजकाज चलाने के लिए लोग तो हैं। ऐसे में जिनके पास राजकाज है उनका आंकलन उनके कार्यों के आधार पर ही हो सकता है। जिनके कार्यों से लोग खुश हैं उनकी तो सराहना की जानी चाहिऐ पर जो अपने पद पर बैठकर अपना दायित्व भूलकर केवल उसके लाभ उठाना चाहते हैं पर अपने प्रयासों से आज आदमी को लाभ नहीं दिला सकते उनकी प्रशंसा कोई नहीं करता। सामने भले कोई कुछ नहीं कहता पर पीठ पीछे उनकी हर कोई निंदा करता है। यहाँ अब कोई एक राजा नहीं है बल्कि राजकाज चलाने वाले लोगों की ऊपर से लेकर नीचे तक एक पंक्ति है और उसमें सबके अपने पदनाम और दायित्व हैं।
राजकाज से जुडे लोग अपने अधिकारों की बात तो खूब करते हैं पर अपने दायित्वों का बोध उनको नहीं होता और न ही इस बात की परवाह है की उनकी लोगों में क्या छवि है। कई अपनी शक्ति दिखाते हैं। अपने से छोटे को दबाकर या उसकी उपेक्षा कर यह दिखाते हैं कि उनके पास क्या ताकत है? अपनी ताकत आम आदमी के प्रयोग में करने के काम को हेयसमझते हैं। राजकाज से संबधित कार्य करने वाले कुछ लोग फिर भी ऐसे होते हैं जो लोगों में लोकप्रिय होते हैं क्योंकि वह अपने दायित्व पूरे करते हैं। उनके बारे में लोग कहते हैं कि 'अमुक अधिकारी अच्छा है", ''अमुक अधिकारी और कर्मचारी का व्यवहार अच्छा है"। मैं बडे पदों के नाम इसलिए नहीं ले रहा क्योंकि आम आदमी के रूप में हमारा काम तो निचले पद वाले लोगों से ही पड़ता है। गाँवों में तो राजकाज के नाम पर वही लोग देखे और पहचाने जाते हैं।
इसलिए जनता से सीधे जुडे राजकाजी लोगों को अपना व्यवहार अच्छा रखना चाहिऐ और नहीं रखते हैं तो उन्हें भी यह समझना चाहिऐ कि वह किसी काम के नहीं है। लोग उनको पीठ पीछे कटुवचन कहते हुए उनकी निंदा करते हैं।

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