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Thursday, May 27, 2010

संत कबीर दर्शन-समाज हित न करे वह बड़ा आदमी किस काम का

संत शिरोमणि कबीर दास कहते हैं कि
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हाथी चढि के जो फिरै, ऊपर चंवर ढुराय
लोग कहैं सुख भोगवे, सीधे दोजख जाय
      सामान्य हिंदी में भावार्थ-अनेक बड़े लोग   हाथी पर चढ़कर अपने ऊपर चंवर डुलवाते हैं जिसे देखकर अन्य  लोग समझते हैं कि वह सुख भोग रहे तो यह उनका भ्रम है| सच यह कि  वह  अपने अभिमान के कारण सीधे नरक में जाते हैं।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जोरे बड़ मति नांहि
जैसे फूल उजाड़ को, मिथ्या हो झड़ जांहि
      सामान्य हिंदी में भावार्थ- आदमी धन, पद और सम्मान पाकर बड़ा हुआ तो भी क्या अगर उसके पास अपनी मति नहीं है। वह ऐसे ही है जैसे बियावन उजड़े जंगल में फूल खिल कर बिना किसी के काम आये मुरझा जाता है।
     वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-समय ने ऐसी करवट ली है कि इस समय धर्म रक्षा और जनकल्याण के नाम पर चालक लोग भी व्यवसाय कर रहे हैं। इस मायावी दुनियां में सामान्य लोगों का यह पता ही नहीं लगता कि सत्य और माया में अंतर क्या  है? जिसे देखो भौतिकता की तरफ भाग रहा है। क्या साधु और क्या भक्त सब दिखावे की भक्ति में लगे हैं। राजा तो क्या संत भी अपने ऊपर चंवर डुलवाते हैं। उनको देखकर लोग वाह-वाह करते हैं। एक तरह से कथित रूप से हमारे समाज या यह मान लिया है कि  राजा की तरह  संत को भी वैभवपूर्ण जिंदगी में  रहना चाहिये। सत्य तो यह है कि इस तरह तो वह भी लोग भ्रम में हो जाते हैं और उनमें अहंकार आ जाता है और दिखावे के लिये सभी धर्म करते हैं और फिर अपनी मायावी दुनियां में अपना रंग भी दिखाते हैं। ऐसे लोग पुण्य नहीं पाप में लिप्त है और उन्हें भगवान भक्ति से मिलने वाला सुख नहीं मिलता और वह अपने किये का दंड भोगते हैं। आजकल ऐसे अनेक साधू और संत देखने को मिल जायेंगे जो साहूकारों की तरह संपति संग्रह और ऋण बांटने का काम करते हैं, कुछ तो सत्ता की दलाली में लगे हुए हैं।
      यह शाश्वत सत्य है कि भक्ति का आनंद त्याग में है और मोह अनेक पापों को जन्म देता है। सच्ची भक्ति तो एकांत में होती है न कि ढोल नगाड़े बजाकर उसका प्रचार किया जाता है। हम जिन्हें बड़ा धर्मभीरू  या भक्त कहते हैं उनके पास अपना ज्ञान और बुद्धि कैसी है यह नहीं देखते। बड़ा आदमी वही है जो अपनी संपत्ति से वास्तव में छोटे लोगों का भला करता है न कि उसका दिखावा। आपने देखा होगा कि कई बड़े लोग अनेक कार्यक्रम गरीबों की भलाई के लिये करते हैं और फिर उसकी आय किन्हीं कल्याण संस्थाओं को देते हैं। यह सिर्फ नाटकबाजी है। वह लोग अपने को बड़ा आदमी सबित करने के लिये ही ऐसा करते हैं उनका और कोई इसके पीछे जनकल्याण करने का भाव नहीं होता। अत: ऐसे लोगों को आदर्श नहीं मानना चाहिए।
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संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक भारतदीप
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Wednesday, May 19, 2010

भर्तृहरि नीति शतक-बदलाव दुनिया का स्वाभाविक नियम (badlav ka niyam-hindu dharma sandesh)

महाराज भर्तृहरि अपने जीवन के अनुभवों के आधार पर कहते हैं 
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परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते
स जातो येन जातेन याति वंशः समुन्नतिम्

हिंदी में भावार्थ-परिवर्तन होते रहना संसार का नियम। जो पैदा हुआ है उसकी मृत्यु होना निश्चित है। जन्म लेना उसका ही सार्थक है जो अपने कुल की प्रतिष्ठा में वृद्धि करता है अर्थात समस्त समाज के लिये ऐसे काम करता है जिससे सभी का हित होता है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अगर आदमी को किसी से भय लगता है तो वह अपने आसपास परिवर्तन आने के  से। उसे लगता है कि कोई उसकी जगह लेगा और उसका असितत्व मिट जाएगा।  कहीं भाषा तो कहीं धर्म और कहीं क्षेत्र के विवाद आदमी के हृदय में व्याप्त इसी भय की भावना का दोहन करने की दृष्टि से उन समूहों  के प्रमुख  उपयोग करते हैं। कई लोगों के हृदय में ऐसे भाव आते है जैसे- अगर पास का मकान बिक गया तो लगता है कि पता नहीं कौन लोग वहां रहने आयेंगे और हमसे संबंध अच्छे रखेंगे कि नहीं। उसी तरह कई लोग स्थान परिवर्तन करते हुए भय से ग्रस्त होते हैं कि पता नहीं कि वहां किस तरह के लोग मिलेंगे। जाति के आधार पर किसी दूसरे जाति वाले का भय पैदा किया जाता है कि अमुक जाति का व्यक्ति अगर यहां आ गया तो हमारे लिए विपत्ति खड़ी कर सकता है। अपने क्षेत्र में दूसरे क्षेत्र से आये व्यक्ति का भय पैदा किया जाता है कि अगर वह यहाँ जम गया तो हमारा अस्तित्व खत्म कर देगा। कहने का अभिप्राय यह है कि बदलाव इस दुनिया का स्वाभाविक नियम है। कुछ  बुद्धिजीवी समाज में बदलाव लाने के लिए प्रयत्नशील दीखते हैं। कोई जातिपति मिटा रहा है तो कोई गरीबी से लड़ रहा है कोई अन्याय के विरुद्ध अभियान चला रहा है, यह सब दिखावा है। प्रकृति समय के अनुसार स्वत: बदलाव लाती है और मनुष्य के बूते कुछ नहीं है सिवाय दिखावा करने के।
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संकलक,लेखक  एवं संपादक-दीपक भारतदीप
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Sunday, May 16, 2010

भर्तृहरि नीति शतक-आशा की लहरें धीरज का बांध तोड़ देती हैं (asha aur dhiraj-hindu adhyamik sandsh)

महाराज भर्तृहरि कहते हैं 
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आशा नाम नदी मनोरथजला तृष्णातरङगाकुला
रामग्राहवती वितर्कविहगा धैर्यद्रुमध्वंसिनी
मोहावर्तसुदुस्तराऽतिगहना प्रोत्तुङगचिन्तातटी
तस्याः पारगता विशुद्धमनसो नन्दन्ति योगश्वराः
हिन्दी में भावार्थ-आशा एक नदी की भांति इसमे हमारी कामनाओं के रूप में जल भरा रहता है और तृष्णा रूपी लहरें ऊपर उठतीं है। यह नदी राग और अनुराग जैसे भयावह मगरमच्छों से भरी हुई हैं। तर्क वितर्क रूपी पंछी इस पर डेरा डाले रहते हैं। इसकी एक ही लहर मनुष्य के धैर्य रूपी वृक्ष को उखाड़ फैंकती है। मोह माया व्यक्ति को अज्ञान के रसातल में खींच ले जाती हैं, जहा चिंता रूपी चट्टानों से टकराता हैं। इस जीवन रूपी नदी को कोई शुद्ध हृदय वाला  योगी तपस्या, साधना और ध्यान से शक्ति अर्जित कर परमात्मा से संपर्क जोड़कर ही सहजता से पार कर पाता है।
वर्त्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- कहते हैं कि ‘उम्मीद पर आसमान टिका है’।  यह उम्मीद और आशा यानि क्या? सांसरिक स्वार्थों की पूर्ति होने ही हमारी आशाओं का केंद्र है। भक्ति, सत्संग तथा तत्वज्ञान से दूर भटकता मनुष्य अपना पेट भरते भरते थक जाता है पर वह है कि भरता नहीं।  कभी कभी जीभ स्वाद बदलने के लालायित हो जाती है।  सच तो यह है कि मन की तृष्णायें ही आशा का निर्माण करती हैं।  भारत जो कभी एक शांत और प्राकृतिक रूप से संपन्न क्षेत्र था आज पर्यावरण से प्रदूषित हो गया है।  हमेशा यहां आक्रांता आये और साथ में लाये नयी रौशनी की कल्पित आशायें।  सिवाय ढोंग के और क्या रहा होगा?  कुछ मूर्ख लोग तो कहते हैं कि इन आक्रांताओं ने यहां नयी सभ्यता का निर्माण किया।  इस पर हंसा ही जा सकता है।  यह नयी सभ्यता कभी अपना पेट नहीं भर पाती। जीभ के स्वाद के लिये अपना धर्म तक छोड़ देती है। रोज नये भौतिक साधनों के उपयोग की तरफ बढ़ चुकी यह सभ्यता जड़ हो चुकी है।  आशायें हैं कि पूर्ण नहीं होती। होती है तो दूसरी जन्म लेती है।  यह क्रम कभी थमता नहीं।
इस सभ्यता में हर मनुष्य का सम्मान की बात कही जाती है।  यह एक नारा है। योग्यता, चरित्र और वैचारिक स्तर के आधार पर ही मनुष्य को सम्मान की आशा करना चाहिये मगर नयी सभ्यता के प्रतिपादक यहां जातीय और भाषाई भेदों का लाभ उठाकर यहां संघर्ष पैदा कर  मायावी दुनियां स्थापित करते रहे। भारतीय अध्यात्म ज्ञान में जहां मान सम्मान से परे रहकर अपनी तृष्णाओं पर नियंत्रण करने के लिये संदेश दिया जाता है। सभी के प्रति समदर्शिता का भाव रखने का आदेश दिया जाता है। वही नयी सभ्यता के प्रतिपादक अगड़ा पिछड़ा का भेद यहां खड़ा करते हुए बतलाते हैं कि जिन तबकों को पहले  सम्मान नहीं मिला अब उनकी पीढ़ियों को विशेष सम्मान दिया जाना चाहिए।  कथित पिछड़े तबकों को विशेष सम्मान की तृष्णा जगाकर वह दावा करते हैं कि हम यहां समाज में बदलाव ला रहे हैं।  कितने आश्चर्य की बात है कि जिन जातियों में अनेक महापुरुष और वीर योद्धा पैदा हुए उनको ही पिछड़ा बताकर सामाजिक वैमनस्य पैदा केवल इसी ‘विशेष सम्मान’ की आड़ में पैदा किया गया है। आज हालत यह है कि पहले से अधिक जातिपाति का  फैल गया है।
विकास, सम्मान और आर्थिक समृद्धि की आशाऐं जगाकर भारतीय अध्यात्म ज्ञान को ढंकने का प्रयास किया गया।  ऐसी आशायें जो कभी पूरी नहीं होती और अगर हो भी जायें तो उनसे किसी मनुष्य को तत्वज्ञान नहीं मिलता जिसके परिणाम स्वरूप समाज में आज रोगों का प्रकोप और तनाव का वातावरण बन गया है।
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Saturday, May 15, 2010

मनु दर्शन-क्रोध और गालियां देने के बुरे परिणाम होते हैं

मनु महाराज के अनुसार 
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अति वादांस्तितिक्षेत नावमन्येत कञ्चन्
न चेमं देहमाश्रित्य वैरं कुर्वीत केनचित्

हिन्दी में भावार्थ-सन्यासी और श्रेष्ठ पुरुषों को दूसरे लोगों द्वारा कहे कटु वचनों को सहन करना चाहिए। कटु शब्द (गाली) का उत्तर वैसे ही शब्द से नहीं दिया जाना चाहिए और न किसी का अपमान करना चाहिए। इस नश्वर शरीर के लिये सन्यासी और श्रेष्ठ पुरुष को किसी से शत्रुता नहीं करना चाहिए।
क्रुद्धयन्तं न प्रतिक्रुध्येदाक्रृष्टः कुशलं वदेत्
साप्तद्वाराऽवकीर्णां च न वाचमनृतां वदेत्
।।
 हिन्दी में भावार्थ - सन्यासी एवं श्रेष्ठ पुरुषों को कभी भी क्रोध करने वाले के प्रत्युत्तर में क्रोध का भाव व्यक्त नहीं करना चाहिए। अपने निंदक के प्रति भी सद्भाव रखना चाहिए। अपनी देह के सातों द्वारों -पांचों ज्ञानेंद्रियों नाक, कान, आंख, हाथ वाणी और विचार, मन तथा बुद्धि-से सद्व्यवहार करते हुए कभी भी झूठ नहीं बोलना चाहिए।
वर्तमान सन्दर्भ में संपादकीय व्याख्या-सामान्य मनुष्य में सहिष्णुता और ज्ञान का अभाव होता है जबकि ज्ञानी लोग शांत और सत्य पथ पर दृढ़ता पूर्वक चलते हैं। फिर आजकल खान पान और रहन सहन की वजह से समाज में क्रोध, निराशा तथा हिंसका की भावना बढ़ रही है।  श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार गुण ही गुणों को बरतते हैं। इस वैज्ञानिक सिद्धांत को ध्यान में रखें तो आजकल दवाईयों से उपजाये गये अन्न तथा सब्जियों का सेवन हर आदमी कर रहा है जिनसे शरीर के रक्त में विषैले तत्वों का बहना स्वाभाविक है। इन्हीं विषैले तत्वों का प्रभाव मनुष्य के मन, वचन, कर्म था वाणी पर पड़े बिना नहीं रह सकता जो अंततः व्यवहार में प्रकट होते हैं।  इसलिये जरा जरा सी बात पर उत्तेजित और निराश होने वाले लोगों को देखकर ज्ञानी विचलित नहीं होते क्योंकि वह जानते हैं कि मनुष्य तो गुणों के अधीन है और जिन तत्वों से वह संचालित हैं वह विषैले हैं।
तत्वज्ञानी इसलिये किसी की प्रशंसा से प्रसन्न होकर नाचते नहीं है तो गालियां देने पर भी अपने अंदर क्रोध को स्थान नहीं देते।  अगर कोई एक गाली देगा और उसके प्रत्तयुतर में दूसरा भी गाली देगा मगर फिर पहले वाला फिर गाली देगा। इस तरह अगर दोनों अज्ञानी हैं तो गालियां का समंदर बन जायेगा पर अगर एक ज्ञानी है तो वह चुपचाप गाली देने से वाले दूर हो जायेगा।  यही स्थिति क्रोध की है।  समय के अनुसार अच्छा और बुरा समय आता है और भले और लोग भी मिलते हैं। ज्ञानी लोग दूसरे का स्वभाव देखकर व्यवहार करते हैं जबकि अज्ञानी अपने स्वभाव के अनुसार दूसरे का चाल चरित्र देखना चाहते हैं। ऐसा न होने पर उनके अंदर क्रोध की उत्पति होती है जो कालांतर में मनुष्य देह को जलाता है।  
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Friday, May 14, 2010

संत कबीर दर्शन -प्रेम हमेशा बराबरी वालों में करना चाहिए

प्रीति ताहि सो कीजिये, जो आप समाना होय
कबहुक जो अवगुन पडै+, गुन ही लहै समोय
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रीति उसी से करना चाहिए, जो अपने समान ही हृदय में प्रेम धारण करने वाले हों। यह प्रेम इस तरह का होना चाहिए कि समय-असमय किसी से भूल हो जाये तो उसे प्रेमी क्षमा कर भूल जायें।
यह तत वह तत एक है, एक प्रान दुइ गात
अपने जिये से जानिये, मेरे जिय की बात
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि सभी लोगों की देह में जीव तत्व एक ही है। आपस में प्रेम करने वालों में कोई भेद नहीं होता क्योंकि दोनो के प्राण एक ही होता है। इस गूढ रहस्य को वे ही जानते हैं जो वास्तव में प्रेमी होते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-प्रेम किया नहीं हो जाता है यह फिल्मों द्वारा संदेश इस देश में प्रचारित किया जाता है। सच तो यह है कि ऐसा प्रेम केवल देह में स्थित काम भावना की वजह से किया जाता है। प्रेम हमेशा उस व्यक्ति के साथ किया जाना चाहिए जो वैचारिक सांस्कारिक स्तर पर अपने समान हो। जिनका हृदय भगवान भक्ति में रहता है उनको सांसरिक विषयों की चर्चा करने वाले लोग विष के समान प्रतीत होते हैं। यहां दिन में अनेक लोग मिलते है पर सभी प्रेमी नहीं हो जाते। कुछ लोग छल कपट के भाव से मिलते हैं तो कुछ लोग स्वार्थ के भाव से अपना संपर्क बढ़ाते हैं। भावावेश  में आकर किसी को अपना सहृदय मानना ठीक नहीं है। जो भक्ति भाव में रहकर निष्काम से जीवन व्यतीत करता है उनसे संपर्क रखने से अपने आपको सुख की अनुभूति मिलती है।
वैसे बाज़ार तथा उसके प्रचार तंत्र ने प्रेम को केवल युवक युवती के इर्द गिर्द समेट कर रख दिया है जो कि केवल यौवन से उपजा एक भाव है।  कहीं न कहीं इसमें हवस का भाव रहता है। यही कारण है कि हमारे देश में आजकल कथित प्रेम में लिप्त प्रेमी और प्रेमियों के साथ ऐसे हादसे पेश आते हैं जिनसे उनकी जिंदगी तक समाप्त हो जाती है या फिर बदनामी का सामना करना पड़ता है। 
यौवन से उपजा यह आकर्षण प्रेम नहीं है पर अगर थोड़ी देर के लिये मान भी लिया जाये तो भी उसमें आर्थिक, सामाजिक तथा वैचारिक स्तर की समानता होना आवश्यक है वरना विवाह बाद जब आकर्षण कम होता है तब व्यक्तिगत विविधता तनाव का कारण बनती है।  कहते हैं कि बेटी हमेशा बड़े घर में देना चाहिये और बहु हमेशा छोटे घर से लाना चाहिये।  स्पष्टत इसके पीछे तर्क यही है कि विवाह बाद आर्थिक तथा सामाजिक सामंजस्य बना रहे।  अगर लड़की छोटे घर जायेगी तो तकलीफ उठायेगी। उसी तरह बहुत अगर अमीर घर से आयेगी तो उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति करना कठिन हो जायेगा। कहने का अभिप्राय यह है कि प्रेम क्षणिक पर जीवन व्यापक है इसलिये संबंध स्थापित करते समय सब तरह की बातों का ध्यान रखना चाहिये।
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Wednesday, May 12, 2010

संत कबीरदास के दोहे-मित्रता से भक्ति और सत्संग में बाधा आती है (bhakti aur satsang-kabir das ji ke dohe)

दुनिया सेती दोसती, होय भजन के भंग
एका एकी राम सों, कै साधुन के संग।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि दुनिया के लोगों के साथ मित्रता बढ़ाने से भगवान की भक्ति में  बाधा आती है। एकांत में बैठकर भगवान राम का स्मरण करना चाहिये या साधुओं की संगत करना चाहिए तभी भक्ति प्राप्त हो सकती है।
ऊजल पहिनै कापड़ा, पान सुपारी खाय
कबीर गुरु की भक्ति बिन, बांधा जमपुर जाय।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि लोग साफ-सुथरे कपड़े पहन कर पान और सुपारी खाते हुए जीवन व्यतीत करते हैं। गुरु की भक्ति के बिना उनका जीवन निरर्थक व्यतीत करते हुए मृत्यु को प्राप्त होते हैं
वर्तमान संदर्भ में सम्पादकीय  व्याख्या-भक्ति लोग अब जोर से शोर मचाते हुए कर रहे हैं। मंदिरों और प्रार्थना घरों में फिल्मी गानों की तर्ज पर भजन सुनकर लोग ऐसे नृत्य करते हैं मानो वह भगवान की भक्ति कर रहे हैं। समूह बनाकर दूर शहरों में मंदिरों में स्थित प्रतिमाओं के दर्शन करने जाते हैं। जबकि इससे स्वयं और दूसरों को दिखाने की भक्ति तो हो जाती है, पर मन में संतोष नहीं होता। मनुष्य भक्ति करता है ताकि उसे मन की शांति प्राप्त हो जाये पर इस तरह भीड़भाड़ में शोर मचाते हुए भगवान का स्मरण करना व्यर्थ होता है क्योंकि हमारा ध्यान एक तरफ नहीं लगा रहता। सच तो यह है कि भक्ति और साधना एकांत में होती है। जितनी ध्यान में एकाग्रता होगी उतनी ही विचारों में स्वच्छता और पवित्रता आयेगी। अगर हम यह सोचेंगे कि कोई हमारे साथ इस भक्ति में सहचर बने तो यह संभव नहीं है। अगर कोई व्यक्ति साथ होगा या हमारा ध्यान कहीं और लगेगा तो भक्ति भाव में एकाग्रता नहीं आ सकती। अगर हम चाहते हैं कि भगवान की भक्ति करते हुए मन को शांति मिले तो एकांत में साधना का प्रयास करना चाहिए।
कहने का अभिप्राय यह है कि भक्ति और सत्संग का मानसिक लाभ तभी मिल सकता है जब उसे एकांत में किया जाये। अगर शोर शराबे के साथ भीड़ में भक्ति या भजन गायेंगे तो फिर न केवल अपना ध्यान भंग होगा बल्कि दूसरे के कानों में भी अनावश्यक कटु स्वर का प्रसारण करेंगे। 
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Monday, May 10, 2010

रहीम संदेश-सुख दुःख तो चौसर की गोट की तरह हैं (rahim ke dohe-sukh dukh)

जब लगि जीवन जगत में, सुख दुख मिलन अगोट
रहिमन फूटे ज्यों, परत दुहुंन सिर चोट
कविवर रहीम कहते हैं कि इस जगत में जीवन है तब तक सुख और दुख और मिलते रहेंगे। यह ऐसे ही जैसे चौसर  की गोट को गोट मारने से दोनो के सिर पर चोट लगती है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस संसार में दुःख और सुख दोनों ही रहते हैं। जिस तरह किसी भी खेल में दो खिलाड़ी होते हैं तभी खेल हो पाता है उसी तरह ही जीवन की अनुभूति भी तभी हो पाती है जब दुख और सुख आते हैं। सूरज डूबता है तभी आकाश में समस्त तारे और चंद्रमा दिखाई पड़ता ह। अगर यह प्रकृति द्वारा निर्मित चक्र घूमे नहीं तो हमें दिल औ रात का पता ही न चले-ऐसे मे क्या यह एकरसता हमें तकलीफ नहीं देगी?
गर्मी के दिनों में भी जब हम कूलर में बैठे रहते हैं तो घबड़ाहट होने लगती है और उस समय भी थोड़ी घूप का सेवन  केवल हमें राहत देता है। गर्मी में धूप कितनी कठोर और दुखःदायी लगती है पर कूलर में भी बहुत देर तक बैठना दुखदायी हो जाता है। इस तरह यह दुख सुख का चक्र है। यह देखा जाये तो यह वास्तव में भ्रम भी है। दुख और सुख मन के भाव हैं। इसलिये अगर हमारे साथ जो परेशानियां हैं उनको सहज भाव से लें तो हमें दुख की अनुभूति नहीं होगी। अगर हम इस चक्र को लेकर प्रसन्न या दुखी होंगे तो उससे मस्तिष्क में तनाव उत्पन्न होता है जो कि वास्तव में कई रोगों का जनक है और उसका इलाज किसी के पास नहीं है। कहने का अभिप्राय यह है कि दुःख सुख तो मनस्थिति के अनुसार अनुभव होते हैं, पर हम सृष्टि के इस सत्य को नहीं समझ पाते और सुख मिलने पर उछलने लगते हैं और दुःख होने पर तनाव से घिर जाते हैं।
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संकलक, लेखक तथा संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर
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Saturday, May 8, 2010

संत कबीर के दोहे-अपनी मति नहीं तो बड़े होने से क्या लाभ (bade hone se kya labh-hindu dharma sandesh)

हाथी चढि के जो फिरै, ऊपर चंवर ढुराय
लोग कहैं सुख भोगवे, सीधे दोजख जाय
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहत हैं कि तो हाथी पर चढ़कर अपने ऊपर चंवर डुलवाते हैं और लोग समझते हैं कि वह सुख भोग रहे तो यह उनका भ्रम है वह तो अपने अभिमान के कारण सीधे नरक में जाते हैं।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जोरे बड़ मति नांहि
जैसे फूल उजाड़ को, मिथ्या हो झड़ जांहि
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि आदमी धन, पद और सम्मान पाकर बड़ा हुआ तो भी क्या अगर उसके पास अपनी मति नहीं है। वह ऐसे ही है जैसे बियावन उजड़े जंगल में फूल खिल कर बिना किसी के काम आये मुरझा जाता है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-समय ने ऐसी करवट ली है कि इस समय धर्म और जनकल्याण के नाम पर भी व्यवसाय हो गया है। इस मायावी दुनियां में यह पता ही नहीं लगता कि सत्य और माया है क्या? जिसे देखो भौतिकता की तरफ भाग रहा है। क्या साधु और क्या भक्त सब दिखावे की भक्ति में लगे हैं। राजा तो क्या संत भी अपने ऊपर चंवर डुलवाते हैं। उनको देखकर लोग वाह-वाह करते हैं। सोचते हैं हां, राजा और संत को इस तरह रहना चाहिये। सत्य तो यह है कि इस तरह तो वह भी लोग भी भ्रम में हो जाते हैं और उनमें अहंकार आ जाता है और दिखावे के लिये सभी धर्म करते हैं और फिर अपनी मायावी दुनियां में अपना रंग भी दिखाते हैं। ऐसे लोग पुण्य नहीं पाप में लिप्त है और उन्हें भगवान भक्ति से मिलने वाला सुख नहीं मिलता और वह अपने किये का दंड भोगते हैं।
यह शाश्वत सत्य है कि भक्ति का आनंद त्याग में है और मोह अनेक पापों को जन्म देता है। सच्ची भक्ति तो एकांत में होती है न कि ढोल नगाड़े बजाकर उसका प्रचार किया जाता है। हम जिन्हें बड़ा व्यक्ति या भक्त कहते हैं उनके पास अपना ज्ञान और बुद्धि कैसी है यह नहीं देखते। बड़ा आदमी वही है जो अपनी संपत्ति से वास्तव में छोटे लोगों का भला करता है न कि उसका दिखावा। आपने देखा होगा कि कई बड़े लोग अनेक कार्यक्रम गरीबों की भलाई के लिये करते हैं और फिर उसकी आय किन्हीं कल्याण संस्थाओं को देते हैं। यह सिर्फ नाटकबाजी है। वह लोग अपने को बड़ा आदमी सबित करने के लिये ही ऐसा करते हैं उनका और कोई इसके पीछे जनकल्याण करने का भाव नहीं होता।
कभी कभी तो लगता है कि जनकल्याण का नारा देने वाले लोग बड़े पद पर प्रतिष्ठत हो गये हैं पर लगता नहीं कि उनके पास अपनी मति है क्योंकि वह दूसरों की राय लेकर काम करने आदी हो गये हैं। ऐसे लोगों के लिये कल्याण तो बस दिखावा है वह तो उसके नाम पर सुख तथा एश्वर्य प्राप्त करने में ही अपने को धन्य समझते हैं।
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Thursday, May 6, 2010

मनुस्मृति-श्रेष्ठ लोगों के साथ ही संबंध बनाने चाहिए (shreshth purush se sambandh-manu smruti)

उत्तमैरुत्तमैर्नित्यं संबंधनाचरेत्सह।
निनीषुः कुलमुत्कर्षमधमानधर्मास्त्यजेत्।
हिन्दी में भावार्थ-
अपने परिवार की रक्षा तथा सम्मान में वृद्धि के लिये अच्छे परिवारों के साथ अपनी कन्या और पुत्र के संबंध बनाने चाहिए। खराब आचरण तथा धर्म विरोधी पुरुषों के परिवारों के साथ किसी प्रकार का संबंध स्थापित करना ठीक नहीं है।
उत्तमानुत्तमान्गच्छन्हीनाश्च वर्जवन्।
ब्राम्हण श्रेष्ठतामेति प्रत्यावयेन शूद्रताम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
श्रेष्ठ पुरुषों से संबंध जोड़ने और नीच तथा अधम पुरुषों से परे रहने वाले विद्वान की प्रतिष्ठा बढ़ जाती है। इसके विपरीत श्रेष्ठ लोगों की बजाय नीच पुरुषों से संबंध बनाने वाला मनुष्य और उसका कुल कलंकित हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-श्रेष्ठ व्यक्ति या परिवार के उच्च आचरण का पैमाना जाति, वर्ण, धन या भाषा नहीं वरन् चरित्र और व्यवहार है। आजकल तो मनुष्य जाति में जिस तरह पाखंड तथा ढोंग की प्रवृत्ति बढ़ गयी है ऐसे में किसी भी प्रकार के मैत्री या वैवाहिक संबंध सोच समझकर जोड़ना चाहिए। युवक युवतियां शैक्षणिक, व्यवसायिक तथा अन्य सार्वजनिक स्थानों पर एक दूसरे से मिलते हैं। लच्छेदार बातों से एक दूसरे पर प्रभाव डालकर संबंध बना देते हैं। कोई यह देखने का विचार भी नहीं करता कि सामने वाले का बौद्धिक, वैचारिक तथा चारित्रिक स्तर क्या है? इसलिये ही आजकल अधिकतर लोग मैत्री और प्यार में धोखे की शिकायत करते नज़र आते हैं। इतना ही नहीं माता पिता की उपेक्षा कर वैवाहिक जीवन साथी चुनने को लालायित युवक युवतियां जब बाद में निराश होते हैं तो आत्महत्या तक कर बैठते हैं। यौवन की अग्नि उनकी बौद्धिक सोच को कुंठित कर देते हैं और समझते हैं कि जैसे जीवन का पूरा अनुभव उनको हो गया है। वह माता पिता के अनुभव को पुराना समझकर उनकी उपेक्षा तो करते हैं पर उसके परिणाम कोई अच्छे नहंी रहते।
एक बात दूसरी भी है कि हमारे समाज के अनेक लोगों ने श्रेष्ठता का प्रमाण जाति, भाषा और आर्थिक स्तर मान लिया है जो कि गलत हैं। दरअसल जिस परिवार में उच्च विचार वाले लोग हैं वही श्रेष्ठ है। जिनका आचरण धार्मिक प्रवृत्ति का है वही श्रेष्ठ लोग हैं। मनोरंजन, विलासिता तथा श्रम बचाने वाले सुविधाभोगी साधनों का संचय करना ही उच्च कुल या व्यक्ति होने का प्रमाण नहीं है। न ही किसी जाति, भाषा या समूह का श्रेष्ठता पर एकाधिकार है। मुख्य विषय यह है कि वैवाहिक तथा मैत्री संबंध स्थापित करने से पहले अपने सामने वाली की बौद्धिक, वैचारिक, सामाजिक तथा चारित्रिक दृढ़ता को प्रमाणित कर लेना चाहिए। केवल चेहरा और पहनावा देखकर किसी को श्र्रेष्ठ मानकर उससे संबंध जोड़ना खतरनाक भी हो सकता है।
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Saturday, April 24, 2010

पतंजलि योग दर्शन-संयम से होते हैं अनेक लाभ (patanjali yog darshan-sanyam se labh)

शब्दार्थप्रत्ययानामितोसराध्यासात् संक्रस्तत्प्रविभागसंयमात् सर्वभूतरुतज्ञानम्
हिन्दी में भावार्थ-
शब्द, अर्थ और ज्ञान का निरंतर अभ्यास हो जाने के कारण मिश्रण होता है। उसके विभाग में संयम करने संपूर्ण प्राणियों के वाणी का ज्ञान हो जाता है।
संस्कारसाक्षात्करणात् पूर्वजातिज्ञानम्।
हिन्दी में भावार्थ-
संयम से अपने संस्कारों का साक्षात्कार करने पर पूर्वजन्म का ज्ञान हो जाता है।
प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम्।
हिन्दी में भावार्थ-
संयम से दूसरे के चित्त का साक्षात्कार करने पर उसके चित्त का ज्ञान हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-योग साधना से मनुष्य अंतर्मुखी हो जाता है उस समय उसकी आंतरिक इंद्रियां अत्यंत शक्तिशाली हो जाती हैं। तब उसे संसार का रहस्य बहुत अच्छी तरह से समझ में आता है। दरअसल योगासन और प्राणायाम से देह और मन के विकार अवश्य दूर होते हैं पर जो साधक उसके बावजूद संयम नहीं रखते उनको ज्ञान प्राप्त नहीं हो पाता।
आजकल कतिपय व्यवसायिक योग शिक्षक समाज में फैले दैहिक तथा मानसिक तनाव से मुक्ति के लिये योगसाधना तथा प्राणायाम अवश्य सिखाते हैं पर उनको पतंजलि योग दर्शन का पूर्ण ज्ञान नहीं है। उन्होंने योग साधना को एक शारीरिक व्यायाम की तरह बना दिया है। योगासन और प्राणायम तो पंतजलि योग दर्शन के हिस्सा भर हैं।
पतंजलि योग दर्शन के अनुसार मनुष्य को सदैव संयम बरतना चाहिये। अंतर्मुखी होकर इस संसार का चिंतन करना चाहिये। अपने आसपास के वातावरण, वस्तुओं तथा व्यक्तियों के बारे में विचार करना चाहिये। ऐसा करते हुए किसी प्रकार का पूर्वाग्रह हृदय में न पालते हुए निरपेक्ष भाव रखना ही अच्छा है। जब संयम पूर्वक सभी विषयों पर विचार करेंगे तो अनेक बातें स्वयमेव हमारे दिमाग में आयेंगी। तब अपने समक्ष उपस्थित विषय पर निष्कर्ष निकालने में सुविधा होगी। इसके लिये जरूरी है कि अपने मस्तिष्क और इंद्रियों में हमेशा संयम रखा जाये। क्रोध या निराशा में आकर कोई न तो निर्णय करना चाहिये और न ही कोई कार्य प्रारंभ करना अच्छा है। शांत चित्त होकर एक दृष्टा की तरह इस संसार की गतिविधियां देखने से वैचारिक सिद्धि मिल जाती है।
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Sunday, April 18, 2010

पतंजलि योग दर्शन-प्राणायाम से मन और विचार दृढ़ होते हैं (patanjali yog darshan-pranayam aur man)

प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य।
हिन्दी में भावार्थ-
प्राणवायु को बाहर निकालने और अंदर रोकने के निरंतर अभ्यास चित्त निर्मल होता है।
विषयवती वा प्रवृत्तिरुपन्न मनसः स्थितिनिबन्धनी।।
हिन्दी में भावार्थ-
विषयवाली प्रवृत्ति उत्पन्न होने पर भी मन पर नियंत्रण रहता है।
विशोका वा ज्योतिवस्ती।
हिन्दी में भावार्थ-
इसके अलावा शोकरहित प्रवृत्ति से मन नियंत्रण में रहता है।
वीतरागविषयं वा चित्तम्।
हिन्दी में भावार्थ-
वीतराग विषय आने पर भी मन नियंत्रण में रहता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भारतीय योग दर्शन में प्राणायाम का बहुत महत्व है। योगासनों से जहां देह के विकार निकलते हैं वहीं प्राणायाम से मन तथा विचारों में शुद्धता आती है। जैसा कि स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते आ रहे हैं कि इस विश्व में मनोरोगियों का इतना अधिक प्रतिशत है कि उसका सही आंकलन करना संभव नहीं है। अनेक लोगों को तो यह भी पता नहीं कि वह मनोविकारों का शिकार है। इसका कारण यह है कि आधुनिक विकास में भौतिक सुविधाओं की अधिकता उपलब्धि और उपयेाग के कारण सामान्य मनुष्य का शरीर विकारों का शिकार हो रहा है वहीं मनोरंजन के नाम पर उसके सामने जो दृश्य प्रस्तुत किये जा रहे है वह मनोविकार पैदा करने वाले हैं।
ऐसी अनेक घटनायें आती हैं जिसमें किसी फिल्म या टीवी चैनल को देखकर उनके पात्रों जैसा अभिनय कुछ लोग अपनी जिंदगी में करना चाहते हैं। कई लोग तो अपनी जान गंवा देते हैं। यह तो वह उदाहरण सामने आते हैं पर इसके अलावा जिनकी मनस्थिति खराब होती है और उसका दुष्प्रभाव मनुष्य के सामान्य व्यवहार पर पड़ता है उसकी अनुभूति सहजता से नहीं हो जाता।
प्राणायाम से मन और विचारों में जो दृढ़ता आती है उसकी कल्पना ही की जा सकती है मगर जो लोग प्राणायाम करते और कराते हैं वह जानते हैं कि आज के समय में प्राणायाम ऐसा ब्रह्मास्त्र है जिससे समाजको बहुत लाभ हो सकता है।
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Saturday, April 17, 2010

श्रीगुरु ग्रंथ साहिब-प्रभु का नाम कभी पुराना नहीं पड़ता (shriguru granth sahib-prabhu ka naam)

‘निरभउ निरंकार सच नाम।
जा का कीआ सगल जहान।।
हिन्दी में भावार्थ-
निर्भय निरंकार का नाम ही सच है। उसी परमात्मा का यह पूरा संसार है।
‘सचु पुराणा होवे नाही।’
हिन्दी में भावार्थ-
इस संसार में समय के साथ सब वस्तु पुरानी हो जाती है लेकिन प्रभु का नाम कभी भी पुराना नहीं पड़ता।
‘आदि सच जुगादि सच।
है भी सच, नानक होसी भी सच।।
हिन्दी में भावार्थ-
परमात्मा का नाम अनेक युगों से सच के रूप में मौजूद है। उसके नाम की शक्ति को कोई चुनौती नहीं दे सकता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-मनुष्य देह शिशुकाल, बाल्यकाल, युवावस्था तथा वुद्धावस्था से गुजरती हुई अंततः समाप्त हो जाती है पर यह संसार सदैव बना रहता है क्योंकि उसका आधार परमात्मा का संकल्प है। भगवान के नाम स्मरण करने से नित एक नवीन स्फूर्ति अनुभव होती है। हृदय में प्रतिदिन श्रद्धा तथा विश्वास के नाम लेते रहें तब भी ऐसा नहीं लगता कि वह पुराना है।
नित ध्यान, स्मरण तथा सत्संग में रत रहने वालों को परमात्मा का नाम कभी पुराना अनुभव नहीं हो सकता। अनेक लोग यह कहते हैं कि भगवान का नाम तो केवल वृद्धावस्था में लिया जाना चाहिये पर यह उनका वहम है। भगवान का नाम लेने की प्रवृत्ति अगर बचपन में ही नहंी पड़ी तो फिर वृद्धावस्था में भी उसकी आदत नहीं पड़ सकती। देह पुरानी पड़ जाती है पर उसमें विचर रहा मन तो आदतों का दास है। इसलिये अगर प्रारंभ में उसे ध्यान, नाम स्मरण तथा सत्संग का अभ्यास नहीं मिला तो वह बाद में उसके लिये लालायित भी नहीं होता। इसलिये प्रारंभ से ही समय मिलने पर परमात्मा का स्मरण करना चाहिये ताकि बाद में उसके लिये पछताना न पड़े।
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Friday, April 16, 2010

पतंजलि योग दर्शन-राग, द्वेष तथा भय का भाव स्वाभाविक (patanjli yog darshan-raag dwesh aur bhay ka bhav)

सुखानुशयी रागः।।
हिन्दी में भावार्थ-
सुख के भाव के पीछे राग है।
दुःखानुशयी द्वेषः।।
हिन्दी में भावार्थ-
दुःख के भाव के पीछे रहने वाला भाव क्लेश है।
स्वरसवाह विदुषोऽपि तथारूढोऽभिनिवेशः।।
हिन्दी में भावार्थ-
मनुष्य स्वभाव में भय का भाव परंपरा से चला आ रहा है जिसे अभिनिवेश भी कहा जाता है तथा यह मूढ़ों की तरह विवेकशील पुरुष में भी रहता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हर जीव की तरह मनुष्य में भी राग, द्वेष तथा भय का भाव समय के अनुसार चलता रहता है। जब मनुष्य सुख की अनुभूति करता है तब उसके अंदर राग पैदा होता है। जब दुःख देखता है तक उसके अंदर द्वेष पैदा होता है। मुत्यु तय है पर फिर भी हर मनुष्य उसके भय के साथ जीता है। सुख प्राप्त होने पर मनुष्य उसकी अनुभूति में इतना रम जाता है कि उसे बाकी संसार का बोध नहंी रहता। दुःख आने पर उसे अन्य सुखी लोगों के प्रति द्वेष भाव उत्पन्न होता है। दोनों ही एक तरह से विष की तरह हैं। राग प्रारंभिक रूप से अच्छा प्रतीत होता है पर एक समय के बाद आदमी अपने सुख से भी उकता जाता है। फिर उससे उत्पन्न विकार उसे त्रास देते हैं। आजकल सुख सुविधा के साधन बहुत हैं पर उनके इस्तेमाल से राजरोग भी पनप रहे हैं इससे हम इस बात को समझ सकते हैं।
आज हमारे समाज में चारों तरफ वैमनस्य का वातावरण है। इसका कारण यह है कि समाज में धन का असमान वितरण है। एक तरफ धनिक वर्ग अपने धन का प्रदर्शन करता है तो दूसरी तरफ जिन लोगों के पास धन का अभाव है वह धनिकों से नाखुश हैं। यह स्वाभाविक है। समाज का धनिक वर्ग दान और परोपकार की प्रवृत्तियों से रहित हो गया है इसने समाज में द्वेषभाव का निर्माण किया है।
आखिर महर्षि पतंजलि के इस सूत्र का आशय क्या है? जो व्यक्ति दृष्टा की तरह जीवन को देखेगा उसे यह बात समझ में आ सकती है। दूसरी स्थिति यह है कि जो मनुष्य इन सूत्रों को समझ लेगा कि इस देह के साथ राग, देष तथा भय की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से लगी हुई हैं वह दृष्टा भाव को प्राप्त होकर जीवन का आनंद प्राप्त करेगा।


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Tuesday, April 13, 2010

मनु स्मृति-अपने ऊपर निर्भर काम को ही हाथ में लें (apna hath jagnnath-manu smriti)

यत्कर्मकुर्वतोऽस्य स्यात्परितोषोऽन्तरात्मनः।
तत्प्रयतनेन कुर्वीत विपरीतं तु वर्जयेत्।
हिन्दी में भावार्थ-
जिस काम को करने से मन और अंतरात्मा को शांति मिलती हो वही करना चाहिए। जिससे इसके विपरीत स्थिति हो तो उस काम को त्याग देना चाहिए।
सर्वे परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्।
एतद्विद्यात्समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः।।
हिन्दी में भावार्थ-
जो कार्य दूसरे के अधीन है वह दुःखदायी होता है। जिस काम पर अपना पूरी तरह से नियंत्रण हो उसी से ही सुख मिलता है। यही सुख और दुःख का लक्षण है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जब भी हमारे सामने कोई कार्य उपस्थित होता है तो उसके परिणामों, प्रकृति तथा स्वरूप पर अवश्य विचार करना चाहिए। कभी कोई कार्य दबाव या परप्रेरणा से नहीं करना चाहिऐ। इसके अलावा जो कार्य पूरे या आंशिक रूप से दूसरे पर निर्भर हो उसे अपने हाथ में न लें तो ही अच्छा। क्योंकि तब लक्ष्य की प्राप्ति दूसरे की गतिविधि पर निर्भर हो जाती है। अनेक बार ऐसा भी होता है कि दूसरा आदमी अगर अंदर ही अंदर द्वेष रखता है तो वह जानबूझकर उस काम का अपना पूरा या आंशिक दायित्व नहीं निभाता तब अपना लक्ष्य या अभियान संकट में पड़ जाता है।
इसके अलावा किसी भी कार्य को करते हुए इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि उससे अपने मन और अंतरात्मा को संतोष मिलेगा या नहीं। जिस काम को करने से मन और अंतरात्मा में क्लेश होता हो उससे करने का विचार ही छोड़ दें तो ही अच्छा होगा। कहने का अभिप्राय यह है कि अपने हाथ से किये जाने वाले कार्यों पर विचार करना चाहिए ताकि उनके परिणामों को लेकर बाद में पछताना न पड़े। बुद्धिमान व्यक्ति किसी भी काम को करने से पहले उसके हर पहलू पर विचार कर लेते हैं।
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Saturday, April 10, 2010

संत कबीर वाणी-परखने के बाद किसी से संपर्क बढ़ायें (sant kabir vani-manushya ko parkhen)

कबीर देखी परखि ले, परिख के मुखा बुलाय।
जैसी अंतर होयगी, मुख निकसेगी आय।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कोई भी व्यक्ति मिले तो पहले उसे परखो फिर उसके मुंह से कुछ बुलवाओ। जैसी बात उसके अंदर होगी वैसी ही बाहर निकल आयेगी।
पहिले शब्द पिछानिये, पीछे कीजै मोल।
पारख परखै रतन को, शब्द का मोल न तोल।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि पहले दूसरे के कहे शब्द को पहचाने फिर उसके साथ अपना व्यवहार या संपर्क कायम करें। रतन को परख कर उसकी कीमत लगाई जा सकती है पर शब्द का कोई मोल नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में पुण्यात्मा तथा पापात्मा दोनों प्रकार के मनुष्य रहते हैं। पुण्यात्मा पुरुष कभी अपने मुख से प्रशंसा करते हुए स्वार्थ की सिद्धि के लिये किसी मनुष्य से संपर्क नहीं करते। जिनका लक्ष्य केवल अपना स्वार्थ सिद्ध करना है वह मुंह से मीठा बोलते हैं तथा अपना काम होने पर गधे को बाप मानने को तैयार हो जाते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि जो लोग जानबुझकर संपर्क बनाते हैं उनकी प्रवृत्तियों को पहले समझ लेना चाहिये। इसके लिये यह जरूरी है कि उनके मुख से निकलने वाले वाक्यों का विश्लेषण किया जाये। कोई मीठा बोले या चाटुकारिता करे तो उसे अच्छा मान लेने की गलती नहीं करना चाहिए।
लोग द्विअर्थी बातें बोलते हैं ताकि समय पड़ने पर अपने वादे से मुकरा जा सके। इसलिये अपने संपर्क में रहने वाले व्यक्तियों के मुख से निकलने वाले शब्द तथा व्यवहार पर दृष्टिपात अवश्य करना चाहिये। इतना ही नहीं संबंधों की गहराई का भी माप लेना चाहिये। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो प्रतिदिन मिलते हैं पर उनसे संबंध औपचारिक होते हैं इसलिये उन पर अधिक विश्वास नहीं करना चाहिये। इसके विपरीत कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनसे आत्मीयता होती है पर वह दैहिक रूप परे निवास करते हैं। समय पड़ने पर वह काम आते हैं इसलिये उनको भुलाना नहीं चाहिए।
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Friday, April 9, 2010

पतंजलि योग दर्शन-अभ्यास से ही चित्त दृढ़ होता है (patanjali yog darshan-abhyas

अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः।
हिन्दी में भावार्थ-
चित्तवृतियों पर नियंत्रण अभ्यास तथा वैराग्य से होता है।
तन्न स्थितो यत्नोऽभ्यासः।
हिन्दी में भावार्थ-
चित्त की स्थिरता के लिये जो प्रयास किया जाता है उसे अभ्यास कहा जाता है।
स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्काराऽसेवितो दृएभूमिः।।
हिन्दी में भावार्थ-
अपने लक्ष्य का सम्मान करते हुए अभ्यास अगर निंरतर किया जाये तो चित्त को दृढ़ कर उसे प्राप्त किया जा सकता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मन की स्थिति पर नियंत्रण होना जरूरी है। अक्सर लोग योग साधना के समय आसनों के पूरी तरह न लग पाने तथा ध्यान में चित्त के अस्थिर होने की चर्चा करते हैं। जिनको योगाभ्यास, प्राणायाम तथा ध्यान में पारंगत होना है उनको किसी योग्य गुरु से ज्ञान प्राप्त कर अपने अभ्यास में लगे रहना चाहिये। जैसे जैसे वह अभ्यास करते जायेंगे उनको नित नित नई अनुभूतियां तथा ज्ञान मिलता जायेगा। एक दिन में न तो ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है और किसी कला में पारंगता मिल सकती है। प्रत्येक मनुष्य सांसरिक कार्यों में लिप्त होकर बहुत सरलता से मानसिक, दैहिक तथा वैचारिक रोगों का शिकार हो जाता है। सच तो यह है कि मानव मन असहजता के भाव को जल्दी प्राप्त हो जाता है जहां से निकलना उसे नरक में जाने जैसा लगता है। ऐसे में सहज योग की धारा उसको एकदम अपने लक्ष्य से विपरीत दिशा में जाना लगता है।
सांसरिक वस्तुओं और व्यक्तियों के संपर्क में रहकर उनके प्रति उपजे मोह से जो असहजता का भाव है उसे कोई आदमी तक तक नहीं समझ सकता जब तक वह सहजता का स्वरूप नहीं देख लेता। इसलिये जब कोई व्यक्ति योगासन, प्राणायाम, ध्यान तथा मंत्रोच्चार करता है तो उसकी प्रवृत्तियां उसे रोकती हैं। ऐसे में यह जरूरी है कि बिना किसी विचार के अपना अभ्यास निरंतर जारी रखा जाये। इस तरह धीरे धीरे अपने कार्य में दक्षता प्राप्त होती जायेगी। एक दिन ऐसा भी आयेगा जब सहजता की अनुभूति होने पर हमें यह पता चलता है कि अभी तक हम वाकई बिना किसी कारण असहज जीवन व्यतीत कर रहे थे।
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Sunday, April 4, 2010

श्रीगुरुग्रंथ साहिब-चिंता तो अनहोनी घटना की करना चाहिये (shri guru granth sahib-chinta n karen

‘चिंता ता की कीजीअै जो अनहोनी होइ।’
इहु मारगु संसार को नानक थिरु नहीं कोइ।।
हिन्दी में भावार्थ-
चिंता तो उस घटना की करना जो अनहोनी हो। इस संसार में तो सभी कुछ स्वाभाविक रूप घटता रहता है और यहां कुछ भी स्थिर नहीं है।
‘सहस सिआणपा लख होहि त इ न चलै नालि।’
हिन्दी में भावार्थ-
गुरुवाणी के अनुसार मनुष्य चाहे लाख चतुराईयां कर ले उसके साथ एक भी नहीं जाती।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अगर हम दृष्टा की तरह अपने जीवन को देखें तो सारे संसार में कुछ भी अस्वाभाविक नहीं दिखाई देता। श्रीमद्भागवत गीता के मतानुसार ‘गुण ही गुणों को बरतते हैं’। इसका आशय यह है कि मनुष्य को उसके कर्म के अनुसार ही फल प्राप्त होता है और जैसा व्यवहार दूसरों से वह करता है वैसा ही आता है। वह जैसी वस्तुओं का उपभोग करता है वैसा ही उसका स्वभाव होता है। जब यह बात समझ में आयेगी तब ही इस जीवन को सहजता से देखा जा सकता है। आजकल के युग में टीवी चैनल तथा अन्य प्रकाशन उद्योग विज्ञापन पर चल रहे हैं। उनको जिन स्त्रोतों से विज्ञापन मिलते हैं वह उनकी नीतियों के अनुसार ही काम करते हैं। इन विज्ञापनों के द्वारा उनको अपने ग्राहकों के उत्पाद लोगों के सामने प्रस्तुत करना होता है। ऐसे में वह अपने विज्ञापनों में ऐसे शब्द और नारे भरते हैं कि देखने, सुनने और पढ़ने वाले के मन में आकर्षण पैदा हो और वह अपनी जेब ढीली करे। अब आदमी आकर्षण के वश में आकर पैसा तो खर्च करता है पर उसकी सहजता का दौर। चीज अगर कर्जा लेकर खरीदी गयी है तो उसको चुकाने की चिंता और अगर चीज खराब हो गयी तो उसको बनवाने के लिये जूझना।
इतना ही नहीं टीवी, फिल्म और समाचार पत्रों में किसी की शादी के तो किसी के स्वयंवर के तथा किसी मर जाने पर इतना शोर मचाया जाता है जैसे कि अस्वाभाविक रूप से सब कुछ घटित हुआ हो। लोग भी उनको देखते हैं और उनका मन कभी खुशी से झूमता है तो की द्रवित होता है। यह काल्पनिक मनोरंजन कभी हृदय के लिये प्रसन्नतादायक नहीं हो सकता।

भगवान श्रीगुरुनानक देव इसलिये ही लोगों को अपने संदेशों में सहज भाव धारण करने का संदेश देते रहे क्योंकि वह जानते थे कि मनुष्य मन को विचलित कर उससे मानसिक रूप से बंधक बनाया जाता है। तमाम तरह के कर्मकांडों का निर्माण मनुष्य के मन में भय पैदा करने के लिये ही किया गया है। जन्म खुशी तो मृत्यु दुःख का विषय बन जाती है। जबकि दोनों सहज घटनायें हैं। जो बना है वह नष्ट होगा, यह इस दुनियां का सर्वमान्य सत्य है। तब चिंता किस बात की करना? चिंता को उस बाद की करना चाहिये जिसका घटना अस्वाभाविक है। मनुष्य का मन चंचल, बुद्धि भयभीत और अहंकार आसमान में टंगा है। उन पर नियंत्रण न होना ही अस्वाभाविक बात है इसलिये उसकी चिंता करना चाहिये। इसके लिये जरूरी है कि भगवान की हृदय से भक्ति की जाये।

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Friday, April 2, 2010

मनुस्मृति-भोजन के बाद गीत-संगीत सुनकर ही शयन करें (dinner and music-hindi adhyamik sandesh)

तत्र भुक्तपर पुनः किंचित्तूर्यघोषैः प्रहर्षितः।
संविशेत्तु यथाकालमुत्तिष्ठेच्च गतक्लमः।
हिन्दी में भावार्थ-
भोजन करने के बाद गीत संगीत का आनंद उठाना चाहिये। उसके बाद ही शयन के लिये प्रस्थान करना उचित है।
एतद् विधानमातिष्ठेदरोगः पृथिवीपतिः।
अस्वस्थः सर्वमेत्त्ु भृत्येषु विनियोजयेत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
स्वस्थ होने पर अपने सारे काम स्वयं ही करना चाहिये। अगर शरीर में व्याधि हो तो फिर अपना काम विश्वस्त सेवकों को सौंपकर विश्राम भी किया जा सकता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-एक तरफ मनुस्मृति में प्रमाद से बचने का सुझाव आता है तो दूसरी जगह भोजन के बाद गीत संगीत सुनने की राय मिलती है। इसमें कहीं विरोधाभास नहीं समझा जा सकता। दरअसल मनुष्य की दिनचर्या को चार भागों में बांटा गया है। प्रातः धर्म, दोपहर अर्थ, सायं काम या मनोरंजन तथा रात्रि मोक्ष या निद्रा के लिये। जिस तरह आजकल चारों पहर मनोरंजन की प्रवृत्ति का निर्माण हो गया है उसे देखते हुए मनृस्मृति के संदेशों का महत्व अब समझ में आने लगा है।
आजकल रेडियो, टीवी तथा अन्य मनोंरजन के साधनों पर चौबीस घंटे का सुख उपलब्ध है। लोग पूरा दिन मनोरंजन करते हैं पर फिर भी मन नहीं भरता। इसका कारण यह है कि मनोंरजन से मन को लाभ मिले कैसे जब उसे कोई विश्राम ही नहीं मिलता। जब कोई मनुष्य प्रातः धर्म का निर्वहन तथा दोपहर अर्थ का अर्जन ( यहां आशय अपने रोजगार से संबंधित कार्य संपन्न करने से हैं) करता है वही सायं भोजन और मनोरंजन का पूर्ण लाभ उठा पाता है। उसे ही रात्रि को नींद अच्छी आती है और वह मोक्ष प्राप्त करता है।
शाम को भोजन करने के बाद गीत संगीत सुनना चाहिये। अलबत्ता टीवी देखने से कोई लाभ नहीं है क्योंकि उसमें आंखें ही थकती हैं और दिमाग को कोई राहत नहीं मिलती। इसलिये टेप रिकार्ड या रेडियो पर गाने सुनने का अलग मजा है। वैसे भी देखा जाये तो आजकल अधिकर टीवी चैनल फिल्मों पर गीत संगीत बजाकर ही गाने प्रस्तुत किये जाते हैं-चाहे उनके हास्य शो हों या कथित वास्तविक संगीत प्रतियोगितायें फिल्मी धुनों से सराबोर होती हैं। देश के व्यवसायिक मनोरंजनक प्रबंधक जानते हैं कि गीत संगीत मनुष्य के लिये मनोरंजन का एक बहुत बड़ा स्त्रोत हैं इसलिये वह उसकी आड़ में अपने पंसदीदा व्यक्तित्वों को थोपते हैं। प्रसंगवश अभी क्रिकेट में भी चौका या छक्का लगने पर नृत्यांगना के नृत्य संगीत के साथ प्रस्तुत किये जाते हैं। स्पष्टतः यह मानव मन की कमजोरी का लाभ उठाने का प्रयास है।
टीवी पर इस तरह के कार्यक्रम देखने से अच्छा है सीधे ही गाने सुने जायें। अलबत्ता यह भोजन करने के बाद कुछ देर तक ठीक रहता है। अर्थशास्त्र के उपयोगिता के नियम के अनुसार हर वस्तु की प्रथम इकाई से जो लाभ होता है वह दूसरी से नहीं होता। एक समय ऐसा आता है कि लाभ की मात्रा शून्य हो जाती है। अतः जबरदस्ती बहुत समय तक मनोरंजन करने का कोई लाभ नहीं है। सीमित मात्रा में गीत संगीत सुनना कोई बुरी बात नहीं है-मनोरंजन को विलासिता न बनने दें।
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Thursday, April 1, 2010

संत कबीर वाणी-मन की दुविधा दूर करो (man ki duvidha door karo-hindi adhyamik gyan sandesh)

‘कबीर’दुविधा दूरि करि, एक अंग है लागि।
यहु सीतल बहु तपति है, दोऊ कहिये आगि।।
संत कबीरदास जी कहते हैं कि मन की दुविधा को दूर करो। एक परमात्मा का ही स्मरण करो। वही शीतलता भी प्रदान करता है तो आग जैसा तपाता भी है। अगर सांसरिक मोह और भगवान भक्ति में बीच में फंसे रहोगे तो दोनों तरफ आग अनुभव होगी।
भूखा भूखा क्या करैं, कहा सुनावै लोग।
भंडा घड़ि जिनि मुख यिका, सोई पूरण जोग।।
संत कबीरदास जी का कहना है कि अपनी भूख को लेकर परेशान क्यों होते हो? सभी के सामने अपने संकट का बयान करने से कोई लाभ नहीं है। जिसने मुख दिया है उसने पेट भरने के योग का निर्माण भी कर दिया है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जब मनुष्य के मन में कर्तापन का बोध बढ़ने लगता है तो उसें अहंकार का भाव पैदा होता है और जिसकी वजह से उसे अनेक बार भारी निराशा मिलती है। मनुष्य सोचता है कि वह अपना काम स्वयं कर रहा है। उसके मन में अपने कर्म फल को पाने की तीव्र इच्छा पैदा हो जाती है और जब वह पूर्ण न हो तब वह निराशा हो जाता है। अनेक लोग इस संशय में पड़े रहते हैं कि हम अपने कर्म के फल का प्रदाता भगवान को माने या स्वयं ही उसे प्राप्त करने के लिये अधिक प्रयास करें। वह भगवान की भक्ति तो करते हैं पर अपने जीवन को दृष्टा की तरह न देखते हुए अपने कर्म फल के लिये स्वयं अपनी प्रशंसा स्वयं करते हैं। यह कर्तापन का अहंकार उन्हें सच्ची ईश्वर भक्ति से परे रखता है।
ईश्वर भक्ति के लिये विश्वास होना चाहिये। अपने सारे कर्म परमात्मा को समर्पित करते हुए जीवन साक्षी भाव से बिताने पर मन में अपार शांति मिलती है। किसी कार्य में परिणाम न मिलने या विलंब से मिलने की दशा में तो निराशा होती है या उतावली से हानि की आशंका रहती है। अतः अपने नियमित कर्म करते हुए परमात्मा की भक्ति करने के साथ ही उसे कर्म प्रेरक और परिणाम देने वाला मानते हुए विश्वास करना चाहिये।
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Saturday, March 27, 2010

मनुस्मृति-सामान्य मनुष्य के लिये मदिरा का सेवन वर्जित (wine not for man-manu smriti)

सुरा वै मनमन्नानां पाप्मा च मलमुच्यते।
तस्माद् ब्राह्मणराजन्यौ वैश्यश्च न सुरां पिबेत्।
हिन्दी में भावार्थ-
सभी अन्नों के मल को सुरा कहा गया है मल का ही दूसरा नाम पाप है। अतः विद्वान, शक्तिशाली तथा व्यवसायियों को कभी सुरापान नहीं करना चाहिये।
यक्षरक्षः पिशाचान्नं मद्यं मांसं सुरासवम्।
तद् ब्राह्मणेन नात्तव्यं देवानामश्नता हवि।।
हिन्दी में भावार्थ-
मदिरा, मांस सुरा, आसव यक्षांे, राक्षसों व पिशाचों द्वारा सेवन किये जाने वाले पदार्थ हैं। अतः देवताओं की पूजा करने वाले इनका सेवन न करें।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कहने को तो हमारे देश में धार्मिक प्रवृत्ति वाले लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है पर दूसरा तथ्य यह भी है कि शराब, मांस और जुआ जैसी प्रवृत्तियों के पोषक भी उतनी ही संख्या में बढ़ रहे हैं। बात तो लोग संस्कारों और संस्कृति की करते हैं पर आधुनिकता के नाम राक्षसी और पैशाचिक प्रवृत्तियों के संवाहक बनते जा रहे हैं। मुंह में देवताओं का नाम और व्यवहार में पिशाचों का काम करते हुए लोग जरा भी संकोच नहीं करते।
आपने देखा होगा कि हमारे टीवी चैनल और समाचार पत्र पत्रिकायें अपने देश भारत की वैदिक विवाह परंपरा की प्रशंसा करते हुए नहीं अघाते। कहीं कोई विदेशी इस परंपरा का निर्वाह करता है तो समाचार प्रकाशित होते हैं। सच तो यह है कि हमारी कथित संस्कृति और संस्कार कुछ कर्मकांडों तक ही सिमट गये हैं। अपनी संस्कृति और संस्कारों की प्रशंसा करने वाले यह कहते हुए नहीं अघाते कि हमारे देश में ‘तैंतीस करोड़ देवता रहते हैं’। मगर इन्हीं कर्मकांडों के निर्वाह के समय शराब और मांस का सेवन आधुनिकता का प्रमाण बन गया है। विवाह हों या कोई अन्य सामूहिक कार्यक्रम उसमें शराब का सेवन करने को समाज ने मान्यता दी है यह जाने बिना कि इसका सेवन यक्ष, राक्षस तथा पिशाच करते हैं। मांस खाने की प्रवृत्ति भी बढ़ती जा रही है। हम यहां मांस या शराब का सेवन करने वालों पर कोई आक्षेप नहंी करना चाहते बल्कि समाज की सोच पर ही प्रश्न उठा रहे हैं।
विवाह एक धार्मिक संस्कार है जिसका पालन करते हुए लोग फूले नहीं समाते। अभी हाल ही में बिना विवाह ही युवक युवतियों के साथ रहने को कानूनी मान्यता मिलने पर अनेक संस्कार और संस्कृति के ठेकेदारों ने बहुत शोर मचाया था पर इसी पवित्र विवाह संस्कार के समय शराब के सेवन पर सभी चुप क्यों हो जाते है? इसके विरुद्ध कोई प्रचार क्यों नहीं करते? यह सोच का विषय है। इतना ही नहीं हमारे देश में कुछ जगह तो मंदिरों में शराब भी प्रसाद के रूप मेंचढ़ाने की परंपरा प्रचलन में आई है। ताज्जुब इस बात का है कि इस पर किसी भी धार्मिक प्रवृत्ति को आपत्ति करते हुए नहीं देखा। देश में शराब को जिस तरह एक सामान्य आदत के रूप में मान्यता मिली है वह चिंता की बात है और समाज को इस बात पर विचार करना चाहिये कि यह सामान्य मनुष्य द्वारा उपभोग में लाया जाने वाला पदार्थ नहीं है।


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