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Thursday 26 January 2012

चाणक्य नीति-स्नेह दुःख का मूल कारण है (chankya neeti(sneh dukh ka mool karan)

                 जीवन जीना एक ऐसी कला है जिसे भारत के अध्यात्मिक ज्ञानियों तथा मनीषियों ने बड़े शोध के साथ प्रस्तुत किया है। अधिकतर लोग सन्यास का अथ संसार की दैनिक गतिविधियों के त्याग को समझते हैं जबकि श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार वह एक ऐसी मानसिक स्थिति है जिसमें मनुष्य आसपास के वातावरण से अपने हृदय के भाव को प्रथक रखता है। वह निर्लिप्त होकर संसार में दृष्टा की तरह रहता है। ज्ञानी आदमी अपनी दिनचर्या भी सामान्य ढंग से संपन्न करता है पर वह भावनात्मक रूप से किसी भी वस्तु, विषय या व्यक्ति के प्रति संवदेनशील नहीं होता। वह दया करता है पर निष्प्रयोजन, मित्रता निभाता है पर कामनाओं से रहित होकर और अपने कर्म किसी भी प्रकार के फल की इच्छा त्याग का त्याग भी कर देता है। देखा जाये तो दुःख सुख मन की स्थिति है। जहां कामना है वहां निराशा है यहां काम है वहां क्रोध है और जहां अहंकार है वहां तनाव है। इस स्थिति को ज्ञानी लोग जानते है।
                                 आचार्य चाणक्य कहते हैं कि
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                              त्वजेद्धर्म दयाहीनं विद्याहीनं गुरुं त्यजेत्।
                               त्यजेत्कोधुमुर्खी भार्या निःस्नेहान् बानधवांस्त्येजेत्।।
                    ‘‘जिस धर्म में दया का गुण न हो, जिस गुरु में विद्या न हो तथा जिस स्त्री में स्नेह न हो उसका त्याग करना ही श्रेयस्कर है।’’
                        यस्य स्नेहो भयं तस्य स्नेहो दुःखस्य भाजनम्।
                        स्नेहामूलानि दुःखानि तानि त्यक्त्वा वसेत्सुखम्।।
              ‘‘स्नेह ही भय और दुःख का कारण है। स्नेह को त्यागकर ही मनुष्य सुखी रह सकता है।’’
                      हतं ज्ञानं क्रियाहीनं हतश्चाऽज्ञानतो नरः।
                       हर्त निर्नायकं सैन्यं स्त्रियो नष्ट ह्यभर्तृकाः।।
              ‘‘ज्ञान रहित आचरण, अज्ञानी पुरुष का जीवन तथा सैन्य विहीन सेनापति तथा स्वामीहीन स्त्री का नाश अतिशीघ्र हो जाता है।
          मूल कारण है किसी भी व्यक्ति, विषय या वस्तु के प्रति मोह, स्नेह और लोभ! खासतौर से जहां हम किसी दूसरे व्यक्ति के प्रति स्नेह मन में रखते हुए उसके हित की कामना करते हैं। वह पूरी न होने पर निराशा हाथ लगती है। अनेक बार ऐसा भी होता है कि हम स्नेह या आदरवश दूसरे का हितकर उपक्रम करते हैं पर वह फिर भी अपना द्वेषभाव नहीं त्यागता। कुछ स्नेहीजन तो अपने अधिकार का वास्ता देकर काम करने के लिये दबाव बनाते हैं। सज्जन लोग इस स्थिति का सामना नहीं कर पाते। यह अलग बात है कि वह इसकी वजह से उनको केवल तनाव ही झेलना पड़ता है। हमें अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। गृहस्थ जीवन में अपने साथ रह रहे परिवार के सदस्यों को सहयोग करना चाहिए पर उनसे किसी भी प्रकार की अपेक्षा करना स्वयं को तनाव में लाना है। यह बात समझनी चाहिए।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Sunday 22 January 2012

दादूदयाल के दोहे-विष को अमृत मत समझो (dadp dayal ke dohe-vish ko amrit mat samjho)

          इस संसार में ऐसे ज्ञानी और ध्यानी लोगों की कमी नहीं है जो अपने सांसरिक ज्ञान को बघारते हुए नहीं थकते। इतना ही नहीं धर्म के नाम कर्मकांडों का महत्व इस तरह किया जाता है कि मानो उनको करने से स्वर्ग मिल जाता है। क्षणिक लाभ और मनोरंजन के लिये लोग अपने संबंध बनाते हैं। उनको ऐसा लगता है कि इससे उनका जीवन आराम से कट जायेगा पर इसके विपरीत ऐसे ही संबंध बाद में बोझ बन जाते हैं।सच बात तो यह है कि मनुष्य अपने जीवन में ऐसे अनेक विषयों से सुख या अमृत की चाह में जुड़ता है जो अंतत: विषदायी सिद्ध होते हैं।
             आजकल हमारे यहां प्रेम विवाहों का प्रचलन अधिक हो गया है। देखा यह जाता है कि अंततः लड़कियों को ही अपने परिवार से वेदना अधिक मिलती है। एक तो उनके परिजन उसकी सामाजिक जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाते हैं और अपनी मर्जी से विवाह करने का आरोप लगाकर संपर्क नहीं रखते दूसरे पति के परिजन भी दहेज आदि न मिलने के कारण उनको बहू रूप में ऐसे स्वीकारते हैं जैसे कि मजबूरी हो। फिर परिवार आदि में खटपट तो होती है साथ ही चाहे लड़की नौकरीशुदा हो या नहीं उससे अपेक्षा यह की जाती है कि वह घर का काम करे। ऐसे में जिन लड़कियों ने प्रेम विवाह किया होते हैं उनको वही लड़के संकट देते हैं जिन्हें उन्होंने प्रेमवश सर्वस्व न्यौछावर किया होता है।
संत कवि दादू दयाल कहते हैं कि
....................
झूठा साचा करि लिया, विष अमृत जाना।
दुख कौ सुख सब कोइ कहै, ऐसा जगत दिवाना।।
          ‘‘मनुष्य को सत्य असत्य, विष अमृत और दुःख सुख की पहचान ही नहीं है। लोगों का दीवाना पन ऐसा है दुख देने वाली वस्तुओं और व्यक्तियों से सुख मिलने की आशा करते हैं।                    ‘‘मनुष्य को सत्य असत्यए विष अमृत और दुःख सुख की पहचान ही नहीं है। लोगों का दीवाना पन ऐसा है दुख देने वाली वस्तुओं और व्यक्तियों से सुख मिलने की आशा करते हैं।                
       इस तरह दीवानापन लड़कों में भी देखा जाता है। वह लड़कियों के बाह्य रूप देखकर बहक जाते हैं पर जब घर चलाने का अवसर उपस्थित होता है तब पता चलता है कि जीवन उतना सहज नहीं है जितना उन्होंने समझा था। जिस इश्क को उर्दू शायर गाकर थकते नहीं है वही एक दिन नफरत का कारण बन जाता है। आई लव यू कहने वाले फिर आई हेट यू कहने लगते हैं। तत्वज्ञानियों को पता है कि यहां हर देहधारी वस्तु अंततः पुरातन अवस्था में आती है। हम अपने मुख से करेला खायें या मिठाई पेट में अंततः वह कचड़ा ही हो जाता है। हम शराब पियें या शरबत पेट में वह विषाक्त जल में परिवर्तित होता है जिसके जिसके निष्कासन पर ही हमारी देह ठंडी होती है। इस ज्ञान को बुढ़ापे में धारण करने अच्छा है कि बचपन में धारण किया जाये तभी संसार के उन संकटों से बचा जा सकता है जो अज्ञान के कारण हमारे सामने उपस्थित होते हैं। कभी कभी तो उनकी वजह से देह का नाश भी होता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday 14 January 2012

वेदान्त दर्शन से-शब्द को परब्रह्म मानना गलत नहीं (vedand darshan se-shabd ko parbrahm manna galat nahin)

              मनुष्य में पराशक्ति के प्रति हमेशा ऐसा आकर्षण है की वह अपने अंदर मौजूद शक्तियों का ज्ञान नहीं कर पाता। कुछ मनुष्य स्वयं को सिद्ध प्रमाणित  कर उसका कोई न कोई रूप प्रचारित कर देते हैं। उनका उद्देश्य पवित्र होता है। वह सोचते हैं कि इससे आम मनुष्य को बुरी राह से हटा कर धर्म मार्ग पर रखा जाये। व्यवहार में उल्टा होता है। लोग अपने अपने इष्ट के रूपों को लेकर आपस में विवाद करते हैं।
      विश्व में अनेक धर्म हैं। इनसे जुड़े धर्म समुदायों में भी विभाजन हो चुका है। विदेशों में प्रवर्तित धर्म और उसके समुदाय को वर्तमान में अध्ययन करें तो पायेंगे कि वह दो तीन तो कहीं चार भागों में बंट गये हैं। उनके धर्मगुरु अपने अनुयायियों को दूसरे धर्म के लोगों का भय दिखाकर भले ही अपने पाले में रखते हैं पर फिर भी उनके आपसी हिंसक संघर्ष होते रहते हैं। एक ही धर्म का एक समुदाय अपने को असली एवं शुद्ध बताता है तो दूसरे समुदाय को दुष्ट कहता है। इसके विपरीत भारतीय धर्मों में विभिन्न समुदाय होने के बावजूद कहीं आपसी संघर्ष का इतिहास नहीं है। सभी धर्म और उनके प्रवर्तक यह मानते हैं कि परमात्मा अनंत है। उसको साकार रूप से भले ही न देखा जाये पर ध्यान, योग तथा भक्ति के माध्यम से उसकी उपस्थिति की अनुभूति अपने हृदय में की जा सकती है। यह बात सही है कि लोग अपनी सुविधा के अनुसार साकार तथा निराकार भक्ति करते हैं पर एक दूसरे के प्रति उनमें आदरभाव रहता है। यहां तक कि एक ही परिवार में अनेक सदस्यों का अलग अलग इष्ट देव होता है पर मूल रूप से यह सभी मानते हैं कि परमात्मा एक है। इस पर कहीं कोई विवाद न होता है न होना चाहिए।
हमारे वेदांत दर्शन में कहा गया है कि
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साक्षादष्विरोधं जैमिनि।
            ‘‘शब्द को साक्षात् परब्रह्म मानने में भी कोई विरोध नहीं है ऐसा जैमिनि आचार्य मानते हैं।
अभिव्यक्तेरित्याश्मरथ्यः।
              ‘‘देश विशेष में ब्रह्म का प्रकट रूप होता है इसलिये इसमें कोई विरोध नहीं है।’’
‘‘अनुस्मृतेर्बादरिः।
             ‘‘ऐसा बादरि नामक आचार्य मानते हैं।
         कहने का अभिप्राय यह है कि भक्ति के स्वरूप या परमात्मा के अस्तित्व को लेकर भले ही आपस में मतभेद हों पर मनभेद नहीं होना चाहिए। इसके अलावा किसी की भक्ति की प्रक्रिया और परमात्मा के रूप पर भी प्रतिकूल टिप्पणियां न करना ही उचित है। हमारा अध्यात्मिक दर्शन मानव मन की व्यापकता का चिंतन करते हुए नित नये सिद्धांतों का प्रतिपादन करता है। हमारे यहां समय समय पर ऐसे महापुरुष भी इस धरती पर प्रकट होते हैं जो भले ही किसी धर्म या समुदाय के हों पर उनको सारा देश बाद में देवत्व का दर्जा प्रदान करता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Sunday 8 January 2012

सामवेद से संदेश-तुम प्रतिदिन युद्ध करते हो (samved-tum pratidin yuddh karte ho-samved se sandesh)

           श्रीमद्भागवत गीता के आलोचक उसे युद्ध से उपजा मानकर उसे तिरस्कार करते हैं पर शायद वह नहीं जानते कि आधुनिक सभ्यता में भी युद्ध एक व्यवसाय है जिसे कर्म की तरह किया जाता है। सारे देश अपने यहां व्यवसायिक सेना रखते हैं ताकि समय आने पर देश की रक्षा कर सकें।
         भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध के समय श्री अर्जुन से कहा था कि अभी तू युद्ध छोड़ देगा पर बाद में तेरा स्वभाव इसके लिये फिर विवश करेगा। अर्जुन एक योद्धा थे और उनका नित्य कर्म ही युद्ध करना था। जब श्रीकृष्ण उसे युद्ध करने का उपदेश दे रहे थे तो एक तरह से वह कर्मप्रेरणा थी। मूलतः योद्धा को क्षत्रिय माना जाता है। इसे यूं भी कहें कि योद्धा होना ही क्षत्रिय होना है। इसलिये श्रीमद्भागवत में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म प्रेरणा दी है यह अलग बात है कि युद्ध करना उसका स्वाभाविक कर्म था। श्रीमद्भागवत में कृष्ण यह भी कहते हैं कि अपने स्वाभाविक कर्म में लगा कोई भी व्यक्ति हो-कर्म के अनुसार क्षत्रिय, ब्राह्मण वैश्य और शुद्र का विभाजन माना जाता है-मेरी भक्ति कर सकता है। इस तरह श्रीमद्भागवत गीता को केवल युद्ध का प्रेरक मानना गलत है बल्कि उसके अध्ययन से तो अपने कर्म के प्रति रुचि पैदा होती है। इसी गीता में अकुशल और कुशल श्रम के अंतर को मानना भी अज्ञान कहा गया है। आजकल हम देखते हैं कि नौकरी के पीछे भाग रहे युवक अकुशल श्रम को हेय मानते हैं।
सामवेद में कहा गया है कि
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अभि विश्वानि काव्या
‘‘सारे सुकर्म कर।’
दिवे दिवे वाजं सस्निः।
‘‘प्रतिदिन तुम युद्ध करते हो।’’
मो षु ब्रह्मेव तन्द्रर्भवो।
‘‘आत्मज्ञानी बनकर कभी आलसी मत बनना।’’
             मनुष्य अपनी देह पालन के लिये कर्म करता है जो युद्ध का ही रूप है। हम आजकल सामान्य बातचीत में यह बात मानते भी हैं कि अब मनुष्य का जीवन पहले की बनस्पित अधिक संघर्षमय हो गया है। जबकि हमारे वेदों के अनुसार तो हमेशा ही मनुष्य का जीवन युद्धमय रहा है। जब हम भारतीय अध्यात्म में वर्णित युद्ध विषयक संदर्भों का उदाहरण लेते हैं तो यह भी देखना चाहिए कि उन युद्धों को तत्कालीन कर्मप्रेरणा के कारण किया गया था। इतना ही नहीं इन युद्धों को जीतने वाले महान नायकों ने अपने युद्ध कर्म का नैतिक आधार भी प्रस्तुत किया था। वह इनको जीतने पर राजकीय सुविधायें भोगने में व्यस्त नहीं हुए वरन् उसके बाद समाज हित के लिये काम करते रहे।
      संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Tuesday 3 January 2012

यजुर्वेद से संदेश-परमात्मा से सद्बुद्धि और शक्ति की याचना करें (yajurved se sandesh-parmatma se sadbuddhi aur shakti ki yachna karen)

           मंदिर या घर में पूजा करते हुए अधिकतर लोग भगवान से अपनी अभीष्ट वस्तु प्रदान करने या फिर कोई अन्य सांसरिक होने की इच्छा मन में करते हैं। यह मनुष्य का अज्ञान ही है कि वह अपने सांसरिक उद्देश्य के लिये पराशक्ति की तरफ अपना मुख ताकता है जबकि परमात्मा ने उसे अपना काम करने के लिये हाथ, चलने के लिये पांव, देखने के लिये आंख, सूंघने के लिये नाक तथा सुनने के लिये कान दिये हैं। अपना लक्ष्य तय करने तथा योजना बनाने के लिये बुद्धि दी है। फिर भी अधिकतर लोग याचक बनकर जीने की आदी होते हैं। वैसे हमारे अध्यात्मिक ज्ञान के अनुसार भक्त चार प्रकार के होते हैं-आर्ती, अर्थार्थी, जिज्ञासु तथा ज्ञानी। इनमें सबसे अधिक संख्या अर्थार्थी लोगो की है जो सकाम भक्ति मे विश्वास करते है।
यजुर्वेद में कहा गया है कि
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मसि त्यांदिन्द्रियं बृहन्मयि दक्षो मयि क्रतुः।
              ‘‘मेरे अंदर महान् शक्ति का निर्माण हो। कार्य दक्षता और कर्तव्यनिष्ठा बढ़े। हम इंद्रियों को वश में करके महाशक्तिशाली बने।’’
मनसः कांममाकूतिं वाचः सत्यमशीप।
             ‘‘मननशील, अंतःकरण की इच्छा और अभिप्राय जानने की शक्ति करने के साथ सत्य भाषण करने का भाव बना रहे।’’
दुते छंह या। ज्याक्ते संदृशि जीव्यासं ज्योक्तो सदृशि जीष्यासम।।
            ‘‘हे शक्तिशाली परमात्मा मुझे बलवान बनाओ। सब मुझे मित्र दृष्टि से और मैं सब को मित्र दृष्टि से देखूं।’’
                हमारे अध्यात्म ग्रंथों के अनुसार नाम स्मरण करते समय ऐसी प्रार्थना करना चाहिए कि हमारे अंदर ही मन और बुद्धि की शुद्धि हो। अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठ बढ़े। कहने का अभिप्राय यह है कि जब हम मानसिक रूप से स्वस्थ तथा गतिशील होंगे तो सांसरिक कार्य वैसे ही सिद्ध होंगे। इसके विपरीत मन में कलुषिता और स्वार्थ का भाव रखने पर हम चाहे कितनी भी परमात्मा से याचना करें हमारा कोई भी काम सिद्ध नहीं हो सकता। हमें नाम स्मरण करते समय परमात्मा से काम में सफलता नही बल्कि उसे संपन्न करने के लिये बल और बुद्धि की याचना करना चाहिए। वैसे ज्ञानी लोग तो निष्काम भाव से ही भगवान का स्मरण यह जानते हुए करते हैं कि संसार चलाने वाला भी वही है इसलिये यहां होने वाले समस्त काम उसकी इच्छा के अनुरूप स्वयं ही सिद्ध होते हैं। कुछ ज्ञानी तो भारी प्रयास के बावजूद अपना काम सिद्ध न होने पर यह मानते हैं कि उसमें भी कोई अच्छाई होगी।
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Friday 30 December 2011

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-उपेक्षासन कर आनंद लें (kautilya ka arthshastra-upekshasan ka anand-economics of kautilya)

               आज के युग में इस तरह के आसन का विशेष महत्व है। पहले तो छोटे राज्यों की वजह युद्ध आमतौर से होते थे पर आधुनिक लोकतंत्र प्रणाली से राज्यों स्वरूप बृहद बन जाने से युद्धों की आशंका समाप्त कर दी है। जब भौतिकवाद में डूबे विश्व समाज के लोग अहंकार और मद में एक दूसरे को नीचा दिखाने में लगे हों और उनसे बहस करने का कोई परिणाम नहीं निकलता हो तब ज्ञानी आदमी के लिये उपेक्षासन एक तरह से ब्रह्मास्त्र की तरह काम कर सकता है। आपसी वार्तालाप में लोग भौतिक साधनों की चर्चा करते हुए अपनी उपलब्धियों का बखान करने से नहीं चूकते। टीवी चैनलों और समाचार पत्रों के साथ इंटरनेट में बाज़ार के विज्ञापनों से प्रेरित होकर उपभोग संस्कृति को बढ़ावा दिया जा रहा है। ऐसे में हमें अपने मन को ऐसी चर्चाओं से मन व्यथित करने की बजाय सात्विक विषयों की तरफ अपना ध्यान ले जाना चाहिए। यह अलग बात है कि इस तरह उपेक्षासन करने पर लोग आपको पौंगापंथी समझें पर सच बात यह है कि इससे आपको आराम मिलेगा। जिस तरह मोर नाचने के बाद अपने गंदे पांव देखकर रोता है उसी आजकल लोग नववर्ष, वैलंटाईन डे तथा अन्य पाश्चात्य पर्व आने पर नाच गाकर और गलत सलत खाकर एंजॉयमेंट यानि आंनद करने का पाखंड करते हैं पर उसके बाद फिर जिंदगी के तनाव उनको घेरकर अधिक दुख देते हैं। पैसा खर्च होने के साथ ही शरीर टूटता है सो अलग।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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आस्त प्रेक्ष्यारिमधिकमुपेक्षासनमुच्यते।
उपेक्षा कृतवानिन्द्र पारिजातग्रहं प्रति।।
              ‘‘जब कोई मनुक्ष्य अपने शत्रु या विरोधी को अपने से अधिक जानकर उसके प्रति उपेक्षा का भाव दिखाता है तब उसे उपेक्षासन कहा जाता है। जब भगवान श्रीकृष्ण ने सत्यभावा के लिये स्वर्ग से कल्पवृक्ष उठा लिया तो देवराज ने अपनी शक्ति को कम मानते हुए उसे युद्ध करने की बजाय उपेक्षासन किया था।"
उपेर्क्षितत्स चान्येस्तु कारणेनेह केन चित्त।
आसनं रुक्मिण इव तदुपेक्षासनं स्पुतम्।।
               ‘‘उसी तरह जिस समय रुक्मणी के भाई रुक्मी ने जब कृष्ण के साथ युद्ध में किसी ने सहायता की तो वह उपेक्षासन कर बैठ गया।’’
                 दरअसल आजकल हम चारों तरफ धन के सहारे फैल रहे आकर्षक वातावरण को देखकर अपने मन में अनेक तरह के सपने पाल लेते हैं। खासतौर से आजकल के मध्यम तथा निम्नवर्गीय युवा फिल्म, इंटरनेट तथा पत्रिकाओं में भौतिकतावाद के चलते आकर्षक संसार के उपभोग का जो सपना देखते हैं वह सभी के लिये साकार होना संभव नहीं है। जिनको विरासत में धन मिलता है वह तो चहकते हैं पर जिनको अपनी रोजी रोटी कमाने के लिये ही संघर्ष करना पड़ता है उनके लिये अपने अभावों का मानसिक तनाव झेलने के अलावा अन्य मार्ग नहीं रह जाता। ऐसे में कुछ युवा बहककर अपराध की तरफ बढ़ जाते हैं। उनके लिये बचने का तो बस यह एक ही मार्ग है कि वह भौतिक संसार के आकर्षण के प्रति उपेक्षासन कर जीवन का आनंद लें।
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Tuesday 27 December 2011

चाणक्य नीति-दुष्ट व्यक्ति अपना अभद्र व्यवहार नहीं छोड़ता (chnakya neeti-dusht vyakti apna abhadra vyavhar nahin chhodta)

             ज्ञानी लोग न बहस करते हैं न समाज के सुधार के लिये कोई अभियान चलाते हैं। तत्वज्ञानी जानते हैं कि इस त्रिगुणमयी माया के बंधन में फंसे संसार का प्रत्येक जीव अपनी प्रवृत्ति के अनुसार व्यवहार करता है। वह अपनी प्रवृत्तियों की निवृति का उपाय नहीं जानता। प्रत्येक जीव अपने रहन सहन, खानपान तथा संगत के व्यवहार से प्रभावित होता है। उसकी इंद्रियां जिस प्रकार के बाह्य वातावरण के संपर्क में आती हैं वैसे ही गुण उनके हो जाते हैं। मनुष्य के लिये निरंतर सहज, सरल और परिश्रमी बने रहना संभव नहीं है। काम, क्रोध और लोभ का मार्ग बुरा है पर उसमें भौतिकता का आकर्षण है इसलिये लोगों को उस पर चलना सहज लगता हैं। लोगों को यह लगता है कि प्रेम से नहीं वरन् शक्ति से समाज पर नियंत्रण पाया जाता इसलिये वह क्रोध करते है। कोई ज्ञानी या योगी हो जाये तभी उसकी मानसिकता में परिवर्तन आ सकता है वरना तो बहुत कम ही लोग हैं जो इस संसार की माया के दुष्प्रभाव से बच पाते हैं वरना तो सारा संसार भ्रमित होकर जीना सहज समझता है।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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न दुर्जनः साधुदशामुपैति बहुप्रकारैरपि शिक्ष्यमाणः।
आमूलसिक्तः पयसा धृतेन न निम्बवृक्षो मधुरत्वमेति।।
           ‘‘दुष्ट व्यक्ति को कितना भी समझाओ वह अपना अभद्रता का व्यवहार नहीं छोड़ता जैसे नीम का वृक्ष भले ही दूध या धी से सींचा जाये पर वह मधुरता को प्राप्त नहीं कर सकता।
अंतर्गतमलो दृष्टस्तीर्थस्नानशतैरपिः
न शुध्यति यथा भापडं सुरत्या दाहितं च यत्।।
‘‘दुराचार तथा वासना में लिप्त व्यक्ति चाहे सैंकड़ें पर तीर्थ कर पर कभी पवित्र नहीं हो सकता जैसे मदिरा का पात्र तपाये जाने पर भी पवित्र नहीं होता।
        यही कारण है कि जिनमें दुष्टता, स्वार्थ तथा मोह का भाव जिन लोगों में आ जाता है उसमें परिवर्तन की आशा करना व्यर्थ है। उल्टे दूसरे को सुधारने के प्रयास में स्वयं के अंदर ही दुर्गुण आने की आशंका रहती है। इसलिये जहां तक हो सके दुष्ट, स्वार्थी तथा कामी आदमी से दूर रहा जाये। इसके बावजूद अगर वह सामने आकर अपनी औकात दिखाये तो उस पर ध्यान न दिया जाये। वह इस धरती पर नीम के वृक्ष की तरह होते हैं जिनको दूध या घी से भी सींचा जाये पर वह मधुरता का गुण ग्रहण नहीं कर सकते।
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Saturday 24 December 2011

दादू दयाल के दोहे-निंदक दूसरे को स्वच्छ कर स्वयं गंदा होता है (dadu dayal ke dohe-nindak doosre so swachchh ka swyan ganda hota hai)

         कभी कभी अपना अपने बाह्य व्यक्तित्व पर आत्ममंथन करना चाहिए। जब हम गुस्से या निराशा में आकर दूसरे की निंदा करते हैं तब शांत होने के बाद अपने ही शब्दों पर विचार करने से यह पता चलेगा कि हमने किसी अन्य पुरुष की निंदा कर उसके जिन दुर्गुणों का बखान किया था वह हमारे अंदर भी आ गये हैं। इतना ही नहीं जिसकी हम निंदा करते हैं कहीं न कहीं उसको लाभ यह होता है कि वह अपने उस दुर्गुण से मुक्त होकर जीवन में तरक्की करता जाता है। जबकि निंदा करने वाला अपने अंदर नये दुर्गुण की वजह से पिछड़ जाता है।
निंदा के विषय में कविवर दादू दयाल कहते हैं कि
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‘दादू’ निद्ना नांव न लीजिये, सुपिनै ही जिनि होइ।
ना हम कहैं न तुम सुणो, हम जिनि भाखै कोइ।।
         ‘‘कभी सपने में भी किसी व्यक्ति की निंदा नहीं करना चाहिए। न हमें किसी की निंदा सुनना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से दुर्गुण अपने अंदर नहीं लाना चाहिए।’’
‘दादू-निंदक बपुरा जिनि मरे, पर जपगारी सोइ।
हम कूं करत ऊजाना, अपाण मैल होइ।।
          ‘‘निंदक बिचारा तो दूसरों के दुर्गुणों का जप करता हुआ उनका अपने अंदर स्थापित करता है जबकि जिसकी निंदा वह करता है उसका मन उजला होता जाता है।’’
       अगर हम समाज में अपने ज्ञान चक्षुओं को खोलकर विचरण करें तो पायेंगे कि लोग एक दूसरे की निंदा कर अपने को श्रेष्ठ अनुभव करते है। इससे यह होता है कि एक दूसरे के दुर्गुण उनमें प्रविष्ट होकर अपना दुष्प्रभाव दिखाते हैं। यही कारण है कि हम कहते हैं कि आज कोई सुखी नहीं है। दूसरों की निंदा करने तथा सुनने की सहज आदत के कारण लोग आत्ममंथन नहीं करते जिससे उनको अपने व्यक्तित्व में निखार लाने का अवसर नहीं मिल पाता। लोग इतनी मर्यादा तक का पालन नहीं करते कि अपने बच्चों के सामने अपने ही बड़े लोगों के विरुद्ध विषवमन न करे जिसके कारण समाज और परिवार में रिश्तों में तनाव पनपता है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Thursday 22 December 2011

भर्तृहरि नीति शतक-विरक्ति भाव से भयमुक्त होना संभव है (bharathari neeti shatak-virakati bhav se bhee bhaymukt hona sanbhav)

             हमारे अध्यात्म ज्ञान में निष्काम भाव का महत्व प्रतिपादित किया गया है। दरअसल इसमें कर्मफल के प्रति विरक्ति दिखाने के लिये प्रेरित किया गया है। जबकि हमारे प्रवचनकर्ता इसका अर्थ इस तरह प्रतिपादित करते हैं जैसे कि संसार की वस्तुओं से ही पूरी तरह विरक्त हुआ जाये। अक्सर यह कहा जाता है कि मोह, लोभ, काम क्रोध तथा कामनायें ही मनुष्य की शत्रु होती हैं। आज तक लोगों को कोई यह समझा नहीं पाया कि कर्मफल है क्या? यही कारण है कि सामान्य जन कहते हैं कि फल की इच्छा के बिना कर्म करना संभव नहीं है। इसका मतलब यह है कि लोग सांसरिक क्रियाओं के कर्म का फल भौतिक पदार्थ की उपलब्धि ही समझते हैं। नौकरी, व्यवसाय या अपनी रोजमर्रा की गतिविधियों से मिलने वाले धन को आज भी फल समझना इस बात का प्रमाण है कि कथित भारतीय अध्यात्मिक गुरु समाज को निष्काम कर्म का यह अर्थ नहंीं समझा पाये जिसका आशय भक्ति, दया और दान और दान से है।
                मनुष्य अपनी दैहिक बाध्यताओं की वजह से प्रतिदिन कर्म करता है। नौकरी, व्यवसाय या मजदूरी से जिन लोगों को पैसा मिलता है वह उससे अपने घर परिवार का संचालन करते हैं। बच्चों की फीस, परिवार के लिये भोजन तथा अपनी जेब का खर्च करता हुआ कोई भी आदमी यह नहीं समझ पाता कि उसके पास आया धन फल नहीं है। इसका आशय यह है कि पैसा अपने हाथ में आना हमारे जीवन के ही कर्म का विस्तार है। वह पैसा हमारी जेब में नहीं रहता। अधिक है तो अल्मारी या बैंक में जमा रहता है। उस पैसे से खरीदा गया भोजन और वस्त्र भी फल नहीं है क्योंकि हम उसे अपनी देह का संचालन करते हैं। ऐसे सांसरिक कर्म हमेशा धन की चाह से किये जाते हैं और ऐसा जो न करे वह मूर्ख ही कहलायेगा। दरअसल उस धन का उपयोग जब किसी पर दया करने या दान देने के लिये किया जाता है तब उसे निष्काम कर्म कहा जा सकता है। जहां धन की वापसी की चाहत न हो वही निष्काम कर्म है। इस चाहत से विरक्ति ही त्याग है।
महाराज भर्तृहरि के नीति शतक में कहा गया है कि
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भोगे रोगभयं कुल च्युतिभयं वित्ते नृपालाद् भयं
मानं दैन्यभयं वाले रिपुभयं रूपे जरायाः भयमः।
शास्त्रे वादिभयं गुणे खलभयं कावे कृतान्ताद् भयं
सर्व वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम्।।
‘‘इस दैहिक जीवन में भोगों से रोग, उच्च परिवार में जन्म लेने पर निम्न आचरण में फंसने, अधिक धन होने पर राज्य, अधिक मौन रहने पर दीनता, शक्तिवान होने पर शत्रु, सौंदर्य से बुढ़ापे, ज्ञानी होने पर वाद विवाद में पराजय, विनम्रता से दुष्टों से आक्रमण और देह रहने पर मृत्यु का भय रहता है। एक मात्र विरक्त का भव ही भय से निरापद बना सकता है।
             जहां दैहिक और भौतिक जीवन को ही स्वीकार किया जाता है वहां भय की संभावना अधिक रहती है। यहां हर वस्तु पतनशील और नष्टप्रायः है। अगर हम अपने अध्यात्म दर्शन को समझें तो यह ज्ञान प्राप्त होगा कि सांसरिक उपलब्धियों का फल समझना ही भय का कारण है। यह ज्ञान होने पर आदमी भय से रहित हो जाता है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Thursday 15 December 2011

मनुस्मृति-निर्धन और निम्न जाति का मजाक उड़ाना या अपमानित करना निंदनीय (garib aur nimna jati ka majak ya apaman na kareh-manu smruti in hindi)

            यह कहना कठिन है कि पूरी दुनियां में ही अहंकार के भाव का बोलबाला है या भारतीय समाज में ही यह विकट रूप में दिखाई देता है। अलबत्ता इतना अवश्य है कि भारतीय समाज में अपने अहंकार में आकर दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति कुछ अधिक ही दिखाई देती है। हम जैसे चिंत्तक तो मानते हैं कि भारत का अध्यात्मिक दर्शन इसलिये ही अधिक समृद्ध हुआ है क्योंकि ऋषियों और मुनियों को अपने आसपास अज्ञान में लिपटा एक बृहद समाज मिला जिसे सुधारने के लिये उन्होंने तत्वज्ञान स्थापित किया। इसके लिये उनको एक सहज जमीन मिल गयी जहां वह अनुसंधान, चिंत्तन, मनन और अध्ययन से अध्यात्मिक ज्ञान का सृजन करने के साथ ही उसे सार्वजनिक रूप से व्यक्त भी कर सके। अगर सभी ज्ञानी होते तो आखिर वह किस पर अनुसंधान कर रहस्यों का पता लगाते। उनकी बात कौन सुनता? एक ज्ञानी के रूप में कौन उनको प्रतिष्ठत करता? एक टांग वाले को लंगड़ा, एक आंख वाले को काना, अक्षरज्ञान से रहित को गंवार और और काले रंग वाले को कुरूप कहकर उनका मजाक उड़ाना तो आम बात है। इसके अलावा हर आदमी अपनी जाति को श्रेष्ठ बताकर दूसरी जाति का मजाक उड़ाता है। कभी कभी तो अपने प्रथक जाति वाले को नीच बताकर उसका अपमान किया जाता है। सच बात तो यह है कि कोई जाति नीच नहीं होती अलबत्ता जिनके पास धन, पद और बाहुबल है वह दूसरे की जाति को नीच बताते हैं। यह एक दम अधर्म और अज्ञान का प्रमाण है।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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हीनांगनतिरिक्तांगहीनाव्योऽधिकान्।
रूपद्रव्यविहीनांश्च जातिहीनांश्च नाक्षिपेत्।।
           ‘‘ऐसे व्यक्तियों का मजाक  उड़ाना या अपमानित करना निंदनीय है जो किसी अंग से हीन, अधिक अंग वाले, शिक्षा से रहित, आयु में बड़े, कुरूप, निर्धन तथा छोटी जाति या वर्ण के हों।’’
         वैसे मनुमहाराज पर भारतीय समाज में जाति पांति स्थापित करने का आरोप लगता है। ऐसा लगता है कि आधुनिक शिक्षा से ओतप्रोत समाज नहीं चाहता कि भारत की प्राचीन शिक्षा का यहां प्रचार प्रसार हो। यही कारण एक तो वह लोग हैं जो मनुस्मृति के चंद उदाहरण देकर देश में उसे जातिपाति का प्रवर्तक मानते हैं बिना पढ़े ही उनका प्रतिकार यह कहते हुए करते हैं कि भारतीय समाज कभी उनके संदेशों के मार्ग पर नहीं चला। यह हैरानी की बात है कि इन्हीं मनुमहाराज ने अंगहीन, अशिक्षित, बूढ़े, असुंदर तथा जाति के आधार पर किसी के मजाक उड़ाने या अपमानित करने को वर्जित बताया है। लार्ड मैकाले की शिक्षा में रचेबसे आधुनिक बुद्धिजीवी चाहे वह जिस विचारधारा के हों मनुस्मृति का पूर्ण अध्ययन किये बिना ही अपना बौद्धिक ज्ञान बघारते हैं।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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