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Tuesday 17 November 2009

चाणक्य नीति-भोजन की नहीं धर्म संग्रह की चिंता करें (bhojan aur dharm-chankya neeti in hindi)

नाहारं  चिन्तयेत् प्राज्ञो धर्ममेकं हि चिन्तयेत्।

आहारो हि मनुष्याणां जन्मना सह जायते।।

हिन्दी में भावार्थ-
विद्वान मनुष्य  को भोजन तथा अन्य प्रकार की सभी चिंताएं छोड़कर केवल धर्म संग्रह की चिंता करना चाहिए। आहार की चिंता क्या करना वह तो मनुष्य के जन्मते ही उत्पन्न हो जाता है।

वयसः परिणामेऽयः खलः खलः एव सः।

सुपक्वमपि माधुर्य नोपयातीन्द्रवारुणम्।।

हिन्दी में भावार्थ-
अवस्था के परिपक्व हो जाने पर जिस मनुष्य में दुष्टता की प्रवृत्ति होती है उसमें फिर कभी बदलाव नहीं आता जैसे अत्यंत पक जाने पर इन्द्रायण  के  फल में मिठास नहीं आता बल्कि वह कड़वा ही बना रहता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य अपने भोजन की इतनी अधिक चिंता करता है उतनी शायद पशु भी नहीं करते। स्थिति यह होती है कि उसने अपने परिवार के लिये पूरे जीवन के लिये भोजन की व्यवस्था कर ली तो फिर उसे आने वाली पीढ़ियों के भोजन की चिंता लग जाती है। भूख से मरने का भय उसे हमेशा सताता है और इसलिये हमेशा डरते हुए जीवन गुजारता है।  सच तो यह है कि यह संभावित भूख उसे गुलाम बनाये रखती है।  जबकि वास्तविकता यह है कि मनुष्य को अपने धर्म संग्रह की चिंता करना चाहिये क्योंकि भोजन तो उसके जन्मते ही उत्पन्न हो जाता है।

मनुष्य में जो गुण बचपन में पड़ गया फिर उसे वह परे नहीं होता। उसी तरह दुर्गुण भी स्थापित हो गया तो वह उससे कभी मुक्त नहीं हो सकता।  कहने वाले जरूर कहते हैं कि बड़े होकर बच्चा सुधर जायेगा पर यह केवल आशा ही है।   इसलिये परिवार के बच्चों को हमेशा अच्छे संस्कार डालने का प्रयास करना चाहिये। बड़े होने पर उनसे आशा तभी की जा सकती है।



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Monday 16 November 2009

संत कबीर वाणी- राम का नाम जपने वाले श्रेष्ठ (ram ka nam-sant kabir das)

मासांहारी मानवा, परतछ राछस जान।
ताकी संगति मति करै, होय भक्ति में हान।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मांसाहार मनुष्य को राक्षसीवृत्ति का स्वामी ही समझना चाहिए। उसकी संगति करने कभी न करें इससे भक्ति की हानि होती है।
मांस खाय ते ढेड़ सब, मद पीवै सो नीच।
कुल की दुरमति परिहरै, राम कहै सो ऊंच।।
संत शिरोमणि कबीरदास का कहना है कि जो मांस खाते हैं वह सब मूर्ख और मदिरा का सेवन करने वाले नीच होते हैं। जिनके कुल में यह परंपराएं हैं उनका त्याग कर जो भगवान श्रीराम का स्मरण करते है वहीं श्रेष्ठ है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कहा भी जाता है कि ‘जैसा खाये अन्न वैसा हो जाये मन’। श्रीगीता में भी कहा गया है कि ‘गुण ही गुणों को बरतते हैं’। जिस तरह का आदमी भोजन करता है वही तत्व उसके रक्त कणों में मिल जाते हैं। यही रक्त हमारी देह के सभी तरफ बहकर समस्त अंगों को संचालित करता है। उसके तत्व उन अंगों पर प्रभाव डालते हैं। जिस जीव की हत्या की गयी है मरते समय उसकी पीड़ा के अव्यक्त तत्व भी उसके मांस में रह जाते हैं। यही तत्व आदमी के पेट में पहुंच जब अपनी पीड़ा का प्रदर्शन करते हैं जिससे मनुष्य में दिमागी और मानसिक विकृत्तियां पैदा होती है। पश्चिमी वैज्ञानिकों ने भी यह सिद्ध किया है कि मांसाहारी की बजाय शाकाहार मनुष्य अधिक उदार होते हैं।
दूसरी बात यह है कि मांस से मनुष्य की प्रवृत्ति भी मांसाहारी हो जाती है। उसमेें संवेदनशीलता के भाव की कमी आ जाती है। ऐसे लोगों से मित्रता या संगत करने से अपनी अंदर भी विकृत्तियां पैदा हो सकती हैं। अनेक ऐसे परिवार हैं जिसमें मांस भक्षण की परंपरा है पर उनमें में भी कुछ लोग ऐसे हैं जो शाकाहारी होने के कारण भगवान के भक्त हो जाते हैं। ऐसे लोगों की प्रशंसा की जानी चाहिए।
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Sunday 15 November 2009

संत कबीर वाणी-चुपड़ी रोटी मांगने में डर लगता है (chupdi roti- kabir sandesh in hindi)

कबीर सांई मुझ को, रूखी रोटी देय।
चुपड़ी मांगत मैं डरूं, मत रूखी छिन लेय।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मैं तो सांईं से रूखी सूखी रोटी की मांग करता हूं। चुपड़ी रोटी मांगने से डर लगता है कि कहीं रूखी भी छिन न जाये।
जिभ्या कर्म कछोटरी, तीनों गृह में त्याग।
कबीर पहिले त्यागि के, पीछे ले बैराग।।
संत कबीर दास का कहना है कि जिव्हा के स्वाद, कर्म तथा विषय वासना के घर त्याग दो। पहिले उनका त्याग कर बाद में बैराग लो।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीभ का स्वाद आदमी को जाने क्या क्या कराता है? अपने घर की रूखी रोटी खाते आदमी उससे उकता जाता है तब उसके मन में चुपड़ी रोटी खाने को मन करता है। मन तो मनुष्य से कभी खेलता है तो कभी खिलवाड़ करता है। कहते भी हैं कि सभी को दूसरे की थाली में घी अधिक नजर आता है। वैसे भोजन पेट भरने के लिये किया जाता है पर जीभ का अपना स्वाद है। इसलिये वह कई बार ऐसी चीजों के सेवन के लिये बाध्य करती है जो स्वास्थ्य के लिये अनुकूल नहीं होती। रास्ते पर चटपटी और स्वादिष्ट चीजों को देखकर उनको खाने को मन मचलता है। तब यह नहीं दिखता कि वह खुले में रखी हैं। पता नहीं कितने कीड़े मकौड़े वहां आकर बैठ चुके हैं।
शरीर का स्वास्थ्य तो सादा भोजन में है पर उसके साथ चटपटा और मीठा खाने के लिये जीभ लालायित रहती है। सच बात तो यह है कि आदमी अगर जीभ के स्वाद में न पड़े तो शायद उसको कोई बीमारी ही न हो। अनेक प्रकार के आकर्षक होटल बाजार में दिखते हैं पर उनके भोज्य पदार्थ किस तरह गंदे ढंग से बनते हैं? कौन देखने जाता है। कई होटलों में भोज्य पदार्थ परोसने वाले होटलों के कर्मचारी भी साफ सुथरे हाथों से काम नहीं करते दिखते। वह भी क्या करें? स्वामीवर्ग को तो अपने कर्मचारी और ग्राहक दोनों का दोहन करने के अलावा कुछ नहीं सूझता। कर्मचारी की स्वच्छता और ग्राहक के स्वास्थ्य से उनका कोई मतलब नहीं होता। मगर जो खा रहे हैं उनको सब देखना चाहिये। होटलों के चटपटे मसाले से बने भोज्य पदार्थ कितने भी स्वादिष्ट हों पर पेट के लिये स्वास्थ्यकर हों यह भी जरूरी है। अगर स्वास्थ्य खराब हुआ तो चटपटा तो छोड़िये फिर रूखा सूख भी खाना दुष्कर हो जाता है-चिकित्सक उससे परहेज को कहते हैं।
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Saturday 14 November 2009

भर्तृहरि शतक-पृथ्वी केवल पानी के चारों और घिरा मिट्टी का गोला (pruthvi mitti ka gola-bhartrihari shatak)

मृतिपण्डो जलरेखया वलचितः सर्वोऽप्ययं न नन्वणुः स्वांशीकृत्य स एवं संगरशतै राज्ञां गणैर्भुज्यते।
ते दद्युर्ददतोऽथवा किमपरं क्षंुद्रदरिद्रं भृशं धिग्धिक्तान्युरुषाधमान्धनकणान् वांछन्ति तेभ्योऽपि ये।।
हिन्दी में भावार्थ-
यह पृथ्वी पानी से चारों तरफ घिरा मिट्टी का एक गोलामात्र है। इस पर अनेक लोगों ने राजा बनकर शासन किया। यह राजा लोग किसी को कुछ नहीं देते। फिर भी राजाओं का मुख ताकते हुए कुछ लोग पाने की उम्मीद में रहते हैं। ऐसे लोगों को धिक्कार है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-राजशाही समाप्त हो गयी पर लोगों के मुख ताकने की आदत नहीं गयी। फिर लोकतंत्र में तो केवल प्रत्यक्ष ही नहीं अप्रत्यक्ष रूप से राज्य करने वाले भी सक्रिय रहते हैं। ऐसे लोग अपने बाहुबल, धन बल तथा बुद्धिबल-चालाकी और बेईमानी-से प्रत्यक्ष रूप से शासन करने वालों पर नियंत्रण रखते हैं। इसका प्रमाण यह है कि अमेरिका की एक पत्रिका दुनियां के शक्तिशाली लोगों की सूची जारी करती है। उसमें कुख्यात लोगों के नाम भी शामिल होते हैं । इस शक्तिशाली शब्द का लोग सही अर्थ नहीं जानते। दरअसल केवल राजकाज और समाज पर नियंत्रण करने वाले व्यक्ति को ही शक्तिशाली माना जाता है। कभी कभी तो यह लगता है कि इस तरह पर्दे के पीछे यही शक्तिशाली विश्व भर के राजाओं में हैं। अनेक देशों की सरकारें उनके आगे पानी भरती नजर आती हैं। उस सूची से यह तो जाहिर हो जाता है कि कहीं न कहीं इन कुख्यात लोगों की पहुंच दूर तक है। यही अपराधी फिल्म, राजनीति, व्यापार, उद्योग में भी धन लगाकर वहां सक्रिय कुछ लोगों को अपना मातहत बना लेेते हैं। यही मातहत जनता को सामने तो राजा दिखते है पर उनकी डोर उनके पीछे खड़े इन कथित शक्तिशाली लोगों के हाथ में होती है जिनको जनता केवल कुख्यात रूप में पहचानती है। इसी अज्ञान के कारण वह उन्हीं मातहतों की तरफ मूंह ताकती रहती है कि वह शायद उसका भला करें। इसके अलावा इन शक्तिशाली तत्वों के मातहतों के आसपास अनेक कलाकार, लेखक, विद्वान तथा सामान्य लोग चक्कर लगाते हैं कि शायद वह उनके आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करें। यह उनका केवल एक भ्रम है। शक्तिशाली तथा राजशाही वाले लोेग किसी का भला नहीं करते। उनका न तो देशभक्ति से लगाव होता है न समाज सेवा से और न ही भगवान भक्ति से! उनका उद्देश्य केवल अपनी आर्थिक, सामाजिक तथा व्यक्ति सत्ता बनाये रखना ही होता है। अतः अपने हित के लिये उनका मुख ताकना केवल मूर्खता है।
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Thursday 12 November 2009

भर्तृहरि शतक-नौकरी करना कठिन काम है (sevak kam hota kathin-hindi sandesh)

मौनान्मूकः प्रवचनपटुर्वातुलो जल्प वा धृष्टः पाश्र्वे वसति च सदा दूरश्चाऽप्रगल्भः।
क्षान्त्या भीरुर्यदि न सहते प्रायशा नाभिजातः सेवाधर्म परमगहनो योगिनामपयगभ्यः।।
हिंदी में भावार्थ-
सेवा करने वाला यदि मौन रहे तो गूंगा, वाक्पट् हो तो बकवादी, समीप रहे तो ढीठ और दूरी बनाकर रखे तो मूर्ख, क्षमाशील हो तो भीरु, असहनशील हो अकुलीन कहा जाता है। यह सेवा धर्म अत्यंत ही कठिन है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-यहां सेवा से आशय गरीबों की सेवा से नहीं बल्कि नौकरी से है। कहते हैं न नौकरी क्यों करी? आधुनिक शिक्षा प्रणाली से शिक्षित अधिकतर युवा नौकरी के लिये इधार फिरते हैं। नौकरी तो नौकरी है चाहे जैसी भी हो-एक तरह से गुलामी है। सच तो यह है कि इसमें स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त ही हो जाता है। यह सही है कि नौकरी करने वाले को वेतन मिलता है पर उसको काम का दबाव और स्वामी या उच्च अधिकारी के व्यवहार का भय घर तक पीछा नहीं छोड़ता। अगर स्वामी या अधिकारी की हां में हां मिलाओ तो वह मूर्ख समझते हैं। अगर कोई सलाह दो तो सही होने पर भी मातहत के सामने हेठी न हो इसलिये अस्वीकार कर दी जाती है। नौकरी करने वाला अपने स्वामी या अधिकारी को रोज झुककर सलाम ठोके तो चमचा कहलाता है और न करे तो मक्कार!
नौकरी करने वाले तो अनेक लोग तो यही कहते हैं कि ‘कितना भी काम करो अपने बोस को खुश नहीं रखा जा सकता’। सच तो यह है कि नौकरी में बंधी बंधायी आय मिलने से खर्च भी वैसे ही हो जाते हैं और उसके खोने का खतरा आदमी को एक तरह गुलाम बना देता है। एक दूसरी बात भी है कि अवकाश के दिनों में आदमी आराम करना चाहता है और उसे घर के अन्य काम बोझ लगते हैं। इस तरह उसकी सामाजिक स्थिति भी अधिक सुदृढ़ नहीं रहती।
इसके विपरीत जो स्वतंत्र व्यवसाय करते है उनका जीवन संघर्षमय होने के कारण उनका दिमाग और देह हमेशा ही सक्रिय रहती है। फिर उनको भविष्य में विकास की संभावना अधिक काम के लिये स्वतः प्रेरित करती है जबकि नौकरी करने वाले के लिये विकास तो छोटी से बड़ी गुलामी में ही है।
एक स्वतंत्र व्यवसायी और नौकरी करने वाले की मासिक आय एक समान भी हो तब भी व्यवसायी अधिक आजादी से सांस ले पाता है। वह आगे चलकर अपने एक रुपये का दो कर सकता है पर नौकरी वाले के लिये यह संभव नहीं है। हालांकि अनेक नौकरी वाले छोटे व्यवसाय करने वालों को हेय समझते हैं पर सच तो यह है कि वह उनके मुकाबले अधिक आजादी से सांस ले पाते हैं। नौकरी में दिल का चैन केवल कहने के लिये है क्योंकि वह तो एक तरह से रोटी का गुलाम हो जाता है। भले ही उपरी कमाई से धन भी अधिक हो जाता है पर इतिहास गवाह रहा है कि अनेक गुलामों ने भी बहुत धन पाया पर कहलाये तो गुलामी ही न!
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Wednesday 11 November 2009

संत कबीर वाणी-पढ़ना लिखना तो सामान्य बात है (santi kabir vani-education a normal subject)

लिखना पढ़ना चातुरी, यह संसारी जेव।
जिस पढ़ने सों पाइये, पढ़ना किसी न सेव।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते है कि लिखना, पढ़ना चतुराई करना यह तो संसार की सामन्य बातें हैं। जिस परमात्मा का नाम पढ़कर समझना चाहिये उसे कोई नहीं मानता।
ज्ञानी ज्ञाता बहु मिले, पण्डित कवी अनेक।
राम रता इन्द्री जिता, कोटी मध्ये अनेक।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं इस संसार में ज्ञानी और विद्वान बहुत मिले। पण्डित और कवि भी बहुत हैं। परन्तु राम भक्ति में लीन अपनी इंद्रियों को जीतने वाला करोड़ो में कोई एक होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-श्रीमद्भागवत में भगवान श्रीकृष्ण जी ने भी यही कहा कि हजारों में कोई एक मुझे भजता है। उन हजारों में भी कोई एक मुझे हृदय से भजता है।
मनुष्य का मन जब संसार के कार्य से ऊब जाता है तब वह कुछ नया चाहता है। कुछ लोग फिल्म और धारावाहिक देखकर मनोरंजन करते हैं तो कुछ गाने सुनकर। कुछ लोग भगवान भक्ति भी यह सोचकर करते हैं कि इससे मन को राहत मिल जाये। उनमें श्रद्धा का अभाव होता है इसलिये भक्ति करने के बाद उनके आचार, विचार और कर्म में कोई अंतर दृष्टिगोचर नहीं होता। ऐसे बहुत कम लोग होते हैं जो सच्ची श्रद्धा से भगवान की भक्ति कर पाते हैं।

इस संसार में जिसे अवसर मिलता है वह पढ़ता लिखता तो अवश्य ही है और इस कारण उसमें चतुराई भी आती है। मगर इससे लाभ कुछ नहीं है। ऐसे कई प्रसंग अब सामने आने लगेे हैं जिसमें पढ़े लिखे लोग ही धर्म परिवर्तन कर दिखाते हैं कि उनमें समाज और परिवार के प्रति विद्रोह है। धर्म परिवर्तन कर विवाह करने वाले अधिकतर लोग शिक्षित ही रहे हैं। इससे साफ जाहिर होता है कि आधुनिक शिक्षा आदमी को शिक्षित तो बना देती है पर अध्यात्मिक ज्ञानी नहीं। कहने को यही शिक्षित कहते हैं कि धर्म क्या चीज है पर भारतीय अध्यात्म ज्ञान के अभाव मेें वही धर्म परिवर्तन कर लेते हैं। आप उनसे पूछिये कि धर्म अगर कोई चीज नहीं है तो उसे बदला क्यों? अगर आप देश में चल रहे भाषा, जाति, धर्म और क्षेत्र के नाम पर चल रहे झगड़ों को देखें तो उनमें शिक्षित लोग ही अधिक लिप्त हैं। इससे यह तो जाहिर हो जाता है कि शिक्षित होने से इंसान ज्ञानी नहीं हो जाता। भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव में आदमी भटकाव की राह पर चला जाता है। इसलिये जितना हो सके अपने घर पर अध्यात्मिक ज्ञान की पुस्तकों का अध्ययन करना चाहिए।
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Tuesday 10 November 2009

संत कबीर वाणी-आशायें नहीं मरी तो योग साधना से क्या लाभ (yogsadhna aur ashaen-sant kabir das)

आसन मारे कह भयो, मरी न मन की आस।
तेली करे बैल, ज्यों, घर ही कोस पचास।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि आसन लगाकर ध्यान आदि करने से क्या लाभ यदि मन की आशायें नहीं मरी। यह तो ऐसे ही हुआ जैसे कि तेली का बैल अपने घर में पचास कोस की परिक्रमा कर लेता है।
सब आसन आसा तनै, निबरन कोई नांहि।
निवृत्ति को जानै नहीं, प्रवृत्ति प्रपंचहि मांहि।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब आसन करने से भी आशायें निवृत नहीं होती तो उसका लाभ सीमित है। मन की निवृत्ति का जाने और प्रपंचों से मुक्ति के बिना सभी आसन व्यर्थ हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-योग साधना केवल योगासन और प्राणायम करना ही नहीं है। उसके साथ धारणा और ध्यान का भी बहुत महत्व है। योगासन के साथ अगर तत्व ज्ञान जानने का प्रयास नहीं किया जाता तो सब व्यर्थ है। वैसे आजकल योग साधना को केवल स्वास्थ्य तक ही सीमित रखकर प्रचारित किया जा रहा है जिसमें कुछ लोगों का व्यवसायिक उद्देश्य है। अगर आदमी केवल अपने जीवन में स्वस्थ होकर फिर योग भूल जाये या न करे तो भी लाभ नहीं है। फिर आदमी अगर अपने समाज के लिये किसी मतलब का नहीं तो उसका भी क्या लाभ?
वैसे हर योग साधक को श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करना चाहिये। उसमें जो तत्व ज्ञान है वही इस संसार को समझने के लिये पर्याप्त है। स्वस्थ समाज तो तब भी था जब भोग विलास के साधन नहीं थे पर समाज के लिये काम करने वाले लोग कितने रहे। योगासन और प्राणायम से देह और मन के विकास तो निकलते हैं पर इस शुद्धता का भाव हमेशा स्थाई बना रहे इसके लिये तत्व ज्ञान का होना जरूरी है। इसलिये भारतीय धर्म ग्रंथों में स्वर्ग से प्रीति रखने वाले वाक्यों को छोड़कर अन्य अच्छी बातों को ग्रहण करते हुए उन पर आपस चर्चा करना भी अच्छा है।
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Monday 9 November 2009

मनुस्मृतिः ॐ शब्द और गायत्री मंत्र का जाप करने से होती है तनाव से मुक्ति (gayatri mantra ka jaap-hindi sandesh)

योऽधीतेऽहन्यहन्येतांस्वीणि वर्षाण्यतन्द्रितः।
स ब्रह्म परमभ्येति वायुभूतः खमूर्तिमान्।।
हिंदी में भावार्थ-
जो व्यक्ति सुस्ती का त्याग कर तीन वर्षों तक औंकार तीन व्याहृतियों सहित तीन चरणों वाले गायत्री मंत्र का जाप करता है वह भक्ति में सिद्धि प्राप्त कर लेता है। वह वायु के समान स्वतंत्र गति प्राप्त करते हुए प्रसिद्ध होता है। वह शरीर की सीमा से परे जाकर आसमान के समान व्यापक स्वरूप वाला बन जाता है।
एकक्षरं परं ब्रह्म प्राणायमः परं तपः।
सवित्र्यास्तु परं नास्ति मौनस्तयं विशष्यिते।।
हिंदी में भावार्थ-
ओंकार शब्द ही परमात्मा की प्राप्ति का सर्वश्रेष्ठ साधन है। प्राणायम से बड़ा कोई तप, गायत्री से बड़ा कोई मंत्र और मौन की तुलना में सत्य बोलना श्रेष्ठ है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अक्षरों में सबसे बड़ा अक्षर ओउम ॐ कहा गया है। मंत्रों में गायत्री मंत्र श्रेष्ठ है। प्रतिदिन ओउम शब्द के उच्चारण का अभ्यास करने से व्यक्ति के मन में एकाग्रता और सुविचारों के प्रवाह का स्तोत्र का निर्माण होता है। उसी तरह हृदय को शीतलता, स्थिरता और दृढ़ता प्रदान करने के लिये गायत्री मंत्र एक तरह से उद्गम स्थल है। जब तीव्र गर्मी पड़ती है तब सूर्य की तेज किरणों से मनुष्य का मन और मस्तिष्क विचलित हो जाता है। कहने को मनुष्य विचारशील और विवेकवान है पर उस पर जलवायु का प्रभाव होता है और तीव्र गर्मी में मनुष्य के अंदर निराशा, क्रोध और हिंसा की प्रवृत्ति का स्वाभाविक रूप से निर्माण होता है। यह नहीं भूलना चाहिये कि गुण ही गुणों में बरतते हैं और जलवायु में अगर तीव्र उष्मा है तो मनुष्य उसे नहीं बच सकता। हां, जो लोग अध्यात्मिक रूप से कोई न कोई प्रयास करते हैं वह अपने को किसी तरह हिंसा, कुविचार और निराशा से बचाकर निकलते हैं। इसके लिये सर्वश्रेष्ठ प्रयास यही है कि गायत्री का मंत्र जाप किया जाये। इससे जो देह, मन और विचारों में शीतलता और पतित्रता आती है उससे मनुष्य तनाव से मुक्त रहता है। विशेष रूप से ग्रीष्मकालीन समय में जब आसपास के मनुष्यों में गर्मी का बुरा प्रभाव पड़ता है तब वह अपने बुरे व्यवहार से पूरे वातावरण को विषाक्त बना देते हैं तब जिसके मन में गायत्री मंत्र के जाप से उत्पन्न स्थिरता, दृढ़ता और प्रसन्नता के भाव होते हैं वह तनाव से मुक्त रहते हैं।
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Friday 6 November 2009

संत कबीर वाणीः दौलत की वजह से सभी प्यार करते हैं (kabir ke dohe-daulat aur pyar)

गुणवेता और द्रव्य को, प्रीति करै सब कोय
कबीर प्रीति सो जानिये, इनसे न्यारी होय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि गुणवेताओ-चालाक और ढोंगी लोग- और धनपतियों से तो हर कोई प्रेम करता है पर सच्चा प्रेम तो वह है जो न्यारा-स्वार्थरहित-हो।

प्रेम-प्रेम सब कोइ कहैं, प्रेम न चीन्है कोय
जा मारग साहिब मिलै, प्रेम कहावै सोय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रेम करने की बात तो सभी करते हैं पर उसके वास्तविक रूप को कोई समझ नहीं पाता। प्रेम का सच्चा मार्ग तो वही है जहां परमात्मा की भक्ति और ज्ञान प्राप्त हो सके।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-टीवी चैनलों और पत्र पत्रिकाओं में आजकल प्रेम पर बहुत कुछ दिखाया और लिखा जाता है। यह प्रेम केवल स्त्री पुरुष के निजी संबंध को ही प्रोत्साहित करता है। हालत यह हो गयी है कि अप्रत्यक्ष रूप से विवाहेत्तर या विवाह पूर्व संबंधों का समर्थन किया जाने लगा है। यह क्षणिक प्रेम एक तरह से वासनामय है मगर आजकल के अंग्रेजी संस्कृति प्रेमी और नारी स्वतंत्रता के समर्थक विद्वान इसी प्रेम में शाश्वत जीवन की तलाश कर हास्यास्पद दृश्य प्रस्तुत करते हैं। एक मजे की बात यह है कि एक तरफ सार्वजनिक स्थलों पर प्रेम प्रदर्शन करने की प्रवृति को स्वतंत्रता के नाम पर प्रेमियों की रक्षा की बात की जाती है दूसरी तरफ प्रेम को निजी मामला बताया जाता है। कुछ लोग तो कहते हैं कि सब धर्मों से प्रीति का धर्म बड़ा है। अब अगर उनसे पूछा जाये कि इसका स्वरूप क्या है तो कोई बता नहीं पायेगा। इस नश्वर शरीर का आकर्षण धीमे धीमे कम होता जाता है और उसके साथ ही दैहिक प्रेम की आंच भी धीमी हो जाती है। इसलिए कहा जाता है कि सच्चा प्रेम केवल परमात्मा से किया जा सकता है।

वैसे सच बात तो यह है कि प्रेम तो केवल परमात्मा से ही हो सकता है क्योंकि वह अनश्वर है। हमारी आत्मा भी अनश्वर है और उसका प्रेम उसी से ही संभव है। परमात्मा से प्रेम करने पर कभी भी निराशा हाथ नहीं आती जबकि दैहिक प्रेम का आकर्षण जल्दी घटने लगता है। जिस आदमी का मन भगवान की भक्ति में रम जाता है वह फिर कभी उससे विरक्त नहीं होता जबकि दैहिक प्रेम वालों में कभी न कभी विरक्ति हो जाती है और कहीं तो यह कथित प्रेम बहुत बड़ी घृणा में बदल जाता है।
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Thursday 5 November 2009

मनु स्मृति-लालची और बुद्धिहीन स्वामी सजा नहीं दे पाता

सोऽसहायेन मूढेन लुब्धेनाकृतबुद्धिना।
न शक्तो न्यायतो नेतुं सक्तेन विषयेनणु च।।
हिंदी में भावार्थ-
जिस राजा के सहायक न हों या फिर मूर्ख, लालची, बुद्धिहीन हों एवं स्वयं भी जो विषय और कामनाओं में लीन रहता हो ऐसे राजा को दंड का उपयोग उचित ढंग से प्रयोग करना नहीं आता।
स्वराष्ट्रे न्यायवृत् स्याद् भृशदण्डश्च शत्रुषु।
सहृत् स्वजिह्मः स्निगधेषु ब्राह्मणेषु क्षमान्वितः।।
हिंदी में भावार्थ-
राजा को चाहिए कि वह प्रजा के शत्रुओं को उग्र दंड दे। से प्रजा के मित्रों से सौहार्दपूर्ण तथा राज्य के विद्वानों से उदारता के साथ ही क्षमा का व्यवहार करे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-किसी राज्य का राजा हो या समाज तथा परिवार का मुखिया उसे अपने संरक्षितों के शत्रुओं से किसी प्रकार की उदारता न बरतते हुए उनको कड़ा दंड दे या कार्रवाई करे। जहां मुखिया या स्वामी का कोई सहायक न हो और वही शराब जैसे व्यसनों में डूबा रहे उसके समूह का सर्वनाश हो जाता है। विषय और कामनाओं का चिंतन करने वाले मनुष्य की बौद्धिक क्षमता समाप्त हो जाती है। ऐसे में उसके आसपास कामी, क्रोधी, लोभी तथा अहंकारी लोगों का मित्र समूह एकत्रित होकर उसे उल्टी सीधी सलाहें देता है जिससे स्वामी के साथ उसके कुल, राज्य और समाज का भी नाश होता है।
इसलिये जिन लोगों को परमात्मा की कृपा से कहीं स्वामित्व का अधिकार प्राप्त होता है वह अपने सरंक्षित तथा शरणागत जीवों के शत्रुओं के विरुद्ध कठोर दंड का उपयोग करें तथा जो मित्र हों उनके साथ सौहार्द का व्यवहार करते हुए अपने समूह का हित सोचें। इसके साथ ही ऐसे विद्वानों का हमेशा सम्मान करें तो संकट पड़ने पर अपने बौद्धिक कौशल से उसे तथा उसके समूह को उबार सकें। समाज के शीर्षस्थ वर्ग का यह दायित्व है कि वह छोटे वर्ग की रक्षा करे।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://rajlekh.blogspot.com

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