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Wednesday, July 29, 2015

एक फांसी पर उठे प्रश्न, उत्तर भविष्य के गर्भ में-हिन्दी चिंत्तन लेख(punishment of death-hindi article)

                               वह पत्रकार हैं, वह वकील हैं, वह स्वयंभू समाज सेवक हैं। टीवी पर चर्चा में उनके चेहरों में ऐसी उदासी कि जैसे उनको फांसी होने वाली है। मुंबई के धारावाहिक बम धमाकों के एक अपराधी को फांसी पर अर्द्धबुद्धिमानों के बीच एकदम बेतुकी बहस में इतने बेहूदे तर्क  कि मुकदमे के दौरान उसने बचाव में नहीं कहे होंगे। वह पकड़ा नहीं गया (एक मृतक अधिकारी के अप्रमाणिक लेख से लिया गया तर्क), उसने जांच मे सहयोग दिया (प्रशासनिक अधिक इसे नहीं मानते) और सरकार अभी तक उसके असली अपराधी सगे भाई को नहीं पकड़ पायी जैसी वह बातें कह रहे हैं।  अपराधियों को फांसी होती है पर जिस तरह इस प्रकरण में इन पेशेवर अर्द्धबुद्धिमानों के चेहरे फक हो रहे हैं और वाणी सूख रही है तब हमारे मन में प्रश्न आ रहा है क्या कोई ऐसी एतिहासिक घटना होनी वाली है जो अभी तक देश में प्रवाहित मानसिक विक्षिप्तीकरण करने वाली विचाराधारा बंद होनी वाली है या उसके संवाहकों लगता है कि उनके सहारे खत्म होने वाले हैं।
                              बुद्धिमानों की मुस्कराहट तो स्वाभाविक है पर क्या वह इस प्रश्न का उत्तर ढूंढ पायेंगे।  हालांकि भविष्य में इसका उत्तर मिल जायेगा। मामला मुंबई का है इसलिये हम कुछ ज्यादा सोच रहे हैं।  मुंबई भारत की आर्थिक राजधानी है और वहां धवल छवि तथ काली नीयत वाले धनपति एक साथ विराजते हैं।  काले धंधे वालों के कू्रर सरदार पाकिस्तान में रहते हैं।  एक समय था जब मुंबई में दुष्ट दबंग का साथ होना गर्व का विषय समझा जाता था। आज कम हुआ है पर लगता है कि इस फांसी से दबंगों की नाक दबने वाली है और उनके सहारे जीने वाले अब भयग्रस्त हैं।  कोई बौखलायेगा पर कौन? कोई टूटेगा? कुछ बनेगा, कुछ बिखरेगा पर क्या? या कुछ भी नहीं होगा।  अनेक प्रश्न भविष्य के गर्भ में होते हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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८.हिन्दी सरिता पत्रिका

Tuesday, July 21, 2015

परिहास में भी किसी का अपमान न करें-कौटिल्य के अर्थशास्त्र के आधार पर चिंत्तन लेख(parihas mein bhee kisi ka apaman na karen-A hindi hindi religion thought based on economics of kautilya)

                               अक्सर यह देखा जाता है कि लोग एक दूसरे की मजाक बनाते हैं पर यह नहीं सोचते कि उसका प्रभाव क्या होगा? मनुष्य में विनोद करने का भाव रहता है पर हास्य रंग बिखेरना भी एक कला है।  अधिकतर लोग दूसरों को अपमानित करना ही मजाक समझते हैं।  किसी से कटु वाक्य कहकर फिर स्वयं ही हंसने लगते हैं। अनेक लोग तो अभद्र शब्द हास्य के रूप में प्रयोग कर इस तरह सीना फुलाते हैं जैसे कि कोई बहुत बड़े भाषाविद हों।  इसी वजह से अनेक लोग अपने मित्रों तथा सहयोगियों में अलोकप्रिय हो जाते हैं।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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न नर्म्मसचिवैः सार्द्ध किञ्विदप्रियं बदेत्।
ते हि मर्मण्यभिन्धन्तिप्रह्यसेनापि संसद्धि।।

                              हिन्दी में भावार्थ-परिहास में अपने अपने सहयोगियों को बुरी बात नहीं कहना चाहिये। समूह में बैठकर मजाक में भी किसी के मर्म पर प्रहार नहीं करना चाहिये।
                              हास्य व्यंग्य इस तरह होना चाहिये कि जिस पर किया जाये उसे भी हंसी आ जाये।  सामूहिक वार्तालाप में कभी भी अपने मित्र या सहयोगी का मजाक के नाम पर अपमान करने वाले अलोकप्रिय हो जाते हैं।  इतना ही नहीं वह अपने लिये शत्रु अधिक बनाते हैं। इसलिये किसी से मजाक करने से पहले अपने शब्दों तथा वाक्यों पर विचार अवश्य करना चाहिये। हमने यह भी देखा है कि अनेक लोग एक दूसरे की जाति, भाषा तथा सामाजिक परंपराओं की  भी मजा उड़ाते हैं जिससे आपसी वैमनस्य बढ़ता है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Monday, July 13, 2015

अध्यात्मिक ज्ञान से ही प्राकृतिक विपदा से बचाव संभव-हिन्दी चिंत्तन लेख(ahdyatmik gyan se hi prakritik vipada se bachav sambhav-hindi thought article)

           भारत देश मौसम की दृष्टि से समशीतोष्ण माना जाता है। यहां गमी, सर्दी और बरसात के मौसम चार चार माह से समान अवधि में बंटे देख जाते हैं।  यही कारण है कि भारतीय हर मौसम का सामना करने में सक्षम माने जाते हैं। यह अलग बात है कि समय के साथ अनियोजित बसाहट, नियंत्रित विकास तथा अनियमित प्रबंध ने गांव ही नहीं शहरों को भी प्राकृतिक आपदाओं का उद्गम स्थल बना दिया है।
                              प्राचीन काल में मनुष्य नदियों के किनारों के निकट  निवास स्थान का चयन इसलिये करते थे क्योंकि वह इस सत्य को जानते थे कि जल ही जीवन है।  अब लोग स्थान चयन धन की नदी के निकट करते हैं क्योंकि वह मानते हैं कि धन ही जीवन है। यह धन की नदियां शहरों में ही बहती हैं यह अलग बात है कि यह प्राकृतिक नदियों और नालों की जलधारा को बाधित करने वाली होती है। थोड़ी बरसात में ही बड़े शहरों की सड़कें मल नदी में परिवर्तित होकर कहर बरपाती हैं क्योंकि विकास की सड़कें कमीशन के सहारे जमी होने के कारण बह जाती हैं। विकास के लोभ में आम और खास दोनों ही प्रकार के इंसान धन ही जीवन के सिद्धांत पर चल रहे हैं इसलिये बड़े शहरों में बरसाती संकट के लिये सभी जिम्मेदार हैं।
                              स्थिति यह है कि नदी के अनेंक किनारे जो बरसात के समय उसका भाग दिखते थे वहां यह जानते हुए भी मकान और कारखाने बनाये गये कि वर्षा होने पर बाढ़ आयेगी। शहरी नालों का गंदा पानी पवित्र कहीं जाने वाली नदियों की तरफ मोड़ा गया।  धर्मग्रथों में कहीं नहीं लिखा गया कि शव जल में बहाये जायें पर स्वर्ग की प्राप्ति के लिये यह भी किया जा रहा है। प्लास्टिक जिसे अग्नि और जल नष्ट नहंी कर सकते उसे जल में प्रवाहित करने में धार्मिक आस्था की आड़ ली जा रही है। सब एक दूसरे से कहते हैं कि सुधर जाओ पर जब अपना समय आता है तो सब इन नदियों को नाला बनाने का काम करते हैं।
                              यह सब अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव का परिणाम है।  हमारे यहां धर्म के नाम पर अनेक कार्यक्र्रम होत हैं पर पेशेवर वक्ता पुरानी कहानियों से मनोरंजन कर लोगों को बहला कर गुरु की पदवी धारण कर लेते हैं। कोई लोगों को यह संदेश नहीं देता कि हमें जीवन स्वच्छ रखने के लिये वातावरण शुद्ध बनाये रखना आवश्यक है। जिन नदियों पर वह कथायें सुनाते हैं उन्हें शुद्ध रखने का रोना तो रोते हैं पर लोगों को अपनी जिम्मेदारी समझाने की बात नहीं करते। हमारा मानना है कि किसी दूसरे पर जिम्मेदारी डालने से पहले आम तथा खास लोग व्यक्तिगत रूप से गंदगी न करने का प्रण ले-ऐसा हमारा मानना है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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८.हिन्दी सरिता पत्रिका

Sunday, July 5, 2015

जनप्रतिनिधियों के वेतन भत्तो पर बहस करना हल्कापन है-हिन्दी चिंत्तन लेख(jan partinidhiyon ke vetan bhatton par bahas karna halkapan hai-hindi thought article)

                              हमारे देश के प्रचार माध्यम लोकतंत्र में नाम बहुत उछलते हैं पर जनप्रतिनिधियों पर जिस तरह से टिप्पणियां करते हैं वह असामान्य प्रकार की हैं।  सांसदों और विधायकों के वेतन और भत्ते बढ़ने पर वह गरीब आदमी का नाम लेकर जिस तरह  विलाप करते हैं उसे देखकर नहीं लगता कि लोकतंत्र और राजतंत्र की उन्हें कोई समझ है।  हमारे विचार से सांसदों और विधायक अगर अपना वेतन भत्ते बढ़ाने के साथ ही अन्य सुविधायें भी लें तो कोई बुरी बात नही है।  जनप्रतिनिधियों के जनहित में निर्वाह की जा रही भूमिका पर ही चर्चा हो तो बात समझ में आये।  अगर आप केंद्र सरकार से नगर निगमों के बजट की बृहद राशि पर नज़र डालें तो सांसदों, विधायकों और पार्षदों के वेतन भत्ते ऊंट के मुंह में जीरे के समान प्रतीत होता है।   जनप्रतिनिधि एक व्यवस्था के शीर्ष पर विराजमान होते हैं उनमें दायित्व निर्वाह की क्षमता दिखाने की अपेक्षा सामान्यजन करते हैं।  जनप्रतिनिधियों की निजी आय पर सामान्य जन अधिक विचार नहीं करते।
                              हमारी दृष्टि से प्रचार माध्यमों को इन जनप्रतिनिधियों के सार्वजनिक कार्यों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिये।  जिस जनप्रतिनिधि में जनहित के प्रति अरुचि का भाव हो या वह निष्क्रिय हो उसे अपने मूल कर्म के लिये प्रेंरित करते रहना चाहिये।  इस तरह जनप्रतिनिधियों के वेतन भत्तों पर बहस करना अर्थशास्त्र लेखांकन के विद्यार्थी होने के नाते हमें हल्कापन लगता है। हम न जनप्रतिनिधि हैं न भविष्य में बनने की संभावना है इसलिये किसी लाभ की आशा से यह लिख रहे हैं यह सोचना गलत होगा।  एक सामान्य नागरिक के रूप में हमारी जनप्रतिनिधियों से सार्वजनिक दायित्व निभाने की आशा ही  की जाती है। वह उस खरे उतरनते हैं या नहीं, इसी पर ही विचार होना चाहिये।
                              प्रचार माध्यमों के पास लोकतंत्र के नारे के नाम पर अभिव्यक्ति की आज़ादी है पर उसका उपयोग करना आता कि नहीं यह विचारणीय प्रश्न है।  सामान्य मनुष्य की अभिव्यक्ति हमेशा चिंत्तन और मनन के दौर से निकलकर बाहर आना चाहिये-हमने देखा होगा कि मानसिक रूप से असामान्य मनुष्य चाहे कुछ बड़बड़ाते हैं और लोग उसे नज़र अदाज कर देते हैं। बहस के विषयों के चयन में इस तरह की हड़बड़ी जिस तरह प्रचार प्रबंधक दिखा रह हैं वह गंभीर लोगों में उनकी छवि इसी तरह की बनाती है। सतही विषयों से कभी भी प्रचार माध्यम समाज के मार्ग दर्शक नहीं बन सकते।  सार्वजनिक विषयों से जुड़े पुराने लोग आज के प्रचार माध्यमों के हल्केपन से उदास ही हो सकते हैं। नये लोगों के पास तो वैसे भी अब बहुत सारे चैनल हैं इसलिये हाल बदल देते हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Monday, June 29, 2015

नालंदा में हिंसक संघर्ष के व्यापक संदेश शिखर पुरुष समझें-हिन्दी चिंत्तन लेख(nalanda mien sangharsh ka vyapak sandesh shikhar purush samjhen-hindi thought aritcle)

                              नालंदा में एक विद्यालय के छात्रावास से लापता दो छात्रों के शव एक तालाब में मिलने के बाद उग्र भीड़ ने निदेशक को पीट पीट कर मार डाला। बाद में छात्रों की मृत्यु पाश्च जांच क्रिया से पता चला कि बच्चों की मौत पानी में डूबने से हो गयी थी। जबकि मृत छात्रों की मृत्यु से गुस्साये लोग यह संदेह कर रहे थे कि छात्रावास के अधिकारियों ने उनकी हत्या करवा कर तालाब में फैंका या फिंकवाया होगा। हमें दोनों पक्षों के मृतक के परिवारों से हमदर्दी है पर इस घटना पर जिस तरह प्रचार माध्यम सतही विश्लेषण कर रहे हैं उससे लगता नहीं कि कोई गहरे चिंत्तन से निष्कर्ष निकल रहा हो।
                              यह घटना समाज में आम जनमानस में राज्य के प्रति कमजोर होते सद्भाव का परिणाम है। इस सद्भाव के कम होने के कारणों का विश्लेषण करना ही होगा।  मनुष्य समाज में राज्य व्यवस्था का बना रहने अनिवार्य माना गया ताकि कमजोर पर शक्तिशाली, निर्धन पर धनिक और प्रभावशाली लोग अपने से कमतर पर अनाचार न कर सकें।  हम प्रचार माध्यमों पर आ रहे समाचारों और विश्लेषणों को देखें तो यह संदेश निरंतर आता रहा है कि प्राकृत्तिक रूप से इस सिद्धांत पर समाज चल रहा है जिसमें हर तालाब में बड़ी मछली छोटी को खा जाती है। मनुष्य में राज्य व्यवस्था का निर्माण इसी सिद्धांत के प्रतिकूल किया गया है।
                              अनेक प्रकार ऐसी घटनायें भी हुईं है कि जिसमें किसी जगह वाहन से टकराकर पदचालकों की मृत्यु हो जाने पर भीड़ आक्रोश में आकर वाहन जला देता है। कहीं वाहन चालक को भी मार देती।  इस तरह की खबरें तो रोज आती हैं। इन्हें सहज मान लेना ठीक नहीं है। आखिर हम जिस सामाजिक व्यवस्था में सांस ले रहे हैं कहीं न कहीं उसका आधार राज्य प्रबंध ही है।  भीड़तंत्र का समर्थन करना अपनी जड़ें खोदना है पर सवाल यह है कि आक्रोश में आकर लोग इसे भूल क्यों जाते हैं? क्या उनमें इस विश्वास की कमी हो गयी है कि गुनाहगार को सजा मिलना सरल नहीं है इसलिये वह समूह में यह काम कर डालें जिसकी अपेक्षा बाद में नहीं की जा सकती।
              दूसरी बात हमें देश के आर्थिक, सामाजिक तथा प्रतिष्ठत शिखर पुरुषों से भी कहना है कि उन्हें अब चिंता करना ही चाहिये। आमजन को केवल दोहन के लिये समझना उनकी भूल होगी।  उन्हें शिखर समाज में आर्थिक, सामाजिक तथा सद्भाव का वातावरण बनाये के लिये मिलते हैं।  अगर कहीं तनाव बढ़ा है तो उन्हें भी आत्ममंथन करना ही होगा।  समाज में विश्वास का संकट सभी वर्गों के लिये तनाव का कारण बनता है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Wednesday, June 24, 2015

चिकित्सा तथा शैक्षणिक केंद्रों में स्वच्छता अभियान की आवश्यकता-हिन्दी चिंत्तन लेख(chikitsa aur shiksha kendron mein swachchhata abhiyan ki awashyakta-hindi thought article)


                     सरकारी अस्पताल में जब चिकित्सक हड़ताल करते हैं तो सबसे अधिक कमजोर आयवर्ग के लोग प्रभावित होते हैं। उसी तरह जब सरकारी विद्यालयों में शिक्षक हड़ताल करते हैं तब इसी वर्ग के छात्र परेशान होते हैं।  यह आर्थिक वैश्वीकरण का परिणाम है कि जिन गरीबों के कल्याण के लिये धनवादी नीतियां लायी गयीं वही उनकी शत्रु हो गयी हैं।
              एक समय था जब सरकारी अस्पताल और विद्यालय जनमानस की दृष्टि में प्रतिष्ठित थे पर समय के साथ बढ़ती आर्थिक असमानता ने समाज में गरीब तथा अमीर के बीच विभाजन कर दिया है । यह विभाजन अमीरों का निजी तथा गरीबों का सरकारी क्षेत्र के प्रति मजबूरी वश झुकाव के रूप में स्पष्टतः दिखाई देता है। हमें याद है जब पहले बच्चों को शासकीय विद्यालयों में भर्ती इस विचार से कराया जाता था कि वहां पढ़ाई अच्छी होती है। उसी तरह इलाज भी सरकारी अस्पतालों में वहां के चिकित्सक तथा नर्सों के प्रति विश्वास के साथ कराया जाता था।  अब अल्प धनी सरकार और अधिक धनी निजी क्षेत्र पर निर्भर रहने लगा है।  सरकारी अस्पतालों में कभी जाना हो तो वहां इतनी गंदगी मिलती है कि लाचार गरीब का रहना तो सहज माना जा सकता है पर वेतनभोगी नर्स, कंपाउंडर और डाक्टर किस तरह वहां दिन निकालते होंगे यह प्रश्न मन में उठता ही है। कहा जाता है कि जिस वातावरण में आदमी रहता है उसका उस पर प्रभाव पड़ता ही है।  ऐसे गंदे वातावरण में चिकित्सा कर्मी अपना मन अच्छा रख पायें यह आशा करना व्यर्थ है। यही स्थिति सरकारी विद्यालयों में है। देश में स्वच्छता अभियान चल रहा है पर अभी हमें अस्पतालों और विद्यालयों में उसके आगमन की प्रतीक्षा है।
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Thursday, June 18, 2015

आष्टांग योग के हर भाग की जानकारी जरूरी-21 जून अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर विशेष लेख(ashtang yoga ke har bhaag ki jankari jaroori-A Hindu hindi thought article on 21 june world day)


      21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर मनाने की जिस तरह तैयारी चल रही है उससे तो यह लगता है कि इसमें केवल आसन तथा प्राणायाम को ही योग का पर्याय मान लिया गया है। पतंजलि योग विज्ञान के अनुसार यम, नियम, प्रत्याहार, आसन, प्राणायाम, ध्यान, धारण तथा समाधि आठ भाग है पर भारत के पेशेवर धार्मिक विद्वान हर भाग का अलग प्रचार करते हैं।  यहां तक कि समाधि की चर्चा इस तरह की जाती है जैसे कि वह येाग से इतर कोई कारनामा हो।  हमारी दृष्टि से भारतीय योग विद्या  आठों भागों पर व्यापक चर्चा किया जाना जरूरी है। देखा यह जा रहा है कि आष्टांग योग के मात्र दो भागों आसन और  प्राणायाम पर ही चर्चा कर लोगों को संकीर्ण जानकारी दी जा रही है। । हमारा मानना है कि 21 जून विश्व अंतर्राष्ट्रीय दिवस पर  पतंजलि योग सूत्रों के साथ ही श्रीमद्भागवत गीता के ज्ञान तथा विज्ञान के सूत्रों की भी चर्चा करना आवश्यक है।  हमने अनेक नाम सुने हैं-राजयोग, विद्या योग और ज्ञान योग आदि-पर इनमें सहज योग ही इसका मूल रूप है। श्रीमद्भागवत इसका सबसे प्रमाणिक ग्रंथ है।
  जब मनुष्य योग साधना से सहज भाव प्राप्त कर लेता है  तब वह सांसरिक विषयों में शक्ति, आत्मविश्वास तथा नैतिकता के साथ जुड़ता है। वह सहजता से उपलब्धियां प्राप्त करता है पर उसे अहंकार नहीं आता। कोई उसे अपने नैतिक और धर्म पथ से विचलित नहीं कर सकता। आसनों के समय आंतरिक रूप से देह की आंतरिक गतिविधियों पर ध्यान रखना चाहिये। प्राणायाम के समय भी अपने प्राणों को भृकुटि पर केंद्रित कर पूरी देह पर दृष्टिपात करने से अनेक प्रकार के लाभ होते हैं। यह सही है कि आसन तथा प्राणायाम से देह में विशेष प्रकार की स्फूर्ति का संचार होता है पर उसके स्थाई लाभ के लिये आठों भागों का ज्ञान होना आवश्यक है। 
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Thursday, June 4, 2015

कंपनियों के खाद्य तथा पेय पदार्थों के उपभोग पर समाज विचार करे-हिन्दी चिंत्तन लेख(eat and drink production of large compani's-hindi thought article)

        देश में मैगी के भोज्य पदार्थ को लेकर विवाद का दौर चल रहा है। हमारी दृष्टि से  एक उत्पादक संस्थान पर ही चर्चा करना पर्याप्त नहीं है। उपभोग की बदलती प्रवृत्तियों ने संगठित उत्पादक संस्थानों के भोज्य पदार्थों को उस भारतीय समाज का हिस्सा बना दिया है जो स्वास्थ्य का उच्च स्तर घरेलू भोजन में ढूंढने के सिद्धांत को तो मानता है पर विज्ञापन के प्रभाव में अज्ञानी हो जाता है। अनेक संगठित उत्पादक संस्थान खाद्य तथा पेय पदार्थों का विज्ञापन भारतीय चलचित्र क्षेत्र के अभिनेताओं से करवाते हैं।  उन्हें अपने विज्ञापनों में अभिनय करने के लिये भारी राशि देते हैं। इन्हीं विज्ञापनों के प्रसारण प्रकाशन के लिये टीवी चैनल तथा समाचार पत्रों में भी भुगतान किया जाता है। इन उत्पादक संस्थानों के विज्ञापनो के दम पर कितने लोगों की कमाई हो रही है इसका अनुमान तो नहीं है पर इतना तय है कि इसका व्यय अंततः उपभोक्ता के जेब से ही निकाला जाता है। आलू चिप्स के बारे में कहा जाता है कि एक रुपये के आलू की चिप्स के  दस रुपये लिये जाते हैं।

        हमारे देश में अनेक  भोज्य पदार्थ पहलेे ही बनाकर बाद में खाने की परंपरा रही है। चिप्स, अचार, मिठाई तथा पापड़ आदि अनेक पदार्थ हैं जिन्हें हम खाते रहे हैं। पहले घरेलू महिलायें नित नये पदार्थ बनाकर अपना समय काटने के साथ ही परिवार के लिये आनंद का वातावरण बनाती थीं। अब समय बदल गया है। कामकाजी महिलाओं को समय नहीं मिलता तो शहर की गृहस्थ महिलाओं के पास भी अब नये समस्यायें आने लगी हैं जिससे वह परंपरागत भोज्य पदार्थों के निर्माण के लिये तैयार नहीं हो पातीं। उस पर हर चीज बाज़ार में पैसा देकर उपलब्ध होने लगी है। घरेलू भोजन में बाज़ार से अधिक शुद्धता की बात करना अप्रासंगिक लगता है। इसका बृहद उत्पादक संस्थानों को भरपूर लाभ मिला है।
       भारतीय समाज में चेतना और मानसिक दृढ़ता की कमी भी दिखने लगी है। अभी मैगी के विरुद्ध अभियान चल रहा है पर कुछ समय बाद जैसे ही धीमा होगा वैसे ही फिर लोग इसका उपभोग करने लगेंगे। पेय पदार्थों में तो शौचालय स्वच्छ करने वाले द्रव्य मिले होने की बात कही जाती है। फिर भी उसका सेवल धड़ल्ले से होता है। यह अलग बात है कि निजी अस्पतालों में बीमारों की भीड़ देखकर कोई भी यह कह सकता है कि यह सब बाज़ार के खाद्य तथा पेय पदार्थों की अधिक उपभोग के कारण हो रहा है।
        ऐसे में बृहद उत्पादक संस्थानों के खाद्य तथा पेय पदार्थों के प्रतिकूल अभियान छेड़ने से अधिक समाज में इसके दोषों की जानकारी देकर उसे जाग्रत करने की आवश्कयता अधिक लगती है।
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Friday, May 29, 2015

राजसी कर्म से पंच गुण उत्पन्न होते ही हैं-हिन्दी चिंत्तन रचना(rajsi karme se panch gun uepanna hote hi hain-hindi thought article)


     अध्यात्मिक दर्शन का संबंध आंतरिक मनस्थिति से है। उसके ज्ञान से  व्यक्ति सात्विक भाव धारण करता है या फिर इस संसार में विषयों से सीमित संबंध रखते हुए योग भाव को प्राप्त होता है।  एक बात तय रही कि दैहिक विषयों से राजसी भाव से ही  राजसी कर्म के साथ संपर्क रखा जा सकता है। ज्ञान होने पर व्यक्ति अधिक सावधानी से राजसी कर्म करता है और न होने पर वह उसके लिये परेशानी का कारण भी बन जाता हैं।  हम देख यह रहे है कि लोग अपने साथ उपाधि तो सात्विक की लगाते हैं पर मूलतः राजसी प्रवृत्ति के होते हैं। ज्ञान की बातें आक्रामक ढंग से इस तरह करेंगे कि वह उन्हीं के पास है पर उनमें धारणा शक्ति नाममात्र की भी नहीं होती और राजसी सुख में लिप्त रहते हैं। राजसी कर्म और उसमें लिप्त लोगों में लोभ, क्रोध, मोह, अहंकार की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती है अतः उनसे सात्विक व्यवहार करने और विचार रखने की आशा करना ही अज्ञान का प्रमाण है। सात्विकता के साथ राजसी कर्म करने वालों की संख्या नगण्य ही रहती है।
            धर्म, अर्थ, समाज सेवा, पत्रकारिता और कला क्षेत्र में धवल वस्त्र पहनकर अनेक लोग सेवा का दावा करते हैं। उनके हृदय में शासक की तरह का भाव रहता है। स्वयंभू सेवकों की भाषा में अहंकार प्रत्यक्ष परिलक्षित होता है। प्रचार में विज्ञापन देकर वह नायकत्व की छवि बना लेते हैं।  शुल्क लेकर प्रचार प्रबंधक जनमानस में उन्हें पूज्यनीय बना देते हैं। कुछ चेतनावान लोग इससे आश्चर्यचकित रहते हैं पर ज्ञान के अभ्यासियों पर इसका कोई प्रभाव नहीं होता। राजसी कर्म में लोग फल की आशा से ही लिप्त होते हैं-उनमें पद, प्रतिष्ठा पैसा और प्रणाम पाने का मोह रहता ही है। हमारे तत्वज्ञान के अनुसार यही सत्य है।
सामान्य जन उच्च राजसी कर्म और पद पर स्थित शिखर पुरुषों से सदैव परोपकार की आशा करते हैं पर उन्हें इस बात का ज्ञान नहीं होता कि इस संसार में सभी मनुष्य अपने और परिवार के हित के बाद ही अन्य बात सोचते हैं। परोपकार की प्रवृत्ति सात्विक तत्व से उत्पन्न होती है और वह केवल अध्यात्मिक रूप से शक्तिशाली मनुष्यों में संभव है। सात्विक लोगों में बहुत कम लोग ही राजसी कर्म में अपनी दैहिक आवश्यकता से अधिक संपर्क रखने का प्रयास करते हें। उन्हें पता है कि व्यापक सक्रियता काम, क्रोध, मोह लोभ तथा अहंकार के पंचगुण वाले  मार्ग पर ले जाती है। ऐसे ज्ञान के अभ्यासी कभी भी राजसी पुरुषों की क्रियाओं पर प्रतिकूल टिप्पणियां भी नहीं करते क्योंकि उनको इसका पता है कि अंततः सभी की देह त्रिगुणमयी माया के अनुसार ही संचालित होती है। उनके लिये अच्छा या बुरा कुछ नहीं होता इसलिये काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा अहंकार को वह राजसी कर्म से उत्पन्न गुण ही मानते हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Friday, May 15, 2015

भारत और चीन के बीच अध्यात्म तत्व मैत्री का आधार बन सकता है-हिन्दी चिंत्तन लेख(india and china relation:adhyatma poind between both country-hindi article)


      भारतीय प्रधानमंत्री श्रीनरेंद्र मोदी की चीन यात्रा के दौरान राजनीतिक विषयों पर चर्चा huee पर जिस तरह इसमें अध्यात्मिक तथा धार्मिक तत्व के दर्शन हुए वह नये परिवर्तन का संकेत हैं।  आमतौर से वामपंथी विचाराधारा के चीनी नेता धर्म जैसे विषय पर सार्वजनिक रूप से मुखर नहीं होते न ही अपने देश से बाहर के लोग प्रेरित करते। जिस तरह नरेंद्र मोदी ने वहां जाकर बौद्धिवृक्ष का पौद्या उपहार के रूप में सौंपा और प्रत्युपहार में उन्हें बुद्ध की स्वर्णिम प्रतिमा सौंपी गयी वह वैश्विक राजनीतिक में एक नया रूप है।
             चीनी नेताओं ने जिस तरह शियान के बौद्ध मंदिर में फोटो खिंचवाये उससे यह लगता है कि अभी तत्काल नहीं तो भविष्य में चीनी जनता के हृदय में भारत के प्रति परिवर्तन अवश्य आयेगा। अभी तक विश्लेषकों की जानकारी सही माने तो वहां पाकिस्तान केा मित्र तथा भारत को विरोधी ही माना जाता है।  हमारा मानना है कि जब तक चीनी प्रचार माध्यम जब तक भारत के प्रति वहां के जनमानस में सद्भाव नहंी स्थापित करते तब दोनों के बीच राजनीतिक साझेदारी जरूर बने पर संास्कृतिक तथा सांस्कारिक संपर्क स्थाई नहंी बन सकते।
वैसे हमें लगता है कि चीनी रणनीतिकार भारत के प्रति कृत्रिम सद्भाव दिखा रहे हैं क्योंकि वह धार्मिक विचाराधारा को अपनी राजकीय सिद्धांत बनाने वाले पाकिस्तान के प्रति उनकी बढ़ती निकटता भारत के लिये खतरा ही है। बौद्ध और भारतीय धर्म समान सिद्धांतों पर आधारित हैं। भारत में जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान महावीर तो भगवान बौद्ध के न केवल समकालीन वरन् समकक्ष ही माने जाते हैं।  दोनों ही अहिंसा सिद्धांत के प्रवर्तक रहे हैं।  एक आम भारतीय के लिये भगवान महावीर तथा बुद्ध में समान श्रद्धा है। ऐसे में अध्यात्मिक चिंत्तकों के लिये चीन का धार्मिक तत्व के प्रति झुकाव दिखना रुचिकर है। पाकिस्तान की राजकीय विचाराधारा चीन तथा भारत दोनों के लिये समान चुनौती है जिसमें धर्म के आधार पर आतंकवाद निर्यात किया जाता है। ऐसे में चीन का उससे मेल संशय का परिचायक है।  साथ ही यह विचार भी आता है कि कहीं चीन का राजनीति में धार्मिक तत्व का मेल कहीं इस समय भारत से तात्तकालिक औपचारिकता निभाने भर तो सीमित नहीं है।
    एक बात तय है कि भारत और चीन की निकटता में अध्यात्म तत्व ही महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। सांसरिक विंषयों से बने संपर्क अधिक समय तक नहीं टिके रहते।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
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