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Sunday, November 27, 2016

उसे जल्दी पता लग जायेगा कि कश्मीर उसके बाप की भी जागीर नहीं है-हिन्दी लेख (It wil Clear front Him That kashmir is Not Proparty his Fathar-Hindi Article)


हमने एक लेख लिखा था वह मिल नहीं रहा पर उसका सारांश यहां लिख देते हैं। प्रख्यात पत्रकार कुलदीप नैयर देह सहित मौजूद हैं। उनका हमने एक लेख पढ़ा था जिसमें उन्होंने बताया कि जब आजादी के बाद पाकिस्तान के कबायली कश्मीर में घुस आये तो वहां के राजा ने भारत से मदद मांगी। भारतीय सेना ने कबायलियों को खदेड़ना प्रारंभ किया। जब भारतीय सेना आगे बढ़ रही तो वहां के एक नेता ने भारत के प्रधानमंत्री से कहा कि ‘बस, जहां तक भारतीय सेना आगे बढ़े गयी है इससे आगे कश्मीर में न बढ़े क्योंकि मेरी इतने ही इलाके तक चलती है। बाकी मैं नहीं संभाल पाऊंगा।’
तब भारत ने अपनी सेना को बढ़ने से रोक दिया और वही हिस्सा आज पाकिस्तान के पास है क्योंकि उसकी ठेकेदारी भारत का कश्मीरी नेता नहीं लेना चाहता था। वह लेख हमने कब पढ़ा याद नहंी पर जेहन में बना रहा। जब अंतर्जाल पर लिखना शुरु किया तो उसे हमने आधार बनाया। इसका मतलब हमने यह निकाला कि देश का विभाजन ही ठेकेदारी पर हुआ। भारत के तत्कालीन पूंजीपतियों का भी कोई बड़ा कारखाना उस समय भारत के उस हिस्से में नहीं था जो आज पाकिस्तान है। भारतीय पूंजीपतियों की उस समय तक अंग्रेजों पर पकड़ अच्छी हो गयी थी और देश के कथित समाज सेवकों के समूह भी उनसे चंदा वगैरह पाते थे। यकीनन उस समय इन्हीं पूंजीपतियों ने भी कहा होगा कि हमारा पूंजी वर्चस्व जिस इलाके तक है वही भारत में रहे बाकी तो अलग हो जाने दो। यह हमारी योगदृष्टि से उपजा निर्णय है इसलिये इसकी संभावना है। हमारे इस संदेश को पढ़कर कोई नैयर साहब से पता करे कि उन्होंने ऐसा कब लिखा था।
बहरहाल उस स्वर्गीय कश्मीरी नेता का बूढ़ा पुत्र कह रहा है कि कश्मीर भारत के बाप का नहीं जो पाकिस्तान से छीन लेगा।
आप समझे या नहंी पर हम उसी लेख के आधार पर कह रहे हैं कि कश्मीर का वह हिस्सा भारत ने ले लिया तो उसकी पारिवारिक जागीर खत्म हो जायेगी। हम भी उस बुढ़ऊ को बता देते हैं हम भी अक्सर यह पूछते हैं कि ‘सिध किसके बाप का है जो वह कहता है कि पाकिस्तान का हिस्सा है।’
अगर सिंध व बलूचिस्तान पाकिस्तान से अलग हो जाये तो पता लग जायेगा कि कश्मीर किसका है। इन दोनों प्रांतों के खून पर पाकिस्तान टिका है जिसके आधार पर वह कश्मीर को लेकर भारत से लड़ता रहता है। आखिरी बात यह कि नोटबंदी के परिणाम जब कालांतर में आयेंगे तो ऐसे कई लोग बौखलाते नज़र आयेंगे जिन्हें लगता है कि हमारी जाति, धर्म और प्रदेश बाप की जागीर हैं। नोटबंदी से हमने इसका संबंध इसलिये जोड़ा है कि पाकिस्तान अब तक भारत से अवैध रूप में गये पैसे पर ही जिंदा है और उसका भविष्य खतरे में हैं। आज एक चैनल पर पाकिस्तान के एक सेवानिवृत्त अधिकारी का सुर बदला हुआ था और उससे लगता है कि भारत की नोटबंदी के कुछ प्रभाव उन भी पड़े हैं। जिस तरह भारत के रणनीतिकार आगे बढ़ रहे हैं उसे देखते हुए उस बूढ़े और चूके हुए कश्मीरी नेता को ऐसे प्रश्न उठाकर उन्हें उग्र नहीं बनाना था। उसे जल्दी ही पता लग जायेगा कि कश्मीर उसके बाप की जागीर नहीं है।


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Sunday, October 30, 2016

तनाव के वातावरण में हॉकी में पाक पर जीतना भी संतोषजनक-हिन्दी लेख (Victory in Hoicky over Pakistan Gave Great Saticfication in Tenson-Hindi Article)

             
                               चलो अच्छा ही हुआ कि आज दीपावली के दिन भारत ने एशिया हॉकी कप के फायनल में पाकिस्तान को 3-2 से हराकर खिताब जीत लिया।  भारतीय प्रचार माध्यम अपनी श्रेष्ठता दिखाने के लिये खेलों को सनसनीपूर्ण बना देते हैं इसलिये दर्शकों के भावुक होने की पूरी संभावना रहती है-खासतौर से जब देशभक्ति और हिन्दू पर्व का संयुक्त विषय हो-ऐसे में हारने पर कुछ लोग तनाव ज्यादा अनुभव करते हैं।  बहरहाल वह मैच हमने देखा। जैसा कि हम जानते हैं कि अब हॉकी का मैच 15-15 मिनट के चार भागों में खेला जाता है। भारतीय हॉकी टीम की यह रणनीति बन गयी है या उसकी स्वाभाविक प्रकृत्ति है कि वह पहले और चौथे भाग में बहुत ज्यादा आक्रामक खेलती है पर दूसरे व तीसरे भाग में उसका प्रदर्शन थोड़ा कमजोर रहता है।
           इस मैच में भी भारत ने पहले ही भाग में 2-1 से बढ़त बना ली थी पर तीसरे भाग में पाकिस्तान ने एक गोल कर बराबरी की।  चौथे भाग में हमारा यकीन था कि पाकिस्तान पर भारत की तरफ से गोला जरूर होगा।  हारने जीतने की चिंता नहीं थी पर हम सोच रहे थे कि अन्य भावुक भारतीय अगर यह स्कोर देखेंगे तो चिंता में पढ़ जायेंगे।  तीसरा गोल होने के बाद हमें भी लग रहा था कि जैसे तैसे समय पास हो तो ठीक है। बहरहाल भारत यह मैच जीत गया। यह कामयाबी पाकिस्तान के विरुद्ध है इसलिये ज्यादा महत्वपूर्ण है वरना तो  वैश्विक स्तर पर भारतीय टीम को अपना प्रभाव दिखाने के लिये अभी बहुत मेहनत करनी है।
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                               हमारे अंदर भी पशु और पक्षियों के प्रति भारी संवेदनायें हैं पर दिखावा नहीं करते। इधर कुछ लोग पटाखे चलने से जानवरों पर संकट देख रहे हैं। अगर हिन्दूवादी पूछ रहे हैं कि उनके पर्वो पर ही सवाल क्यों उठते हैं तो इसका जवाब तो मिलना ही चाहिये। दिवाली पर पशुप्रेम दो प्रकार के लोगों को ही जागा है। एक वह जो निरपेक्ष हैं दूसरे जो कुत्ते पालते हैं जिनको इन पटाखों के शोर से बहुत परेशान होती है और उससे बचने के लिये वह स्वामी के शयनकक्ष तक बिना अनुमति के घुस जाते हैं। केवल हिन्दू पर्व पर विलाप करने वाले पशुप्रेमियों को हमारी यह राय है कि वह अपने पालतु बिल्ली और कुत्तों को शयन कक्ष में जाकर बिठा दें उन्हेें पटाखों के शोर से परेशानी नहीं होगी। हमारे पास एक टॉमी नामक कुत्ता-यह शब्द लिखते हुए पीड़ा होती है-तेरह साल रहा है उसे हम इसी तरह ही दिवाली और दशहरा पर इसी तरह बचाते हैं।  आज पशुप्रेमियों का अभियान देकर उसकी याद आ रही है और मन भावुक हो रहा है। काश! वह होता तो आज उसे हम इसी तरह अपने शयनकक्ष के पलंग के नीचे दुबका देते।
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                       दीपावली पर चीनी सामान के बहिष्कार का अभियान तो चल रहा है पर बाज़ार में जिस तरह भीड़ लगी है तो दुकानदार से यह पूछना भी मुश्किल है कि यह चीनी है या देसी। फिर कोई पहचान भी नहीं है।  इस बात की संभावना है कि कई दिनों से चीनी सामान के बहिष्कार की बात चलती रही है तो जिन व्यापारियों ने सामान खरीदा हो वह बाहर की पैकिंग भी बदल कर सामान बेच सकते हैं।  अतः पूरी तरह यह प्रयास सफल नहीं हो सकता कि चीनी सामान बिके ही नहीं। वैसे भी हम आर्थिक दृष्टि से छोटे व्यापारियों की देशभक्ति पर सवाल नहीं उठायें तो अच्छा है पहले बड़े मगरमच्छों से सभी सवाल करें जो भारी मात्रा में सामान मंगवा रहे है।

Thursday, October 13, 2016

हिन्दू विरोधी नहीं चाहते कि विजयी घोष ‘जयश्रीराम’ घोष भारत में गूंजे-हिन्दी लेख (AntiHindu has been Disturb "JayShriRam* Slogan-Hindi Article)


                            जयश्रीराम शब्द का उच्चारण  भारतीय जनमानस की आत्मा है जिनको उनका नाम पसंद नहीं है वह कथित विदेशी धर्मों के राजनीतिक के विस्तार करने वाले हैं। जब हम खुश होते हैं तो ‘जयश्रीराम’ बोलते हैं, जब परेशानी हो तो आर्तभाव ‘हे राम’ कहकर बोझ हल्का करते हैं। दरअसल निरपेक्ष लोग चाहते हैं कि बस यहां भारतीय जनमानस आर्त भाव से ‘हेराम’ बोलता रहे। वह कभी दैहिक, शारीरिक तथा मानसिक रूप से मजबूत होकर ‘जयश्रीराम’ का उद्घोष न करे ताकि गरीब कल्याण का उनका व्यापार चलता रहे।
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                           यह भारत है जहां प्रधानमंत्री कह ही सकता है कि सैन्य विषय का राजनीतिकण न करो। नवाज शरीफ की तरह प्रतिबंध तो नहीं लगा सकता। उनके राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं को लगता है कि निरपेक्षों को इस प्रचार से चुनौती दे सकते हैं तो उन्हें रोकने के लिये उनका पासपोट तो भारत में जब्त नहीं हो सकता। अलबत्ता निरपेक्ष समूह के बुद्धिमानों की हालत देखते ही बनती है।
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             ऐसा लगता है कि कश्मीर सीमा पर जमकर आतंकवादियों की सफाई हो रही है। पाकिस्तान में कोहराम न मच जाये इस वजह से वह बता नहीं रहा। तंगधार में जिस तरह सेना ने आतंकवादियों की घूसपैठ रोकी है उससे यह साफ हो रहा है कि आतंकवादियों के सफाये किये बिना वह रुकेगी नहीं।
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                               रक्षामंत्री मनोहर पार्रिकर के बयान से निरपेक्ष विचारक यह सोचकर हतप्रभ हैं कि एक न एक राष्ट्रवादी प्रतिदिन उनके पाकिस्तान प्रेम की दुखती रग पर  हाथ रख ही देता है। पाकिस्तान प्रेमी निरपेक्ष विचारकों को रक्षामंत्री पार्रिकर का बयान अगर े चिढ़ाता है तो वह अच्छा जरूर लगेगा।
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                                    तीन तलाक पर टाईम्स नाउ पर बहस चल रही है। धर्मनिरपेक्षवादियों ने यहां अपने ही वाद का मजाक बना दिया है।  धर्मनिरपेक्षता का अर्थ केवल पूजा पद्धति के अधिकार तक ही है जो घर या दरबार की दीवारों की सीमा तक ही हो सकती है। सड़क पर तो संविधान का लिखा ही चलेगा चाहे पवित्र ग्रंथों में कुछ भी लिखा हो।  दूसरी बात यह कि संविधान लोगों को पूजा पद्धति तक ही अधिकार देता है पवित्र ग्रंथों के सम्मान की बात वह नहीं करता क्योंकि यह उसके क्षेत्र का विषय नहीं है। हमारा तो यह तक मानना है कि धर्म के नाम पर घर या दरबार  के बाहर जूलूसों और खानपान से अगर किसी दूसरे को तकलीफ होती है तो उसे संविधान रोकेगा चाहे भले ही पवित्र ग्रंथ में कुछ भी लिखा हो।
धर्मनिरपेक्षता में पूजा पद्धति मानने तक ही अधिकार है।  इससे आगे एक देश एक कानून लागू करना ही होगा।
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Sunday, September 25, 2016

पाकिस्तान का टूटना तय है-हिन्दी लेख (Pakistan destroyd by Pakistan-Hindi Artcile)

                                          जिस तरह के आसार लग रहे हैं उससे तो लगता है कि पाकिस्तान अगले वर्ष के अंत ही अपना अस्तित्व बचा ले तो बहुत बड़ी बात होगी। देश के कुछ विद्वानों को यह गलतफहमी है कि भारत के रणनीतिकारों ने बिना सोचे समझे बलूचिस्तान का मुद्दा उठाया है। यह मुद्दा उठने के बात वैश्विक स्तर की प्रतिक्रियायें देखकर तो यह लगता है कि पाकिस्तान पर अमेरिका ही नहीं बल्कि सभी देश वक्र दृष्टि रखते हैं। बलूचाी नेता स्पष्ट रूप से पंजाबी सेना और शासकों पर बरस रहे हैं।  विश्व में यह बात पहली बार प्रचार पटल पर आयी है कि पाकिस्तान एक देश नहीं वरन् एक धर्म के ही भाषा विशेष लोगों से नियंत्रित देश हैं जिसमें दूसरी जातियों और संस्कृतियों को जबरन अपने झंडे के नीचे दिखाया जाता है। पाकिस्तान ने जितना कश्मीर में भारत को परेशान किया है उससे सौ गुना भारत बलूचिस्तान में करने वाला है। भारतीय रणनीतिकारों ने सन् 1947 में हुए अप्राकृतिक विभाजन के विरुद्ध ऐसा अभियान प्रारंभ किया है जो पूरे विश्व को प्रभावित करेगा। अमेरिका कभी भी बलूचिस्तान पर भारत के रुख का विरोध नहीं  करेगा क्योंकि अपने शत्रू चीन के विरुद्ध उसे रोकने के लिये यह उसे सुविधा प्रदान करेगा।
                                 अंतर्जाल के शब्द सैनिकों को सलाह है कि ट्विटर पर रुझान में पाकिस्तान लिखकर वहां के रुझान देखें और भारत विरोधियों पर जमकर प्रहार करें। उन्हें समझायें कि अपने मीडिया प्रचार में आकर परमाणु बम को मसखरी न समझेें। प्रहार रोमन लिपि में करें ताकि उनके समझ में आये। इतना भी समझा दें कि जब भारतीय सेना इस्लामाबाद पहुंच गयी तो पता लगा कि उनके पास तो परमाणु बम था ही नहीं। भारत तब ऐसे ही जवाब देता फिरेगा जैसे आज इराक पर आक्रमण के बाद रासायनिक बम न मिलने पर अमेरिका देता फिर रहा है। भारत को अपने अनेक हथियारों का परीक्षण करना है और पाकिस्तान के मक्कार नेता और अहंकारी सेना यही अवसर देने जा रहे हैं। अभी भी अवसर है भारत जो कहे मान लो वरना सीरिया मिस्र और इराक के अनेक शहर बिना परमाणु बम के तबाह हो चुके हैं और कराची, लाहौर तथा इस्लामाबाद का हश्र भी वैसा ही हो सकता है।

Tuesday, September 20, 2016

अपनी जरूरत और खर्च कम करो फिर जुद्ध की बात करना (Discusstion on Posibility War Between India And Pakistan)

     
                           उरी हमले में शहीदों को श्रद्धापूर्वक नमन! हमारी मांग है कि शहीदों के परिवारों को भरपूर मदद सरकार तो करे ही निजी क्षेत्र भी उनके जवान बच्चों के लिये शिक्षा तथा रोजगार की योजना पर काम करे।  एक शहीद की तीन लड़कियां अभी पढ़ रही हैं। उनकी शिक्षा तथा रोजगार के लिये समाज करे तो बहुत अच्छा रहेगा। हमारे देश में अनेक धार्मिक संगठन अपने सदस्य बढ़ाने के लिये सामाजिक मदद भी करते हैं उनको चाहिये कि वह आगे बढ़कर अब राष्ट्र पर समर्पित शहीदों के परिवारों के लिये काम करें।
         इधर कुछ लोग जुद्ध जुद्ध के नारे लगा रहे हैं। उन्हें सलाह है कि वह पहले कम खाओ, वह गम खाओ की नीति पर चलना सीख लें। इधर उधर भागकर मनोरंजन ढूंढने की बजाय संत रविदास का सूत्र ‘मन चंगा, कठौती में गंगा’ भी जीवन में उतारें। सीधा मतलब यह है कि अपनी जरूरत तथा व्यय कम करों क्योंकि जुद्ध के बाद जो होना है उसका खमियाजा आम आदमी को ही उठाना है।  हमें हमें 1971 का युद्ध याद है उसके बाद से हमारा देश नैतिक, आर्थिक तथा वैचारिक क्षेत्र में पतन की तरफ ऐसा अग्रसर हुआ कि आज भी महंगाई, भ्रष्टाचार तथा अपराधों के जाल में इस कदर जकड़ा है कि आम जनमानस सहजता से सांस भी नहीं ले सकता। देश में भ्रष्टाचारी, अपराधी तथा कालाबाजारिये तो इस इंतजार में है कि राज्यप्रबंध अस्थिर हो और वह अपने कारनामें ज्यादा बढ़ा सकें। देश के अंदर हुए हमले गद्दारों के बिना नहीं हो सकते पर कोई पकड़ा नहीं जाता। ऐसे में सवाल है कि जुद्ध जीत भी लिये तो होना क्या है? गद्दार ज्यादा ताकतवर होकर फिर नुक्सान पहुंचायेंगे। 

Saturday, September 3, 2016

पाखंडियों की ही आस्था आहत होती है-हिन्दी चिंत्तन लेख (Pakhandiyon ki Aastha-Hindi Thought Article)

            धर्म तथा आस्था पर आघात की आड़ में जिस तरह देश में उपद्रव होने लगे हैं और कथित विद्वान भी उनका समर्थन करते हैं वह चिंताजनक है।  खासतौर से धार्मिक पुस्तकों के अपमान पर विवाद उठाकर जिस तरह कुछ लोग अपने को भक्त साबित करते हैं वह सरासर पाखंडी हैं।  हमारा मानना है कि भगवान तथा धार्मिक पुस्तकों का अपमान तो हो ही नहीं सकता क्योंकि वह मौन रूप से उसी अस्तित्व में रहेंगी जैसे सदियों से रही हैं। प्रतिष्ठत प्रस्तर या धातु की प्रतिमायें तथा धार्मिक ग्रंथों में वर्णित शब्द कभी न सम्मानित होते हैं न अपमानित।  जो कहते हैं कि हमारी आस्था आहत हो रही है वह सरासर झूठे हैं। जिनकी आस्था सच्ची है वह कभी अपने इष्ट तथा ज्ञान के शब्दों को अपमानित होता अनुभव नहीं कर सकते। गुरु ग्रंथ के अंशों वाली एक किताब थी पर संपूर्ण ग्रंथ नहीं था।  दो वर्ष पहले अमृतसर गये थे।  वहां एक सुबह नहाधोकर बिना कुछ खाये हम स्वर्णमंदिर गये और फिर वहां बाहर दुकान से चार खंडों वाला गुरूग्रंथ साहिब खरीदा।  उसे पैकेट में श्रद्धा से लेकर धर्मशाला आये।  इस दौरान ऐसे जाहिर नहीं होने दिया कि हमारे पास गुरुग्रंथ साहिब है।  उस समय लग रहा था कि चाहे हमारी कितनी श्रद्धा हो पर कोई व्यक्ति ग्रंथ के अपमान का बहाना कर लड़ न बैठे। धर्मशाला में एक टेबल रखी थी जिसे साफ कर हमने उस पर एक बैग में अलग रख दिया। हमारे साथ जीवन संगिनी के अलावा एक अन्य परिवार भी था। यह परिवार कहीं बाहर था। हमने अपनी जीवन संगिनी से कहा कि-घर पहुंचने तक किसी को मत बताना कि हमारे पास गुरुग्रंथ साहिब है। इस देश में आस्था पर जो पाखंड है उसके चलते कोई भी भिड़ सकता है।
             रेल में भी हमने उस बैग को इस तरह रखा कि किसी का पैर उस पर न पड़े। घर आकर श्रद्धा से उसके लिये एक आले में एक जगह बनायी। हम अपने घरों में एक गुरुजारा ( गुरु का आला) जरूर बनाते हैं ताकि वहां पूजा पाठ कर सकें। आज भी जब उससे  लिखते हैं तो नहाधोकर बिना खाये उसका पाठ करते हैं। उसे पढ़ते हैं तो आनंद आता है। यही श्रीमद्भागवत गीता के अध्ययन के समय भी हम करते हैं। अपनी आस्था से ही धार्मिक ग्रंथों का
                        सम्मान करते हैं।  जब पंजाब में गुरुग्रंथ साहिब के अपमान पर विवाद चल रहा था तब हमने लिखा था कि जो लोग मानते हैं कि इस पवित्र ग्रंथ का अपमान हुआ है वह सरासर पाखंडी हैं। गुरुग्रंथ साहिब का अध्ययन करने वाले उसके शब्दों को स्वर्णतुल्य मानते हैं जिनकी चमक कभी कम हो ही नहीं सकती।  ऐसे लोगों के कारण हम जैसे श्रद्धालू भी इसलिये भयभीत रहते हैं कि कहीं उन्हें अश्रद्धावान न घोषित कर दिया जाये।  यही कारण है कि कहीं अगर कोई धार्मिक पुस्तक लेकर निकलते हैं तो किसी को बताते ही नहीं कि हमारे पास क्या है? हमारा मानना है कि राजकीय नियमों में आस्था की रक्षा की आड़ में पाखंडियों को बचाने का काम नहीं होना चाहिये।
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पाखंडियों की ही आस्था आहत होती है-हिन्दी चिंत्तन लेख

Thursday, July 28, 2016

ध्यान से मन का व्यायाम होता है-हिन्दी चिंत्तन लेख(Dhyan se man ka vyayam hota hai_Hindu Thouhgt Article)


हमारे देश में श्रीमद्भागवत गीता का नाम बहुत श्रद्धा व विश्वास से लिया जाता है उसे देखते हुए तो हमारे देश में मानसिक, शारीरिक तथा वैचारिक रूप से सभी लोगों को अत्यंत मजबूत होना चाहिये पर ऐसा दिखता नहीं।  दरअसल गीता के ज्ञान का पढ़कर उसे समझना फिर व्यावाहरिक में उतारना सहज नहीं है।  उसमें भगवान श्रीकृष्ण ने भृकुटि पर ध्यान रखकर साधना करने का जो नियम दिया है वह अत्यंत व्यापक विषयों में कार्यसाधन की दृष्टि से योगदान देता है।
कहा जाता है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का वास रहता है। यह भी माना जाता है कि स्फूर्त मन से देह में भी उत्साह रहता हैं।  इसका अर्थ यह है कि तन और मन का आपस में स्थाई संबंध जीवन भर रहता है। हमारे दर्शन के अनुसार तो मनुष्य की पहचान व नियंत्रणकर्ता उसका मन ही है। शरीर स्वस्थ रखने के लिये अनेक तरह के उपाय और दवाईयां हैं। कुछ लोग नित व्यायाम भी करते हैं।  मगर मन का व्यायाम कैसे हो? इसका उपाय कोई चिकित्सक, शिक्षक या पेशेवर विद्वान नहीं बता पाता। देह के अंग पकड़कर इधर से उधर घुमाये जा सकते हैं मगर मन को पकड़ना सहज ही नहीं असंभव भी लगता है। यही कारण है कि हमारे देश में आजकल पंचतारा चिकित्सालय तथा विश्वख्यात चिकित्सकों की उपस्थिति के बावजूद स्वास्थ्य का सूचकांक गिरता जा रहा है। संस्कृतनिष्ठ नामों से सुशोभित निजी चिकित्सालय बाहर से स्वर्ग जैसे प्रतीत होते हैं पर जिसमें अस्वस्थ धनिक ही वास करने की पात्रता रखते हैं।
संसार में भौतिकतावाद ने देह के विश्राम के लिये अनेक विलासी साधनों का सृजन किया है पर मन के विश्राम के सारे स्थान नष्ट किये हैं। बाह्यकेंद्रित मनुष्य का मन एकांत में ध्यान साधना की बात सोच भी नहीं सकता। ध्यान वह क्रिया है जो चंचल मन को ठहराव देती है। देह की सूक्ष्म इंद्रियों में इस ठहराव से सुखद अनुभूति होती है मगर माया के कूंऐ का मैंढक मन कभी उससे बाहर निकलना नहीं चाहता। जिन लोगों को मन में संताप है उन्हें ध्यान करना ही चाहिये।  ध्यान से बाह्य स्थिति भले ही प्रत्यक्ष न बदले पर उनके प्रति बदले दृष्टिकोण से मनुष्य में स्थिरता आती है और वह समस्याओं से पार पा सकता है।
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Sunday, July 3, 2016

वैश्विक धार्मिक आतंकवाद के विरुद्ध वैचारिक बहस की आवश्यकता-हिन्दी चिंत्तन लेख (vishwa mein Dharmik aatankwad ke viruddh vaicharik bahas ki jaroorat-Hindi Thought Article

                     हमारे यहां के विद्वान तीन विचारधाराओं के हैं-प्रगतिशील, जनवादी तथा राष्ट्रवादी-जिनकी यह धारणा रही है कि धार्मिक आतंकवाद अशिक्षा, गरीबी तथा बेबसी के कारण युवाओं को अपने जाल में फंसाता है।
ढाका में हमला करने वाले
1. सभ्रांत तथा अमीर घरानों की संताने हैं।
2. सभी उत्कृष्ट शैक्षणिक संस्थानों से उच्च शिक्षा प्राप्त हैं।
3.आधुनिक संचार साधनों के उपयोग में इतना माहिर कि
होटल पर कब्जा करने के बाद सीधे दृश्य अपने चैनल पर भेजे।
हैदराबाद में भी हाल ही में गिरफ्तार युवाओं की स्थिति भी कुछ ऐसी है।
ऐसे में तीनों विचाराधाराओं के विद्वान क्या अपनी यह धारणा बदलेंगे कि आतंकवाद का कारण लोगों की निजी स्थिति नहीं वरन् संकट कहीं न कहीं विश्व के धार्मिक समाजों के अंदर ही वैचारिक संकट का है।
इधर हमारे भारतीय समाज में भी संकट कम नहीं है क्योंकि


1.तीव्र गति से शराब पीकर गाड़ी चलाने वाले धनिक वर्ग के युवा
मार्ग पर चलते सामान्य लोगों को पत्थर या कीड़ा समझते हुए कुचल जाते हैं।
1.मित्र के नाम निम्म वर्ग के युवाओं को गुलाम समझकर चलते है।
3.अपने संरक्षकों के पद, प्रतिष्ठा तथा पैसे की वजह से
कानून को खरीदने का विषय समझते हैं।
4.युवतियों को टाईमपास मानकर उनके साथ संबंध बनाते हैं।
एक अध्यात्मिक साधक के रूप में हमारा मानना है कि
1.शिक्षा में भारत के प्राचीन अध्यात्मिक साहित्य को शामिल करना चाहिये।
2.हिन्दू समाज को समझायें कि वह मुगालते में रहकर
जाति, भाषा, क्षेत्र तथा सामाजिक आधार पर भेदभाव से परे रहे।
3.दहेज, खर्चीली विवाह पंरपरा तथा तेरहवीं की प्रथा से कम से कम दस वर्ष दूर रहे।
4.हिन्दू धर्म के रक्षक बजाय दूसरे समाजों को साथ लेने के
प्रयास करने की बजाय अपने समाज के लोगों को
दैहिक, मानसिक तथा वैचारिक रूप से शक्तिशाली बनाने का काम करें।
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                     ढाका में हमलावार अमीर घरानों के होने के साथ ही शिक्षित भी थे-जनवादी ध्यान दें गरीब व अशिक्षितों से बागी होने का हक भी छीन लिया गया है। अभी तक जनवादी तर्क देते थे कि गरीब लोग बागी होकर बंदूक उठाते हैं। ढाका के हमलावर अमीर घरानों के आतंकियों ने उनका तर्क खारिज किया है। ढाका के आतंकी अमीरों की औलाद व शिक्षित थे-धार्मिक आंतक को गरीब व अशिक्षित से जोड़ने वालों को अब अपने तर्क पर दोबारा सोचना चाहिये। भारत के विद्वानों को ढाका के आतंकियों की शिक्षा व अर्थ की स्थिति देखते हुए अपनी यह राय बदली होगी कि विकास व शिक्षा से धार्मिक आतंक कम होगा।
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                        बंग्लादेश के रेस्टॉरेंट में हुई घटना प्रचारतंत्र के उस लोभ का परिणाम है जिसमें वह सनसनी के प्रचार में विज्ञापन प्रसारण से हिंसा के लाभ देखता है। लगता है कि आतंकी संगठन वसूली के लिये प्रचारतंत्र में नाम चमकाने के लिये हिंसा कराते हैं और कथित बुद्धिमान इस जाल में फंस जाते हैं। जैसे ही कहीं आतंकी हिंसा होती है विश्व भर के प्रचार माध्यम उसका सीधा प्रसारण करने के बाद भी लंबी चौड़ी बहस करते हैं जिससे हिंसक तत्व खुश होते हैं। देखा जाये तो जैसे जैसे प्रचारतंत्र की ताकत बड़ी है आतंकवाद भी उसी गति से बढ़ा है क्योंकि कहीं न कहीं वह इसी से खाद पानी पाता है। प्रचारतंत्र में सक्रिय लोग यदि सतर्कता पूर्वक समाचार व बहस के विषयों का चयन इस तरह करें कि आतंकवादी हतोत्साहित हों तो अच्छा रहेगा।
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Monday, June 20, 2016

21 जून 2016 अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर विशेष लेख(Special article on 21 June International yoga Day)

            कल अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस है। प्रचार माध्यमों के लिये यह दिन उसी तरह ही आय का साधन बन गया है जैसे कि वेलंटाईन डे, मातृपितृदिवस तथा मित्र दिवस आदि। अगर हम इन प्रचार माध्यमों के विशेषज्ञ उद्घोषकों के प्रश्नों पर विचार करें तो अजीब लगता है।  एक उद्घोषक ने एक अतिथि क्रिकेट खिलाड़ी से पूछा-‘क्या जिम से योगा को चुनौती मिल रही है।’
        खिलाड़ी ने जवाब दिया वह तो हमारी समझ में नहीं आया पर दूसरी अतिथि रुपहले पर्दे की अभिनेत्री ने जवाब दिया कि यह दोनों अलग विषय है।
        योगसाधना के आठ भाग हैं-यम, नियम, संयम, प्रत्याहार, आसन, प्राणायाम, ध्यान, धारणा तथा समाधि। हम आजकल प्रचार में जिसे योग बता रहे हैं उसको आसन व प्राणायाम तक सीमित किया गया है। शायद इसका कारण इन दोनों में ही साधक दैहिक रूप से अधिक सक्रिय रहता है जिसका फिल्मांकन ज्यादा आकर्षक लगता है।  जबकि यम, नियम, प्रत्याहार, ध्यान, धारण व समाधि आंतरिक सक्रियता से संभव होती हैं जिसमें साधक की सक्रियता नहीं होती। इस कारण दर्शकों ऐसी क्रियायें नहीं बांध सकती जिससे टीवी चैनल इससे बचते हैं।
        योग साधना के आष्टांग भागों का अभ्यास करने वाला साधक अध्यात्मिक रूप इतना पारंगत हो जाता है कि उसकी बुद्धि कंप्यूटर की तरह स्वतः काम करती है तो मन पालतू होकर उसका दास बन जाता है। वह मन जो मनुष्य का स्वामी होकर इधर से उधर दौड़ाता है वह योग संपन्न बुद्धि का दास बन जाता है। अध्यात्मिक रूप से संपन्न साधक सासंरिक विषयों में दूसरों से अधिक दक्ष होता है। अतः योग साधना का अभ्यास नियमित करें तब इसके महत्व का आभास होगा वरना तो अनेक लोग बिना अभ्यास के इसके महत्व पर चर्चा कर रहे हैं।
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प्रस्तोता-दीपक ‘भारतदीप

Wednesday, June 1, 2016

तूफान की तरह सांस ले रहे सभी शहर-दीपकबापूवाणी (Toofan ki tarah saans le rahe shahar-DeepakBapuWani)

सबकी भलाई का दावा शोरकर जतायें, उगाहें धन पर समाजसेवक कहलायें।
‘दीपकबापू’ तिकड़म से करें अपना काम, बेबस का दिल हमेशा वादे से बहलायें।।
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इंसानी नीयत का पता नहीं चलता, अक्लमंद शब्द के अर्थ से छलता।
‘दीपकबापू’ भावनाओं के  व्यापार में, हर रस सौदे की शक्ल में ढलता।।
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तूफान की तरह सांस ले रहे सभी शहर, हर कदम मिलता हादसे का कहर।
समुद्र मंथन में अमृत पी गये देवता, ‘दीपकबापू’ बनाते नकल में सब जहर।।
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कोई रोये तो तरस आता नहीं, कोई हंसे तो पसंद आता नहीं।
‘दीपकबापू’ हैरान है उन लोगों पर, कोई रस जिनको भाता नहीं।।
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जंगल खा गया इंसान शेर हुए लापता, चालाक लोग करें लोमड़ी जैसी खता।
संसार में छा गया कागज का राज, ‘दीपकबापू’ पत्थरों में ढूंढते अपना पता।।
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लालची का नहीं होता ज्ञान से वास्ता, माया महल ही जाता उसका रास्ता।
‘दीपकबापू’ धर्म दाव पर लगा देते, काम क्रोध लोभ से जो होते बावस्ता।।
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धर्म की रक्षा अर्थ से बताते हैं, ज्ञान से शक्तिशाली धन बताते हैं।
‘दीपकबापू’ पाखंड का जाल बुनकर, भक्तों के भय से कमाते हैं।।
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दिमाग में राजकाज की समझ नहीं है, जहां भीड़ का अंगूठा सहमति वहीं है।
‘दीपकबापू’ दाल रोटी के फेर में फंसे, जहां चूल्हे पर पके घर भी वहीं है।।
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चिड़िया तिनका तिनका चुन बनाती घर, इंसान छत के लिये रहता दर-ब-दर।
‘दीपकबापू’ किश्तों में चलाते जिंदगी, उम्र जंग में गुजरे मिले न चैन की डगर।।
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उत्सव में अब खुशी कहां मिलती है, चम्मच समेटे चावल थाली हिलती है।
‘दीपकबापू’ दिल हो गये पत्थर जैसे, जीभ केवल खाने पर ही पिलती है।।
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पत्थर के बुत पर भले यकीन करना, व्यर्थ है मांस के पुतले याचना करना।
संगीनों के पहरे में अमीर बने राजा, ‘दीपकबापू’ न जाने भभकी से डरना।।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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