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हिंदी मित्र पत्रिका

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Monday, April 21, 2014

धनियों को गरीब की मित्रता रास नहंी आती-रहीम दर्शन पर आधारित चिंत्तन लेख(dhaniyon ko garib ki mitrata ras nahin aatee-rahim darshan)



      एक तरफ कुछ लोगों के पास एकदम सहजता से धन आ रहा है तो दूसरी तरफ अधिकतर लोग भारी परिश्रम के बाद भी वैसी सफलता हासिल नहीं कर पा रहे जिसकी वह अपेक्षा करते हैं। विश्व में राज्य से मुक्त अर्थव्यवस्था ने समाज में अनेक प्रकार के विरोधाभास पैदा किये हैं। कृषि, लघु उद्योग तथा व्यापार में लगे लोगों की संख्या कम होती जा रही है। अधिकतर लोग नौकरियों के लिये कंपनियों की तरफ दौड़े जा रहे हैं। एक तरह से मध्यम वर्ग का दायरा सिमट रहा है। समाज में अधिक अमीरों की संख्या नगण्य मात्रा  जबकि गरीबों की संख्या गुणात्मक रूप से बढ़ रही है।  इन दोनों के बीच सामंजस्य स्थापित करने वाला मध्यम वर्ग जहां संख्यात्मक दृष्टि से सिमटा है वहीं उसका आत्मविश्वास भी कम हुआ है।  वह गरीब कहलाना नहीं चाहता और अमीर बन नहीं पाता।  इतना ही नहीं अपने अस्तित्व के लिय संघर्ष कर रहे लोगों से यह अपेक्षा भी नहीं की जा सकती कि वह समाज में सामंजस्य का वातावरण बनाये।
      भौतिकवाद के चक्कर मे फंसा समाज हार्दिक प्रेम, निष्प्रयोजन मित्रता तथा आदर्श व्यवहार के भाव से परे होता जा रहा है।  देखा जाये तो हमारे देश में जिस तरह धनिकों का भंडार बढ़ने के साथ ही  ही समाज में व्यसन, अपराध तथा शोषण की प्रवृत्ति भी तेजी बढ़ती  जा रही है।  कथित आर्थिक विकास ने नैतिकता का जहां विध्वंस करने के साथ ही अध्यात्मिक ज्ञान की धारा को अवरुद्ध कर दिया है। सबसे बड़ी बात तो यह कि विभिन्न समाजों के बीच ही नहीं बल्कि उनक अंदर ही सद्भाव काम कर दिया है। लोग औपचारिक रूप से आपसी संपर्क तो रखते हैं पर हार्दिक प्रेम का नितांत अभाव है।
कविवर रहीम कहते हैं कि
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रहिमन कीन्ही प्रीति, साहब को भावै नहीं,
जिनके अनगिनत भीत, हमैं, गरीबन को गनै।
     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-धनियों के अनेक मित्र बन जाते हैं। उनको गरीब लोगों से मित्रता करना अच्छा नहीं लगता। बड़े लोगों को छोटे लोगों की प्रीति अच्छी नहीं लगती।
      कंपनी नाम की व्यवस्था ने साहब, सचिव और सहायक का अंतर इस तरह स्थापित किया है कि लगता है कि यह कोई आधुनिक विभाजन है। विभिन्न पदों के लिये होने वाले प्रशिक्षण में यह बता दिया जाता है कि अपने से निचले स्तर के व्यक्ति के साथ समान सबंध स्थापित न करें वरना आपको अपने काम में ही परेशानी उठानी पड़ेगी।  धनिका परिवारों में भी निम्न वर्ग के लोगों को अपना अनुचर मानकर व्यवहार करने के संस्कार स्वाभाविक रूप से ही मिलते हैं।  अमीरों के अनुचर बनने वाले मध्यम और निम्न वर्ग के युवक युवतियों को यह आभास नहीं होता कि उन्हें उच्च वर्ग से हार्दिक प्रेम की आशा नहीं  करनी चाहिये।  जीवन का यथार्थ यही है कि हर बड़ी मछली छोटी को ही खा जाती है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Monday, April 14, 2014

पाखंड अधिक समय तक नहीं चलता रहीम दर्शन पर आधारित चिंत्तन लेख(pakhand adhik samay tak nahin chalta-hindu religion thought based on rahim darshan)



      आधुनिक लोकतंत्र में जहां यह पूरे विश्व में एक अच्छी परंपरा बनी है कि लोग अपने देश, प्रदेश और शहर के लिये राज्य व्यवस्था की देखरेख करने वाले प्रमुख का चयन स्वयं ही कर सकते हैं वही इस तरह की बुरी प्रवृत्ति भी चालाक लोगों में आयी है कि वह जनमानस को अपने पक्ष में करने के लिये अनेक तरह के प्रपंच तथा स्वांग रचते हैं।  अपने प्रचार में वह स्वयं की छवि एक ईमानदार, समझदार तथा उच्च विचारों वाले व्यक्ति की बनाते हैं। इससे प्रभावित होकर लोग उन्हें अपना नायक भी मान लेते हैं पर जब बाद में पता चलता है कि वह तो पद पर बैठने के लिये एक बुत की तरह सज कर आये थे तब उनके प्रति निराशा का भाव पलता है। ऐसा भी देखा गया है कि अनेक लोगों ने अपनी छवि महान नायक की बनाई पर कालांतर में जब भेद खुला तो वह खलनायक कहलाने लगे।
कविवर रहीम कहते हैं कि

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रहिमन ठहरी धूरि की, रही पवन ते पूरि।

गांठ युक्ति की खुलि गई, अंत धूरि की धूरि।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-जिस तरह ठहरी हुई धूल हवा के रहने पर स्थिर नहीं रहती वैसे ही यदि किसी व्यक्ति के कुकृत्य या बुरे विचार का रहस्य खुल जाये तो उसकी सभी निंदा करते हैं।
      चुनावी वैतरणी पार करने के लिये प्रचार की नाव का सहारा सभी लेते हैं।  जो सौम्य व्यक्तित्व के स्वामी हैं उनके प्रति लोग वैसे ही सहृदयता का भाव रखते हैं पर जिनके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है उसके प्रति प्रचार देखकर ही अपना दृष्टिकोण बनाते हैं। यही वजह है कि जिन्होंने अपने जीवन में कोई परमार्थ नहीं किया होता वही उच्च पद की लालसा में प्रचार के माध्यम से अपनी छवि भव्य बनाने का प्रयास करते हैं।  कई बार प्रचार के दौरान ही उनकी पोल खुल जाती है पर अनेक लोग समाज की आंखें बचाकर अपना लक्ष्य ही पा लेते हैं।  ऐसे राजसी पुरुषों का निजी कार्यों तक सीमित रहने के कारण किसी को उनकी स्वार्थ वृत्ति का अनुभव नहीं होता पर सार्वजनिक पदों पर उनका चरित्र जाहिर होने लगता है तब लोग हताश हो जाते हैं।  वैसे तो पूरे विश्व में अनेक छद्म समाज सेवकों ने उच्च पद प्राप्त कर अपनी प्रतिष्ठा गंवाई है पर जिन्होंने बहुत प्रचार से लोकप्रियता अर्जित की पर अपना दायित्व निभाने में नाकाम रहे उन्हें उतने ही बड़े अपमान का भी सामना उनको करना पड़ा।
      उच्च पद पर बैठने का प्रयास करना बुरा नहीं है पर इसके लिये लोगों के साथ कोई ऐसी बात नहीं करना चाहिये जो बाद में निरर्थक सिद्ध हो। न ही ऐसे वादे करना चाहिये जिनको पूरा करना स्वयं को ही संदिग्ध लगे। लोगों को यह बात स्पष्ट रूप से समझाना चाहिये कि उनकी समस्याओं का वह निराकरण का पूरा प्रयास करेंगे। उच्च पद पर आने के बाद ईमानदारी से प्रयास भी करना चाहिये वरना लोगों में निराशा का भाव पैदा होता है जो कालांतर में घृणा में बदल जाता है।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Wednesday, April 9, 2014

महर्षियों ने सुख का त्याग कर ज्ञान का सृजन किया-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख(maharshiyon ne sukh ka tyag kar gyan ka srijan kiya-A hindu religion thought on bhartrihari neeti shatak)



      आमतौर से हर मनुष्य में दूसरों से सम्मान पाने की कामना होती है। इसे राजसी प्रवृत्ति ही माना जाता है। जिनके पास तत्व का ज्ञान है वह कभी किसी से न तो सम्मान पाने की कामना करते हैं न ही अपमान होने पर विचलित होते हैं। जैसे जैसे 2014 के लोकसभा  चुनाव का समय पास आता जा रहा है वैसे टीवी चैनलों तथा समाचार पत्र पत्रिकाओं की खबरों में इससे संबंधित जानकारी दिलचस्प होती जा रही है।  इसमें कोई संदेह नहीं है कि मनुष्य समाज में राजपद की स्थापना की अनिवार्यता की शर्त पूरी करने के लिये सभी नागरिकों को अपनी भागीदारी निभानी ही होगी। कोई जनप्रतिनिधि पद का प्रत्याशी तो  कोई मतदाता के रूप में अपनी भागीदारी निभायेगा।  इसमें कोई संदेह नहीं है कि मतदाताओं को प्रभावित करने के लिये सभी प्रत्याशी अपनी तरह से कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।  सबसे ज्यादा दिलचस्प बात यह है कि इन चुनावों में धर्म के नाम पर कार्यरत कुछ विद्वान इस चुनावी राजनीति में अपने व्यक्तिगत प्रभाव के लिये सक्रिय होना चाहते हैं। पहली बात तो हम यहां यह बता दें कि धर्म से हमारा आशय उच्च आचरण से होता है।  इस आचरण के भी तीन रूप हैं-सात्विक, राजस और तामस।  एक चौथा रूप भी होता है- वह है योगी या सन्यासी- जिसकी चर्चा बहुत कम होती है यह अलग बात है कि धर्म के नाम पर सक्रिय कुछ पेशेवर लोग यही रूप धारण कर समाज में विशेष रंग के कपड़े पहनकर विचरते हैं।
      चुनावी राजनीति में सामान्य लोग भी सक्रिय होते हैं और कहीं न कहीं उन पर भी अन्य की तरह इन विशेष वस्त्रधारी कथित धर्म विशेषज्ञों के प्रति रुझान रहता हैं। चुनावी राजनीति में सक्रिय शिखर पुरुष भी  यह मानकर चलते हैं कि इन कथित धर्म रक्षकों के पास शिष्यों का  एक ऐसा समुदाय रहता है जो चुनाव को प्रभावित कर सकता हैं।  इसलिये अभी तक वह इनके इर्दगिर्द मंडराते थे पर अब तो यह हालत हो गयी है कि अनेक धर्मों के कथित विशेषज्ञ बाकायदा चुनाव मैदान में उतरने के लिये इन शीर्ष पुरुषों से संपर्क रखने लगे हैं। टिकट मिलने पर अपने धर्म की जीत और न मिलने पर संकट बताकर अपने समुदाय को यह समझाने का प्रयास करते हैं कि वह उनके बताये अनुसार मतदान करे।  हमें इस पर आपत्ति नहीं है पर इतना अवश्य कह सकते हैं कि यह राजसी आचरण है।  इसे सत्वगुण या योग से तो कतई नहीं जोड़ा जा सकता है।  जब यह कथित पेशेवर धार्मिक विद्वान यह दावा करते हैं कि उनका आचरण सात्विक है या वह स्वयं सन्यासी हैं तब उनका इस तरह का व्यवहार उनकी निष्ठा पर ही संदेह पैदा करता है।
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि

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रम्यं हर्म्यतलं न किं वसतये श्रव्यं न गवादिकं किंवा प्राणसमासमगमसुखं नवाधिकप्रीतये।

किं तद्भ्रान्तपत्पतङ्गपवनव्यालोलदीपाङ्करच्छायचञ्वलामाकरूय सकलं सन्तो वनान्तं गताः।।

     हिन्दी में भावार्थ-क्या प्राचीन समय में संतों को रहने के लिये सुंदर महल नहीं थे? क्या उनके सुनने के लिये संगीत नहीं था। क्या उन्हें प्राण प्रिय सुंदर स्त्रियों से समागम हृदय को प्रिय नहीं लगता था? जो उन्होंने संसार को गिरते पतंगे के पंखों की हवा से विचलित हुई दीपक का लौ की छाया के समान विचलित मानकर त्याग दिया।
      हमारा मानना है कि आम आदमी की चिंतायें उसके परिवार के इर्दगिर्द ही रहती हैं।  धर्म के नाम पर वह अपने इष्ट की आराधना से अधिक कुछ नहीं करता। अधिक से अधिक अपने आसपास किसी पर विपत्ति होने पर आदमी उसकी सहायता कर अपने सात्विक होने का बोध अवश्य कराता है पर उसमें  हमेशा ही राजसी वृत्तियां ही उपस्थित रहती हैं।  वह इन कथित पेशेवर धार्मिक लोगों को इस डर से सम्मान देता है कि वह कहीं उसे धर्मद्रोही घोषित कर समाज में बदनाम न कर दें। वह इन मध्यस्थों को सर्वशक्तिमान का रूप माने यह सोचना ही भ्रम है। अनेक धर्म के ऐसे व्यवसायी यह जानते हैं इसलिये अपने साथ समाज पर नियंत्रण रखने के लिये दबंग तथा प्रभावशाली लोग साथ लेकर चलते हैं। वह सद्भाव से प्रीति की बजाय भय बिन भये न प्रीति का सिद्धांत मानते हैं।
      समस्या यह है कि श्रीमद्भागवत गीता का कर्म तथा गुण विभाग का ज्ञान आम लोगों को नहीं है । जिनसे वह श्रीगीता ज्ञान ग्रहण करते हैं वह केवल शाब्दिक अर्थ बताते हैं। आज के परिप्रेक्ष्य में यह ज्ञान किस तरह प्रासांगिक है इसकी जानकारी आम लोगों को नहीं है।
 राजनीति एक व्यापक शब्द है जिसका चुनावी राजनीति एक रूप है।  परिवार, रिश्तेदारी, व्यवसाय, नौकरी तथा खेल में भी बिना राजनीति के किसी को सफलता नहीं मिलती। जहां प्रतिफल की आशा है वह अपनायी जाने वाली नीति ही राजनीति है। पहले राजतंत्र था तो राजा अपने जीवन तक बना रहता था पर आजकल लोकतंत्र है और उसमें अदलाबदली होती रहती है। यह अदलाबदली चुनाव से ही होती है।  इस चुनावी राजनीति में धार्मिक पहचान वालों के शामिल होने  पर प्रश्न चिन्ह केवल ज्ञानी ही उठा सकते हैं पर उनको सुनने या पढ़ने वाली भीड़ तो अपने इन्ही शीर्ष पुरुषों के पीछे रहती है इसलिये कोई प्रभाव नहीं होता।
      देखा जाये तो वर्तमान काल में कोई देहधारी मनुष्य  हमारे देश में कोई धार्मिक रूप से लोकप्रिय या जनमानस में प्रतिष्ठत नहीं है। जब तक प्रचार माध्यम सीमित थे तब लोगों के सामने कथित रूप से अनेक महापुरुष विराजमान थे पर धीमे धीमे यह पता लगा कि इनमें बहुत लोग  पाखंडी और व्यापारी हैं। इन लोगों को देखकर हमें प्राचीन महापुरुषों की याद आती है जो सभी सुखों का त्यागकर सत्य की खोज में निकले। उन्होंने ज्ञान प्राप्त कर समाज को चिंत्तन शक्ति प्रदान की। उन्होंने राजसुख का इस तरह त्याग किया कि राजा लोग भी उनके सामने नतमस्तक हो गये।  अब इन नवीन धार्मिक पुरुषों से यह पूछने का साहस कौन कर सकता है कि वह किसलिये राजसी सुखों के चक्कर में पड़े हैं? इससे उनके समाज को कौनसा अध्यात्मिक लाभ होने वाला है? बहरहाल ज्ञान साधकों के लिये चुनावी राजनीति में सक्रिय होने की इन पेशेवर धार्मिक लोगों की कोशिश दिलचस्पी का विषय होती है। 

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Tuesday, April 1, 2014

संत तुलसीदास दर्शन-दूसरे की निंदा कर अपनी कीर्ति बढ़ाने वाले लोग अज्ञानी(sant tulsidas darshan-doosre ki ninda kar apni kirti badhane wale log agyani)




      सामान्य मनुष्य की इंद्रियां अपने समक्ष घटित दृश्य, उपस्थित वस्तु तथा व्यक्ति के साथ ही स्वयं से जुड़े विषय पर ही केंद्रित रहती है। ज्ञान के अभाव में मनुष्य सहजता से बहिर्मुखी रहता है जिस कारण उसे जल्दी ही मानसिक तनाव घेर लेता है। अगर कोई व्यक्ति साधक बनकर योगाभ्यास तथा ज्ञानार्जन का प्रयास करे तो ंअंततः उसकी अंतर्चेतना जाग्रत हो सकती है।  बाहरी विषयों से तब उसका संपर्क सीमित रह जाता है।  बहिर्मुखी  भाव कभी थकावट तो कभी बोरियत का शिकार बनाता है।  यही कारण है कि जिन लोगों के पास धनाभाव है वह अधिक धनी को देखकर उसके प्रति ईर्ष्या पालकर कुंठित होते हुए स्वयं को रोगग्रस्त बना लेते हैं। उसी तरह धनी भी आसपास गरीबी देखकर इस भय से ग्रसित रहता है कि कहीं उसकी संपत्ति पर किसी की वक्रदृष्टि न पड़े। वह अपने वैभव की रक्षा की चिंता में अपनी देह गलाता है। आर्थिक विशेषज्ञ  कहते हैं कि हमारे देश में धनिकों की संख्या बढ़ी है तो स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस बात की जानकारी भी सार्वजनिक रूप से करते हैं कि देश में राजरोगों का प्रकोप बढ़ा है। हमारे समाज में चर्चायें अब अध्यात्म विषय पर कम संसार के भोगों पर अधिक होती है। इससे चिंतायें, ईर्ष्या तथा वैमनस्य का जो भाव बढ़ा है उसका अंाकलन किया जाना चाहिये।
संत तुलसीदास जी कहते हैं कि

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पर सुख संपति देखि सुनि, जरहिं जे लड़ बिनु आगि।

तुलसीतिनके भागते, चलै भलाई भागि।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-दूसरे की सुख और संपत्ति देखकर जलने वाले बिना आग के ही जलते हैं। उनके भाग्य से कल्याण दूर भाग जाता है।

तुलसीके कीरति चहहिं, पर की कीरति खोइ।

तिनके मुंह मस लागिहै, मिटिहि न मरिहै धोइ।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-इस संसार में जो दूसरे की निंदा कर अपनी कीर्ति बढ़ाना चाहते हैं वह अज्ञानी हैं।  उनके मुख पर ऐसी कालिख लगती है वह बहुत धोने पर भी मिटती नहीं है।
     अपनी भौतिक भूख शांत करने के लिये जीवन बिताने वाले लोगों के लिये यह संभव नहीं है कि वह परोपकार का काम करें इसलिये अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिये दूसरे की निंदा करते हैं।  अपनी बड़ी लकीर खींचने की बजाय थूक से दूसरे की खींची लकीर को छोटा करने लगते हैं। यह अलग बात है कि पीठ पीछे ऐसे निंदकों के विरुद्ध भी जनमत बन ही जाता है।  उनके विरुद्ध लोग अधिक अनर्गल प्रलाप करते हैं।  सच बात तो यह है कि अगर अपनी प्रतिष्ठा बनानी है तो हमें वास्तविक रूप से दूसरों की भलाई करने का काम करना चाहिये न कि अपना बखान स्वयं कर हास्य का विषय बने।
      हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार हमारे संकल्प के अनुसार ही हमारे लिये इस संसार का निर्माण होता है इसलिये न केवल अपने तथा परिवार के लिये बल्कि मित्र, पड़ौसी तथा रिश्तेदारों के लिये भी मंगलकामना करना चाहिये। यह संभव नहीं है कि हम अपने लिये तो सुखद भविष्य की कामना करें और दूसरे के अहित का विचार करें। ऐसे में यह उल्टा भी हो सकता है कि आप दूसरे का अनिष्ट सोचें उसका तो भला हो आये पर आपकी मंगल कामना करने की बजाय सुख की बजाय दुख चला आये। इसलिये अपने हृदय में सुविचारों को स्थान देना चाहिये।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Wednesday, March 26, 2014

दूसरे को देखकर जलने से अपना भाग्य रूठता है-तुलसीदास दर्शन के आधार पर चिंत्तन लेखdoosre ko dekhkar jalne se apna bhagya roothta hai-tulsidas darshan par aadharit chinttan lekh)




      सामान्य मनुष्य की इंद्रियां अपने समक्ष घटित दृश्य, उपस्थित वस्तु तथा व्यक्ति के साथ ही स्वयं से जुड़े विषय पर ही केंद्रित रहती है। ज्ञान के अभाव में मनुष्य सहजता से बहिर्मुखी रहता है जिस कारण उसे जल्दी ही मानसिक तनाव घेर लेता है। अगर कोई व्यक्ति साधक बनकर योगाभ्यास तथा ज्ञानार्जन का प्रयास करे तो ंअंततः उसकी अंतर्चेतना जाग्रत हो सकती है।  बाहरी विषयों से तब उसका संपर्क सीमित रह जाता है।  बहिर्मुखी  भाव कभी थकावट तो कभी बोरियत का शिकार बनाता है।  यही कारण है कि जिन लोगों के पास धनाभाव है वह अधिक धनी को देखकर उसके प्रति ईर्ष्या पालकर कुंठित होते हुए स्वयं को रोगग्रस्त बना लेते हैं। उसी तरह धनी भी आसपास गरीबी देखकर इस भय से ग्रसित रहता है कि कहीं उसकी संपत्ति पर किसी की वक्रदृष्टि न पड़े। वह अपने वैभव की रक्षा की चिंता में अपनी देह गलाता है। आर्थिक विशेषज्ञ  कहते हैं कि हमारे देश में धनिकों की संख्या बढ़ी है तो स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस बात की जानकारी भी सार्वजनिक रूप से करते हैं कि देश में राजरोगों का प्रकोप बढ़ा है। हमारे समाज में चर्चायें अब अध्यात्म विषय पर कम संसार के भोगों पर अधिक होती है। इससे चिंतायें, ईर्ष्या तथा वैमनस्य का जो भाव बढ़ा है उसका अंाकलन किया जाना चाहिये।
संत तुलसीदास जी कहते हैं कि

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पर सुख संपति देखि सुनि, जरहिं जे लड़ बिनु आगि।

तुलसीतिनके भागते, चलै भलाई भागि।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-दूसरे की सुख और संपत्ति देखकर जलने वाले बिना आग के ही जलते हैं। उनके भाग्य से कल्याण दूर भाग जाता है।

तुलसीके कीरति चहहिं, पर की कीरति खोइ।

तिनके मुंह मस लागिहै, मिटिहि न मरिहै धोइ।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-इस संसार में जो दूसरे की निंदा कर अपनी कीर्ति बढ़ाना चाहते हैं वह अज्ञानी हैं।  उनके मुख पर ऐसी कालिख लगती है वह बहुत धोने पर भी मिटती नहीं है।
     अपनी भौतिक भूख शांत करने के लिये जीवन बिताने वाले लोगों के लिये यह संभव नहीं है कि वह परोपकार का काम करें इसलिये अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिये दूसरे की निंदा करते हैं।  अपनी बड़ी लकीर खींचने की बजाय थूक से दूसरे की खींची लकीर को छोटा करने लगते हैं। यह अलग बात है कि पीठ पीछे ऐसे निंदकों के विरुद्ध भी जनमत बन ही जाता है।  उनके विरुद्ध लोग अधिक अनर्गल प्रलाप करते हैं।  सच बात तो यह है कि अगर अपनी प्रतिष्ठा बनानी है तो हमें वास्तविक रूप से दूसरों की भलाई करने का काम करना चाहिये न कि अपना बखान स्वयं कर हास्य का विषय बने।
      हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार हमारे संकल्प के अनुसार ही हमारे लिये इस संसार का निर्माण होता है इसलिये न केवल अपने तथा परिवार के लिये बल्कि मित्र, पड़ौसी तथा रिश्तेदारों के लिये भी मंगलकामना करना चाहिये। यह संभव नहीं है कि हम अपने लिये तो सुखद भविष्य की कामना करें और दूसरे के अहित का विचार करें। ऐसे में यह उल्टा भी हो सकता है कि आप दूसरे का अनिष्ट सोचें उसका तो भला हो आये पर आपकी मंगल कामना करने की बजाय सुख की बजाय दुख चला आये। इसलिये अपने हृदय में सुविचारों को स्थान देना चाहिये।

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Saturday, March 22, 2014

सूप जैसा जिसका स्वभाव हो उस पर यकीन न करें-संत कबीर दर्शन(soop jaisa jiska swabhav ho us par yakin n karen-sant kabir darshan)



      हमारे देश में अनेक ऐसे मठाधीश धर्म के नाम पर अपने आश्रमों में महल की तरह व्यवस्था कर उसमें राजा की तरह विराजमान रहते हैं। यही नहीं उनके मुंहलगे कथित शिष्य उनकी सेवा इस तरह करते हैं जैसे कि वह महल के कारिंदे हों। धर्म के प्रतीक रंगों के वस्त्र पहनकर अनेक ऐसे लोग साधु बनकर समाज के पथप्रदर्शक बनने का ठेका लेते हैं जिन्होंने भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों में वर्णित ज्ञान को रट तो लगाया पर धारण न कर उसे विक्रय योग्य विषय बना लिया है।  इतना ही नहीं ऐसे कथित साधु अनेक निंदनीय प्रसंगों में शामिल होकर अपनी प्रतिष्ठा तक गंवा देते हैं मगर फिर भी बेशरमी से अपने विरुद्ध कार्यवाही को हिन्दू धर्म का विरोध में की गयी प्रचारित करते हैं।  इतना ही नहीं प्रचार माध्यमों में बने रहने का उनका मोह उन्हें इतना रहता है कि हर विशेष घटना पर अपनी प्रतिकिया देने के लिये पर्दे पर हमेशा ही अवतरित होने का प्रयास करते हैं। अध्यात्मिक विषयों पर चर्चा कर लोगों को आत्मिक रूप से परिपक्व बनाने की बजाय यह लोभी साधु सांसरिक विषयों में दक्षता प्राप्त करने के हजार नुस्खे बताते हैं।
संत कबीरदास जी कहते हैं कि

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साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय।

सार सार को  गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय।।

      सामान्य हिन्दी में भावार्थ-साधु वही व्यक्ति है जिसका स्वभाव सूप(छाज) की तरह हो। वह केवल ज्ञान की चर्चा करे और व्यर्थ की बातों की उपेक्षा कर दे।

साधु भया तो क्या भया, बोलै नाहिं बिचार।

हतै पराई आतमा, जीभ गाधि तरवार।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-वह साधु नहीं हो सकता जो बिना विचार किये ही सारे काम करता है। वह अपनी जीभ का तलवार की तरह उपयोग कर दूसरे के  आत्मा  को रंज करता है।
      सच्चा साधु वही है जो सहज भाव से आचरण, विचार तथा व्यवहार करता हो। मान और अपमान में समान हो।  इतना ही नहीं किसी भी स्थिति में वह अपनी वाणी को कृपाण की तरह उपयोग न करे।  साधु की सबसे बड़ी पहचान उसकी मधुर वाणी तथा प्रभावशाली चरित्र होता है। हम आजकल ऐसे अनेक कथित साधुओं को देखते हैं जो प्रचार माध्यमों में चेहरा चमकाने के लिये उत्सुक रहते हैं पर यह अलग बात है कि अनेक बार उनका यही मोह तब शत्रु बन जाता है जब उनकी हिंसक, मूर्खतापूर्ण तथा अव्यवहारिक गतिविधियां कैमरे के सामने आ जाती हैं। आज के प्रचार माध्यम इतने शक्तिशाली है कि उनके उपयोग से अनेक व्यवसायिक धर्म के ठेकेदार प्रतिष्ठित हो गये पर अंततः उन्हें बदनामी का बोझ भी इसी वजह से झेलना पड़ा क्योंकि उन्होंने इस शक्ति को समझा नहीं।
      ऐसा नहीं है कि सच्चे साधु इस देश में मिलते नहीं है जिनके गुरु बनाया जा सके। हमारा मानना है कि सच्चे साधु कभी प्रचार के मोह नहंी पड़ता न धर्म की दुकान लगाते हैं। आत्मप्रचार में लगे साधुओं की सबसे बड़ी पहचान यह है कि वह अपने शिष्य बनाने के लिये आओ आओ के नारे उसी तरह लगाते हैं जैसे दुकानदार ग्राहक के लिये लगाते हैं।  उसी तरह जिस तरह फेरीवाले सामान लेकर घर घर जाते हैं वैसे ही कथित साधु अपने शिष्यों के घर जाकर आतिथ्य ग्रहण उनको कृतार्थ करने का ढोंग रचते हैं।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Friday, March 14, 2014

पतंजलि योग विज्ञान-तनाव मुक्ति ध्यान से ही संभव (patanjali yog vigyan-tanav mukti dhyan se hi sambhav)



            इस संसार में मनुष्य के जीवन में क्लेश और प्रसन्नता दोनों ही प्रकार के संयोग बनते बिगड़ते हैं। यह अलग बात है कि सामान्य मनुष्य सुख का समय आने पर सब कुछ भूल जाता है पर जब दुःख का समय आता है तब वह सहायता के लिये इधर उधर ताकता रहता है। क्लेश के समय वह विचलित होता है पर जिन लोगों को योग तथा ज्ञान का अभ्यास निरंतर हो उन्हे कभी भी इस बात की परवाह नहीं होती कि उसका समय अच्छा चल रहा है या बुरा, बल्कि वह हर हालत में सहज बने रहते हैं।
            हमारे देश में पेशेवर योग शिक्षकों ने प्राणायाम तथा योगासनों का प्रचार खूब किया है जिसके लिये वह प्रशंसा के पात्र भी हैं पर ध्यान के प्रति आज भी लोगों में इतना ज्ञान नहीं है जितनी अपेक्षा की जाती है। जिस तरह योगासन के पश्चात् प्राणायाम आवश्यक है उसी तरह ध्यान भी योगसाधना का एक अभिन्न अंग है। यह ध्यान ही मनुष्य की वास्तविक शक्ति होती है जो कि मनुष्य के उस मन पर नियंत्रण करने में सहायक होती है जो प्रत्यक्ष उसकी देह का स्वामी होता है।  हमारे दर्शन के अनुसार अध्यात्म या आत्मा मनुष्य की देह का वास्तविक स्वामी होता है और योग विद्या से अपनी इंद्रियों का उससे संयोग कर जीवन को समझा जा सकता है। योगाभ्यास में ध्यान विद्या में पारंगत होने पर ही समाधि के चरम स्तर तक पहुंचा जा सकता है।

पतंजलि योग साहित्य मे कहा गया है कि

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ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः।

            हिन्दी में भावार्थ-सूक्ष्मावस्था को प्राप्त क्लेश चित्त को अपने कारण में विलीन करने के साधन से नष्ट करना चाहिये।

ध्यानहेयास्तदूवृत्तयः।

            हिन्दी में भावार्थ-उन क्लेशों की वृत्तियां ध्यान से नाश करने योग्य हैं।

            जहां आसन और प्राणायाम प्रातः किये जाते हैं वहीं ध्यान कहीं भी  कभी भी लगाया जा सकता है। जहां अवसर मिले वहीं अपनी बाह्य चक्षुओं को विराम देकर अपनी दृष्टि भृकुटि पर केंद्रित करना चाहिये।  प्रारंभ में सांसरिक विषय मस्तिष्क में विचरण करते हैं तब ऐसा लगता है कि हमारा ध्यान नहीं लग रहा है जब इस पर चिंता किये बिना अंतदृष्टि पर नियंत्रण रखने से धीरे धीरे इस बात का अनुभव होता है कि उन विषयों का विष वहां जलकर नष्ट हो रहा है।  जिस तरह हम मिठाई खायें या करेला, हमारे उदर में वह कचड़े के रूप में ही परिवर्तित होता है।  उसी तरह कोई विषय प्रसन्नता तो कोई  क्लेश उत्पन्न करने वाला होता है, पर दोनों से  अंतर्मन में विष ही पैदा होता है। यह विष कोई भौतिक रूप से नहीं होता इसलिये उसे ध्यान  से ही जलाकर नष्ट किया जा सकता है।  हम विचार करें तो ध्यान के दौरान भी मनुष्य दैहिक अंगों की सक्रियता नहीं होती है। ध्यान अभौतिक होने के साथ ही  मानसिक स्थिति है। विषयों के संसर्ग से उत्पन्न विष ध्यान के माध्यम से जब नष्ट हो जाता है उसके बाद मनुष्य को अपनी देह तथा मन के हल्के होने की  सुखद अनुभूति होने लगती है। उसे ऐसा लगने लगता है जैसे कि जमीन पर चलने की बजाय  उड़ रहा है। देह में स्फूर्ति, मन में सहजता और विचारों में नवीनता का यह आनंद केवल ध्यान से ही मिलता है। ध्यान से मस्तिष्क की नसों में एक ऐसे सुख का आभास होता है जिसे शब्दों में बाहर वर्णन करने की बजाय मनुष्य उसे अनुभव करते रहने में ही आनंद अनुभव करता है। इससे होने वाले सुख की ध्यान करने वाला अपने अभ्यास के आधार पर ही अनुभव कर सकता है। जैसे जैसे यह अभ्यास बढ़ता जाता है वैसे वैसे आनंद की अनुभूति भी बढ़ती है।
            ध्यान की क्रिया से निवृत होने पर जब अपने देह की आंतरिक स्थिति पर दृष्टिपात करें तो पता चलता है कि देह में एक अजीब प्रकार की सहजता है, उससे पूर्व हम ऐसे खड़े थे जैसे कि मुट्ठियां भींची थीं।  मस्तिष्क में जो स्फूर्ति उत्पन्न होती है उससे यह समझा जा सकता है कि उससे पूर्व हमारे अंदर कितना तनाव था।  आजकल लोग भारी तनाव में जीते हैं।  उनको यह मालुम नहीं है कि सहजता होती क्या है? इतना ही नहीं कुछ लोग बाहर से सहज दिखने का प्रयास करते हैं पर मन में उनके भारी तनाव होता है।  मुख्य बात यह है कि हमारा  मस्तिष्क तनावग्रस्त रहता है इसका आभास तभी हो सकता है जब हम ध्यान की क्रिया में लिप्त होकर देखें।
            कार्यस्थल, यात्रा अथवा किसी समारोह में जाने पर हम वहां के वातावरण से अनेक तनाव उत्पन्न करने वाले तत्वों को अंदर समाविष्ट होने से तभी बचा सकते हैं जब ध्यान का अभ्यास तथा उसके परिणाम का ज्ञान हो। अगर हम कहीं काम करते बीच में थोड़ा ध्यान करें तो उसके बाद फिर काम पर लगें तो ऐसा लगता है कि वह अभी शुरु किया है। उस समय अपने अंगों को शिथिल होते देखें।  किसी कार्य में निरंतर लगे रहने पर थकावट हो जाये तो ध्यान लगायें, थोड़ी देर में ऐसा लगेगा कि हमारी देह में नयी स्फूर्ति का संचार हो रहा है। यात्रा में बैठे बैठे बोर हो रहे हैं तो वहां ध्यान लगायें।  किसी समारोह में जायें तो वहां मच रहा शोरशराबा अच्छा लगता है पर उससे हमारे मस्तिष्क में तनाव आता है। ऐसा लग रहा है हम प्रसन्न हो रहें हैं पर कहीं एकांत में जाकर ध्यान लगायें तो पता चलेगा कि हमारे अंदर कहीं तनाव था।
            सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि ध्यान एक आत्मकेंद्रित मनोरंजन का अभौतिक साधन भी है। सामान्य आदमी शहर के महल में रहता हुए बोर होता है  तो उसे गांव की सादगी आकर्षक लगती है। गांव में प्रकृति के करीब रहने वाले व्यक्ति को शहर आकर्षित करते हैं।  आदमी घर में बोर होता है तो कहीं पर्यटन करने चला जाता है।  यह मानव मन ही है जिसे कभी भजन तो कभी गजल सुनना अच्छा लगता है।  इससे चंचल मन कुछ देर बहलता है पर यह एक विषय से दूसरे विषय की तरफ जाने की वह प्रक्रिया है जिससे अध्यात्मिक  असहजता से मुक्ति पाना संभव नहीं है।  ध्यान की क्रिया करने पर सांसरिक विषयों से कुछ समय निवृत्ति की अनुभूति होती है और चित्त में एक नवीनता आती है। वैसे तो अधिकतर व्यवसायिक योग शिक्षक ध्यान की बात करते हैं पर उनका लक्ष्य योगसन और प्राणायाम की क्रियाओं पर ही रहता है।  इस विषय में भारतीय योग संस्थान के शिविरों में निष्काम भाव शिक्षकों ने हमेशा ही अच्छा काम किया है।  कम से कम इस लेखक ने योग विधा में ध्यान का महत्व भारतीय योग संस्थान के शिविरों में जाकर ही समझा है।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Saturday, March 8, 2014

अध्यात्मिक ज्ञानी का मन उसे भटका नहीं सकता-हिंदू धार्मिक चिंतन9adhyamik chinttan-aadmi ka man use bhatka nahin sakta)



      इस समय सर्दी का मौसम चल रहा है। कहने को बसंत ऋतु आ गयी है पर अचानक बर्फबारी होने से शीतलहर का प्रकोप पहले से अधिक हो गया है। ऐसे में बर्फीले पर्यटन स्थलों पर सैलानियों के उमड़ने की खबर आती है तो हैरानी नहीं होती।  हमारे देश में जिंदगी से उकताये लोगों की कमी नहीं है। जिंदगी से वही लोग उकताते हैं जिनके पास पैसा खूब है पर करने के लिये कुछ नही है। गरीब या मध्यम वर्ग के लोगों की जिंदगी का संघर्ष प्रतिदिन चलता है और देखा जाये तो इसमें उनके लिये मनोरंजन भले ही न हो पर दिमाग को व्यस्त रखता है। इसलिये वह अपने मस्तिष्क में ं इधर उधर भागकर मन बहलाने का विचार तक नहीं ला पाते।  दूसरे वह लोग भी उकताये रहते हैं जो सुबह भ्रमण नहीं करते या फिर अपने शहर को ही समझ पाते।  यह विचार इस लेखक के एक मित्र के पर्यटन से लौटने के बाद इस टिप्पणी के बाद उपजे जिसमें उसने कहा कि ‘‘देाा जाये तो बाहर जाकर घूमने से कोई लाभ नहीं है क्योंकि इतना आनंद तो हम अपने शहर में ही लेते है। बाहर जाकर घूमने का तनाव होने के बाद घर लौटने पर हुई थकान से तो यह सीखा जा सकता है।
      देखा जाये तो ठंड हमेशा ही देह की संवेदनक्रिया पर नकारात्मक प्रभाव डालती है यानि नर्वस सिस्टम पर शीत लहर का बुरा प्रभाव होता है।  जुकाम, खांसी और बुखार की संभावना अधिक रहती है।  सर्दी  में स्वेटर, टोपा और हाथ के दास्ताने पहनकर स्कूटर पर रात को निकलना एक तरह से स्वयं स्वीकारी सजा की तरह लगता है।  हमारा घर मुख्य शहर के  बाहरी इलाके में है जहां गर्मी और सर्दी की हवायें अब शरीर को भारी कष्ट देती हैं। अब यह उम्र का परिणाम है या वातावरण प्रदूषित होने से कि हमारा मौसम से संघर्ष होता ही है।  गर्मी में जब शाम को सात बजे घर लौटते हैं तो गर्म हवायें ऐसी लगती हैं जैसे कि भट्टी के पास से निकल रहे हों। अब तो यह लगने लगा है कि कार लें तभी सामान्य रूप से बाहर निकल पाये। दूसरा उपाय यह है कि स्कूटर की बजाय हम ऑटो या पैदल सफर करें।   कहने का अभिप्राय यह है कि अब या तो अमीरों के लिये या फिर गरीबों के लिये ही मौसम रह गया है।  मध्यम वर्ग के लिये वैसा ही संकट है जैसा कि आजकल भारतीय अर्थव्यवस्था की वजह से उसके घर का है।
      उस दिन हम एक दिन के लिये दिल्ली प्रवास पर थे।  वहां ऐसा नहीं लगा कि जैसे कहीं बाहर घूम रहे हैं।  अनेक बार ऐसा लगा कि अपने शहर में ही घूम रहे। सड़कें, घर और मंदिरों को देखकर कोई नया आकर्षण पैदा नहीं हो रहा था।  घर लौटे तब याद आया कि हम दिल्ली से लौटे हैं। तब संत रविदास का यह संदेश ध्यान आया कि मन चंगा तो कठौती में गंगा। सुबह योग साधना और उद्यान का भ्रमण करना की दिनचर्या अगर बाधित हो तो हमारा मन खराब हो जाता है। ऐसे में कहीं बाहर जाना पड़े तो हमारे लिये मनोरंजन का धन ऋण पत्रक बराबर ही रहता है।  एक तरह से कहें तो वह ऋणात्मक यानि माइनस हो जाता है। वैसे देखा जाये तो सरस्वती माता की कृपा होने से जो यह लिखने की कला मिली है उसके आगे कोई भी प्राकृतिक उपहार मूल्यवान नहीं लगता।  हमारे लिये लिखना सत्संग की तरह हो गया है। पहले सत्संग में जाकर जो आनंद मिलता था वह लिखने से मिलता है।  हमने एक सत्संगी के मुख से सुना था कि अपनी घोल तो नशा होय। टीवी पर जब कोई मनोरंजक कार्यक्रम देखते हैं तो लगता है कि वक्त खराब करने की बजाय इंटरनेट पर एक कविता ही लिख डालें।
      हालांकि कहते हैं कि कंप्यूटर का नशा भी बुरा है। हालांकि हमें यह पता है पर फिर भी लगता है कि जायें तो कहां जायें? इससे निजात पाकर फुर्सत हो तो हो ध्यान लगाकर इससे प्राप्त विकृतियों का विध्वंस करते हैं। ध्यान लगाने से  कंप्यूटर से हुई थकान तुरंत फुर्र हो जाती है।  यही कारण है कि हमारा चिंत्तन चलता रहता है उसी से इस बात की अनुभूति  हुई कि इंसान के मन के सौदागर बहुत है और वह विभिन्न विषयों का सृजन इस तरह करते हैं कि किसी को इस बात का पता ही नहीं चले कि सत्य से असत्य की तरफ कैसे जा रहा है?
      अनेक मिलने वाले लोग आकर देश के प्रसिद्ध मंदिरों में चलने का प्रस्ताव देते हैं हम हां तो करते हैं पर मन नहीं करता।  जितने भी प्रसिद्ध सर्वशक्तिमान के रूप हैं उनके बड़े मंदिर हमारे शहर में ही हैं। हम अक्सर वहां जाकर ध्यान लगाकर अपने मन की प्रसन्नता पा ही लेते हैं।  हमारे मित्र लोग जो ऐसे मंदिरों पर चलने के लिये प्रेरित करते हैं दरअसल वह कभी इस तरह अपने अवकाश का उपयोग नहीं करते। अवकाश के दिन भी वह सासंरिक विषयों में उसी तरह समय बिताते हैं तब उनको कहां शांति मिलनी है?
      जब इस तरह का चिंतन हमारे मन में चलता है तब संत रविदास की याद आती है जिन्होंने का मन का विज्ञान बताने वाला यह मंत्र दिया था मन चंगा तो कठौती में गंगा।उनकी जयंती हाल ही में मनायी गयी थी। उनकी यह एक पंक्ति ही संसार का सच बयान कर देती है।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Saturday, March 1, 2014

चाणक्य नीति-वफ़ा और वीरता का गुण श्वान से सीखें (chankya neeti-vfa aur veerta ka gun shwan se seekhen)



      यह विचित्र बात है कि श्वान या कुत्ते को एकदम घटिया पशु कहा जाता है। जब कोई एक व्यक्ति दूसरे  के विरुद्ध क्रुद्ध होकर विषवमन करना हो तो उसे कुत्ता कह कर अपनी भडास निकालता है। इतना ही नहीं अगर किसी व्यक्ति को उत्तेजित करना हो तो उसे भी यही उपाधि दी जाती है।  हालांकि समाज में कुत्ते को पालने वाले हमेशा ही रहे हैं। गांव हो या शहर कुत्ते को लोग पालते हैं। कुत्ते की वफादारी का गुण विश्व विख्यात है पर उसका यह भी गुण है कि थोड़ा मिलने पर भी वह प्रसन्न हो जाता है।  अक्सर कुत्ते सोते मिलते हैं पर जरा आहट होने पर ही वह जाग जाते हैं। इतना ही नहीं जब स्वामी पर संकट हो तो कुत्ता अपनी जान की भी परवाह नहीं करता। 
चाणक्य नीति में कहा गया है कि

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बह्वाशी स्वल्पसन्तुष्टः सुनिद्रो लघुचेतनः।

स्वामिभक्तश्च शुरश्च बडेते श्वानतो गुणाः।।

     हिन्दी में भावार्थ-समय के अनुसार बहुत खाना या कम ही खाने से संतुष्ट हो जाना, अवसर मिले तो खूब सोना पर आहट होते ही जाग जाना तथा वफादारी के साथ ही वीरता का गुण कुत्ते से सीखना चाहिये।
      देखा जाये तो सभी पशु पक्षियों में कोई न कोई गुण होता है पर इंसान उसे अनदेखा कर देता है। इंसानों में सभी बुरे हो नहीं सकते पर यह भी सच है कि स्वाजातीय जीवों के लिये इंसान ही खतरा होता है।  अपराध विशेषज्ञों के अनुसार इंसान के लिये खतरा दूसरे इंसान कम अपने निकटस्थ ज्यादा होते हैं। स्त्रियों के विरुद्ध अपराध उनके करीबी ही ज्यादा करते हैं।  हम जब धोखे की बात करते हैं तो वही देता है जिस पर हम अपना समझकर यकीन करते हैं।  गद्दारी का शिकार आदमी तभी होता है जब वह किसी को मित्र मानकर उसे अपनी गुप्त बातें बताता है।
      अधिकतर लोग अपनी मतलब की वजह से कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। उन्हें मित्र या रिश्ते का ख्याल नहीं आता।  हम स्वयं ऐसा न करें यह अच्छी बात है पर दूसरे पर यकीन करते हुए उसकी पिछली पृष्ठभूमि देखना चाहिये।  हमें अपने जीवन के प्रति सतर्कता बरतना चाहिये और किसी पर दूसरे पर विश्वास करते तो दिखें पर करें नहीं। दूसरी बात यह कि हमें कभी स्वयं किसी से गद्दारी नहीं करना चाहिये। अगर किसी का काम न करना हो तो उससे वादा कभी नहीं करें। जीवन का सिद्धांत यही है कि जैसा व्यवहार आप दूसरे से चाहते हैं वैसा स्वयं ही करें।

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Saturday, February 22, 2014

पतंजलि योग सूत्र के आधार पर चिंत्तन लेख-ध्यान से ही क्लशों का नाश करना संभव(dhyane se hee kleshon ka nash karana sambhav-patanjali yog sootra ke aadhar par chinntan lekh)



      इस संसार में मनुष्य के जीवन में क्लेश और प्रसन्नता दोनों ही प्रकार के संयोग बनते बिगड़ते हैं। यह अलग बात है कि सामान्य मनुष्य सुख का समय आने पर सब कुछ भूल जाता है पर जब दुःख का समय आता है तब वह सहायता के लिये इधर उधर ताकता रहता है। क्लेश के समय वह विचलित होता है पर जिन लोगों को योग तथा ज्ञान का अभ्यास निरंतर हो उन्हे कभी भी इस बात की परवाह नहीं होती कि उसका समय अच्छा चल रहा है या बुरा, बल्कि वह हर हालत में सहज बने रहते हैं।
      हमारे देश में पेशेवर योग शिक्षकों ने प्राणायाम तथा योगासनों का प्रचार खूब किया है जिसके लिये वह प्रशंसा के पात्र भी हैं पर ध्यान के प्रति आज भी लोगों में इतना ज्ञान नहीं है जितनी अपेक्षा की जाती है। यह ध्यान ही मनुष्य की वास्तविक शक्ति होती है जो कि मनुष्य के उस मन पर नियंत्रण करने में सहायक होती है जो प्रत्यक्ष उसकी देह का स्वामी होता है।  हमारे दर्शन के अनुसार अध्यात्म या आत्मा मनुष्य की देह का वास्तविक स्वामी होता है और योग विद्या से अपनी इंद्रियों का उससे संयोग कर जीवन को समझा जा सकता है। योगाभ्यास में ध्यान विद्या में पारंगत होने पर ही समाधि के चरम स्तर तक पहुंचा जा सकता है।

पतंजलि योग साहित्य मे कहा गया है कि

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     हिन्दी में भावार्थ-सूक्ष्मवस्था को प्राप्त क्लेश चित्त को अपने कारण में विलीन करने के साधन से नष्ट करना चाहिये।

ध्यानहेयास्तदूवृत्तयः।

     हिन्दी में भावार्थ-उन क्लेशों की वृत्तियां ध्यान से नाश करने योग्य हैं।

      जहां आसन और प्राणायाम प्रातः किये जाते हैं वहीं ध्यान कहीं भी  कभी भी लगाया जा सकता है। जहां अवसर मिले वहीं अपनी बाह्य चक्षुओं को विराम देकर अपनी दृष्टि भृकुटि पर केंद्रित करना चाहिये।  प्रारंभ में सांसरिक विषय मस्तिष्क में विचरण करते हैं तब ऐसा लगता है कि हमारा ध्यान नहीं लग रहा पर धीरे धीरे इस बात का अनुभव होता है कि उन विषयों का विष वहां जलकर नष्ट हो रहा है।  जिस तरह हम करेला खायें या मिठाई, हमारे उदर में वह कचड़े के रूप में परिवर्तित होता है।  उसी तरह कोई विषय प्रसन्नता देने वाला हो या क्लेश उत्पन्न करने वाला, वह अंतर्मन में विष ही पैदा करता है। यह विष कोई भौतिक रूप से नहीं होता इसलिये उसे ध्यान  से ही जलाकर नष्ट किया जा सकता है।  हम विचार करें तो ध्यान के दौरान भी मनुष्य दैहिक अंगों की सक्रियता नहीं होती। ध्यान अभौतिक या मानसिक स्थिति है। विषयों से संसर्ग उत्पन्न विष ध्यान के माध्यम से जब नष्ट हो जाता है उसके बाद मनुष्य को यह सुखद अनुभूति होने लगती है  उसकी देह एकदम हल्की हो गयी है और वह जैसे उड़ रहा है। मस्तिष्क की नसों में एक ऐसे सुख का आभास होता है जिसे शब्दों में वर्णन करने की बजाय मनुष्य उसे अनुभव करते रहने में ही आनंद अनुभव करता है।

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