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Saturday, February 6, 2016

भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में भेदभाव की दृष्टि रखना अज्ञान का प्रमाण.हिन्दी चिंत्तन लेख (HIndiReligion Messge Based on ShriMadBhagwatGeeta)

भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में भेदभाव की दृष्टि रखना अज्ञान का प्रमाण.हिन्दी चिंत्तन लेख
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              जब धर्म के विषय पर बहस हो और कोई संत वेशधारी उत्तेजित होकर बोलने लगे तो समझ लेना चाहिये कि वह घनघोर अज्ञान के अंधेरे में जीवन व्यतीत कर रहा है। शनिशिंगणापुर विषय पर प्रचार माध्यमों में जमकर बहस चलायी जा रही है। तय बात है कि यह  टीव चैनलों में विज्ञापनों का समय पास करने के लिये हो रहा है। इस बहस में अनेक कथित संत अपनी बात कहने आ रहे है। कथित संत शब्द हमने इसलिये लिखा है क्योंकि वह सन्यासी की वेशभूषा में होते हैं और उसकी गीता में जो ज्ञानी  व्याख्या है वह उसके ठीक विपरीत उनका आचरण होता है। अनेक बार उनकी वाणी से क्रोध से भरे शब्द निकलते हैं जैसे कि किसी के तर्क से उनका सब कुछ छिना जा रहा है। इनमें अनेक अधिक से अधिक कैमरा अपनी तरफ केंद्रिता होता देखने की ऐसी लालच होती है जिससे उनकी वाणी दिग्भ्रमित हो जाती है।
  धर्म की रक्षा में जीवन दाव पर लगाने वाले  यह कथित सन्त सन्यासी कभी अपनी वाणी से स्थिरप्रज्ञ नहीं दिखते जो कि श्रीमद्भागवतगीता के अनुसार ज्ञानी होने का प्रमाण है। भारतीय धर्म की पहचान उसके अध्यात्मिक ज्ञान से है जबकि कथित संत सन्यास कर्मकांडों के प्रचार को ही धार्मिकता का आधार मानते हैं।  श्रीगीता के अनुसार द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ बताया गया है जबकि धर्म के कथित पेशेवर प्रचारक कर्मकांडों से स्वर्ग तथा मोक्ष प्राप्ति का मार्ग बताते हैं कि उनको दान दक्षिणा मिल सके। श्रीमद्भागवत गीता में भक्त तथा भक्ति के तीन प्रकार बताये गये हैं इसलिये ज्ञान साधक समाज में भिन्नता को उसी दृष्टि से देखते हैं।  किसी भक्त की भक्ति के प्रकार पर प्रतिकूल टिप्पणी करना ज्ञानसाधक वर्जित समझते हैं।  महत्वपूर्ण बात यह कि श्रीगीता में यह स्पष्ट किया गया है कि जो भी मनुष्य साधना करेगा वह सुखी रहेगा। जातिए भाषा अथवा लिंग के आधार पर  भिन्नता देखना भक्ति के विषय में अस्वीकार कर दिया गया है।  ऐसे में कर्मकांड से जुड़ी किसी परंपरा में मनुष्य में किसी आधार पर भिन्नता देखी जाती है तो तय बात है कि वह श्रीमद्भागवतगीता में वर्णित समानता के सिद्धांत के विरुद्ध है। ऐसे में अगर कोई सन्यासी या संत शनि शिंगणापुर में नारी प्रवेश का विरोध करता है तो उसके ज्ञान पर प्रश्न जरूर उठेंगे। वैसे संत वेदों व शास्त्रों की बात कर रहे हैं पर उन्हें यह ध्यान रखना चाहिये कि मथुरा मेें जन्मेए वृंदावन में पले फिर द्वारका में जाकर बसे महामना भगवान श्रीकृष्ण ने सारा ज्ञान समेटकर श्रीमद्भागवत गीता में रख दिया था। अगर संत भेदरहित दृष्टि से बोलकर अपना महत्व प्रमाणित करना चाहते हैं तो उन्हें यह याद रखना चाहिये कि इस देश में कर्मयोगियों की संख्या उनसे ज्यादा है जो उनकी बात को काट सकते हैं।

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Thursday, January 14, 2016

ज्ञान के कारण भारत में सहिष्णुता का भाव हमेशा रहा है(Adhyatmik Gyan ki karan Bharat mein sahishnuta ka Bhav hamesha rahaa hai)

                              सऊदी अरब में एक शिया धर्मगुरु को फांसी दी गयी है। अरब देशों में अपने ही धर्म के विचारधारा के आधार पर जितनी शत्रुता दिखती है उससे नहीं लगता कि राज्य प्रबंध में वहां मानवता के नियमों का पालन होता है। आप जरा भारतीय अध्यात्मिक विचारधारा का महान प्रभाव देखिये।  पहले तो हमारे यहां धर्म का आशय मनुष्य के आचरण तथा कर्म के आधार पर लिया जाता है। कहीं कर्म को ही धर्म का नाम दिया जाता है। जैसे ब्राह्मण धर्म, क्षत्रिय धर्म, वैश्य धर्म तथा सेवक या शुद्र धर्म। यही जातियां, वर्ण या व्यवसाय भी कहें जाते हैं। इसे हम सनातन विचारधारा या धर्म की संज्ञा भी देते हैं। दरअसल भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा सत्य पर आधारित है जिसके स्वरूप में  बदलाव कभी नहीं हुआ पर सनातन धर्म के बाद भी यहां बौद्ध, जैन तथा सिख धर्म की धारायें प्रवाहित हुईं। कोई विरोध या धार्मिक द्वंद्व नहीं हुआ। इतना ही नहीं मूल भारतीय ज्ञान तत्व हमेशा ही सभी धाराओं में प्रवाहित देखा गया है।
                             कभी भारत में यह नहीं सुना गया कि यहां उत्पन्न धार्मिक विचारधाराओ के बीच संघर्ष हुआ हो। उससे भी महत्वपूर्ण बात यह कि जिन्हें हिन्दू विचाराधारा वाला माना जाता है वह तो यहां उत्पन्न सभी धर्मों के पवित्र स्थानों में जाने से कभी संकोच नहीं करते। यह अलग बात है कि बाहरी आक्रमणकारियों के साथ आयी विदेशी विचाराधारायें अपने आपसी ही नहीं वरन् आंतरिक द्वंद्व भी यहां साथ लायीं। विदेशी विचाराधारायें सर्वशक्तिमान के एक ही प्रकार के दरबार तथा एक ही किताब में आस्था का प्रचार करती हैं। तत्वज्ञान के नाम पर उनमें कुछ है इसका आभास भी नहीं होता। उन दोनों विचारधाराओं में जड़ता दिखती है जबकि भारतीय अध्यात्मिक विचारधारा समय समय के साथ परिवर्तनों से मिले अनुभवों को संजोकर चलती है।  इसी कारण हमारे यहां धार्मिक संघर्ष कभी नहीं देखे गये जैसे कि विदेशों में देखे जाते हैं।
                             भारत में धार्मिक विषय पर तर्क वितर्क करने का पूर्ण अधिकार है यही कारण है कि यहां कभी धर्म के नाम पर कभी संघर्ष नहीं होते।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Saturday, December 26, 2015

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अचानक लाहौर यात्रा से परेशान होने की जरूरत नहीं(Meaning of Primminister Narendra Modi in Lahore Treval)


                   25 दिसम्बर को भारत के प्रधानमंत्री श्रीनरेंद्र मोदी काबुल यात्रा से अचानक ही पाकिस्तान के लाहौर पहुंच गये। इस यात्रा का कार्यक्रम अचानक बना था। अनेक विशेषज्ञों को इस पर आपत्ति है पर हमारा मानना है कि अब  बदलते समय में विदेश नीति में संपर्क के नये आयाम भी बनाने होंगेे-खासतौर से पाकिस्तान, बांग्लादेश व दक्षिण एशियाई पड़ौसी देशों के विषय में हम अपनी नीति वह नहीं रख सकते जो सीमा से दूर देशों से अपनाते हैं।  पाकिस्तान विश्व का इकलौता ऐसा देश है जिसमें हमारी भाषा जस की तस समझी जाती है। ऐसे में औपचारिकता से हटकर भारत के ऐसी नीति जिससे उसे साधा जा सके। पाकिस्तान में सत्ता नियंत्रण करने वाले जितनी भी संस्थायेें उनसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संपर्क रखना ही होगा भले विदेश नीति की दृष्टि से अनुपयुक्त हो।
                           पता नहीं पाकिस्तान के भारतीय विशेषज्ञ क्या सोचते हैं, पर हमारी राय है कि उसे एक अलग राष्ट्र कहें तो ठीक पर मानना नहीं चाहिये। पाकिस्तान के साथ व्यवहार करते समय ऐसा व्यवहार करना चाहिये कि वह हमारा ही एक प्रदेश है जो चार प्रदेशों से बना है। एक धर्म की छत के नीचे पाकिस्तान एक नहीं रह पाया बल्कि चार संस्कृतियों को जबरन एक दिखाने की कोशिश करते हुए वहां जारी आंतरिक संघर्ष खतरनाक स्थिति में पहूंच गया है। पाकिस्तान के अंदर नागरिक वेश में औपचारिक रूप से प्रवेश कर वहां अपने खुले संपर्क बनाये रखना चाहिये।  हम दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में दखल नहीं देते-यह जुमला कभी पाकिस्तान के विषय में प्रयोग करना ही नहीं चाहिये।  भारत का हित इसमें है कि पाकिस्तान के सिंध, ब्लूचिस्तान, सीमाप्रांत और पंजाब चारों के साथ संपर्क बनायें। 
                           पाकिस्तान भारत का एक भाग है। जिस तरह किसी पिता के आठ बेटे हों और दो घर छोड़कर बाहर रहने लगे तब भी वह उनसे बेफिक्र नहीं रह पाता। उसी तरह भारत भी अपने अलग हो चुके चार प्रांतों को पाकिस्तान नाम की छत के नीचे इस तरह छोड़ नहीं सकता। जो भारतीय रणनीतिकार पाकिस्तान को एक राष्ट्र मानते हैं वह शुतुरमुर्ग हैं जो मानते हैं इससे चैन से बैठा जा सकता है। ब्लूचिस्तान, सिंध वह सीमाप्रांत के लोग स्वयं पाकिस्तान के पंजाब प्रांत का गुलाम समझते हैं। इन प्रांतों के लोग भारत से समर्थन की अपेक्षा करते हैं। उन्हें सीधा समर्थन नहीं दिया जा सकता पर पंजाबी प्रभाव वाली पाकिस्तानी सरकार पर दबाव डाले कि वह यहां के नागरिका संपर्क अन्य प्रंातों तक फैलने में रुकावट न डाले।
पाकिस्तान ने तुर्कमिस्तान से भारत तक गैस पाईप लाईन बिछाने का काम शुरु किया- साठ वर्ष में यह उसका पहला सकारात्मक संदेश है। दूसरा संदेश यह कि वहां के प्रधानमंत्री ने अपने सहयोगियों को निर्देश दिया कि वह भारत विरोधी बयान देना बंद करें। इसके बाद ही भारत के प्रधानमंत्री ने अनौपचारिक रूप से पाकिस्तान की यात्रा का निर्णय लिया होगा।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Saturday, December 12, 2015

परदेस जाकर सुख की कामना करना बेकार-चाणक्य नीति के आधार पर चिंत्तन लेख(Pardes Jakr sukh ki kamna karna bekar(A Spiritual Thought article based on Chankyaniti)


                           पहले तो मनुष्य की पीढ़ियां दर पीढ़ियां ही शहर या गांव में जीवन गुजार देती थीं। आधुनिक युग में संचार, संपर्क तथा परिवहन के आधुनिक साधनों ने उसे मानसिक रूप से  अस्थिर बना दिया है। इसी कारण जहां पहले केवल श्रमिक वर्ग के ही लोग रोजगार के लिये परिगमन करते थे वहीं अब खाये पीये लोगों में भी बाहर जाकर आनंदमय जीवन बिताने का विचार जोर पकड़ता है-जिस स्थान पर सब कुछ मिल रहा है वह उन्हें ढेर सारे दोषों के साथ ही बोरियत देने वाला लगता है-पर्दे की प्रचार पंक्तियां उन्हें दूर के ढोल सुहावने दिखाती हैं।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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अलिस्यं नलिनीदलमध्यगः कमलिनीमकरन्दमदालसः।
विधिवशात्परंदेशमुपागतः कुटाजपुष्परसं बहु मन्यते।।
                           हिन्दी में भावार्थ-भौंरा जब तक कमलिनी के मध्यम रहते हुए पराग से रसपान कर उसके मद में आलसी हो जाता है पर कालवश परदेेश जाने के शौक से अन्य फूलों पर चला जाता  है जिनमें न रस होती न गंध।
                           अध्यात्मिक ज्ञान की कमी के कारण ही संपन्न परिवारों के मस्तिष्क में ऐसी अस्थिरता आई जिसे शब्दों में बयान करना ही कठिन लगता है।  ऐसे लोगों को भारतीयअध्यात्मिक दर्शन का अध्ययन जरूर करना चाहिये। हमारे देश में अनेक लोग अपने बच्चों को बाहर भेजकर यह सोचते हैं कि उनका जीवन धन्य हो गया पर बाद में उन्हें अपना जीवन अकेला गुजारना पड़ता है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Friday, November 27, 2015

संसार से भागने वाले वैरागी की अपेक्षा निष्काम वीतरागी श्रेष्ठ-अष्टावक्र गीता के आधार पर चिंत्तन लेख (Sansar se bhage Ragi se Nishkam Veetragi Shreshth-A Hindu Spritualy Thought based on AshtakraGita)

                           हमारे यहां कथित रूप से अनेक ऐसे सन्यासी हैं जो विषयों का त्यागने की बात  तो करते है पर बड़े बड़े आश्रम बनाने के साथ ही भारी मात्रा में संग्रह भी करते हैं। दरअसल वह भारत के स्वर्णिम अध्यात्मिक ज्ञान के विक्रेता की तरह हैं जिनका  समाज में चेतना लाने से अधिक अपना वैभव जुटाना होता। सन्यास सहज नहीं है यह बात श्रीमद्भागवत गीता में कही गयी है।  यही कारण है कि निष्काम कर्म का सिद्धांत प्रतिपादित किया है जिसमें अपनी दैहिक आवश्यकताओं की सीमा तक विषयों में लिप्त रहने का संदेश है।
अष्टावक्रगीता में कहा गया है कि
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हातुमिच्छति संसारं दुःखजिह्यासया।
वीतरागी हि निर्दुःखस्तस्मिन्नपि न खिद्यति।।
हिन्दी में भावार्थ-रागी पुरुष दुःख से बचने के लिये संसार का त्याग करना चाहता है लेकिन वीतरागी दुःखमुक्त होकर विषयों से जुड़कर भी खेद को प्राप्त नहीं होता।
                           यह अंतिम सत्य है कि कोई भी व्यक्ति बिना कर्म किये नहीं रह सकता है। श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया है कि जो आनंद सांख्ययोगी लेना चाहते हैं वह कर्मयोगी विषयों में अनुराग त्याग कर भी प्राप्त कर सकते हैं। गीता में तो सांख्ययोग को अत्यंत कठिन बताया गया है। यहां तक कि सन्यासी होने पर विषयों के चिंत्तन से मुक्त होना कठिन माना गया है। ज्ञानी मनुष्य इतना ही कर सकता है कि जीवन निर्वाह के लिये विषयों में अपने हित की सीमा तक सक्रिय रहकर अनुराग का त्याग कर दे। यही निष्काम कर्म का सिद्धांत है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Friday, November 20, 2015

स्वर्ग और मोक्ष-हिन्दी कविता(Swarg aur Moksh-Hindi Kavita)


भूखा पेेट एक रोटी से भी भरे
लोभ में चाहे पकवान खाये।

दिल की चाहत अनंत
सोने के पहाड़ पर चढ़े
हीरे का ख्याल सताये।

कहें दीपकबापू समाधि में
स्वर्ग गिरता आकर चरण में
मोक्ष आ जाता शरण में
जाने वही जो लगाये।।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Wednesday, November 11, 2015

हिन्दू राजा अध्यात्मिक प्रेरक होने के कारण ज्यादा लोकप्रिय(Hindu King Most Popular His Spirutual Inspration Hindu Raja Adhyatmik prerak Hone ke kaaran Jyada Lokpriya)


                                   कर्नाटक के टीपू सुल्तान की जयंती मनाने पर विवाद चल रहा है।  प्रश्न यह है कि हमारे देश में अभी इतिहास के राजपुरुषों से चिपक कर क्यों चला जा रहा है। हमारे देश की जनता राजपुरुषों से अधिक अध्यात्मिक ज्ञानी पुरुषों को याद रखती है।  राजाओं को लेकर ज्यादा आकर्षण भारतीयों में नहीं देखा जाता।  राजाओं का कार्यक्षेत्र केवल सांसरिक विषयों तक ही सीमित रहता है।  अच्छे राजा को इतिहास में दर्ज किया जाता है पर उसे अध्यात्मिक प्रतीक नहीं माना जाता।
                                   हमारे यहां आज भी विक्रमादित्य, चंद्रगुप्त तथा अशोक को याद किया जाता है पर अकबर सहित अनेक बादशाह उन जैसी लोकप्रियता नहीं प्राप्त कर सके। इसका कारण यह है कि हिन्दू राजा कहीं न कहीं अध्यात्मिक रूप से भी प्र्रेरक बने जबकि मुगल बादशाहों में यह विषय नहीं दिखाई दिया।  प्रस्तुत है इस विषय पर किये गये ट्विटर।
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                                   हम यहां साफ कर दें कि राम कृष्ण और हनुमान को इस देश के हृदय में जननायक हो सकते हैं टीपु सुल्तान जैसे कई आये और गये।
                                   टीपू सुल्तान जैसे कई राजा आये और गये भारतीय जनमानस में आज भी राम, कृष्ण और हनुमान ही हृदय नायक हैं और रहेंगे। क्या टीपू सुल्तान जैसे राजाओं को इसलिये याद किया जाता है ताकि भारतीय जनमानस से राम, कृष्ण व हनुमान जी का नाम मिटाया जा सके जो सफल नहीं हो सकता।  टीपू सुल्तान भारतीय पहचान का प्रतीक नहीं माना जा सकता है क्योंकि उसकी कोई अध्यात्मिक छवि नहीं है और भारत की विश्व में पहचान उसके प्राचीन महानायकों की वजह से ही है।
                                   समस्त महानुभावों को दीपावली पर हार्दिक बधाई तथा शुभकामनायें। हमेशा ही सभी के  जीवन में प्रसन्नता तथा उत्साह का भाव रहे यही हमारी कामना है।
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Saturday, October 31, 2015

देश के वातावरण पर असली आपकी बात-ट्विटर और फेसबुक पर लिखे संदेश(Desh ka vatavaran par Asli Aap Ki Baat-Message on Twitter &FaceBook)

अब सत्य कहें जो कि विश्व तथा भारत में हो रही घटनाओं पर आधारित है। वह यह कि भारत में वातावरण खराब होने वाली बात यूं ही नहीं दोहराई जा रही है। इसके पीछे कोई  प्रायोजित कार्यक्रम है। हमारे देश में जब इतना भ्रष्टाचार दशकों से रहा है तो साहित्य, कला, फिल्म और अन्य क्षेत्रों में दिये जाने वाले सम्मान उससे अछूते नहीं रह सकते।  तय बात है कि यह सम्मान भी कुछ तय करके लिये और दिये गये होंगे। अब वापसी भी उसी प्रक्रिया का भाग हैं।
                                   इससे देश की विदेशों में प्रतिष्ठा गिरने वाली बात एक तरह से मसखरी ही है। जिस तरह विदेशों में वातावरण है उससे तो विदेशों में यह छवि बन रही होगी कि भारतीय अधिक चेतना वाले हैं जो अपने देश की स्थिति वैसी होने से चिंतित हो रहे हैं जैसी आज विदेशी झेल रहे हैं।
वह बातें जो फेसबुक और ट्विटर पर लिखी गयीं
सम्मान वापसी करने वालों पर चेतन भगत की टिप्पणियों पर उन्हें मसखरा कहा जा रहा है। सच तो यह है कि पूरे देश में सम्मान वापसी का मुद्दा एक मसखरी ही माना जा रहा है। इसलिये मसखरा बनकर ही टिप्पणी की जा सकती है।
देश की मुख्य समस्यायें महंगाई, बेरोजगारी और खराब प्रबंधन हैं। आम लोगों की नज़र में यही मुद्दे हैं जिन पर चर्चा होना चाहिये। मांस खाने का विरोध करना गलत है पर उसके प्रत्युत्तर में सार्वजनिक रूप से खाने का प्रदर्शन करना भी बुरा है।
 देश का वातावरण बिगड़ा नहीं बल्कि बिगड़ जाये इसके प्रयास अधिक हो रहे हैं। ऐसा लगता है कि कुछ लोगों इससे लाभ है।
महंगाई, बेरोजगारी और अन्य मुद्दों पर बोलने से प्रचार नहीं मिलता इसलिये माहौल बिगड़ने की बात कहीं जा रही है।
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Sunday, October 11, 2015

ब्लॉग लेखकों को ज्ञानपीठ सम्मान देना प्रारंभ करें-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन लेख(Give Gyanpith Award to Blog Writter-Hindi Satire Thought Artcel)

                 प्रतिदिन कोई न कोई सम्मानीय अपना सम्मान पुराने सामान की तरह बाहर फैंक रहा है। इससे तो यही लगता है जितने साहित्यक सम्मान देश में बांटे गये हैं उससे तो अगले दस वर्ष तक टीवी चैनलों पर रोज सम्मान वापसी की प्रमुख खबर रहने वाली है।  खासतौर से विशिष्ट रविवार की सामग्री केवल सम्मान वापसी रहने वाली है।  हमारी सलाह है कि अब ज्ञानपीठ तथा अन्य सम्मान सभी भाषाओं के ब्लॉग लेखकों को ही दिया जाना चाहिये जो कभी भी यह वापस नहीं करेंगे और करेंगे तो खबर भी नहीं बनेगी।  अंतर्जाल पर भारत की क्षेत्रीय भाषाओं के ब्लॉग लेखक सक्रिय है।  वह कैसा लिखते हैं यह तो पता नहीं पर यही स्थिति पुराने सम्मानीय लेखकों की भी है। इनमें से अनेक तो ऐसे हैं जिन्हें अपनी भाषा के लोग भी तब जान पाये जब उन्हें सम्मानित किया गया।
                                   हमारी यह सलाह है कि जिस तरह यह लोग अब फनी-इसका मतलब न पूछिये हमें पता नहीं-हो रहे हैं तो उसका मुकाबला भी उनके फन से होना चाहिये।  ब्लॉग भी अब एक किताब की तरह हैं। एक बार सम्मान प्रदान करने वाली संस्था के प्रबंधक भी फनी होकर ब्लॉग लेखकों को ज्ञानीपीठ से सम्मानित कर दें। यही प्रतिक्रियात्मक प्रयास इन पुराने सम्माानीयों के जख्म पर नमक छिड़कने की तरह होगा। एक अध्यात्मिक ज्ञान साधक की दृष्टि से हमारा मानना है कि राजसी कर्म में जस से तस जैसा व्यवहार करना ही चाहिये।  कम से कम हिन्दी में अनेक ऐसे ब्लॉग लेखक हैं जिन्हें हम बहुत काबिल मानते हैं। उन्हें ज्ञानपीठ सम्मान इसलिये भी मिलना चाहिये क्योंकि अंतर्जाल पर हिन्दी उन्हीं की वजह से जमी है। सबसे बड़ी बात यह पुराने सम्मानीय उन्हें दोयम दर्जे का मानते हैं और जब उन्हें ज्ञानपीठ तथा अन्य सम्मान मिलने लगे तो सारी हेकड़ी निकल जायेगी।
                                   हमारा ज्ञानपीठ के लिये कोई दावा नहीं है, यह बात साफ कर देते हैं क्योंकि हमें नहीं लगता कि फन इतना भी स्तरहीन नहीं होना चाहिये कि भन-इसका मतलब भी नहीं पूछिये- लगने लगे। अगर बात जमे तो  गहन चिंत्तन करें नहीं तो व्यंग्य समझकर आगे बढ़ जायें।
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Sunday, October 4, 2015

नेपाल अब भारत की चमचागिरी से नहीं दादागिरी से ही मानेगा-हिन्दी चिंत्तन लेख(Nepal ab Bharat ki chamachagiri se nahin dadagiri se hee manega-hindi thought article)

                                   हमारा अनुमान सही निकला भारत की यूएन में सदस्यता रोकने के लिये चीन नेपाल का मुहरे की तरह इस्तेमाल कर रहा है तभी उसने भारत के विरुद्ध  आवश्यक  सामग्री की आपूर्ति रोकने की शिकायत की है। यूएन में शिकायत करने के बाद भारत अब नेपाल को अपने हाल पर छोड़ दे तभी चीन का मुहरा होने का अर्थ वह समझेगा।
                                   हमने पहले भी उल्लेख किया था कि समुद्रीसीमा न होने से नेपाल को भारतीय सीमा से सामान आपूर्ति की अंतर्राष्ट्रीय बाध्यता है मगर नेपाल इस अधिकार की आड़ में भारतीय जनमानस को अपमानित नहीं कर सकता। इतनी अक्ल नहीं है नेपाली रणनीतिकारों को कि सुविधायें कभी अधिकार के रूप में नहीं मिलती।  चीन यूएन में पाकिस्तान का उपयोग नहीं कर सकता इसलिये नेपाल का कर रहा है मगर भारतीय रणनीतिकार अब आक्रामक मूड में हैं। वह इसकी परवाह नहीं करेंगे कि चीन अब यह तर्क देगा कि भारत की अपनी पड़ौसी से नहीं बनती इसलिये उसे सदस्यता न दी जाये। स्वयं उसके वियतनाम, मंगोलिया और ताइवान से संबंध खराब हैं।  मगर नेपालियों ने भारत से स्थाई बैर ले लिया है यह बात अब समझ लें।
                                   भारत के रणनीतिकार भी यह समझ लें कि उनकी हमारे देश की सामरिक स्थिति इजरायल की तरह ही है।  इजरायल के दुश्मन ही  अप्रत्यक्ष रूप से भारत के दुश्मन बने हुए हैं। हम यह भी देख रहे हैं कि जैसे जैसे भारत संयुक्त राष्ट्र की स्थाई सदस्यता के लिये दावा बढ़ा रहा है वैसे वैसे ही यह सभी दुश्मन मिलकर कश्मीर का मुद्दा भी ज्यादा तेजी से उठा रहे हैं। कोई कमी न रह जाये इसलिये नेपाल को भी भारत का दुश्मन बना दिया है।  मगर जिस तरह इजरायल ताकत के साथ खड़ा हुआ वैसे ही भारत को भी खड़ा रहना चाहिये। नेपाल के लोगों को भी अब यह साफ समझना चाहिये कि हिन्दू धर्म से अलग होने के बाद भारतीय जनमानस में उनके लिये सद्भाव समाप्त हो गया है।  जो  नेपाल के कदम का स्वागत कर रहे हैं वह स्वयं कट्टर धार्मिक राष्ट्र हैं और उन्हें दूसरे देश की धर्मनिरपेक्षता में अपना साम्राज्य फैलाने की सुविधा मिल जाती है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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