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Sunday, July 20, 2014

समाधि में सत्य का अनुभव होता है-पतंजलि योग साहित्य के आधार पर चिन्तन लेख (a hindu hindi religion though based on samadhipad related by patanjali yoga literature and schince)



    भारतीय योग विद्या एक ऐसा विज्ञान है जिसका अभी पूर्ण  विशद अध्ययन किया जाना आवश्यक है। हमारी देह एक है पर उसमें तमाम तरह की हड्डियां और नसें आपस में जुडी हैं  जो उसे धारण करने के साथ ही  संचालित भी करती है। देह को चलाने के लिये बुद्धि के साथ मन भी सक्रिय रहता हैं।  सबसे बड़ी बात यह कि इन सबको धारण करने वाला अदृश्य पुरुष या आत्मा है जो हम स्वयं होते हैं।  योगासन तथा प्राणायाम के बाद जब देह के साथ ही मन विकार रहित हो जाता है तब ध्यान के माध्यम से हम उस परम पुरुष के साथ अपने अंदर साक्षात्कार कर सकते हैं। जब उससे साक्षात्कार होता है तब  पता लगता है कि वह हम स्वयं हैं।  इसके बाद यह आभास होता है कि हमारी बुद्धि और मन प्रथक विषय हैं जिनकी चंचलता के गुण की समझ आने पर जीवन में भटकाव से बचा जा सकता है।  हमारा मन ही हमारी देह का संचालन कर रहा है। इस  तत्व ज्ञान में ध्यान के माध्यम से स्थित होना ही समाधि का सर्वोत्म रूप है। जब किसी साधक को इस तरह की समाधि लगाने का अभ्यास हो जाता है तब वह अपने हृदय के सांसरिक भावों पर नियंत्रण कर लेता है। वह एक दृष्टा के रूप में जीवन में देह को सक्रिय रखते  हुए भी अपने अंदर कर्ता का अहंकार नहीं आने देता।
पतंजलि योग विज्ञान में कहा गया है कि
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सत्तवपुरुषमान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावधिष्ठातृत्वं सर्वज्ञातृत्वं च।।
     हिन्दी मे भावार्थ-बुद्धि और आत्मा के भिन्न होने की अनुभूति का ज्ञान जब समाधि में होता है तब योगी का सभी भावों पर नियंत्रण हो जाता है। वह सर्वज्ञ हो जाता है।
          हमारे देश में भारतीय योग संस्थान से जुड़े अनेक विद्वान शिविरों में जिस तरह से भारतीय योग विज्ञान का  प्रचार कर रहें हैं वह एकदम व्यावहारिक लगता है, पर देखा यह जा  रहा है कि कुछ व्यवसायिक योग शिक्षक अपने आपको ज्ञानी के रूप मे प्रस्तुत कर अध्यात्मिक गुरु के रूप में प्रतिष्ठित होकर समाज में योग को लेख भ्रम फैला रहे हैं। हमें उन पर कोई टिप्पणी नहीं करनी मगर सच यह है उनका लक्ष्य केवल अपने व्यवसायिक हित साधना है| पतंजलि योग साहित्य के आठों भागों का वह सैद्धांतिक आशय पक्ष जानते हैं पर व्यावहारिक अभ्यास का उनको अनुभव नहीं है। हमारा उद्देश्य तो केवल  यह बताना है कि योगासन, प्राणायाम और ध्यान का अभ्यास करने से हमें देह, बुद्धि और मन के शुद्धता की अनुभूति तो होती है पर उसके बाद अपने  दैनिक कार्य करने के दौरान अपने समय का  उचित ढंग से उपयोग  करने का ज्ञान नहीं रहता।  इसके लिये यह जरूरी है कि पतंजलि योग विज्ञान  के आठों भागों का अध्ययन करने के साथ ही समय मिलने पर श्रीमद्भागवत गीता का भी अध्ययन करना चाहिये।  योग विद्या में पारंगत होने के बाद सत्संग में शामिल होने के साथ ही अपने प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन भी अवश्य करें ताकि जिंदगी बुद्धिमानी से गुजरे न कि पेशेवर लोग हमें अध्यात्म के नाम पर बुद्धू  बनायें।
      इस लेख का उद्देश्य आत्मप्रचार नहीं वरन भारतीय योग संस्थान के तत्वावधान में  समय समय पर आयोजित किये गए  शिविरों  योगाभ्यास  तथा वहाँ ख्याति प्राप्त विद्वानों के उद्बोधन से प्राप्त ज्ञान तथां अनुभव को बाटना है| पवित्र संकल्प लेकर योगाभ्यास करने वाले साधकों के संपर्क में आने पर जिस तरह का सुखद अहसास  होता है उसको शब्दों में वर्णित नहीं किया जा सकता पर भारतीय योग विद्या के महान प्रभाव का वर्णन किये बिना नहीं रहा सकता|
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday, July 13, 2014

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-योग्य मंत्रियों से ही राष्ट्र की रक्षा संभव(kautilya ka arthshastra-yogya matriyon se hi rashtra ki raksha sambhav)



      हम जब किसी राष्ट्र की स्थिरता की बात करते हैं तो यह भूल जाते हैं कि उसमें सक्रिय सामाजिक समूहों में भी स्थिरता होना चाहिये।  समाज की  परिवारों  और परिवारों  की स्थिरता व्यक्ति में अंतर्निहित होती है।  हम आज जब देश की स्थिति को देखते हैं तो राष्ट्र की स्थिरता को लेकर भारी चिंत्तायें व्याप्त हैं। इधर हमारे यहां विकास के दावे भी किये जा रहे हैं उधर राष्ट्र में व्याप्त सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक तनावों की चर्चा भी हो रही है। यह विरोधाभास हमारी उन नीतियों का ही परिणाम है जिसमें किसी मनुष्य के लिये  अर्थार्जन ही एक श्रेष्ठ और अंतिम लक्ष्य माना जाता है।  अर्थार्जन में भी केवल पेट की रोटी तक ही सीमित लक्ष्य माना गया है।  यह आज तक समझा नहीं गया कि उदर की भूख की शांत होने के बाद भी मनुष्य ही नहीं पशु पक्षी भी  सीमित नहीं रहते। सभी जीवों मे नरमादा होते हैं और जो कहीं न कहीं अगली पीढ़ी का सृजन करते हैं।  यह कामुक प्रवृत्ति सभी में होती हैं पर मनुष्य को उसके लिये भी अर्थ का सृजन संचय के लिये  करना पड़ता है। पशु पक्षी विवाह पद्धति नहीं अपनाते जबकि मनुष्य को इसे सामाजिक बाध्यता के रूप में स्वीकार करना ही पड़ता है। मनुष्य की संचयी प्रवृत्ति का ऐसे अर्थशास्त्री कतई अध्ययन नहीं करते जिनका लालन पालन धनपति करते हैं।
      हमारे देश के कुछ विद्वान अर्थशास्त्री गरीबी रेखा की सीमा के लिये एक राशि तय करते हैं। उसमें वह मनुष्य के खाने और कपड़े का ही हिसाब रखते हैं। उनका मानना है कि एक मनुष्य को खाने और कपड़े के अलावा जिंदा रहने के लिये कुछ अन्य नहीं चाहिये।  वातानुकूलित कक्षों में उनके इस चिंत्तन को मजाक ही माना जाता है।  वह मनुष्य में व्यापत उस संचयी प्रवृत्ति का आभास होते हुए भी तार्किक नहीं मानते जिसमें वह विश्ेाष अवसरों पर व्यय करने के लिये बाध्य होता है। वह मनुष्य को केवल एक पशु की श्रेणी में रखकर अपनी राय देते हैं।  इस तरह के चिंत्तन ने ही देश की अर्थव्यवस्था को भारी निराशाजनक दौर में पहुंचा दिया है। महंगाई, बेरोजगारी तथा अपराध देश में बढ़ते जा रहे हैं।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि

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जलान्नायुधयन्त्राछृर्य धीरयोधरधिष्ठितं।

निवासाय प्रशस्यन्ते भमुजां भूतिच्छितां।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-जल, अन्न, शस्त्र और यन्त्रों से सम्पन्न, धीर वीर योद्धाओं के साथ ही योग्य मंत्रियों तथा आचार्यों से रक्षित दुर्ग की ही महत्ता होती है।

      एक तरह से हम देश में शुद्ध रूप से पूंजी पर आधारित अर्थव्यवस्था  का एक विकट रूप देख रहे हैं जिसमें मानवीय संवेदनाओं के साथ ही संस्कृति, संस्कार और परंपराओं के निर्वाह की बाध्यता को कोई स्थान नहीं है। सच बात तो यह है कि अमीर और गरीब के बीच स्थित एक समन्वित कड़ी मध्यम वर्ग रहा है जिसकी परवाह किसी को नहीं है।  यह लड़खड़ा रहा है और इससे जो समाज में अस्थिरता का वातावरण है वह अत्यंत चिंत्ताजनक है।  यह वर्ग अन्य दोनों वर्गों की बौद्धिक सहायता करने के साथ ही अपने श्रम के साथ ही सक्रिय भी रहता है।
      हम यहां इस वर्ग के लिये कोई याचना नहीं कर रहे बल्कि इतना कहना चाहते हैं कि देश की स्थिरता में इसी वर्ग का अन्य दोनों की अपेक्षा कहीं अधिक योगदान रहता है। अगर देश में समाज में निजी पूंजी का प्रभाव बढ़ा और मध्यम वर्ग केवल कंपनियों की नौकरी के इर्दगिर्द ही सिमटा तो कालांतर में ऐसे संकट उत्पन्न होंगे जिसकी कल्पना तक हम अभी नहीं कर सकते।  इसलिये देश के आर्थिक रणनीतिकारों को इस तरफ ध्यान जरूर देना चाहिये।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, July 5, 2014

बाल सफेद होने के बावजूद आदमी अज्ञानी रहता है-संत कबीर संदेश(bal safed hone ke bavjood aadmi agyani rahata hai-sant kabir sandesh)



   हमारे देश भारत में जैसे जैसे आर्थिक विकास बढ़ता गया है वैसे ही लोगों में धार्मिक प्रवृत्ति के प्रति अधिक रुझान भी देखा जा रहा है।  सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि कथित रूप से धर्म प्रचार करने वाले न केवल लोगों से चंदा और दान लेते हैं वरन् अपने ज्ञान सुनाने के लिये आधुनिक महंगे तथा अत्यंत तकनीकी साधनों का भरपूर उपयोग भी करते हैं।  सबसे बड़ा ज्ञानी वही है जिसके पास धन है। सबसे प्रभावशाली वह माना जाता है जिसके चरण कमल उच्च पद पर स्थित हैं।  सबसे शक्तिशाली वही है जो अपने बाहुबल का उपयोग कमजोर को दबाने के लिये करता है।  कभी कभी तो यह लगता है कि आधुनिक सभ्यता में शीर्ष पर पहुंचे लोग भौतिक रूप से तो जितने शक्तिशाली हो गये हैं उतने ही मानसिक रूप से कमजोर हुए हैं।  उनका पूरा श्रम, समय तथा चिंत्तन अपनी स्थिति बनाये रखने तक ही सिमट गया है।  यही कारण है कि सामाजिक रूप से बदलाव की बातें सभी करते हैं पर उनके शब्द महत्वहीन ही रहते हैं। यह शक्तिशीली शीर्ष पुरुष समाज के हित का दिखावा केवल इसलिये करते हैं ताकि उनके विरुद्ध लोगों में मन वैमनस्य का भाव बढ़ न जाये।

संत कबीर दास ने कहा है कि
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अहिरन की चोरी करै, करे सुई का का दान
ऊंचा चढि़ कर देखता, केतिक दूर विमान

      संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य अपने जीवन में तमाम तरह के अपराध और चालाकियां कर धन कमाता है पर उसके अनुपात में नगण्य धन दान कर अपने मन में प्रसन्न होते हुए फिर आसमान की ओर दृष्टिपात करता है कि उसको स्वर्ग में ले जाने वाला विमान अभी कितनी दूरी पर रह गया है।

आंखि न देखि बावरा, शब्द सुनै नहिं कान
सिर के केस उज्जल भये, अबहुं निपट अजान

      संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं आंखों से देख नहीं पाता, कानों से शब्द दूर ही  रह जाते हैं और सिर के बाल  सफेद होने के बावजूद भी मनुष्य अज्ञानी रह जाता है  साथ ही माया के जाल में फंसा रहता है।

      हमारे देश आधुनिक समय में अंग्रेजों की सृजित अर्थ, राजकीय, शैक्षिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक व्यवस्था पद्धति का अनुकरण कर रहा है उसके ही एक प्रमुख विद्वान का मानना है कि  कोई भी धनी नहीं बन सकता है-ऐसा मानने वाले बहुत हैं तो हम स्वयं देख भी सकते हैं। धनी होने के बाद समाज में प्रतिष्ठा पाने के मोह से लोग दान करते हैं। कहीं मंदिर में घंटा चढ़ाकर, पंखे या कूलर लगवाकर या बैंच बनवाकर उस पर अपना नाम खुदवाते हैं। एक तीर से दो शिकार-दान भी हो गया और नाम भी हो गया। फिर मान लेते हैं कि उनको स्वर्ग का टिकट मिल गया। यह दान कोई सामान्य वर्ग के व्यक्ति नहीं कर पाते बल्कि जिनके पास तमाम तरह के छल कपट और चालाकियों से अर्जित माया का भंडार है वही करते हैं। उन्होंने इतना धन कमाया होता है कि उसकी गिनती वह स्वयं नहीं कर पाते। अगर वह इस तरह अपने नाम प्रचारित करते हुए दान न करें तो समाज में उनका कोई नाम भी न पहचाने। कई धनपतियों ने अपने मंदिरों के नाम पर ट्रस्ट बनाये हैं। वह मंदिर उनकी निजी संपत्ति होते हैं और वहां कोई इस दावे के साथ प्रविष्ट नहीं हो सकता कि वह सार्वजनिक मंदिर है। इस तरह उनके और कुल का नाम भी दानियों में शुमार हो जाता है और जेब से भी पैसा नहीं जाता। वहां भक्तों का चढ़ावा आता है सो अलग। ऐसे लोग हमेशा इस भ्रम में जीते हैं कि उनको स्वर्ग मिल जायेगा।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Friday, June 27, 2014

ईख के खेत में रसभरा पौधा नहीं होता-रहीम दर्शन पर आधारित चिंत्तन लेख(eekh ke khet mein rasbhara paudya nahin hota-A hindu hindi religion thought based on rahim darshan)



                      हमारे देश में धर्म पर व्याख्यान करना भी एक तरह से पेशा रहा है। यह अलग बात है कि कथित धर्म प्रचारक कभी प्रत्यक्ष रूप से अपने परिश्रम का प्रतिफल शुल्क या मूल्य के रूप में नहीं लेते देखे गये  पर दान दक्षिणा के नाम पर उन्हें इतना मिल जाता है कि वह अपना घर चला ही लेते हैं। अब तो यह देखा जा रहा है कि धार्मिक संगठनों के प्रमुख किसी पूंजीपति  से कम नहीं रह गये।  दवा, कपड़े खानेपीने का सामान तथा पूजा सामग्री बेचने के अलावा अनेक धार्मिक संगठन तीर्थयात्राओं का भी इंतजाम करने लगे हैं। अनेक धार्मिक प्रमुखों के आश्रम राजमहल की तरह हैं तो उनके शिष्यों के आवास भी होटल से कम नहीं होते।
                      हम जिस धर्म को आचरण में लाने पर प्रमाणिक मानते हैं वही वस्तुओं के विक्रय तथा अनेक सेवाओं के लिये एक विज्ञापन की छाप बन गया है। एक तरह से बाज़ार स्वामियों  का एक बहुत बड़ा भाग धर्म की आड़ लेकर व्यापार कर रहा है। यही कारण है कि ऐसा लगता है जैसे हमारा पूरा देश ही धर्ममय हो रहा है पर इधर यह भी दिखाई देता है कि समाज में  नैतिक आचरण भी निरंतर पतन की तरफ जा रहा है। आर्थिक विकास दृष्टि से हम जहां आगे जा रहा है वहीं मानसिक रूप से हमारा समाज पिछड़ रहा है।
कविवर रहीम कहते हैं कि
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रहिमन जो तुम कहत थे, संगति ही गुन होय।
बीच उखारी रसभरा, रस काहै न होय।।
                   सरल हिन्दी में व्याख्या-यह कहना गलत है कि सत्संग का असर मनुष्य पर सदैव अच्छा होता है।  ईख के खेत में उगन वाला रसभरा पौधा कभी रस से नहीं होता है।
                      कहने का अभिप्राय यह है कि हम भौतिक विषयों पर किसी एक सूत्र के आधार पर निर्णय नहीं कर सकते क्योंकि मनुष्य देह जहां प्रत्यक्ष दिखती है वहीं उसमें बैठा मन कभी दिखाई नहीं देता जो कि बंदर की तरह नाचता और नचाता है। मनुष्य मन को धर्म के नाम पर सहजता से भरमाया जा सकता है। वह कब किसी तरह गुलाटी मारेगा इसका कोई तयशुदा सूत्र नहीं है। यही कारण है कि जहां हमारे देश के ऋषि मुनि समाज को हमेशा ही अन्धविश्वास  से दूर रहने की प्रेरणा देते रहे हैं वहीं चालाक लोगों का एक वर्ग कर्मकांडों से समाज को स्वर्ग दिलाने की आड़ में भ्रमित करता रहा है।  आधुनिक समय में पैसे का खेल इस कदर हो गया है कि अनेक प्रकार के आकर्षक धार्मिक स्थान बन गये हैं जो जहां लोग श्रद्धा से कम पर्यटन करने अधिक जाते हैं।  अनेक पर्यटन स्थल तो सर्वशक्तिमान की दरबारों की वजह से ही प्रसिद्ध हैं। वहां भारी भीड़ जुटती है। करोड़ों का चढ़ावा आता है।  आने वाले सभी लोगों को श्रद्धालू और दानी माने तो हमारा पूरा समाज देवत्व का प्रमाण माना जाना चाहिये पर ऐसा है नहीं। देश में व्याप्त भ्रष्टाचारशोषण, महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध, नशेबाजी और सट्टेबाजी को देखें तब लगता है कि यहां असुरों की संख्या भी कम नहीं है।
                      कहने का अभिप्राय यह है कि कथित रूप से धर्म की संगत करने का कोई लाभ तब तक नहीं होता जब तक अपनी नीयत साफ न हो। श्रद्धा के बिना सत्संग में जाने से मन में विचार स्वच्छ नहीं होते और इसके अभाव में मनुष्य का व्यवहार अच्छा नहीं होता।

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Thursday, June 12, 2014

अधिक भोजन करना ठीक नहीं मनु स्मृति पर आधारित चिन्तन लेख (ADHIK BHOJAN KARNA THEEK NAHIN-a HINDU HINDI RELIGION THOUGHT BASED ON MANU SMRITI)



            मनुष्य भोजन, आवास तथा वस्त्र प्राप्त करने के बाद भी संग्रह करता है जबकि पशु पक्षी तथा अन्य जीव अपनी आवश्यकता पूरी होने पर शांत होकर विश्राम करते हैं। मनुष्य जहां के मन की भूख कभी शांत नहीं होती। इतना ही नहीं जब माया का प्रभाव उस पर बढ़ जाये तो वह भोजन तक आराम से नहीं करता।  कहा जाता है कि जब भोजन करें तो मन शांत रखें पर मनुष्य खुशी हो या दुःख अपने मन के भावों को भोजन के वक्त भी जाग्रत रखता है।  आमतौर से ज्ञान तािा योग साधक भोजन को औषधि की तरह ग्रहण करते हैं पर सामान्य मनुष्य भोजन के पेट भरने के साथ जीभ के स्वाद की तृप्ति भी करना चाहते हैं। आजकल तो जीभ के स्वाद के लिये ऐसे पदार्थों को उदरस्थ कर रहे हैं जो न केवल अपाचक हैं वरन् स्वास्थ के लिये हानिकारक भी होते हैं।

मनु स्मृति में कहा गया है कि

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पूजयेदशनं नित्यमद्याच्चैतदकुत्सन्।
दृष्टया हृध्येत्प्रसींदेच्च प्रतिनदेच्य सर्वेशः।


     हिंदी में भावार्थ-थाली में सजकर जैसा भी भोजन प्राप्त हो उसे देखकर अपने मन में प्रसन्नता का भाव लाना चाहिये। ऐसा अच्छा भोजन हमेशा प्राप्त हो यह कामना हृदय में करना चाहिए।

अनारोगयमन्तयुरूयमस्वगर्यं चारिभोजनम्।
अपुण्यं लोकविद्विष्टं तस्मात्त्परिर्जयेत्।।


     हिंदी में भावार्थ- भूख से अधिक भोजन करने से  देह के लिये अस्वास्थ्यकर है। इससे आयु कम होने के साथ ही पुण्य का भी नाश होता है। दूसरे लोग अधिक खाने वाले की निंदा करते या मजाक उड़ाते हैं।
     जब सामने थाली में भोजन आता है तो उसे देखकर हमारे मन में कोई न कोई भाव अवश्य आता है। सब्जी मनपंसद हो तो अच्छा लगता है और न हो तो निराशा घेर लेती है। भोजन पसंद का न होने पर परोसने वाला कोई बाहर का आदमी हो तो हम उससे कुछ नहीं कहते पर मन में उपजा वितृष्णा का भाव उस भोजन से मिलने वाले अमृत को विष तो बना ही देता है। घर का आदमी या पुरुष हो तो हम उसे डांटफटकार देते हैं और इससे उसी भोजन को विषप्रद बना देते हैं जो अमृत देने वाला होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि मन के भावों से भोजन से मिलने वाली ऊर्जा का स्वरूप निर्धारित होता है।
     भोजन खाते समय केवल उसी पर ध्यान रखना चाहिये। न तो उस समय किसी से बात करना चाहिये और न ही मन में अन्य विचार लाना चाहिये। इससे भोजन सुपाच्य हो जाता है। चिकित्साविज्ञान ने अब इस बात की पुष्टि कर दी है कि भोजन करते समय तनाव रहित व्यक्ति विकार रहित भी हो जाते हैं।
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Wednesday, June 4, 2014

धन की उष्णता के अभाव में आदमी उत्साहहीन हो जाता है-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन (dhan ke abhav aadmi utsahrahit ho jaata hai-A hindi hindu religion message based on bhartrihari policiy century)



      मनुष्य समुदाय इस धरतीपर सदियों से सांस ले रहा है। यह मानना गलत है कि उसके मूल स्वमभाव में कोई अधिक अंतर आया है। जिस तरत अन्य जीवों-पक्षू, पक्षियों तथा जलचरों का मूल स्वभाव नहीं  बदला उसी तरह मनुष्य के रहन सहन तथा खान पान की आदतें भले ही बदली हों पर उसके विचार, चिंत्तन तथा व्यवहार में कोई अंतर न आया है न आयेगा। हम अगर अपने पौराणिक ग्रथों का अध्ययन करने तो इस बात का आभास होता है कि मनुष्य समाज आज भी वैसा ही है जैसा पहले था।  इसलिये ही उनमें व्याप्त संदेश आज भी प्रासंगिक माने जाते हैं।

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि

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यसयास्ति वित्तं स नरः कुलीन स पण्डित स श्रुतवान्गुणज्ञः।

स एव वक्ता स च दर्शनीयः।

सर्वे गुणा कांचनमाश्रयन्ति।।


     हिन्दी में भावार्थ-जिस मनुष्य के पास माया का भंडार उसे ही कुलीन, ज्ञानी, गुणवान माना जाता है। वही आकर्षक है। स्पष्टतः सभी के गुणों का आंकलन उसके धन के आधार पर किया जाता है।

तानीन्द्रियाण्यविकलानि तदेव नाम सा बुद्धिप्रतिहता वचनं तदेव।

अर्थोष्मणा विरहितः पुरुष क्षणेन सोऽप्यन्य एव भवतीति विचित्रमेतत्।।

     हिन्दी में भावार्थ-एक जैसी इंद्रियां, एक जैसा नाम और काम, एक ही जैसी बुद्धि और वाणी पर फिर भी जब आदमी धन की गरमी से क्षण भर में रहित हो जाता है तब उसकी स्थिति बदल जाती  है। इस धन की बहुत विचित्र महिमा है।

     यह समाज भर्तृहरि महाराज के समय में भी था और आज भी है। हम बेकार में परेशान होकर कहते हैं कि आजकल का जमाना खराब हो गया है।सच बात तो यह है कि सामान्य मनुष्य की प्रवृत्तियां ही ऐसी है कि वह केवल भौतिक उपलब्धियां देखकर ही दूसरे के गुणों का आंकलन  करता है। इधर गुणवान मनुष्य अपने अंदर गुणों का संचय करते हुए इतना ज्ञानी हो जाता है कि वह इस बात को समझ लेता है कि धन से नहीं वरन गुणों से  ही उसके जीवन की रक्षा होगी। इसलिये वह समाज में प्रतिष्ठा अर्जित करने के लिये कोई अधिक प्रयास नहीं करता। उधर अल्पज्ञानी और ढोंगी लोग थोड़ा पढ़लिखकर सामान्य व्यक्तियों के सामने अपनी चालाकियों के सहारे उन्हीं से धन वसूल कर प्रतिष्ठित भी हो जाते हैं। यह अलग बात है कि इतिहास हमेशा ही उन्हीं महान लोगों को अपने पन्नों में दर्ज करता है जिन्होंने अपने गुणों से वास्तव में समाज को प्रभावित किया जाता है।
      इसका एक दूसरा पहलू भी है। अगर हमारे पास अधिक धन नहीं है तो इस बात की परवाह नहीं करना चाहिए। समाज के सामान्य लोगों की संकीर्ण मानसिकता का विचार करके अपने सम्मान और असम्मान की उपेक्षा कर देना चाहिए।  जिसके पास धन है उसे सभी मानेंगे। आप अच्छे लेखक, कवि, चित्रकार या कलाकार हैं पर उसकी अगर भौतिक उपलब्धि नहीं होती तो फिर सम्मान की आशा न करें। इतना ही नहीं अगर आप परोपकार के काम में लगे हैं तब भी यह आशा न करें  कि बिना दिखावे अथवा विज्ञापन के आपको कोई सम्मान करेगा। सम्मान या असम्मान से उपेक्षा करने के बाद आपके अंदर एक आत्मविश्वास पैदा होगा जिससे जीवन में अधिक आनंद प्राप्त कर सकेंगे।

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Saturday, May 17, 2014

मनुष्य अपनी आदत के अनुसार रस और विष ग्रहण करता है-तुलसीदास के दर्शन के आधार पर चिंत्तन लेख(manush apni adat ke anusha ras aur vish chunta hai-A hindi religion thouhg based on tulsidas darshan)



            पूरे विश्व में उपभोग संस्कृति का प्रभाव बढ़ रहा है। धार्मिक गुरु तथा समाज चिंत्तक भले ही अपने समाजों के सांस्कृतिक, धार्मिक तथा श्रेष्ठ होने का दावा भले करें पर सच यह है कि अध्यात्मिक दृष्टि से लोगों की चेतना का एक तरह से हरण हो गया है।  स्थिति यह हो गयाी है कि विषयों में  अधिक लोग इस तरह लिप्त हो गये हैं कि उनकी वजह से जो दैहिक, मानसिक तथा शारीरिक विकार पैदा हो रहे हैं उनका आंकलन कोई नहीं कर रहा।  अनेक लोगों के पास ढेर सारा धन है पर उनका पाचन क्रिया तंत्र ध्वस्त हो गया है।  महंगी दवाईयां उनकी सहायक बन रही हैं। दूसरी बात यह है कि जिसके पास धन है वह स्वतः कभी किसी अभियान पर दैहिक तथा मानसिक बीमारी के कारण समाज का सहयोग नहीं कर सकता। उसके पास देने के लिये बस धन होता है। जहां समाज को शारीरिक तथा मानसिक सहायता की आवश्यकता होती है वह मध्यम तथा निम्न वर्ग का आदमी ही काम आ सकता है।
            अनेक लोग धन के मद में ऐसे वस्त्र पहनते हैं जो उनकी छवि के अनुरूप नहीं होते। उसी तरह औषधियों का निरंतर सेवन करने से  उनकी रोगप्रतिरोधक क्षमता का हृास हो जाता है। यहां तक कि अनेक लोगों को सामान्य जल भी बैरी हो जाता है। अनेक बीमारियों में चिकित्सक कम पानी पीने की सलाह देते हैं।  अधिक दवाईयों का सेवन भी उनके लिये एक तरह से दुर्योग बन जाता है।    
संत तुलसीदास कहते हैं कि
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ग्रह भेषज जल पवन पट, पाइ कुजोग सुजोग।
होहिं कुबस्तु सुबस्तु जग, लखहिं सुलच्छन लोग।।
            सामान्य हिन्दी में भावार्थ-ग्रह, वेशभूषा, पानी, वायु तथा औषधि समय अनुसार दुर्योग तथा संयोग बनाते हैं।
जो जो जेहि जेहि रस मगन, तहं सो मुदित मन मानि
रसगुन दोष बिचारियो, रसिक रीति पहिचानि।।
            सामान्य हिन्दी में भावार्थ-प्रत्येक मनुष्य अपने स्वभाव के अनुसार संसार के विषयों के रस में मग्न रहता है। उसे उसके रस के दोषों के प्रभाव को नहीं जानते। इसके विपरीत ज्ञानी लोग रसों के गुण दोष को पहचानते हुए ही आनंद उठाते है। एक तरह से ज्ञानी ही सच्चे रसिक होते हैं।
            जिन लोगों की भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में रुचि है वह जानते हैं कि हर विषय के उपभोग की सीमा होती है।  अति हमेंशा वर्जित मानी जाती है। योग और ज्ञान साधना का नियमित अभ्यास करने वाले जानते हैं कि सांसरिक विषयों में जब अमृत का आभास होता है तो बाद में परिवर्तित होकर विष बन जाते हैं जिसे योग तथा ज्ञान साधना से ही नष्ट किया जा सकता है। यही कारण है कि जब विश्व में उपभोग संस्कृति से जो दैहिक, मानसिक तथा वैचारिक विकारों का प्रभाव बढ़ा है तब भारतीय योग साधना तथा श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों की चर्चा हो रही है क्योंकि अमृत से विष बने सांसरिक विषयों के रस को जला देने की कला इन्हीं में वर्णित है।


संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Sunday, May 11, 2014

अधम की सेवा कभी न करें-मनुस्मृति के आधार पर हिन्दी चिंत्तन लेख(adham ke sewa kabhi na kareh-A hindu religion thought mased on manu smriti)



        हमारे देश में ज्योतिष, काला जादू तथा तंत्र मंत्र की आड़ में  लोगों को सांसरिक विषयों में सफलता दिलाने के लिये कथित रूप से अनेक व्यवसायिक धार्मिक ठेकेदार सक्रिय हैं। सच बात तो यह है कि सांसरिक विषयों में लिप्त रहते हुए नैतिक आचरण करना ही धर्म है पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि हम अपने महान धर्मभीरु होने का दावा करते हुए गाते फिरें।  दूसरी बात यह कि कथित रूप से जो गुरु या संत सांसरिक विषयों पर बोलते हैं उनको धर्म का प्रवर्तक मानना ही गलत है।  उससे ज्यादा बुरी बात यह है कि खांस वस्त्रों को पहनकर घूमने वाले लोगों को संबंधित धर्म का ज्ञानी मानना एकदम मूर्खता है।  अगर भेड़ की खाल पहनकर भेड़िया शाकाहारी होने का स्वांग करे और  कोई हिरण मान ले तो मूर्ख ही कहा जाता  है। यही स्थिति मनुष्य की है। वह किसी भी कथित धर्म प्रचारक के मुख से अच्छी बातें सुनकर उसे संत या सन्यासी मानने लगता है।  इसी कारण अनेक लोग ज्ञान के व्यवसायिक प्रचारकों को ही गुरु मानने लगते हैं। हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं है वरन् उसे धारण कर जीवन में उतारना ही पूर्ण ज्ञानी होने का प्रमाण होता है।
                        इस बात को अनेक  लोग नहीं समझते और ज्ञान की बातें सुनाने वालों को संत कहने लगते हैं। यही कारण है कि अनेक लोगों ने धर्म के नाम पर हमारे देश में अपना व्यापार चला रखा है।  इन लोगों में धन कमाने की प्रवृत्तियां किसी सामान्य मनुष्य से अधिक खतरनाक ढंग से विद्यमान देखी जाती है। 
मनस्मृति में कहा गया है कि

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अकर्मशीलं च महाशनं च लोकद्विष्टं महुमायं नृशंसम्।

अदेशकालज्ञमनिष्टवेषमेतान् गृहे न प्रतिवासयेत्।।

                        हिन्दी में भावार्थ-अकर्मण्य, अधिक भोजन करने वाले, सबसे बैर बांधने वाले, मायावी, क्रूर, देशकाल का ज्ञान न रखने वाले, निन्दित वेश धारण वाले मनुष्यों को कभी अपनी घर में नहीं  ठहराये।

संक्लिष्टकर्माणमतिप्रमादं नित्यानृतं चाटृढभक्तिकं च।

विसृष्टरागं पटमानिन्र चाप्येतान् न सेवेत नराधमान् षट्।।

                        हिन्दी में भावार्थ-क्लेश करने वाला, अत्यंत प्रमादी, झूठ बोलने वाला, अस्थिर भक्ति वाला, स्नेह से रहित तथा अपने को ही चतुर मानने वाला, यह छह प्रकार के लोग अधम माने जाते हैं। इनकी सेवा कतई न करें।
                        कभी कभी तो यह लगता है कि धर्म के नाम पर व्यापार चलाने वाले उतने ही खतरनाक है जितना अफीम बेचने वाले लोग होते हैं।  हमने देखा है कि मादक द्रव्य बेचने में लगे लोग अपने ही स्वाजातीय व्यवसायियों के विरुद्ध हिंसक गतिविधियां करते हैं। ऐसे ही धर्म व्यवसायियों के कारण प्रसिद्ध अर्थशास्त्री कार्ल मार्क्स से धर्म को अफीम कहा था।  हम उसके कथित अर्थशास्त्र के सिद्धांतों से सहमत हों या न हों पर भारत के संदर्भ में उसका धर्म को अफीम मानने का सिद्धांत एकदम सही लगता है।  अनेक बार तो ऐसा लगता है कि धर्म का व्यापार करने वाले यह लोग अधर्म की राह पर चलते हुए शक्ति, संपत्ति तथा शिष्य संग्रह कर अपनी ताकत इसलिये बढ़ाते हैं ताकि राजकीय संस्थाओं पर प्रभाव जमाया जा सके।  ऐसे लोगों की सेवा करना या उनकी भक्ति में लगे रहने से मन के कलुषित होने का भय रहता है।
                        हमारे यहां कहा भी जाता है कि भक्ति भगवान की करो किसी बंदे को भजना ठीक नहीं है। कथित गुरुओं की व्यवसायिक चालाकियों के चलते अनेक लोग फंस कर भगवान की बजाय अपने कथित गुरुओं  को ही भगवान मानने लगते हैं। जब उनको अपने गुरु की असलियत पता चलती है तो उनके अंदर निराशा और तनाव का ज्वार उठने लगता है। अनेक कथित गुरु अपने सत्संग में चुटकुले और अपनी कल्पित कहानियां सुनाकर हास्य का भाव भी पैदा करते हैं। अपने शिष्य समुदाय को बनाये रखने के लिये अनेक प्रकार के स्वांग भी रचते हैं।  कहना चाहिये कि वह धर्म के नाम पर अभिनय करते हैं। जब पोल खुलती है तब शिष्य अपने को एक अंधेरे कुंऐं में गिरा अनुभव करते हैं।
                        जिन लोगों के अंदर अध्यात्मिक ज्ञान की ललक है उनको गुरु ढूंढने की बजाय अपने ही अध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिये।  हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार कोई भोग कभी किसी का उद्धार नहीं कर सकता। यह शक्ति केवल त्यागी भाव के गुरु में ही संभव है जिसकी पहचान यह होती है कि वह जहां खड़ा हो जाये वहीं आश्रम लगने लगे। जब बोले तो लगे कि अमृतवाणी प्रवाहित हो रही है। वह संपत्ति और शिष्य संचय की बजाय सर्वजन हिताय के भाव से समाज में सलंग्न रहता है।   

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Saturday, May 10, 2014

दूसरे से जलने वाले का भाग्य रूठ जाता है-तुलसीदास दर्शन पर आधारित चिंत्तन लेख(doosre se jalane wale ka bhag rooth jaata-A hindi religion thought basen on tulsidas darshan)




      सामान्य मनुष्य की इंद्रियां अपने समक्ष घटित दृश्य, उपस्थित वस्तु तथा व्यक्ति के साथ ही स्वयं से जुड़े विषय पर ही केंद्रित रहती है। ज्ञान के अभाव में मनुष्य सहजता से बहिर्मुखी रहता है जिस कारण उसे जल्दी ही मानसिक तनाव घेर लेता है। अगर कोई व्यक्ति साधक बनकर योगाभ्यास तथा ज्ञानार्जन का प्रयास करे तो ंअंततः उसकी अंतर्चेतना जाग्रत हो सकती है।  बाहरी विषयों से तब उसका संपर्क सीमित रह जाता है।  बहिर्मुखी  भाव कभी थकावट तो कभी बोरियत का शिकार बनाता है।  यही कारण है कि जिन लोगों के पास धनाभाव है वह अधिक धनी को देखकर उसके प्रति ईर्ष्या पालकर कुंठित होते हुए स्वयं को रोगग्रस्त बना लेते हैं। उसी तरह धनी भी आसपास गरीबी देखकर इस भय से ग्रसित रहता है कि कहीं उसकी संपत्ति पर किसी की वक्रदृष्टि न पड़े। वह अपने वैभव की रक्षा की चिंता में अपनी देह गलाता है। आर्थिक विशेषज्ञ  कहते हैं कि हमारे देश में धनिकों की संख्या बढ़ी है तो स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस बात की जानकारी भी सार्वजनिक रूप से करते हैं कि देश में राजरोगों का प्रकोप बढ़ा है। हमारे समाज में चर्चायें अब अध्यात्म विषय पर कम संसार के भोगों पर अधिक होती है। इससे चिंतायें, ईर्ष्या तथा वैमनस्य का जो भाव बढ़ा है उसका अंाकलन किया जाना चाहिये।
संत तुलसीदास जी कहते हैं कि

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पर सुख संपति देखि सुनि, जरहिं जे लड़ बिनु आगि।

तुलसीतिनके भागते, चलै भलाई भागि।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-दूसरे की सुख और संपत्ति देखकर जलने वाले बिना आग के ही जलते हैं। उनके भाग्य से कल्याण दूर भाग जाता है।

तुलसीके कीरति चहहिं, पर की कीरति खोइ।

तिनके मुंह मस लागिहै, मिटिहि न मरिहै धोइ।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-इस संसार में जो दूसरे की निंदा कर अपनी कीर्ति बढ़ाना चाहते हैं वह अज्ञानी हैं।  उनके मुख पर ऐसी कालिख लगती है वह बहुत धोने पर भी मिटती नहीं है।
     अपनी भौतिक भूख शांत करने के लिये जीवन बिताने वाले लोगों के लिये यह संभव नहीं है कि वह परोपकार का काम करें इसलिये अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिये दूसरे की निंदा करते हैं।  अपनी बड़ी लकीर खींचने की बजाय थूक से दूसरे की खींची लकीर को छोटा करने लगते हैं। यह अलग बात है कि पीठ पीछे ऐसे निंदकों के विरुद्ध भी जनमत बन ही जाता है।  उनके विरुद्ध लोग अधिक अनर्गल प्रलाप करते हैं।  सच बात तो यह है कि अगर अपनी प्रतिष्ठा बनानी है तो हमें वास्तविक रूप से दूसरों की भलाई करने का काम करना चाहिये न कि अपना बखान स्वयं कर हास्य का विषय बने।
      हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार हमारे संकल्प के अनुसार ही हमारे लिये इस संसार का निर्माण होता है इसलिये न केवल अपने तथा परिवार के लिये बल्कि मित्र, पड़ौसी तथा रिश्तेदारों के लिये भी मंगलकामना करना चाहिये। यह संभव नहीं है कि हम अपने लिये तो सुखद भविष्य की कामना करें और दूसरे के अहित का विचार करें। ऐसे में यह उल्टा भी हो सकता है कि आप दूसरे का अनिष्ट सोचें उसका तो भला हो आये पर आपकी मंगल कामना करने की बजाय सुख की बजाय दुख चला आये। इसलिये अपने हृदय में सुविचारों को स्थान देना चाहिये।

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Saturday, April 26, 2014

मूर्ख को इच्छापूर्ति कर ही जीता जा सकता है-चाणक्य नीति पर आधारित चिंत्तन लेख(murkh ko ichchhapoorti ka hee jita ja sakta hai-a hindu religion thought based on chankya policy)



      मनुष्य जीवन में सभी के सामने अनेक प्रकार के अन्य मनुष्य, विषय तथा प्रसंग आते हैं।  जब हमें किसी के समक्ष अपनी बात कहनी है तो पहले उसके व्यक्तित्व का मापतौल करना चाहिये।  किसी भी  व्यक्ति की प्रकृत्ति, विचार, छवि तथा गुणों को ध्यान में रखते हुए व्यवहार करना चाहिये।  सामान्यतः लोग अपनी बात कहने के लिये आतुर रहते हैं पर उनको इसका ज्ञान नहीं रहता कि किसके समक्ष कौनसी बात किस प्रकार कहना चाहिये।  कहना भी चाहिये कि नहीं!  साथ ही जब हम किसी दूसरे व्यक्ति से व्यवहार करते हैं तो यह नहीं  देखते कि  उसकी योग्यता और आचरण किस योग्य है?
      हम जीवन में दूसरे लोगों से अपेक्षाऐं करते हैं तो दूसरे भी हमसे अपनी अर्थपूर्ति के लिये अपनी दृष्टि रखा करते हैं।  आमतौर से लोग राजसी कर्म के लिये राजसी बुद्धि से एकदूसरे के समक्ष प्रस्तुत होते हैं।  ऐसे में सात्विक व्यवहार की अपेक्षा न तो दूसरे से करें न ही अनावश्यक रूप से स्वयं को धर्मभीरु प्रमाणित करने का प्रयास करना चाहिये।  सच बात तो यह है कि मनुष्य समाज में अधिकतर लोग आत्ममुग्ध होकर रहते हैं। वह सोचते हैं कि जैसे हम अच्छे या बुरे हैं वैसे ही दूसरे भी हैं।  यही कारण कि अधिकतर लोग हमेशा यह शिकायत करते फिरते हैं कि हमारे साथ दूसरे धोखा करते हैं।
दार्शनिक तथा चिंत्तक चाणक्य महाराज का कहना है कि

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लुब्धमर्थेन गृह्णीयात् स्तब्धमञ्जलिकर्मणा।

मूर्खं छन्दोऽनृवृत्तेन यथार्थत्वेन पण्डितम्।।

     हिन्दी में भावार्थ-लोभी को धन, अभिमानी को विनम्रता, मूर्ख  को इच्छापूर्ति और विद्वान को सत्य से जीता जा सकता है।
      हम अगर जीवन में मानवीय स्वभाव के मूल तत्व को समझ लें तो न कभी धोखा होगा न हृदय में निराशा को स्थान मिलेगा। जिन लोगों से हम अर्थलाभ की अपेक्षा करते हैं उन्हें अर्थ देकर ही संतुष्ट किया जा सकता है।  धन, पद तथा बाहुबल का अहंकार मनुष्य में न हो यह अस्वाभाविक बात है इसलिये अपने से अधिक योग्य व्यक्ति के साथ विनम्रता का व्यवहार करना ही लाभदायक रहता है। मूर्ख लोगों का काम ही दूसरों के काम  में बाधा डालना है अतः संभव हो तो उनकी इच्छा पूर्ति कर अपना पीछा छुड़ायें।  महत्वपूर्ण बात यह है कि जब हमें किसी से किसी विषय पर बौद्धिक सहायता लेनी हो तो उसे सच बताना चाहिये।
      अपने सर्वज्ञ होने का भ्रम कभी नहीं पालना चाहिये।  न ही यह मानना चाहिये कि हम स्वयं शक्तिशाली हैं या फिर शक्तिशाली लोगों से संपर्क है तो कोई हमारा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता।  जब हमारी इंद्रियां बाहर सक्रिय हों तो यह भी विचार करना चाहिये कि वह अनुकूल विषय, वस्तु या व्यक्ति से संपर्क कर रही हैं या प्रतिकूलता का पीछा कर रही हैं।  प्रतिकूल होने पर वह मनुष्य को भारी संकट में डाल देती हैं। इसलिये बोलते या काम करते समय सारी स्थिति पर विचार करना चाहिये।

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