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Sunday, July 5, 2015

जनप्रतिनिधियों के वेतन भत्तो पर बहस करना हल्कापन है-हिन्दी चिंत्तन लेख(jan partinidhiyon ke vetan bhatton par bahas karna halkapan hai-hindi thought article)

                              हमारे देश के प्रचार माध्यम लोकतंत्र में नाम बहुत उछलते हैं पर जनप्रतिनिधियों पर जिस तरह से टिप्पणियां करते हैं वह असामान्य प्रकार की हैं।  सांसदों और विधायकों के वेतन और भत्ते बढ़ने पर वह गरीब आदमी का नाम लेकर जिस तरह  विलाप करते हैं उसे देखकर नहीं लगता कि लोकतंत्र और राजतंत्र की उन्हें कोई समझ है।  हमारे विचार से सांसदों और विधायक अगर अपना वेतन भत्ते बढ़ाने के साथ ही अन्य सुविधायें भी लें तो कोई बुरी बात नही है।  जनप्रतिनिधियों के जनहित में निर्वाह की जा रही भूमिका पर ही चर्चा हो तो बात समझ में आये।  अगर आप केंद्र सरकार से नगर निगमों के बजट की बृहद राशि पर नज़र डालें तो सांसदों, विधायकों और पार्षदों के वेतन भत्ते ऊंट के मुंह में जीरे के समान प्रतीत होता है।   जनप्रतिनिधि एक व्यवस्था के शीर्ष पर विराजमान होते हैं उनमें दायित्व निर्वाह की क्षमता दिखाने की अपेक्षा सामान्यजन करते हैं।  जनप्रतिनिधियों की निजी आय पर सामान्य जन अधिक विचार नहीं करते।
                              हमारी दृष्टि से प्रचार माध्यमों को इन जनप्रतिनिधियों के सार्वजनिक कार्यों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिये।  जिस जनप्रतिनिधि में जनहित के प्रति अरुचि का भाव हो या वह निष्क्रिय हो उसे अपने मूल कर्म के लिये प्रेंरित करते रहना चाहिये।  इस तरह जनप्रतिनिधियों के वेतन भत्तों पर बहस करना अर्थशास्त्र लेखांकन के विद्यार्थी होने के नाते हमें हल्कापन लगता है। हम न जनप्रतिनिधि हैं न भविष्य में बनने की संभावना है इसलिये किसी लाभ की आशा से यह लिख रहे हैं यह सोचना गलत होगा।  एक सामान्य नागरिक के रूप में हमारी जनप्रतिनिधियों से सार्वजनिक दायित्व निभाने की आशा ही  की जाती है। वह उस खरे उतरनते हैं या नहीं, इसी पर ही विचार होना चाहिये।
                              प्रचार माध्यमों के पास लोकतंत्र के नारे के नाम पर अभिव्यक्ति की आज़ादी है पर उसका उपयोग करना आता कि नहीं यह विचारणीय प्रश्न है।  सामान्य मनुष्य की अभिव्यक्ति हमेशा चिंत्तन और मनन के दौर से निकलकर बाहर आना चाहिये-हमने देखा होगा कि मानसिक रूप से असामान्य मनुष्य चाहे कुछ बड़बड़ाते हैं और लोग उसे नज़र अदाज कर देते हैं। बहस के विषयों के चयन में इस तरह की हड़बड़ी जिस तरह प्रचार प्रबंधक दिखा रह हैं वह गंभीर लोगों में उनकी छवि इसी तरह की बनाती है। सतही विषयों से कभी भी प्रचार माध्यम समाज के मार्ग दर्शक नहीं बन सकते।  सार्वजनिक विषयों से जुड़े पुराने लोग आज के प्रचार माध्यमों के हल्केपन से उदास ही हो सकते हैं। नये लोगों के पास तो वैसे भी अब बहुत सारे चैनल हैं इसलिये हाल बदल देते हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Monday, June 29, 2015

नालंदा में हिंसक संघर्ष के व्यापक संदेश शिखर पुरुष समझें-हिन्दी चिंत्तन लेख(nalanda mien sangharsh ka vyapak sandesh shikhar purush samjhen-hindi thought aritcle)

                              नालंदा में एक विद्यालय के छात्रावास से लापता दो छात्रों के शव एक तालाब में मिलने के बाद उग्र भीड़ ने निदेशक को पीट पीट कर मार डाला। बाद में छात्रों की मृत्यु पाश्च जांच क्रिया से पता चला कि बच्चों की मौत पानी में डूबने से हो गयी थी। जबकि मृत छात्रों की मृत्यु से गुस्साये लोग यह संदेह कर रहे थे कि छात्रावास के अधिकारियों ने उनकी हत्या करवा कर तालाब में फैंका या फिंकवाया होगा। हमें दोनों पक्षों के मृतक के परिवारों से हमदर्दी है पर इस घटना पर जिस तरह प्रचार माध्यम सतही विश्लेषण कर रहे हैं उससे लगता नहीं कि कोई गहरे चिंत्तन से निष्कर्ष निकल रहा हो।
                              यह घटना समाज में आम जनमानस में राज्य के प्रति कमजोर होते सद्भाव का परिणाम है। इस सद्भाव के कम होने के कारणों का विश्लेषण करना ही होगा।  मनुष्य समाज में राज्य व्यवस्था का बना रहने अनिवार्य माना गया ताकि कमजोर पर शक्तिशाली, निर्धन पर धनिक और प्रभावशाली लोग अपने से कमतर पर अनाचार न कर सकें।  हम प्रचार माध्यमों पर आ रहे समाचारों और विश्लेषणों को देखें तो यह संदेश निरंतर आता रहा है कि प्राकृत्तिक रूप से इस सिद्धांत पर समाज चल रहा है जिसमें हर तालाब में बड़ी मछली छोटी को खा जाती है। मनुष्य में राज्य व्यवस्था का निर्माण इसी सिद्धांत के प्रतिकूल किया गया है।
                              अनेक प्रकार ऐसी घटनायें भी हुईं है कि जिसमें किसी जगह वाहन से टकराकर पदचालकों की मृत्यु हो जाने पर भीड़ आक्रोश में आकर वाहन जला देता है। कहीं वाहन चालक को भी मार देती।  इस तरह की खबरें तो रोज आती हैं। इन्हें सहज मान लेना ठीक नहीं है। आखिर हम जिस सामाजिक व्यवस्था में सांस ले रहे हैं कहीं न कहीं उसका आधार राज्य प्रबंध ही है।  भीड़तंत्र का समर्थन करना अपनी जड़ें खोदना है पर सवाल यह है कि आक्रोश में आकर लोग इसे भूल क्यों जाते हैं? क्या उनमें इस विश्वास की कमी हो गयी है कि गुनाहगार को सजा मिलना सरल नहीं है इसलिये वह समूह में यह काम कर डालें जिसकी अपेक्षा बाद में नहीं की जा सकती।
              दूसरी बात हमें देश के आर्थिक, सामाजिक तथा प्रतिष्ठत शिखर पुरुषों से भी कहना है कि उन्हें अब चिंता करना ही चाहिये। आमजन को केवल दोहन के लिये समझना उनकी भूल होगी।  उन्हें शिखर समाज में आर्थिक, सामाजिक तथा सद्भाव का वातावरण बनाये के लिये मिलते हैं।  अगर कहीं तनाव बढ़ा है तो उन्हें भी आत्ममंथन करना ही होगा।  समाज में विश्वास का संकट सभी वर्गों के लिये तनाव का कारण बनता है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Wednesday, June 24, 2015

चिकित्सा तथा शैक्षणिक केंद्रों में स्वच्छता अभियान की आवश्यकता-हिन्दी चिंत्तन लेख(chikitsa aur shiksha kendron mein swachchhata abhiyan ki awashyakta-hindi thought article)


                     सरकारी अस्पताल में जब चिकित्सक हड़ताल करते हैं तो सबसे अधिक कमजोर आयवर्ग के लोग प्रभावित होते हैं। उसी तरह जब सरकारी विद्यालयों में शिक्षक हड़ताल करते हैं तब इसी वर्ग के छात्र परेशान होते हैं।  यह आर्थिक वैश्वीकरण का परिणाम है कि जिन गरीबों के कल्याण के लिये धनवादी नीतियां लायी गयीं वही उनकी शत्रु हो गयी हैं।
              एक समय था जब सरकारी अस्पताल और विद्यालय जनमानस की दृष्टि में प्रतिष्ठित थे पर समय के साथ बढ़ती आर्थिक असमानता ने समाज में गरीब तथा अमीर के बीच विभाजन कर दिया है । यह विभाजन अमीरों का निजी तथा गरीबों का सरकारी क्षेत्र के प्रति मजबूरी वश झुकाव के रूप में स्पष्टतः दिखाई देता है। हमें याद है जब पहले बच्चों को शासकीय विद्यालयों में भर्ती इस विचार से कराया जाता था कि वहां पढ़ाई अच्छी होती है। उसी तरह इलाज भी सरकारी अस्पतालों में वहां के चिकित्सक तथा नर्सों के प्रति विश्वास के साथ कराया जाता था।  अब अल्प धनी सरकार और अधिक धनी निजी क्षेत्र पर निर्भर रहने लगा है।  सरकारी अस्पतालों में कभी जाना हो तो वहां इतनी गंदगी मिलती है कि लाचार गरीब का रहना तो सहज माना जा सकता है पर वेतनभोगी नर्स, कंपाउंडर और डाक्टर किस तरह वहां दिन निकालते होंगे यह प्रश्न मन में उठता ही है। कहा जाता है कि जिस वातावरण में आदमी रहता है उसका उस पर प्रभाव पड़ता ही है।  ऐसे गंदे वातावरण में चिकित्सा कर्मी अपना मन अच्छा रख पायें यह आशा करना व्यर्थ है। यही स्थिति सरकारी विद्यालयों में है। देश में स्वच्छता अभियान चल रहा है पर अभी हमें अस्पतालों और विद्यालयों में उसके आगमन की प्रतीक्षा है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Thursday, June 18, 2015

आष्टांग योग के हर भाग की जानकारी जरूरी-21 जून अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर विशेष लेख(ashtang yoga ke har bhaag ki jankari jaroori-A Hindu hindi thought article on 21 june world day)


      21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर मनाने की जिस तरह तैयारी चल रही है उससे तो यह लगता है कि इसमें केवल आसन तथा प्राणायाम को ही योग का पर्याय मान लिया गया है। पतंजलि योग विज्ञान के अनुसार यम, नियम, प्रत्याहार, आसन, प्राणायाम, ध्यान, धारण तथा समाधि आठ भाग है पर भारत के पेशेवर धार्मिक विद्वान हर भाग का अलग प्रचार करते हैं।  यहां तक कि समाधि की चर्चा इस तरह की जाती है जैसे कि वह येाग से इतर कोई कारनामा हो।  हमारी दृष्टि से भारतीय योग विद्या  आठों भागों पर व्यापक चर्चा किया जाना जरूरी है। देखा यह जा रहा है कि आष्टांग योग के मात्र दो भागों आसन और  प्राणायाम पर ही चर्चा कर लोगों को संकीर्ण जानकारी दी जा रही है। । हमारा मानना है कि 21 जून विश्व अंतर्राष्ट्रीय दिवस पर  पतंजलि योग सूत्रों के साथ ही श्रीमद्भागवत गीता के ज्ञान तथा विज्ञान के सूत्रों की भी चर्चा करना आवश्यक है।  हमने अनेक नाम सुने हैं-राजयोग, विद्या योग और ज्ञान योग आदि-पर इनमें सहज योग ही इसका मूल रूप है। श्रीमद्भागवत इसका सबसे प्रमाणिक ग्रंथ है।
  जब मनुष्य योग साधना से सहज भाव प्राप्त कर लेता है  तब वह सांसरिक विषयों में शक्ति, आत्मविश्वास तथा नैतिकता के साथ जुड़ता है। वह सहजता से उपलब्धियां प्राप्त करता है पर उसे अहंकार नहीं आता। कोई उसे अपने नैतिक और धर्म पथ से विचलित नहीं कर सकता। आसनों के समय आंतरिक रूप से देह की आंतरिक गतिविधियों पर ध्यान रखना चाहिये। प्राणायाम के समय भी अपने प्राणों को भृकुटि पर केंद्रित कर पूरी देह पर दृष्टिपात करने से अनेक प्रकार के लाभ होते हैं। यह सही है कि आसन तथा प्राणायाम से देह में विशेष प्रकार की स्फूर्ति का संचार होता है पर उसके स्थाई लाभ के लिये आठों भागों का ज्ञान होना आवश्यक है। 
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Thursday, June 4, 2015

कंपनियों के खाद्य तथा पेय पदार्थों के उपभोग पर समाज विचार करे-हिन्दी चिंत्तन लेख(eat and drink production of large compani's-hindi thought article)

        देश में मैगी के भोज्य पदार्थ को लेकर विवाद का दौर चल रहा है। हमारी दृष्टि से  एक उत्पादक संस्थान पर ही चर्चा करना पर्याप्त नहीं है। उपभोग की बदलती प्रवृत्तियों ने संगठित उत्पादक संस्थानों के भोज्य पदार्थों को उस भारतीय समाज का हिस्सा बना दिया है जो स्वास्थ्य का उच्च स्तर घरेलू भोजन में ढूंढने के सिद्धांत को तो मानता है पर विज्ञापन के प्रभाव में अज्ञानी हो जाता है। अनेक संगठित उत्पादक संस्थान खाद्य तथा पेय पदार्थों का विज्ञापन भारतीय चलचित्र क्षेत्र के अभिनेताओं से करवाते हैं।  उन्हें अपने विज्ञापनों में अभिनय करने के लिये भारी राशि देते हैं। इन्हीं विज्ञापनों के प्रसारण प्रकाशन के लिये टीवी चैनल तथा समाचार पत्रों में भी भुगतान किया जाता है। इन उत्पादक संस्थानों के विज्ञापनो के दम पर कितने लोगों की कमाई हो रही है इसका अनुमान तो नहीं है पर इतना तय है कि इसका व्यय अंततः उपभोक्ता के जेब से ही निकाला जाता है। आलू चिप्स के बारे में कहा जाता है कि एक रुपये के आलू की चिप्स के  दस रुपये लिये जाते हैं।

        हमारे देश में अनेक  भोज्य पदार्थ पहलेे ही बनाकर बाद में खाने की परंपरा रही है। चिप्स, अचार, मिठाई तथा पापड़ आदि अनेक पदार्थ हैं जिन्हें हम खाते रहे हैं। पहले घरेलू महिलायें नित नये पदार्थ बनाकर अपना समय काटने के साथ ही परिवार के लिये आनंद का वातावरण बनाती थीं। अब समय बदल गया है। कामकाजी महिलाओं को समय नहीं मिलता तो शहर की गृहस्थ महिलाओं के पास भी अब नये समस्यायें आने लगी हैं जिससे वह परंपरागत भोज्य पदार्थों के निर्माण के लिये तैयार नहीं हो पातीं। उस पर हर चीज बाज़ार में पैसा देकर उपलब्ध होने लगी है। घरेलू भोजन में बाज़ार से अधिक शुद्धता की बात करना अप्रासंगिक लगता है। इसका बृहद उत्पादक संस्थानों को भरपूर लाभ मिला है।
       भारतीय समाज में चेतना और मानसिक दृढ़ता की कमी भी दिखने लगी है। अभी मैगी के विरुद्ध अभियान चल रहा है पर कुछ समय बाद जैसे ही धीमा होगा वैसे ही फिर लोग इसका उपभोग करने लगेंगे। पेय पदार्थों में तो शौचालय स्वच्छ करने वाले द्रव्य मिले होने की बात कही जाती है। फिर भी उसका सेवल धड़ल्ले से होता है। यह अलग बात है कि निजी अस्पतालों में बीमारों की भीड़ देखकर कोई भी यह कह सकता है कि यह सब बाज़ार के खाद्य तथा पेय पदार्थों की अधिक उपभोग के कारण हो रहा है।
        ऐसे में बृहद उत्पादक संस्थानों के खाद्य तथा पेय पदार्थों के प्रतिकूल अभियान छेड़ने से अधिक समाज में इसके दोषों की जानकारी देकर उसे जाग्रत करने की आवश्कयता अधिक लगती है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Friday, May 29, 2015

राजसी कर्म से पंच गुण उत्पन्न होते ही हैं-हिन्दी चिंत्तन रचना(rajsi karme se panch gun uepanna hote hi hain-hindi thought article)


     अध्यात्मिक दर्शन का संबंध आंतरिक मनस्थिति से है। उसके ज्ञान से  व्यक्ति सात्विक भाव धारण करता है या फिर इस संसार में विषयों से सीमित संबंध रखते हुए योग भाव को प्राप्त होता है।  एक बात तय रही कि दैहिक विषयों से राजसी भाव से ही  राजसी कर्म के साथ संपर्क रखा जा सकता है। ज्ञान होने पर व्यक्ति अधिक सावधानी से राजसी कर्म करता है और न होने पर वह उसके लिये परेशानी का कारण भी बन जाता हैं।  हम देख यह रहे है कि लोग अपने साथ उपाधि तो सात्विक की लगाते हैं पर मूलतः राजसी प्रवृत्ति के होते हैं। ज्ञान की बातें आक्रामक ढंग से इस तरह करेंगे कि वह उन्हीं के पास है पर उनमें धारणा शक्ति नाममात्र की भी नहीं होती और राजसी सुख में लिप्त रहते हैं। राजसी कर्म और उसमें लिप्त लोगों में लोभ, क्रोध, मोह, अहंकार की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती है अतः उनसे सात्विक व्यवहार करने और विचार रखने की आशा करना ही अज्ञान का प्रमाण है। सात्विकता के साथ राजसी कर्म करने वालों की संख्या नगण्य ही रहती है।
            धर्म, अर्थ, समाज सेवा, पत्रकारिता और कला क्षेत्र में धवल वस्त्र पहनकर अनेक लोग सेवा का दावा करते हैं। उनके हृदय में शासक की तरह का भाव रहता है। स्वयंभू सेवकों की भाषा में अहंकार प्रत्यक्ष परिलक्षित होता है। प्रचार में विज्ञापन देकर वह नायकत्व की छवि बना लेते हैं।  शुल्क लेकर प्रचार प्रबंधक जनमानस में उन्हें पूज्यनीय बना देते हैं। कुछ चेतनावान लोग इससे आश्चर्यचकित रहते हैं पर ज्ञान के अभ्यासियों पर इसका कोई प्रभाव नहीं होता। राजसी कर्म में लोग फल की आशा से ही लिप्त होते हैं-उनमें पद, प्रतिष्ठा पैसा और प्रणाम पाने का मोह रहता ही है। हमारे तत्वज्ञान के अनुसार यही सत्य है।
सामान्य जन उच्च राजसी कर्म और पद पर स्थित शिखर पुरुषों से सदैव परोपकार की आशा करते हैं पर उन्हें इस बात का ज्ञान नहीं होता कि इस संसार में सभी मनुष्य अपने और परिवार के हित के बाद ही अन्य बात सोचते हैं। परोपकार की प्रवृत्ति सात्विक तत्व से उत्पन्न होती है और वह केवल अध्यात्मिक रूप से शक्तिशाली मनुष्यों में संभव है। सात्विक लोगों में बहुत कम लोग ही राजसी कर्म में अपनी दैहिक आवश्यकता से अधिक संपर्क रखने का प्रयास करते हें। उन्हें पता है कि व्यापक सक्रियता काम, क्रोध, मोह लोभ तथा अहंकार के पंचगुण वाले  मार्ग पर ले जाती है। ऐसे ज्ञान के अभ्यासी कभी भी राजसी पुरुषों की क्रियाओं पर प्रतिकूल टिप्पणियां भी नहीं करते क्योंकि उनको इसका पता है कि अंततः सभी की देह त्रिगुणमयी माया के अनुसार ही संचालित होती है। उनके लिये अच्छा या बुरा कुछ नहीं होता इसलिये काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा अहंकार को वह राजसी कर्म से उत्पन्न गुण ही मानते हैं।
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Friday, May 15, 2015

भारत और चीन के बीच अध्यात्म तत्व मैत्री का आधार बन सकता है-हिन्दी चिंत्तन लेख(india and china relation:adhyatma poind between both country-hindi article)


      भारतीय प्रधानमंत्री श्रीनरेंद्र मोदी की चीन यात्रा के दौरान राजनीतिक विषयों पर चर्चा huee पर जिस तरह इसमें अध्यात्मिक तथा धार्मिक तत्व के दर्शन हुए वह नये परिवर्तन का संकेत हैं।  आमतौर से वामपंथी विचाराधारा के चीनी नेता धर्म जैसे विषय पर सार्वजनिक रूप से मुखर नहीं होते न ही अपने देश से बाहर के लोग प्रेरित करते। जिस तरह नरेंद्र मोदी ने वहां जाकर बौद्धिवृक्ष का पौद्या उपहार के रूप में सौंपा और प्रत्युपहार में उन्हें बुद्ध की स्वर्णिम प्रतिमा सौंपी गयी वह वैश्विक राजनीतिक में एक नया रूप है।
             चीनी नेताओं ने जिस तरह शियान के बौद्ध मंदिर में फोटो खिंचवाये उससे यह लगता है कि अभी तत्काल नहीं तो भविष्य में चीनी जनता के हृदय में भारत के प्रति परिवर्तन अवश्य आयेगा। अभी तक विश्लेषकों की जानकारी सही माने तो वहां पाकिस्तान केा मित्र तथा भारत को विरोधी ही माना जाता है।  हमारा मानना है कि जब तक चीनी प्रचार माध्यम जब तक भारत के प्रति वहां के जनमानस में सद्भाव नहंी स्थापित करते तब दोनों के बीच राजनीतिक साझेदारी जरूर बने पर संास्कृतिक तथा सांस्कारिक संपर्क स्थाई नहंी बन सकते।
वैसे हमें लगता है कि चीनी रणनीतिकार भारत के प्रति कृत्रिम सद्भाव दिखा रहे हैं क्योंकि वह धार्मिक विचाराधारा को अपनी राजकीय सिद्धांत बनाने वाले पाकिस्तान के प्रति उनकी बढ़ती निकटता भारत के लिये खतरा ही है। बौद्ध और भारतीय धर्म समान सिद्धांतों पर आधारित हैं। भारत में जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान महावीर तो भगवान बौद्ध के न केवल समकालीन वरन् समकक्ष ही माने जाते हैं।  दोनों ही अहिंसा सिद्धांत के प्रवर्तक रहे हैं।  एक आम भारतीय के लिये भगवान महावीर तथा बुद्ध में समान श्रद्धा है। ऐसे में अध्यात्मिक चिंत्तकों के लिये चीन का धार्मिक तत्व के प्रति झुकाव दिखना रुचिकर है। पाकिस्तान की राजकीय विचाराधारा चीन तथा भारत दोनों के लिये समान चुनौती है जिसमें धर्म के आधार पर आतंकवाद निर्यात किया जाता है। ऐसे में चीन का उससे मेल संशय का परिचायक है।  साथ ही यह विचार भी आता है कि कहीं चीन का राजनीति में धार्मिक तत्व का मेल कहीं इस समय भारत से तात्तकालिक औपचारिकता निभाने भर तो सीमित नहीं है।
    एक बात तय है कि भारत और चीन की निकटता में अध्यात्म तत्व ही महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। सांसरिक विंषयों से बने संपर्क अधिक समय तक नहीं टिके रहते।
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Tuesday, May 5, 2015

भजन के साथ सुप्रभात good morning with bhajan


           प्रातःकाल जब तक अखबार या टीवी में जब तक समाचारों नहीं सुने तभी तक ही सुप्रभात रह सकती है। हम  दूसरे को सुप्रभात कह सकते हैं पर उसके लिये हमारे अंदर जीवन के प्रति उत्साह होना चाहिये।  अगर कहीं दुर्घटना, आतंक अथवा डकैती घटनाओं से सुबह ही संपर्क कायम हो गया तो फिर सुप्रभात रह ही नहीं रह सकती। बुरे समाचारों की वजह से निराशा और क्रोध जैसे विष हमारे अंदर आ ही जाते हैं। । ऐसे में किसी से सुप्रभात बोले भी तो उसका प्रभाव नहीं होता क्योंकि बुरे समाचारों की वजह से मन वैसे ही खराब हो जाता है।
         टीवी पर श्रीमन्नारायण नारायण शब्दों के साथ भजन चल रहा है। कितना अच्छा अनुभव हो रहा है। किसी बुरे समाचार से संपर्क नहीं होना और भजन के स्वर से कानों में अमृत का घोल मिलने से वाकई प्रातः मन ही मन दोहरा रहे हैं सुप्रभात!

Saturday, March 28, 2015

अन्ना के पुराने भक्तों के पूरे भारत में छा जाने क संभावना क्षीण-हिन्दी लेख


       आज अन्ना हजारे के तीन चार वर्ष पूर्व चलाये गये भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की याद आ रही है।  लोकतंत्र में आंदोलन से सत्ता के शिखर पहुंचने का तरीका नया नहीं है पर वर्तमान समय में वह फिर उपयोग की प्रमाणिकता दिखा रहा है। उस समय अन्ना हजारे के अनशन ने पूरे देश को आंदोलित किया था। उनके कुछ भक्तों ने कीचड़ साफ करने के लिये नाले मे ही उतरने का उपक्रम किया तो लगा कि समाज में सार्वजनिक मर्यादायें बनाये रखने की उनकी प्रतिबद्धता उल्लेखनीय है। यह अलग बात है कि इन भक्तों ने अन्ना के निकट रहने से ही अपनी छवि बनायी थी जिसका नकदीकरण की इच्छा उनके अंदर थी।  उस समय विद्वान लोगों का भी मानना था कि तत्कालीन राजनीति परिदृश्य में अपनी दाल न गलते देख कुछ उत्साही लोगों ने पहले आंदोलन फिर सत्ता की राह पर चलने का लक्ष्य बनाकर ही अन्ना के नाम का सहारा योजनबद्ध ढंग से लिया है।
 इन भक्तों ने एक नया राजनीतिक दल बनाया। 2013 में महानगरीय प्रकृति की दिल्ली विधानसभा का चुनाव जीता तो फिर 2014  के लोकसभा के आम चुनाव में महायोद्धा के रूप में उतर गये। यह अलग बात है कि अन्ना के आंदोलन में किये उनके श्रमदान के पुण्य इतने शक्तिशाली नहीं थे कि इतना बड़ा फल मिल जाता।  दरअसल वह पुण्य इतने ही थे कि दिल्ली में 49 तक राज्य सुख मिल सके।  यह अलग बात है कि फिर 2015 में वही दिल्ली विधानसभा हाथ आयी जिसे शेष भारत का जनमानस एक महानगर पालिका से अधिक नहीं मानता।
      बहरहाल अन्ना के इन भूतपूर्व भक्तों के बीच दिल्ली की सत्ता आने के बाद जो आपस मनमुटाव हुआ उससे एक बात तो साफ होती है कि काजल की कोठरी से कोई बिना काले दाग के बाहर नहीं आ सकता। उस समय जिन लोगों ने अपनी छवि उत्साही समाज सेवक की बनायी थी आज उन पर सत्ता का अहंकार चढ़ ही गया लगता है। अब उनकी विरोधाभासी छवि हैरान किये दे रही है।
        एक अध्यात्मिक लेखक होने के नाते हमें कभी राजसी पुरुषों की दोहरी छवि पर आश्चर्य नहीं होता।  सत्ता पाने या समाज सुधारने के आंदोलन हमारी दृष्टि से राजसी कर्म का ही भाग है जिससे काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा अहंकार जैसी बुराईयां आती हैं।  हमने अन्ना के भक्त जब सत्ता की राह पर आये तो हम उनसे सात्विकता की आशा तो नहीं कर रहे पर राजसी कर्म में जिस भावनात्मक, वैचारिक तथा प्रशासनिक कार्यों में दृढ़ता की आशा कर रहे थे वह भी अब आगे बढ़ती नहीं दिख रही।  एक बात हम यहां यह बता दें कि राजसी कर्म कोई बुरा नहीं होता न ही राजसी पुरुष कमतर होते हैं शर्त यह है कि वह अपने कर्म के स्वरूप तथा परिणाम पर विचार कर योजनबद्ध ढंग से काम करे।  बहरहाल अन्ना के पुराने भक्तों से पूरे भारत के राजनीतिक परिदृश्य पर छा जाने की जो संभावना पैदा हुई थी वह अब क्षीण हो गयी लगती है। हालांकि दिल्ली तथा पंजाब के आसपास के राज्यों में इसका अस्तित्व बना रहेगा। इससे आगे विस्तार केवल एक सपना होगा।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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Saturday, March 21, 2015

इज्जत में ही रहता है बेइज्जती का भय-पतंजलि योग के आधार पर चिंत्तन लेख(izzat mein he rahta hain beizzati ka khatra-A Hindu hindi religion thought based on patanjali yog sahitya)



            मनुष्य में यह सामान्य प्रवृत्ति रहती है कि वह अपने परिवार, समाज तथा अन्य वर्ग से सम्मान पाना चाहता है। पूज्यता मिलने पर वह न केवल प्रसन्न होता है वरन् उसके मद में डूबकर विचित्र व्यवहार भी करने लगता है।  उसे देश, काल तथा भाग्य के परिवर्तित होने का आभास और अनुमान तक नहीं हो पाता।  कालांतर में जब उसे सम्मान नहीं मिलता तो वह मानसिक संताप का शिकार हो जाता है।  अगर हम योग सिद्धांतों को समझें तो जहां मान है वहीं अपमान, जहां विश्वास है वहीं घात  और जहां वचन है वहीं निराशा की आशंका रहती है।  श्रीमद्भागवत गीता में इसलिये ही सांसरिक विषयों के प्रति निष्काम भाव अपनाने का संदेश दिया है। निष्काम भाव से काम करने पर अनुकूल परिणाम न मिलने पर निराशा नहीं होती वरन् यह संतोष रहता है कि हमने अपना काम पूरे परिश्रम से किया।

पतंजलि योग में कहा गया है कि

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स्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्स्मयाकरणे पुनरिष्टप्रसङ्गात्।

            हिन्दी में भावार्थ-संपन्न व्यक्ति से सम्मान मिलने पर प्रसन्न नहीं होना चाहिये क्योंकि उससे अपमानित होने का भय भी उपस्थित रहता है।

            योग साधना के समय आसन तथा प्राणायाम के दौरान साधक ऊपर-नीचे, दायें-बायें तथा सामने-पीछे की तरफ अंगों को घुमाने के साथ ही प्राण भी उसी क्रम में स्थापित करता है। इस तरह के अभ्यास करते करते उसके अंदर यह ज्ञान सहजता से आ जाता है कि किसी कर्म का प्रतिकर्म भी हो सकता है।  उसी तरह वह किसी के व्यवहार से निराश भी नहीं होता क्योंकि वह जानता है कि दुष्कर्म करने वाला  मनुष्य कभी  सद्कर्म की तरफ भी प्रेरित हो ही जाता है।  इस तरह का ज्ञान होने पर मनुष्य का जीवन सहज हो जाता है।  उसे सांसरिक विषयों की चिंता परेशान नहीं करती क्योंकि वह जानता है कि उसकी समस्यायें समय आने पर स्वतः ही दूर हो जायेंगी।

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
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