Tuesday, 13 May, 2008

संत कबीर वाणी:कुल की चाल चलते हुए मन का हंस बिगड़ गया

दुनिया के धोखे मुआ, चल कुटुंब की कानि
तब कुल की क्या लाज है, जब ले धरा पसानि


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते है यह दुनियां एक धोखा है जिसमें आदमी केवल अपने परिवार के पालन पोषण के लिये हर समय जुटा रहता है। वह इस बात का विचार नहीं करता कि जब उसका शरीर निर्जीव होकर इस धरती पर पड़ा रहेगा तब उसके कुल शान का क्या होगा?



कुल करनी के कारनै, हंसा गया बिगोय
तब कुल काको लाजि, चारि पांव का होय


संता शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने परिवार की मर्यादा के लिये आदमी ने अपने आपको बिगाड़ लिया वरना वह तो हंस था। उस कुल की मर्यादा का तब क्या होगा जब परमार्थ और सत्संग के बिना जब भविष्य में उसे पशु बनना पड़ेगा।

संपादकीय व्याख्या-मनुष्य मन को हंस भी कहा जाता है पर उसे कोई उड़ने दे सके तभी समझा जा सकता है। हर कोई अपने विचार और लक्ष्यों का दायरा संकीर्ण कर लेता है। अपने और परिवार के हित के आगे उसे कुछ नहीं सूझता। कई लोग मन में शांति न होने की बात कहते हैं पर उसके लिये कोई यत्न नहीं करते। मन एकरसता से ऊब जाता है। स्वार्थ सिद्धि की एक ऐसा रस है जिसमें डूबे रहने से बोरियत लगती है-अगर थोड़ा परमार्थ भी कर लें तो एक सुख का अनुभव होता है। परमार्थ का यह आशय कतई नहीं है कि अपना सर्वस्व लुटा दें बल्कि हम किसी सुपात्र व्यक्ति की सहायता करें ने किसी बेबस का सहारा बने। वैसे लुटाने को लोग लाखों लुटा रहे हैं। अपने परिवार के नाम प्याऊ या किसी मंदिर में बैच या पंखा लगवाकर उस पर अपने परिवार का परिचय अंकित करवा देते हैं और स्वयं ही दानी होने का प्रमाणपत्र ग्रहण करते हैं। इससे मन को शांति नहीं मिलती। दूसरों से दिखावा कर सकते हो पर अपने आप से वह संभव नहीं है। हम हर जगह अपने कुल की परिवार की प्रतिष्ठा लिये घूमते हैं पर अपनी आत्मा से कभी परिचित नहीं होते। इसके लिये जरूरी है कि समय निकालकर भक्ति और संत्संग के कार्यों में बिना किसी दिखावे के निष्काम भाव से सम्मिलित हों।

Monday, 12 May, 2008

संत कबीर वाणी:सत्य शब्द की खोज करे वह संत धन्य


खोजी हुआ शब्द का, धन्य संत जन सोय
कहैं कबीर गहि शब्द को, कबहु न जाय बिगोय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि वह सत्य धन्य है जो सत्य के शब्दों की खोज करता है। जो सत्य के शब्द के ज्ञान को धारण करता है वह गलती नहीं करता और उसका कभी पतन नहीं होता।

सोई शब्द जिन सार है, जो गुरू दिया बताय
बलिहार वा गुरुन की, सीष बियोग न जाय


वह शब्द ज्ञान सत्य है जो हमें अपनु गुरूओं से मिलता है। उस गुरू के सर्वस्व अर्पण कर दो जिससे शब्द ज्ञान मिला है और उससे कभी दूर न जाओ

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आजकल ढोंगी गुरूओं की बाढ़ इस देश में आयी है। कभी कभी तो लगता है कि अध्यात्मिक ज्ञान को रटने वाले पर स्वयं उसे धारण करने से वंचित लोग गुरू बनते जा रहे हैं। सकाम भक्ति का प्रचार इस समय जोरों पर है। सकाम भक्ति से तब तक ही मन में शांति रहती है जब तक हम उसे करते हैं और अधिकतर गुरू इसी प्रकार की भक्ति को प्रोत्साहन देते हैं ताकि जब तक भक्त या शिष्य जब तक उनके पास रहें उसमें मग्न रहें और फिर सांसरिक दुनियां में लौटकर दुःख भोगते हुए उनको याद करें। निष्काम भक्ति तो सदैव ह्ृदय में बनी रहती हैं और करने के बाद भी हमारा मन प्रफुल्लित रहता है। निष्काम भक्ति का आशय ईश्वर का ध्यान करते हुए निरंकार के रूप में उसे देखना। इससे हमारे मन, बुद्धि और विचारों का जो चक्र है वह घूमता रहता है और उससे उसमें शुद्धता आती है।

Saturday, 10 May, 2008

संत कबीर वाणी:शब्द का महत्व चुम्बक समान


यही बड़ाई शब्द की, जैसे चुम्बक भाय
बिना शब्द नहिं ऊबरै, केता करै उपाय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि शब्द का महत्व तो चुम्बक के समान है जो आदमी को अपनी आकर्षित करता है। बिना शब्द के कोई भी अपने जीवन में उबर नहीं सकता चाहे जितने भी उपाय कर ले।

सीखै सुनै विचार ले, ताहि शब्द सुख देय
बिना समझै शब्द गहे, कछु न लोहा लेय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो शब्द सुनकर कुछ सीखता और उस पर विचार करता है उसे वह सुख प्रदान करते हैं। बिना सोचे समझे ग्रहण कर बोलने वाला व्यक्ति कोई लाभ नहीं ले पाता।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-कई बार कुछ लोगों को देखकर हमें यह लगता होगा कि कि अधिक बोल जाते हैं। कई बार यह अनुभव भी होता है कि वह कुछ कार्यों को समय रहते सीख नहीं पाये। यह अनुभव हमें अपने बारे में भी होता है। मनुष्य का एक दूसरे से संपर्क वार्तालाप को माध्यम से होता है और आजकल अंतर्जाल पर संपर्क होता है तो शब्द लिखकर भी संपर्क होता है। शब्द बोला जाय या लिखा जाये उसमें आकर्षण होता है। इन पंक्तियों का लेखक अंतर्जाल पर लिखता है और कई बार दूसरे का लिखा ही दिल को ऐसा छू जाता है जैसे उसने बोला हो। कई लोग ऐसे भी है जो दुःख पहुंचाने वाले शब्द लिखते हैं। ऐसे लोग अज्ञान के अंधेरे में होते हैं। वह सोचते हैं कि इस तरह शब्द लिखने या कहने से किसी पर कोई प्रभाव नहीं होता या हम अपने मन की भडास निकाल लें दूसरे पर उसका जो प्रभाव होता है उसकी हम चिंता क्यों करें? यह ऐसे लोग होते हैं जो जिनको जीवन का ज्ञान देने वाला गुरू नहीं मिला होता या फिर उन्होने उसके ज्ञान को गंभीरता से ग्रहण नहीं किया होता।

कई बार लोग एक दूसरे के लिए पीठ पीछे अभद्र शब्द का करते हुए निंदा करते हैं सोचते हैं कि कौन वह सुन रहा है या जाकर उससे कहेगा। यह सच भी होता है पर ऐसा कर वह अपने मन और देह को भी भारी कष्ट देते हैं। अपना खून जलाते हैं। अतः उनकी कमियों से सीखकर हमें अपने अंदर सुधार कर लेना चाहिए।

Friday, 9 May, 2008

संत कबीर वाणी:ध्यान के लिए बाहर के द्वार बंद कर अन्दर के खोलें


सुमिरन सुरति लगाय के, मुख ते कछु न बोल
बाहर के पट देय के, अंतर के पट खोल


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मन का एकाग्र और वाणी पर नियंत्रण करते हुए परमात्मा का स्मरण करो। आपनी बाह्य इंदियों के द्वार बंद कर अंदर के द्वार खोलो।

संपादकीय व्याख्या-इससे पता चलता है कि कबीरदास जी ध्यान की चरम स्थिति प्राप्त कर चुके थे और यही उनकी भक्ति और शक्ति का निर्माण करता था। भगवान की भक्ति का श्रेष्ठ रूप भी ध्यान ही है। अक्सर लोग कहते हैं कि हमारा ध्यान नहीं लगता या थोड़ी देर लगता है फिर भटक जाता है। दरअसल हम लोग शोरशराबे से भक्ति करने के आदी हो जाते हैं इसलिये यह सब होता है। इसके अलावा ध्यान के लिये गुरू की आवश्यकता होती है वह मिलते नहीं है। अधिकतर गुरू सकाम भक्ति के लिए प्रेरित कर केवल अपने प्रति लोगों का आकर्षण बनाये रखना चाहते हैं।

ध्यान लगाना सरल भी है और कठिन भी। यह हम पर निर्भर करता है कि हमारे मन और विचारों पर हमारा नियंत्रण कितना है। इस संसार के दो मार्ग हैं। एक सत्य का दूसरा माया का। हमारा मन माया के प्रति इतना आकर्षित रहता है कि उसे वहां से हटाने के लिये दृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है। अगर हमने तय कर लिया कि हमें ध्यान लगाना ही है तो दुनियां की कोई ताकत उसे लगने से रोक नहीं सकती और अगर संशय है तो कोई गुरू उसे लगवा नहीं सकता।
इन पंक्तियों का लेखक कोई सिद्ध पुरुष नहीं है पर ध्यान की विधि जो अनुभव से आई है उसे तो बता ही सकता है। कहीं शांत स्थान पर सुखासन में बैठ जाईये और आंखें बंद कर शरीर को ढीला छोड़ दें। अपने हृदय में चक्रधारी देव की कल्पना कर उसे पर अपनी दृष्टि रखें। अपना पूरा नाक के बीच में भृकुटि पर ही रखें। दुनियां के विचार आयें आने दीजिये। आप तो तय कर लीजिये कि मुझे ध्यान लगाना है। जो विचार आते हैं उनके बारे में चिंतित होने की बजाय यह सोचिये कि वह आपके जीवन के जो घटनाक्रम आपने देखे और अनुभव किये हैं उनसे उत्पन्न विकार है जो वहां भस्म हो रहे हैं। जिस तरह हम कोई पदार्थ मुख से ग्रहण करते हैं पर शरीर में वह गंदगी के रूप में बदल जाता है। हम मुख से करेला खायें यह क्रीमरोल उसका हश्र एक जैसा ही होता है। हम काढ़ा पियें या शर्बत वह भी कीचड़ के रूप में परिवर्तित हो जाता है। यही हाल आखों से देखे गये अच्छे बुरे दृश्य और कानों से सुने गये प्रिय और कटु स्वर का भी होता है। उसके विकार हम देख नहीं पाते पर वह हमारी देह में होते है और उसको वहां से निकालने के लिये ब्रह्मास्त्र का काम करता है ध्यान। जब ध्यान लगाते हैं और जो विचार हमारे दिमाग में आते हैं उनके बारे में यह समझना चाहिए कि वह विकार हैं जो वहां भस्म होने आ रहे हैं और हमारा मन शुद्ध हो रहा है। धीरे-धीरे हमारी बाह्य इंद्रियों के द्वार ध्यान के कारण स्वतः बंद होने लगेंगे। बस अपने अंदर दृढ़ इच्छा शक्ति की आवश्यकता है।

Thursday, 8 May, 2008

संत कबीर वाणी:टोना-टोटका सब झूठ है

जंत्र मंत्र झूठ है, मति भरमो जग कोय
सार शब्द जानै बिना, कागा हंस न होय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यंत्र और मंत्र एकदम बेकार है और इसके भ्रम में कभी मत पड़ो। जब तक परम सत्य और शब्द को नहीं जानेगा तब तक वह सिद्ध नहीं हो सकता। कौवा कभी हंस नहीं हो सकता।

जिहि शब्दे दुख ना लगे, सोईं शब्द उचार
तपत मिटी सीतल भया, सोई शब्द ततसार


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने मुख से ऐसे शब्द बोलना चाहिए जिससे दूसरा प्रसन्न हो जाये। अगर दूसरा व्यक्ति हमारे बोलने से प्रसन्न होता है तो हमें स्वाभाविक रूप से आत्मिक सुख की प्राप्ति होती है।

संपादकीय व्याख्या-कहते हैं कि शिक्षा व्यक्ति को जागरूक बनाती है पर कुछ हमारे देश में कुछ लोग ऐसे है जो शिक्षित होने के बावजूद टोने टोटके वालों के पास जाकर अपनी समस्याओं का हल ढूंढते हैं या कथित ढोंगी साधुओं की दरबार में उपस्थित होकर उनका आशीर्वाद लेते हैं। यह यंत्र-मंत्र और टोना टोटका कई लोगों के लिये व्यापार बना हुआ है। कहीं पैसा लेकर यज्ञ हो रहा है तो कही तावीज आदि बेचा जाता है। किसी के हाथ में कोई सिद्धि नहीं है पर सिद्ध कहलाने वाले बहुत लोग मिल जायेंगे। सच तो यह है जीवन का पहिया घूमता है तो कई काम स्वतः बनते हैं तो कई आदमी के बनाने के बावजूद बिगड़ जाते हैं। ऐसे में अंधविश्वासों की सहायता लेना अपने आपको धोखा देना है।

Wednesday, 7 May, 2008

मनुस्मृति:घर चलाने का दायित्व स्त्रियों को सौंप देना चाहिए

अर्थस्य संग्रहे चैनां व्यये चैव नियोजयत्
शौचे धर्मेऽन्नपक्तयां च पारिणाहृास्य योजने

धन का संग्रह करना एवं खर्च करना, घर की स्वच्छता, भोजन बनाना तथा घर की सभा वस्तुओं को संभालने का दायित्व स्त्रियों को सौप देना चाहिए। इस तरह स्त्रियों को अपने दायित्व का निर्वहन से सुखद अनुभूति होती है और उनका मन घर में लगा रहता है।

स्वां प्रसूति चरित्रं च कुलमात्मानमेव च
स्वं च धर्म प्रयत्नेन जायां रक्षन् हि रक्षति


जो पुरुष प्रयत्नपूर्वक अपनी स्त्री की रक्षा करता है वही अपनी संतान, चरित्र, परिवार तथा अपने साथ अपने धर्म की रक्षा कर पाता है।

संपादकीय व्याख्या-आजकल स्त्रियों को सार्वजनिक रूप से अपमानित करने केे समाचार आये दिन अखबारों में छपते और टीवी चैनलों पर दिखाये जाते है। इससे यह जाहिर होता है कि उनके परिवार के पुरुष सदस्य उनके प्रति अपने दायित्वों में कहीं न कहीं कमी रखते है। स्त्रियों पर दैहिक आक्रमण ही नहीं बल्कि वाणी से भी कोई अभद्र शब्द कहना निषेध है। अब तो सरकार ने स्त्रियों के रक्षा के करने के लिये अनेक प्रकार के कानून भी बना दिये हैं। स्त्री के सम्मान की रक्षा ही धर्म की रक्षा है। कई लोग इस प्रकार के अहंकार में रहते हैं कि वह चूंकि पुरुष हैं इसलिये वहीं घर का खर्च चलाने के साथ धन का संग्रह करेंगे। ऐसे लोग स्वयं ही परेशानी बुलाते है। उनको घर चलाने का जिम्मा अपनी गृहिणी को ही सौंपना चाहिए। वह उससे बचत भी करतीं हैं और समय आने पर अपने ही पति और परिवार की सहायता करतीं हैं।

Tuesday, 6 May, 2008

संत कबीर वाणी:स्वार्थी लोग करते हैं झूठी प्रशंसा Sant Kabir Speech: People are selfish false praise

स्वारथ कूं स्वारथ मिले, पडि पडि लूंबा बूंब
निस्प्रेही निरधार को, कोय न राखै झूंब


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब लोग अपने हृदय में स्वार्थ की भावना लेकर परस्पर मिलते हैं तब एक दूसरे की आवश्यकता से अधिक प्रशंसा करते हैं। इस मिलन पर वह लोग बहुत प्रसन्न होते हैं। परंतु जो निस्वार्थ और निष्काम भाव से मिलते हैं वह इस तरह से एक दूसरे के प्रति दिखावे का सम्मान नहीं व्यक्त करते।

संसार से प्रीतड़ी, सरै न एकौ काम
दुविधा से दोनों गये, माया मिली न राम


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि संसार के विषयों की प्रवृत्ति के लोगों से संपर्क रखने पर शुभ कार्य नहीं होता। इससे तो व्यर्थ ही दुविधा में पड़ कर दोनों ही तरफ खाली हाथ रह जायेंगे। न तो इससे कोई धन की प्राप्ति होगी न ही भगवान की भक्ति ही कर पायेंगे।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-हमारे यहां सत्संग की परंपरा है जिसमें सम्मिलित होकर अपने हृदय की शुद्धि कर सकते हैं-यह अलग बात है कि लोग वहां भी अपने वार्तालाप में संसार विषयों पर ही चर्चा करते हैं। जिसे देखो वही अपने मित्रों और रिश्तेदारों को एकत्रित कर समाज में अपनी शक्ति का प्रदर्शन करता है। सच तो यह है कि मित्र, परिवार और अन्य संबंध मात्र स्वार्थ के आधार पर ही होते हैं। सामने लोग प्रशंसा करते हैं जो कभी कभी स्वयं को झूठी लगती है। अगर अपने ज्ञान चक्षु खोलकर ऐसे लोगों के परस्पर मिलन को देखें तो इस बात का अनुभव होगा कि सभी एक दूसरे की झूठी प्रशंसा करते हैं। सच्ची प्रशंसा वही है जो पीठ पीछे हो। अतः अपने मुख के समक्ष की गयी प्रशंसा पर कभी अपने हृदय में अहंकार को स्थान नहीं देना चाहिए।

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1.Sant Kabir G says that the head when people in your heart to the spirit of mutual self-interest, then get each other's needs more than praise them. The meeting of the people are very happy. But the sense of selfless get it this way, a second show of respect not expressed.




2.Sant Kabir G says that the head of the subjects of the world's people to maintain contact on the good work does not. It is futile to the dilemma facing both sides in the left hand will be empty. It's not the receipt of any money not only God's will only be able devotional.


In the context of the current interpretation - There Satsang is the tradition of their own which included correction of the heart can - it's another matter that the people of the world where their conversation topics on the talk. Look what your friends and relatives of the same collecting society of their power of the performance. The fact is that friends, family and other relations on the basis of mere self-interest are. In front of people who are sometimes praised itself seems to be false. If your knowledge of such eye opening to get people to see if there is mutual experience that all the false praise to each other. The same is true appreciation of the behind the back. So your mouth before your heart ever been on the appreciation of the place of arrogance should not.

Saturday, 3 May, 2008

रहीम के दोहे:अहंकार है आदमी के छोटे होने का प्रमाण

बड़े पेट के भरन को, है रहीम देख बाढि
यातें हाथी हहरि कै, दया दांत द्वे काढि

कविवर रहीम कहते हैं कि जो आदमी बड़ा है वह अपना दुख अधिक दिन तक नहीं छिपा सकता क्योंकि उसकी संपन्नता लोगों ने देखी होती है जब उसके रहन सहन में गिरावट आ जाती है तब लोगों को उसके दुख का पता लग जाता है। हाथी के दो दांत इसलिये बाहर निकल आये क्योंकि वह अपनी भूख सहन नहीं कर पाया।

बड़े बड़ाई नहिं तजैं, लघु रहीम इतराइ
राइ करौंदा होत है, कटहर होत न राइ

कविवर रहीम कहते हैं कि बड़े आदमी कभी अपने मुख से स्वयं अपनी बड़ाई नहीं करते जबकि छोटे लोग अहंकार दिखाते है। करौंदा पहले राई की तरह छोटा दिखाई देता है परंतु कटहल कभी भी राई के समान छोटा नजर नहीं आता।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-कहा जाता है कि धनाढ्य व्यक्ति इतना अहंकार नहीं दिखाता जितना नव धनाढ्य दिखाते हैं। होता यह है कि जो पहले से ही धनाढ्य हैं उनको स्वाभाविक रूप से समाज में सम्मान प्राप्त होता है जबकि नव धनाढ्य उससे वंचित होते हैं इसलिये वह अपना बखान कर अपनी प्रभुता का बखान करते हैं और अपनी संपत्ति को उपयोग इस तरह करते हैं जैसे कि किसी अन्य के पास न हो।

वैसे बड़ा आदमी तो उसी को ही माना जाता है कि जिसका आचरण समाज के हित श्रेयस्कर हो। इसके अलावा वह दूसरों की सहायता करता हो। लोग हृदय से उसी का सम्मान करते हैं जो उनके काम आता है पर धन, पद और बाहुबल से संपन्न लोगों को दिखावटी सम्मान भी मिल जाता है और वह उसे पाकर अहंकार में आ जाते हैं। आज तो सभी जगह यह हालत है कि धन और समाज के शिखर पर जो लोग बैठे हैं वह बौने चरित्र के हैं। वह इस योग्य नहीं है कि उस मायावी शिखर पर बैठें पर जब उस पर विराजमान होते हैं तो अपनी शक्ति का अहंकार उन्हें हो ही जाता है। जिन लोगों का चरित्र और व्यवसाय ईमानदारी का है वह कहीं भी पहुंच जायें उनको अहंकार नहीं आता क्योंकि उनको अपने गुणों के कारण वैसे भी सब जगह सम्मान मिलता है।
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Rahim's couplets: arrogance of the small man's testimony
Rahim says that big man who is suffering more days, it can not hide its prosperity because people have seen a decline in tolerance when his life is his grief to the people it takes to address it. So two out of elephant teeth come because he could not tolerate their hunger.


Rahim says that the big man his mouth sometimes do not boast their own people while the small show of arrogance. Like the first gooseberry mustard small but appears like a small mustard jackfruit ever is missing.

In the context of the current interpretation - is said that such a wealthy person does not show arrogance as the newly rich show. It appears that they are already naturally rich in the society honours is the newly wealthy are deprived of it because his deeds to his mastery of his deeds, and to use the property as a way to Others have not.

However, the big man is considered to be the same as that which best practice in the interest of society. In addition, he helps others. The heart of the same people who respect their work comes on the money, rank and power from rich people to get respect is to mock him and he is satisfied they are in arrogance. Today, all that money and place the condition of society are sitting on top of what the people of the dwarf character. He is not eligible to sit on top of that illusory when he sits on are, they have the arrogance of his power is. The people of character and integrity of the business, is the arrogance they do not go anywhere access to their properties because they are coming because even though there is respected everywhere.

Friday, 2 May, 2008

रहीम के दोहे:जहाँ छलकपट हो वहाँ नहीं जाएं

रहिमन वहां न आइए, जहां कपट को हेत
हम तन ढारत ढेकुली, सींचत अपनो खेत

कविवर रहीम कहते हैं कि वहां कतई न जाईये जहां कपट होने की संभावना है। रात भर ढेंकली कोई किसान चलाता रहे पर कोई कपटी उसके खेत का पानी अपनी खेत की तरफ कर ले ऐसा भी होता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-छलकपट तो पहले भी था पर अब तो आधुनिक तरीके आ गये हैं और इस तरह छलकपट होता है कि कई बार पता भी नहीं चलता कि हमने क्या और क्यों गंवाया? पहले तो आमने-सामने ही कपट होता था पर अब तो मोबाइल और इंटरनेट के आने से तो वह व्यक्ति हमारी आंखों के सामने भी नहीं होता जो हमें ठगता है। खासतौर से उन युवक और युवतियों को सजग रहना चाहिए जो अपने लिये जीवन साथी ढूंढते है। यहंा तो इतना झूठ बोला जा सकता है कि जिसे पकड़ना संभव ही नहीं है। कोई छद्म नाम रखकर, किसी बड़े परिवार से संबंध बताकर या अपने को बहुत व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत कर धोखा देना बहुत आसान है। एक की जगह दूसरे की फोटो भी रखी जा सकती है। ऐसे सैंकड़ों मामले हैं। अभी कई लोगों का यह पता भी नहीं होगा कि हिंदी में ब्लाग लिखे जाते हैं और वह इन कपटों की जानकारी बहुत अच्छी तरह रखते हैं। जो लोग इंटरनेट पर सक्रिय हैं उनको नित-प्रतिदिन हिंदी के ब्लाग पढ़ना चाहिए क्योंकि जिस तरह के धोखेबाजी की जानकारी यहां मिल जाती है अखबारों में भी नहीं मिल पाती।

इसीलिये कपट से बचने के लिए जितना हो सके सावधानीपूर्वक अपने संबंध बनाने चाहिए। नई तकनीकी ने आजकल धोखे के नये तरीकों को जन्म दिया है जिससे यह आसान हो गया है कि न नाम का पता चले न शहर की जानकारी हो और किसी से भी धोखे का शिकार जाये।

Thursday, 1 May, 2008

रहीम के दोहे:यह जीवन फिर नहीं मिलता

रीति प्रीति सबसों भली, बैर न हित मित गोत
रहिमन याही जनम की, बहुरि न संगति होत

कविवर रहीम कहते है कि इस जीवन में सबसे प्रेम से पेश आओ। न किसी से बैर करो न अपने मित्र और गौत्र से हित की चाह करो। यह मनुष्य जीवन फिर मिलेगा कि नहीं कहना कठिन है।

वर्तमान संदर्भ मे व्याख्या-आप देखेंगे कई ऐसे पेशेवर प्रवचनकर्ता हैं जो लोगों को सकाम भक्ति की तरह प्रेरित कर दावा करते हैं कि अगले जन्म में भी मनुष्य योनि प्राप्त होगी। यह उनका ढोंग है। सच तो यह है कि यह जीवन अनंत रहस्यों से भरा पड़ा है और इसका पूरा ज्ञान किसी को नहींं। अगला जन्म होता है भी कि नहीं या अगली योनि में कौन क्या बनता है इसका आभास किसी को नहीं हो सकता चाहे कोई कितना बड़ा तत्वज्ञानी होने का दावा क्यों न करे। जो तत्वज्ञानी है वह जीवन जीने के बेहतर तरीके तो बताते हैं पर उसके बाद का अनुमान तो वह भी नहीं कर पाये। इसलिये बेहतर यही है कि हमें अपने जीवन में सबसे प्रेम का बर्ताव करना चाहिए और इस स्वार्थ से भरे संसार में अपने मित्रों और रिश्तेदारों से कोई आशा न कर निष्काम भाव से अपना कर्म करना चाहिए। हम अगर दूसरे को सुख देते हैं तो हमें सुख मिलेगा, और अगर दूसरे को दुख देंगे तो हमें चैन से रहने की आशा भी नहीं करना चाहिए। अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए अपने दैनिक कार्यों के साथ भगवान की भक्ति भी करना चाहिए। इसके साथ ही जो अगले जन्म में मनुष्य योनि दिलाने का दावा करते हैं ऐसे कथित लोगों की बातों को अनदेखा कर देना चाहिए।