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Thursday, July 28, 2016

ध्यान से मन का व्यायाम होता है-हिन्दी चिंत्तन लेख(Dhyan se man ka vyayam hota hai_Hindu Thouhgt Article)


हमारे देश में श्रीमद्भागवत गीता का नाम बहुत श्रद्धा व विश्वास से लिया जाता है उसे देखते हुए तो हमारे देश में मानसिक, शारीरिक तथा वैचारिक रूप से सभी लोगों को अत्यंत मजबूत होना चाहिये पर ऐसा दिखता नहीं।  दरअसल गीता के ज्ञान का पढ़कर उसे समझना फिर व्यावाहरिक में उतारना सहज नहीं है।  उसमें भगवान श्रीकृष्ण ने भृकुटि पर ध्यान रखकर साधना करने का जो नियम दिया है वह अत्यंत व्यापक विषयों में कार्यसाधन की दृष्टि से योगदान देता है।
कहा जाता है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का वास रहता है। यह भी माना जाता है कि स्फूर्त मन से देह में भी उत्साह रहता हैं।  इसका अर्थ यह है कि तन और मन का आपस में स्थाई संबंध जीवन भर रहता है। हमारे दर्शन के अनुसार तो मनुष्य की पहचान व नियंत्रणकर्ता उसका मन ही है। शरीर स्वस्थ रखने के लिये अनेक तरह के उपाय और दवाईयां हैं। कुछ लोग नित व्यायाम भी करते हैं।  मगर मन का व्यायाम कैसे हो? इसका उपाय कोई चिकित्सक, शिक्षक या पेशेवर विद्वान नहीं बता पाता। देह के अंग पकड़कर इधर से उधर घुमाये जा सकते हैं मगर मन को पकड़ना सहज ही नहीं असंभव भी लगता है। यही कारण है कि हमारे देश में आजकल पंचतारा चिकित्सालय तथा विश्वख्यात चिकित्सकों की उपस्थिति के बावजूद स्वास्थ्य का सूचकांक गिरता जा रहा है। संस्कृतनिष्ठ नामों से सुशोभित निजी चिकित्सालय बाहर से स्वर्ग जैसे प्रतीत होते हैं पर जिसमें अस्वस्थ धनिक ही वास करने की पात्रता रखते हैं।
संसार में भौतिकतावाद ने देह के विश्राम के लिये अनेक विलासी साधनों का सृजन किया है पर मन के विश्राम के सारे स्थान नष्ट किये हैं। बाह्यकेंद्रित मनुष्य का मन एकांत में ध्यान साधना की बात सोच भी नहीं सकता। ध्यान वह क्रिया है जो चंचल मन को ठहराव देती है। देह की सूक्ष्म इंद्रियों में इस ठहराव से सुखद अनुभूति होती है मगर माया के कूंऐ का मैंढक मन कभी उससे बाहर निकलना नहीं चाहता। जिन लोगों को मन में संताप है उन्हें ध्यान करना ही चाहिये।  ध्यान से बाह्य स्थिति भले ही प्रत्यक्ष न बदले पर उनके प्रति बदले दृष्टिकोण से मनुष्य में स्थिरता आती है और वह समस्याओं से पार पा सकता है।
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Sunday, July 3, 2016

वैश्विक धार्मिक आतंकवाद के विरुद्ध वैचारिक बहस की आवश्यकता-हिन्दी चिंत्तन लेख (vishwa mein Dharmik aatankwad ke viruddh vaicharik bahas ki jaroorat-Hindi Thought Article

                     हमारे यहां के विद्वान तीन विचारधाराओं के हैं-प्रगतिशील, जनवादी तथा राष्ट्रवादी-जिनकी यह धारणा रही है कि धार्मिक आतंकवाद अशिक्षा, गरीबी तथा बेबसी के कारण युवाओं को अपने जाल में फंसाता है।
ढाका में हमला करने वाले
1. सभ्रांत तथा अमीर घरानों की संताने हैं।
2. सभी उत्कृष्ट शैक्षणिक संस्थानों से उच्च शिक्षा प्राप्त हैं।
3.आधुनिक संचार साधनों के उपयोग में इतना माहिर कि
होटल पर कब्जा करने के बाद सीधे दृश्य अपने चैनल पर भेजे।
हैदराबाद में भी हाल ही में गिरफ्तार युवाओं की स्थिति भी कुछ ऐसी है।
ऐसे में तीनों विचाराधाराओं के विद्वान क्या अपनी यह धारणा बदलेंगे कि आतंकवाद का कारण लोगों की निजी स्थिति नहीं वरन् संकट कहीं न कहीं विश्व के धार्मिक समाजों के अंदर ही वैचारिक संकट का है।
इधर हमारे भारतीय समाज में भी संकट कम नहीं है क्योंकि


1.तीव्र गति से शराब पीकर गाड़ी चलाने वाले धनिक वर्ग के युवा
मार्ग पर चलते सामान्य लोगों को पत्थर या कीड़ा समझते हुए कुचल जाते हैं।
1.मित्र के नाम निम्म वर्ग के युवाओं को गुलाम समझकर चलते है।
3.अपने संरक्षकों के पद, प्रतिष्ठा तथा पैसे की वजह से
कानून को खरीदने का विषय समझते हैं।
4.युवतियों को टाईमपास मानकर उनके साथ संबंध बनाते हैं।
एक अध्यात्मिक साधक के रूप में हमारा मानना है कि
1.शिक्षा में भारत के प्राचीन अध्यात्मिक साहित्य को शामिल करना चाहिये।
2.हिन्दू समाज को समझायें कि वह मुगालते में रहकर
जाति, भाषा, क्षेत्र तथा सामाजिक आधार पर भेदभाव से परे रहे।
3.दहेज, खर्चीली विवाह पंरपरा तथा तेरहवीं की प्रथा से कम से कम दस वर्ष दूर रहे।
4.हिन्दू धर्म के रक्षक बजाय दूसरे समाजों को साथ लेने के
प्रयास करने की बजाय अपने समाज के लोगों को
दैहिक, मानसिक तथा वैचारिक रूप से शक्तिशाली बनाने का काम करें।
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                     ढाका में हमलावार अमीर घरानों के होने के साथ ही शिक्षित भी थे-जनवादी ध्यान दें गरीब व अशिक्षितों से बागी होने का हक भी छीन लिया गया है। अभी तक जनवादी तर्क देते थे कि गरीब लोग बागी होकर बंदूक उठाते हैं। ढाका के हमलावर अमीर घरानों के आतंकियों ने उनका तर्क खारिज किया है। ढाका के आतंकी अमीरों की औलाद व शिक्षित थे-धार्मिक आंतक को गरीब व अशिक्षित से जोड़ने वालों को अब अपने तर्क पर दोबारा सोचना चाहिये। भारत के विद्वानों को ढाका के आतंकियों की शिक्षा व अर्थ की स्थिति देखते हुए अपनी यह राय बदली होगी कि विकास व शिक्षा से धार्मिक आतंक कम होगा।
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                        बंग्लादेश के रेस्टॉरेंट में हुई घटना प्रचारतंत्र के उस लोभ का परिणाम है जिसमें वह सनसनी के प्रचार में विज्ञापन प्रसारण से हिंसा के लाभ देखता है। लगता है कि आतंकी संगठन वसूली के लिये प्रचारतंत्र में नाम चमकाने के लिये हिंसा कराते हैं और कथित बुद्धिमान इस जाल में फंस जाते हैं। जैसे ही कहीं आतंकी हिंसा होती है विश्व भर के प्रचार माध्यम उसका सीधा प्रसारण करने के बाद भी लंबी चौड़ी बहस करते हैं जिससे हिंसक तत्व खुश होते हैं। देखा जाये तो जैसे जैसे प्रचारतंत्र की ताकत बड़ी है आतंकवाद भी उसी गति से बढ़ा है क्योंकि कहीं न कहीं वह इसी से खाद पानी पाता है। प्रचारतंत्र में सक्रिय लोग यदि सतर्कता पूर्वक समाचार व बहस के विषयों का चयन इस तरह करें कि आतंकवादी हतोत्साहित हों तो अच्छा रहेगा।
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Monday, June 20, 2016

21 जून 2016 अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर विशेष लेख(Special article on 21 June International yoga Day)

            कल अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस है। प्रचार माध्यमों के लिये यह दिन उसी तरह ही आय का साधन बन गया है जैसे कि वेलंटाईन डे, मातृपितृदिवस तथा मित्र दिवस आदि। अगर हम इन प्रचार माध्यमों के विशेषज्ञ उद्घोषकों के प्रश्नों पर विचार करें तो अजीब लगता है।  एक उद्घोषक ने एक अतिथि क्रिकेट खिलाड़ी से पूछा-‘क्या जिम से योगा को चुनौती मिल रही है।’
        खिलाड़ी ने जवाब दिया वह तो हमारी समझ में नहीं आया पर दूसरी अतिथि रुपहले पर्दे की अभिनेत्री ने जवाब दिया कि यह दोनों अलग विषय है।
        योगसाधना के आठ भाग हैं-यम, नियम, संयम, प्रत्याहार, आसन, प्राणायाम, ध्यान, धारणा तथा समाधि। हम आजकल प्रचार में जिसे योग बता रहे हैं उसको आसन व प्राणायाम तक सीमित किया गया है। शायद इसका कारण इन दोनों में ही साधक दैहिक रूप से अधिक सक्रिय रहता है जिसका फिल्मांकन ज्यादा आकर्षक लगता है।  जबकि यम, नियम, प्रत्याहार, ध्यान, धारण व समाधि आंतरिक सक्रियता से संभव होती हैं जिसमें साधक की सक्रियता नहीं होती। इस कारण दर्शकों ऐसी क्रियायें नहीं बांध सकती जिससे टीवी चैनल इससे बचते हैं।
        योग साधना के आष्टांग भागों का अभ्यास करने वाला साधक अध्यात्मिक रूप इतना पारंगत हो जाता है कि उसकी बुद्धि कंप्यूटर की तरह स्वतः काम करती है तो मन पालतू होकर उसका दास बन जाता है। वह मन जो मनुष्य का स्वामी होकर इधर से उधर दौड़ाता है वह योग संपन्न बुद्धि का दास बन जाता है। अध्यात्मिक रूप से संपन्न साधक सासंरिक विषयों में दूसरों से अधिक दक्ष होता है। अतः योग साधना का अभ्यास नियमित करें तब इसके महत्व का आभास होगा वरना तो अनेक लोग बिना अभ्यास के इसके महत्व पर चर्चा कर रहे हैं।
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प्रस्तोता-दीपक ‘भारतदीप

Wednesday, June 1, 2016

तूफान की तरह सांस ले रहे सभी शहर-दीपकबापूवाणी (Toofan ki tarah saans le rahe shahar-DeepakBapuWani)

सबकी भलाई का दावा शोरकर जतायें, उगाहें धन पर समाजसेवक कहलायें।
‘दीपकबापू’ तिकड़म से करें अपना काम, बेबस का दिल हमेशा वादे से बहलायें।।
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इंसानी नीयत का पता नहीं चलता, अक्लमंद शब्द के अर्थ से छलता।
‘दीपकबापू’ भावनाओं के  व्यापार में, हर रस सौदे की शक्ल में ढलता।।
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तूफान की तरह सांस ले रहे सभी शहर, हर कदम मिलता हादसे का कहर।
समुद्र मंथन में अमृत पी गये देवता, ‘दीपकबापू’ बनाते नकल में सब जहर।।
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कोई रोये तो तरस आता नहीं, कोई हंसे तो पसंद आता नहीं।
‘दीपकबापू’ हैरान है उन लोगों पर, कोई रस जिनको भाता नहीं।।
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जंगल खा गया इंसान शेर हुए लापता, चालाक लोग करें लोमड़ी जैसी खता।
संसार में छा गया कागज का राज, ‘दीपकबापू’ पत्थरों में ढूंढते अपना पता।।
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लालची का नहीं होता ज्ञान से वास्ता, माया महल ही जाता उसका रास्ता।
‘दीपकबापू’ धर्म दाव पर लगा देते, काम क्रोध लोभ से जो होते बावस्ता।।
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धर्म की रक्षा अर्थ से बताते हैं, ज्ञान से शक्तिशाली धन बताते हैं।
‘दीपकबापू’ पाखंड का जाल बुनकर, भक्तों के भय से कमाते हैं।।
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दिमाग में राजकाज की समझ नहीं है, जहां भीड़ का अंगूठा सहमति वहीं है।
‘दीपकबापू’ दाल रोटी के फेर में फंसे, जहां चूल्हे पर पके घर भी वहीं है।।
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चिड़िया तिनका तिनका चुन बनाती घर, इंसान छत के लिये रहता दर-ब-दर।
‘दीपकबापू’ किश्तों में चलाते जिंदगी, उम्र जंग में गुजरे मिले न चैन की डगर।।
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उत्सव में अब खुशी कहां मिलती है, चम्मच समेटे चावल थाली हिलती है।
‘दीपकबापू’ दिल हो गये पत्थर जैसे, जीभ केवल खाने पर ही पिलती है।।
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पत्थर के बुत पर भले यकीन करना, व्यर्थ है मांस के पुतले याचना करना।
संगीनों के पहरे में अमीर बने राजा, ‘दीपकबापू’ न जाने भभकी से डरना।।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Sunday, May 29, 2016

योग साधना में आसन से शरीर शुद्ध होता है-पतंजलि योग दर्शन (yoga Sadhana mein aasan se sharir shuddh hota hai-PatanjaliYogaDarshan)

पतंजलि योग सूत्र में कहा गया है कि
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योगाङ्गनुष्ठादशुद्धक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः।।
                       हिन्दी मे भावार्थ-योग से अंगों का अनुष्ठान करने से अशुद्धि का क्षरण होता है जिससे ज्ञान का प्रकाश होने से विवेक की प्राप्ति होती है।
                        योग साधना के अभ्यास से  मनुष्य देह, मन तथा विचार से अत्यंत मजबूत होता है। उसकी बुद्धि हमेशा ही स्वाभाविक रूप से सतर्क तथा चेतनामय रहती है जिसे किसी अप्रत्याक्षित संकट से वह विचलित नहीं होता। इसलिये बिना मांगे मध्यम वर्ग के लोगों को हमारी सलाह है कि अपनी आत्मरक्षा के लिये वह योगसाधना का सहारा लें। योगसाधना से ही ऐसी सिद्धि मिल सकती है कि न पास हथियार हो न दल फिर भी संकट से आत्म रक्षा की जाये। अब समय आ गया है जब छुईमुई होकर उपभोग में रत रहने से काम नहीं चलेगा। अतः योगसाधना अपनायें। अब अपने देश में अंग्रेजनीति से नहीं वरन् कृष्णनीति से ही काम चलेगा जिसमें योगसिद्धि होना आवश्यक है।
हमने अपने प्राचीन इतिहास में अनेक सिद्धों के नाम सुने हैं। इन सिद्धों ने योग साधना के आठों अंगों में महारत हासिल किया था। उनके जीवन प्रसंगों से हमें प्रेरणा लेना चाहिये।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Saturday, May 7, 2016

प्राणायाम से देह व मन में स्फूर्ति आती है- पतञ्जलि योग दर्शन के आधार पर चिंत्तन लेख(A Hindi Article based on PatanjaliYogaDarshan)

श्रीमद्भागवत गीता में प्राणायाम को हवन तथा यज्ञ माना गया है। अपानवायु से प्राणवायु तथा प्राणवायु से अपनावायु में का संचार आहुति कहा गया है। यदि किस मनुष्य को प्रतिदिन श्रम करना पड़ता है तो भी उसे आसन पर स्थिर होकर प्राणायाम अवश्य करना चाहिये। इससे मन की शुद्धि होती है जो कि सार्थक जीवन के लिये आवश्यक है।

पतंजलि योग दर्शन में कहा गया है कि
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‘उदानजयाज्वलपङ्कण्टकादिष्वसङ्गउत्क्रान्तिश्च।’
हिन्दी में भावार्थ-‘उदानवायु को जीत लेने से जल, कीचड़ व कण्टकादि का शरीर से संपर्क नहीं रहता जिससे उसकी ऊर्ध्वगति भी होती है।’
व्याख्या-देह में वायु तत्व के पांच रूप है।
1. प्राणवायु जो नासिका से प्रविष्ट होता है।
2. अपानवायु जो नाभि से पांव तक विचरण करता है
3. समानवायु जो हृदय से नाभि तक रहता है।
4. व्यानवायु शरीर की समस्त नाड़ियों में विचरण करता है।
5. उदानवायु जो कंठ में रहता है। अंत समय में सूक्ष्म तत्व का इसी के सहारे बाहर गमन होता है।
  योगसाधना के नियमित अभ्यास से वायुतत्व के समस्त तत्वों पर नियंत्रण हो जाता है। वायुतत्व पर नियंत्रण से मन का भटकाव समाप्त होता है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Saturday, April 30, 2016

देव बनने से डर लगता है-हिन्दी क्षणिकायें #Dev banane se Dar lagta hai-HindiShortPoem)

लोगों में सुनने की
ताकत नहीं बची
सच कहने में डर लगता है।

तय करना कठिन है
गिरते को बचाये
या अपने हाल पर छोड़ें
देव बनने से डर लगता है।
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गनीमत है
मानवता के साथ
प्यासे भी जिंदा है
वरना बोतलों में
पूरा पानी भर जाता।

सौदागरों के बाज़ार में
दाम चढ़ जाते आकाश पर
दान अगर मर जाता।
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कोई वादा करता है
पूरा करेगा
बिल्कुल पक्का समझना।

मजबूरी अगर होगी
तो पूरा नहीं भी करेगा।
बिल्कुल पक्का समझना।
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हमारे शब्द
उनका दिल नहीं छू पायेंगे
यह सोच कुछ कहा नहीं।

तसल्ली होती है
जुबानी जंग से बचे
हमारा मौन भी बहा नहीं।
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दिल की तार
अंतरिक्ष में जुड़ी होती
हम अपनी बात कह देते।

कागज कालम का
समय रहा नहीं
होठ टांकते शब्द
सामने पर्दे पर 
हम यूं ही कविता कह देते।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Thursday, April 14, 2016

दौलतमंदों की हुकुमत में-हिन्दी क्षणिकायें (Hindi Short Poem)

ठेले पर सामान के
दाम से जूझते हैं
मॉल में खरीददारी पर
गूंगे बहरों की तरह टूटते हैं।
माया के खेल में
कहीं लूटे
कहीं लूटते हैं।
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हमने तो वफा निभाई
अपना समझकर
वह कीमत पूछने लगे।
क्या मोल बताते
अपने जज़्बातों का
जो नहीं जानते पराये सगे।
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राजा अंगुल में
प्रजा चंगुल में
सिर पर विराजे पीर।
तब ताकतवर
हो जाते अमीर,
सस्ता लगता उन्हें
गरीब का ज़मीर।
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सोने चांदी की चाहत ने
इंसानों की
अक्ल छीन ली है।

धरती पर बिखरा
पेट भरने का सामान
पर कमअक्लोंने दर्द की
फसल बीन ली है।
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दौलतमंदों की हुकुमत में
बेबस लोग
गरीब हो जाते हैं।
खातों में लिखा जाता
जब परिश्रम का भाव
फूटे नसीब हो जाते हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Saturday, March 26, 2016

पुराने व्यक्तित्वों के पीछे अपनी आयोग्यता छिपाने का प्रयास (A Hindi Article on shahi Diwas)


                 आजादी के बाद से हमारे यहां लोकतंत्र की आड़ में एक अनवरत बौद्धिक संघर्ष रहा है-अब यह पता नहीं कि वह स्वप्रेरित है या प्रायोजित। आजकल आजादी का नारा फिर लग रहा है।  राष्ट्रवादियों के शिखर पर आने के बाद उलटपंथियों का बरसों पुराना चला आ रहा बौद्धिक प्रभाव समाप्ति की तरफ जा रहा है तो वह स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हुए शहीदों के व्यक्तित्व का नवीनीकरण करने का प्रयास कर रहे हैं।  1947 से पूर्व जो स्वतंत्रता आंदोलन चला था वह केवल नारों पर आधारित था।  उसके बाद देश में एक कुशल राज्य प्रबंध की आवश्यकता था पर लोकतंत्र में जनमानस में प्रभाव बनाये रखने के लिये पहले की तरह ही नारों का उपयोग किया गया। श्रीअन्नाहजारे ने कुछ वर्ष पूर्व भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन चलाया था उसे भी कुछ विद्वानों ने दूसरा स्वतंत्रता आंदोलन कहा था-अगर हम उनकी बात मान लें तो इसका अर्थ तो यह है कि देश अभी स्वतंत्र हुआ ही नहीं। 
अब हमें बौद्धिक रूप से व्यवहारिक होना चाहिये।  देश को स्वतंत्र रूप से चलते हुए 70 वर्ष हो गये। देश के स्वतंत्रता में योगदान देने वाले महापुरुषों के नाम इतिहास में दर्ज हैं और जिज्ञासु लोग उन्हें पढ़ सकते हैं। उनके नाम पर बार बार लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचने की आवश्यकता नहीं है। पुराने महान व्यक्त्तिवों के पीछे नये बुद्धिजीवी अपनी खाली सोच छिपाने का ऐसा प्रयास कर रहे हैं जिस पर हंसा ही जा सकता है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Sunday, March 13, 2016

शोर मचाकर झूठ भी सच बनाते-दीपकबापूवाणी (Shor Machakar Jhooth Bhi sach banate-DeepakBapuWani)

इंसान की पहचान अब मिले कहां, मुखौटे के पीछे नीयत छिपी यहां।
‘दीपकबापू’ दिल को  समझा लिया, वफा के बिना जीना सीख यहां।।
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शोर मचाकर झूठ भी सच बनाते, घृणा फैलाकर जहान में अमन लाते।
‘दीपकबापू’ लिया भलाई का ठेका, गरीबउद्धार के नाम खूब धन पाते।।
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जलाकर शांति के घर जो हंसते, घृणा की आग में वह भी फंसते।
‘दीपकबापू’ विध्वंस में मजा ढूंढते, कभी हाथ से बने गड्ढे मे धंसते।।
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दिल तोड़ते ऐसे शब्द वह बोलें, हमदर्दी के नाटक में घृणा घोलें।
‘दीपकबापू’ चले उल्टी अक्ल पर, तरक्की में तबाही की राह खोलें।।
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करें खुद जख्म ज़माने का दिया बतायें, चलने में लाचार पथज्ञान बतायें।
‘दीपकबापू’ पाई बोलने की आजादी, चीख कर अपने स्वर में दम लायें।।
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बहुत है समाज से धोखा करने वाले, वफा बंद कर लगा दिये ताले।
लगा रहे मुख से भलाई के नारे, घूमते ‘दीपकबापू’ पीछे चाकू डाले।।
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मुख से बोलकर अपनी शक्ति गंवायें, जंग में जाकर वही मुंह की खायें।
मुक्के का प्रहार सदा सफल नहीं, ‘दीपकबापू’ कभी मौन से भी सतायें।।
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भद्रभाषा में अपशब्दों की करें तलाश, जोश से करें विनम्रता का नाश।
‘दीपकबापू’ सस्ते में वाणी बेचने वाले, शब्द से खेलें समझकर ताश।।
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कर्म से इतिहास की धारा नहीं मोड़ते, वही अपना नाम वीरता से जोड़ते।
‘दीपकबापू’ मुक्काछाप क्रांतिकारी हैं, नारे लगाकर कागजी पत्थर तोड़ते।।
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तंग दिमाग में अपनी सोच नहीं होती, अड़ियल विचार में लोच नहीं होती।
‘दीपकबापू’ चलायें दर्द का व्यापार, वहां लगायें तेल जहां मोच नहीं होती।।
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