Friday, 10 July, 2009

संत कबीर वाणी-अंधे हाथी छूकर करते हैं अपना अपना बखान (andhon ka hathi-sant kabir vani)

भीतर तो भेदा नहीं, बाहर कथै अनेक।
जो पै भीतर लखि पर, भीतर बाहिर एक।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अंदर तो प्रवेश किया नहीं पर उस आत्ममय रूप के बाहर अनेक वर्णन किये जाते हैं। एक बार अगर हृदय में उस आत्मा रूप को समझ लें तो फिर अंदर बाहर एक जैसे हो जायेंगे।
अन्धे मिलि हाथ छूआ, अपने अपने ज्ञान।
अपनी सब कहैं? किसको दीजै कान।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अंधे हाथी को छूकर अपना ज्ञान बखान करना शुरु कर जब केवल अपने ही दृष्टिकोण सत्य कहने लगें तो ऐसे में किस पर ध्यान दे सकते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे देश में अनेक प्रकार के देव देवताओ की मान्यता है। कहने को तो कहा जाता है कि परमात्मा एक ही स्वरूप है पर फिर भी कुछ कथित साधु संत अपने अपने हिसाब से हर स्वरूप को श्रेष्ठ बताते हैं। कुछ तो ऐसे हैं जो हर स्वरूप बखान करते हैं। अध्यात्मिक ज्ञान बेचना एक तरह से व्यवसाय हो गया है। जिस तरह किताब बेचने वाला दुकानदार तमाम तरह की किताबें बेचता है पर उसे सभी किताबों का ज्ञान नहीं होता वह हाल इन धर्म बेचने वालों का है। ऐसे भी दुकानदार देखे जा सकते हैं जो स्वयं एक ही भाषा जानते हैं पर उनकी भंडार में बिकने के लिये अनेक भाषओं किताबें रहती हैं। यही हाल धर्म बेचने वाले कथित साधुओं का है। वह समय और पर्व के अनुसार भगवान के हर स्वरूप की व्याख्या करते हैं पर उसको जानते स्वयं भी नहीं है। उनको तो बस उस पर बोलना है और क्योंकि यह उनकी आय का जरिया है।
सच बात तो यह है कि जो सत्य स्वरूप आत्मा को समझ लेता है वह कोई छद्म रूप धारण नहीं करता। हमेशा अंदर और बाहर से एक जैसा ही होता है।
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Tuesday, 7 July, 2009

संत कबीर वाणी-मांस का भक्षण मनुष्य के लिये नहीं (Kabir ke dohe)

यह कूकर को भक्ष है, मनुष देह क्यों खाय।
मुख में आमिष मेलहिं, नरक पड़े सो जाये।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मांस तो श्वान का भोजन है फिर मनुष्य की देह पाकर उसे क्यों खाये। यह जानते हुए भी जो मांस खायेगा वह नरक में जायेगा।
मांस मछलियां खात है, सुरा पान सों हेत।
ते नर जड़ से जाहिंगे, ज्यों मूरी का खेत।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो मनुष्य मांस और मछली खाना और शराब पीना पसंद करते हैं वह नराधम मूली के खेत के समान है जो जड़ से नष्ट हो जायेंगे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जिस तरह समाज में मांस और मदिरा के सेवन की प्रवृत्ति बढ़ रही है वैसे ही अपराध और ठगी का पैमाना भी बढ़ा है। पहले तो यह स्थिति थी कि शराब पीने वाले को समाज में हेय और निकृष्ट समझा जाता था पर आज यह हालत है कि जो शराब या मांस का सेवन नहीं करता उसे पिछड़ा समझा जाता है। कहने को तो देश बहुत संस्कृतिनिष्ठ है पर अब परंपरागत कार्यक्रमों में शराब का सेवन खुलकर किया जाता है। कई बार तो यह देखा गया है कि शादी विवाह या अन्य अवसर पर आयोजित घरेलू धार्मिक कार्यक्रमों लोग शराब पीकर शामिल होते हैं। शराब के इस सेवन से लोगों की मानसिकता विकृत हो गयी है और हम भले ही यह दावा करते हैं कि हमारा देश धर्मनिष्ठ और संस्कृतिनिष्ठ है पर वास्तविकता यह है कि हम अपनी राह से भटक गये हैं। सच बात तो यह है कि अब हमें आत्ममंथन करना चाहिये कि हमारे अपने ही दावों में कितना दम है।
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Sunday, 5 July, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-जीवन में कभी आलस्य न करें (kautilya ka arthshastra)

भोक्तं पुरुषकारेण दृष्टसित्रयमिव वियम्।
व्यवसायं सदैवेच्छेन्न हि कलीववदाचरेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
दुष्ट स्त्री के समान धन पाने की इच्छा यानि लक्ष्मी को पुरस्कार से भोगने के लिये सदा उद्योग करते रहें। कभी आलस्य न करें।
प्रयत्नप्रेर्यर्वमणेन महता चितहस्तिना।
रूढ़वैरिद्रु मोत्खतमकृत्देव कुतः सुखम्।।
हिंदी में भावार्थ-
चित्त रूपी हाथी को अपने नियंत्रण में करने के प्रयास के साथ ही वैर रूपी वृक्ष को उखाउ़ फैंके बिना भला सुख कहां प्राप्त हो सकता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-यह सच है कि जीवन में मानसिक शांति के लिये अध्यात्मिक ज्ञान आवश्यक है पर दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति और सांसरिक दायित्वों के निर्वहन के लिये धन की आवश्यकता होती है। इसकी प्राप्ति के लिये भी उद्योग करना चाहिये। कभी जीवन में आलस्य न करें। भगवान श्री कृष्ण ने भी गीता में यही कहा है कि अपने सांसरिक कर्म करते हुए भक्ति करने के साथ ही ज्ञान प्राप्ति का प्रयास करें। निष्काम कर्म का श्रीगीता में आशय अक्सर गलत बताया जाता है। सच तो यह है उसमें धन की उपलिब्धयों को फल नहीं माना गया बल्कि उनसे तो सांसरिक कार्य का ही हिस्सा कहा जाता है। अपने परिश्रम से जो धन प्राप्त होता है उससे हम दूसरे दायित्वों का निर्वहन करते हैं। वह अपने साथ नहीं ले जाते इसलिये उसे फल नहीं मानना चाहिये। सांसरिक कार्य के लिये धन जरूरी है और उसी से ही दान और यज्ञ भी किये जाते हैं।

इसके अलावा अपने मन में दूसरे की भौतिक उपलब्धियां देखकर निराशा या बैर नहीं पालना चाहिये। हमारे मानसिक दुःख का कारण यही है कि हम दूसरों के प्रति अनावश्यक रूप से द्वेष और बैर पाल लेते हैं। उनसे अगर विरक्त हो जायें तो आधा दुःख तो वैसे ही दूर हो जाये।
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Saturday, 4 July, 2009

संत कबीर वाणी-गाली का जवाब न देने वाला संत (kabir ke dohe)

आवत गारी एक है, उलटत होय अनेक।
कहैं कबीर नहिं उलटिये, वही एक की एक।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब गाली आती है तो एक ही होती है पर उसका जवाब देने पर उसकी संख्या बढ़ती जाती है। अगर कोई मूर्ख आदमी गाली बकता है तो बुद्धिमान का काम है कि वह चुप हो जाये तो एक ही गाली होकर रह जायेगी।
गारी ही से ऊपजै,कलह कष्ट और मीच।
हारि चले जो सन्त है, लागि मरै सो नीच।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि गालियां बकने से ही कलह और कष्ट पैदा होता है। गाली सुनकर जो उसका जवाब न दे वह संत और जो लड़ मरे वह नीच है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-गालियां देना एक तरह से फैशन हो गया है। अपढ़ या गंवार ही नहीं बल्कि जिनको शिक्षित और सभ्य समझा जाता है वह लोग भी आपसी बातचीत में गालियों का प्रयोग करते हैं। कई बार तो वार्तालाप के दौरान ही लोग अनावश्यक रूप से गालियां प्रयोग करते हुए इस बात का उनको आभास तक नहीं होता कि उससे उनका पूरा वाक्य अर्थहीन हो जाता है। श्रोता का दिमाग गाली सुनकर उसी पर केंद्रित हो जाने के कारण वाक्य के अन्य शब्दों का अर्थ समझने में असमर्थ रहता है या उनका उसकी दृष्टि में महत्व कम हो जाता है।
इसके अलावा अधिकतर वाद विवाद हिंसा में इसलिये ही बदल जाते हैं कि गालियों का प्रयोग प्रारंभ होने से दोनों पक्ष अपना संयम खो बैठते हैं। अगर एक आदमी गाली देता है तो उसके प्रत्तयुत्तर में दूसरा भी गाली देता है और इस तरह उनकी संख्या बढ़ती जाती है। अगर गाली का जवाब नही दिया जाये तो वह एक ही होकर रह जाती है। गाली देने वाला मूर्ख और उसे सुनकर जवाब न देने वाला संत ही कहा जाता है।
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Friday, 3 July, 2009

भर्तृहरि शतक-विद्वान की होती है दो प्रकार की गति

संसारेऽस्मिन्नसारे परिणतितरले द्वे गती पण्डितानां तत्वज्ञानामृताम्भः प्लवललितयां वातु कालः कदाचित्।
नो चेन्मुग्धांनानां स्तनजघनघना भोगसम्भोगिनीनां स्थूलोपस्थस्थलीषु स्थगितकरतलस्पर्शलीलोद्यतानाम्।।
हिंदी में भावार्थ-
इस परिवर्तनशील दुनियां में विद्वानो की दो ही गतियां होती हैं। एक तो वह तत्वज्ञान का अमृत रसपात करें या सुंदर स्त्रियों की संगत करते हुए जीवन के समय का सदुपयोग करे।
आवासः क्रियतां गंगे पापहारिणी वारिणि।
स्तनद्वये तरुण्या वा मनोहारिणी हारिणी।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुष्य या तो पापनाशिनी गंगा के तट पर कुटिया बनाकर रहे या फिर मोतियों की माला धारण किए हृदय में उमंग पैदा करने वाली तरुणियों की संगत करे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कुछ आधुनिक विद्वान समलैंगिकता के प्रवर्तक बन रहे हैं। उनका कहना है कि समलैंगिकता कोई बुरी बात नहीं है। हो सकता है कि उनकी राय अपनी जगह सही हो पर हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है कि विद्वान और समझदार आदमी की दो ही गतियां हैं। एक तो यह कि वह तत्वज्ञान का रस लेकर जीवन व्यतीत करे और दृष्टा बनकर इस संसार की गतिविधियों में शामिल होे। दूसरा यह है कि वह सुंदर स्त्री ं के साथ आनंद जीवन व्यतीत करे। यही बात हम स्त्रियेां के बारे में भी कह सकते हैं। जो लोग दावा करते हैं कि वह अधिक शिक्षित हैं और उन्हें पुरानी पंरपरायें बांध नहीं सकती हैं उन्हें यह बात समझ लेना चाहिये कि समलैंगिकता कोई प्राकृतिक संबंध नहीं है। अरे, मनुष्य तो सभी जीवों में समझदार माना जाता है फिर भी वह ऐसे नियमों पर कैसे चल सकता है जिस पर पशु पक्षी भी नहीं चलते।
कभी आप अपने घर में देखें तो अनेक बार चिड़िया और चिड़ा जोड़े के के रूप में साथ आकर अपने लिये तिनके लाते हुए घर बनाते हैं कभी दो चिड़े या दो चिड़िया अपना युगल बनाकर यह काम नहीं करते। अगर हम कहें कि प्राकृतिक के सबसे अधिक निकट भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान हैं और इसलिये इसे यह देश विश्व में अध्यात्मिक गुरु माना जाता है तो गलत नहीं है। प्राचीन भारतीय साहित्य में जिस कार्य का उल्लेख तक नहीं है उसे प्राकृतिक तो माना ही नहीं जा सकता। यहां मनुष्य के लिये दो ही गतियां हैं एक तो यह कि वह तत्वज्ञान का रस पान करे या विपरीत लिंग वाले मनुष्य के साथ रास लीला।
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Thursday, 2 July, 2009

चाणक्य नीति-थोड़े अभ्यास से भी ज्ञान का घड़ा भर जाता है

जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्वते घटः।
स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च।।
हिंदी में भावार्थ-
जिस तरह एक एक बूंद से घड़ा भर जाता है उसी तरह नित प्रतिदिन थोड़े थोड़े अभ्यास से समस्त विद्यायें, धन और धर्म में भी श्रीवृद्धि की जा सकती है।
नाह्यरं चिन्तयेत् प्राज्ञो धर्ममेक्र हि चिन्तयेत्।
आहारो हि मनुष्याणां जन्मना सह जायते।।
हिंदी में भावार्थ-
जो मनुष्य ज्ञानी और धर्मपरायण होते हैं वह कभी भी भोजनादि की चिंता त्यागकर हमेशा ही धर्म संचय में लगे रहते हैं क्योंकि वह जानते हैं कि मनुष्य के आहार का भाग तो उसके जन्म के साथ ही इस धरती पर उत्पन्न हो गया था।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अक्सर लोग भक्ति, योगसाधना और प्राणायम का अभ्यास न करने का कारण समय न मिलना बताते हैं जबकि यह केवल झूठ के अलावा कुछ नहीं होता। हम सब जानते हैं कि कितना समय आलस्य और फालतू कामों में बिताते हैं। इसके अलावा कुछ लोग कहते हैं कि हमें किसी ने सिखाया नहीं है या कोई सिखाने वाला नहीं मिल रहा जबकि सच यह होता है कि उनके अंदर सीखने का संकल्प ही नहीं होता। जो व्यक्ति तय कर ले कि वह भगवान भक्ति और साधना करेगा उसके लिये सीखने और ज्ञान प्राप्त करने के मार्ग स्वतः ही खुल जाते हैं। आदमी एक बार सीखकर नित प्रतिदिन अभ्यास करे तो शेष ज्ञान तो स्वतः ही उसके पास आ जाता है। श्रीगीता का रोज एक श्लोक भी पढ़ा जाये तो भी वह हमें ज्ञानी बना सकता है। जिस तरह एक बूंद बूंद से घड़ा भरता है उसी तरह एक या दो श्लोक का अभ्यास किया जाये तो ज्ञान का घड़ा भी निश्चित रूप से भर सकता है।
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Wednesday, 1 July, 2009

मनु स्मृति-खीर, रबड़ी और मालपुआ स्वास्थ्य के लिए हानिकारक

आरण्यानां च सर्वेषां मृगानणां माहिषां बिना।
स्त्रीक्षीरं चैव वन्र्यानि सर्वशक्तुनि चैव हि।।
हिंदी में भावार्थ-
भैंस के अतिरिक्त सभी वनैले पशुओं तथा स्त्री का दूध पीने योग्य नहीं होता। सभी सड़े गले या बहुत खट्टे पदार्थ खाने योग्य नहीं होते। इस सभी के सेवन से बचना चाहिये।

वृथाकृसरसंयावं पायसायूपमेव च।
अनुपाकृतमासानि देवान्नानि हर्वषि च।।
हिंदी में भावार्थ
-तिल, चावल की दूध में बनी खीर,दूध की रबड़ी,मालपुआ आदि स्वास्थ्य के हानिकाकाकर हैं अतः उनके सेवन से बचना चाहिये।
दधिभक्ष्यं च शुक्तेषु सर्वे च दधिसम्भवम्।
यानि चैवाभियूशयन्ते पुष्पमूलफलैः शुभैः।।
हिंदी में भावार्थ-
शुक्तों में दही तथा उससे बनने वाले पदार्थ-मट्ठा तथा छाछ आदि-तथा शुभ नशा न करने वाले फूल, जड़ तथा फल से निर्मित पदार्थ-अचार,चटनी तथा मुरब्बा आदि-भक्षण करने योग्य है।
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Tuesday, 30 June, 2009

संत कबीर वाणी-भय इंसान की पारणमणि

भय बिन भाव न ऊपजै, भय बिनु होय न प्रीति।
जब हिरदे से भय गया, मिटी सकल रस रीति।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि भय के बना हृदय में भाव नहीं पैदा होता। बिना भय के प्रीति नहीं होती। जब हृदय से भय मिट गया तो सभी प्रकार के रस और रीति भी मिट जाती है।
भय से भक्ति करै सबै, भय से पूजा होय।
भय पारस जीव को, निरभय होय न कोय।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि भय के कारण ही सभी भक्ति करते हैं। भय से लोग अपने से शक्तिशाली व्यक्ति की पूजा करते हैं। इस प्रकार यह भय ही लोगों के लिये पारसमणि है जो उने पास रहती है। निरभय तो कोई होई नहीं सकता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सामान्य लोग भय के वशीभूत होकर न केवल भगवान की बल्कि अपने से अधिक शक्तिशाली व्यक्ति की भी भक्ति और पूजा करते हैं। आदमी के मन में मृत्यु, बीमारी, भूख और तथा अन्य संकटों का भय हमेशा ही रहता है इसलिये उस समय किसी की सहायता की चाहत उसे भगवान की भक्ति करने के लिये प्रेरित करने के साथ सांसरिक जीवों की चाटुकारिता के लिये भी बाध्य करती है। इस देह के साथ मृत्यु, बीमारी, भूख और प्यास का प्रकोप निंरतर बना रहता है। आदमी ठीक होने पर बीमारी, पेट भरा होने पर भी भोजन, और गला तर होने पर भी प्यास की चिंता करते हुए मरने से पहले ही कई बार मर चुका होता है। सच बात तो यह है कि इसी भय के कारण वह सामाजिक जीव बना है पर यही उसके लिये बंधन भी बन जाता है। इसी कारण वह भक्ति करते हुए कामनायें मन में पालता है और दया करने से पहले अपने उद्देश्य तय करता है। जबकि हमारे अध्यात्म दर्शन के अनुसान तो निष्काम भक्ति और निष्प्रयोजन दया करना ही फलदायी माना गया है। वैसे मनुष्य जीवन का चरम सुख तो निर्भय होकर जीने में है तब किसी किसी रस या रीति में दिलपचस्पी नहीं रह जाती पर मोह मनुष्य के अंदर भय को हमेशा जीवित रखता है।
सच तो यह है कि भय एक पारसमणि की तरह है जिसे वह कभी छोड़ना ही नहीं चाहता।
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Sunday, 28 June, 2009

मनुस्मृति-बिना प्रयोजन कौतुहल नहीं करें

न नृत्येन्नैव गायेन वादित्राणि वादयेत्।
नास्फीट च क्ष्वेडेन्न च रक्तो विरोधयेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुमहाराज कहते हैं कि नाचना गाना, वाद्य यंत्र बजाना ताल ठोंकना, दांत पीसकर बोलना ठीक नहीं और भावावेश में आकर गधे जैसा शब्द नहीं बोलना चाहिये।

न कुर्वीत वृथा चेष्टां न वार्य´्जलिना पिबेत्।
नौत्संगे भक्षयेद् भक्ष्यानां जातु स्यात्कुतूहली।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुमहाराज कहते हैं कि जिस कार्य को करने से अच्छा फल नहीं मिलता हो उसे करने का प्रयास व्यर्थ है। अंजली में भरकर पानी और गोद में रखकर भोजन करना ठीक नहीं नहीं है। बिना प्रयोजन का कौतूहल नहीं करना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जब आदमी तनाव रहित होता है तब वह कई ऐसे काम करता है जो उसकी देह और मन के लिये हितकर नहीं होते। लोग अपने उठने-बैठने, खाने-पीने, सोने-चलने और बोलने-हंसने पर ध्यान नहीं देते जबकि मनुमहाराज हमेशा सतर्क रहने का संदेश देते हैं। अक्सर लोग अपनी अंजली से पानी पीते हैं और बातचीत करते हुए खाना गोद में रख लेते हैं-यह गलत है।
जब से फिल्मों का अविष्कार हुआ है लोगों का न केवल काल्पनिक कुतूहल की तरफ रुझान बढ़ा है बल्कि वह उन पर चर्चा ऐसे करते हैं जैसे कि कोई सत्य घटना हो। फिल्मों की वजह से संगीत के नाम पर शोर के प्रति लोग आकर्षित होते हैं।
मनुमहाराज इनसे बचने का जो संदेश देते है उनके अनुसार नाचना, गाना, वाद्य यंत्र बजाना तथा गधे की आवाज जैसे शब्द बोलना अच्छा नहीं है। फिल्में देखना बुरा नहीं है पर उनकी कहानियों, अभिनेताओं, अभिनेत्रियों को देखकर कौतूहल का भाव पालन व्यर्थ है इससे आदमी का दिमाग जीवन की सच्चाईयों को सहने योग्य नहीं रह जाता।

नाचने गाने और वाद्य यंत्र बजाना या बजाते हुए सुनना अच्छा लगता है पर जब उनसे पृथक होते हैं तो उनका अभाव तनाव पैदा करता है। इसके अलावा अगर इस तरह का मनोरंजन जब व्यसन बन जाता है तब जीवन में अन्य आवश्यक कार्यों की तरफ आदमी का ध्यान नहीं जाता। लोग बातचीत में अक्सर अपना प्रभाव जमाने के लिये किसी अन्य का मजाक उड़ाते हुए बुरे स्वर में उसकी नकल करते हैं जो कि स्वयं उनकी छबि के लिये ठीक नहीं होता। कहने का तात्पर्य यह है कि उठने-बैठने और चलने फिरने के मामले में हमेशा स्वयं पर नियंत्रण करना चाहिए।
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Saturday, 27 June, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-उन्नतिशील पुरुष को ही मिलता है सम्मान

उत्थिता एव पूज्यन्ते जनाः काय्र्यार्थिमिनेरैः।
शत्रुवश पतितं कोऽयनुवन्दते मानवं पुंनः।।
हिंदी में भावार्थ-
जीवन में उत्थान की तरफ बढ़ते हुए पुरुष का कार्यभिलाषी पुरुष सम्मान करते हैं और भला पतन की तरफ जा रहे शत्रु के समान पुरुष का कौन पूछता है।
अर्थार्थी जीवलोकोऽय ज्वलन्तमुपसर्पति।
क्षीणढीरां निराजीव्यां वत्सत्स्त्तव जति मातरम्।।
हिंदी में भावार्थ-
धन में ही अपना स्वार्थ रखने वाला यह लोक लक्ष्मी की चमक से प्रज्जवलित पुरुष की सेवा करता है और दुग्धहीन जीविका न देने वाली माता को उसका बछड़ा भी त्याग देता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में अर्थ या धन सभी कुछ नहीं है पर फिर भी वह इस दैहिक जीवन का बहुत बड़ा आधार है। यह सच है कि अर्थ से धर्म का निर्वाह होता है पर उसका फल धन नहीं है परंतु संसार में जीवन को सुख और शांति से बिताने के लिये धन की आवश्यकता होती है। उसकी शक्ति ऐसी है कि पूरा मनुष्य समुदाय उसके पीछे भाग रहा है। कोई विद्वान या ज्ञानी अपने गुण, ज्ञान, दान और मार्गदर्शन से समाज के लिये बहुत काम करता है पर अगर वह स्वयं निर्धन है तो फिर लोग उसकी बात नहीं सुनते क्योंकि धन होना ही व्यक्ति की योग्यता का सबसे बड़ा प्रमाण है। अगर पुरुष के पास धन पर्याप्त मात्रा में न हो तो उसके परिवार वाले भी उसे त्याग देते है। कहने का तात्पर्य यह है कि अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना बहुत अच्छी बात है पर इसका आशय यह नहीं कि मनुष्य अपने स्वाभाविक कर्म से विरक्त हो जाये। उसी तरह अध्यात्मिक ज्ञान रखने वाले अगर सांसरिक कर्म करते हैं तो यह नहीं समझना चाहिये कि वह अज्ञानी हैं।
हां, यह बात निश्चित है अगर कोई अध्यात्मिक ज्ञानी होने के साथ ही धन भीपर्याप्त मात्रा में प्राप्त कर चुका है तो उसका अधिक ही समान होता है बनिस्बत उसके जो केवल धन के सहारे ही सम्मान प्राप्त करता है। इस संसार में धन के क्षेत्र में जैसे ही मनुष्य उन्नति की तरफ जाता है वैसे ही समाज उसका सम्मान करता है। धनी आदमी की सेवा सभी करते हैं पर निर्धन को वह एक तरह से शत्रु समझता है।
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