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Saturday, March 28, 2015

अन्ना के पुराने भक्तों के पूरे भारत में छा जाने क संभावना क्षीण-हिन्दी लेख




आज अन्ना हजारे के तीन चार वर्ष पूर्व चलाये गये भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की याद आ रही है।  लोकतंत्र में आंदोलन से सत्ता के शिखर पहुंचने का तरीका नया नहीं है पर वर्तमान समय में वह फिर उपयोग की प्रमाणिकता दिखा रहा है। उस समय अन्ना हजारे के अनशन ने पूरे देश को आंदोलित किया था। उनके कुछ भक्तों ने कीचड़ साफ करने के लिये नाले मे ही उतरने का उपक्रम किया तो लगा कि समाज में सार्वजनिक मर्यादायें बनाये रखने की उनकी प्रतिबद्धता उल्लेखनीय है। यह अलग बात है कि इन भक्तों ने अन्ना के निकट रहने से ही अपनी छवि बनायी थी जिसका नकदीकरण की इच्छा उनके अंदर थी।  उस समय विद्वान लोगों का भी मानना था कि तत्कालीन राजनीति परिदृश्य में अपनी दाल न गलते देख कुछ उत्साही लोगों ने पहले आंदोलन फिर सत्ता की राह पर चलने का लक्ष्य बनाकर ही अन्ना के नाम का सहारा योजनबद्ध ढंग से लिया है।
 इन भक्तों ने एक नया राजनीतिक दल बनाया। 2013 में महानगरीय प्रकृति की दिल्ली विधानसभा का चुनाव जीता तो फिर 2014  के लोकसभा के आम चुनाव में महायोद्धा के रूप में उतर गये। यह अलग बात है कि अन्ना के आंदोलन में किये उनके श्रमदान के पुण्य इतने शक्तिशाली नहीं थे कि इतना बड़ा फल मिल जाता।  दरअसल वह पुण्य इतने ही थे कि दिल्ली में 49 तक राज्य सुख मिल सके।  यह अलग बात है कि फिर 2015 में वही दिल्ली विधानसभा हाथ आयी जिसे शेष भारत का जनमानस एक महानगर पालिका से अधिक नहीं मानता।
      बहरहाल अन्ना के इन भूतपूर्व भक्तों के बीच दिल्ली की सत्ता आने के बाद जो आपस मनमुटाव हुआ उससे एक बात तो साफ होती है कि काजल की कोठरी से कोई बिना काले दाग के बाहर नहीं आ सकता। उस समय जिन लोगों ने अपनी छवि उत्साही समाज सेवक की बनायी थी आज उन पर सत्ता का अहंकार चढ़ ही गया लगता है। अब उनकी विरोधाभासी छवि हैरान किये दे रही है।
        एक अध्यात्मिक लेखक होने के नाते हमें कभी राजसी पुरुषों की दोहरी छवि पर आश्चर्य नहीं होता।  सत्ता पाने या समाज सुधारने के आंदोलन हमारी दृष्टि से राजसी कर्म का ही भाग है जिससे काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा अहंकार जैसी बुराईयां आती हैं।  हमने अन्ना के भक्त जब सत्ता की राह पर आये तो हम उनसे सात्विकता की आशा तो नहीं कर रहे पर राजसी कर्म में जिस भावनात्मक, वैचारिक तथा प्रशासनिक कार्यों में दृढ़ता की आशा कर रहे थे वह भी अब आगे बढ़ती नहीं दिख रही।  एक बात हम यहां यह बता दें कि राजसी कर्म कोई बुरा नहीं होता न ही राजसी पुरुष कमतर होते हैं शर्त यह है कि वह अपने कर्म के स्वरूप तथा परिणाम पर विचार कर योजनबद्ध ढंग से काम करे।  बहरहाल अन्ना के पुराने भक्तों से पूरे भारत के राजनीतिक परिदृश्य पर छा जाने की जो संभावना पैदा हुई थी वह अब क्षीण हो गयी लगती है। हालांकि दिल्ली तथा पंजाब के आसपास के राज्यों में इसका अस्तित्व बना रहेगा। इससे आगे विस्तार केवल एक सपना होगा।
दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Saturday, March 21, 2015

इज्जत में ही रहता है बेइज्जती का भय-पतंजलि योग के आधार पर चिंत्तन लेख(izzat mein he rahta hain beizzati ka khatra-A Hindu hindi religion thought based on patanjali yog sahitya)



            मनुष्य में यह सामान्य प्रवृत्ति रहती है कि वह अपने परिवार, समाज तथा अन्य वर्ग से सम्मान पाना चाहता है। पूज्यता मिलने पर वह न केवल प्रसन्न होता है वरन् उसके मद में डूबकर विचित्र व्यवहार भी करने लगता है।  उसे देश, काल तथा भाग्य के परिवर्तित होने का आभास और अनुमान तक नहीं हो पाता।  कालांतर में जब उसे सम्मान नहीं मिलता तो वह मानसिक संताप का शिकार हो जाता है।  अगर हम योग सिद्धांतों को समझें तो जहां मान है वहीं अपमान, जहां विश्वास है वहीं घात  और जहां वचन है वहीं निराशा की आशंका रहती है।  श्रीमद्भागवत गीता में इसलिये ही सांसरिक विषयों के प्रति निष्काम भाव अपनाने का संदेश दिया है। निष्काम भाव से काम करने पर अनुकूल परिणाम न मिलने पर निराशा नहीं होती वरन् यह संतोष रहता है कि हमने अपना काम पूरे परिश्रम से किया।

पतंजलि योग में कहा गया है कि

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स्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्स्मयाकरणे पुनरिष्टप्रसङ्गात्।

            हिन्दी में भावार्थ-संपन्न व्यक्ति से सम्मान मिलने पर प्रसन्न नहीं होना चाहिये क्योंकि उससे अपमानित होने का भय भी उपस्थित रहता है।

            योग साधना के समय आसन तथा प्राणायाम के दौरान साधक ऊपर-नीचे, दायें-बायें तथा सामने-पीछे की तरफ अंगों को घुमाने के साथ ही प्राण भी उसी क्रम में स्थापित करता है। इस तरह के अभ्यास करते करते उसके अंदर यह ज्ञान सहजता से आ जाता है कि किसी कर्म का प्रतिकर्म भी हो सकता है।  उसी तरह वह किसी के व्यवहार से निराश भी नहीं होता क्योंकि वह जानता है कि दुष्कर्म करने वाला  मनुष्य कभी  सद्कर्म की तरफ भी प्रेरित हो ही जाता है।  इस तरह का ज्ञान होने पर मनुष्य का जीवन सहज हो जाता है।  उसे सांसरिक विषयों की चिंता परेशान नहीं करती क्योंकि वह जानता है कि उसकी समस्यायें समय आने पर स्वतः ही दूर हो जायेंगी।

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Sunday, January 25, 2015

आस्था के नाम पर धर्म पर चर्चा रोकना गलत-हिन्दी चिंत्तन लेख(aastha ke naam par dharam par charcha rokana galat-hindi thought article)



            फ्रांस में शार्ली हेब्दो पत्रिका पर हमले से मध्य एशिया के उन्मादी समूहों को बरसों तक प्रचारात्मक ऊर्जा मिलेगी।  पहले यह ऊर्जा सलमान रुशदी की पुस्तक के बाद उन पर ईरान के एक धार्मिक नेता खुमैनी के फतवे से मिली थी।  इसके बाद मध्य एशिया का धार्मिक उन्माद बढ़ता ही गया।  वह धार्मिक नेता बरसों तक अमेरिका में रहा और उसी ने ही ईरान की राजशाही के बाद धार्मिक ठेकेदार होने के साथ ही वहां के शासन को भी अपने हाथ में ले लिया। प्रत्यक्ष अमेरिका का खुमैनी से कोई संबंध नहीं दिखता था मगर उसके नेतृत्व में उस समय ईरान में राजशाही के विरुद्ध चल रहे लोकतात्रिक आंदोलन से उसकी सहमति थी। राजशाही के पतन के बाद वहां खुमैनी के धार्मिक नेतृत्व में बनी सरकार कट्टरपंथी ही थी। दिखाने के लिये अमेरिका ने ईरान में लोकतंत्र स्थापित किया पर सच यह है कि वहां एक उस व्यक्ति को सत्ता मिली जो बाद में उसका   दुश्मन बना।
            धार्मिक उन्मादी प्रचार के भूखे होते हैं।  जिस तरह चार्ली हेब्दों के कार्टूनिस्टों की हत्या हुई है वह मध्य एशिया के धर्म की ताकत बनाये रखने के लिये की गयी है जो केवल प्रचार से मिलती है।     इस धार्मिक उन्माद का सामना करने के लिये पूरे विश्व में धार्मिक आस्था और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का एक ही रूप रखना चाहिये।  यह नहीं हो सकता कि एक देश में आस्था के नाम पर किसी धर्म पर कटाक्ष अपराध तो किसी में एक सामान्य प्रक्रिया मानना चाहिये।  हमारे देश में स्थिति यह है कि भारतीय धर्मोंे पर आक्रमण तो एक सामान्य प्रक्रिया और दूसरे धर्म पर कटाक्ष अपराध मानने की प्रचारजीवियों की प्रवृत्ति हो गयी है।  समस्या यह है कि भारतीय धर्म के ठेकेदार भी कर्मकांडों के ही संरक्षक होते हैं और अध्यात्मिक ज्ञान को एक फालतू विषय मानते हैं।  अध्यात्मिक ज्ञानी अंतर्मुखी होते हैं इसलिये कटाक्ष की परवाह नहीं करते कर्मकांडियों बहिर्मुखी होने के कारण चिंत्तन प्रक्रिया से पर होते इसलिये कटाक्ष सहन नहीं कर पाते।  हमारा तो यह मानना है कि विदेशी विचाराधाराओं के मूल तत्वों पर कसकर टिप्पणी हो सकती है और सहज मानव जीवन के लिये  भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा पर चलने के अलावा कोई विकल्प हो ही नहीं सकता, पर यह ऐसी सोच संकीर्ण मानसिकता की मानी जाती है।  हम इस पर बहस कर सकते हैं और कोई कटाक्ष करे तो उसका शाब्दिक प्रतिरोध भी हो सकता है पर कर्मकांडी किसी कटाक्ष को सहन नहीं करना चाहते। वह बहस में किसी अध्यात्मिक ज्ञानी का नेतृत्व स्वीकार नहीं कर सकते। इसलिये चिल्लाते हैं ताकि शोर हो जिससे वह प्रचार प्रचार पायें।
            फ्रांस की चार्ली हेब्दो पत्रिका पर हमले को सामान्य समझना उसी तरह भूल होगी जैसे सलमान रुशदी की किताब पर ईरान के धार्मिक तानाशाह खुमैनी के उनके खिलाफ मौत की फतवे को मानकर की गयी थी। शिया बाहुल्य होने के कारण ईरान के वर्तमान शासक  मध्य एशिया में प्रभावी गुट के विरोधी हैं पर वह इस हत्याकांड की निंदा नहीं करेंगे क्योंकि कथित धार्मिक आस्था पर आक्रमण पर स्वयं ही हिंसक कार्यवाहियों के समर्थक हैं।  कहने का अभिप्राय यह है कि इस विषय पर मध्य एशिया की विचारधारा पर बने सभी समूह वैचारिक रूप से एक धरातल पर खड़ मिलेंगे।
            इनका प्रतिकार वैचारिक आक्रमण से किया जा सकता है पर अलग अलग देशों  अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नियमों में विविधिता है। जहां आस्था के नाम पर छूट है वहां बहस की गुंजायश कम रह जाती है। इसलिये फ्रांस, ब्रिटेन, अमेरिका तथा अन्य पश्चिमी देशों के बुद्धिमान सीधे धार्मिक अंधवश्विास पर आक्रमण करते हैं जबकि एशियाई देशों में  दबी जुबान से यह काम होता है। भारत में तो यह संभव ही नहीं है।  आज भी हमारे देश के बुद्धिजीवी दिवंगत कार्टूनिस्टों की मौत पर सामान्य शोक जरूर जता रहे हैं पर अपने यहां आस्था के नाम पर अभिव्यक्ति की आजादी सीमित रखने का विरोध नहीं कर रहे। शायद उनके लियं यहां भारतीय धर्मों में ही दोष हैं जिन पर गाह बगाहे वह हंसते ही हैं।  कट्टर धार्मिक विचाराधाराओं के विरुद्ध वैचारिक अभियान में पश्चिमी देशों का अनुसरण हमारे देश के बुद्धिजीवी करना ही नहीं चाहते। संभवत भारतीय प्रचार माध्यम सनसनी के सतही आर्थिक लाभ से संतुष्ट हैं और चाहते हैं कि यहां वैचारिक जड़ता बनी रहे।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Saturday, January 3, 2015

सफल राज्य व्यवस्था से ही धर्म की रक्षा संभव-हिन्दी चिंत्तन लेख(safal rajya vyavastha se hi dharm ki raksha sambhav-hindi thought article)


             25 दिसम्बर 2014 श्री अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म दिन सुशासन दिवस में रूप में मनाया जाता  है। हमारे देश में आज राज्य व्यवस्थाओं में राम राज्य की कल्पना के साकार प्रकट होने की अपेक्षा की जाती है। यह तो पता नहीं कि हमारे देश के धाार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक विषयों के विशेषज्ञ सुशासन के स्वरूप और महत्व से क्या आशय लेते हैं, पर हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार शासन की व्यवस्था ही सतयुग और कलियुग की स्थिति  परिभाषित करती है।  हमारे महान विद्वान चाणक्य जी का कहना है कि राज्य के अच्छे बुरे प्रबंध से  ही प्रजा में सतयुग और कलियुग का भाव निर्मित होता है। हमारा देश बौद्धिक रूप से तत्वज्ञान के भंडार की वजह से विश्व का अध्यात्मिक गुरु माना जाता है और उसके अनुसार भी मनुष्य की दैनिक आवश्यकतायें भी कम महत्वपूर्ण नहीं होती इसलिये राजधर्म में स्थित लोगोें  यह दायित्व होता है कि वह प्रजा के प्रति हमेशा सजग रहें।  हमारे यहां धर्म से आशय अच्छे व्यवहार तथा अपने कर्म का निर्वाह करने से ही है।
            हमारे यहां भगवान विष्णु के अनेक अवतार माने जाते हैं उनमें भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण की चर्चा सबसे अधिक होती है।  इसका कारण यह है कि उन्होंने न केवल अध्यात्मिक रूप से समाज को संदेश दिया वरन् सांसरिक विषयों मेें भी नैतिक सिद्धांतों से कार्य करने की प्रेरणा दी।  दोनों ने ही राजधर्म का निर्वाह किया। भगवान विष्णु भी पालनहार होने की वजह से भारतीय समाज में सक्रिय इष्ट का सम्मान पाते हैं।  कहने का अभिप्राय यह है कि हमारा अध्यात्मिक दर्शन केवल भगवान की आराधना के लिये ही प्रेरित नहीं करता वरन् सांसरिक विषयों में भी सिद्धांतों के पालन की बात कहता है।  हमारे यहां कर्म ही धर्म माना जाता है। यही कारण है कि राज धर्म का महत्व अत्यंत बढ़ जाता है।
            हमारे यहां अभी धर्मांतरण पर बहस चल रही है।  एक प्रश्न आता है कि हमारे यहां इतने लोग धर्मांतरण क्यों कर गये? इतिहास बताता है कि मध्य युग में हमारे यहां के राजा अपने कर्तव्य से विमुख हो गये। उनके परस्पर संबंध कटु रहे।  प्रजा के प्रति उनके असंतोष का परिणाम ही रहा है कि लोग विदेशी शासकों के प्रति भी सद्भावना दिखाते रहे। हमने देखा होगा कि अनेक पुराने लोग आज भी कहते हैं कि अंग्रेजों का राज्य आज की अपेक्षा अच्छा था।  हमारे यहां विदेशी विचाराधारा और शासन के प्रति यह मोह अपने राज्य प्रबंधकों के कुशासन से उत्पन्न निराशा की वजह से विद्रोह के रूप में परिवर्तित होता रहा।  यह विद्रोह की प्रवृत्ति इतनी रही कि राज्य प्रबंधक के इष्ट और पूजा पद्धति से प्रथक जाकर समाज में अलग पहचान दिखने की प्रेरक बन गयी।
            अध्यात्मिक ज्ञान के अभ्यास से हमारी समझ तो यह बनी है कि संसार में जितने भी कथित संज्ञाधारी धर्म बने हैं वह राज्य के प्रेरणा से बने हैं।  दरअसल ऐसे संज्ञाधारी धर्म भ्रम फैलाने के लिये ही प्रकट किये गये हैं ताकि पूजा पद्धति के माध्यम से लोगों में आपसी संघर्ष कराकर राज्य प्रबंध की नाकामियों से उनका ध्यान हटाया जाये।  हमारे देश में धर्म से आशय कर्म तथा व्यवहार से है। किसी भी प्राचीन ग्रंथ में धर्म का कोई नाम नहीं है।  अच्छा राजा भगवान का दूसरा  रूप माना गया है। इसके विपरीत विदेशी विचारधाराओं के शीर्ष पुरुषं पूजा पद्धतियों से नये लोग जोड़कर अपने समाज को यह जताते रहे है कि वह अपने कथित धर्म को ही श्रेष्ठ माने। यही कारण है कि आज विदेशों में धर्म के नाम पर संघर्ष आज भी जारी है।
            हमारे यहां राजधर्म बृहद धर्म का ही एक उपभाग माना जाता है।  राजधर्म में स्थित लोग अगर अपने कर्म का निर्वाह उचित रूप से करें तो प्रजा में उनकी छवि अच्छी बन सकती है।  धर्म की रक्षा में मध्यम वर्ग की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है पर हम देख रहे हैं कि वह अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष कर रहा है। धनिक वर्ग अपनी प्रभुता के मोह तथा अहकार में तल्लीन है।  निम्म वर्ग के लिये भी हर पल संकट मुंह बायें रहता है। हमारा मानना है कि हमारे यहां इस समय संकट इसलिये अधिक क्योंकि समाज को स्थिर रखने वाला मध्यम वर्ग स्वयं ही अस्थिर हो गया है।  हमारा यह भी मानना है कि राज्य प्रबंध सुशासन का रूप ले तो हमारे देश में विदेशी विचारधाराओं के साथ उनके प्रवाह के लिये लालायित लोगों का प्रभाव स्वतः कम हो जायेगा तब किसी अन्य प्रयास की आवश्यकता नहीं होगी। अगर इस प्रयास में कमी रहेगी तो बाकी अन्य प्रयास न केवल विवाद खड़े करेंगे बल्कि मजाक भी बनेगा।
            माननीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी को उनके जन्म दिन पर बधाई।

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Friday, December 26, 2014

समाधि के बारे में भ्रम न पालें-हिंदू चिन्तन लेख(samadhi ke bare mein bhram palen-hindu chinttan lekh)



            पतंजलि योग साहित्य के अनुसार सात भागों से गुजरने के बाद आठवां और अंतिम भाग समाधि है। योग के विषय के व्यापक संदर्भों में पतंजलि योग साहित्य ही एकमात्र प्रमाणिक सामग्री प्रदान करता है।  हमने कथित रूप से अनेक लोगों से सुना है कि अमुक गुरु समाधि में प्रवीण थे या अमुक संत को इस विषय में विशेषज्ञता प्राप्त है।  अनेक लोग तो कहते हैं कि हिमालय की कंदराओं में कई ऐसे योगी है जो समाधि में दक्ष हैं।  जब हम पतंजलि योग साहित्य का अध्ययन करते हैं तो लगता है कि इस तरह की बातें केवल प्रमाणिक नहीं है।  समाधि योग का चरम शिखर है।  एक तरह से योग साधना की आहुति समाधि ही है।
            ऐसे में अनेक प्रश्न दिमाग में आते हैं। हम जिन लोगों की समाधि विषयक योग्यता के बारे में सुना है उनकी बाकी सात भागों में सक्रियता की चर्चा नहीं होती।  आसन और प्राणायाम का भाग अत्यंत महत्वपूर्ण है।  वैसे हम आसनों की बात करें तो अब अनेक प्रकार के व्यायाम भी इनके साथ वैज्ञानिक ढंग से इसलिये जोड़े गये हैं क्योंकि पहले समाज श्रम आधारित था पर अब सुविधा भोगी हो गया जिससे लोगों को दैहिक शुद्ध करायी जा सके।  यह व्यायाम रूपी आसान इसलिये वैज्ञानिक हैं क्योंकि इस दौरान सांसो के उतार चढ़ाव का-जिसे प्राणायाम भी कहा जाता है- अभ्यास भी कराया जाता है।  एक तरह से आसन और प्राणायाम का संयुक्त रूप बनाया गया है। पतंजलि योग में प्राणायाम में प्राण रोकने और छोड़ने का अभ्यास ही एक रूप माना गया है। आसन से आशय भी सुखासन, पद्मासन या वज्रासन पर बैठना है। बहुत सहज दिखने वाली आसन और प्राणायाम की प्रक्रिया तब बहुत कठिन हो जाती है जब मनुष्य के मन और देह पर भोग प्रभावी होते हैं। योगाभ्यास के  दौरान देह से पसीना निकलता ही जिससे देह के विकार बाहर आते हैं पर सवाल यह है कि इसे करते कितने लोग हैं? जिनके बारे में समाधि लगाने का दावा किया जाता है वह पतंजलि योग के कितने जानकार होते हैं यह पता ही नहीं लगता।
            यहां हम बता दें कि भक्ति के चरम को छूने वाले अनेक संतों ने तो योग साधना को भी बेकार की कवायद बताया है।  इसमें कोई संदेह नहीं है कि उन संतों ने भक्ति का शिखर अपने तप से पाया पर सच यह है कि वह भक्ति भी उसी तरह सभी के लिये कठिन है जैसे कि योग साधना।  दूसरी बात यह है कि इन महापुरुषों ने योग साहित्य का अध्ययन न कर केवल तत्कालीन समाज में ऐसे योगियों को देखा था जिनका स्वयं का ज्ञान अल्प था।  अगर इन महापुरुषों ने योग साधना का अध्ययन किया होता तो वह जान पाते कि जिस भक्ति के शिखर को उन्होंने पाया है वह समाधि का ही रूप है और कहीं न कहीं उन्होंने अनजाने में ही योग के आठों भागों को पार किया था।  योग साहित्य से इन महापुरुषों की अनभिज्ञता का प्रमाण यह है कि वह योग को तीव्र या धीमी गति से प्राणवायु को ग्रहण या त्यागने की प्रक्रिया  ही मानते थे जो कि योग साधना का केवल एक अंशमात्र है।  यह अलग बात है कि इन महापुरुषों के  कथनों को भक्ति की सर्वोपरिता बताने वाले आज के पेशेवर संत उन भक्तों के सामने दोहराकर वाहवाही लूटते हैं जो देह मन और बुद्धि के विकारों से ग्रसित हैं। कहा जाता है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन रहता है।  जब वात, पित और कफ के कुपित से पीड़ित समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग हो तब हार्दिक भक्ति करने वाले मिल जायेंगे यह सोचना भी व्यर्थ है।
            हमने ऐसे लोग भी देखें हैं जो योग साधना प्रारंभ करते हैं तो कथित धार्मिक गुरू उन्हें ऐसा करने से रोक देते हैं।  अनेक गुरु तो यह कहते हैं कि योग साधना से कुछ नहीं होता। बीमारी दवा से जाती है और भगवान भक्ति से मिलते हैं।  यह प्रचार भयभीत और कमजोर लोगों के दिमाग की देन है।  मूलतः सभी जानते हैं योग साधना से व्यक्ति में एक नयी स्फूर्ति आने के साथ ही उसके मन मस्तिष्क में आत्मविश्वास पैदा होता है जिससे वह किसी दूसरे पर निर्भर नहीं रहता। इसलिये कायर और कमजोर लोग आलस्यवश न केवल स्वयं योग साधना से दूर रहते हैं बल्कि दूसरों में भी नकारात्मक भाव पैदा करते हैं।
            योग साधना की बातें सभी करते हैं पर महर्षि पतंजलि योग के सूत्रों का पढ़ने और समझने की समझ किसमें कितनी है यह तो विद्वान लोग ही बता सकते हैं।  हमारा एक अनुभव है कि जो नित्य योग साधना करते हैं उन्हें इसका अध्ययन अवश्य करना चाहिये। जिस तरह आसना के समय सांसों के अभ्यास से दोनों काम होते हैं उसी तरह योग सूत्र पढ़ने पर हम उनसे होने वाले लाभों को पढ़कर अधिक ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। सबसे बड़ी बात यह कि समाधि विषयक भ्रम दूर हो जाते हैं।


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Saturday, December 13, 2014

कबीर पंथ पर अमीर नहीं फकीर चलते हैं-हिन्दी कविता(kabir panth par amir nahin faqir chalte hain-hindi kavita)

            हमारे देश में महापुरुषों के नाम पर बहुत सारे पंथ बन गये हैं। इसमें आजकल कबीर पंथ की बहुत चर्चा है।  संत कबीर दास जी ने हमेशा ही भक्ति तथा ज्ञान साधना को एकांत का विषय बताया है। इतना ही नहीं उन्होंने धर्म के नाम पर ठेकेदारी करने वाले कथित संतों पर भी तीखे कटाक्ष किये हैं।  हैरानी की बात यह है कि भगवान नाम स्मरण से ही संसार सागर को पार करने का संदेश देने वाले संत कबीर के नाम पर भी पंथ चलाकर भीड़ का एकत्रीकरण होता रहा है।  संत कबीर ने कभी कोई अपना संगठन या आश्रम बनाया  अथवा शिष्यों को दीक्षा देने का कोई नाटक किया हो इसका उदाहरण नहीं मिलता।  उनकी रचनायें भी शिष्यों की बजाय संपूर्ण समाज को संबोधित करती हैं।
            हरियाणा के एक कथित संत ने पूज्यनीय कबीर का जितना मखौल बनाया है उसका उदाहरण आज तक नहीं देखा गया। कानूनी प्रक्रिया से बचने के लिये उन्होंने अपने आश्रम के बाहर भक्तों और शिष्यों को एकत्रित कर लिया है ताकि वहां पुलिस प्रविष्ट न हो सके। हथियार बंद लोग न केवल अपने कथित गुरू को बचाने का प्रयास करते वरन् पुलिस पर हमले भी कर रहे थे।  संत के पकड़े जाने के बाद उनके महलनुमा आश्रम से अनेक प्रकार के हथियार तथा अन्य आपत्तिजनक वस्तुऐं बरामद होने के समाचार आ रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम का न तो अध्यात्मिक दर्शन और नही  उन महान संत कवि कबीर दास जी के संदेशों से संबंध है जिन्हें हमारा ज्ञानी समाज अपनी अनमोल धरोहर मानता है।

संत कबीर कहते हैं कि

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गुरुवा तो घर घर फिरै, दीक्षा हमरी लेहु।

कै बूड़ौं कै ऊबरौ, टका पर्दनी देहु।।

            हिन्दी में भावार्थ-गुरू तो घर घर फिर अपनी दीक्षा देने के लिये फिरते हैं। उनका केवल धन से मतलब होता है शिष्य उबरे या डूबे इससे उनका कोई मतलब नहीं होता।

सतगुरु ऐसा कीजिये, जाके पूरन मन्न।

अनतोले ही देत है नाम सरीखा धन्न।

            हिन्दी में भावार्थ-गुरु तो वही हो सकता है जिसका मन भरा हुआ है तथा वह बिना तोले ही नाम स्मरण जैसा धन देते हैं।

            कबीर ने संपूर्ण भारतीय समाज को एक इकाई माना है।  वह एक छोटे समूह का प्रतिनिघित्व नहीं करते थे वरन् उन्हें भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में एक ऐसा महापुरुष माना जाता है जिसकी चर्चा के बिना कोई ज्ञानी संत वाणी से से निकले शब्द समूह को अधूरा ही मानता है। आज हम जब कबीर पंथ के नाम पर चले ऐसे धार्मिक संगठनों या कथित संतों की क्रियायें देखते हैं तो लगता है कि वह दोहरे अपराध में लिप्त हैं-एक तो उनका नाम लेकर भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के सिद्धांतों की आड़ में भ्रम फैलाना दूसरा कानून से  अपने आप को बड़ा समझकर न्याय सिद्धांतों का अपमान करना।  इस दोहरे अपराध की सजा भी दोहरी होना चाहिये। जिस अपराध पर कानूनी कार्यवाही होनी है वह तो करना ही चाहिये साथ ही उन पर धर्म को अपमानित करने का मामला भी दर्ज किया जा सकता है। हालांकि इसी बची यह भी खबर आयी है कि जिस तरह आश्रम से पुलिस पर आक्रमण किया गया उससे उस कथित संत पर राष्ट्रद्रोह का मामला दर्ज किया गया है।  एक कथित कबीर पंथी अगर वास्तव में अपनी राह चला होता तो कभी भी ऐसी नौबत नहीं आती।  अब तो उनके भक्त भी उन्हें छोड़कर जाते हुए यह कह रहे हैं कि वह कभी इस आश्रम में नहीं आयेंगे।


दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Sunday, November 9, 2014

संयम से ही ज्ञान होता है-पतंजलि योग साहित्य के आधार पर चिंत्तन लेख(sanyam se hi gyan paida hota hai-patanjali yog sahitya)



            यह मानवीय स्वभाव है कि जब वह अपने सामने किसी दृश्य, व्यक्ति या वस्तु को देखता है तो उस पर अपनी तत्काल प्रतिक्रिया देने या राय कायम करने को तत्पर हो जाता है। इस उतावली में अनेक बार मनुष्य के मन, बुद्धि तथा विचारों में भ्रम तथा तनाव के उत्पन्न होता है।  इस तरह की प्रतिक्रिया अनेक बार कष्टकर होती है और बाद में उसका पछतावा भी होता है।
            वर्तमान समय में हमारे यहां युवा वर्ग में जिस तरह रोजगार, शिक्षा तथा कला के क्षेत्र में शीघ्र सफलता प्राप्त करने के लिये सामूहिक प्रेरणा अभियान चल रहा है उसमें धीरज से सोचकर काम करने की कला का कोई स्थान ही नहीं है।  लोग अनेक तरह के सपने तो देखते हैं पर उन्हें पूरा करने की उनको उतावली भी रहती है। यही कारण है कि सामान्य लोगों में  धीरज रखने की प्रवृत्ति करीब करीब समाप्त ही हो गयी है।  जिस कारण नाकामी मिलने पर अनेक लोग भारी कष्ट के कारण मानसिक संताप भोगते हैं।

पतंजलि योग में कहा गया है कि

--------------

क्षणत्तक्रमयोः संयमाद्विवेकजं ज्ञानम्।

            हिन्दी में भावार्थ-क्षण क्षण के क्रम से संयम करने पर विवेकजनित ज्ञान उत्पन्न होता है।



जातिलक्षणदेशैरन्यतानवच्छेदात्तुल्ययोस्ततः प्रतिपत्तिः।

            हिन्दी में भावार्थ-जिन विषयों का जाति, लक्षण और क्षेत्र का भेद नहीं किया जा सकता उस समय जो दो वस्तुऐं एक समान प्रतीत होती हैं उनकी पहचान विवेक ज्ञान से की जा सकती है।

            प्रकृति ने मनुष्य और पशुओं के बीच अंतर केवल विवेक शक्ति का ही रखा है।  मन, बुद्धि तथा अहंकार तो पशुओं में भी पाये जाते हैं पर अपने से संबद्ध विषय की भिन्नता, उनके  लक्षण तथा  उपयोग करने की इच्छा का निर्धारण करने की क्षमता केवल मनुष्य में ही है।  इसके लिये आवश्यक है कि जब मनुष्य के सामने कोई वस्तु, विषय या व्यक्ति दृश्यमान होता है तब उस पर संयम के साथ हर क्षण दृष्टि जमाये रखना चाहिये। यह क्रिया तब तक करना चाहिये जब तक यह तय न हो जाये कि उस दृष्यमान विषय की प्रकृत्ति, लक्षण तथा उससे संपर्क रखने का परिणाम किस तरह का हो सकता है?
            इसे हम विवेक संयम योग भी कह सकते हैं।  ऐसा अनेक बार होता है कि हमाने सामने दृश्यमान विषय के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं होती।  एक साथ दो विषय समान होने पर यह निर्णय लेना कठिन हो जाता है कि उनकी प्रकृति समान है या नहीं! अनेक अवसर पर किसी भी विषय, वस्तु तथा व्यक्ति की मूल प्रंकृत्ति, रूप तथा भाव को छिपाकर उसे हमारे सामने इस तरह प्रस्तुत किया जाता है कि वह हमें अनुकूल लगे जबकि वह भविष्य में उसके हमारे प्रतिकूल होने की आशंका होती है।
            इनसे बचने का एक ही उपाय है कि हमारे सामने जब कोई नया विषय, वस्तु या व्यक्ति आता है तो पहले उस पर बाह्य दृष्टि के साथ ही अंतदृष्टि भी लंबे क्षणों तक केंद्रित करें।  प्रतिक्रिया देने से पहले निरंतर हर क्षण संयम के साथ उस पर विचार करें। धीमे धीमे हमारा विवेक ज्ञान जाग्रत होता है  जिससे दृश्यमान विषय के बारे में वह ज्ञान स्वाभाविक रूप से  होने लगता है जो उसके पीछे छिपा रहता है। इस हर क्षण संयम रखने की प्रक्रिया को हम विवेक योग भी कह सकते हैं।     

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
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Saturday, November 1, 2014

राज्य प्रबंधक धूर्त कर्मचारियों को दंडित करते रहें-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(rajya prabandhak dhurt karamchariyon ko dandit karen-A Hindu hindi reiligion thought based on manu smriti)

      हमारे देश में लोकतांत्रिक प्रणाली अवश्य है पर यहां की राज्य प्रबंध व्यवस्था वही है जो अंग्रेजों ने प्रजा को गुलाम बनाये रखने की भावना से अपनायी थी। उन्होंने इस व्यवस्था को इस सिद्धांत पर अपनाया था कि राज्य कर्मीं ईमानदार होते हैं और प्रजा को दबाये रखने के लिये उन्हें निरंकुश व्यवहार करना ही  चाहिये।  राजनीतिक रूप से देश स्वतंत्र अवश्य हो गया पर जिस तरह की व्यवस्था रही उससे देश में राज्य प्रबंध को लेकर हमेशा ही एक निराशा का भाव व्याप्त  दिखता रहा है।  इसी भाव के कारण  देश में अनेक ऐसे आंदोलन चलते रहे हैं जिनके शीर्ष पुरुष देश में पूर्ण स्वाधीनताा न मिलने की शिकायत करतेे है।

मनुस्मृति में कहा गया है कि

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शरीकर्षात्प्राणाः क्षीयन्ते प्राणिनां यथा।

तथा राज्ञामपि प्राणाः क्षीयन्ते राष्ट्रकर्षणात्।।

     हिन्दी में भावार्थ-जिस प्रकर शरीर का अधिक शोषण करने से प्राणशक्ति कम होती उसी तरह जिस राज्य में प्रजा का अधिक शोषण होने वहां अशांति फैलती है।

राज्ञो हि रक्षाधिकृताः परस्वादयिनः शठाः।

भृत्याः भवन्ति प्रायेण तेभ्योरक्षेदियाः प्रजाः।।

     हिन्दी में भावार्थ-प्रजा के लिये नियुक्त कर्मचारियों में स्वाभाविक रूप से धूर्तता का भाव आ ही जाता है। उनसे निपटने का उपाय राज्य प्रमुख को करना ही चाहिए।
      देश की अर्थव्यवस्था को लेकर अनेक विवाद दिखाई देते हैं।  यहां ढेर सारे कर लगाये जाते हैं।  इतना ही नहीं करों की दरें जिस कथित समाजवादी सिद्धांत के आधार पर तय होती है वह कर चोरी को ही प्रोत्साहित करती है।  इसके साथ ही  कर जमा करने तथा उसका विवरण देते समय करदाता  इस तरह  अनुभव करते हैं जैसे कि उत्पादक नागरिक होना जैसे एक अपराध है।  देश के कमजोर, गरीब तथा अनुत्पादक लोगों की सहायता या कल्याण करने का सरकार को करना चाहिये पर इसका यह आशय कतई नहीं है कि उत्पादक नागरिकों पर बोझ डालकर उन्हें करचोरी के लिये प्रोत्साहित किया जाये।      यह हैरानी की बात है कि कल्याणकारी राज्य के नाम करसिद्धांत अपनाये गये कि गरीब लोगों की भर्लाइै के लिये उत्पादक नागरिकों पर इतना बोझ डाला जाये कि वह अमीर न हों पर इसका परिणाम विपरीत दिखाई दिया जिसके अनुसार  पुराने पूंजीपति जहां अधिक अमीर होते गये वहीं मध्यम और निम्न आय का व्यक्ति आय की दृष्टि से नीचे गिरता गया।  इतना ही नहीं  ऐसे नियम बने जिससे निजी व्यवसाय या लघु उद्यमों की स्थापना कठिन होती गयी।
            हालांकि अब अनेक विद्वान यह अनुभव करते हैं कि राज्य प्रबंध की नीति में बदलाव लाया जाये। इस पर अनेक बहसें होती हैं पर कोई निर्णायक कदम इस तरह उठाया नहीं जाता दिख रहा है जैसी कि अपेक्षा होती है।  हालांकि भविष्य में इसकी तरफ कदम उठायेंगे इसकी संभावना अब बढ़ने लगी है।  एक बात तय है कि कोई भी राज्य तभी श्रेष्ठ माना जाता है जहां प्रजा के अधिकतर वर्ग खुश रहते हैं।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Thursday, October 23, 2014

मस्तिष्क की स्मृतियां ही संस्कार होती हैं-पतंजलि योग विज्ञान(mastishk ki smritiyan hi sanskar-patanjali yoga vigyan)




            आमतौर से सामान्य भाषा में स्मृति तथा संस्कार एकरूप नहीं होते।  स्मृतियों को पुराने विषय, व्यक्ति, दृश्य अथवा अनुभूतियों के स्मरण का भंडार माना जाता है जबकि संस्कार मस्तिष्क में स्थापित मानवीय व्यवहार के स्थापित सिद्धांतों के रूप में समझा जाता है। पतंजलि योग का अध्ययन करें तो लगता है कि संस्कार स्मृति का ही एक भाग है।  जीवन व्यवहार के सिद्धांत अंततः स्मृति समूह का ही वह भाग है जो मानव मस्तिष्क को प्रभावित करते हैं।

पतंजलि  योग सूत्र  में कहा गया है

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जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानष्यानन्तर्य स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वात्।।


     हिन्दी में भावार्थ-पतंजलि योग सूत्र के अनुसार जाति, देश काल इन तीनों से संपर्क टूटने पर भी स्वाभाविक कर्म संस्कारों में बाधा नहीं आती क्योंकि स्मृति और संस्कारों का एक ही रूप होता है।

     हम इस श्लोक में योग के संस्कारिक रूप को समझ सकते हैं। जब मनुष्य बच्चा होता है तब उसके अपने घर परिवार, रिश्तेदारी, विद्यालय तथा पड़ौस के लोगों से स्वाभाविक संपर्क बनते हैं। वह उनसे संसार की अनेक बातें ऐसी सीखता है जो उसके लिये नयी होती हैं। वह अपने मन और बुद्धि के तत्वों में उन्हें स्वाभाविक रूप से इस तरह स्थापित करता है जीवन भर वह उसकी स्मृतियों में बनी जाती हैं। कहा भी जाता है कि बचपन में जो संस्कार मनुष्य में आ गये फिर उनसे पीछा नहीं छूटता और न छोड़ना चाहिए क्योंकि वह कष्टकर होता है।
      यही कारण है कि माता पिता तथा गुरुओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दें। संभव है बाल्यकाल में अनेक बच्चे उनकी शिक्षा पर ध्यान न दें पर कालांतर में जब वह उनकी स्थाई स्मृति बनती है तब वह उनका मार्ग प्रशस्त करती है। इसलिये बच्चों के लालन पालन में मां की भूमिका सदैव महत्वपूर्ण मानी गयी है क्योंकि बाल्यकाल में वही अपने बच्चे के समक्ष सबसे अधिक रहती है और इसका परिणाम यह होता है कि कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं है जो अपनी मां को भूल सके।
      इसलिये हमारे अध्यात्मिक संदेशों में अच्छी संगत के साथ ही अच्छे वातावरण में भी निवास बनाने की बात कहीं जाती है। अक्सर लोग कहते हैं कि पास पड़ौस का प्रभाव मनुष्य पर नहीं पड़ता पर यह गलत है। अनेक बच्चे तो इसलिये ही बिगड़ जाते हैं क्योंकि उनके बच्चे आसपास के गलत वातावरण को अपने अंदर स्थापित कर लेते हैं।
      यही नहीं आज के अनेक माता पिता बाहर जाकर कार्य करते हैं और सोचते हैं कि उनका बच्चा उनकी तरह ही अच्छा निकलेगा तो यह भ्रम भी उनको नहीं पालना चाहिये क्योंकि किसी भी मनुष्य की प्रथम गुरु माता की कम संगत बच्चों को अनेक प्रकार के संस्कारों से वंचित कर देती है। ऐसे लोग सोचते हैं कि उनका बच्चा बड़ा होकर ठीक हो जायेगा या हम उसे संभाल लेंगे तो यह भी भ्रामक है क्योंकि जो संस्कार कच्चे दिमाग में स्मृति के रूप में स्थापित करने का है वह अगर निकल गया तो फिर अपेक्षायें करना निरर्थक है। युवा होने पर दिमाग पक्का हो जाता है और सभी जानते हैं कि पक्की मिट्टी के खिलोने नहीं बन सकते-वह तो जैसे बन गये वैसे बन गये। दरअसल हम जिससे संस्कार कहते हैं वह प्रारम्भिक काल में स्थापित स्मृतियों का विस्तार ही हैं इसलिये अगर हम अपेक्षा करते हैं कि हमारे बच्चे आगे चलकर वह काम करें जो हम स्वयं चाहते हैं तो उसकी शिक्षा पहले ही देना चाहिए। यह स्मृतियां इस तरह की होती हैं कि देश, काल तथा जाति से कम संपर्क रहने न बिल्कुल न होने पर भी बनी रहती हैं और मनुष्य अपने संस्कारों से भ्रष्ट नहीं होता है अगर किसी लोभवश वह अपना पथ छोड़ता भी है तो उसे भारी कष्ट उठाना पड़ता है और फिर अपने स्थान पर वापस आता है।
दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
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