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Friday, November 27, 2015

संसार से भागने वाले वैरागी की अपेक्षा निष्काम वीतरागी श्रेष्ठ-अष्टावक्र गीता के आधार पर चिंत्तन लेख (Sansar se bhage Ragi se Nishkam Veetragi Shreshth-A Hindu Spritualy Thought based on AshtakraGita)

                           हमारे यहां कथित रूप से अनेक ऐसे सन्यासी हैं जो विषयों का त्यागने की बात  तो करते है पर बड़े बड़े आश्रम बनाने के साथ ही भारी मात्रा में संग्रह भी करते हैं। दरअसल वह भारत के स्वर्णिम अध्यात्मिक ज्ञान के विक्रेता की तरह हैं जिनका  समाज में चेतना लाने से अधिक अपना वैभव जुटाना होता। सन्यास सहज नहीं है यह बात श्रीमद्भागवत गीता में कही गयी है।  यही कारण है कि निष्काम कर्म का सिद्धांत प्रतिपादित किया है जिसमें अपनी दैहिक आवश्यकताओं की सीमा तक विषयों में लिप्त रहने का संदेश है।
अष्टावक्रगीता में कहा गया है कि
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हातुमिच्छति संसारं दुःखजिह्यासया।
वीतरागी हि निर्दुःखस्तस्मिन्नपि न खिद्यति।।
हिन्दी में भावार्थ-रागी पुरुष दुःख से बचने के लिये संसार का त्याग करना चाहता है लेकिन वीतरागी दुःखमुक्त होकर विषयों से जुड़कर भी खेद को प्राप्त नहीं होता।
                           यह अंतिम सत्य है कि कोई भी व्यक्ति बिना कर्म किये नहीं रह सकता है। श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया है कि जो आनंद सांख्ययोगी लेना चाहते हैं वह कर्मयोगी विषयों में अनुराग त्याग कर भी प्राप्त कर सकते हैं। गीता में तो सांख्ययोग को अत्यंत कठिन बताया गया है। यहां तक कि सन्यासी होने पर विषयों के चिंत्तन से मुक्त होना कठिन माना गया है। ज्ञानी मनुष्य इतना ही कर सकता है कि जीवन निर्वाह के लिये विषयों में अपने हित की सीमा तक सक्रिय रहकर अनुराग का त्याग कर दे। यही निष्काम कर्म का सिद्धांत है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Saturday, May 25, 2013

ऋग्वेद के आधार पर चिंत्तन-मन में पवित्र संकल्प धारण करें (rigved ke adhar par chinttan-man mein pavitra sankalp dharan karen)

      इस संसार में जो सफल तथा  व्यक्ति प्रसिद्ध हुए हैं उन्होंने अपने लक्ष्य का निर्माण बाल्यकाल में ही कर लिया था। कुछ ने युवा होने पर संकल्प धारण किया पर उनके प्रयास निष्काम होने के साथ ही दृढ़ संकल्प के साथ जुड़े हुए थे। इसलिये वह सफल व्यक्ति कहलाये।  सच बात तो यह है कि अनेक लोग अपने लक्ष्य तथा संकल्प बदलते रहते है। परिणामस्वरूप उनके हाथ कुछ नहीं आता।  इसके अलावा जो लोग  अपने लक्ष्य के साथ कामनाओं की संभावना अधिक ही मन में  रखते हैं, वह भी अधिकतर नाकाम ही होते हैं।  अधिकतर लोग किसी कार्य को पेट पालने या कमाने का लक्ष्य रखकर प्रारंभ करते हैं।  उनके लिये कमाना ही फल है।  ऐसे में उनकी बुद्धि संकीर्ण हो जाती है जिससे व्यापक रूप से कार्य करना संभव नहीं हो पाता।  पहले तो यह समझना चाहिये कि सबका दाता परमात्मा है।  दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम!  मनुष्य को अपना काम यह सोचकर करना चाहिये कि वह तो उसे करना ही है।  बिना काम किये शरीर जर्जर हो ंजाता है।  उस काम से जो उसे भौतिक उपलब्धि होती है वह कोई फल नहीं होता क्योंकि वह तो आगे के काम में व्यय हो जाती है।  नौकरी में वेतन मिले या व्यापार में लाभ हो वह कोई साथ नहीं रखता बल्कि परिवार और अपने पर खर्च करता है। यह उपलब्धि कर्म का विस्तार करती है न कि वह फल है। इसलिये काम अपने हृदय को संतोष देने के लिये करना चाहिये।
 ऋग्वेद में कहा गया है कि
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आकृतिः सत्या मनसो में असतु।
           हिन्दी में भावार्थ-मन के संकल्प और प्रार्थना सत्य हो।
समाना व आकृतिः  आकूतिः समाना हृदयान वः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसह्यसति।।
            हिन्दी में भावार्थ-मनुष्यों  के संकल्प एक समान रहें और हृदय भी एक समान हों जिससे संगठित होने पर कार्य संपन्न होता है। जब संकल्प, मन और विचार का मेल होता है तब एकता स्वतः हो जाती है।
         दूसरी बात यह कि अपना मेल उन लोगों से करना चाहिये जिनका संकल्प, विचार तथा लक्ष्य समान हो। विपरीत यह प्रथक चाल चलन वाले से संबंध रखने से कोई लाभ नहीं होता।  समान विचाराधारा वाले के साथ चलने पर संगठन बनता है और कोई लक्ष्य आसानी से प्राप्त किया जा सकता है।  जीवन में संकल्प का अत्यंत महत्व है। जिस तरह का संकल्प हम करते हैं वैसा ही वातावरण हमारे सामने आता है।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Thursday, May 23, 2013

विदुर नीति के आधार पर चिंत्तन-कष्ट से पाया धन व्यर्थ (vidur neeti darshan-kasht se prapat dhan vyarth)



          मनुष्य जीवन को धारण करने वालों के मन मस्तिष्क में  यह भ्रम रहता कि वह केवल धनर्जान करने के लिये ही पैदा हुए हैं।   संसार के अधिकतर मनुष्य  धन को ही सत्य मानते हैं।  धन कमाने के बाद  उसके व्यय का प्रदर्शन कर समाज में अपनी श्रेष्ठता साबित करने का मोह कोई नहीं छोड़ पाता। हमारे देश में धर्म तथा  समाज के नाम पर ऐसी परम्पराएं  बनायीं गयी हैं जिनका निर्वाह बिना धन के संभव नहीं हो सकता।  पुत्र  के लिये व्यवसाय तथा पुत्री के लिये वर ढूंढते हुए हमारे देश के अधिकतर लोगों का जीवन ही निकल जाता है।  हमारे देश के लोगों में धन संचय की प्रवृत्ति इतनी गहरी है कि आधुनिक समय में चालाक बुद्धिमानों के लिये उनके साथ  ठगी करना आसान हो गया है। 
         देश भर में अनेक चिटफंड कंपनियां यह काम इस तरह कर रही है कि लोग अपनी सारी जमा पूंजी उनके पास जमा कर आते हैं।  अधिक व्याज का लोभ लोगो के लिये संकट का कारण तब बनता है जब उनका मूल धन भी हाथ से निकल जाता है।  पीड़ित लोग अधिकतर अपने पृत्र के व्यवसाय या नौकरी तथा बेटी की शादी के लिये धन जमा करने की बात कहते है।  हमारे यहां विवाह तथा मृत्यु के अवसर पर जितनी नाटकबाजी होती है वह धन से ही संभव है।  यही कारण है कि भारत में लोग बच्चों के भविष्य के लिये अधिक से अधिक संचय करते हैं। इतना ही नहीं अपने बुजुर्गों की मृत्यु पर उनके दाह संस्कार के बाद भोज के प्रबंध का जिम्मा भी उन पर रहता है।  समाज में अपनी कथित छवि बचाये रखने के लिये भारत के लिये हर आम आमदी जूझता रहता है।  हमारे देश में सीध सच्चे धंधे में अधिक धनवान होने के अवसर करीब करीब बंद कर दिये गये हैं, जिसका परिणाम यह हुआ है कि अपने पास मौजूद धन की वृद्धि के लिये ऐसे ठगों के जाल में आमजन  आसान से फंस जाते हैं।
                      विदुरनीति में कहा गया है कि
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            अतिक्लेशेन येऽर्याः स्युर्धर्मस्यातिक्रमेश वा।
            अरेवां प्रणपातेन मा स्म तेषु मनकृथाः।।
        हिंदी  में भावार्थ-जिस धन को अर्जित करने में मन तथा शरीर को अत्यंत क्लेश हो, धर्म का उल्लंघन  करना पड़े या फिर शत्रु के सामने अपना सिर झुकाने की बाध्यता उपस्थित हो, उसे प्राप्त  करने का विचार ही त्याग देना श्रेयस्कर है।
                          
            सहस्त्राणिऽपि जीवन्ति जीवन्ति शतिनानथा।
            धृतराष्ट्र निमुंचेच्छां न कथंचिन्न जीव्यते।
       हिन्दी में भावार्थ-जिनके पास हजार है वह जिंदा रहते हैं पर जिनके पास सौ वह भी जिंदा  रहते हैं। धन का लोभ छोड़ने वाले लोग भी हर हालत में अपना जीवन धारण किये रहते ही  हैं।
        हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार  जिस जीव में परमात्मा ने प्राणवायु प्रवाहित की है माया उसकी सेवा करने के लिये बाध्य है। कहा भी जाता है कि जिसने पेट दिया है वह दाना भी देगा।  परमात्मा की दासी माया है न कि उसकी स्वामिनी।  यह भी कहा जाता है कि जिसके भाग्य में माया का जितना भाग आना लिखा है उतना ही मिलेगा। इसके बावजूद धर्मभीरुता का दावा करने वाले हमारे भारतीय समाज के अधिकांश लोगों  को इस पर विश्वास नहीं है। श्रीमद्भागवत गीता से कथित रूप से कर्मप्रेरणा मिलने का दावा करने वाले यहां अनेक लोग मिल जायेंगे पर यह कोई नहीं समझ पाया कि उसमें निष्कर्म की बात कही गयी है न कि सकाम कर्म का सिद्धांत स्थापित किया गया है।  स्थिति यह है कि लोग धन के लिये देह तथा मन को भारी संताप देने के लिये तैयार हो जाते हैं। अपने ही धन के शत्रुओं की चिकनी चुकडी बातों में आकर उसे सौंप देते हैं।  परिणाम यह है कि बाद में जब धोखा मिलता है तो सिवाय आर्तनाद करने के अलावा उनके पास कोई दूसरा विकल्प् नहीं रहता। 
         अतः अपने नियमित स्वाभाविक कर्म करते हुए परमात्मा का स्मरण ही करते रहना चाहिये।  संसार के विषयों का चक्र माया की कृपा से चलता ही रहता है।  उसमें एक दृष्टा की तरह शामिल होना चाहिये। समय आने पर सारे काम हो जाते हैं यह विश्वास धारण कर जीवान आनंद से बिताना चाहिये।   

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Sunday, May 19, 2013

अथर्ववेद से संदेश-देह और मन को शुद्ध रखने वाला मनुष्य पीड़ाओं से दूर रहता है (atharvaved se sandesh-shariri aur man ko shuddh rakhane wala peedaon se door rahataa hai

           इस संसार में प्रत्येक मनुष्य को संघर्ष करना ही पड़ता है।  इस  संघर्ष में जय पराजय का आधार मनुष्य के अंदर विद्यमान शारीरिक और मानसिक क्षमतायें होती हैं।  जिनका संकल्प दृढ़ होने के साथ हृदय  में कर्म करने से प्रतिबद्धता है वह व्यक्ति हमेशा ही सफल होता है।  यह बात कहने में अत्यंत सहज लगती है पर इसका व्यवहारिक पहलू यह है कि हमें अपने जीवन में ऐसी दिनचर्या अपनाना चाहिये जो शारीरिक तथा मानसिक शक्ति में वृद्धि करने में सहायक  हो।  जीवन में न केवल शारीरिक शक्ति का होना आवश्यक है बल्कि उसके साथ मनुष्य को मानसिक रूप से भी शक्तिशाली होना चाहिए।
            हमारे अध्यात्मिक दर्शन में ब्रह्म मुहूर्त में उठना जीवन के लिये सबसे ज्यादा उत्तम माना जाता है।  हमारे महान पूर्वजों ने जिस अध्यात्मिक ज्ञान का संचय किया है वह सभी प्रातःकाल उठने को ईश्वर की सबसे बड़ी आराधना माना जाता है। इससे तन और मन में शुद्धता रहती है।  प्रातःकाल का समय धर्म का माना जाता है और इस दौरान योगासन, ध्यान और मंत्रजाप कर स्वयं को अध्यात्मिक रूप से दृढ़ बनाया जाना आवश्यक है। 
अथर्ववेद  में कहा गया है कि 
व्यार्त्या पवमानो वि शक्रः पाप हत्यथा।।
           हिन्दी में भावार्थ- तन और मन में शुद्धता रखने वाला मनुष्य पीड़ाओं से दूर रहता तो पुरुषार्थी दुष्कर्म करने से बचता है।
ओर्पसूर्यमन्यातस्वापाव्युषं जागृततादहमिन्द्र इवारिष्टो अक्षितः।
             हिन्दी में भावार्थ- दूसरे लोग भले ही सूर्योदय तक सोते रहें पर शूरवीर सदृश नाश और क्षय रहित होकर समय पर जागे।
      जब देह और मन में शुद्धता होती तब आदमी स्वयं ही सत्यकर्म के लिये प्रेरित होता है।  पुरुषार्थी मनुष्यों को सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि वह पाप कर्मों पर कभी नहीं विचार करते। आजकल हम समाज में जो अपराध की बढ़ती प्रवृत्ति देख रहे हैं उसके पीछे दो ही प्रकार के लोग जिम्मेदार दिखाई देते हैं। एक तो वह लोग जिनके पास कोई काम नहीं है यानि वह बेकार है दूसरे वह जिनको काम करने की आवश्यकता ही नहीं है यानि वह निकम्मे हैं।  यह बेकार और निकम्मे ही मिलकर अपराध करते हैं।  हम जब जब सभ्य समाज की बात करते हैं तो वह पुरुषार्थी लोगों के कंधों पर ही निर्भर करता है। हृदय में शुद्ध और देह में दृढ़ता होने पर कोई भी लक्ष्य आसानी से प्राप्त किया जा सकता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday, October 7, 2012

संत कबीर दास के दोहे-पानी तो झुक कर ही पिया जा सकता है (sant kabir ke dohe-pani to jhukkar hi piya ja sakta hai)

       हर मनुष्य को स्वाभिमान से जीवन व्यतीत करना चाहिए। इसका अर्थ भी यह कदापि नहीं है कि विनम्रता का त्याग करें। हमेशा इस अकड़ में गरदन ऊपर कर न चलें कि आपको किसी की जरूरत नहीं है।  समय के  अनुसार अपने व्यवहार में परिवर्तन लाते रहना चाहिए।  न इतना विनम्र होना चाहिए कि लोग कायर समझने लगें न इतनी उग्रता दिखायें कि लोग अहंकारी समझें।  जहां से मदद और कृपा की आशा हो वहां तो विनम्रता दिखाना चाहिए जहां से न हो वहां भी सरल व्यवहार रखकर यह साबित करें कि आप में निरंकार का भाव है।
        इस संसार में अपने पद, पैसे और प्रतिष्ठा के मद में रहने वाले लोग बहुत मिल जाते हैं और जब उनका पतन होता है उनकी उसी समाज हंसी भी उड़ती है जिससे वह अपने वैभव से पीड़ित किये रहते हैं।  जीवन अनेक रंगों से भरा है।  कभी दुःख है तो कभी सुख, कभी हृास है तो कभी परिहास, कभी सौंदर्य का बोध होता है तो कभी वीभत्स रूप सामने आता है।  ऐसे में मनुष्य को अपने मन पर नियंत्रण रखना चाहिए।  इसके साथ ही वाणी में सदैव मिठास रखते हुए लोगों के साथ प्रेमपूर्वक वार्तालाप करने से अपनी स्वयं की छवि बनती है।      
  संत कबीरदास जी कहते हैं कि
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ऊंचा पानी न टिकै, नीचै ही ठहराय।
नीचा होय सा भरि पियै, ऊंच पियासा जाए।
    ‘‘पानी कभी ऊंचाई पर नहीं टिकता वह नीचे की तरफ बहता है। उसी तरह जिस व्यक्ति को पानी पीना होता है उसे गरदन नीचे करनी पड़ती है। जो अकड़ कर गरदन ऊंची रखता है उसे पानी भी नसीब नहीं होता।’’
      हम जब भी पानी पीते हैं तो गरदन झुकाना पड़ती है। चाहे ग्लास में पियें या सीधे नल से मगर अपनी गर्दन झुकानी पड़ती है।  हालांकि कुछ लोग कह सकते हैं कि गरदन अकड़ कर बोतल से भी पानी पिया जा सकता है तो उनको यह भी बता दें कि स्वास्थ्य वैज्ञानिक इस तरह सीधे पानी पीने से देह को हानि पहुंचने की आशंकायें अब जताने लगे हैं।  उनका कहना है कि सीधे गले में पानी न डालते हुए मुख के माध्यम से अंदर पानी पीना चाहिए।  इससे एक बात पता लगती है कि हमारा अध्यात्मिक दर्शन भी विज्ञान से परिपूर्ण है।



लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Writer-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh

संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
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Sunday, August 19, 2012

बगुले से भी सीख ली जा सकती है-चाणक्य नीति दर्शन (bagule se seekh-chankya neeti darshan)



      सामान्य मनुष्य हमेशा ही बहिर्मुखी रहता है। आंखों के सामने घटित दृश्य, कानों में गूंजते स्वर तथा नासिका से सुगंध दुंर्गंध का बोध करने में उसकी इंद्रियां इतनी व्यस्त रहती है कि उसकी बुद्धि मे चिंत्तन का कीड़ा कभी घूमता नज़र नहीं आता।  विरले लोग ही होते हैं जो आत्ममंथन करते हैं।  ऐसे ज्ञानी लोग न केवल सदैव प्रसन्न रहते हैं बल्कि हर स्थिति में सफलता उनके हिस्से ही आती है।  आमतौर से बगुले को धूर्तता का पर्याय माना जाता है पर उसे अगर चालाकी समझा जाये तो कुछ सीखा जा सकता है। वह अपनी इंद्रियों को वश में कर तालाब में मछलियों का शिकार करता है।  अगर मनुष्य उससे सीखकर अपने जीवन के लक्ष्यों को पूरा करने का प्रयास करे तो वह सुखी रह सकता है।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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इन्द्रियाणि च संयम्य बकवत् पण्डितो नरः।
देशकालबलं सर्वकार्याणि साधयेत्।।
                     हिन्दी भावार्थ-ज्ञानी व्यक्ति हमेशा ही बगुले की तरह इंद्रियों पर नियंत्रण कर देश और काल की समझ धारण कर अपने बल से ही सारे कार्यो को संपन्न करता है।’’
य एतान् विंशतिगुणानाचारिव्यति मानवः।
कार्याऽवस्थासु सर्वासु अजेयः स भविष्यति।।
                                                  हिन्दी में भावार्थ-जो व्यक्ति बीस गुणों का आचरण कर जीवन व्यतीत करेगा वह कायों को संपन्न करने के साथ हर अवस्था में विजयी होता है।’’
      हमें जब भी एकांत मिले आत्ममंथन अवश्य करना चाहिए। अपने गुणों तथा बल के साथ ही अपनी कमजोरियों पर भी विचार करना चाहिए। हमेशा बहिर्मुखी बने रहने से कोई लाभ नहीं जब तक हम अंतर्मुखी होकर विचार न करें। जीवन में सफलता का मूल मंत्र यही है कि अपने अंदर गुणों के संचय का प्रयास भी करें।
 
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Saturday, February 18, 2012

यजुर्वेद से संदेश-अज्ञान की छाया में रहने वाले केवल बातें करते हैं (yajurved se sandesh-agyan ki chhaya mein rahane wale kewal bataen karte hain)

         हमारे देश में धर्म प्रचार की परंपरा है जो कि आमतौर से सत्संग और प्रवचनों के रूप में दिखाई देती है।  इसका लाभ देश के व्यवसायिक बुद्धिमानों ने इस तरह उठाया कि संत और सेठ का अंतर ही नहीं दिखाई देता। प्राचीन ग्रंथों के स्वर्णिम तत्व ज्ञान को रटने वाले गेरुए या सफेद वस्त्र पहनकर उनका प्रवचन करते हैं।  उन्होंने उसे धारण कितना किया है यह केवल ज्ञानी ही समझ सकते हैं। 
   हमारे देश का अध्यात्म ज्ञान अनेक ग्रंथों में वर्णित है। इन ग्रंथों में सकाम तथा निष्काम दोनों प्रकार की भक्ति के सिद्धांतों का प्रतिपादन किया गया है। कर्म और फल के नियमों का उल्लेख किया गया है। यह अंतिम सत्य है कि हर मनुष्य को अपने ही कर्म का फल स्वयं भोगना पड़ता है। कोई व्यक्ति भी किसी की नियति और फल को बदल नहीं सकता। यह अलग बात है कि समस्त ग्रंथों का अध्ययन करने के बावजूद अनेक लोग उसका ज्ञान धारण नहीं कर पाते पर सुनाने में सभी माहिर हैं।
        हमारे देश का तत्वज्ञान प्रकृत्ति और जीवन के मूल सिद्धांतों पर आधारित एक विज्ञान है। इस संबंध में हमारे अनेक प्राचीन ग्रंथ पठनीय है। यह अलग बात है कि उनका रटा लगाने वाले अनेक लोग अपने आपको महान संत कहलाते हुए मायापति बन जाते हैं। उनके आश्रम घास फूस के होने की बजाय पत्थर और सीमेंट से बने होते हैं। उसमें फाइव स्टार होटलों जैसी सुविधायें होती हैं। गुरु लोग एक तरह से अपने महल में महाराज की तरह विराजमान होते हैं और भक्तों की दरबार को सत्संग कहते हैं। तत्वज्ञान का रट्टा लगाना उसे दूसरों को सुनाना एक अलग विषय है और उसे धारण करना एक अलग पक्रिया है।
               इस विषय पर यजुर्वेद में कहा गया है कि
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            नीहारेण प्रवृत्त जल्प्या चासुतृप उम्थ्शासरचरन्ति
‘‘जिन पर अज्ञान की छाया है जो केवल बातें बनाने के साथ ही अपनी देह की रक्षा के लिये तत्पर हैं वह तत्वज्ञान का प्रवचन बकवाद की तरह करते हैं।’’
        तत्वज्ञानी वह नहीं है जो दूसरे को सुनाता है बल्कि वह है जो उसे धारण करता है। किसी ने तत्वज्ञान धारण किया है या नहीं यह उसके आचरण, विचार तथा व्यवहार से पता चल जाता है। जो कभी प्रमाद नहीं करते, जो कभी किसी की बात पर उत्तेजित नहीं होते और सबसे बड़ी बात हमेशा ही दूसरे के काम के लिये तत्पर रहते हैं वही तत्वाज्ञानी हैं। सार्वजनिक कार्य के लिये वह बिना आमंत्रण के पहुंच कहीं भी मान सम्मान की परवाह किये बिना पहंच जाते हैं और अगर कहीं स्वयं कोई अभियान प्रारंभ करना है तो बिना किसी शोरशराबे के प्रारंभ कर देते हैं। लोग उनके सत्कर्म से प्रभावित होकर स्वयं ही उनके अनुयायी हो जाते हैं।
        इसके विपरीत अज्ञानी और स्वार्थी लोग तत्वज्ञान बघारते हैं पर उसे धारण करना तो दूर ऐसा सोचते भी नहीं है। किसी तरह अपने प्रवचन करते हुए आम लोगों को भ्रम में रखते हैं। वह उन कर्मकांडों को प्रोत्साहित करते हैं जो सकाम भक्ति का प्रमाण माने जाने के साथ ही फलहीन माने जाते हैं। अतः जिन लोगों को अध्यात्म में रुचि है उनको अज्ञानी और अज्ञानी की पहचान उस समय अवश्य करना चाहिए जब वह किसी को अपना गुरु बनाते हैं।
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Monday, December 12, 2011

रहीम के दोहे-बड़े आदमी की अनुचित बात नहीं माननी चाहिए

             आधुनिक युग में भौतिकतवाद ने अनेक ऐसे प्रायोजित नायकों को स्थापित किया है जो धर्म, कला, साहित्य, समाज तथा आर्थिक जगत के शिखर पर पहुंचकर लोगों को सिखाने लगते हैं कि जीवन कैसे जिया जाये? वह वस्तुओं का विज्ञापन करते हैं तो समाज की व्यवस्था में भी अपना दखल इस तरह देते हैं कि जैसे उन जैसा महाज्ञानी कोई न हो। यह प्रायोजित नायक अगर वस्तुओं के उत्पादों का विज्ञापन करते हैं तो समाज पर नियंत्रण करने वाले ठेकेदारों के साथ खड़े होकर उनको लोगों पर नियंत्रण करने में भी सहायक बनते हैं। आकर्षण तथा विश्वास के जाल में फंसा आम जनमानस अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव में अच्छे बुरे की पहचान नहीं कर पाता। यही कारण कि आजकल के युवा गीत, संगीत तथा नृत्य के जाल में फंसा है। अभी हाल ही में एक तमिल अंग्रेजी मिश्रित कोलेवरी डी को हिन्दी भाषी क्षेत्रों में भारी लोकप्रियता हासिल हुई। शब्द किसी के समझ में नहीं आते पर संगीत पर ही लोग थिरक रहे हैं। एक प्रेमिका से निराश प्रेमी के शब्दों को समझे बिना केवल संगीत की धुन पर थिरकना इस बात का प्रमाण है कि लोग आत्मज्ञान से इतने परे हैं कि उन्हें उछलकूद की जिंदगी जीकर मन बहलाना पड़ रहा है।
कविवर रहीम के अनुसार
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अनुचित वचन न मानिए, जदपि गुराइस गाढ़ि।
है ‘रहीम’ रघुनाथ तें, सुजस भरत को बाढ़ि।।
              ‘‘कितना भी बड़ा आदमी क्यों न हों उसकी गलत बात नहीं मानिए भले ही वह कितनी भी महत्वपूर्ण क्यों न हो। भगवान श्री राम ने अपने पिता की बात मानते हुए वनगमन किया पर फिर भी उनसे अधिक यश उस भरत को प्राप्त हुआ जिन्होंने मां की आज्ञा ठुकराकर राज्य त्याग दिया।’’
‘‘अब ‘रहीम’ मुश्किल बढ़ी, गाढ़े दोऊ काम।
सांचे से तो जग नहीं, झूठे मिलें न राम।।
‘‘दुनियां में दो महत्वपूर्ण काम एकसाथ करना अत्यंत कठिन है। सच का साथ लो तो जग नहीं मिलता और झूठ बोलो तो परमात्मा से साक्षात्कार नहीं हो पाता।
         आत्म ज्ञान के अभाव झूठ का इतना बोलबाला हो गया है कि लोग यह सोचकर चलते हैं कि भगवान उनके दुष्कर्मों को नहीं देख रहा है। धर्म और अध्यात्म का प्रचार करने वाले लोग पर्दे के पीछे विलासिता का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। स्वयं कभी परमात्मा का स्वरूप जो लोग समझ नहीं पाये वह दूसरों को समझा रहे हैं। जीवन की सच्चाई यह है कि अगर सत्य की राह चलो तो लोग साथ नहीं होते। जब लोग साथ होते हैं तो वह असत्य की राह पर चलने को विवश करते हैं ऐसे में शुद्ध भाव से भक्ति अत्यंत कठिन है। शुद्ध भाव से भक्ति न होने पर मन को शांति नहीं मिलती। यही कारण है कि आज आधुनिक साधनों से सुसज्तित आदमी के मन में भी शांति नहीं है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Wednesday, October 26, 2011

पतंजलि योग सूत्र-आत्मा जीव की बुद्धि के अनुसार कार्य कर सकता है (aatma aur buddhi ka sanjojan-patanjali yoga sootra)

            हमारे अध्यात्मिक दर्शन के कुछ विद्वान आत्मा को परमात्मा का अंश मानते हैं तो कुछ आत्मा को ही परमात्मा मानते हैं। इस तरह की राय में भिन्नता के बावजूद यह एक सत्य बात है कि आत्मा अत्यंत शक्तिशाली तत्व है जिसे समझने की आवश्यकता है। दरअसल जो लोग के माध्यम से इंद्रियों और आत्मा का संयोग करते हैं वही जानते हैं कि तत्पज्ञान क्या है और उसको सहजता से कैसे जीवन में धारण किया जा सकता है। आत्मा और परमात्मा में भेद करने जैसे विषयों में अपना दिमाग खर्च करने से अच्छा है कि अपनी आत्मा को पहचानने और उसे अपनी इ्रद्रियों को संयोजन का प्रयास किया जाये।
            पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
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            द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः।।
          ‘‘चेतनमात्र दृष्ट (आत्मा) यद्यपि स्वभाव से एकदम शुद्ध यानि निर्विकार तो बुद्धिवृति के अनुरूप देखने वाला है।
           तदर्थ एवं दृश्यस्यात्मा।।
         ‘‘दृश्य का स्वरूप उस द्रष्टा यानि आत्मा के लिये ही है।’’
          पंचतत्वों से बनी इस देह का संचालन आत्मा से ही है मगर उसे इसी देह में स्थित इंद्रियों की सहायता चाहिए। आत्मा और देह के संयोग की प्रक्रिया का ही नाम योग है। मूलतः आत्मा शुद्ध है क्योंकि वह त्रिगुणमयी माया से बंधा नहीं है पर पंचेंद्रियों के गुणों से ही वह संसार से संपर्क करता है और बाह्य प्रभावों का उस पर प्रभाव पड़ता है।
           आखिर इसका आशय क्या है? पतंजलि विज्ञान के इस सूत्र का उपयोग क्या है? इन प्रश्नों का उत्तर तभी जाना जा सकता है जब हम इसका अध्ययन करें। अक्सर ज्ञानी लोग कहते हैं कि ‘किसी बेबस, गरीब, लाचार, तथा बीमार या बेजुबान पर अनाचार मत करो’ तथा ‘किसी असहाय की हाय मत लो’ क्योंकि उनकी बद्दुआओं का बुरा प्रभाव पड़ता है। यह सत्य है क्योंकि किसी लाचार, गरीब, बीमार और बेजुबान पशु पक्षी पर अनाचार किया जाये तो उसका आत्मा त्रस्त हो जाता है। भले ही वह स्वयं दानी या महात्मा न हो चाहे उसे ज्ञान न हो या वह भक्ति न करता हो पर उसका आत्मा उसके इंद्रिय गुणों से ही सक्रिय है यह नहीं भूलना चाहिए। अंततः वह उस परमात्मा का अंश है और अपनी देह और मन के प्रति किये गये अपराध का दंड देता है।
         कुछ अल्पज्ञानी अक्सर कहते है कि देह और आत्म अलग है तो किसी को हानि पहुंचाकर उसका प्रायश्चित मन में ही किया जा सकता है इसलिये किसी काम से डरना नहीं चाहिए। । इसके अलावा पशु पक्षियों के वध को भी उचित ठहराते हैं। यह अनुचित विचार है। इतना ही नहीं मनुष्य जब बुद्धि और मन के अनुसार अनुचित कर्म करता है तो भी उसका आत्मा त्रस्त हो जाता है। भले ही जिस बुद्धि या मन ने मनुष्य को किसी बुरे कर्म के लिये प्रेरित किया हो पर अंततः वही दोनों आत्मा के भी सहायक है जो शुद्ध है। जब बुद्धि और मन का आत्मा से संयोग होता है तो वह जहां अपने गुण प्रदान करते हैं तो आत्मा उनको अपनी शुद्धता प्रदान करता है। इससे अनेक बार मनुष्य को अपने बुरे कर्म का पश्चाताप होता है। यह अलग बात है कि ज्ञानी पहले ही यह संयोग करते हुए बुरे काम मे लिप्त नहीं होते पर अज्ञानी बाद में करके पछताते हैं। नहीं पछताते तो भी विकार और दंड उनका पीछा नहीं छोड़ते।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Saturday, October 22, 2011

मनुस्मृति-अतिथि सत्कार पवित्र मनुष्य को प्रदान करना चाहिए (atithi satkar pavitra manushya ka pradan karna chahiye-manu smriti)

       हमारे देश में संस्कार तथा संस्कृति के नाम पर भी कई नारे प्रचलित हो गये हैं। इनमें एक है ‘अतिथि देवो भव‘। इसको लेकर बहुत सारी बातें कही जाती हैं जबकि हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है कि मेहमान की पात्रता तभी स्वीकार्य है जब वह पवित्र मनुष्य हो। ऐसा नहीं है कि हर किसी को घर के दरवाजे पर आने पर मेहमान का दर्जा देकर उसका स्वागत किया जाये। दरअसल इस तरह के नारे अध्यात्मिक ग्रंथों में वर्णित तत्वज्ञान के अभाव में ही समाज में प्रचलित हो गये हैं। कुछ लोग तो यह कहते हैं कि अतिथि सत्कार धर्म का सर्वोच्च रूप है और एक तरह से यज्ञ करने से अधिक श्रेष्ठ है। यह सत्य है कि अगर सुपात्र मनुष्य का अतिथि रूप में सत्कार करना एक तरह यज्ञ ही है पर इसमें पवित्रता का विचार भी होना चाहिए। ज्ञानी लोग हर क्रिया को यज्ञ की तरह मानते हैं। जिस तरह यज्ञ पवित्र स्थान पर पवित्र वस्तुओं से किया जाता है उसी तरह अतिथि सत्कार का धर्म भी पवित्र व्यक्ति को प्रदान किया जाना चाहिए।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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ज्ञानेनैवापरे विप्राः यजन्ते तैमंखेःसदा।
ज्ञानमूलां क्रियामेषां पश्चन्तो ज्ञानचक्षुषा।
            ‘‘तत्वाज्ञानी सभी क्रियाओं को अपने ज्ञान नेत्रों से देखते हुए उसके प्रेरक तत्वों को पहचानते हैं। इस तरह वह अपने ज्ञान से ही यज्ञानुष्ठान करना सबसे महत्वपूर्ण मानते है।
पाषण्डिनो विकर्मस्थान्बैडाव्रतिकांछठान्।
हैंतुकान्वकवृत्तश्चि वांड्मात्रेण्णापि नार्चयेत्।।
          ‘‘पांखडी, दृष्ट, ठग, दूसरों को दुःख पहुंचाने वाला तथा धर्म ग्रंथों में अरुचि रखने भले ही सज्जनता का व्यवहार करे पर उसे कभी मेहमान नहीं बनाना चाहिए। इतना ही नहीं उसका वाणी से भी कभी स्वागत नहीं करना चाहिए।’’
         हमारे देश में पहले शिक्षा के अभाव में लोगों को अध्यात्मिक ग्रंथों का ज्ञान नहीं था तो अब आधुनिक शिक्षा ने उनको एक तरह से विरक्त ही कर दिया गया है। इसलिये चालाक लोग दूसरों को अतिथि सत्कार का धर्म निभाने की राय देते हैं और स्वयं मजे करते हैं। इसलिये यह आवश्यक है कि तत्वज्ञान को समझा जाये। अपनी हर क्रिया को अपने ज्ञान चक्षुओं से देखते हुए यज्ञ होने की अनुभूति की जाये। जीवन में आनंद लेने का यह भी एक तरीका है।
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Friday, August 12, 2011

भारतीय वेद शास्त्रों से-एक हाथ से अभिवादन करना अधर्म का प्रमाण (ek hath se abhivadan amuchit-bhartiya ved shastron se)

           हमारे देश में अनेक प्रकार के सांस्कृतिक विरोधाभास रहे हैं और जैसे जैसे अंग्रेज सभ्यता ने यहां पांव पसारे तो वह अधिक बढ़े भी हैं। एक तरफ हमारे देश के लोग अपने रक्त प्रवाह में बह रहे प्राचीन संस्कारों को विस्मृत नहीं कर पाते दूसरी तरफ पाश्चात्य सभ्यता में रचबसकर आकर्षक दिखने का मोह उसे ऐसे कर्मो के लिये प्रेरित करता है जो न केवल अधार्मिक बल्कि हास्यास्पद भी होते हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण अभिवादन का तरीके भी हैं जो आजकल हम अपना रहे हैं। एक तो हम लोग अभिवादन के समय हाथ मिलाते हैं दूसरा यह कि एक हाथ हिलाकर कुछ शब्द बुदबुदा देते हैं जैसे कि ‘हलो’ या फिर ‘क्या हाल हैं’ आदि। हाथ मिलाने की प्रक्रिया को तो अब पश्चिमी चिकित्सा विशेषज्ञ भी नकारने लगे हैं। उनका कहना है कि इससे एक मनुष्य के हाथ में जो विषैले जीवाणु हैं वह दूसरे में प्रविष्ट कर जाते हैं इससे स्पर्श के माध्यम से फैलने वाले रोगों के संचरण की आशंका रहती है। एक हाथ हिलाकर अभिवादन करना पश्चात्य सभ्यता में बड़े लोगों का तरीका है। जहां भीड़ है वहां नेता, अभिनेता और खिलाड़ी एक हाथ हिला हिलाकर लोगों का अभिवादन करते हैं। इसमें कहीं न कहीं देह का अहंकार बाहर प्रकट होता है। यही कारण है कि पश्चिम में भी कुछ लोग दोनों हाथ हिलाकर अभिवादन करते हैं।
एक हाथ से अभिवादन करना हमारे धर्म ग्रंथों में वर्जित किया गया है।
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जन्मप्रभृति यत्किंचित् सुकृतं समुपार्जितम्।
तत्सर्व निष्फलं याति एकहस्ताभिवादनात्।।
       ‘‘एक हाथ से कभी अभिवादन नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से पूरा जीवन और पुण्य निष्फल हो जाता है।’’
           हमारे देश में दोनों हाथ जोड़कर अभिवादन या प्रणाम करने की परंपरा है पर आजकल कुछ लोग ऐसे हैं जो हाथ मिलाने की औपचारिकता से समय बचाने या फिर किसी अनावश्यक व्यक्ति के सामने होने पर उसका एक हाथ से अभिवादन कर आगे बढ़ जाते हैं। इससे यह तो स्पष्ट होता है कि अभिवादन करने वाला आदमी दूसरे को जानता है पर वह उससे रुककर बात नहीं करना चाहता। अपने को सभ्य साबित करने के लिये अभिवादन भी वह जरूरी समझता है इसलिये एक हाथ हिला देता है। यह एक अधार्मिक व्यवहार है। इससे तो अच्छा है कि मुंह ही फेर लिया जाये कि सामने वाले को देखा ही नहीं। हमारे देश में दोनों हाथों से प्रणाम और अभिवादन करने की जो परंपरा है वह विश्व में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। इसमें न एक व्यक्ति दूसरे का स्पर्श करता है न एक ही अधर्म की प्रक्रिया में लिप्त होता है। जब किसी व्यक्ति का अभिवादन करना ही है तो फिर एक हाथ का उपयोग क्यों करें? दोनों हाथों की सक्रियता इस बात का प्रमाण होती है कि हम हृदय से दूसरे व्यक्ति का सम्मान कर रहे हैं।
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Saturday, July 16, 2011

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-क्रोध के दुर्गुण से बचने के लिये सहशीलता का गुण पैदा करें (kauliya ka arthshastra par hindi lekh-krodh aur sahanshilta)

       क्रोध के दुर्गुण से निपटने का उपाय अपने अंदर सहनशीलता का गुण पैदा करना ही है। जहां दो लोग आपस में क्रोध करते हैं उनका मन और बुद्धि संतप्त हो जाती है। अंततः वह स्वयं को ही ही हानि पहुंचाते हैं। अगर हम हिंसक घटनाओं को देखें तो लोगों पर तरस आता है। छोटी छोटी बातों पर लोग आपस में लड़ पड़ते हैं। यहां तक कि उनको अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं।
          कबीर दास जी ने एक जगह कहा भी है कि ‘न सूत न कपास, जुलाहों में लट्ठमलट्ठा’। जब हम अपने समाज की सांस्कृतिक विरासत की बात करते हैं तो इस बात को भूल जाते हैं कि हमारे यहां परिवार तथा समाज में जरा जरा बात पर लोग आपस में लड़ पड़ते हैं। कई बार तो यह होता है कि लोग एक दूसरे की जान ले लेते हैं और बाद में जब उनके विवाद के विषय का पता चलता है तो लगता है कि वह तो एकदम महत्वहीन था और उसमें सार तो कुछ था ही नहीं। यह सब क्रोध के दुर्गुण का परिणाम था।
                          कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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                       अमर्षोप्रृहीतानां मन्युसन्तप्तचेतसाम्।
                     परस्परपकारेण पुंसां भवति विग्रह।।
           ‘‘दोनों और क्रोध होने पर परस्पर संतप्त चित्त वाले मनुष्य अपकार को प्राप्त होते हैं। पुरुषों में यह विग्रह सदैव उपस्थित होता है।
                    यानापहारस्मभूते ज्ञानशक्तिविधातजे
                     समस्तदर्थश्वांगन क्षान्त्या चोपेक्षणेन च।।
         "ज्ञान या ज्ञान शक्ति के अभाव में वस्तु के हरण का विग्रह प्राप्त होता है वह ज्ञान शक्ति के उपयोग से ही शांत होता है या फिर अपने अंदर सहनशीलता लाने पर ही शांति मिलती है।"
          यह जीवन तो नश्वर है और संसार के अनेक पदार्थ तो प्राणहीन हैं पर उनका आकर्षण मनुष्य के मन को बांधता है। सोना, चांदी, हीरा और जवाहरात टके के मोल नहीं है पर मनुष्य के मोह ने उनको कीमती बना दिया है। इन पदार्थों का वह संचय करता है और अगर कहीं उनसे विग्रह हो तो उसे पीड़ा होती है। इनको लेकर लोगों में आपसी विवाद होते हैं। लूटपाट तक हो जाती है। अपनी वस्तु के छिन जाने पर आदमी खिन्न हो जाता है यह जानते हुए कि यह मायारूपी लक्ष्मी तो चंचला है। अपनी वस्तु खोने या छिन जाने पर आदमी को निराशा से बचने के लिये अपने अंदर सहनशीलता के गुण की तरफ देखना चाहिए। ऐसे विग्रह होने पर जब हम अपने अंदर सहनशीलता के तत्वा को निहारेंगे तो मन शांत हो जायेगा।
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Saturday, July 9, 2011

वेद शास्त्रों से-कर्म और फल का कोई नियम नहीं है (ved shastron se-karma aur fal ka niyam nahin)

        किसी भी कर्म का फल मिलता है उसमें देर सबेर हो सकती है। हालांकि यह कोई नियम नहीं है कि सभी कर्मों का फल कर्ता की इच्छानुसार प्राप्त हो। शायद यही कारण है कि हमारे यहां अध्यात्मिक दर्शन में सांसरिक कर्म में निष्काम कर्म की बात कही गयी है।
वेदांत दर्शन में कहा गया है कि
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उपलब्धिवदनियमः।
‘‘भोगों की प्रप्तियों की भांति कर्म करने में भी कोई नियम नहीं है।
यथा तक्षाभयथा।
इसके सिवाय जैसे कारीगर कभी काम करता है कभी नहीं करता है।
          वैसे फल की इच्छा करते हुए जब कर्म किया जाता है तो हमारा मन विचलित होने के साथ मस्तिष्क की एकाग्रता भंग होने की आशंका रहती है और कर्म उचित प्रकार से संपन्न नहीं हो पाता। दूसरी बात यह भी है कि जब कर्म के बाद फल प्राप्त नहीं होता या उसमें विलंब होता है तो व्यर्थ का तनाव पैदा होता है। हमें यह समझना चाहिए कि प्रकृति भी एक कारीगर की तरह है जो कभी कर्म करती है कभी नहीं करती है। मनुष्य का यह धर्म है कि वह अपना नियमित कर्म करे पर फल देने या न देने की का निर्णय प्रकृति पर छोड़ देना चाहिए।
मूल बात यह है कि हमें अधिक अपेक्षायें, इच्छायें और कामनायें मन में नहीं रखना चाहिए। कालांतर में उनके पूर्ण होने पर सुख मिलता है और न मिलने पर दुःख होने लगता है। तत्वज्ञानी इसलिये ही सुख, दुख, प्रसन्नता, शोक तथा मान सम्मान से परे हो जाते हैं क्योंकि वह जानते है इस संसार में सभी चीजें नश्वर हैं। सत्य जहां सूक्ष्म और स्थिर है वहीं माया विस्तार पाने के साथ ही रूप बदलती है। उत्पन्न होकर नष्ट होना फिर प्रकट होना माया की सामान्य प्रकृति है। जिस तरह सत्य या परमात्मा अनंत है वैसे ही माया भी अनंत है। उसके नियम समझना भी कठिन है।
इसके विपरीत सामान्य मनुष्य माया को अपने वश करने कें लिये पूरी जिंदगी दाव पर लगा देता है पर हाथ उसके कुछ नहीं आता। खेलती माया है उसके नियम अज्ञात हैं फिर भी आदमी यही सोचता है कि वह अपने नियमों के अनुसार खेल रहा है।
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Friday, July 1, 2011

अध्ययन करने से पहले और बाद में आंखों से पानी को स्पर्श करना उपयोगी-हिन्दी चिंत्तन लेख (study, word and water-hindi chinttan lekh)

          वायु तथा जल को न केवल जीवन का आधार माना गया है कि बल्कि उनको ओषधि भी कहा जाता है। जिस तरह प्रातः प्राणायाम से शुद्ध वायु के प्रवेश से शरीर और मन के आंतरिक विकार बाहर निकलते हैं उसी तरह नहाने के दौरान जल के उपयोग से बाहरी अंगों पर शुद्धता आती है। आधुनिक विज्ञान जल की उपयोगिता को लेकर अनेक अनुंसधान कर चुका है। हालांकि हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों में भी इस विषय पर अनेक बातें कही गयी है।
          मनु स्मृति में कहा गया है कि
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            कृत्वा मूत्रं पूरीपं वा खान्याचान्त उपस्पृशेत्।
            वेदमध्येध्माणश्च अन्नमश्नंश्च सर्वदा
       "मल मूत्र करने के बाद व्यक्ति को सदैव हाथ धोकर आचमन करने के साथ ही पानी का स्पर्श आंखों पर करना चाहिए। सदैव वेद पढ़ने तथा भोजन करने से पहले भी हाथ धोकर आचमन करना चाहिए।"
                आजकल कंप्यूटर का उपयोग बढ़ता जा रहा है पर उससे होने वाली हानियों से रोकने और बचने के उपाय बहुत कम  लोग जानते हैं। कुछ स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि कंप्यूटर का उपयोग करने वालों को बीस मिनट से अधिक उस पर काम करने के बाद दो मिनट आंखें बंद रखना चाहिए। इसके अलावा कंप्यूटर से उठकर बाहर आसमान में ताकना चाहिए ताकि आंखों के उन सूक्ष्म तंतुओं का विस्तार होता है जो काम के दौरान सिकुड़ जाते है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कही गयी है कि कंप्यूटर पर काम करने वालों को अपनी आंखों में पानी की छींटें मारते रहना चाहिए। कंप्यूटर पर काम करते हुए आंखों में जल सूखने लगता है और आंखों में छींटे मारने से वहां ताजगी आती है। मनृस्मृति में भी कहा गया है कि वेद आदि का अध्ययन करने से पहले और बाद दोनों ही समय आंखों में जल का प्रवेश कराना चाहिए। यही बात हम कंप्यूटर पर काम करते समय भी लागू कर सकते हैं। ऐसे प्रयासों से बहुत सीमा तक कंप्यूटर से होने वाली हानियों से बचा जा सकता है।
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',ग्वालियर
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Saturday, June 25, 2011

चाणक्य नीति-आचरण में ज्ञान न दिखे वह निरर्थक (acharan aur gyan-chankya neeti)


       आजकल देश में धन की अधिकता के कारण धार्मिक कार्यक्रम अधिक ही होते हैं। इन कार्यक्रमों पर काला या सफेद चाहे जो भी धन खर्च होता है इस पर हम टिप्पणी नहीं करेंगे पर इनकी तादाद देखते हुए तो यह लगता है कि हमारा देश विश्व में एक आदर्श होना चाहिए पर बढ़ते अपराध, भ्रष्टाचार, व्याभिचार तथा अहंकार को देखते हुए यह नहीं लगता कि किसी को हमसे नैतिकता का उपदेश लेना चाहिए। इसका सीधा मतलब है कि लोग ज्ञान चर्चा करते हैं तो केवल यह दिखाने के लिये कि उनकी मनुष्य देह के अंदर भी एक मनुष्य है। धार्मिक सत्संग वाणी विलास तथा मनोरंजन के रूप में होते हैं। गीत संगीत और काव्य से सजे सत्संग मजा जरूर देते हैं पर उनसे ज्ञान प्राप्त नहीं होता। गीत और भजन में अब कोई अंतर नहीं दिखता। लोग यह दिखाने के लिये अधिक प्रयत्नशील हैं कि वह धर्मभीरु हैं पर आचरण पर उनके ज्ञान की छाया नहीं दिखती।
       इस विषय पर महर्षि चाणक्य अपनी नीति में कहते हैं कि
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           हतं ज्ञानं क्रियाहीनं हतश्चाऽज्ञानतो नरः।
         हतं निर्नायकं सैन्यं स्त्रियो नष्टा ह्यभर्तृकाः।।
       ‘‘अगर मनुष्य के पास ज्ञान है पर उसे आचरण में नहीं लाता तो वह व्यर्थ है। अज्ञानी पुरुष का जीवन निरर्थक है। अज्ञानी पुरुष हमेशा असफल रहता है। उसी तरह सेनापति रहित सेना और स्वामीरहित स्त्रियां नष्ट हो जाती हैं।"
           विकास के नाम पर विनाशलीला अपना रूप दिखा रही है। अपराधों के समाचारों को देखते हुए तो ऐसा लगता है कि जिस हम संस्कृति की बात करते हैं वह कभी की लुप्त हो गयी है। सामाजिक और पारिवारिक रिश्ते नाम के लिये हो गये हैं। धन हैं तो वह भी निभा लो नहीं तो भूल जाओ। पाश्चात्य सभ्यता को विकास का पर्याय माने लेने के बाद हमें भारतीय सस्कृति के प्रति मोह है पर अपनी स्वार्थ पूर्ति तक ही वह रहता है। कहने का अभिप्राय यह है कि ज्ञान हमारे पास खूब है पर आचरण में नहीं है इसलिये ही समाज अब टूटता जा रहा है। ऐसे में समूचे समाज को संबोधित कर उसे सुधरने का उपदेश देने से अच्छा है हम स्वयं आत्ममंथन करें और अपने आचरण सुधारे।
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Sunday, June 19, 2011

चाणक्य नीति-जिसका अनिष्ट करना हो उससे मधुर वाणी में बात करें(chankya neeti-jiska bura karna ho usse meetha bolen)

       वैसे तो हर आदमी को सदैव मीठा बोलना चाहिए पर इसकी परिवार और मित्रता के व्यवहार में इसकी सीमा है। अपने परिवार के सदस्यों और मित्रों में जिन लोगों का व्यवहार सुधारना है उनसे कभी कभी सख्ती से भी पेश आना चाहिए वरना उनके मार्ग से भटकने की संभावना भी रहती है। इतना ही नहीं अपने निकटस्थ व्यक्तियों के कार्यों पर नज़र हमेशा रखना चाहिए। अगर वह कोई ऐसा काम करते हैं जो कालांतर में उनके लिये दुःख का कारण बनने की संभावना हो तो उन्हें सख्त लहजे में समझाना चाहिए।
       हमारे यहां कुछ आधुनिक विद्वानों का मानना है कि अगर बेटे के पांव में जूता बाप की नाप के बराबर या बेटी की जुती का माप मां की माप के बराबर हो तो वह उनको मित्र या सहेली समझें। फिल्मों और टीवी धारावाहिकों में भी पात्र ऐसे रचे जाते हैं जिसमें माता पिता अपनी पुत्री या पुत्र से इस तरह व्यवहार शालीन व्यवहार करते हैं जैसे कि वह उनके बराबर हों। हम इसका विरोध नहीं कर रहे पर यह भी एक सच्चाई कि फिल्म और टीवी जैसेे आदर्श चरित्र सामान्य जीवन में दिखाई नहीं देते। समाज के सत्य उससे ज्यादा कटु हैं जितने उनके काल्पनिक कथानकों में दिखाई देते हैं। आज की लड़के लड़कियों पर उनके शैक्षणिक संस्थान दूर होने तथा उनके सत्रों के बड़े होने के कारण माता पिता कम ही नज़र रख पाते हैं जिस कारण ऐसी घटनायें सामने आती हैं जो वीभत्स दृश्य होने के कारण लोगों के मन में पीड़ित के प्रति करुणा का भाव पैदा करती हैं। पुत्र या पुत्री कारुणिक स्थिति में पहुंचे उससे अच्छा है कि मन मारकर उनके साथ सख्त व्यवहार रखना भी जरूरी लगता है
        महान नीति विशारद चाणक्य कहता है कि
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        यस्य चाप्रियामिच्छेत तस्य ब्रूयात् सदा प्रियम्।
          व्याधो मृगवधं कर्तृ गीतं गायति सुस्वरम्।।
            ‘जिसका बुरा करने की इच्छा हो उसके साथ हमेशा ही मीठा बोलना चाहिए जैसे शिकारी हिरण का      वध करने के लिये मीठे स्वर में   गीत गाता है।’’
          उसी तरह यह भी देखना चाहिए कि हमसे या परिवार और मित्र समुदाय के सदस्यों के साथ कोई अन्य मनुष्य अधिक प्रेमपूर्ण व्यवहार कर रहा है तो उसका उद्देश्य क्या है? इतना ही नहंी अगर हम किसी व्यक्ति का अनिष्ट चाहते हैं तो उसके प्रति सद्व्यवहार दिखायें। अनावश्यक रूप से उसकी प्रशंसा करें तब वह भ्रमित होकर अतिसक्रियता दिखायेगा जो कि कालांतर में उसके लिये घातक होगी।
           चाणक्य नीति केवल राजाओं के लिये ही नहीं  वरन् सामान्य जीवन में कितनी उपयोगी है यह उनके इस तरह के संदेशों से समझा जा सकता है। उनका आशय यही है कि किसी का बुरा न करें। हमेशा सतर्क रहें और अगर विरोधी अक्षम्य अपराध करे तो उसे इतनी चालाकी से अहिंसक होकर दंड दें कि उसे इसका आभास तक न हो।
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',ग्वालियर
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com
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Friday, June 17, 2011

बंदर की तरह उछलकूद कर समाजसेवा नहीं होती-रहीम के दोहे (bandar ki tarah samaj seva-rahim ke dohe)

कविवर रहीम कहते है 
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बड़े दीन को दुख, सुनो, लेत दया उर आनि
हरि हाथीं सौं कब हुतो, कहूं रहीम पहिचानि

         "इस संसार में बड़े लोग तो वह जो छोट आदमी की पीड़ा सुनकर उस पर दया करते हैं, परंतु बंदर कभी हाथी नहीं हो सकता-कुछ लोग बंदर की तरह उछलकूद कर दया दिखाते हैं पर करते कुछ नहीं। वह कभी हाथी नहीं हो सकते।"
            हमारे देश में हमेशा  ही दान तथा परोपकार के जरिये समाज सेवा करने की परंपरा रही है।  यही कारण है की हमारे अधिकतर धार्मिक स्थानों पर तीर्थयात्रियों के धर्मशालाएँ बनवाईं गईं।  वहाँ लंगरखाने बनवाए गए। अब पाश्चत्य संस्कृति के प्रभाव ने समाज सेवा को न केवल व्यापार बना  दिया है बल्कि उसके लिए पैसा दूसरों से लेकर लोगों के कल्याण करने की परंपरा विकसित  की गई है। जिसे हम समाज सेवा की दलाली भी कह सकते हैं। यही कारण है कि आजकल बच्चों, विकलांगों, महिलाओं और तमाम के तरह की बीमारियों के मरीजों की सहायतार्थ संगीत कार्यक्रम, क्रिकेट मैच तथा अन्य मनोरंजक कार्यक्रम होते हैं-जो कि मदद के नाम पर दिखावे से अधिक कुछ नहीं है।  ऐसे कार्यक्रमों में  केवल बंदर की तरह उछलकूद होती है। ऐसे व्यवसायिक कार्यक्रम तो तमाम तरह के आर्थिक लाभ के लिये किये जाते हैं। जो सच्चे समाज सेवी हैं वह बिना किसी उद्देश्य के लोगों की मदद करते है, और वह प्रचार से परे अपना काम वैसे ही किये जाते हैं जैसे हाथी अपनी राह पर बिना किसी की परवाह किये चलता जाता है।
            समझदार लोग तो सब जानते हैं पर कुछ बंदर की तरह उछलकूद कर समाजसेवा का नाटक करने वालों को देखकर इस कटु सत्य को भूल जाते है। कई लोग ऐसे कार्यक्रमों की टिकिट यह सोचकर खरीद लेते हैं कि वह इस तरह दान भी करेंगे और मनोरंजन भी कर लेंगे। उन्हें यह भ्रम तोड़ लेना चाहिये कि वह दान कर रहे हैं क्योंकि सुपात्र को ही दिया दान फलीभूत होता है। अतः हमें अपने बीच एसे लोग की पहचान कर लेना चाहिए जो इस तरह समाज सेवा का नाटक करते है। इनसे तो दूर रहना ही बेहतर है।
       
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',ग्वालियर
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Tuesday, April 19, 2011

तंत्र मंत्र धोखा है, शब्द सार ही सच-कबीर के दोहे (tanra mantra dhokha-kabir ke dohe)

हमारे देश में लोगों के हृदय में भगवान भक्ति का जितना अधिक भाव उतना ही तंत्र मंत्र के प्रति भी आस्था दिखाई देती है। काला जादू, माता की सवारी तथा तंत्र मंत्र सिद्धि में यह आस्था भगवान की निष्काम भक्ति के आगे बिल्कुल निरर्थक है। अनेक लोग धन प्राप्त करने के लिये सिद्धों के पास चक्कर लगाते हैं तो अनेक अपनी शारीरिक बीमारियों के लिये तांत्रिकों के चक्कर में पड़ जाते हैं। हैरानी की बात यह है कि भगवान की नियमित भक्ति करने वाले भी ऐसी ही राह पर चल पड़ते हैं क्योंकि उनको लगता है कि यह भी शायद भक्ति का ही स्वरूप है।
देश के लोगों के व्याप्त भक्ति भाव का लाभ उठाने के लिये कुछ कथित संत जादू टोने की आड़ भी लेते हैं। कुछ तांत्रिक अपनी सिद्धि बेचने के लिये माता और भैरव बाबा की मूर्तियां भी अपने घरों या आश्रमों लगा देते हैं ताकि भक्ति का भाव रखने वाले गुमराह हों।
जादू टोने के विषय पर संत कबीर कहते हैं कि
जंत्र मंत्र सब झूठ है, मति भरमो जग कोय।
सार शब्द जानै बिना, कागा हंस न होय।।
‘‘तंत्र मंत्र विद्या एकदम झूठ है। इसमें पड़कर भ्रम के मार्ग पर चलना व्यर्थ है। तत्वज्ञान ही जीवन का सार है। कौआ कभी हंस नहीं बन सकता।’’
सच बात तो यह है कि अगर जो पवित्र मंत्र हैं उनका मन में आप करने से शांति मिलती है। जैसे जैसे हम मंत्र का जाप बढ़ाते जाते हैं हमारी देह अच्छे काम करने के लिये प्रवृत्त होती जाती है। बुद्धि में तीक्ष्णता बढ़नें के साथ ही मन एकाग्र होने लगता है तब हमारे हाथ से स्वाभाविक रूप से पवित्र काम होते हैं जिनसे सात्विक लाभ होता है। इसका मतलब यह है कोई पवित्र मंत्र जाप करने से भक्त को ही लाभ होता है पर वह दूसरे को लाभ नहीं दिला सकता। यह संसार परमात्मा के संकल्प के आधार पर ही स्थित है। उसी तरह मनुष्य का संकल्प ही उसके जीवन का निर्माण करता है। कुछ लोग तो प्रेत साधना कर सिद्धि का दावा करते हैं जो तामसी प्रवृत्ति की भक्ति का परिचायक है। अतः दृढ़ता पूर्वक भगवान की भक्ति करना जो किसी अंधविश्वास में पड़ने से बेहतर है।
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लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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Thursday, April 14, 2011

भगवान तो भक्ति भाव में बसते हैं-हिन्दू धार्मिक लेख (bhagawan to bhakti ke bhookhe hain-hindu dharmik lekh)

भक्ति का संबंध मन के भावों से है-यह अंतिम सत्य है। परमात्मा के स्वरूप के बारे में कोई दावा नहीं कर सकता क्योंकि वह अनंत है। कई लोग कहते हैं कि वह एक है तो ज्ञानी कहते हैं कि न वह एक है न अनेक, न वह गोरा है न काला, न वह स्त्री है न पुरुष न ही वह ज्ञात है न अज्ञात है, बल्कि वह तो अनंत है। उसकी अनुभूति निरंकार भक्ति से भी की जा सकती है न और किसी स्वरूप की मूर्ति बनाकर भी उसे पाया जा सकता है। मुख्य विषय है कि हमारा भाव किस प्रकार का है। मानो तो भगवान नहीं तो वह पत्थर है। वह अनंत परमात्मा भाव पूर्ण भक्ति से ही पाया जा सकता है।
हमारे देश में मूर्ति पूजक तथा उनके विरोधियों की संख्या अधिक है। भारत में प्रवर्तित धर्मों को मूर्ति पूजक मानकर उनका विरोध किया जाता है जबकि अध्यात्मिक दृष्टि से हमारे यहां आकार तथा निराकार दोनों ही रूपों के साथ ही केवल ध्यान योग के माध्यम से भी भक्ति के महत्व को स्वीकार किया जाता है। हमारे अध्यात्म दर्शन की यह खूबी है कि वह मनुष्य की उसकी दैहिक तथा शारीरिक क्षमताओं की सीमाओं के अनुसार परमात्मा की भक्ति के लिये प्रेरित करता है। मूर्ति पूजा एक साधना एक क्रिया है पर साध्य तो परमात्मा की भक्ति पाना है।
इस विषय पर नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि
काष्ठापाषाणाधातूनां कृत्वा भावेद सेवनम्।
श्रद्धया चतथा सिद्धस्तस्य विष्णुंः प्रसीदति।।
‘‘लकड़ी, पत्थर अथवा किसी भी धातु से बनी प्रतिमाओं की सहृदयता से सेवा करना चाहिए। श्रद्धा एवं सदाशयता से सेवा करने पर भगवान विष्णु उत्तम फल प्रदान करते हैं।’’
न देवा विद्यते काष्ठे न पाषाणे न भृन्मये।
भावे हि विद्यते देवस्तस्माद् भावो हि कारणम्।।
‘‘देवता या परमात्मा लकड़ी में नहीं है, पत्थर में विराजमान नहीं है और न ही धातु में विद्यमान है। मिट्टी की प्रतिमा में उसका अस्तित्व नहीं है। परमात्मा का निवास तो भावना में है। जहां भक्ति भावना है वहां वह अवश्य प्रकट होते हैं।’’
हम अगर स्वयं मूर्तिपूजक हैं तो किसी निरंकार के उपासक का मजाक न बनायें। अगर हम निरंकार के उपासक हैं तो मूर्तिपूजक पर न हंसें-यही संदेश हमारा अध्यात्मिक दर्शन देता है। जो लोग मूर्तिपूजा करते हुए उसकी सेवा करते हुए भक्ति निच्छल भाव से करते हैं उनके लिये भी भगवान प्रकट होते हैं और जो निरंकार के उपासक हैं तो उनके हृदय में ही भगवान बसते हैं। मुख्य बात यह है कि भक्ति भाव पवित्र होने के साथ ही उदारतापूर्ण होना चाहिए।
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लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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Sunday, March 6, 2011

अधर्म का धन होली पर्व पर चुराई गयी लकड़ी की तरह शीघ्र नष्ट होता है-रहीम के दोहे (adharm ka dhan holi ke parva ki lakdi ki tarah-rahim ke dohe)

अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि‘आजकल समय खराब हो गया है और नयी पीढ़ी व्यसनों का शिकार हो रही है।’
हम समाज के नैतिक और अध्यात्मिक पतन के लिये बढ़ते हुए भौतिकतावद को दोष देते हैं। यह सही है पर इसके लिये मनुष्य के की शारीरिक सुख सुविधा तथा मनोरंजन के लिये बनी वस्तुओं का उपभोग नहीं बल्कि उनको खरीदने की लिये धन का वह स्वरूप है जो अधर्म पर आधारित होता है। सच तो यह है कि जब पहले देश में जब कृषि आधारित व्यवस्था में श्रम की प्रधानता थी तब लोग ईमानदारी और परिश्रम के मार्ग से अपना भौतिक विकास करते थे। यह मार्ग लंबा होता था पर लोग सहजता से जीवन व्यतीत करते थे। विश्व में आर्थिक उदारीकरण की लहर के बाद देश की सामान्य कार्यप्रणाली में परिवर्तन आया है। अब जिसे देखो नौकरी के पीछे भाग रहा है। जिनके पास शिक्षा की उपाधि है उनमें कोई भी व्यवसाय या कृषि को अपना लक्ष्य नहीं बनाता। जल्दी जल्दी धन कमाने के लिये अनेक व्यक्ति अधर्म तथा अपराध का काम करने लगते हैं। ऐसे में उनकी उपभोग की प्रवृत्ति भी वैसी होती जा रही है। शराब, जुआ तथा सट्टा जैसे व्यसनों का प्रकोप बड़ रहा है।
कविवर रहीम कहते हैं कि
रहिमन वित्त अधर्म को, जरत न लागै बार।
चोरी करि होरी रची, भई तनिक में छार।।
‘‘पाप के धन को नष्ट होने में अधिक समय नहीं लगता। ठीक उसी तरह जैसे होली के अवसर पर कुछ लोग लकड़ी चुराकर लाते हैं और वह जलकर जल्दी नष्ट हो जाती है।’’
पाप का धन होली के लिये चुराई गयी लकड़ी की तरह ही नष्ट होता है। जिन लोगों के पास अधर्म की कमाई है उनका पैसा भी वैसे ही खर्च होता है। किसी को स्वयं ही शराब, जुआ, तथा सट्टे की आदत लग जाती है या फिर उनके परिवार के सदस्य इसका शिकार होते हैं। यह भी नहीं हुआ तो बीमारी अपना रौद्र रूप प्रकट कर पैसा बाहर निकलवाती है। इसलिये जहां तक संभव हो धर्म की कमाई करें क्योंकि शरीर के अच्छ स्वास्थ्य और मन की प्रसन्नता का यही एक उपाय है।
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लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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