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Sunday, August 12, 2012

विदुर नीति-अपने पर आश्रित को न खिलाना क्रूरता (vidur neeti on corruption or bhrashtachar)

   द्वापर में जब महात्मा विदुर ने महाभारतकाल के दौरान धृतराष्ट्र को अपने अपदेश दिये थे तब यह कल्पना भी नहीं की होगी कलियुग में भी उनका महत्व उतना ही रहेगा।  दूसरी बात हम जब कहते हैं कि कभी इस धरती पर सतयुग या कलियुग रहता है तो यह धारणा स्वयमेव खंडित हो जाती है जब यह पता चलता है कि आज की तरह उस समय भी भ्रष्टाचार और अन्याय होता था।  आज हम देखते हैं कि देश के गरीबों, दलितों तथा भूखे लोगों को रोजगार तथा रोटी देने के लिये अनेक योजनाओं में सरकार धन देती है पर बीच में काम करने वाले राजकर्मी सारा का सारा हड़प जाते हैं।   वह यह पाप बेहिचक करते हैं। यह अलग बात ऐसे ही लोग धर्म के पाखंड में जुटे दिखते हैं।  स्थिति तो यह है कि अनेक सफेदपोश लोग जिनके घर महलों जैसे बने हैं वह गरीब के पास जाता निवाला भी अपने घर रुपये के रूप में ले जाते हैं।  उसकी झौंपड़ी मे पहुंचने वाली रसद का रास्ता अपने घर की तरफ बदल देते हैं।
विदुर नीति में कहा गया है कि
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               एकः सम्पन्नायश्नाति वस्ते वासश्च शोभनम।
     योऽसंविभज्य भृत्येभ्यः कौः नृशंसतरस्ततः।।
  हिन्दी में भावार्थ-जो मनुष्य अपने से पोषित पात्र लोगों को बिना कुछ दिये भोजन करता है उसके वस्त्र पहनता है उससे बढ़कर क्रूर कौन हो सकता है।
     देश में धर्म के प्रचार का जितना शोर है उसे देखकर तो यहां कदम कदम पर धर्मात्मा मिलना चाहिए पर हो इसका उल्टा रहा है।  जहां तहां राक्षसी प्रवृत्ति के लोग धन संग्रह के लिये किसी भी अपराध को करने के लिये तैयार दिखते हैं।  अनेक जगह तो विभिन्न धर्मों के प्रतीक रंगों को पहनकर उसकेे ठेकेदार बनने वाले लोग अपने पास आने वाले बंदों को ठगते हैं।  धर्म के क्षेत्र में भ्रष्टाचार है। कला और साहित्य के क्षेत्र में भी इसी तरह अपने शासित लोगों का शोषण हो रहा है।  कहने का अभिप्राय यह है कि दूसरे के कंधे पर बंदूक चलाकर उसका ही निवााला छीनना आम बात हो गयी है।  जिसके कल्याण की बात की जाये उसी से मुंह फेर कर चलना क्रूरता है।  जिन लोगों को भारतीय अध्यात्म से प्रेम है वह इस बुराई से बचें तभी अपने हृदय को प्रसन्न कर सकते हैं।  
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Friday, August 10, 2012

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-बगैर शास्त्र ज्ञान राजनीति करना व्यर्थ (poitical scince and government post,rajneeti shastra or sarkari pad-kautiyla ka arthshastra)

           मूलतः हर मनुष्य में दूसरे पर शासन करने की प्रवृत्ति होती है जो अंततः अहंकार की अग्नि से पैदा होती है। यह बुरा भी नहीं है पर जिस मनुष्य में अपने शासित लोगों का हित करने की बजाय उनका दोहन करने का लक्ष्य होता है  वह उसको भ्रष्ट, निकृष्ट और दुष्ट बना देता है। आधुनिक लोकतंत्र ने पूरे विश्व में राजनीति शास्त्र की बजाय केवल नारे देने वालों को राज्य पद पर प्रतिष्ठित करना प्रारंभ किया है।  इतना ही नहीं राजनीति की बजाय अन्यत्र विषयों में पारंगत और प्रतिष्ठित लोगों के लिये राजकाज में आने की प्रवृत्ति बढ़ी है।  कहने का अभिप्राय यह है कि राजनीति से अनभिज्ञ लोग राजधर्म से भी अनभिज्ञ होते हैं और जब वह राजकाज करते हैं तो वह उसमें वह सफल नहीं हो पाते।  इसके परिणाम प्रजा को भोगने पड़ते हैं।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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शास्त्रचक्षुनृपस्तस्मान्महामात्यमते स्थितः।
धर्मार्थप्रतिपातीनि व्यसननि परित्येत्।।

                ‘हिन्दी में भावार्थ-किसी भी राज्य प्रमुख के पास शास्त्रों का ज्ञान होना आवश्यक है।  उसे हमेशा ही योग्य मंत्रियों के साथ दिखना चाहिए।  धर्म और अर्थ के लिये घातक व्यसनों को वह त्याग दे।
      राज्य करना भी एक तरह से कला है।  जिस तरह समाज में कला का व्यवसायीकरण हुआ है वैसे ही राजनीति भी पेशा बन गयी है।  अनेक लोग तो अपने राजनीति से इतर व्यवसायों, संगठनों तथा सामाजिक हितों की रक्षा के लिये पदारूढ़ होने की  कामना करते हैं।  वह सफल भी होते हैं। उनका लक्ष्य केवल पद पर बैठकर अपने तथा परिवार की रक्षा करना होता है इसलिये प्रजाहित की न तो उनमें दिलचस्पी रहती है न ही कोई वह योजना बनाते हैं।  इसी कारण पूरे विश्व में भ्रष्टाचार और अराजकता का वातावरण बन गया है।  अलबत्ता पद बचाये रखने के लिये ऐसे लोग  नारे अवश्य दिया करते हैं।  यही कारण है कि इस समय विश्व के अनेक देशों में असंतोष का वातावरण बन गया है।  अनेक जगह खूनी संघर्ष चल रहे हैं।  अनेक राज्य प्रमुख अपने ही देश के विद्रोहियों से जान बचाते फिर रहे हैं। यह राज्य प्रमुख केवल बंदूक के सहारे पदों पर आ गये पर जनहित करने की समझ उनमें कभी नहीं दिखी। हमारे देश को अंग्रेजों से राजनीतिक स्वतंत्रता मिले साठ साल से अधिक समय हो गया है पर आज भी अनेक विद्वान मानते हैं कि अधूरी आजादी ही मिली है।  इसलिये राजनीति में सक्रिय होने वाले लोगों को पहले राजनीति शास्त्र का अध्ययन करना चाहिए।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Sunday, August 5, 2012

ऋग्वेद से संदेश-स्वच्छता से रोगों का नाश होता है (rigved se sandesh-cleani body and men)

                      हमारे वेदों में अनेक ऐसी बातें कही गयी हैं जिनका महत्व इस संसार में कभी महत्व नहीं होता।  इसका कारण यह है कि इस संसार में समय के साथ भौतिक स्वरूप के साथ ही लोगों के रहन सहन, चाल चलन तथा कार्य करने के तरीकों में बदलाव तो संभव है पर उसके अंदर की मूल प्रकृतियों का निवास स्थाई रूप से रहता है।  इन मूल प्रकृतियों तथा उनकी निवृति के ज्ञान का (जिसे हम अध्यात्मिक विज्ञान भी कह सकते हैं) जो वर्णन इन वेदों में वर्णित है।  उनकी विषय सामग्री का  अध्ययन चाहे जब किया जाये उनमें नवीनता बनी रहती है।
ऋग्वेद में कहा गया है कि
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ब्रह्माद्विषः अवजहि।
हिन्दी में अर्थ-‘‘ज्ञान से द्वेष करने वाले को मार।’’
अहः अहःशुन्ध्युः परिपदां।।’’
हिन्दी में अर्थ-‘‘नित्य स्वच्छता रखने वाला रोगों को दूर करता है।’’
             अधिकतर लोग धार्मिक कर्मकांडों को ही अपने जीवन का हिस्सा बनाते हैं पर आध्यात्मिक ज्ञान उनके लिये बुढ़ापे में जानने वाला विषय होता है जबकि इसका ज्ञान अगर बचपन से हो जाये तो जिंदगी आराम से बिताई जा सकती है। इसका कारण यह है कि सांसरिक विषयों से संबंध तो बचपन से ही हो जाता है और अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव आम मनुष्य उसमें इस तरह लिप्त हो जाता है कि उसके लिये सुख कम दुःख अधिक प्रकट होते हैं।  अधिकतर मनुष्यों के  अंदर अहंकार मोह तथा लोभ की  प्रकृतियां विद्यमान रहती हैं जो उसे ज्ञान से परे रखती है।  यह प्रकृतियां ज्ञान से द्वेष करती हैं।  ज्ञानी से चिढ़ाती हैं।
           अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव में आदमी की न  केवल देह  बल्कि मन तथा विचारों में भी अस्वच्छता का वास हो जाता है।  इस तरह की समस्या से बचने का उपाय यही है कि  हम अपने अध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन कर अपनी बुद्धि, विचार तथा मन को शुद्ध रखने का प्रयास करें।
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Saturday, October 22, 2011

मनुस्मृति-अतिथि सत्कार पवित्र मनुष्य को प्रदान करना चाहिए (atithi satkar pavitra manushya ka pradan karna chahiye-manu smriti)

       हमारे देश में संस्कार तथा संस्कृति के नाम पर भी कई नारे प्रचलित हो गये हैं। इनमें एक है ‘अतिथि देवो भव‘। इसको लेकर बहुत सारी बातें कही जाती हैं जबकि हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है कि मेहमान की पात्रता तभी स्वीकार्य है जब वह पवित्र मनुष्य हो। ऐसा नहीं है कि हर किसी को घर के दरवाजे पर आने पर मेहमान का दर्जा देकर उसका स्वागत किया जाये। दरअसल इस तरह के नारे अध्यात्मिक ग्रंथों में वर्णित तत्वज्ञान के अभाव में ही समाज में प्रचलित हो गये हैं। कुछ लोग तो यह कहते हैं कि अतिथि सत्कार धर्म का सर्वोच्च रूप है और एक तरह से यज्ञ करने से अधिक श्रेष्ठ है। यह सत्य है कि अगर सुपात्र मनुष्य का अतिथि रूप में सत्कार करना एक तरह यज्ञ ही है पर इसमें पवित्रता का विचार भी होना चाहिए। ज्ञानी लोग हर क्रिया को यज्ञ की तरह मानते हैं। जिस तरह यज्ञ पवित्र स्थान पर पवित्र वस्तुओं से किया जाता है उसी तरह अतिथि सत्कार का धर्म भी पवित्र व्यक्ति को प्रदान किया जाना चाहिए।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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ज्ञानेनैवापरे विप्राः यजन्ते तैमंखेःसदा।
ज्ञानमूलां क्रियामेषां पश्चन्तो ज्ञानचक्षुषा।
            ‘‘तत्वाज्ञानी सभी क्रियाओं को अपने ज्ञान नेत्रों से देखते हुए उसके प्रेरक तत्वों को पहचानते हैं। इस तरह वह अपने ज्ञान से ही यज्ञानुष्ठान करना सबसे महत्वपूर्ण मानते है।
पाषण्डिनो विकर्मस्थान्बैडाव्रतिकांछठान्।
हैंतुकान्वकवृत्तश्चि वांड्मात्रेण्णापि नार्चयेत्।।
          ‘‘पांखडी, दृष्ट, ठग, दूसरों को दुःख पहुंचाने वाला तथा धर्म ग्रंथों में अरुचि रखने भले ही सज्जनता का व्यवहार करे पर उसे कभी मेहमान नहीं बनाना चाहिए। इतना ही नहीं उसका वाणी से भी कभी स्वागत नहीं करना चाहिए।’’
         हमारे देश में पहले शिक्षा के अभाव में लोगों को अध्यात्मिक ग्रंथों का ज्ञान नहीं था तो अब आधुनिक शिक्षा ने उनको एक तरह से विरक्त ही कर दिया गया है। इसलिये चालाक लोग दूसरों को अतिथि सत्कार का धर्म निभाने की राय देते हैं और स्वयं मजे करते हैं। इसलिये यह आवश्यक है कि तत्वज्ञान को समझा जाये। अपनी हर क्रिया को अपने ज्ञान चक्षुओं से देखते हुए यज्ञ होने की अनुभूति की जाये। जीवन में आनंद लेने का यह भी एक तरीका है।
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Thursday, October 6, 2011

मनुस्मृति से संदेश-सोने का हार वस्त्रों के बाहर पहनना अनुचित (manusmriti se sandesh-sone ka har vastron ke bahar pahanna nindaniya)

          स्वयं को दूसरों के सामने स्वयं को श्रेष्ठ प्रमाणित करना मनुष्य का स्वभाव होता है। अनेक लोग दूसरे मनुष्यों का ध्यान अपनी तरफ खींचने के लिये उच्छृंखलता का व्यवहार करते हैं। कुछ अपनी उद्दंण्डता से स्वयं को शक्तिशाली साबित करना चाहते है। दरअसल इस प्रयास में अनेक लोग ऐसे निंदनीय कार्य करते हैं जिनका आभास ज्ञान न होने के कारण उनको नहीं होता। आमतौर से सोने का हार पहनना स्त्री जाति के लिये एक धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा रही है। वह भी उसे अपने वस्त्रों के पीछे छिपाये रहती हैं या उसे ऐसे पहनती हैं कि हार का पूरा भाग दूसरे को नहीं दिखाई दे। अब तो पुरुष जाति में भी सोने की चैन पहनने का रिवाज प्रारंभ हो गया है। तय बात है कि यह सब दिखाने के लिये है और इसलिये जो पुरुष सोने की चैन पहनते है उसे वस्त्रों के बाहर प्रदर्शित करते हैं। मनुस्मृति में इसे निंदनीय कार्य बताया गया है।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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न विगृह्य कर्था कुर्याद् बहिर्माल्यं न धारयेत्।
गवां च यानं पृष्ठेन सर्वथैव विगर्हितम्।।
       ‘‘उच्छृ्रंखल पूर्व बातचीत करने, प्रदर्शन के लिये कपड़ो के बाहर सोने की माला पहनना और बैल की पीठ पर सवारी करना निंदनीय कार्य हैं।’’
सर्वे च तिलसम्बद्धं नाद्यादस्तमिते रवी।
न च नग्न शयीतेह च योच्छिष्ट क्वच्तिद्व्रजेत्।
             ‘‘सूर्यास्त होने के बाद तिलयुक्त पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए और न ही नग्न होकर पानी पीना चाहिए। जूठे मुंह यानि बिना कुल्ला किये बाहर भी नहीं जाना चाहिए।’’
          यह तो केवल एक उदाहरण है जबकि हम समाज की दिनचर्या में कई ऐसे तथ्य देख सकते हैं जिसमें लोग आचरणहीनता दर्शाने वाले विषयों को फैशन मानने लगे हैं। बातचीत में अनावश्यक रूप से उग्र भाषा का प्रयोग करना अथवा जोरदार आवाज में बोलकर अपनी बात को सही प्रमाणित करना इसी श्रेणी में आता है। अनेक लोगों की तो यह आदत है वह वार्तालाप के समय हर वाक्य के साथ गाली का प्रयोग करते हैं बिना यह जाने कि इसका उपस्थित श्रोताओं पर विपरीत प्रभाव होता है। मनुस्मृति का अध्ययन करने पर अनेक ऐसे कामों से बचा जा सकता है जिनके दुष्प्रभावों से अवगत न होने पर हम उनको करते हैं।
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Saturday, September 10, 2011

भर्तृहरि नीति शतक-मायावी धन आदमी को घुमाता रहता है (money and man-bhrtrihari neeti shatak)

             मनुष्य का यह स्वभाव है कि वह अगर धनार्जन करता है तो उसे व्यय के लिये भी तत्पर रहता है। जैसे जैसे उसके पास धन संपदा बढ़ती है अपना वैभव दिखाने के लिये वह उतना ही उतावला होता हैै। अगर कोई अल्पधनी अपनी मेहनत से धनवान हो जाता है तो उसे इस बात की प्रसन्नता कम होती है बल्कि वह इस चिंता को अधिक पाल लेता है कि वह अपने वैभव का प्रदर्शन समाज के सामने कर अपनी गरीब की छवि से मुक्ति पाये।
         नवधनाढ्य आदमी समाज के सामने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने कें लिये अनेक पदार्थों का संचय करता है। अपनी चाल ढाल से वह यह सिद्ध करने का प्रयास करता है कि वह अब धनवान हो गया है। यही कारण है कि हमारे देश में धनवानों की बढ़ती संख्या के कारण भौतिक पदार्थों के संचय के साथ ही विलासिता का प्रदर्शन भी तेज हो गया है।
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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परिक्षीणः कश्चित्स्पृहयति यवानां प्रसृतये स पश्चात्सम्पूर्णः कलयति धरित्रीं तृणसमाम्।
अतश्चानैकान्त्याद् गुरु लघुतयाऽर्थेषु धनिनामवस्था वस्तुनि प्रथयति च संकोचयति च।।
         ‘‘जब मनुष्य गरीब होता है तब वह अपने रहने के लिये एक गज जमीन की चाहत करता है पर जब अमीर होने पर वही पूरे भूमंडल की कामना करने लगता है। इस संसार में अनेक पदार्थ हैं और अमीरी गरीबी के अनुसार उनको पाने की कामना बदलती रहती है। वस्तुओं का महत्व भी मनुष्य की आर्थिक स्थिति के अनुसार बदलता रहता है।"
            जहां तक धन कम या ज्यादा होने का सवाल है तो यह त्रिगुणमयी माया अपने रंग रूप इंसान को इस तरह दिखाती है कि वह उसी को ही सत्य मानकर उसके इर्दगिर्द घूमता रहता है। अपनी आत्मा और परमात्मा विषयक अध्यात्म ज्ञान उसके लिये सन्यासियों का विषय होता है। धन न होने पर आदमी अपने सांसरिक संघर्ष में निरंतर व्यस्त रहता है इसलिये सत्संग तथा ज्ञान चर्चा उसके लिये दूर की कौड़ी हो जाती है तो धन आने पर आदमी ऐसे सात्विक स्थानों पर भी अपने राजस भाव का प्रदर्शन बहुत उत्तेजना के साथ करता है जहां अध्यात्मिक विषयक विचार हो रहा है। मजे की बात यह है कि धनवान लोगों को यह भ्रम रहता है कि उनके पास अध्यात्मिक ज्ञान है वह उसका बखान भी करते हैं। यह अलग बात है कि उनकी वाणी के पीछे ज्ञान का नहीं  वरन् धन का ओज होता है। उनके सामने प्रस्तुत लोग ज्ञान बघारते समय भले कुछ न कहें पर पीठ पीछे  उन पर हंसते हैं। वजह साफ है, ज्ञान का प्रमाण भौतिक पदार्थों की उपलिब्ध नहीं वरन! उनका त्याग है।
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Tuesday, August 9, 2011

वेद शास्त्रों से-विषयों से रसरहित होना ही मोक्ष है (ved shastron se-vishayon se ras rahit hona moksh)

        हमारे देश के अनेक कथित ज्ञानी अपने अल्पज्ञान से लोगों को मोक्ष का गलत पाठ पढ़ाते हैं। इसका आशय यह है कि मनुष्य मरने के बाद पुनः इस संसार में न लौटे। इससे अनेक लोग घबड़ा जाते हैं। हर मनुष्य यह चाहता है कि वह इस संसार में पुनः मनुष्य यौनि में ही आये। उसकी इस भावना का धर्म के ठेकेदार बहुत लाभ उठाते हैं और उसे दान पुण्य कर सकाम भक्ति के लिये प्रेरित करते हैं। इतना ही नहीं मनुष्य यौनि से पहले स्वर्ग का सुख भोगने की भी यह लोग गांरटी देते हैं। इस तरह धर्म एक सीमित अर्थ वाला विषय रह गया है। दरअसल मोक्ष का मतलब यह कतई नहीं है कि मरने के बाद आदमी फिर इस संसार में नहीं लौटेगा। अभी तक यह तय नहीं है कि मनुष्य या अन्य जीवों का इस संसार में लौटना होता है कि नहीं। आत्मा अमर है यह निश्चित है पर परमात्मा अनंत है और उसकी लीला को वही जानता है।
        दरअसल हमारा अध्यात्म मनुष्य को मन पर इस तरह नियंत्रण करना सिखाता है कि वह कम से कम इस अलौकिक मनुष्य यौनि में अपना जीवन व्यर्थ के विषयों के बर्बाद न करे। आनंद का अर्थ समझे। वरना तो स्थिति यह होती है कि आदमी अपने मन को प्रसन्न करते हुए अनेक साधन जुटा लेता है पर सुख ले नहीं पाता। सुख कोई दिखने या हाथ आने वाली चीज नहीं है बल्कि अनुभूति का विषय है और यही समझने वाले ज्ञानी कहलाते हैं जिनकी संख्या उंगलियों पर गिनने लायक हैं।
वेदशास्त्रों में कहा गया है कि
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मोक्षो विषयवैरस्यं बन्धो वैषयिको रसः।
सतावदेव विज्ञानं यथेच्छसि तथा कुरु।।
           ‘‘विषयों में से रस का चला जाना ही मोक्ष है और विषयों में रस का होना ही बंधन है। विज्ञान इतना ही। वैसे जिसकी इच्छा है वही काम करे।’’
इन्द्रियाण विचरतां विषयेष्वपहारिषु।
संयम यत्नमातिष्ठेद् विद्वान् यन्तेव वाजिनाम्।।
             ‘इंद्रियों का स्वभाव है कि वह विषयों में ही विचरती हैं। मनुष्य को कुशल सारथि की भांति उन पर नियंत्रण करना चाहिए।’’
        किसी वस्तु की प्राप्ति से पहले आदमी संघर्ष करता है पर बाद में वह कितना सुख अनुभव कराती है यह कौन विचार करता है। आसक्ति वस्तु प्राप्त करने तक ही सीमित है पर उसके उपयोग से सुविधा मिलती है न कि सुख का अनुभव होता है। सुख या आनंद त्याग में है। किसी वस्तु के मिलने पर हर्ष या न मिलने पर जब निराशा न हो तब यह समझना चाहिए कि हमने मोक्ष पा लिया। आसक्ति तनाव का कारण बनती है और विरक्ति सहजता का भाव पैदा करती है। इसी विरक्ति को मोक्ष कहा जाता है। मोक्ष का मतलब है आसक्ति का मर जाना। आसक्ति मरने का मतलब है तनावरहित जीवन गुजारना। यही ज्ञान और विज्ञान है।
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Wednesday, August 3, 2011

चाणक्य नीति-अभ्यास न होने से अर्जित ज्ञान भी विष हो जाता है (chankya neeti-abhyas n ho to gyan vish saman)

                भारतीय शिक्षा पद्धति का यह सबसे बड़ा दोष यह है कि वह व्यवहार में कहीं काम नहीं आती। हमारे यहां बच्चों को इतिहास, भूगोल, सामान्य विज्ञान, गणित, अर्थशास्त्र, राजनीतिक शास्त्र तथा साहित्य पढ़ाया जाता है। पढ़ने वालों का एकमात्र उद्देश्य शिक्षा प्रमाणपत्र प्राप्त करना होता है ताकि कहीं उनको नौकरी आदि मिल सके। जिनको मिल गयी उनके लिये काम के दौरान उस ज्ञान का अभ्यास नहीं होता जिससे उन्होंने शिक्षा प्राप्त की है। इससे उनके मन में हमेशा यह कुंठा रहती है कि जो उन्होंने पढ़ा है उसका उपयोग नहीं हो रहा। धीरे धीरे यह कुंठा तनाव का कारण बन जाती है। जिनको नौकरी नहीं मिली वह अन्य कोई श्रमप्रधान काम नहीं कर सकते क्योंकि बचपन से ही उसकी आदत नहीं रही। ऐसे शिक्षित बेरोजगार बनकर समाज ही नहीं परिवार की नज़रों में भी वह लोग खटकते हैं। समय के अनुसार हम देख रहे हैं कि देश में श्रमप्रधान काम करने वालों की संख्या कम होने के साथ ही शैक्षणिक प्रमाणपत्र लेकर नौकरी मांगने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है।
आचार्य चाणक्य कहते हैं कि
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अनभ्यासं विषं शास्वमजीर्णे भोजनं विषम्।
दरिद्रस्य विषं गोष्ठी वृद्धस्वय तरुणी विषम्।।
          ‘‘जिस तरह अपच रोग होने से स्वादिष्ट से स्वादिष्ट भोजन भी विष हो जाता है उसी तरह अभ्यास के अभाव में अर्जित ज्ञान भी विष हो जाता है। दरिद्र आदमी के लिये गोष्ठियां और वृद्ध के लिये तरुणी भी विष समान हो जाती है’’
आलस्योपगता विद्या परहस्तगतं धनम्।
अल्पबीजं इसं क्षेत्रं हतं सैन्यमनायकम्।।
             ‘‘आलस्य मनुष्य का स्वभाव है। इसी दोष के कारण उसके प्रयासों से अर्जित विद्या भी अभ्यास न होने से नष्ट हो जाती है। दूसरे के हाथ में गया धन कभी वापस नहीं आता। बीज अच्छा न होने पर फसल भी वैसे ही होती है।’’
        कहने का अभिप्राय यह है कि आज की शिक्षा पद्धति एकदम बेकार है। देखा जाये तो यह शिक्षा प्रमाण पत्र प्राप्त कर गुलामी करने के लिये ही चलायी गयी है। भारतीय अध्यात्म ज्ञान का इसमें कोई स्थान नहीं है। जिससे मनुष्य में व्यक्तित्व, चरित्र, विचार और आचरण का निर्माण होता है उस ज्ञान का वर्तमान शिक्षा पद्धति में कोई स्थान नहीं है। यही कारण है कि देश में भ्रष्टाचार, अपराध तथा हिंसा की घटनायें आम हो गयी हैं। देखा जाये तो हमारे मनीषियों ने हमारे लिये महान ज्ञान का सृजन किया और उसे हम जानते भी है पर न स्वयं अभ्यास करते हैं न दूसरों को करने देते हैं। कई बार तो कहीं ज्ञान की बातें सुनते हैं तो वह विष की तरह लगती हैं क्योंकि कहीं न कहीं हमारे अंदर कुंठा होती है कि हम उस मार्ग पर नहीं चल रहे जहां सत्य स्थित है। अभ्यास नहीं है तो अध्यात्मिक ज्ञान पर चलते नहीं और इस वजह से जो कुंठा है वह हमारे अंदर मानसिक द्वंद्व को जन्म देती है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
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Wednesday, July 27, 2011

भर्तृहरि शतक-अल्पधनी और नवधनाढ्य इतराते हैं (bhartri shatak-alpadhani aur navdhanadhya)

         हमारे देश में विकास बढ़ रहा है तो साथ में एक ऐसा वर्ग भी पैदा हो रहा है जिसके लिये अधिक धन मानसिक रूप से विकृत होने का कारण बन रहा है। अनेक लोगों के पास इतना धन आ रहा है कि वह समझते ही नहीं कि उसको खर्च कहां करें? उनमें स्वयं और उनके परिवार के लोगों में धन का अभिमान इस कदर घर कर जाता है कि वह समझते हैं कि उनके आगे निर्धन या अल्पधनी तो पशुओं जैसा जीव है। वैसे भी हमारे अनेक सामाजिक विशेषज्ञ नवधनाढ्यों में बढ़ती अपसंस्कृति को लेकर चिंतित है। समाज में अनेक प्रकार के वर्ण, वर्ग तथा भाषा समूंहों में वैमनस्य बढ़ रहा है। इसका मुख्य कारण यही है कि एक तरफ ऐसे लोग हैं जिनके पास धन की बहुतायत है दूसरी तरफ ऐसे भी है जिनके पास खाने के लिये भी पर्याप्त नहीं है। पाश्चात्य सभ्यता के चलते जहां दान, दया और परोपकार की प्रवृति का हृास हुआ है वहीं नवधनाढ्यों के अहंकार ने समाज में संवदेनहीनता का ऐसा वातावरण बना दिया है जो अंततः वैमनस्य का कारण बनता है।
       नीति विशारद भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि
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            विपुलहृदयैरीशैरेतज्जगज्जनितं पुरा विधृतमपरैर्दत्तं चान्यैर्विजित्य तृणं यथा।
           इह हि भुवनान्यन्यै धीराश्चयतुर्दशभुञ्जते कतिपयपुरस्वाम्ये पुंसां क एष मदज्वर।।
           ‘‘बहुत समय पहले उदारचित्त महापुरुषों ने इस धरती को अपनाया। कुछ ने इसका जमकर उपभोग किया। कुछ ने इसे प्राप्त कर दूसरों को दान दिया। आज भी कई महान बलशाली राजा धरती के विशाल भूभाग के स्वामी हैं पर उनको अभिमान तनिक भी नहीं है। मगर जो कुछ ही गांवों में स्वामी है वह अपनी संपत्ति पर इतराते हैं।
        अब यह स्थिति है कि जिनके पास धन है वह दान, या परोपकार कर समाज में प्रभुत्व स्थापित करने की बजाय उसका अनाप शनाप खर्च कर अपने वैभव दिखाना चाहते हैं। यही कारण है कि समाज के असंतोष तत्व अपराध की तरफ भी आकृष्ट हो रहे हैं। कभी कभी तो लगता है कि ऐसे अनेक लोगों के पास धन आ गया है जो उसे पाने योग्य ही नहीं है या फिर उनको धन पचाने का मंत्र नहीं मालुम। हम देख रहे हैं कि देश में उपभोग संस्कृति का प्रचार हो रहा है जिससे अध्यात्मिक ज्ञान के प्रति लोगों का रुझान न के बराबर रह गया है। जबकि अध्यात्मिक ज्ञान के बिना मनुष्य दंभी, लालची और कामुक हो जाता है और उसमें पशुवत व्यवहार करने की इच्छा बवलती हो उठती है।
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Saturday, July 23, 2011

मनुस्मृति से संदेश-कन्या से जबरदस्ती करने वाले को मृत्युदंड मिले (manusmriti se sandesh-crime and punishment against girls)

         हमारे देश के स्त्रियों के प्रति क्रूरतम अपराध की घटनायें तेजी से बढ़ रही हैं। इसका कारण यह है कि अपराधियों के मन में कठोर दंड का भय नहीं है। हमने पश्चिम के आधार पर अपनी दंड व्यवस्था को कथित रूप से मानवीय बना दिया है जिसमें प्राणदंड देना अपराध पर नियंत्रण करने का मार्ग नहीं माना जाता। यह मूर्खतापूर्ण राय है कि फांसी की सजा से अपराध नियंत्रित नहीं होता। देने वाले तो यह तर्क देते हैं कि हत्या की सजा फांसी है पर उससे क्या वह रुक रही हैं? इसका उत्तर यह है कि हमारे यहां कानूनी प्रक्रिया में लंबा समय लगता है। शनैः शनै अपराधी के अपराध की के प्रति लोगों का नजरिया ठंडा हो जाता है। फिर देखा यह भी जा रहा है कि अपराधियों को सजा दिलाना व्यवस्था से जुड़ी संस्थाओं के लिये कठिन होता जा रहा है इसी कारण अपराधियों के हौंसले बढ़ रहे हैं। इसके जवाब में यह सवाल भी है कि कितनी हत्याओं के लिये कितनों को प्राणदंड मिला। उससे भी ज्यादा यह बुरी बात है कि पद, प्रतिष्ठा और पैसे के दम पर अनेक लोग अपराध कर भी बच जाते हैं। वह समाज के अन्य तबकों के लिये अपराध कर सजा से बचने के मामले में प्रेरक बन जाते हैं। इसी कारण अपराध बढ़ रहे हैं।
मनुस्मृति में कन्याओं के प्रति अपराध के दंड पर कहा गया है कि
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योऽकामां दूषयेत्कन्यां स सद्यो वधमर्हति।
सकामा दूषयंस्तुल्यो न वधं प्राप्नुयान्नरः।।
        ‘‘जो कन्या संभोग की इच्छुक नहीं है उसे बलात संभोग करने वाले पुरुष को तुरंत मृत्युदंड देना चाहिए। स्वयं संभोग की इच्छुक कन्या से सहवास करने वाले व्यक्ति को मृत्युदंड के बजाय उसे कोई दूसरा दंड देना चाहिए।
अभिमह्य तु यः कन्या कुर्याद्दर्पेण मानवः।
तस्याशुकर्त्ये अंगल्यौ दण्डं चार्हतिष्ट्म्।।
         ‘‘जो पुरुष अपनी पौरुष के मन में आकर कन्या से बलात्कार कर उसे अपवित्र करता है उसकी तत्काल दो उंगलियां काट डालनी चाहिए तथा उस पर आर्थिक दंड लगाना चाहिए।
            अक्सर लोग सवाल यह करते हैं कि किसी भी कन्या से बलात संभोग करने वालों को ही क्या जिम्मेदार माना जा सकता है? इसके लिये कन्या को किसी पुरुष को उकसाने के लिये जिम्मेदार क्यों नहीं माना जाता। मनुस्मृति की दृष्टि से हर हालत में पुरुष ही जिम्मेदार है। अगर वह कन्या की इच्छा के खिलाफ जबरदस्ती करता है तो मृत्युदंड का अधिकारी है और अगर इच्छा के विरुद्ध वह नहीं करता तो भी उसे सजा मिलना चाहिए। कुछ घटनाओं में देखा गया है कि लड़कियों को शादी का झांसा देकर कुछ लोग उनके साथ शारीरिक संबंध कायम कर लेते हैं। मामला चलने पर वह दावा करते हैं कि यह सब लड़की की इच्छा से हुआ। वह प्रमाण भी पेश करते हैं तब लोगों की सहानुभूति पीड़ित कन्या की बजाय उसके साथ हो जाती है पर सच बात तो यह है कि वह फिर भी दंड का अधिकारी है।
           ऐसा लगता है कि कड़े दंडों की वजह से ही मनुस्मुति को जाति पाति समर्थक तथा स्त्री विरोधी कहकर प्रचलन से बाहर किया गया है जबकि उसमें वर्णित अनेक संदेश आज भी प्रासांगिक हैं। देश के सामाजिक विशेषज्ञ हमारे प्राचीन ग्रंथों से इसलिये मुंह चुराते हैं क्योंकि वह अंग्र्रेजी शिक्षा के कारण डरपोक हो गये हैं जिसमें अपराधों के लिये कड़े दंड की बजाय मानवीय प्रकार के दंड देने क बात कही गयी है।
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Monday, July 18, 2011

पतंजलि योग साधना-अविद्या नाश के लिये क्रिया योग आवश्यक (kriya yoga for knowledge or gyan)

                 भारतीय पतंजलि योग विज्ञान अत्यंत व्यापक है और इसे पूरी तरह बिना समझे कोई गुरु जैसी पदवी की योग्यता धारण नहीं कर सकता। योगसाधना की चरमस्थिति समाधि है। संसार, देह और अन्य सभी प्रकार के भौतिक पदार्थों के अस्तित्व के आभास से रहित होना ही समाधि है। इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि देह के क्लेशों से रहित होकर आत्मा में ही अपना ध्यान स्थापित करना भी योग का सर्वश्रेष्ठ रूप है।
योग साधना का यह आशय कतई नहीं है कि आसन या प्राणायाम कर ही इतिश्री समझ लें। यह दोनों तो आष्टांग योग के दो भाग मात्र हैं। इसका अंतिम भाग समाधि है जहां तक पहुंचने के लिये प्राणायाम तथा आसन तो मार्ग मात्र हैं। शून्य में स्थापित होने पर ही समाधि की अवस्था समझना चाहिए।
        पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
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               तपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः।।
        ‘तप, स्वाध्याय और ईश्वर में ध्यान लगाना क्रिया योग है।’
               समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च।
          ‘यह समाधि की सिद्धि करने वाला और अविद्या जैसे क्लेशों का नाश करने वाला है।’
                अविद्यास्मितारागद्वेषभिनिवेशाः क्लेशः।
           ‘अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश यह सभी क्लेश हैं।
           तत्वज्ञान होने पर ही मनुष्य को इस संसार का पूर्ण आंनद मिल सकता है। इसलिये क्रिया योग करना आवश्यक है। क्रिया योग का आशय तप, स्वाध्याय और परमात्मा के नाम का स्मरण करना है। प्राणयाम तथा योगासन से शरीर और मन में स्फूर्ति आती है तब किसी रचनात्मक कर्म की प्रेरणा स्वतः प्राप्त होती है। देह में विचर रही ऊर्जा किसी सकारात्मक कर्म के लिये प्रेरित करती है। ऐसे में तप और स्वाध्याय के माध्यम से क्रिया योग कर संसार को समझा जा सकता है। नये विषयों की खोज, अनुसंधान और शोध के लिये प्रयत्नशील होना चाहिए भले ही इससे शरीर को थोड़ा कष्ट पहुंचे। यह प्रयास तप करने जैसा ही होता है। संबंधित ग्रंथों का अध्ययन कर अपनी स्वाध्याय की भूख को जिज्ञासा से उपजी भूख को भी शांत करना चाहिए। इसी क्रिया योग से ही योग साधना के अभी तक उद्घाटित न किये गये रहस्यों को भी समझा जा सकता है।
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Saturday, July 9, 2011

वेद शास्त्रों से-कर्म और फल का कोई नियम नहीं है (ved shastron se-karma aur fal ka niyam nahin)

        किसी भी कर्म का फल मिलता है उसमें देर सबेर हो सकती है। हालांकि यह कोई नियम नहीं है कि सभी कर्मों का फल कर्ता की इच्छानुसार प्राप्त हो। शायद यही कारण है कि हमारे यहां अध्यात्मिक दर्शन में सांसरिक कर्म में निष्काम कर्म की बात कही गयी है।
वेदांत दर्शन में कहा गया है कि
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उपलब्धिवदनियमः।
‘‘भोगों की प्रप्तियों की भांति कर्म करने में भी कोई नियम नहीं है।
यथा तक्षाभयथा।
इसके सिवाय जैसे कारीगर कभी काम करता है कभी नहीं करता है।
          वैसे फल की इच्छा करते हुए जब कर्म किया जाता है तो हमारा मन विचलित होने के साथ मस्तिष्क की एकाग्रता भंग होने की आशंका रहती है और कर्म उचित प्रकार से संपन्न नहीं हो पाता। दूसरी बात यह भी है कि जब कर्म के बाद फल प्राप्त नहीं होता या उसमें विलंब होता है तो व्यर्थ का तनाव पैदा होता है। हमें यह समझना चाहिए कि प्रकृति भी एक कारीगर की तरह है जो कभी कर्म करती है कभी नहीं करती है। मनुष्य का यह धर्म है कि वह अपना नियमित कर्म करे पर फल देने या न देने की का निर्णय प्रकृति पर छोड़ देना चाहिए।
मूल बात यह है कि हमें अधिक अपेक्षायें, इच्छायें और कामनायें मन में नहीं रखना चाहिए। कालांतर में उनके पूर्ण होने पर सुख मिलता है और न मिलने पर दुःख होने लगता है। तत्वज्ञानी इसलिये ही सुख, दुख, प्रसन्नता, शोक तथा मान सम्मान से परे हो जाते हैं क्योंकि वह जानते है इस संसार में सभी चीजें नश्वर हैं। सत्य जहां सूक्ष्म और स्थिर है वहीं माया विस्तार पाने के साथ ही रूप बदलती है। उत्पन्न होकर नष्ट होना फिर प्रकट होना माया की सामान्य प्रकृति है। जिस तरह सत्य या परमात्मा अनंत है वैसे ही माया भी अनंत है। उसके नियम समझना भी कठिन है।
इसके विपरीत सामान्य मनुष्य माया को अपने वश करने कें लिये पूरी जिंदगी दाव पर लगा देता है पर हाथ उसके कुछ नहीं आता। खेलती माया है उसके नियम अज्ञात हैं फिर भी आदमी यही सोचता है कि वह अपने नियमों के अनुसार खेल रहा है।
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Wednesday, July 6, 2011

संत कबीर वाणी-पैसा हो तो पचास गुरु मिल जाते हैं(sant kabir wani-paisa aur guru)

                लोग एकदूसरे से पूछते हैं कि आज के गुरु भी भ्रष्ट और अज्ञानी हैं ऐसे में किससे ज्ञान प्राप्त किया जाये? देखा जाये तो ऐसे गुरुओं की उपस्थिति हर काल में रही है जो अध्यात्मिक दर्शन का व्यापार करते हैं। उनका लक्ष्य कोई धर्म का प्रचार करना नहीं होता बल्कि वह शिष्यों को ग्राहक बनाकर अपना रटा हुआ ज्ञान बेचते है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि हमारे देश में गुरु शिष्य की उच्च परंपरा रही है पर उसकी आड़ में ऐसे गुरुओं और शिष्यों की भरमार भी रही है जो पाखंड तथा ढोंग कर धर्म का दिखावा करते हैं। शिष्य जहां धर्म और अध्यात्म से इतर अपने अन्य लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये गुरु बनाते हैं तो गुरु भी अपने निकट ऐसे ही शिष्यों को आने देते हैं जो उनके धर्म के व्यापार में दलाल की भूमिका निभा सके हैं।
         संत कबीर कहते हैं कि
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        गुरवा तो सस्ता भया, पैसा केर पचास।
       राम नाम धन बेचि के, शिष्य करन की आस।।
        ‘‘गुरु का पद तो सस्ता हो गया है। पैसा हो तो पचास गुरु बन जाते हैं। यह गुरु स्वयं राम नाम का धन बेचते हैं और शिष्य से अपनी उदरपूर्ति की आशा करते हैं।
       गुरु बिचारा क्या करे, शब्द न लागा अंग।
        कहें कबीर मैली गजी, केसे लागे रंग।।
      ‘‘कोई गुरु भी क्या करे कि उसके शब्दों का प्रभाव शिष्यों पर नहीं होता। उनके मन उसी तरह मैले हैं जिस तरह गंदा कपड़ा होता है जिस पर रंग चढ़ाना व्यर्थ हो जाता है।’’
              योग्य गुरु तथा शिष्य का संयोग बड़े भाग्य से बनता है। अगर कोई गुरु योग्य है तो उसके शिष्यों में मन में ज्ञान प्राप्त करने की बजाय दिखावे की प्रवृत्ति अधिक है। वह उसके ज्ञान को केवल मनोरंजन का विषय मानकर सुनते है। प्रवचन और सत्संग के बाद उनका घर जाकर जस की तरह आचरण हो जाता है। उसी तरह अगर कोई गुरु ज्ञानी है पर उसके पास अच्छे प्रबंधक और प्रचारक शिष्य नहीं है तो उसे कोई नहीं पूछता। यही स्थिति उन जिज्ञासु लोगों की भी है जो अपने लिये आध्यात्मिक गुरु ढूंढते हैं पर व्यवसायिक गुरुओं की बहुतायत होने के कारण वह निराश हो जाते हैं। हालांकि ऐसे में श्रीमद्भागवत गीता तथा अन्य धर्मग्रंथों का नियमित अध्ययन किया जाये तो ऐसे पावन ग्रंथ स्वतः गुरु बन जाते हैं। महर्षि चाणक्य कहते हैं कि प्रतिदिन एक पाठ और वह भी नहीं तो एक दोहे या श्लोक का अध्ययन कर भी ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। वह भी नहीं तो आधे श्लोक या दोहे का अध्ययन करें। गुरु का अर्थ यह कदापि नहीं है कि वह सदेह हा सामने हो एकलव्य का अभ्यास इस बात की पुष्टि भी करता है। मूल बात संकल्प की है और वह धारण कर लिया तो फिर ज्ञानमार्ग का द्वार स्वतः खुल जाता है।
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',ग्वालियर
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Friday, July 1, 2011

अध्ययन करने से पहले और बाद में आंखों से पानी को स्पर्श करना उपयोगी-हिन्दी चिंत्तन लेख (study, word and water-hindi chinttan lekh)

          वायु तथा जल को न केवल जीवन का आधार माना गया है कि बल्कि उनको ओषधि भी कहा जाता है। जिस तरह प्रातः प्राणायाम से शुद्ध वायु के प्रवेश से शरीर और मन के आंतरिक विकार बाहर निकलते हैं उसी तरह नहाने के दौरान जल के उपयोग से बाहरी अंगों पर शुद्धता आती है। आधुनिक विज्ञान जल की उपयोगिता को लेकर अनेक अनुंसधान कर चुका है। हालांकि हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों में भी इस विषय पर अनेक बातें कही गयी है।
          मनु स्मृति में कहा गया है कि
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            कृत्वा मूत्रं पूरीपं वा खान्याचान्त उपस्पृशेत्।
            वेदमध्येध्माणश्च अन्नमश्नंश्च सर्वदा
       "मल मूत्र करने के बाद व्यक्ति को सदैव हाथ धोकर आचमन करने के साथ ही पानी का स्पर्श आंखों पर करना चाहिए। सदैव वेद पढ़ने तथा भोजन करने से पहले भी हाथ धोकर आचमन करना चाहिए।"
                आजकल कंप्यूटर का उपयोग बढ़ता जा रहा है पर उससे होने वाली हानियों से रोकने और बचने के उपाय बहुत कम  लोग जानते हैं। कुछ स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि कंप्यूटर का उपयोग करने वालों को बीस मिनट से अधिक उस पर काम करने के बाद दो मिनट आंखें बंद रखना चाहिए। इसके अलावा कंप्यूटर से उठकर बाहर आसमान में ताकना चाहिए ताकि आंखों के उन सूक्ष्म तंतुओं का विस्तार होता है जो काम के दौरान सिकुड़ जाते है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कही गयी है कि कंप्यूटर पर काम करने वालों को अपनी आंखों में पानी की छींटें मारते रहना चाहिए। कंप्यूटर पर काम करते हुए आंखों में जल सूखने लगता है और आंखों में छींटे मारने से वहां ताजगी आती है। मनृस्मृति में भी कहा गया है कि वेद आदि का अध्ययन करने से पहले और बाद दोनों ही समय आंखों में जल का प्रवेश कराना चाहिए। यही बात हम कंप्यूटर पर काम करते समय भी लागू कर सकते हैं। ऐसे प्रयासों से बहुत सीमा तक कंप्यूटर से होने वाली हानियों से बचा जा सकता है।
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Wednesday, June 29, 2011

कबीर संदेश-लोग कर्मकांडों को धर्म के भ्रम मे पालते हैं (kabir sandesh-karmkand aur dharma)

          मूलतः भारतीय समाज प्रगतिवादी माना जाता है। हालांकि कुछ विदेशी भारतवासियों की धर्मभीरुता का मजाक उड़ाते हैं पर जिस तरह हमारा समाज समय के अनुसार नई शिक्षा, विज्ञान तथा साधनों के उपयोग की तरफ प्रवृत्त होता है उससे यह प्रमाणित होता है कि रूढ़ता का भाव उसमें नहीं है पर इसके बावजूद फिर भी धर्म के नाम पर अनेक कर्मकांड हैं जिसे लोग केवल सामाजिक दबाव में इसलिये अपनाते हैं कि लोग क्या कहेंगे। आधुनिक शिक्षा से जीवन में आगे बढ़े लोग भी अंधविश्वास और कर्मकांडों पर इसलिये विश्वास करते दिखते हैं क्योंकि उन पर कहीं न कहीं से दूसरे लोगो का दबाव होता है। स्थिति यह है कि अनेक धार्मिक ठेकेदार तो इन्हीं कर्मकांडों को ही धर्म का आधार कहकर प्रचारित करते हैं।
            इस विषय पर संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि
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            ‘कबीर’ मन फूल्या फिरै, करता हूं मैं ध्रंम।
                कोटि क्रम सिरि ले चल्या, चेत न देखै भ्रम।।
          "आदमी अपने सिर पर कर्मकांडों का बोझ ढोते हुए फूलता है कि वह धर्म का निर्वाह कर रहा है। वह कभी अपने विवेक का उपयोग करते हुए इस बात का विचार नहीं करता कि यह उसका एक भ्रम है।"
              संत कबीरदास जी ने अपने समाज के अंधविश्वासों और कुरीतियों पर जमकर प्रहार किये हैं। कितने आश्चर्य की बात है कि अनेक संत और साधु उनके संदेशों को ग्रहण करने का उपदेश तो देते हैं पर समाज में फैले अंधविश्वास और कर्मकांडों पर खामोश रहते हैं। आदमी के जन्म से लेकर मृत्यु तक ढेर सारे ऐसे कर्मकांडों का प्रतिपादन किया गया है जिनका कोई वैज्ञानिक तथा तार्किक आधार नहीं है। इसके बावजूद बिना किसी तर्क के लोग उनका निर्वहन कर यह भ्रम पालते हैं कि वह धर्म का निर्वाह कर रहे हैं। किसी कर्मकांड को न करने पर अन्य लोग नरक का भय दिखाते हैं यह फिर धर्म भ्रष्ट घोषित कर देते हैं। इसीलिये कुछ आदमी अनचाहे तो कुछ लोग भ्रम में पड़कर ऐसा बोझा ढो रहे हैं जो उनके दैहिक जीवन को नरक बनाकर रख देता है। कोई भी स्वयं ज्ञान धारण नहीं करता बल्कि दूसरे की बात सुनकर अंधविश्वासों और रूढ़ियों का भार अपने सिर पर सभी उसे ढोते जा रहे हैं। इस आर्थिक युग में कई लोग तो ऋण लेकर ऐसी परंपराओं को निभाते हैं और फिर उसके बोझ तले आजीवन परेशान रहते हैं। इससे तो अच्छा है कि हम अपने अंदर भगवान के प्रति भक्ति का भाव रखते हुए केवल उसी कार्य को करें जो आवश्यक हो। अपना जीवन अपने विवेक से ही जीना चाहिए।
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Tuesday, June 28, 2011

संत कबीर वाणी-मनुष्य को अपनी देह का ज्ञान नहीं होता (sant kabir wani-manshya deh ka gyan)

           भारतीय योग विधा के बारे में अनेक लोग अनेक तरह के प्रचार करते हैं पर यह बात कम ही लोग बताते हैं कि योग साधना के अभ्यास से मनुष्य को अपनी देह और आत्मा के बीच के अंतर का आभास स्वतः होने लगता है। अज्ञानी मनुष्य देह को सर्वस्व मानकर पूरा जीवन नष्ट कर देता है जबकि ज्ञानी योग साधक अपने अभ्यास से देह और आत्मा के साथ ही परमात्मा के तत्व का भी आभास कर जीवन मजे से गुजारते हैं
सामान्य मनुष्य आंखों से देखते हैं पर दृश्य के संपूर्ण तत्व उनमें प्रविष्ट नहीं होते। अच्छे दृश्य का जहां वह पूरा आनंद नहीं उठा पाते वही बुरे दृश्य उनको अंदर तक हिला देते हैं। उसी तरह हर आदमी कान से अपनी प्रशंसा के साथ ही अपने को अच्छी बातें सुनना चाहता है। तत्व ज्ञान की बात सुनने की बजाय वह अपनी वाणी से सांसरिक बातों की बखान करता है।
             इस विषय पर संत कबीर कहते हैं कि
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            आंखि न देखि बावरा, शब्द सुनै नहिं कान।
           सिर के केस उज्वल भये, अबहुं निपट अज्ञान।।
          ‘‘संसार के लोगों को अपनी देह के संचालन का ही ज्ञान नहीं है। इन पगली आंखों से बावला नहीं देखता और न ही कानों से अच्छी बात सुनता है। सिर के बाल भी सफेद हो जाने पर भी लोग अज्ञानी बने रहते हैं।’’
             नर नारायन रूप हैं तू मति जानै देह।
            जो समझे तो समझ ले, खलक पलक में खेह।।
       ‘हे मनुष्य! तुम साक्षात नारायण हो इसलिये अपने को केवल देह मत जान। समझना है अपनी देह से प्रथक उस परमात्मा को समझ जो तेरी आत्मा का आधार है।’’
         कहने का अभिप्राय है कि देह से अलग आत्मा और आत्मा के अस्तित्व का ज्ञान होने पर जीवन का आनंद कम होने की बजाय बढ़ जाता है। जिन लोगों के पास अध्यात्मिक ज्ञान नहीं है वह अपने बाल सफेद हो जाने पर भी अज्ञानी बने रहते हैं। कुछ लोगो को लगता है कि तत्वज्ञान से आदमी जीवन से विरक्त हो जाता है यह बात गलत है। दरअसल तत्वज्ञानी जीवन में व्यर्थ चेष्टा, प्रमाद और निंदा से परे रहते हैं तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि वह असांसरिक लोग हैं।

लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',ग्वालियर
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com
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Friday, June 17, 2011

बंदर की तरह उछलकूद कर समाजसेवा नहीं होती-रहीम के दोहे (bandar ki tarah samaj seva-rahim ke dohe)

कविवर रहीम कहते है 
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बड़े दीन को दुख, सुनो, लेत दया उर आनि
हरि हाथीं सौं कब हुतो, कहूं रहीम पहिचानि

         "इस संसार में बड़े लोग तो वह जो छोट आदमी की पीड़ा सुनकर उस पर दया करते हैं, परंतु बंदर कभी हाथी नहीं हो सकता-कुछ लोग बंदर की तरह उछलकूद कर दया दिखाते हैं पर करते कुछ नहीं। वह कभी हाथी नहीं हो सकते।"
            हमारे देश में हमेशा  ही दान तथा परोपकार के जरिये समाज सेवा करने की परंपरा रही है।  यही कारण है की हमारे अधिकतर धार्मिक स्थानों पर तीर्थयात्रियों के धर्मशालाएँ बनवाईं गईं।  वहाँ लंगरखाने बनवाए गए। अब पाश्चत्य संस्कृति के प्रभाव ने समाज सेवा को न केवल व्यापार बना  दिया है बल्कि उसके लिए पैसा दूसरों से लेकर लोगों के कल्याण करने की परंपरा विकसित  की गई है। जिसे हम समाज सेवा की दलाली भी कह सकते हैं। यही कारण है कि आजकल बच्चों, विकलांगों, महिलाओं और तमाम के तरह की बीमारियों के मरीजों की सहायतार्थ संगीत कार्यक्रम, क्रिकेट मैच तथा अन्य मनोरंजक कार्यक्रम होते हैं-जो कि मदद के नाम पर दिखावे से अधिक कुछ नहीं है।  ऐसे कार्यक्रमों में  केवल बंदर की तरह उछलकूद होती है। ऐसे व्यवसायिक कार्यक्रम तो तमाम तरह के आर्थिक लाभ के लिये किये जाते हैं। जो सच्चे समाज सेवी हैं वह बिना किसी उद्देश्य के लोगों की मदद करते है, और वह प्रचार से परे अपना काम वैसे ही किये जाते हैं जैसे हाथी अपनी राह पर बिना किसी की परवाह किये चलता जाता है।
            समझदार लोग तो सब जानते हैं पर कुछ बंदर की तरह उछलकूद कर समाजसेवा का नाटक करने वालों को देखकर इस कटु सत्य को भूल जाते है। कई लोग ऐसे कार्यक्रमों की टिकिट यह सोचकर खरीद लेते हैं कि वह इस तरह दान भी करेंगे और मनोरंजन भी कर लेंगे। उन्हें यह भ्रम तोड़ लेना चाहिये कि वह दान कर रहे हैं क्योंकि सुपात्र को ही दिया दान फलीभूत होता है। अतः हमें अपने बीच एसे लोग की पहचान कर लेना चाहिए जो इस तरह समाज सेवा का नाटक करते है। इनसे तो दूर रहना ही बेहतर है।
       
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',ग्वालियर
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Saturday, June 11, 2011

संत कबीर के दोहे-आदमी कभी धन पाने के प्रयास से थकता नहीं

           प्रकृति में उत्पन्न समस्त जीवों में मनुष्य सबसे अधिक बुद्धिमान माना गया है और विचित्र बात यह है कि जहां अन्य जीव सीमित आवश्यकताओं के कारण अपना जीवन सामान्य रूप से गुजार लेते हैं जबकि मनुष्य असीम लालच और लोभ को अपने मन में स्थान देता है और सदैव संकट बुलाता है। संत कबीर दास जी ने अपने संदेशों में इसी तरफ इंगित किया है।
       कबीरा औंधी खोपड़ी, कबहूं धापै नाहिं
       तीन लोक की सम्पदा, कब आवै घर माहिं
          संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य की खोपड़ी उल्टी होती है क्योंकि वह कभी भी धन प्राप्ति से थकता नहीं है। वह अपना पूरा जीवन इस आशा में नष्ट कर देता है कि तीनों लोकों की संपदा उसके घर कब आयेगी।
            इस दुनिया में मनुष्य ही एक ऐसा जीवन जिसके पास बुद्धि में विवेक है इसलिये वह कुछ नया निर्माण कर सकता है। अपनी बुद्धि की वह से ही वह अच्छे और बुरे का निर्णय कर सकता है। सच तो यह कि परमात्मा ने उसे इस संसार पर राज्य करने के लिए ही बुद्धि दी है पर लालच और लोभ के वश में आदमी अपनी बुद्धि गुलाम रख देता है। वह कभी भी धन प्राप्ति के कार्य से थकता नहीं है। अगर हजार रुपये होता है तो दस हजार, दस हजार से लाख और लाख से दस लाख की चाहत करते हुए उसकी लालच का क्रम बढ़ जाता है। कई बार तो ऐसे लोग भी देखने में आ जाते है जिनके पेट में दर्द अपने खाने से नहीं दूसरे को खाते देखने से उठ खड़ा होता है।
         अनेक धनी लोग जिनको चिकित्सकों ने मधुमेह की वजह से खाने पर नियंत्रण रखने को कहा होता है वह गरीबों को खाता देख दुःखी होकर कहते भी हैं‘देखो गरीब होकर खा कैसे रहा है’। इतना ही नहीं कई जगह ऐसे अमीर हैं पर निर्धन लोगों की झग्गियों को उजाड़ कर वहां अपने महल खड़े करना चाहते हैं। आदमी एक तरह से विकास का गुलाम बन गया है। भक्ति भाव से पर आदमी बस माया के चक्कर लगाता है और वह परे होती चली जाती है। सौ रुपया पाया तो हजार का मोह आया, हजार से दस हजार, दस हजार से लाख और लाख से दस लाख के बढ़ते क्रम में आदमी चलता जाता है और कहता जाता है कि अभी मेरे पास कुछ नहीं है दूसरे के पास अधिक है। मतलब वह माया की सीढियां चढ़ता जाता है और वह दूर होती जाती है। इस तरह आदमी अपना पूरा जीवन नष्ट कर देता है।
       आजकल तो जिसे देखो उस पर विकास का भूत चढ़ा हुआ है। कहते हैं कि इस देश में शिक्षा की कमी है पर जिन्होने शिक्षा प्राप्त की है तो इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि उन्होंने ज्ञान भी प्राप्त कर लिया है। इसलिये शिक्षित आदमी तो और भी माया के चक्कर में पड़ जाता है और उसे तो बस विकास की पड़ी होती है पर उसका स्वरूप उसे भी पता नहीं होता। लोगों ने केवल भौतिक उपलब्धियों को ही सबकुछ मान लिया है और अध्यात्म से दूर हो गये हैं उसी का परिणाम है कि सामाजिक वैमनस्य तथा मानसिक तनाव बढ़ रहा है। अत: जितना हो सके उतना ही अपनी पर नियंत्रण रख्नना चाहिये।  मनुष्य को अपनी बुद्धि तथा मन को लेकर हमेशा आत्ममंथन करना चाहिए ताकि वह स्वयं भी अपने कर्म पर नियंत्रण रख सके 
लेखक एवं संपादक -nhid jkt dqdjstk ^Hkkjrnhi*Xokfy;j
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Tuesday, June 7, 2011

पतंजलि योग विज्ञान-योगाभ्यास से शरीर की संरचना को जाना जा सकता है (patanjali yogavigyan yogaabhyas se sharir ki sanrchana ka gyan)

         भारतीय योग विज्ञान का अध्ययन किया जाये तो उसके व्यापक प्रभाव परिलक्षित होते हैं। इसमें वर्णित क्रियाओं का अभ्यास करने सें देह के स्वस्थ होने के साथ ही जहां मन में स्फृटित विचारों की धारा का प्रवाह तो होता ही है वहीं तमाम ऐसे विषयों और व्यक्तिों के बारे में ज्ञान होता है जो हमारे निकट नहीं होते। उनके दर्शन करते हुए उनके आचार विचार का अध्ययन ध्यान के माध्यम से भी किया जा सकता है। यह अलग बात है कि कुछ लोग अपने अंदर आयी स्फृटित धाराणाओं को सही अध्ययन नहीं कर पाते क्योंकि उनको योग विज्ञान के संपूर्ण सूत्रों का ज्ञान नहीं हो पाता।
              पतंजलि योग सूत्र में कहा गया है कि
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          नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम्।
         ‘‘नाभिचक्र में संयम या ध्यान करने शरीर के व्यूह यानि पूर्ण संरचना का ज्ञान हो जाता है।’’
          कण्ठकूपे क्षत्पिपासानिवृत्तिः।।
        ‘‘कण्ठकूप में संयम या ध्यान करने से भूख और प्यास की निवृत्ति हो जाती है।’’
         कूर्मनाडयां स्थैर्यम्।।
        ‘‘कूर्माकार जिसे नाड़ी भी कहा जाता है में संयम या ध्यान करने से स्थिरता होती है।’’
        मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम्।।
        ‘‘मूर्धा की ज्योति में संयम या ध्यान करने से सिद्ध पुरुषों के दर्शन होते है।’’
          योग विज्ञान के ज्ञाता लोगों को तत्वज्ञान के लिये श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करना चाहिए। उसमें भगवान श्रीकृष्ण ने योग के प्रभावों का विशद वर्णन किया है। ‘गुण ही गुणों में बरतते हैं’ और इंद्रियां ही इंद्रियों में बरतती है’ यह तो ऐसे सूत्र हैं जिनका योग विज्ञानियों को का अवश्य अध्ययन करना चाहिए। जहां योग विज्ञान में यह बात बताई गयी है कि किस तरह अपनी इंद्रियों पर ध्यान रखकर उनको संयमित किया जा सकता है वहीं श्रीमद्भागवत गीता में यह स्पष्ट किया गया है कि स्थिरप्रज्ञ मनुष्य ही जीवन का सबसे अधिक आनंद उठाता है। सामान्य लोग अपने चंचल मन के साथ इधर उधर भटकते हैं वहीं योग विज्ञानी एक ही जगह स्थिर रहकर संसार को अपनी अंतदृष्टि से देख लेते हैं।
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लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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Saturday, June 4, 2011

सामवेद से संदेश-पुरुषार्थ के विषय में भगवान विष्णु का अनुसरण करें (bhagwan vishnu prushartha ke prateek-samved se sandesh)

       यह आश्चर्य की बात है कि प्रकृति ने मनुष्य को देह, बुद्धि और मन की दृष्टि से अन्य जीवों की अपेक्षा सर्वाधिक शक्तिशाली जीव बनाया है तो सबसे अधिक आलसी भाव भी प्रदान किया। अधिकतर लोग लोग अपने तथा परिवार के स्वार्थ सिद्ध करने के बाद आराम करना चाहते है और परमार्थ उनको निरर्थक विषय लगता है जबकि पुरुषार्थ का भाव निष्काम कर्म से ही प्रमाणित होता है। उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि जिस देह से मनुष्य संसार का उपभोग करता है उसका ही महत्व नहीं समझता और भोगों में उसका नाश करता है। जिससे अंत समय में रोग उसके अंतिम सहयात्री बन जाते हैं और मृत्यु तक साथ रहते हैं।
      योग साधना, ध्यान, भजन और उद्यानों की सैर करने से जो देह के साथ मन को भी जो नवीनता मिलती है उसका ज्ञान अधिकतर मनुष्यों को नहीं रहता। सच बात तो यह है कि शरीर और मन को प्रत्यक्ष रूप से प्रसन्न करने वाले विषय मनुष्य को आकर्षित करते है और वह इसमें सक्रिय होकर जीवन भर प्रसन्न रहने का निरर्थक प्रयास करत है। वह अपनी इसी सक्रियता को पुरुषार्थ समझता है जबकि अप्रत्यक्ष लाभ देने वाले योगासन, ध्यान, भजन तथा प्रातः उद्यानों में विचरण करना उसे एक निरर्थक क्रिया लगती है। सीधी बात कहें तो इस अप्रत्यक्ष लाभ के लिये निष्काम भाव से इन कर्मो में लगना ही पुरुषार्थ कहा जा सकता है।
हमारे पावन ग्रंथ सामवेद में कहा गया है कि
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विष्णोः कर्माणि पश्चत यतो व्रतानि पस्पशे।
‘‘भगवान विष्णु के पुरुषार्थों को देखो और उनका स्मरण करते हुए अनुसरण करो।’
ऋतस्य पथ्या अनु।
‘‘ज्ञानी सत्य मार्ग का अनुसरण करते हैं।’’
‘प्रेता जयता नर।’
आगे बढ़ो और विजय प्राप्त करो।’’
      पुरुषार्थ करना मनुष्य का धर्म है और इसके लिये जरूरी है कि सत्य को मार्ग का अनुसरण किया जाये। आजकल जल्दी धनवान बनने के लिये असत्य मार्ग को भी अपनाने लगते हैं और उनको कामयाबी भी मिल जाती है पर जब उनको इसका दुष्परिणाम भी भोगना पड़ता है। यही कारण है कि ज्ञानी लोग कभी भी ऐसे गलत कार्य में अपना मन नहीं लगाते जिसका कालांतर में दुष्परिणाम भोगना पड़े।
     कर्म और पुरुषार्थ के विषय में भगवान विष्णु का स्मरण करना चाहिए। वह संसार के पालनहार माने जाते हैं। ऐसा महान केवल पुरुषार्थ करने वालों को ही मिल सकता है। भगवान विष्णु के चौदह अवतार माने जाते हैं और हर अवतार में कहीं न कहीं उनका पुरुषार्थ प्रकट होता है।
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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