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Wednesday, July 6, 2011

संत कबीर वाणी-पैसा हो तो पचास गुरु मिल जाते हैं(sant kabir wani-paisa aur guru)

                लोग एकदूसरे से पूछते हैं कि आज के गुरु भी भ्रष्ट और अज्ञानी हैं ऐसे में किससे ज्ञान प्राप्त किया जाये? देखा जाये तो ऐसे गुरुओं की उपस्थिति हर काल में रही है जो अध्यात्मिक दर्शन का व्यापार करते हैं। उनका लक्ष्य कोई धर्म का प्रचार करना नहीं होता बल्कि वह शिष्यों को ग्राहक बनाकर अपना रटा हुआ ज्ञान बेचते है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि हमारे देश में गुरु शिष्य की उच्च परंपरा रही है पर उसकी आड़ में ऐसे गुरुओं और शिष्यों की भरमार भी रही है जो पाखंड तथा ढोंग कर धर्म का दिखावा करते हैं। शिष्य जहां धर्म और अध्यात्म से इतर अपने अन्य लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये गुरु बनाते हैं तो गुरु भी अपने निकट ऐसे ही शिष्यों को आने देते हैं जो उनके धर्म के व्यापार में दलाल की भूमिका निभा सके हैं।
         संत कबीर कहते हैं कि
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        गुरवा तो सस्ता भया, पैसा केर पचास।
       राम नाम धन बेचि के, शिष्य करन की आस।।
        ‘‘गुरु का पद तो सस्ता हो गया है। पैसा हो तो पचास गुरु बन जाते हैं। यह गुरु स्वयं राम नाम का धन बेचते हैं और शिष्य से अपनी उदरपूर्ति की आशा करते हैं।
       गुरु बिचारा क्या करे, शब्द न लागा अंग।
        कहें कबीर मैली गजी, केसे लागे रंग।।
      ‘‘कोई गुरु भी क्या करे कि उसके शब्दों का प्रभाव शिष्यों पर नहीं होता। उनके मन उसी तरह मैले हैं जिस तरह गंदा कपड़ा होता है जिस पर रंग चढ़ाना व्यर्थ हो जाता है।’’
              योग्य गुरु तथा शिष्य का संयोग बड़े भाग्य से बनता है। अगर कोई गुरु योग्य है तो उसके शिष्यों में मन में ज्ञान प्राप्त करने की बजाय दिखावे की प्रवृत्ति अधिक है। वह उसके ज्ञान को केवल मनोरंजन का विषय मानकर सुनते है। प्रवचन और सत्संग के बाद उनका घर जाकर जस की तरह आचरण हो जाता है। उसी तरह अगर कोई गुरु ज्ञानी है पर उसके पास अच्छे प्रबंधक और प्रचारक शिष्य नहीं है तो उसे कोई नहीं पूछता। यही स्थिति उन जिज्ञासु लोगों की भी है जो अपने लिये आध्यात्मिक गुरु ढूंढते हैं पर व्यवसायिक गुरुओं की बहुतायत होने के कारण वह निराश हो जाते हैं। हालांकि ऐसे में श्रीमद्भागवत गीता तथा अन्य धर्मग्रंथों का नियमित अध्ययन किया जाये तो ऐसे पावन ग्रंथ स्वतः गुरु बन जाते हैं। महर्षि चाणक्य कहते हैं कि प्रतिदिन एक पाठ और वह भी नहीं तो एक दोहे या श्लोक का अध्ययन कर भी ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। वह भी नहीं तो आधे श्लोक या दोहे का अध्ययन करें। गुरु का अर्थ यह कदापि नहीं है कि वह सदेह हा सामने हो एकलव्य का अभ्यास इस बात की पुष्टि भी करता है। मूल बात संकल्प की है और वह धारण कर लिया तो फिर ज्ञानमार्ग का द्वार स्वतः खुल जाता है।
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',ग्वालियर
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com
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Wednesday, June 29, 2011

कबीर संदेश-लोग कर्मकांडों को धर्म के भ्रम मे पालते हैं (kabir sandesh-karmkand aur dharma)

          मूलतः भारतीय समाज प्रगतिवादी माना जाता है। हालांकि कुछ विदेशी भारतवासियों की धर्मभीरुता का मजाक उड़ाते हैं पर जिस तरह हमारा समाज समय के अनुसार नई शिक्षा, विज्ञान तथा साधनों के उपयोग की तरफ प्रवृत्त होता है उससे यह प्रमाणित होता है कि रूढ़ता का भाव उसमें नहीं है पर इसके बावजूद फिर भी धर्म के नाम पर अनेक कर्मकांड हैं जिसे लोग केवल सामाजिक दबाव में इसलिये अपनाते हैं कि लोग क्या कहेंगे। आधुनिक शिक्षा से जीवन में आगे बढ़े लोग भी अंधविश्वास और कर्मकांडों पर इसलिये विश्वास करते दिखते हैं क्योंकि उन पर कहीं न कहीं से दूसरे लोगो का दबाव होता है। स्थिति यह है कि अनेक धार्मिक ठेकेदार तो इन्हीं कर्मकांडों को ही धर्म का आधार कहकर प्रचारित करते हैं।
            इस विषय पर संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि
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            ‘कबीर’ मन फूल्या फिरै, करता हूं मैं ध्रंम।
                कोटि क्रम सिरि ले चल्या, चेत न देखै भ्रम।।
          "आदमी अपने सिर पर कर्मकांडों का बोझ ढोते हुए फूलता है कि वह धर्म का निर्वाह कर रहा है। वह कभी अपने विवेक का उपयोग करते हुए इस बात का विचार नहीं करता कि यह उसका एक भ्रम है।"
              संत कबीरदास जी ने अपने समाज के अंधविश्वासों और कुरीतियों पर जमकर प्रहार किये हैं। कितने आश्चर्य की बात है कि अनेक संत और साधु उनके संदेशों को ग्रहण करने का उपदेश तो देते हैं पर समाज में फैले अंधविश्वास और कर्मकांडों पर खामोश रहते हैं। आदमी के जन्म से लेकर मृत्यु तक ढेर सारे ऐसे कर्मकांडों का प्रतिपादन किया गया है जिनका कोई वैज्ञानिक तथा तार्किक आधार नहीं है। इसके बावजूद बिना किसी तर्क के लोग उनका निर्वहन कर यह भ्रम पालते हैं कि वह धर्म का निर्वाह कर रहे हैं। किसी कर्मकांड को न करने पर अन्य लोग नरक का भय दिखाते हैं यह फिर धर्म भ्रष्ट घोषित कर देते हैं। इसीलिये कुछ आदमी अनचाहे तो कुछ लोग भ्रम में पड़कर ऐसा बोझा ढो रहे हैं जो उनके दैहिक जीवन को नरक बनाकर रख देता है। कोई भी स्वयं ज्ञान धारण नहीं करता बल्कि दूसरे की बात सुनकर अंधविश्वासों और रूढ़ियों का भार अपने सिर पर सभी उसे ढोते जा रहे हैं। इस आर्थिक युग में कई लोग तो ऋण लेकर ऐसी परंपराओं को निभाते हैं और फिर उसके बोझ तले आजीवन परेशान रहते हैं। इससे तो अच्छा है कि हम अपने अंदर भगवान के प्रति भक्ति का भाव रखते हुए केवल उसी कार्य को करें जो आवश्यक हो। अपना जीवन अपने विवेक से ही जीना चाहिए।
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',ग्वालियर
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Saturday, June 11, 2011

संत कबीर के दोहे-आदमी कभी धन पाने के प्रयास से थकता नहीं

           प्रकृति में उत्पन्न समस्त जीवों में मनुष्य सबसे अधिक बुद्धिमान माना गया है और विचित्र बात यह है कि जहां अन्य जीव सीमित आवश्यकताओं के कारण अपना जीवन सामान्य रूप से गुजार लेते हैं जबकि मनुष्य असीम लालच और लोभ को अपने मन में स्थान देता है और सदैव संकट बुलाता है। संत कबीर दास जी ने अपने संदेशों में इसी तरफ इंगित किया है।
       कबीरा औंधी खोपड़ी, कबहूं धापै नाहिं
       तीन लोक की सम्पदा, कब आवै घर माहिं
          संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य की खोपड़ी उल्टी होती है क्योंकि वह कभी भी धन प्राप्ति से थकता नहीं है। वह अपना पूरा जीवन इस आशा में नष्ट कर देता है कि तीनों लोकों की संपदा उसके घर कब आयेगी।
            इस दुनिया में मनुष्य ही एक ऐसा जीवन जिसके पास बुद्धि में विवेक है इसलिये वह कुछ नया निर्माण कर सकता है। अपनी बुद्धि की वह से ही वह अच्छे और बुरे का निर्णय कर सकता है। सच तो यह कि परमात्मा ने उसे इस संसार पर राज्य करने के लिए ही बुद्धि दी है पर लालच और लोभ के वश में आदमी अपनी बुद्धि गुलाम रख देता है। वह कभी भी धन प्राप्ति के कार्य से थकता नहीं है। अगर हजार रुपये होता है तो दस हजार, दस हजार से लाख और लाख से दस लाख की चाहत करते हुए उसकी लालच का क्रम बढ़ जाता है। कई बार तो ऐसे लोग भी देखने में आ जाते है जिनके पेट में दर्द अपने खाने से नहीं दूसरे को खाते देखने से उठ खड़ा होता है।
         अनेक धनी लोग जिनको चिकित्सकों ने मधुमेह की वजह से खाने पर नियंत्रण रखने को कहा होता है वह गरीबों को खाता देख दुःखी होकर कहते भी हैं‘देखो गरीब होकर खा कैसे रहा है’। इतना ही नहीं कई जगह ऐसे अमीर हैं पर निर्धन लोगों की झग्गियों को उजाड़ कर वहां अपने महल खड़े करना चाहते हैं। आदमी एक तरह से विकास का गुलाम बन गया है। भक्ति भाव से पर आदमी बस माया के चक्कर लगाता है और वह परे होती चली जाती है। सौ रुपया पाया तो हजार का मोह आया, हजार से दस हजार, दस हजार से लाख और लाख से दस लाख के बढ़ते क्रम में आदमी चलता जाता है और कहता जाता है कि अभी मेरे पास कुछ नहीं है दूसरे के पास अधिक है। मतलब वह माया की सीढियां चढ़ता जाता है और वह दूर होती जाती है। इस तरह आदमी अपना पूरा जीवन नष्ट कर देता है।
       आजकल तो जिसे देखो उस पर विकास का भूत चढ़ा हुआ है। कहते हैं कि इस देश में शिक्षा की कमी है पर जिन्होने शिक्षा प्राप्त की है तो इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि उन्होंने ज्ञान भी प्राप्त कर लिया है। इसलिये शिक्षित आदमी तो और भी माया के चक्कर में पड़ जाता है और उसे तो बस विकास की पड़ी होती है पर उसका स्वरूप उसे भी पता नहीं होता। लोगों ने केवल भौतिक उपलब्धियों को ही सबकुछ मान लिया है और अध्यात्म से दूर हो गये हैं उसी का परिणाम है कि सामाजिक वैमनस्य तथा मानसिक तनाव बढ़ रहा है। अत: जितना हो सके उतना ही अपनी पर नियंत्रण रख्नना चाहिये।  मनुष्य को अपनी बुद्धि तथा मन को लेकर हमेशा आत्ममंथन करना चाहिए ताकि वह स्वयं भी अपने कर्म पर नियंत्रण रख सके 
लेखक एवं संपादक -nhid jkt dqdjstk ^Hkkjrnhi*Xokfy;j
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Thursday, March 3, 2011

तीनों लोकों की संपदा पाने के लिये लोग जीवन नष्ट कर देते हैं-हिन्दी धार्मिक लेख (aadmi ka jivan-hindi dharmik lekh)

सिख गुरु गोविंद सिंह जी का कहना था कि ‘धन बहुत बड़ी चीज है, पर आदमी को खाने के लिये बस दो रोटी चाहिए।’
इसका आशय यही है कि भले ही आदमी कितना भी कमा ले पर उसका पेट अन्न के बिना नहीं भर सकता। हम इसका व्यापक तथा गुढ़ भाव देखें तो यह बात समझ में आती है कि खाने के लिये जहां हमें रोटी चाहिए तो प्यास बुझाने के लिये पानी। देह को बचाने के लिये कपड़ा चाहिये और रात गुजारने के लिये छत की आवश्यकता होती है। यह धन से प्राप्त होती हैं पर दैहिक आवश्यकता की पूर्ति वस्तुओं से होती है कि कागज के नोटों से। यह बात लोग नहीं समझते और पैसा कमाने का लक्ष्य रखकर ही चलते जाते हैं और फिर अंततः उनकी देह नष्ट हो जाती है। इस दुनियां के अधिकतर मनुष्य जितना कमाते हैं उतना खर्च नहंी कर पाते। वह ऐसा भौतिक संसार रच जाते हैं जो बाद में दूसरों के काम आता है।
इस विषय पर संत कबीरदास कहते हैं कि
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कबीरा औंधी खोपड़ी, कबहूं धापै नाहिं
तीन लोक की सम्पदा, कब आवै घर माहिं
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य की खोपड़ी उल्टी होती है क्योंकि वह कभी भी धन प्राप्ति से थकता नहीं है। वह अपना पूरा जीवन इस आशा में नष्ट कर देता है कि तीनों लोकों की संपदा उसके घर कब आयेगी।
हालांकि लोग धन का पीछा करते हुए थकते नहीं हैं पर एकरसता से जो ऊब पैदा होती है उसको भी नहीं समझ पाते। योगसाधना, ध्यान, और मंत्रजाप उनके लिये फालतु की चीज हैं। कुछ लोग पैसे के कारण भी भक्ति का दिखावा करते हुए बड़े बड़े कार्यक्रम भी करते हैं पर उनका आचरण, व्यवहार और वाणी हमेशा ही उनके अंदर के विकारों से ग्रसित दिखाई देती है। आजकल तो ऐसे लोग भी हो गये हैं जो धर्म का व्यापार इसलिये करते हैं ताकि उनके लिये सुखसुविधा का संग्रह होता रहे। अनेक लोग समाज पर दबदबा बनाये रखने के लिये भगवान की आड़ लेते हैं। ऐसे लोग वैभव, पद और बाहुबल से संपन्न दिखते जरूर हैं पर मानसिक रूप से विकृति को प्राप्त हो जाते हैं।
इस संसार में सुख से रहने का मार्ग अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने से ही सुलभ होता है। यही सोचकर तत्व ज्ञानी जितना मिलता है उसी से संतोष कर लेते हैं। वह न केवल अपना जीवन आनंद से बिताते हैं बल्कि दूसरों को भी सुख देते हैं।

लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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Friday, October 15, 2010

संत कबीर दर्शन-सामूहिक भक्ति और भजन दिखावा है (samuhik bhakti ek dikhava-sant kabir darshan)

ऊजल पहिनै कापड़ा, पान सुपारी खाय।
कबीर गुरु की भक्ति बिन, बांधा जमपुर जाय।।
संत कबीर कहते हैं कि जो उजले कपड़े पहनने के साथ ही पान सुपारी खाकर दिखावा करते हैं और गुरु की भक्ति नहीं करते वह बहुत तकलीफ के साथ मुत्यु को प्राप्त होते हैं।
दुनियां सेती दोसती, होय भजन में भंग।
एका एकौ राम सों, कै साधुन के संग।।
संत कबीर कहते हैं कि दुनियां के लोगों के साथ मित्रता करने से भक्ति में बाधा आती है। एक अकेले ही भगवान राम की भक्ति तथा साधुओं की संगत करने पर ही मन को शांति मिलती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आधुनिक युग ने भारत में जीवन के मायने ही बदल दिये हैं। मित्रता के नाम पर अनेक लोग कुसंगत में फंसकर जीवन तबाह करते हैं तो अनेक लोग समूहों में मिलकर भगवान भजन का आयोजन कर अपने धार्मिक होने की दिखावा करते हैं। स्थिति यह है कि अनेक लोग अपने यहां शादी विवाह के अवसर पर परंपरागत गीत गायन के स्थान पर भजन जागरण करते हैं और इस अवसर पर शराब तंबाकू का खुलकर सेवन होता है। कई बार तो हंसी आती है कि भक्ति को लेकर लोग समझते क्या हैं? वह भगवान को भक्ति दिखा रहे हैं या लोगों को बता रहे हैं या अपने आपको ही स्वयं के भक्त होने का विश्वास दिला रहे हैं। अब तो हर मौके पर सामूहिक भजन कार्यक्रम करने की ऐसी परंपरा शुरु हो गयी है कि देखकर लगता है कि पूरा देश ही भक्तमय हो रहा है। उस हिसाब से देश में नैतिकता तथा आचरण के मानदंड बहुत ऊंचे दिखना चाहिये पर ऐसा है नहीं।
दरअसल देश में बढ़ते धन ने लोगों को बावला बना दिया है और धनी लोग अपनी छबि धार्मिक बनाये रखने के लिये ऐसे आयोजन करते हैं जिससे समाज में भले आदमी की छबि बने रहे। उसी तरह कुछ बाहुबली लोगों से पैसा वसूल कर भी अनेक प्रकार के सामूहिक धार्मिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं कि लोग उनकी छबि को साफ सुथरा समझें। सच तो यह है कि धर्म साधना एकांत का विषय है और इसमें जो समूह बनाकर भजन करते हैं या कार्यक्रमों में शामिल होते हैं वह सिवाय पाखंड के कुछ नहीं करते। दूसरों को नहीं अपने आपको धोखा देते हैं।
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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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Saturday, February 27, 2010

संत कबीर वाणी-व्यसनी अपने और दूसरों के लिये नरक बनाता है

छाजन भोजन हक्क है, अनाहक लेय।
आपन दोजख जात है, और दोजख देय।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं हर इंसान को भोजन पाने का हक है पर वह ऐसी वस्तुओं का सेवन करता है जिन पर उसका हक नहीं है। वह स्वयं तो नरक में जाता ही है दूसरों के लिये भी संकट पैदा करता है।
अमल आहारी आतमा, कबहुं न पावै पार।
कहैं कबीर पुकारि के, त्यागो ताहि विचार।।
कबीरदास जी कहना है कि नशे का सेवन करने वाले इस संसार रूपी दरिया को कभी पार नहीं कर सकते। अतः नशीली वस्तुओं का सेवन त्याग देना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जिस सर्वशक्तिमान ने जीव को पैदा किया है उसने उनके लिये भोजन की भी व्यवस्था की है। मनुष्य ही नहीं हर जीव का यह अधिकार है कि वह भोजन प्राप्त करे। पशु और पक्षी भी अपने भाग्य के अनुसार भोजन प्राप्त करते हैं पर मनुष्य ऐसा जीव है जो नशीने पदार्थों को सेवन करता है। नशीले पदार्थ ग्रहण करना उसका अधिकार नहीं है पर वह जबरन उनको ग्रहण करता है। इससे न वह स्वयं ही नरक भोगता है बल्कि दूसरों के सामने इस धरती पर नरक जैसा दृश्य प्रस्तुत करता है। पहले हुक्के का प्रचलन था जबकि आजकल सिगरेट और बीड़ी ने उसकी जगह ले ली है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार इनके सेवन करने वाला अपने शरीर की हानि तो करता ही है, पर वह जो धुंआ वातावरण में छोड़ता है उससे उसके पास बैठने वाले व्यक्ति को कहीं अधिक हानि होती है। इसके अलावा उसका धुआं विषाक्त गैस बनकर आसपास के लोगों को भी तकलीफ पहुंचाता है।
जो सिगरेट और बीड़ी का सेवन करते हैं उनको यह अनुमान ही नहीं होता कि उनके धुऐं की वजह से उनके अपने ही लोग उनको घृणा की दृष्टि से देखते हैं। यही स्थिति शराब की है। अनेक बार सार्वजनिक स्थानों पर पास खड़े शराबियों में मुख से आने वाली दुर्गंध कष्टदायी लगती है और लोग उनको कभी घृणित दृष्टि से देखते हैं। इस तरह धुम्रपान तथा शराब को सेवन त्याग देना ही उचित है क्योंकि इनके सेवना का अधिकर मनुष्य का नहीं है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Tuesday, November 10, 2009

संत कबीर वाणी-आशायें नहीं मरी तो योग साधना से क्या लाभ (yogsadhna aur ashaen-sant kabir das)

आसन मारे कह भयो, मरी न मन की आस।
तेली करे बैल, ज्यों, घर ही कोस पचास।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि आसन लगाकर ध्यान आदि करने से क्या लाभ यदि मन की आशायें नहीं मरी। यह तो ऐसे ही हुआ जैसे कि तेली का बैल अपने घर में पचास कोस की परिक्रमा कर लेता है।
सब आसन आसा तनै, निबरन कोई नांहि।
निवृत्ति को जानै नहीं, प्रवृत्ति प्रपंचहि मांहि।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब आसन करने से भी आशायें निवृत नहीं होती तो उसका लाभ सीमित है। मन की निवृत्ति का जाने और प्रपंचों से मुक्ति के बिना सभी आसन व्यर्थ हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-योग साधना केवल योगासन और प्राणायम करना ही नहीं है। उसके साथ धारणा और ध्यान का भी बहुत महत्व है। योगासन के साथ अगर तत्व ज्ञान जानने का प्रयास नहीं किया जाता तो सब व्यर्थ है। वैसे आजकल योग साधना को केवल स्वास्थ्य तक ही सीमित रखकर प्रचारित किया जा रहा है जिसमें कुछ लोगों का व्यवसायिक उद्देश्य है। अगर आदमी केवल अपने जीवन में स्वस्थ होकर फिर योग भूल जाये या न करे तो भी लाभ नहीं है। फिर आदमी अगर अपने समाज के लिये किसी मतलब का नहीं तो उसका भी क्या लाभ?
वैसे हर योग साधक को श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करना चाहिये। उसमें जो तत्व ज्ञान है वही इस संसार को समझने के लिये पर्याप्त है। स्वस्थ समाज तो तब भी था जब भोग विलास के साधन नहीं थे पर समाज के लिये काम करने वाले लोग कितने रहे। योगासन और प्राणायम से देह और मन के विकास तो निकलते हैं पर इस शुद्धता का भाव हमेशा स्थाई बना रहे इसके लिये तत्व ज्ञान का होना जरूरी है। इसलिये भारतीय धर्म ग्रंथों में स्वर्ग से प्रीति रखने वाले वाक्यों को छोड़कर अन्य अच्छी बातों को ग्रहण करते हुए उन पर आपस चर्चा करना भी अच्छा है।
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Saturday, October 17, 2009

संत कबीर वाणी-ढंग से बोलने वाले जिंदगी में कभी नहीं हारते (theek bolne vale nahin harte-sant kabir vani)

मुख आवै सोई कहै, बोलै नहीं विचार।
हते पराई आतमा, जीभ बांधि तलवार।।
भावार्थ-
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो मन में जो आता है, वही अपने मुख से बक देते हैं। वह अपनी जीभ का तलवार की तरह उपयोग कर दूसरे की आत्मा को कष्ट पहुंचाते हैं।
बोलै बोल विचारि के, बैठे ठौर संभारि।
कहैं कबीर ता दास को, कबहु न आवै हारि।
भावार्थ-
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब भी कुछ बोलना हो विचार कर बोलें तथा अपने लक्ष्य का ध्यान रखें। जो आदमी सोच समझ कर बोलता है वह जीवन में कभी नहीं हारता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अगर हम अपने देश में आये दिन होने वाले झगड़ों को देखें तो अधिकतर बिना मतलब के होते हैं जो केवल इसलिये पैदा होते हैं क्योंकि आपस में मधुर संवाद करने का तरीका कुछ लोगों को नहीं होता। सबसे पहले तो जातीय झगड़ों की बात करें। अक्सर लोग यही कहा जाता है कि बड़ी जाति के लोग छोटी जाति के लोगों को ढंग से नहीं बुलाते। इससे बड़ी बात क्या होगी कि शायद अपना देश दुनियां में पहला ऐसा देश होगा जहां संबोधन को लेकर भी नियम हैं कि आप अमुक जाति का नाम लेकर नहीं पुकार सकते। यहां जब भी आदमी बौखलाता है दूसरे को उसकी जाति का नाम लेकर गाली देता है। बहुत छोटी लगने वाली यह बात महत्वपूर्ण है जिसे समझना चाहिये। दरअसल इसी बातचीत से पनपे झगड़ों ने समाज में हमेशा ही विघटना पैदा किया जिसके कारण विदेशियों को यहां राज्य का अवसर मिला। शायद यही कारण है कि हमारे प्राचीन मनीषी हमेशा ही मधुर वचन बोलने का संदेश देते रहे क्योंकि वह जानते थे कि समाज में यह एक भयानक बीमारी है कि लोग एक दूसरे के लिये अपशब्दों का प्रयोग करने में नहीं हिचकते जो कि कालांतर में समाज और राष्ट्र के लिये घातक बनता है।

हमने देखा होगा कि मधुर वचन बोलने वाले हमेशा ही अपना काम निकाल जाते हैं। हालांकि इसकी आड़ में कुछ लोग चाटुकारिता भी करते हैं पर इतना तय है कि उनका कोई काम रुकता नहीं है। ऐसे में जहां तक हो सके आदमी बड़ा हो तो उससे हम स्वतः ही नम्रता से बोलते हैं पर अपने से छोटा भी हो तो भी उससे मधुरा शब्दों में बात करें-इस जीवन में पता नहीं कब किसकी आवश्यकता पड़ जाये। आपने सुना होगा कि जहां सुई काम करती है वहां तलवार काम नहीं करती। इसलिये अगर जीवन में हमेशा विजेता की तरह बने रहना है तो अपने शब्दों में मधुरता लायें।
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Saturday, September 19, 2009

संत कबीरदास वाणी-आहार विषयक चिंता से मुक्ति न पाये, वह योगी नहीं (sant kabir vani(bhojan ki chinta aur yog sadhna)

आसन मारे कह भयो, मरी न मन की आस।
तेल केरे बैल ज्यौं, घर ही कोस पचास।।
संत शिरोमणि कबीरदासजी कहते हैं कि आसन लगाने से भी क्या लाभ जब मन में कामनाएं जीवित रहें। वह तो तेली के बैल की तरह है जो घर में पचास कोस का चक्कर काट लेता है।
जोगी हृै जग जीतता, बहिरत है संसार।
एक अंदेशा रहि गया, पीछै पड़ा आहार।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जोगी जग जीतकर विचरण करता है पर अगर उसके अंदर अपने आहार के विषय में संशय रह गया तो वह ठीक नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-कबीरदास जी ने योग साधना के विषय में जो बातें कही है वह उनके काल में शायद इसलिये ही ठीक लगी क्योंकि उस समय नियमित परिश्रम के कारण लोगों में रोग आदि कम होते थे और जो लोग योगासाधना करते थे उनको केवल सन्यासी मान लिया जाता था। जबकि वर्तमान समय में परिश्रम की प्रवृत्ति कम हुई है जिससे बीमारियों का प्रकोप बढ़ा है जिससे समाज में शारीरिक और मानसिक के कारण लोग बहुत परेशान हैं इसलिये योग साधना केवल भक्ति ही नहीं बल्कि उन विकारों से लड़ने का एक अच्छा साधन लगती है।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि संत शिरोमणि कबीरदास जी को योग साधना और ध्यान के विषय में अधिक जानकारी नहीं थी। दूसरा यह भी कि वह भक्ति के ऐसे चरम शिखर पर पहुंचे थे जहां कोई विरला पहुंचता है। योगसाधना भक्ति का रूप नहीं है बल्कि उसके लिये शक्ति अर्जित करने का एक साधन है। कबीरदास जी कहते हैं कि योगी जग जीतता हुआ जग में विचरण करता है पर आहार विषयक उसका संदेह उसे सांसरिक व्यक्तियों की श्रेणी में खड़ा कर देता है। इस तरह के संशय मनुष्य में अपनी ही देह, मन और विचारों में स्थित विकारों के कारण उत्पन्न होते हैं और योग साधना, ध्यान और मंत्रोच्चार से उनको दूर कर परमात्मा की भक्ति बहुत सहज ढंग से की जा सकती है यह बात शायद कबीर नहीं समझ पाये। इसलिये उन्होंने आसनों के विषय में ऐसी प्रतिक्रिया दी है। इसके बावजूद योग साधकों को कबीरदास जी के कथनों की अनदेखी नहीं करना चाहिये क्योंकि उनकी आहार विषयक चेतावनी बहुत महत्वपूर्ण है और यही वह बिन्दू है जहां मनुष्य आकर रुक जाता है। एक बार पेट भरने के बाद उसे अगले समय की चिंता लग जाती है। सामान्य गृहिणियों का अधिकतर समय तीन समय का भोजन बनाने में लग जाता है और ऐसे में वह तो अध्यात्मिक विषय में चिंतन कर ही नहीं पातीं।
योग साधना और ध्यान के बावजूद अगर आहार व्यवहार विषयक शुद्धता हमारे अंदर नहीं आती तो अपनी नियमित अवधि को बढ़ायें। जहां तक ध्यान का विषय तो अपने अंदर संकल्प लें कि हम तो वह लगाते ही रहेंगे चाहे लगे या नहीं। अंततः उसमें सफलता मिलेगी और शनैः शनैः दैहिक, मानसिक और वैचारिक विकार दूर निकल जायेंगे और आहार विषय चिंता से मुक्ति मिल सकेगी।
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Friday, July 10, 2009

संत कबीर वाणी-अंधे हाथी छूकर करते हैं अपना अपना बखान (andhon ka hathi-sant kabir vani)

भीतर तो भेदा नहीं, बाहर कथै अनेक।
जो पै भीतर लखि पर, भीतर बाहिर एक।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अंदर तो प्रवेश किया नहीं पर उस आत्ममय रूप के बाहर अनेक वर्णन किये जाते हैं। एक बार अगर हृदय में उस आत्मा रूप को समझ लें तो फिर अंदर बाहर एक जैसे हो जायेंगे।
अन्धे मिलि हाथ छूआ, अपने अपने ज्ञान।
अपनी सब कहैं? किसको दीजै कान।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अंधे हाथी को छूकर अपना ज्ञान बखान करना शुरु कर जब केवल अपने ही दृष्टिकोण सत्य कहने लगें तो ऐसे में किस पर ध्यान दे सकते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे देश में अनेक प्रकार के देव देवताओ की मान्यता है। कहने को तो कहा जाता है कि परमात्मा एक ही स्वरूप है पर फिर भी कुछ कथित साधु संत अपने अपने हिसाब से हर स्वरूप को श्रेष्ठ बताते हैं। कुछ तो ऐसे हैं जो हर स्वरूप बखान करते हैं। अध्यात्मिक ज्ञान बेचना एक तरह से व्यवसाय हो गया है। जिस तरह किताब बेचने वाला दुकानदार तमाम तरह की किताबें बेचता है पर उसे सभी किताबों का ज्ञान नहीं होता वह हाल इन धर्म बेचने वालों का है। ऐसे भी दुकानदार देखे जा सकते हैं जो स्वयं एक ही भाषा जानते हैं पर उनकी भंडार में बिकने के लिये अनेक भाषओं किताबें रहती हैं। यही हाल धर्म बेचने वाले कथित साधुओं का है। वह समय और पर्व के अनुसार भगवान के हर स्वरूप की व्याख्या करते हैं पर उसको जानते स्वयं भी नहीं है। उनको तो बस उस पर बोलना है और क्योंकि यह उनकी आय का जरिया है।
सच बात तो यह है कि जो सत्य स्वरूप आत्मा को समझ लेता है वह कोई छद्म रूप धारण नहीं करता। हमेशा अंदर और बाहर से एक जैसा ही होता है।
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Tuesday, July 7, 2009

संत कबीर वाणी-मांस का भक्षण मनुष्य के लिये नहीं (Kabir ke dohe)

यह कूकर को भक्ष है, मनुष देह क्यों खाय।
मुख में आमिष मेलहिं, नरक पड़े सो जाये।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मांस तो श्वान का भोजन है फिर मनुष्य की देह पाकर उसे क्यों खाये। यह जानते हुए भी जो मांस खायेगा वह नरक में जायेगा।
मांस मछलियां खात है, सुरा पान सों हेत।
ते नर जड़ से जाहिंगे, ज्यों मूरी का खेत।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो मनुष्य मांस और मछली खाना और शराब पीना पसंद करते हैं वह नराधम मूली के खेत के समान है जो जड़ से नष्ट हो जायेंगे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जिस तरह समाज में मांस और मदिरा के सेवन की प्रवृत्ति बढ़ रही है वैसे ही अपराध और ठगी का पैमाना भी बढ़ा है। पहले तो यह स्थिति थी कि शराब पीने वाले को समाज में हेय और निकृष्ट समझा जाता था पर आज यह हालत है कि जो शराब या मांस का सेवन नहीं करता उसे पिछड़ा समझा जाता है। कहने को तो देश बहुत संस्कृतिनिष्ठ है पर अब परंपरागत कार्यक्रमों में शराब का सेवन खुलकर किया जाता है। कई बार तो यह देखा गया है कि शादी विवाह या अन्य अवसर पर आयोजित घरेलू धार्मिक कार्यक्रमों लोग शराब पीकर शामिल होते हैं। शराब के इस सेवन से लोगों की मानसिकता विकृत हो गयी है और हम भले ही यह दावा करते हैं कि हमारा देश धर्मनिष्ठ और संस्कृतिनिष्ठ है पर वास्तविकता यह है कि हम अपनी राह से भटक गये हैं। सच बात तो यह है कि अब हमें आत्ममंथन करना चाहिये कि हमारे अपने ही दावों में कितना दम है।
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Tuesday, June 30, 2009

संत कबीर वाणी-भय इंसान की पारणमणि

भय बिन भाव न ऊपजै, भय बिनु होय न प्रीति।
जब हिरदे से भय गया, मिटी सकल रस रीति।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि भय के बना हृदय में भाव नहीं पैदा होता। बिना भय के प्रीति नहीं होती। जब हृदय से भय मिट गया तो सभी प्रकार के रस और रीति भी मिट जाती है।
भय से भक्ति करै सबै, भय से पूजा होय।
भय पारस जीव को, निरभय होय न कोय।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि भय के कारण ही सभी भक्ति करते हैं। भय से लोग अपने से शक्तिशाली व्यक्ति की पूजा करते हैं। इस प्रकार यह भय ही लोगों के लिये पारसमणि है जो उने पास रहती है। निरभय तो कोई होई नहीं सकता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सामान्य लोग भय के वशीभूत होकर न केवल भगवान की बल्कि अपने से अधिक शक्तिशाली व्यक्ति की भी भक्ति और पूजा करते हैं। आदमी के मन में मृत्यु, बीमारी, भूख और तथा अन्य संकटों का भय हमेशा ही रहता है इसलिये उस समय किसी की सहायता की चाहत उसे भगवान की भक्ति करने के लिये प्रेरित करने के साथ सांसरिक जीवों की चाटुकारिता के लिये भी बाध्य करती है। इस देह के साथ मृत्यु, बीमारी, भूख और प्यास का प्रकोप निंरतर बना रहता है। आदमी ठीक होने पर बीमारी, पेट भरा होने पर भी भोजन, और गला तर होने पर भी प्यास की चिंता करते हुए मरने से पहले ही कई बार मर चुका होता है। सच बात तो यह है कि इसी भय के कारण वह सामाजिक जीव बना है पर यही उसके लिये बंधन भी बन जाता है। इसी कारण वह भक्ति करते हुए कामनायें मन में पालता है और दया करने से पहले अपने उद्देश्य तय करता है। जबकि हमारे अध्यात्म दर्शन के अनुसान तो निष्काम भक्ति और निष्प्रयोजन दया करना ही फलदायी माना गया है। वैसे मनुष्य जीवन का चरम सुख तो निर्भय होकर जीने में है तब किसी किसी रस या रीति में दिलपचस्पी नहीं रह जाती पर मोह मनुष्य के अंदर भय को हमेशा जीवित रखता है।
सच तो यह है कि भय एक पारसमणि की तरह है जिसे वह कभी छोड़ना ही नहीं चाहता।
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Monday, June 22, 2009

संत कबीरदास वाणी-शरीर देवालय और मन ध्वजा है

काया देवल मन धजा, विषय लहर फहराय।
मन चलते देवल चले, ताका सरबय जाय।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि शरीर देवालय और मन झंडे की तरह है। विषय लहरों की तरह हैं। चंचल मन के वेग से देवालय यानि यह शरीर भी चलायमान होता है। अंततः सब नष्ट हो जाता है।
काया कजरी बन अहै, मन कुंजर महमन्त।
अंकुस ज्ञान रतन है, फेरै साधु संत।।

संत शिरामणि कबीरदास जी का यह आशय है कि यह शरीर तो जंगल की तरह जिसमें मन रूपी हाथी मस्ती से विचरण करता है। उस पर ज्ञान रूपी अंकुश ही नियंत्रण रख सकता है वरना तो यह साधु और संतों को भी विचलित कर देता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-मनुष्य का मन ऐसी शय है जिस पर नियंत्रण कर लिया जाये तो फिर वह नियंत्रणकर्ता का गुलाम बन जाता है। इसी प्रवृत्ति के कारण विज्ञापन एक व्यवसाय बन गया है। आधुनिक संचार माध्यमों ने तो एक तरह से मनुष्य को गुलाम बना दिया है। जिस उत्पाद का विज्ञापन आधुनिक संचार माध्यमों में दिखता है उसकी बिक्री बढ़ जाती है। कोई गाना आदमी सुनता है तो उसे गुनगुनाने लगता है। कहने का तात्पर्य है कि इस मायावी संसार में मायापति अब विज्ञापन के जरिये ही मनुष्य को उपभोक्ता बनाकर उसे अपने नियंत्रण में लेते हैं।
हमारे समाज पर फिल्मों का बहुत प्रभाव पड़ता है इसी कारण उसमें जो दिखाया जाता है लोग उसे ही सच मान लेते हैं। काल्पनिक पात्रों का अभिनय करने वाले कलाकार आजकल नये भगवान बन गये हैं। वह भारतीय जनमानस पर ऐसे छाये हुए हैं कि व्यवसायिक, राजनीतिक, सामाजिक तथा धार्मिक क्षेत्र के शिखर पुरुष भी इन अभिनेताओं के साथ फोटो खिंचवाकर अपने को धन्य समझते हैं-केवल इस कारण कि आम जनमानस उनका भी चेहरा अवश्य देखेंगे। अनेक विचार समूह इन्हीं फिल्मों के जरिये अप्रत्यक्ष रूप से इन्ही फिल्मों और धारावाहिकों के जरिये अपना प्रचार कर रहे हैं। इन फिल्मों और धारावाहिकों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष से प्रायोजित करने वाले व्यवसायी अपने धार्मिक, सामाजिक, तथा आर्थिक उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं। इसके लिये अब उनको अलग से प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है। वजह यह है कि भारतीय जनमानस अपने अध्यात्मिक ज्ञान से परे हो गया है और काल्पनिक पात्रों में ही अपना अस्तित्व ढूंढने का प्रयास करता है और इसी कारण वह आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक रूप से गुलाम बना हुआ है। सभी जानते हैं कि बाजार पर केवल स्वार्थी लोगों का नियंत्रण है पर फिर भी उसके प्रचार में बह जाते हैं। इनसे अपने मन को बचाने के लिये अंकुश केवल भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान ही है पर वह तभी अपने हाथ में आ सकता है जब उसके लिये थोड़ा प्रयास किया जाये।
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Saturday, May 23, 2009

संत कबीर वाणी-कुतिया ही चोरों से मिल जाये तो कौन पहरा देगा

खट्टा मीठा चरपरा, जिभ्या सब रस लेय।
चोरों कुतिया मिलि गई, पहरा किसका देय।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि हमारी जीभ खट्टा, मीठा और चटपटा सब प्रकार के रसों का स्वाद लेती है ऐसे में उससे यह कैसे आशा की आये कि वह किसी को बुरा कहेगी। यह ऐसा ही है जैसे कि चोरों से कुतिया मिल जाये तो पहरा कौन दे।
खट्टा मीठा देखिके, रसना मेलै नीर।
जब लग मन पाको नहीं, काचो निपट कबीर।।
संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि खट्टा मीठा देखकर जीभ से लार टपकती है। अगर मन वश में नहीं है तो उसे कच्चे कांच का ही समझना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-खट्टा मीठा और चटपटा स्वाद लेने की आदी हो चुकी जीभ किसी खाद्य पदार्थ के विषैले होने की जांच नहीं करती। इस समय बाजार में अनेक प्रकार के ‘फास्ट फूड’ बिकते हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि वह पेट के लिये अत्यंत खतरनाक हैं। इसके अलावा अनेक चटपटी वस्तुऐं बनती हैं जिनमें अनेक प्रकार के खतरनाक रसायन मिले होते हैं। उनका उपयोग सेहत के लिए ठीक नहीं हैै। इसके बावजूद जीभ के स्वाद के लिये लोग उनका उपयोग करते हैं।
आशय यह है कि खाने पीने की वस्तुओं को उपभोग करते समय जीभ के स्वाद की तृप्ति देखते हैं न कि उससे होने वाली हानियों पर। यही कारण है कि आजकल अस्पतालों में बीमार लोगों की भीड़ लगी रहती है। चिकित्सकों को इससे इतनी कमाई होने लगी है कि उनके निजी अस्पताल फाइव स्टार होटलों की तरह चमकने लगे हैं। लोगों ने जीभ के स्वाद की पूर्ति के लिये वस्तुओं के अच्छे और बुरे होने की पहचान खो दी है और ऐसे में यह कैसे आशा की जाये कि वह स्वस्थ जीवन व्यतीत करें।
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Sunday, May 17, 2009

संत कबीर वाणी: राम के सच्चे भक्त होते हैं सुख दु:ख से परे

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि
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हैवर गैवर सघन धन, छन्नपती की नारि
तास पटेतर ना तुलै, हरिजन की पनिहारि

भगवान की भक्ति करने वाली गरीब नारी की बराबरी महलों में रहने वाली रानी भी नहीं कर सकती भले ही उसके राजा पति के पास हाथियों और घोड़ो का झुंड और बहुत सारी धन संपदा है।

दुखिया भूखा दुख कीं, सुखिया सुख कौं झूरि
सदा अजंदी राम के, जिनि सुख-दुख गेल्हे दूरि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि भूख के कष्ट के कारण दुखी आदमी मर रहा है तो ढेर सारे सुख के कारण सुखी भी कष्ट उठा रहा है किंतु राम के भक्त तो हर हाल में में मजे से रहते हैं क्योंकि वह दुःख सुख के भाव से परे हो गये हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-दुनियां में तीन तरह के लोग होते हैं-दुःखी,सुखी और भक्त। अभाव और निराशा के कारण दुःखी आदमी हमेशा परेशान रहता है तो सुखी आदमी अपने सुख से उकता जाता है और वह हर ‘मन मांगे मोर’ की धारा में बहता रहता है। विश्व के संपन्न राष्ट्रों के देश भारत के अध्यात्मिक ज्ञान की तरफ आकर्षित होते हैं तो भारत के लोग उनकी भौतिक संपन्नता प्रभावित होते हैं। पश्चिम में तनाव है तो पूर्व वाले भी सुखी नहीं। कहने का तात्पर्य यह है कि लोग इस मायावी संसार में केवल दैहिक सुख सुविधाओं के पीछे भागते हैं। जिसके भौतिक साधन नहीं है वह कर्ज वगैरह लेता है और फिर उसे चुकाते हुए तकलीफ उठाता है और अगर वह चीजें नहीं खरीदे तो परिवार के लोग उसका जीना हराम किये देता है। सुख सुविधा का सामान खरीद लिया तो फिर दैहिक श्रम से स्त्री पुरुष विरक्त हो जाते हैं और इस कारण स्वास्थ बिगड़ने लगता है।

जिन लोगों ने अध्यात्म ज्ञान प्राप्त कर लिया है वह जीवन को दृष्टा की तरह जीते हैं और भौतिकता के प्रति उनका आकर्षण केवल उतना ही रहता है जिससे देह का पालन पोषण सामान्य ढंग से हो सके। वह भौतिकता की चकाचैंध मेंे आकर अपना हृदय मलिन नहीं करते और किसी चीज के अभाव में उसकी चिंता नहीं करते। ऐसे ही लोग वास्तविक राजा है। जीवन का सबसे बड़ा सुख मन की शांति हैं और किसी चीज का अभाव खलता है तो इसका आशय यह है कि हमारे मन में लालच का भाव है और कहीं अपने आलीशान महल में भी बैचेनी होती है तो यह समझ लेना चाहिये कि हमारे अंदर ही खालीपन है। दुःख और सुख से परे आदमी तभी हो सकता है जब वह निष्काम भक्ति करे।
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Friday, April 10, 2009

संत कबीरदास वाणीः मुख से बोला और हाथ से लिखा शब्द तो चारों ओर घूमता है

कुटिल वचन सबतें बुरा, जारि करै सब छार।
साधु वचन जल रूप है, बरसै अमृत धार।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कटु वचन बहुत बुरे होते हैं और उनकी वजह से पूरा बदन जलने लगता है। जबकि मधुर वचन शीतल जल की तरह हैं और जब बोले जाते हैं तो ऐसा लगता है कि अमृत बरस रहा है।

शब्द न करैं मुलाहिजा, शब्द फिरै चहुं धार।
आपा पर जब चींहिया, तब गुरु सिष व्यवहार।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि शब्द किसी का मूंह नहीं ताकता। वह तो चारों ओर निर्विघ्न विचरण करता है। जब शब्द ज्ञान से अपने पराये का ज्ञान होता है तब गुरु शिष्य का संबंध स्वतः स्थापित हो जाता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- पिछले दिनों समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ कि अब लोगों में अपशब्द बोलना एक तरह से फैशन बनता जा रहा है। लोग अंतर्जाल पर गाली गलौच लिखना एक फैशन बना रहे हैं। यह वर्तमान विश्व समुदाय में अज्ञान और अहंकार की बढ़ती प्रवृत्ति का परिचायक है। पहले तो यह विचार करना जरूरी है कि हमारे शब्दों का प्रभाव किसी न किसी रूप में होता ही है। एक बात यह भी है कि हम जो शब्द बोलते हैं वह समाप्त नहीं हो जाता बल्कि हवा में तैरता रहता है। फिर समय पढ़ने पर वह उसी मुख की तरफ भी आता है जहां से बोला गया था। ऐसे में अगर हम अपने मुख से अपशब्द प्रवाहित करेंगे तो वह लौटकर कभी न कभी हमारे पास ही आने हैं। आज हम किसी से अपशब्द अपने मुख से बोलेंगे कल वही शब्द किसी अन्य द्वारा हमारे लिये बोलने पर लौट आयेगा। इस तरह तो अपशब्द बोलने और सुनने का क्रम कभी नहीं थमेगा।

इसलिये अच्छा यही है कि अपने मुख मधुर और दूसरे को प्रसन्न करने वाले शब्द बोलें जाये। लिखने का सौभाग्य मिले तो पाठक का हृदय प्रफुल्लित हो उठे ऐसें शब्द लिखें। पूरे विश्व समुदाय में गाली गलौच का प्रचलन कोई अच्छी बात नहीं है। ब्रिटेन हो या भारत या अमेरिका इस तरह की प्रवृत्ति ही विश्व में तनाव पैदा कर रही है। हम आज आतंकवाद और मादक द्रव्यों से विश्व समुदाय को बचाने का प्रयास कर रहे हैं पर इसके के लिये यह जरूरी है कि अपने शब्द ज्ञान का अहिंसक उपयोग करें तभी अन्य को समझा सकते हैं।
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Friday, March 27, 2009

संत कबीर वाणीः अपने विश्वास में बदलाव बनता है तनाव कारण

सौ वर्षहि भक्ति करि, एक दिन पूजै आन
सो अपराधी आत्मा, पैर चौरासी खान

संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि सौ वर्ष तक अपने इष्ट या गुरु की भक्ति करने के बाद एक दिन किसी दूसरे देवी देवता की पूजा कर ली तो समझ लो कि पहले की भक्ति गड़ढे में गयी और अपनी आत्मा ही रंज होने लगती है।
कामी तिरै क्रोधी तिजै, लोभी की गति होय
सलिल भक्त संसार में, तरत न देखा कोय

कामी क्रोधी और लोभी व्यक्ति थोड़ी भक्ति करने के बाद भी इस भवसागर को तैर कर पार कर सकता है पर शराब का सेवन करने वालों की कोई गति नहीं हो सकती।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-एक बार जिस इष्ट की आराधना करना प्रारंभ किया तो फिर उसमें परिवर्तन नहीं करना चाहिये। सभी जानते हैं कि परमात्मा का एक ही है पर इंसान उसे अलग अलग स्वरूपों में पूजता है। जिस स्वरूप की पूजा करें उसमें पूर्ण रूप से विश्वास करना चाहिये। जीवन में उतार चढ़ाव आते रहते हैं पर दूसरों के कहने में आकर इष्ट का स्वरूप नहीं बदलना चाहिये। दरअसल विश्वास में बदलाव अपने अंदर मौजूद आत्मविश्वास का ही कमजोर करता है और हम अपने जीवन में आयी परेशानियों से लड़ने की क्षमता खो बैठते हैं।
अपने देश में जितना भक्तिभाव है उससे अधिक अधविश्वास है। किसी की कोई परेशानी हो तो दस लोग आते हैं कि अमुक जगह चलो वहां के पीर या बाबा तुम्हारी परेशानी दूर कर देंगे और परेशान आदमी उनके कहने पर चलने लगता है और अपने इष्ट से उसका विश्वास हटने लगता है। कालांतर में यही उसके लिये दुःखदायी होने लगता है। इस तरह अनेक प्रकार की सिद्धों की दुकानों बन गयी हैं जहां लोगों की भावनाओंं का दोहन जमकर दिया जाता है। सच बात तो यह है कि जीवन का पहिया घूमता है तो अनेक काम रुक जाते हैं और रुके हुए काम बन जाते हैं किसी सिद्ध के चक्कर लगाने से कोई काम नहीं बनता। इस तरह का भटकाव जीवन में तनाव का कारण बनता है। कोई एक काम बन गया तो दूसरे काम के लिये सिद्ध के पास भाग रहे हैं। इस तरह विश्वास में बदलाव हमारी संघर्ष की भावना का कमजोर करता है।

अपनी जिंदगी में हमेशा एक ही इष्ट पर यकीन करना चाहिये। यह मानकर चलें कि अगर कोई काम रुका है तो उनकी मर्जी से और जब समय आयेगा तो वह भी पूरा हो जायेगा। वैसे जीवन में प्रसन्न रहने का सबसे अच्छा उपाय तो निष्काम भक्ति ही है पर उसके लिये दृष्टा बनकर जीना पड़ता है। यह मानकर चलना पड़ता है कि इस तरह के उतार चढ़ाव जीवन का एक अभिन्न अंग है। साथ में निष्प्रयोजन दया भी करते रहना चाहिये यह सोचकर कि पता नहीं इस देह पर आये संकट के लिये कब कौन सहायता करने आ जाये।
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Wednesday, March 25, 2009

संत कबीर वाणीः मन पर स्वयं सवारी करें, उसे सवार न बनायें

मन के मते न चालिये, मन के मते अनेक
जो मन पर असवार है,सौ साधु कोय एक

संत कबीर कहते हैं कि मन के अनुसार हमेशा मत चला क्योंकि उसमें हमेशा विचार आते रहते हैं। बहुत कम ऐसे लोग ऐसे हैं जिन पर मन सवारी नहीं करता बल्कि वह उस पर सवारी करते हैं। ऐसे ही लोग साधु कहलाते हैं।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य की पहचान उसके मन से है जो उसे चलाता है पर यह गलतफहमी उसे होती है कि वह स्वयं चल रहा है। वैसे बिना मन के कोई मनुष्य तो चल ही नहीं सकता पर अंतर इतना है कि कुछ लोग मन पर सवारी करते हैं और कुछ लोगों पर मन सवार हो जाता है। सामान्य मनुष्य के मन में अनेक इच्छायें जाग्रत होती हैं और वह उनके वशीभूत होकर जीवन भर भटकते हैं। एक पूरी होती है तो दूसरी जाग्रत होती है और फिर तीसरी और चौथी। इच्छा पूरी होने पर मनुष्य प्रसन्न होता है और न पूरी होने पर दुःखी । इस तरह वह जीवन भर अज्ञान के अंधेरे में भटकता है। दूसरे वह लोग होते हैं जो अपने अंदर उत्पन्न इच्छाओं को दृष्टा की तरह देखते हैं। ऐसे लोग साधु कहलाते हैं और वह अपने देह के लिये आवश्यक वस्तुओं को जुटाते हुए अपना जीवन व्यतीत करते हैं पर सुविधा और विलास की वस्तुओं के प्रति उत्पन्न मोह को वह अपने अंदर अधिक देर तक टिकने नहीं देते। ऐसा नहीं है कि उनके मन में उन चीजों को पाने की इच्छा नहीं आती पर वह उनको अनावश्यक समझकर उसे अधिक तवज्जो नहीं देते। वह हर वस्तु के पीछे अंधे होकर नहीं भागते।
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Sunday, March 22, 2009

संत कबीर वाणीः हरिभक्त के हाथ में हुक्का नहीं सुहाता

सुरापान अचवन करै,पिवै तमाखू भंग
कहैं कबीरा राम-जन, ताको करो न संग

संत कबीरदास जी कहते हैं जो शराब का सेवन और तम्बाकू भंग का उपभोग करते हैं ऐसे लोगों की संगत कभी नहीं करना चाहिये भले ही वह राम का नाम लेने वाले हों।
हुक्का तो सोहै नहीं, हरिदासन के हाथ
कहैं कबीरा हुक्का गहैं, ताको छोड़ो साथ

संत कबीरदास जी कहते हैं कि जो भगवान के भक्त हैं उनके हाथ में हुक्का नहीं सुहाता। जो हुक्का या तुंबाकु का सेवन करते हैं उनका साथ छोड़ देना चाहिये।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य को भक्ति और ज्ञानार्जन के लिये इसलिये सक्रिय रहना चाहिये क्योंकि उससे मन में शांति रहती है। मनुष्य का मन ही उसे संचालित करता है। अगर यह मन व्यसनों में लगता है तो फिर उसका गुलाम हो जाता है। फिर भी आदमी अपने आपको दिखाने के लिये भक्ति करता है। इससे उसको शांति नहीं मिलती। लोग मंदिर में जाकर मत्था टेकते हैंं और फिर बाहर निकलते ही तंबाकू, भांग और शराब का सेवन करते हैं।

दूसरी बात तो छोडि़ये मूंह में तंबाकू है और भगवान की भक्ति की बात करते हैं। पास खड़े आदमी को शराब की बदबू आ रही है और शराब है कि अपना अध्यात्मिक ज्ञान सुनाये जा रहा है। इस देश में कई जगह ऐसे साधु मिल जायेंगे जो अपने शिष्यों से चिलम भराते हैं और फिर उसके कल्याण के नाम पर मंत्र आदि जपते हैं। यह सब ढोंग इस देश में बहुत होता है।
अध्यात्मिक ज्ञान से आदमी तभी संपन्न हो पाता है जब वह किसी व्यवसन का शिकार नहीं होता। जब मन ज्ञान और भक्ति मेंं रम गया तो फिर उसे कहीं और लगाने की आवश्यकता ही नहीं होती। अगर भक्ति और ज्ञानार्जन में लगे होने केे बावजूद हमारा मन व्यवसनों की तरह आकर्षित हो तो समझ लेना चाहिये कि हमारे अध्यात्मिक प्रयासों मेें कोई कमी है। इसके अलावा जो तंबाकू,भांग और शराब का सेवन करते हैं उनके साथ कभी भी ंसगत नहीं करना चाहिये। आदमी कितना भी प्रयास करे उसे संग का रंग तो लग ही जाता है।
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