समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढ़ें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका


हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर
Showing posts with label हिन्दू धर्म संदेश. Show all posts
Showing posts with label हिन्दू धर्म संदेश. Show all posts

Friday, November 27, 2015

संसार से भागने वाले वैरागी की अपेक्षा निष्काम वीतरागी श्रेष्ठ-अष्टावक्र गीता के आधार पर चिंत्तन लेख (Sansar se bhage Ragi se Nishkam Veetragi Shreshth-A Hindu Spritualy Thought based on AshtakraGita)

                           हमारे यहां कथित रूप से अनेक ऐसे सन्यासी हैं जो विषयों का त्यागने की बात  तो करते है पर बड़े बड़े आश्रम बनाने के साथ ही भारी मात्रा में संग्रह भी करते हैं। दरअसल वह भारत के स्वर्णिम अध्यात्मिक ज्ञान के विक्रेता की तरह हैं जिनका  समाज में चेतना लाने से अधिक अपना वैभव जुटाना होता। सन्यास सहज नहीं है यह बात श्रीमद्भागवत गीता में कही गयी है।  यही कारण है कि निष्काम कर्म का सिद्धांत प्रतिपादित किया है जिसमें अपनी दैहिक आवश्यकताओं की सीमा तक विषयों में लिप्त रहने का संदेश है।
अष्टावक्रगीता में कहा गया है कि
-----------
हातुमिच्छति संसारं दुःखजिह्यासया।
वीतरागी हि निर्दुःखस्तस्मिन्नपि न खिद्यति।।
हिन्दी में भावार्थ-रागी पुरुष दुःख से बचने के लिये संसार का त्याग करना चाहता है लेकिन वीतरागी दुःखमुक्त होकर विषयों से जुड़कर भी खेद को प्राप्त नहीं होता।
                           यह अंतिम सत्य है कि कोई भी व्यक्ति बिना कर्म किये नहीं रह सकता है। श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया है कि जो आनंद सांख्ययोगी लेना चाहते हैं वह कर्मयोगी विषयों में अनुराग त्याग कर भी प्राप्त कर सकते हैं। गीता में तो सांख्ययोग को अत्यंत कठिन बताया गया है। यहां तक कि सन्यासी होने पर विषयों के चिंत्तन से मुक्त होना कठिन माना गया है। ज्ञानी मनुष्य इतना ही कर सकता है कि जीवन निर्वाह के लिये विषयों में अपने हित की सीमा तक सक्रिय रहकर अनुराग का त्याग कर दे। यही निष्काम कर्म का सिद्धांत है।
------------------

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका

9.हिन्दी सरिता पत्रिका

Saturday, May 25, 2013

ऋग्वेद के आधार पर चिंत्तन-मन में पवित्र संकल्प धारण करें (rigved ke adhar par chinttan-man mein pavitra sankalp dharan karen)

      इस संसार में जो सफल तथा  व्यक्ति प्रसिद्ध हुए हैं उन्होंने अपने लक्ष्य का निर्माण बाल्यकाल में ही कर लिया था। कुछ ने युवा होने पर संकल्प धारण किया पर उनके प्रयास निष्काम होने के साथ ही दृढ़ संकल्प के साथ जुड़े हुए थे। इसलिये वह सफल व्यक्ति कहलाये।  सच बात तो यह है कि अनेक लोग अपने लक्ष्य तथा संकल्प बदलते रहते है। परिणामस्वरूप उनके हाथ कुछ नहीं आता।  इसके अलावा जो लोग  अपने लक्ष्य के साथ कामनाओं की संभावना अधिक ही मन में  रखते हैं, वह भी अधिकतर नाकाम ही होते हैं।  अधिकतर लोग किसी कार्य को पेट पालने या कमाने का लक्ष्य रखकर प्रारंभ करते हैं।  उनके लिये कमाना ही फल है।  ऐसे में उनकी बुद्धि संकीर्ण हो जाती है जिससे व्यापक रूप से कार्य करना संभव नहीं हो पाता।  पहले तो यह समझना चाहिये कि सबका दाता परमात्मा है।  दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम!  मनुष्य को अपना काम यह सोचकर करना चाहिये कि वह तो उसे करना ही है।  बिना काम किये शरीर जर्जर हो ंजाता है।  उस काम से जो उसे भौतिक उपलब्धि होती है वह कोई फल नहीं होता क्योंकि वह तो आगे के काम में व्यय हो जाती है।  नौकरी में वेतन मिले या व्यापार में लाभ हो वह कोई साथ नहीं रखता बल्कि परिवार और अपने पर खर्च करता है। यह उपलब्धि कर्म का विस्तार करती है न कि वह फल है। इसलिये काम अपने हृदय को संतोष देने के लिये करना चाहिये।
 ऋग्वेद में कहा गया है कि
---------------------
आकृतिः सत्या मनसो में असतु।
           हिन्दी में भावार्थ-मन के संकल्प और प्रार्थना सत्य हो।
समाना व आकृतिः  आकूतिः समाना हृदयान वः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसह्यसति।।
            हिन्दी में भावार्थ-मनुष्यों  के संकल्प एक समान रहें और हृदय भी एक समान हों जिससे संगठित होने पर कार्य संपन्न होता है। जब संकल्प, मन और विचार का मेल होता है तब एकता स्वतः हो जाती है।
         दूसरी बात यह कि अपना मेल उन लोगों से करना चाहिये जिनका संकल्प, विचार तथा लक्ष्य समान हो। विपरीत यह प्रथक चाल चलन वाले से संबंध रखने से कोई लाभ नहीं होता।  समान विचाराधारा वाले के साथ चलने पर संगठन बनता है और कोई लक्ष्य आसानी से प्राप्त किया जा सकता है।  जीवन में संकल्प का अत्यंत महत्व है। जिस तरह का संकल्प हम करते हैं वैसा ही वातावरण हमारे सामने आता है।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Thursday, May 23, 2013

विदुर नीति के आधार पर चिंत्तन-कष्ट से पाया धन व्यर्थ (vidur neeti darshan-kasht se prapat dhan vyarth)



          मनुष्य जीवन को धारण करने वालों के मन मस्तिष्क में  यह भ्रम रहता कि वह केवल धनर्जान करने के लिये ही पैदा हुए हैं।   संसार के अधिकतर मनुष्य  धन को ही सत्य मानते हैं।  धन कमाने के बाद  उसके व्यय का प्रदर्शन कर समाज में अपनी श्रेष्ठता साबित करने का मोह कोई नहीं छोड़ पाता। हमारे देश में धर्म तथा  समाज के नाम पर ऐसी परम्पराएं  बनायीं गयी हैं जिनका निर्वाह बिना धन के संभव नहीं हो सकता।  पुत्र  के लिये व्यवसाय तथा पुत्री के लिये वर ढूंढते हुए हमारे देश के अधिकतर लोगों का जीवन ही निकल जाता है।  हमारे देश के लोगों में धन संचय की प्रवृत्ति इतनी गहरी है कि आधुनिक समय में चालाक बुद्धिमानों के लिये उनके साथ  ठगी करना आसान हो गया है। 
         देश भर में अनेक चिटफंड कंपनियां यह काम इस तरह कर रही है कि लोग अपनी सारी जमा पूंजी उनके पास जमा कर आते हैं।  अधिक व्याज का लोभ लोगो के लिये संकट का कारण तब बनता है जब उनका मूल धन भी हाथ से निकल जाता है।  पीड़ित लोग अधिकतर अपने पृत्र के व्यवसाय या नौकरी तथा बेटी की शादी के लिये धन जमा करने की बात कहते है।  हमारे यहां विवाह तथा मृत्यु के अवसर पर जितनी नाटकबाजी होती है वह धन से ही संभव है।  यही कारण है कि भारत में लोग बच्चों के भविष्य के लिये अधिक से अधिक संचय करते हैं। इतना ही नहीं अपने बुजुर्गों की मृत्यु पर उनके दाह संस्कार के बाद भोज के प्रबंध का जिम्मा भी उन पर रहता है।  समाज में अपनी कथित छवि बचाये रखने के लिये भारत के लिये हर आम आमदी जूझता रहता है।  हमारे देश में सीध सच्चे धंधे में अधिक धनवान होने के अवसर करीब करीब बंद कर दिये गये हैं, जिसका परिणाम यह हुआ है कि अपने पास मौजूद धन की वृद्धि के लिये ऐसे ठगों के जाल में आमजन  आसान से फंस जाते हैं।
                      विदुरनीति में कहा गया है कि
                                       -----------------
            अतिक्लेशेन येऽर्याः स्युर्धर्मस्यातिक्रमेश वा।
            अरेवां प्रणपातेन मा स्म तेषु मनकृथाः।।
        हिंदी  में भावार्थ-जिस धन को अर्जित करने में मन तथा शरीर को अत्यंत क्लेश हो, धर्म का उल्लंघन  करना पड़े या फिर शत्रु के सामने अपना सिर झुकाने की बाध्यता उपस्थित हो, उसे प्राप्त  करने का विचार ही त्याग देना श्रेयस्कर है।
                          
            सहस्त्राणिऽपि जीवन्ति जीवन्ति शतिनानथा।
            धृतराष्ट्र निमुंचेच्छां न कथंचिन्न जीव्यते।
       हिन्दी में भावार्थ-जिनके पास हजार है वह जिंदा रहते हैं पर जिनके पास सौ वह भी जिंदा  रहते हैं। धन का लोभ छोड़ने वाले लोग भी हर हालत में अपना जीवन धारण किये रहते ही  हैं।
        हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार  जिस जीव में परमात्मा ने प्राणवायु प्रवाहित की है माया उसकी सेवा करने के लिये बाध्य है। कहा भी जाता है कि जिसने पेट दिया है वह दाना भी देगा।  परमात्मा की दासी माया है न कि उसकी स्वामिनी।  यह भी कहा जाता है कि जिसके भाग्य में माया का जितना भाग आना लिखा है उतना ही मिलेगा। इसके बावजूद धर्मभीरुता का दावा करने वाले हमारे भारतीय समाज के अधिकांश लोगों  को इस पर विश्वास नहीं है। श्रीमद्भागवत गीता से कथित रूप से कर्मप्रेरणा मिलने का दावा करने वाले यहां अनेक लोग मिल जायेंगे पर यह कोई नहीं समझ पाया कि उसमें निष्कर्म की बात कही गयी है न कि सकाम कर्म का सिद्धांत स्थापित किया गया है।  स्थिति यह है कि लोग धन के लिये देह तथा मन को भारी संताप देने के लिये तैयार हो जाते हैं। अपने ही धन के शत्रुओं की चिकनी चुकडी बातों में आकर उसे सौंप देते हैं।  परिणाम यह है कि बाद में जब धोखा मिलता है तो सिवाय आर्तनाद करने के अलावा उनके पास कोई दूसरा विकल्प् नहीं रहता। 
         अतः अपने नियमित स्वाभाविक कर्म करते हुए परमात्मा का स्मरण ही करते रहना चाहिये।  संसार के विषयों का चक्र माया की कृपा से चलता ही रहता है।  उसमें एक दृष्टा की तरह शामिल होना चाहिये। समय आने पर सारे काम हो जाते हैं यह विश्वास धारण कर जीवान आनंद से बिताना चाहिये।   

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Sunday, May 19, 2013

अथर्ववेद से संदेश-देह और मन को शुद्ध रखने वाला मनुष्य पीड़ाओं से दूर रहता है (atharvaved se sandesh-shariri aur man ko shuddh rakhane wala peedaon se door rahataa hai

           इस संसार में प्रत्येक मनुष्य को संघर्ष करना ही पड़ता है।  इस  संघर्ष में जय पराजय का आधार मनुष्य के अंदर विद्यमान शारीरिक और मानसिक क्षमतायें होती हैं।  जिनका संकल्प दृढ़ होने के साथ हृदय  में कर्म करने से प्रतिबद्धता है वह व्यक्ति हमेशा ही सफल होता है।  यह बात कहने में अत्यंत सहज लगती है पर इसका व्यवहारिक पहलू यह है कि हमें अपने जीवन में ऐसी दिनचर्या अपनाना चाहिये जो शारीरिक तथा मानसिक शक्ति में वृद्धि करने में सहायक  हो।  जीवन में न केवल शारीरिक शक्ति का होना आवश्यक है बल्कि उसके साथ मनुष्य को मानसिक रूप से भी शक्तिशाली होना चाहिए।
            हमारे अध्यात्मिक दर्शन में ब्रह्म मुहूर्त में उठना जीवन के लिये सबसे ज्यादा उत्तम माना जाता है।  हमारे महान पूर्वजों ने जिस अध्यात्मिक ज्ञान का संचय किया है वह सभी प्रातःकाल उठने को ईश्वर की सबसे बड़ी आराधना माना जाता है। इससे तन और मन में शुद्धता रहती है।  प्रातःकाल का समय धर्म का माना जाता है और इस दौरान योगासन, ध्यान और मंत्रजाप कर स्वयं को अध्यात्मिक रूप से दृढ़ बनाया जाना आवश्यक है। 
अथर्ववेद  में कहा गया है कि 
व्यार्त्या पवमानो वि शक्रः पाप हत्यथा।।
           हिन्दी में भावार्थ- तन और मन में शुद्धता रखने वाला मनुष्य पीड़ाओं से दूर रहता तो पुरुषार्थी दुष्कर्म करने से बचता है।
ओर्पसूर्यमन्यातस्वापाव्युषं जागृततादहमिन्द्र इवारिष्टो अक्षितः।
             हिन्दी में भावार्थ- दूसरे लोग भले ही सूर्योदय तक सोते रहें पर शूरवीर सदृश नाश और क्षय रहित होकर समय पर जागे।
      जब देह और मन में शुद्धता होती तब आदमी स्वयं ही सत्यकर्म के लिये प्रेरित होता है।  पुरुषार्थी मनुष्यों को सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि वह पाप कर्मों पर कभी नहीं विचार करते। आजकल हम समाज में जो अपराध की बढ़ती प्रवृत्ति देख रहे हैं उसके पीछे दो ही प्रकार के लोग जिम्मेदार दिखाई देते हैं। एक तो वह लोग जिनके पास कोई काम नहीं है यानि वह बेकार है दूसरे वह जिनको काम करने की आवश्यकता ही नहीं है यानि वह निकम्मे हैं।  यह बेकार और निकम्मे ही मिलकर अपराध करते हैं।  हम जब जब सभ्य समाज की बात करते हैं तो वह पुरुषार्थी लोगों के कंधों पर ही निर्भर करता है। हृदय में शुद्ध और देह में दृढ़ता होने पर कोई भी लक्ष्य आसानी से प्राप्त किया जा सकता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Wednesday, March 21, 2012

चाणक्य नीति-पैसेवालों को ही समाज इज्ज़तदार समझता है (chankya policy-richman alwvays popular in society)

                  श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार तत्वज्ञानी इस संसार में अधिक नहीं होते। सामान्य सांसरिक जीवन तो केवल धन के आधार पर ही चलता है। इसलिये सामान्य मनुष्यों से यह आशा करना एकदम व्यर्थ है कि कि लोग गरीब मगर गुणी आदमी का सम्मान करें। अधिकतर लोग अपनी भौतिक आवश्यकताओं को लेकर परेशान रहते हैं। कई लोग तो उधार की आशा में साहुकारों की चाटुकारिता करते है कि उन्होंने उनसे उधार लिया है या फिर भविष्य में उससे लेना पड़ सकता है। हमेशा ही धन की चाहत में लगे लोगों के लिये धनवान और महल आकर्षण का केंद्र बने रहते हैं। यही कारण है कि समाज का नियंत्रण स्वाभाविक रूप से धनिकों के हाथ में रहता है।
                                   चाणक्य नीति में कहा गया है कि
                                            -----------------------
                      यस्याऽर्थातस्थ्य मित्राणि यस्याऽर्थास्तस्य बान्धवाः।
                           यस्याऽर्थाः स पुमांल्लोकेयस्याऽर्था स च पंडितः।।
                  ‘‘यह इस सांसर के समस्त समाजों का सच है कि जिसके पास धन है उसके बंधु बांधव बहुत है। उसे विद्वान और सम्मानित माना जाता है। यहां तक कि अगर व्यक्ति के पास धन अधिक हो तो उसे महान ज्ञानी माना जाता है।’’
                         स्वर्गस्थितनामिह जीवलोके चत्वारि चिह्ननि वसन्ति देहे।
                        दानप्रसङ्गो मधुरा च वाणी देवाऽर्चनं ब्राह्मणतर्पणं च।।
                 "स्वर्ग से इस धरती पर अवतरित होने वाले दिव्य चार गुण पाये जाते हैं-दान देना, मधुर वचन बोलना देवताओं के प्रति निष्ठा तथा विद्वानों को प्रसन्न करना।’’
                     ऐसे में अल्पधनियों को कभी इस बात की चिंता नहीं करना चाहिए कि उनका हर आदमी सम्मान करे। उन्हें अपने सात्विक गुणों का विकास करना चाहिए। मूल बात यह है कि हम अपनी दृष्टि में बेहतर आदमी बने रहें। श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान दूसरों के सामने बघारना आसान है पर उसे धारण कर अपनी जीवन की राह पर चलना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण का गीता में दिया गया संदेश दूसरों को सुधारने की बजाय स्वयं का चेहरा दर्पण में देखने को प्रेरित करता है। वैसे हम धनी हों या अल्पधनी दूसरों से सच्चे सम्मान की अपेक्षा नहीं करना चाहिए। आम मनुष्यों के हृदय में दूसरों के लिये सम्मान की भावना कम ही रहती है। धनिक होने से भले ही समाज सम्मानीय और ज्ञानी माने पर इस कारण अपने स्वाभाविक गुणों का त्याग कर उसका पीछा नहीं करना चाहिए।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की धर्म संदेश पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका
6.दीपक भारतदीप की हिन्दी एक्सप्रेस-पत्रिका
7.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Tuesday, March 13, 2012

पतंजलि योग विज्ञान-हिंसा के भाव से रहित आदमी आनंद से रहता है (hinsa se rahit manusya anand se rahta hai-patanjali yog vigyan or scince)

             अहिंसा एक स्थाई भाव है जिसमें स्थित मनुष्य न केवल स्वयं आनंदपूर्वक जीवन व्यतीत करता है वरन समाज में लोकप्रिय होता है।  श्रीमद्भागवत गीता में बताया गया है कि इस संसार के सारे पदार्थ परमात्मा के संकल्प के आधार पर स्थित पर वह उनमें नहीं है। यहां इस बात को स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है कि इस संसार के देहधारी जीव के संकल्प से गहरा संबंध है क्योंकि वह अंततः उसी परमात्मा का अंश हैं। इसलिये जीव भले ही इस संसार और भौतिक पदार्थों को धारण करे वह उसमें अपना भाव लिप्त न करे। हम अगर योग साधना और ध्यान करने के साथ श्रीमद्भावगत गीता का अध्ययन करें तो धीरे धीरे यह बात समझ में आने लगेगी कि यह संसार की प्रकृति और इसमें स्थित समस्त पदार्थ न बुरे हैं न अच्छे, बल्कि वह हमारे संकल्प के अनुसार कभी प्रतिकूल तो कभी अनुकूल होते हैं। इसलिये हम अपने हृदय के अंदर अहिंसा, त्याग, तथा परोपकार के संकल्प धारण करें तो यह सारा संसार और पदार्थ हमारे अनुकूल हो जायेंगे। 
पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
--------------------
 
अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः।
           ‘‘हृदय में अहिंसा का भाव जब स्थिर रूप से प्रतिष्ठ हो जाता है तब उस योगी के निकट सब प्राणी वैर का त्याग कर देते हैं।
अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम्।
‘‘हृदय जब चोरी के भाव से पूरी तरह रहित हो जाता है तब उस योगी के समक्ष सब प्रकार के रत्न प्रकट हो जाता है।’’
          अधिकतर लोग यह तर्क देते हैं कि यह संसार बिना चालफरेब के चल नहीं सकता। यह लोगों की मानसिक विलासिता और बौद्धिक आलस्य को दर्शाता है। एक तरह से यह मानसिक विकारों से ग्रसित लोगों का अध्यात्मिक दर्शन से परे एक बेहूदा तर्क है। हम यह तो नहीं कहेंगे कि सारा समाज ही मानसिक विकारों से ग्रसित है पर अधिकतर लोग इस मत के अनुयायी हैं कि जैसे दूसरे लोग चल रहे हैं वैसे ही हम भी चलें। कुछ लोग ऐसे जरूर हैं जो इस सत्य को जानते हैं और अपने देह, हृदय तथा मस्तिष्क से विकारों की निकासी कर अपना संकल्प शुद्ध रखते हुए अपना जीवन शांति  से जीते हैं। ऐसे लोग संख्या में नगण्य होते हैं पर समाज के लिये वही प्रेरणास्त्रोत होते हैं।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Wednesday, February 22, 2012

विदुर नीति-अमीर में दान तथा गरीब में कष्ट सहन करने की शक्ति हो (vidur neeti-amir aur garib ke shakti)

                  फिल्म और टीवी धारावाहिकों पर अनेक तरह के ऐसे कार्यक्रम प्रसारित होते हैं जिनकी कहानियों का कोई सिर पैर नहीं होता। स्थिति यह है कि टीवी में धनाढ्य वर्ग की पृष्ठभूमि पर आधारित कार्यक्रमों में उनके सानिध्य में पल रहे नौकर पात्रों की वेशभूषा भी अत्यंत महंगी होती है। कई बार तो ऐसा होता है कि किसी पात्र को अपनी जिंदगी से परेशान हाल दिखाया जाता है पर उसके हर पल बदलते कपड़े इस बात को प्रमाणित नहीं करते कि वह वाकई परेशान हाल समाज का प्रतिबिंब है। यह अलग बात है कि यह सब दिखाने वाले साहित्य को समाज का दर्पण बताते हुए अपनी कहानियों के प्रमाणिक होने का दावा करते हैं। हमारे देश के अनेक अभिनेता गरीब से उठकर अमीर बनने की कहानियों को अपने नायकत्व से सुसज्जित कर महानायक बन गये हैं। अनेक तो शताब्दी के नायक और महानायक की छवि बना चुके हैं। मगर यह सब कल्पित कहानियों के पात्र हैं। उनमें समाज की सत्यता देखना स्वयं को तकलीफ देना है।
          समाज का सच यह है कि हमारे यहां जड़तावाद फैला है। वंशवाद इस तरह बढ़ा है कि कोई विरला ही होता है जो अपने बल, पराक्रम तथा कौशल से शून्य से शिखर पर पहुंचता है। चाटुकारिता की वजह से बस इतनी सफलता मिलती है कि शिखर पुरुष की चरणवंदना करते हुए समाज देख सकता है। कहने का अभिप्राय यह है कि हम प्रचार माध्यमों में जिस तरह का वातावरण देखते हैं वह प्रायोजित है और आम इंसान का ध्यान बंटाने के लिये है जिससे वह विद्रोह की प्रवृत्तियों से दूर रहे और समाज यथारूप से स्थित रहे। भौतिक परिवर्तन आयें पर उससे शिखर पुरुषों के परिवार की रक्षा होती रहे।
               विदुर नीति में कहा गया है कि
               --------------
              द्वाविमौ कपटकी तीक्ष्णौ शरीरपरिशोधिणौ।
                 यश्चाधनः कामयते यश्च कुप्यस्यनीश्वरः।।
              ‘‘गरीब मनुष्य जब अपने पास उपलब्ध धन से अधिक मूल्यवान वस्तु की कामना करता है और अस्वस्थ या कमजोर होने पर क्रोध की शरण लेता है तब वह अपने ही शरीर को सुखाने का काम करता है।’’
               द्वावम्भसि निचेष्टच्यौ गलै बध्वा दृढां शिलाम्।
            धनवन्तमदातारं दरिद्र चापस्विनम्।।
          ‘‘मनुष्य धन होने पर दान न करे और गरीब होने पर कष्ट सहन न कर सके उसे गले में पत्थर मजबूत पत्थर बांधकर पानी में डुबा देना चाहिए।’’
           इसलिये जहां तक हो सके मनोरंजन के लिये बने इस तरह के कार्यक्रम देखें पर उनको दिल और दिमाग में इस तरह न स्थापित होने दें कि पूरा समय कल्पना में खोकर अपना जीवन नष्ट कर डालें। मूल बात यह है कि हमें अपने चरित्र पर दृढ़ रहना चाहिए। अपने अंदर यह आत्मविश्वास होना चाहिए कि जैसी भी स्थिति हमारे सामने आयेगी उससे निपट लेंगे। यह दुनियां पल पल रंग बदलती है और अगर कभी भूख है तो कभी रोटी का अंबार भी लग सकता है। कभी प्यास है तो सामने शीतल जल का तालाब भी आ सकता है। इसलिये छल, कपट या चाटुकारिता से सफलता प्राप्त कर अपने लिये संकट को आमंत्रण नहीं देना चाहिए।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, February 18, 2012

यजुर्वेद से संदेश-अज्ञान की छाया में रहने वाले केवल बातें करते हैं (yajurved se sandesh-agyan ki chhaya mein rahane wale kewal bataen karte hain)

         हमारे देश में धर्म प्रचार की परंपरा है जो कि आमतौर से सत्संग और प्रवचनों के रूप में दिखाई देती है।  इसका लाभ देश के व्यवसायिक बुद्धिमानों ने इस तरह उठाया कि संत और सेठ का अंतर ही नहीं दिखाई देता। प्राचीन ग्रंथों के स्वर्णिम तत्व ज्ञान को रटने वाले गेरुए या सफेद वस्त्र पहनकर उनका प्रवचन करते हैं।  उन्होंने उसे धारण कितना किया है यह केवल ज्ञानी ही समझ सकते हैं। 
   हमारे देश का अध्यात्म ज्ञान अनेक ग्रंथों में वर्णित है। इन ग्रंथों में सकाम तथा निष्काम दोनों प्रकार की भक्ति के सिद्धांतों का प्रतिपादन किया गया है। कर्म और फल के नियमों का उल्लेख किया गया है। यह अंतिम सत्य है कि हर मनुष्य को अपने ही कर्म का फल स्वयं भोगना पड़ता है। कोई व्यक्ति भी किसी की नियति और फल को बदल नहीं सकता। यह अलग बात है कि समस्त ग्रंथों का अध्ययन करने के बावजूद अनेक लोग उसका ज्ञान धारण नहीं कर पाते पर सुनाने में सभी माहिर हैं।
        हमारे देश का तत्वज्ञान प्रकृत्ति और जीवन के मूल सिद्धांतों पर आधारित एक विज्ञान है। इस संबंध में हमारे अनेक प्राचीन ग्रंथ पठनीय है। यह अलग बात है कि उनका रटा लगाने वाले अनेक लोग अपने आपको महान संत कहलाते हुए मायापति बन जाते हैं। उनके आश्रम घास फूस के होने की बजाय पत्थर और सीमेंट से बने होते हैं। उसमें फाइव स्टार होटलों जैसी सुविधायें होती हैं। गुरु लोग एक तरह से अपने महल में महाराज की तरह विराजमान होते हैं और भक्तों की दरबार को सत्संग कहते हैं। तत्वज्ञान का रट्टा लगाना उसे दूसरों को सुनाना एक अलग विषय है और उसे धारण करना एक अलग पक्रिया है।
               इस विषय पर यजुर्वेद में कहा गया है कि
               --------------------
            नीहारेण प्रवृत्त जल्प्या चासुतृप उम्थ्शासरचरन्ति
‘‘जिन पर अज्ञान की छाया है जो केवल बातें बनाने के साथ ही अपनी देह की रक्षा के लिये तत्पर हैं वह तत्वज्ञान का प्रवचन बकवाद की तरह करते हैं।’’
        तत्वज्ञानी वह नहीं है जो दूसरे को सुनाता है बल्कि वह है जो उसे धारण करता है। किसी ने तत्वज्ञान धारण किया है या नहीं यह उसके आचरण, विचार तथा व्यवहार से पता चल जाता है। जो कभी प्रमाद नहीं करते, जो कभी किसी की बात पर उत्तेजित नहीं होते और सबसे बड़ी बात हमेशा ही दूसरे के काम के लिये तत्पर रहते हैं वही तत्वाज्ञानी हैं। सार्वजनिक कार्य के लिये वह बिना आमंत्रण के पहुंच कहीं भी मान सम्मान की परवाह किये बिना पहंच जाते हैं और अगर कहीं स्वयं कोई अभियान प्रारंभ करना है तो बिना किसी शोरशराबे के प्रारंभ कर देते हैं। लोग उनके सत्कर्म से प्रभावित होकर स्वयं ही उनके अनुयायी हो जाते हैं।
        इसके विपरीत अज्ञानी और स्वार्थी लोग तत्वज्ञान बघारते हैं पर उसे धारण करना तो दूर ऐसा सोचते भी नहीं है। किसी तरह अपने प्रवचन करते हुए आम लोगों को भ्रम में रखते हैं। वह उन कर्मकांडों को प्रोत्साहित करते हैं जो सकाम भक्ति का प्रमाण माने जाने के साथ ही फलहीन माने जाते हैं। अतः जिन लोगों को अध्यात्म में रुचि है उनको अज्ञानी और अज्ञानी की पहचान उस समय अवश्य करना चाहिए जब वह किसी को अपना गुरु बनाते हैं।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Thursday, January 26, 2012

चाणक्य नीति-स्नेह दुःख का मूल कारण है (chankya neeti(sneh dukh ka mool karan)

                 जीवन जीना एक ऐसी कला है जिसे भारत के अध्यात्मिक ज्ञानियों तथा मनीषियों ने बड़े शोध के साथ प्रस्तुत किया है। अधिकतर लोग सन्यास का अथ संसार की दैनिक गतिविधियों के त्याग को समझते हैं जबकि श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार वह एक ऐसी मानसिक स्थिति है जिसमें मनुष्य आसपास के वातावरण से अपने हृदय के भाव को प्रथक रखता है। वह निर्लिप्त होकर संसार में दृष्टा की तरह रहता है। ज्ञानी आदमी अपनी दिनचर्या भी सामान्य ढंग से संपन्न करता है पर वह भावनात्मक रूप से किसी भी वस्तु, विषय या व्यक्ति के प्रति संवदेनशील नहीं होता। वह दया करता है पर निष्प्रयोजन, मित्रता निभाता है पर कामनाओं से रहित होकर और अपने कर्म किसी भी प्रकार के फल की इच्छा त्याग का त्याग भी कर देता है। देखा जाये तो दुःख सुख मन की स्थिति है। जहां कामना है वहां निराशा है यहां काम है वहां क्रोध है और जहां अहंकार है वहां तनाव है। इस स्थिति को ज्ञानी लोग जानते है।
                                 आचार्य चाणक्य कहते हैं कि
                                      ------------------
                              त्वजेद्धर्म दयाहीनं विद्याहीनं गुरुं त्यजेत्।
                               त्यजेत्कोधुमुर्खी भार्या निःस्नेहान् बानधवांस्त्येजेत्।।
                    ‘‘जिस धर्म में दया का गुण न हो, जिस गुरु में विद्या न हो तथा जिस स्त्री में स्नेह न हो उसका त्याग करना ही श्रेयस्कर है।’’
                        यस्य स्नेहो भयं तस्य स्नेहो दुःखस्य भाजनम्।
                        स्नेहामूलानि दुःखानि तानि त्यक्त्वा वसेत्सुखम्।।
              ‘‘स्नेह ही भय और दुःख का कारण है। स्नेह को त्यागकर ही मनुष्य सुखी रह सकता है।’’
                      हतं ज्ञानं क्रियाहीनं हतश्चाऽज्ञानतो नरः।
                       हर्त निर्नायकं सैन्यं स्त्रियो नष्ट ह्यभर्तृकाः।।
              ‘‘ज्ञान रहित आचरण, अज्ञानी पुरुष का जीवन तथा सैन्य विहीन सेनापति तथा स्वामीहीन स्त्री का नाश अतिशीघ्र हो जाता है।
          मूल कारण है किसी भी व्यक्ति, विषय या वस्तु के प्रति मोह, स्नेह और लोभ! खासतौर से जहां हम किसी दूसरे व्यक्ति के प्रति स्नेह मन में रखते हुए उसके हित की कामना करते हैं। वह पूरी न होने पर निराशा हाथ लगती है। अनेक बार ऐसा भी होता है कि हम स्नेह या आदरवश दूसरे का हितकर उपक्रम करते हैं पर वह फिर भी अपना द्वेषभाव नहीं त्यागता। कुछ स्नेहीजन तो अपने अधिकार का वास्ता देकर काम करने के लिये दबाव बनाते हैं। सज्जन लोग इस स्थिति का सामना नहीं कर पाते। यह अलग बात है कि वह इसकी वजह से उनको केवल तनाव ही झेलना पड़ता है। हमें अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। गृहस्थ जीवन में अपने साथ रह रहे परिवार के सदस्यों को सहयोग करना चाहिए पर उनसे किसी भी प्रकार की अपेक्षा करना स्वयं को तनाव में लाना है। यह बात समझनी चाहिए।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की धर्म संदेश पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका
6.दीपक भारतदीप की हिन्दी एक्सप्रेस-पत्रिका
7.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Friday, December 30, 2011

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-उपेक्षासन कर आनंद लें (kautilya ka arthshastra-upekshasan ka anand-economics of kautilya)

               आज के युग में इस तरह के आसन का विशेष महत्व है। पहले तो छोटे राज्यों की वजह युद्ध आमतौर से होते थे पर आधुनिक लोकतंत्र प्रणाली से राज्यों स्वरूप बृहद बन जाने से युद्धों की आशंका समाप्त कर दी है। जब भौतिकवाद में डूबे विश्व समाज के लोग अहंकार और मद में एक दूसरे को नीचा दिखाने में लगे हों और उनसे बहस करने का कोई परिणाम नहीं निकलता हो तब ज्ञानी आदमी के लिये उपेक्षासन एक तरह से ब्रह्मास्त्र की तरह काम कर सकता है। आपसी वार्तालाप में लोग भौतिक साधनों की चर्चा करते हुए अपनी उपलब्धियों का बखान करने से नहीं चूकते। टीवी चैनलों और समाचार पत्रों के साथ इंटरनेट में बाज़ार के विज्ञापनों से प्रेरित होकर उपभोग संस्कृति को बढ़ावा दिया जा रहा है। ऐसे में हमें अपने मन को ऐसी चर्चाओं से मन व्यथित करने की बजाय सात्विक विषयों की तरफ अपना ध्यान ले जाना चाहिए। यह अलग बात है कि इस तरह उपेक्षासन करने पर लोग आपको पौंगापंथी समझें पर सच बात यह है कि इससे आपको आराम मिलेगा। जिस तरह मोर नाचने के बाद अपने गंदे पांव देखकर रोता है उसी आजकल लोग नववर्ष, वैलंटाईन डे तथा अन्य पाश्चात्य पर्व आने पर नाच गाकर और गलत सलत खाकर एंजॉयमेंट यानि आंनद करने का पाखंड करते हैं पर उसके बाद फिर जिंदगी के तनाव उनको घेरकर अधिक दुख देते हैं। पैसा खर्च होने के साथ ही शरीर टूटता है सो अलग।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
----------------------
आस्त प्रेक्ष्यारिमधिकमुपेक्षासनमुच्यते।
उपेक्षा कृतवानिन्द्र पारिजातग्रहं प्रति।।
              ‘‘जब कोई मनुक्ष्य अपने शत्रु या विरोधी को अपने से अधिक जानकर उसके प्रति उपेक्षा का भाव दिखाता है तब उसे उपेक्षासन कहा जाता है। जब भगवान श्रीकृष्ण ने सत्यभावा के लिये स्वर्ग से कल्पवृक्ष उठा लिया तो देवराज ने अपनी शक्ति को कम मानते हुए उसे युद्ध करने की बजाय उपेक्षासन किया था।"
उपेर्क्षितत्स चान्येस्तु कारणेनेह केन चित्त।
आसनं रुक्मिण इव तदुपेक्षासनं स्पुतम्।।
               ‘‘उसी तरह जिस समय रुक्मणी के भाई रुक्मी ने जब कृष्ण के साथ युद्ध में किसी ने सहायता की तो वह उपेक्षासन कर बैठ गया।’’
                 दरअसल आजकल हम चारों तरफ धन के सहारे फैल रहे आकर्षक वातावरण को देखकर अपने मन में अनेक तरह के सपने पाल लेते हैं। खासतौर से आजकल के मध्यम तथा निम्नवर्गीय युवा फिल्म, इंटरनेट तथा पत्रिकाओं में भौतिकतावाद के चलते आकर्षक संसार के उपभोग का जो सपना देखते हैं वह सभी के लिये साकार होना संभव नहीं है। जिनको विरासत में धन मिलता है वह तो चहकते हैं पर जिनको अपनी रोजी रोटी कमाने के लिये ही संघर्ष करना पड़ता है उनके लिये अपने अभावों का मानसिक तनाव झेलने के अलावा अन्य मार्ग नहीं रह जाता। ऐसे में कुछ युवा बहककर अपराध की तरफ बढ़ जाते हैं। उनके लिये बचने का तो बस यह एक ही मार्ग है कि वह भौतिक संसार के आकर्षण के प्रति उपेक्षासन कर जीवन का आनंद लें।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की धर्म संदेश पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका
6.दीपक भारतदीप की हिन्दी एक्सप्रेस-पत्रिका
7.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Monday, December 12, 2011

रहीम के दोहे-बड़े आदमी की अनुचित बात नहीं माननी चाहिए

             आधुनिक युग में भौतिकतवाद ने अनेक ऐसे प्रायोजित नायकों को स्थापित किया है जो धर्म, कला, साहित्य, समाज तथा आर्थिक जगत के शिखर पर पहुंचकर लोगों को सिखाने लगते हैं कि जीवन कैसे जिया जाये? वह वस्तुओं का विज्ञापन करते हैं तो समाज की व्यवस्था में भी अपना दखल इस तरह देते हैं कि जैसे उन जैसा महाज्ञानी कोई न हो। यह प्रायोजित नायक अगर वस्तुओं के उत्पादों का विज्ञापन करते हैं तो समाज पर नियंत्रण करने वाले ठेकेदारों के साथ खड़े होकर उनको लोगों पर नियंत्रण करने में भी सहायक बनते हैं। आकर्षण तथा विश्वास के जाल में फंसा आम जनमानस अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव में अच्छे बुरे की पहचान नहीं कर पाता। यही कारण कि आजकल के युवा गीत, संगीत तथा नृत्य के जाल में फंसा है। अभी हाल ही में एक तमिल अंग्रेजी मिश्रित कोलेवरी डी को हिन्दी भाषी क्षेत्रों में भारी लोकप्रियता हासिल हुई। शब्द किसी के समझ में नहीं आते पर संगीत पर ही लोग थिरक रहे हैं। एक प्रेमिका से निराश प्रेमी के शब्दों को समझे बिना केवल संगीत की धुन पर थिरकना इस बात का प्रमाण है कि लोग आत्मज्ञान से इतने परे हैं कि उन्हें उछलकूद की जिंदगी जीकर मन बहलाना पड़ रहा है।
कविवर रहीम के अनुसार
--------------
अनुचित वचन न मानिए, जदपि गुराइस गाढ़ि।
है ‘रहीम’ रघुनाथ तें, सुजस भरत को बाढ़ि।।
              ‘‘कितना भी बड़ा आदमी क्यों न हों उसकी गलत बात नहीं मानिए भले ही वह कितनी भी महत्वपूर्ण क्यों न हो। भगवान श्री राम ने अपने पिता की बात मानते हुए वनगमन किया पर फिर भी उनसे अधिक यश उस भरत को प्राप्त हुआ जिन्होंने मां की आज्ञा ठुकराकर राज्य त्याग दिया।’’
‘‘अब ‘रहीम’ मुश्किल बढ़ी, गाढ़े दोऊ काम।
सांचे से तो जग नहीं, झूठे मिलें न राम।।
‘‘दुनियां में दो महत्वपूर्ण काम एकसाथ करना अत्यंत कठिन है। सच का साथ लो तो जग नहीं मिलता और झूठ बोलो तो परमात्मा से साक्षात्कार नहीं हो पाता।
         आत्म ज्ञान के अभाव झूठ का इतना बोलबाला हो गया है कि लोग यह सोचकर चलते हैं कि भगवान उनके दुष्कर्मों को नहीं देख रहा है। धर्म और अध्यात्म का प्रचार करने वाले लोग पर्दे के पीछे विलासिता का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। स्वयं कभी परमात्मा का स्वरूप जो लोग समझ नहीं पाये वह दूसरों को समझा रहे हैं। जीवन की सच्चाई यह है कि अगर सत्य की राह चलो तो लोग साथ नहीं होते। जब लोग साथ होते हैं तो वह असत्य की राह पर चलने को विवश करते हैं ऐसे में शुद्ध भाव से भक्ति अत्यंत कठिन है। शुद्ध भाव से भक्ति न होने पर मन को शांति नहीं मिलती। यही कारण है कि आज आधुनिक साधनों से सुसज्तित आदमी के मन में भी शांति नहीं है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की धर्म संदेश पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका
6.दीपक भारतदीप की हिन्दी एक्सप्रेस-पत्रिका
7.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Sunday, December 4, 2011

संत दरिया के दोहे-बगुला और हंस का रंग एक पर प्रकृति अलग है (sant dariya ke dohe-bagula aur hans)

               वर्तमान युग भौतिकतावाद के चरम पर पहुंच गया है। धन संचय, संपदा सृजन और वस्तुओं के संग्रह के साथ ही आमजनों में अपने लिये सुविधाऐं पाने की अंधी दौड़ लगी हुई है। आदमी अपने हृदय में व्याप्त अंधेरे से भागता हुआ बाहर रौशनी ढूंढ रहा है। अज्ञानी लोग अपने मन के वश सांसरिक उपलब्धियों को पचा नहीं पा रहे। आदमी एक वस्तु पाने का लक्ष्य प्राप्त करता है तब भी उसकी बेचैनी खत्म नहीं होती। उससे जल्दी बोर हो जाता है फिर दूसरी के लिये भागता है। भक्ति, योग साधना और परमात्मा के नाम जाप को वृद्धावस्था की विषय समझा जाता है। परिणाम यह है कि समाज में तनाव और वैमनस्य बढ़ रहा है। तत्वज्ञान से परे होकर समाज ऐसा सुख ढूंढ रहा है जिसकी प्राप्ति संभव नहीं है।
संत दरिया कहते हैं कि
---------------
बाट खुली जब जानिये, अंतर भया उजास।
जो कुछ थी सो ही बनीं, पूरी मन की आस।
‘‘हृदय में उजाला हो तभी मार्ग को खुला समझें। उसके बाद जब तत्वज्ञान होने पर संतोष का भाव आने से मनुष्य अपनी आवश्यकतायें और आशाऐं सीमित कर लेता है। इसलिये मन की सभी आशायें स्वतः पूरी हो जाती है।’’
‘‘दरिया’ बगुला ऊजला, उज्जवल ही होय हंस।
वे सरवर मोती चुगैं, वा के मुख में मंस।।
बगुला और हंस दोनों का रंग सफेद होता है परंतु प्रकृति दोनों की अलग है। हंस मोती खाता है जबकि बगुला मांस खाकर भूख मिटाता है।
              दौलत, शौहरत और बड़ा ओहदा पाने की होड़ ने मनुष्य को पशु से भी बदतर बना दिया है। कहने को सभी मनुष्य एक जैसे होते हैं पर ज्ञानी और अज्ञानी में अंतर उसके व्यवहार से दिखता है। ज्ञानी मनुष्य अपनी सीमित आवश्यकाओं के कारण शांति से रहते हैं। समय मिलने पर सत्संग और परमात्मा के गुणों की चर्चा कर मन का सुख प्राप्त करने की कला उनको आती है। जबकि अज्ञानी मनुष्य पूरी जिंदगी भौतिक उपलब्धि प्राप्त करते हुए गुजारता है और समय मिलने पर उनका उनके बखान में बबार्द करता है। कहने को हमारे देश में शिक्षित लोगों की संख्या बढ़ी है पर ज्ञानी तो नगण्य ही है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की धर्म संदेश पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका
6.दीपक भारतदीप की हिन्दी एक्सप्रेस-पत्रिका
7.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Friday, December 2, 2011

रहीम के दोहे-इस संसार में संपत्ति के सगे बहुत हैं (rahim ke dohe-is sansar mein sanpatti ke sage bahut hain)

           इस संसार का सबसे बड़ा सत्य यही है कि मूलतः हर सामान्य आदमी अपने स्वार्थ की वजह से दूसरों के साथ संबंध बनाता है। वह उन्हीं से संबंध निभाता है जिससे उसे अपनी अपेक्षायें पूरी होने की संभावना रहती है। यह सभी जानते हैं पर अज्ञानी लोग समाज के स्वार्थी होने का रोना होते हुए अपनी मतलबपरस्ती को जायज ठहराते हैं जबकि ज्ञानी मनुष्य निष्काम भाव से दूसरों की सहायता के लिये तत्पर रहते हैं क्योंकि उनके मन में अपने कर्म का फल पाने की आशा नहीं रहती। धर्म, अध्यात्म और संस्कृति के नाम पर हम भले ही परिवार और समाज क एकरूप होने का भ्रम पाल लें पर सत्य यही है कि स्वार्थ ही सभी प्रकार के संबंधों का आधार होता है।
इस संसार में जिसके पास संपत्ति, वैभव, पद, प्रतिष्ठा और शक्ति है उससे संबंध रखने के लिये सभी आतुर होते हैं। निरीह, अल्प धनवान, सादगी पसंद और सत्य मार्ग का अनुसरण करने वाले लोगों के मित्र अत्यंत कम होते हैं। यह अलग बात है कि जिन लोगों के पास धन, पद, प्रतिष्ठा और आकर्षण है उनको यह भ्रम रहता है कि उनके चाहने वाले बहुत हैं। वह यह सच नहीं जानते कि इस संसार में पाखंड का बोलबाला है।
कविवर रहीम कहते हैं कि
-----------------
कहि ‘रहीम संपत्ति सगे, बनत बहुत बहुत रीत।
बिपत्ति कसौटी ज कसे, ते ही सांचे मीत।।
         ‘‘इस संसार में सभी लोग उसके सगे हैं जिसके पास संपत्ति है। धनवान आदमी के सभी मित्र बनते हैं मगर आपातकाल में जो काम आये वही सच्चा मित्र कहलाता है।
काहु ‘‘रहीम’ कैसे बनै, अनहोनी ह्वै जाय।
मिला रहै औ ना मिलै, तासो कहा बसाय।।
       ‘‘अनहोनी होने पर बात नहीं बन सकती। किसी व्यक्ति के पास होने पर भी अगर उससे आत्मीयता का भाव नहीं रहता तो उसे संबंध कैसे निभाया जा सकता है।
           इस सत्य को जानकर दूसरे मनुष्यो के साथ अपने संबंध अत्यंत सतर्कता बरतते हुए बनाना चाहिए। यह भी देखना चाहिए कि हमारे साथ दोस्ती और रिश्ते का दंभ भरने वालों के साथ हमारी वैचारिक, स्वाभाविक तथा आचरण के आधार पर समानता है कि नहीं। आमतौर से विपरीत व्यक्तित्व के लोगों के बीच आपसी संबंध अधिक समय तक नहीं चलता। निष्काम भाव से काम करने वाले मनुष्य बुरा अवसर आने पर पर निभाते हैं पर कामनाओं से भरपूर आदमी उस समय मुंह फेर जाता है। अतः जिनसे मानसिक रूप से समानता के आधार पर संबंध निर्मित न हो सके उनसे दूर रहना ही श्रेयस्कर है। यह अलग बात है कि उनको इस बात का आभास नहीं होने देना चाहिए।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की धर्म संदेश पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका
6.दीपक भारतदीप की हिन्दी एक्सप्रेस-पत्रिका
7.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Thursday, November 17, 2011

कौटिल्य के अर्थशास्त्र के आधार पर संदेश-हीन मनुष्य से संबंध न बनायें (dharma sandesh-heen aur samarthvan manushya)

          आम मनुष्य की यह सामान्य आदत होती है कि वह अपनी भौतिक उपलब्धियों तथा गुणों का बखान करता है। ऐसा करते हुए हर मनुष्य भूल जाता है कि इससे वह अपने शत्रु ही अधिक बनाता है। इस तरह की आत्मप्रवंचना से जो हीन पुरुष होते हैं वह बलशाली मनुष्य से जलते हैं। महान नीति विशारद चाणक्य का भी कहना है कि अपना स्वास्थ्य दूसरों से छिपाकर रखें। इसके अलावा श्रीमद्भागवत में श्री कृष्ण भी कहते हैं कि उनके ज्ञान का केवल भक्तों में ही प्रसारण करना चाहिए। इसके पीछे संभवत कारण यह है कि समाज में अपने व्यसनों, विचारों और द्वेष की भावना से ओतप्रोत लोगों की संख्या सदैव अधिक रहती है। इसलिये उनको विकार घेरे रहते हैं जो कि अंततः उनके लिये अस्वास्थ्यकर होते हैं। इतना ही धन, स्वास्थ्य तथा ज्ञान से हीन मनुष्यों की कुंठा इतनी तीव्रतर होती है कि वह उनका नकारात्मक सोच हो जाता है और किसी की खुशी देखकर उनके मन में द्वेष पैदा होता है। ऐसे में अस्वस्थ, चरित्रहीन तथा धन के लालची निर्धन लोगों से संपर्क बनाना अपने लिये ही अहितकारी भी हो सकता है।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
----------------------------------------------
न सन्धिच्छिद्धीनैश्च तत्र हेतुरसंशयः।
तस्य विश्रम्भामलभ्य प्रहरेत्तं गतस्मृहः।
             ‘‘हीन पुरुष के साथ कभी संधि न करें। इसमें संदेह नहीं है कि उसके साथ विश्वासपूर्वक बातचीत करने पर इस बात की संभावना प्रबल रहती है कि वह समय मिलने पर अवश्य हानि करेगा।’’
           इसका यह आशय कदापि नही है कि निर्धन लोगों से धनियों को दूर रहना चाहिए। इतना अवश्य है कि धनिकों को चाहिए कि वह निर्धन लोगों के सामने अपने वैभव का प्रदर्शन करने की बजाय उनकी सहायता करें तो अच्छा है क्योंकि इसे समाज में सामंजस्य बना रहता है। हमारा मानना है कि धन का निर्धन, स्वास्थ्य का बीमार आदमी तथा अपने ज्ञान को मूर्ख के सामने प्रदर्शन करने से बचना चाहिए। ऐसा करने से हीन मनुष्य मन ही मन द्वेष करने लगता है जो कि अंततः समर्थशील मनुष्य के लिये कष्टकारी होता है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की धर्म संदेश पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका
6.दीपक भारतदीप की हिन्दी एक्सप्रेस-पत्रिका
7.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Wednesday, November 9, 2011

मनुस्मृति-जुआ करवाने राज्य के लिये डाकू की तरह (gamling worker as a dacait for nation-manu smriti)

             आजकल खेलों में अनेका फिक्सिंग की चर्चा होती है। अभी हाल में पाकिस्तान के तीन क्रिकेट खिलाड़ियों को स्पॉट फिक्सिंग के आरोप में सजा भी हुई थी। ऐसा नहीं भारत कोई इस समस्या से बचा हुआ है। भारत के भी दो खिलाड़ियों पर इस अपराध में आजीवन खेलने पर प्रतिबंध लगाया गया था। विश्व में भारत की आर्थिक शक्ति पर ही क्रिकेट खेल चल रहा है। जिन पाकिस्तानियों को ब्रिटेन में क्रिकेट खेल फिक्स करने के आरोप में सजा हुई हैए बताया जा रहा है कि भारत के सट्टेबाज भी उनसे संबंधित हैं। इधर हम देख रहे हैं कि भारत में भी अनेक सट्टेबाज पकड़े जा रहे हैं। कहने को क्रिकेट एक खेल है पर जैसे जैसे इससे जुड़े काले कारनामों का पर्दाफाश हो रहा है उससे तो जुंआ ही अधिक दिखने लगा है। अनेक परिवार इसके चक्कर में बरबाद हो गये हैं। हैरानी तो इस बात की है कि इस खेल में पैसा लगाने वाले वह लोग भी हैं जो इसको कभी खेले ही नहीं है। भले ही वह इसे मनोरंजन मानते हों पर अंततः यह जुआ है।
इस विषय पर मनु स्मृति में कहा गया है कि
----------------
अप्राणिभिर्यत्क्रियते तल्लोके द्यूतमच्यते।
प्राणिभिः क्रियतेयस्तु सः विज्ञेयः समाह्वयः।।
             ‘‘जिस खेल में धन आदि निर्जीव वस्तुओं से हार या जीत का निर्णय हो वह खेल जुआ कहलाता है। पशु-पक्षी या अन्य सजीव प्राणियों को दांव पर रखकर खेले जाने वाले खेल का नाम समाह्व्य है।’’
एते राष्ट्रे वर्तमाना राज्ञः प्रच्छन्नत्सकराः।
विकर्म क्रियर्यानित्य बाधन्ते भद्रिकाः प्रजाः।।
          ‘‘जो लो जुआ या समाह्वय जैसे कर्म करवाते हैं वह राष्ट्र के लिये डाकू की तरह होते हैं और सदैव अपने कुकर्मों से प्रजा को कष्ट देते हैं।’’
         देश में एक बहुत बड़ा सट्टा समूह सक्रिय हैं। ऐसा कोई मैच नहीं होता जिसके होने पर कहीं न कहीं सट्टेबाज न पकड़े जाते हों। हैरानी इस बात की है कि यह केवल भारतीय टीम के खेलने पर ही नही होता बल्कि प्रसिद्धि विदेशी टीमों के मैच पर भी हमारे देश में सट्टा लगता है। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि आज के अनेक युवा अधिक धन पर उसे पचा नहीं हो पाते और स्वयं जुआ खेलकर अपने खिलाड़ी होने का गर्व पालते हैं। उनको यह पता नहीं कि इन सट्टेबाजों का धन अंततः अपराध जगत के अन्य लोगों के पास पहुंचता है। सट्टेबाजी से जुड़े विदेश में बैठे अनेक भारतीयों के माध्यम से यह धन आतंकवादियों और अतिवादियों के पास पहुंचने के समाचार भी आते हैं। देश के युवाओं को यह बात समझना चाहिए कि वह सट्टा खेलकर ऐसे लोगों को साथ दे रहे हैं जो अंततः राष्ट्र के लिये डाकू की तरह होते हैं। वह ऐसे तत्वों को प्रोत्साहन देते हैं जो आमजनों को परेशान करते हैं।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की धर्म संदेश पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका
6.दीपक भारतदीप की हिन्दी एक्सप्रेस-पत्रिका
7.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Wednesday, October 26, 2011

पतंजलि योग सूत्र-आत्मा जीव की बुद्धि के अनुसार कार्य कर सकता है (aatma aur buddhi ka sanjojan-patanjali yoga sootra)

            हमारे अध्यात्मिक दर्शन के कुछ विद्वान आत्मा को परमात्मा का अंश मानते हैं तो कुछ आत्मा को ही परमात्मा मानते हैं। इस तरह की राय में भिन्नता के बावजूद यह एक सत्य बात है कि आत्मा अत्यंत शक्तिशाली तत्व है जिसे समझने की आवश्यकता है। दरअसल जो लोग के माध्यम से इंद्रियों और आत्मा का संयोग करते हैं वही जानते हैं कि तत्पज्ञान क्या है और उसको सहजता से कैसे जीवन में धारण किया जा सकता है। आत्मा और परमात्मा में भेद करने जैसे विषयों में अपना दिमाग खर्च करने से अच्छा है कि अपनी आत्मा को पहचानने और उसे अपनी इ्रद्रियों को संयोजन का प्रयास किया जाये।
            पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
               ----------------------
            द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः।।
          ‘‘चेतनमात्र दृष्ट (आत्मा) यद्यपि स्वभाव से एकदम शुद्ध यानि निर्विकार तो बुद्धिवृति के अनुरूप देखने वाला है।
           तदर्थ एवं दृश्यस्यात्मा।।
         ‘‘दृश्य का स्वरूप उस द्रष्टा यानि आत्मा के लिये ही है।’’
          पंचतत्वों से बनी इस देह का संचालन आत्मा से ही है मगर उसे इसी देह में स्थित इंद्रियों की सहायता चाहिए। आत्मा और देह के संयोग की प्रक्रिया का ही नाम योग है। मूलतः आत्मा शुद्ध है क्योंकि वह त्रिगुणमयी माया से बंधा नहीं है पर पंचेंद्रियों के गुणों से ही वह संसार से संपर्क करता है और बाह्य प्रभावों का उस पर प्रभाव पड़ता है।
           आखिर इसका आशय क्या है? पतंजलि विज्ञान के इस सूत्र का उपयोग क्या है? इन प्रश्नों का उत्तर तभी जाना जा सकता है जब हम इसका अध्ययन करें। अक्सर ज्ञानी लोग कहते हैं कि ‘किसी बेबस, गरीब, लाचार, तथा बीमार या बेजुबान पर अनाचार मत करो’ तथा ‘किसी असहाय की हाय मत लो’ क्योंकि उनकी बद्दुआओं का बुरा प्रभाव पड़ता है। यह सत्य है क्योंकि किसी लाचार, गरीब, बीमार और बेजुबान पशु पक्षी पर अनाचार किया जाये तो उसका आत्मा त्रस्त हो जाता है। भले ही वह स्वयं दानी या महात्मा न हो चाहे उसे ज्ञान न हो या वह भक्ति न करता हो पर उसका आत्मा उसके इंद्रिय गुणों से ही सक्रिय है यह नहीं भूलना चाहिए। अंततः वह उस परमात्मा का अंश है और अपनी देह और मन के प्रति किये गये अपराध का दंड देता है।
         कुछ अल्पज्ञानी अक्सर कहते है कि देह और आत्म अलग है तो किसी को हानि पहुंचाकर उसका प्रायश्चित मन में ही किया जा सकता है इसलिये किसी काम से डरना नहीं चाहिए। । इसके अलावा पशु पक्षियों के वध को भी उचित ठहराते हैं। यह अनुचित विचार है। इतना ही नहीं मनुष्य जब बुद्धि और मन के अनुसार अनुचित कर्म करता है तो भी उसका आत्मा त्रस्त हो जाता है। भले ही जिस बुद्धि या मन ने मनुष्य को किसी बुरे कर्म के लिये प्रेरित किया हो पर अंततः वही दोनों आत्मा के भी सहायक है जो शुद्ध है। जब बुद्धि और मन का आत्मा से संयोग होता है तो वह जहां अपने गुण प्रदान करते हैं तो आत्मा उनको अपनी शुद्धता प्रदान करता है। इससे अनेक बार मनुष्य को अपने बुरे कर्म का पश्चाताप होता है। यह अलग बात है कि ज्ञानी पहले ही यह संयोग करते हुए बुरे काम मे लिप्त नहीं होते पर अज्ञानी बाद में करके पछताते हैं। नहीं पछताते तो भी विकार और दंड उनका पीछा नहीं छोड़ते।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग

Saturday, October 15, 2011

सामवेद से संदेश-प्रातःकाल उठने से जीवन आनंदमय हो जाता है (samved se sandesh-pratkal uthne se jivan mein anand)

              प्रातःकाल को ऊषाकाल भी कहा जाता है। हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में नींद से जागना जीवन में प्रतिदिन नवीनतम आनंद प्रदान करता है। आजकल के आधुनिक रहन सहन की शैली में इतना बदलाव आया है कि आमतौर से लोग सूर्योदय के बाद उठते हैं। यही कारण है कि हम देख रहे हैं कि हमारे देश में स्वास्थ्य का स्तर गिरता जा रहा है। मधुमेह, हृदय रोग, वायु विकार तथा अन्य बीमारियों का प्रकोप बढ़ रहा है। इनको राजरोग भी कहा जाता है जो केवल धनिकों में पाये जाते है जिनकी जीवन शैली में आलस्य अधिक रहता है। स्थिति यह है कि कहीं बुजुर्गों के मिलाप होता है तो वहां अध्यात्मिक चर्चा से अधिक बीमारियों के साथ ही इलाज की चर्चा होती है। अब लोग ज्ञान नहंी बघारते बल्कि अपनी बीमारी से कैसे लड़ रहे हैं इस पर अपनी अभिव्यक्ति अधिक व्यक्त करते हैं। कुछ रोगों के बारे में तो यहां तक मान लिया है कि बिना गोली लिये प्रभाविक मनुष्य कभी जीवन में आगे चल ही नहीं सकता। यह सोच गलत है। जो लोग प्रातःकाल उठकर सैर या योगसाधना वगैरह करते हैं तो उनके स्वास्थ्य का स्तर स्वतः ऊंचा हो जाता है। यह अब प्रमाणित भी हो गया है।
सामवेद में कहा गया है कि
---------------
उस्त्रा देव वसूनां कर्तस्य दिव्यवसः।
            ‘‘उषा वह देवता है जिससे रक्षा के तरीके सीखे जा सकते हैं।’’
ते चित्यन्तः पर्वणापर्वणा वयम्।
             ‘‘हम प्रत्येक पर्व में तेरा चिंत्न करें’’
          प्रातः उठने से न केवल विकार दूर होते हैं वरन् जीवन में कर्म करने के प्रति उत्साह भी पैदा होता है। अगर हम आत्ममंथन करें तो पायेंगे कि हमारे अंदर शारीरिक और मानसिक विकारों का सबसे बड़ा कारण ही सूर्योदय के बाद नींद से उठना है। हमारी समस्या यह नही है कि हमें कहीं सही इलाज नहीं मिलता बल्कि सच बात यह है कि अपने अंदर विकारों के आगमन का द्वार हम सुबह देरे से उठकर स्वयं ही खोलते हैं।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की धर्म संदेश पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका
6.दीपक भारतदीप की हिन्दी एक्सप्रेस-पत्रिका
7.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Sunday, October 9, 2011

सामवेद से संदेश-दोगला व्यवहार आनंद नहीं देता (dogla vyavahar anana nahina deta-samved se sandesh)

             संसार के जिस आदमी ने मिलो यही कहता है कि ‘मै दुखी हूं’, क्योंकि सामान्य मनुष्य सुख तो चाहते हैं पर उसे पाने का कौशल बहुत कम लोग हैं। इसका कारण यह भी है कि संसार में अधिकांश मनुष्य दोहरे आचरण के मार्ग पर चलने वाले हैं। आदर्शों, सिद्धांतों और नैतिकता की दुहाई सभी लोग देते हैं पर व्यवहार में सात्विकता केवल ज्ञानियों में ही दिखाई देती है। ज्ञानी इस बात को जानते हैं कि दोगला व्यवहार हमेशा स्वयं के लिये ही कष्टकारक है। लोग किसी के मित्र नहीं है भले ही दावा करते हों कि उन्होंने ढेर सारे मित्रों से व्यवहार निभाया है। अपने ही आत्मीय जनों की पीठ पीछे निंदा करते हैं। इस बात को जाने बिना बिना कि एक कान से दूसरे कान में पहुंच ही जाती है। नतीजा यह है कि समाज में वैमनस्य भी बढ़ रहा है। हम जब यह कहते हैं कि आजकल समाज में वैसा सद्भाव नहीं है तो यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि उसके लिये स्वयं ही जिम्मेदार हैं।
सामवेद में कहा गया है कि
------------------------------------------
मा ते रसस्य मत्सत द्वयाविनः।
            ‘‘दोहरा आचरण करने वाले आनंदित नहीं होते।’
ऋतस्य जिह्वा पवते मधु।
           ‘‘सच्च मनुष्य की जिह्वा से मधु टपकता है।’’
         लोगों की वाणी, विचार तथा व्यवहार स्वार्थों के अनुसार मधुर और कठोर होता है। ताकतवर के आगे सिर झुकाते हैं तो कमजोर पर आग की तरह झपटते हैं। आपसी वार्तालाप में ऐसी पवित्र बातें करते हैं गोया कि महान धार्मिक हों पर व्यवहार में शुद्ध रूप से स्वार्थ दिखता है। ऐसे में संसार या समाज को बिगड़ने का दोष देकर आत्ममंथन से बचना एक दोगला प्रयास है। ऐसे प्रयासों के चलते कोई सुख या आनंद नहीं प्राप्त कर सकता। इसके विपरीत निराशा, तनाव, तथा मानसिक विकारों को मनुष्य शरीर में शासन स्थापित हो जाता है। इसलिये जहां तक हो सके आत्ममंथन कर अपने दोषों का निराकरण करना चाहिए। संसार या समाज के दूषित होने की बात करना व्यर्थ है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की धर्म संदेश पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका
6.दीपक भारतदीप की हिन्दी एक्सप्रेस-पत्रिका
7.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

विशिष्ट पत्रिकायें