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Sunday, December 29, 2013

दूसरे लोगों की पापपूर्ण तरक्की देखकर दुःखी न हों-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(doosron ki paappoorn tarkki dekhkar dukhi n hon-hindi thought aritcle based on manu smriti)



                        विश्व के अधिकतर देशों में जो राजनीतक, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्थायें हैं उनमें सादगी, सदाचार तथा सिद्धांतों के साथ विकास करते हुए उच्चत्तम शिखर पर कोई सामान्य मनुष्य नहीं पहुंच सकता।  अंग्रेज विद्वान जार्ज बर्नाड शॉ का मानना था कि कोई भी व्यक्ति ईमानदारी से अमीर नहीं बन सकता। अंग्रेजों  ने अनेक देशों में राज्य किया।  वहां से हटने से पूर्व  अपने तरह की व्यवस्थायें निर्माण करने के बाद ही किसी देश को आजाद किया।  यही कारण है सभी देशों में आधुनिक राज्यीय, सामाजिक, आर्थिक तथा प्रशासनिक व्यवस्थाओं के शिखर पर अब सहजता से कोई नहीं पहुंच पाता।  यही कारण है कि उच्च शिखर पर वही पहुंचते हैं जो साम, दाम, दण्ड और भेद सभी प्रकार की नीतियां अपनाने की कला जानते हैं। याद रहे यह नीतियां केवल राजसी पुरुष की पहचान है। सात्विक लोगों के लिये यह संभव नहीं है कि वह उस राह पर चलें। वैसे भी शिखर वाली जगहों पर राजसी वृत्ति से काम चलता है। ऐसे में उच्च स्थान पर पहुंचने वालों से यह आशा करना व्यर्थ है कि वह निष्काम भाव से कर्म तथा निष्प्रयोजन दया करें। 
मनु स्मृति में  कहा गया है कि

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अधर्मेणैधते तावत्ततो भद्राणि पश्यति।

ततः सपत्नाञ्जयति समूलस्तु विनश्यति।।



            हिन्दी में भावार्थ-अधर्मी व्यक्ति अपने अधार्मिक कर्मों के कारण भले ही उन्नति करने के साथ ही अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता दिखे पर अंततः वह जड़ मूल समेत नष्ट हो जाता है।
            राजसी पुरुषों का आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा अन्य क्षेत्रों में जो तेजी से विकास होता है उसे देखकर सात्विक प्रवृत्ति के लोग भी दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। खासतौर से युवा वर्ग को शिखर पुरुषों का जीवन इस तरह का तेजी से विकास की तरफ बढ़ता देखकर उनके आकर्षण का शिकार हो जाते हैं।  जिनकी प्रकृति सात्विक है वह तो अधिक देर तक इस पर विचार नहीं करते पर जिनकी राजसी प्रवृत्ति है वह अपना लक्ष्य ही यह बना लेते हैं कि वह अपने क्षेत्र में उच्च शिखर पर पहुंचे। न पहुंचे तो  कम से कम किसी बड़े आदमी की चाटुकारिता उसके नाम का लाभ उठायें।  यह प्रयास सभी को फलदायी नहीं होता। सच बात तो यह है कि कर्म और और उसके फल का नियम यही है कि जो जैसा करेगा वैसा भरेगा। देखा यह भी जाता है कि उच्च शिखर पर येन केन प्रकरेण पर पहुंचते हैं उनका पतन भी बुरा होता है।  इतना ही नहीं भले ही बाह्य रूप से प्रसन्न दिखें आंतरिक रूप से भय का तनाव पाले रहते हैं।  अतः दूसरों का कथित विकास देखकर कभी उन्हें अपना आदर्श पुरुष नहीं मानना चाहिये।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Tuesday, December 24, 2013

विषयों में आसक्त लोगों को ज्ञान देने से लाभ नहीं-मनुस्मुति के आधार हिन्दी चिंत्तन लेख(vishayon mein asakt logon ko gyan dene se labh nahin-hindi thought aritcle based on manu smriti)



                        हमारे देश में धर्म के विषय पर कहीं चर्चा हो तो अनेक लोग बातें सुनने और कहने के लिये लालायित हो उठते हैं। हैरानी की बात है कि जितना धर्म के विषय में हमारे पौराणिक ग्रंथों में लिखा गया उससे अधिक अन्यत्र कहीं सामग्री नहीं मिलती।  यही कारण है कि हमारे देश में उससे पढ़कर रटने वाले धर्म संदेशों के प्रचार को एक व्यवसाय बना लेते हैं।  दूसरी बात यह भी है कि हमारे देश में लोगों का व्यवसाय कृषि, लघु एवं कुटीर उद्योग के साथ ही वस्तुओं का विक्रय कर अपना पेट पालना रहा है।  पुराने समय में लोगों को बाज़ार के छोटे होने के कारण  अपने धंधे आदि से फुर्सत अधिक रहती थी और यही कारण है कि उनके हृदय में संसार के विषयों के पश्चात् अज्ञात शक्ति की आराधना करने का समय निकल आता है। इसी कारण उनके अंदर धर्म के प्रति आस्थाओं का जन्म हुआ। सीधी बात कहें तो उनका अध्यात्म उन्हें अपनी तरफ आकर्षित करता था। संसार की अज्ञात शक्ति के प्रति जिज्ञासा का कथित धर्म प्रचारकों ने खूब लाभ उठाया  औद्योगिक रूप से हमारा देश अभी शैशवकाल में ही है। ऐसे में छोटे शहरों और गांवों में लोगों के पास धर्म के प्रति रुचि अभी भी बरकरार है।  यह अलग बात है कि उनको ज्ञान देने वाले कथित गुरु उनकी जिज्ञासा शांत करने की बजाय अपनी चालाकी से कथायें सुनाकर या भजन गाकर मनोरंजन के माध्यम से उनके मन को प्रसन्न करते हैं। जहां तक ब्रह्मज्ञान का प्रश्न है उसके बारे में भ्रांत धारणाऐं प्रचलित हैं। कौन त्यागी, कौन सन्यासी और कौन तत्वाज्ञानी इसके बारे में आम लोगों अपने अपने गुरुओं के मतानुसार विचार करते हैं। 
         अनेक कथित ब्रह्मज्ञानी तो ऐसे हैं जो केवल संपत्ति संग्रह और शिष्यों के समूह का संचय कर प्रचार में प्रसिद्धि पाते हैं। इतना ही नहीं बाज़ार तथा प्रचार समूहों के लिये जो उपयोगी हैं वह सिद्ध है और जो नहीं है उसे कोई पूछता तक नहीं है। सच बात तो यह है कि त्यागी ही सच्चा सन्यासी होता है।  सन्यास का यह अर्थ कदापि नहीं है कि आदमी अपनी सांसरिक जिम्मेदारी से भागकर गेरुऐ वस्त्र पहन ले। गेरुए वस्त्र पहनकर भी जो कामनायें करता है वह सन्यासी नहीं है। इच्छाओं का त्याग करे वही ब्रह्मज्ञानी है और जो इच्छाओं की पूर्ति में ही लगा रहे उससे तो न ज्ञान लेना चाहिये और न उसे देना चाहिये।
मनुस्मृति में कहा गया है कि

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न जातु कामा कामानामुपभोगेन शाम्यति।

हविषा कृष्णवर्त्मेव भूव एवाभिवर्धते।।

                        हिन्दी में भावार्थ-जिस तरह आग में घी डालने से अग्नि प्रज्जवलित होती है उसी तरह एक इच्छा पूरी होने पर दूसरी स्वतः जाग्रत हो जाती है।

अर्थकामेष्वसक्तानां धर्मज्ञानं विधीयते।

धर्म जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः।।

                        हिन्दी में भावार्थ-अर्थ और काम में आसक्त लोगों के लिये धर्म का ज्ञान देने का कोई विधान नहीं है। धर्म के विषय में जिज्ञासा रखने वालों के लिये वेद ही सर्वोच्च प्रमाण हैं।
                        भारत में हिन्दू धर्म में साकार तथा निराकार दो प्रकार की भक्ति की धारा प्रचलित है पर अब तो यहां अहंकार की भक्ति की धारा भी बह रही है। अनेक गुरु स्वयं को भगवान का अवतार बताकर लोगों में अपने शिष्य बनाते हैं।  इतना ही नहीं जो उनसे व्यवसायिक लाभ उठाना चाहते हैं या वेतन पाते हैं वह हृदय से अपने स्वामी को भगवान नहीं मानते पर शिष्यों को प्रभावित करने के लिये वह इसी तरह का प्रचार करते हैं। अनेक बार तो ऐसा भी होता है कि धर्म व्यवसाय में लगे लोग एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप करने का प्रयास करते हुए समाज में वैमनस्य फैलाते नज़र आते हैं।  यह सब देखते हुए धर्म के प्रति जिज्ञासा रखने वाले लोग हमेशा ही ंसशय में रहते हैं।
                        इस संशय के निवारण के लिये लोगों को अपने ही धर्म ग्रंथों का अध्ययन करते रहना चाहिये।  यही  ग्रंथ धर्म का प्रमाण हैं और अगर इनका ध्यान से अध्ययन किया जाये तो धर्म के साथ ही तत्वज्ञान की अनुभूति स्वतः होने लगती है।  सबसे बड़ी बात यह कि हमारे धर्मग्रंथ मानते हैं कि कामनाओं का त्याग करना ही सन्यास है और ग्रहस्थ होते हुए भी सन्यासी हुआ जा सकता हैं।  अतः भ्रम में आकर किसी को न तो गुरु बनाना चाहिये न गुरु में ईश्वर का रूप देखने की कामना करना चाहिये।

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Sunday, August 11, 2013

संत कबीर दास का दर्शन-दूसरों को ज्ञान देने वाला तीतर स्वयं पिंजरे में रहता है (doosron ko gyan dene wala teetar swuam pinjremein rahata hai-sant kabir das ka darshan)



      हमारे देश में जैसे जैसे भौतिक समृद्धि के कारण जैसे जैसे विलासिता बढ़ रही है लोगों के शरीर टूट रहे हैं। कहा जाता है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन रहता है।  आलस्य, विलास तथा प्रमाद के भाव की समाज में प्रधानता हो तो लोगों के मानसिक रूप से समृद्ध होने की कल्पना करना ही निरर्थक है। स्थिति यह है कि लोगों के पास धन और विलासिता के ढेर सारे साधन है पर हार्दिक प्रसन्नता उनसे कोसों दूर रहती है। ऐसे में उनका मन उनको मनोरंजन के लिये इधर उधर दौड़ता है जिसका लाभ भारतीय धार्मिक ग्रंथों के वाचकों ने खूब उठाया है।
           वैसे तो हमारे यहां कथा और सत्संग की परंपरा अत्यंत पुरानी है पर भौतिक युग में पेशेवर धार्मिक वाचकों ने उसे मनोरंजन स्वरूप दे दिया है।  वह स्वयं ज्ञान पढ़कर दूसरों को सुनाते हैं।  मनोरंजन से ऊबे लोग उसे ही अध्यात्म का मार्ग समझते हुए  भीड़ की भेड़  बनकर ऐसे उपदेशकों को अपना गुरु बना लेते हैं।  स्थिति यह है कि लोगों को त्याग, दया और दान की प्रेरणा देने वाले यह उपदेशक अपनी कथाओं के प्रायोजन के लिये सौदेबाजी करते हैं।  यह स्वाभाविक भी है क्योंकि इन उपदेशकों को अपनी कथााओं के लिये अपने साथ ऐसे दल की व्यवस्था करनी होती है जैसे कि नाटक निर्देशक  करते हैं।  अपने साथ संगीत और नृत्य  कलाकार लेकर अपनी कथाओं के पात्रों का मंच पर नाटक की तरह प्रस्तुत कर  यह कथा वाचक खर्च भी करते हैं।  ऐसे में उनको अपने कार्यक्रमों के लिये व्यवसायिक प्रबंध कौशल का परिचय देना होता है।  देखा जाये तो अध्यात्म साधना एकांत का विषय है पर गीत संगीत तथा नृत्य के माध्यम से शोर मचाकर यह लोगों का मन वैसे ही हरते हैं जैसे कि मनोरंजन करना ही अध्यात्म हो।
संत प्रवर कबीर दास जी कहते हैं कि
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पण्डित और मसालची, दोनों सूझत नाहिं।
औरन को करै चांदना, आप अंधेरे माहिं।।
         सामान्य हिन्दी में भावार्थ-पण्डित और मशाल दिखाने वाले दूसरों को प्रकाश दिखाते हैं, पर स्वयं अंधेरे में रहते हैं।
पण्डित केरी पोथियां, ज्यों तीतर का ज्ञान।
और सगुन बतावहीं, आपन फंद न जान।।
        सामान्य हिन्दी में भावार्थ-पण्डित पोथियों पढ़कर ज्ञानोपदेश करत हैं। उनका ज्ञान तीतर की तरह ही है जो दूसरे पक्षियों को ज्ञान देता पर स्वयं पिंजरे में रहता है।     
         हमारा अध्यात्म अत्यंत समृद्ध है। देखा जाये तो हमारे अध्यात्म का सार श्रीमद्भागवत गीता में पूर्ण रूप से समाहित है। इस छोटे पर महान ग्रंथ का अध्ययन करने पर यह साफ लगता है कि उसमें वर्णित सदेशों से  प्रथक अन्य कोई सत्य हो ही नहीं सकता। कहा भी जाता है कि जिसने श्रीगीता का अध्ययन कर लिया उसे फिर अन्य किसी ग्रंथ से कोई प्रयोजन नहीं रह जाता है। हैरानी की बात है कि अपने आपको श्रीगीता सिद्ध बताने वाले उसके संदेश भी इतने विस्तार से बताते हैं कि सामान्य भक्तों के सिर के ऊपर से निकल जाते हैं।  उससे भी ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि लोग श्रीगीता के प्रवचन के समय ही प्रमाद कर अपनी बात से भक्तों को हंसाते हुए समझाते हैं।  प्रमाद राजसी कर्म का परिचायक है और स्वयं को सात्विक कहने वाले इन उपदेशकों को इससे बचना चाहिये।
      जिन लोगों को अधिक पुस्तकों से माथा पच्ची न करनी हो वह प्रातःकाल एक दो श्लोक ही गीता का पढ़ लिया करें।  उसका शाब्दिक अर्थ लेकर मन ही मन उसका चिंत्तन कर भावार्थ समझने का प्रयास करें।  आजकल सिद्ध गुरु मिलना कठिन है। कथित गुरु अपने आश्रमों के विस्तार और भक्तों के संग्रह को ही अपना लक्ष्य बनाते हें।  अतः भगवान श्रीकृष्ण को अपना गुरु मानते हुए श्रीगीता का अध्ययन करें तो यकीन मानिए स्वतः ही अध्यात्म का ऐसा ज्ञान प्राप्त होगा जो कथित बड़े संतों के लिये भी दुर्लभ है।

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Saturday, June 22, 2013

मनुस्मृति-राज्य पंचायत प्रणाली के माध्यम से संचालित हों(manu smirti-rajya panchayat pranali ke madhyam se sanchalit hon)



         भारत में गांवों  की बदहाल स्थितियां किसी से छिपी नहीं है। आधुनिक व्यवस्था में गांवों के विकास की बात तो बहुत कही जाती है पर देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण गांवों में आज भी पेयजल, स्वास्थ्य तथा शिक्षा की स्थिति बद से बदतर ही होती जा रही हैं।  भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों को एकदम विस्मृत कर पश्चिमी विचाराधाराओं का अनुकरण तो किया गया है पर उन्हें भी व्यवहार में नहीं लाया जा रहा।  गरीब और गांवों के विकास के नारे भी खूब लगते है।  हैरानी तब आती है जब गांवों के विकास तथा पंचायती राज की कल्पना के लिये हर कोई श्रेय लेना चाहता है। सच बात तो यह है कि मनृस्मृति में पहले से ही पंचायती राज का सिद्धांत प्रतिपादित किया गया है। यह सिद्धांत कोई प्रचलित सामाजिक पंचायतों के रूप में नहीं वरन् प्रशासनिक व्यवस्था के लिये बनाया गया है। अक्सर कहा जाता है कि भारत में पंचायत प्रणाली केवल सामाजिक उद्देश्यों के लिये थी। यह सोच गलत है क्योंकि मनु महाराज जिन पंचायतों की बात करते हैं उनका स्वरूप प्रशासनिक है।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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ग्रामस्याधिपतिं कुर्याद्दशग्रामपतिं तथा।
विंशतीशं शतेशं च सहस़्पतिमेव च।।
    हिन्दी में भावार्थ-प्रत्येक गांव में एक मुखिया नियुक्त करना चाहिये। दस गांवों को मिलाकर बीस गांवों का और बीस बीस गांवों के पांच समूहों को मिलाकर सौ गांवों का तथा सौ गावों के दस वर्गों का एक समूह बनाकर उनकी देखभाल करने हेतु एक मुखिया नियुक्त कराना चाहिये।
तेषां ग्राम्याणि कार्याणि पृथक कार्याणिं चैव हि।
राज्ञोऽन्यः सचिवः स्निग्धस्तानि पश्चवैदतन्द्रितः।।
     हिन्दी भाषा में भावार्थ-सभी गांवों  के काम की देखभाल करने के लिये सचिवों की नियुक्ति करते उसे उसे सभी गावों के अधिपतियों पर दृष्टि बनाये रखने का आदेश देना चाहिये।
            कहा जाता है कि महात्मा गांधी मानते थे कि असली भारत गांवों में रहता है जबकि मनुस्मृति में तो गांवों को ही बड़े राष्ट्र का आधार माना गया है। इतना ही नहंी नगरों के साथ गांवों की देखभाल पर जोर दिया गया है। हम यह भी कह सकते हैं कि पंचायती राज्य की कल्पना का श्रेय आधुनिक समय के कथित विद्वानों को नहीं दिया जा सकता। मनुस्मृति में यह कल्पना पहले ही प्रस्तुत की गयी है। इतना ही प्राचीन काल की व्यवस्था में इसे अपनाया भी गया था। इसी कारण हमारे यहां अनुशासन तथा व्यवस्था बनी हुई थी।

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Thursday, May 23, 2013

विदुर नीति के आधार पर चिंत्तन-कष्ट से पाया धन व्यर्थ (vidur neeti darshan-kasht se prapat dhan vyarth)



          मनुष्य जीवन को धारण करने वालों के मन मस्तिष्क में  यह भ्रम रहता कि वह केवल धनर्जान करने के लिये ही पैदा हुए हैं।   संसार के अधिकतर मनुष्य  धन को ही सत्य मानते हैं।  धन कमाने के बाद  उसके व्यय का प्रदर्शन कर समाज में अपनी श्रेष्ठता साबित करने का मोह कोई नहीं छोड़ पाता। हमारे देश में धर्म तथा  समाज के नाम पर ऐसी परम्पराएं  बनायीं गयी हैं जिनका निर्वाह बिना धन के संभव नहीं हो सकता।  पुत्र  के लिये व्यवसाय तथा पुत्री के लिये वर ढूंढते हुए हमारे देश के अधिकतर लोगों का जीवन ही निकल जाता है।  हमारे देश के लोगों में धन संचय की प्रवृत्ति इतनी गहरी है कि आधुनिक समय में चालाक बुद्धिमानों के लिये उनके साथ  ठगी करना आसान हो गया है। 
         देश भर में अनेक चिटफंड कंपनियां यह काम इस तरह कर रही है कि लोग अपनी सारी जमा पूंजी उनके पास जमा कर आते हैं।  अधिक व्याज का लोभ लोगो के लिये संकट का कारण तब बनता है जब उनका मूल धन भी हाथ से निकल जाता है।  पीड़ित लोग अधिकतर अपने पृत्र के व्यवसाय या नौकरी तथा बेटी की शादी के लिये धन जमा करने की बात कहते है।  हमारे यहां विवाह तथा मृत्यु के अवसर पर जितनी नाटकबाजी होती है वह धन से ही संभव है।  यही कारण है कि भारत में लोग बच्चों के भविष्य के लिये अधिक से अधिक संचय करते हैं। इतना ही नहीं अपने बुजुर्गों की मृत्यु पर उनके दाह संस्कार के बाद भोज के प्रबंध का जिम्मा भी उन पर रहता है।  समाज में अपनी कथित छवि बचाये रखने के लिये भारत के लिये हर आम आमदी जूझता रहता है।  हमारे देश में सीध सच्चे धंधे में अधिक धनवान होने के अवसर करीब करीब बंद कर दिये गये हैं, जिसका परिणाम यह हुआ है कि अपने पास मौजूद धन की वृद्धि के लिये ऐसे ठगों के जाल में आमजन  आसान से फंस जाते हैं।
                      विदुरनीति में कहा गया है कि
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            अतिक्लेशेन येऽर्याः स्युर्धर्मस्यातिक्रमेश वा।
            अरेवां प्रणपातेन मा स्म तेषु मनकृथाः।।
        हिंदी  में भावार्थ-जिस धन को अर्जित करने में मन तथा शरीर को अत्यंत क्लेश हो, धर्म का उल्लंघन  करना पड़े या फिर शत्रु के सामने अपना सिर झुकाने की बाध्यता उपस्थित हो, उसे प्राप्त  करने का विचार ही त्याग देना श्रेयस्कर है।
                          
            सहस्त्राणिऽपि जीवन्ति जीवन्ति शतिनानथा।
            धृतराष्ट्र निमुंचेच्छां न कथंचिन्न जीव्यते।
       हिन्दी में भावार्थ-जिनके पास हजार है वह जिंदा रहते हैं पर जिनके पास सौ वह भी जिंदा  रहते हैं। धन का लोभ छोड़ने वाले लोग भी हर हालत में अपना जीवन धारण किये रहते ही  हैं।
        हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार  जिस जीव में परमात्मा ने प्राणवायु प्रवाहित की है माया उसकी सेवा करने के लिये बाध्य है। कहा भी जाता है कि जिसने पेट दिया है वह दाना भी देगा।  परमात्मा की दासी माया है न कि उसकी स्वामिनी।  यह भी कहा जाता है कि जिसके भाग्य में माया का जितना भाग आना लिखा है उतना ही मिलेगा। इसके बावजूद धर्मभीरुता का दावा करने वाले हमारे भारतीय समाज के अधिकांश लोगों  को इस पर विश्वास नहीं है। श्रीमद्भागवत गीता से कथित रूप से कर्मप्रेरणा मिलने का दावा करने वाले यहां अनेक लोग मिल जायेंगे पर यह कोई नहीं समझ पाया कि उसमें निष्कर्म की बात कही गयी है न कि सकाम कर्म का सिद्धांत स्थापित किया गया है।  स्थिति यह है कि लोग धन के लिये देह तथा मन को भारी संताप देने के लिये तैयार हो जाते हैं। अपने ही धन के शत्रुओं की चिकनी चुकडी बातों में आकर उसे सौंप देते हैं।  परिणाम यह है कि बाद में जब धोखा मिलता है तो सिवाय आर्तनाद करने के अलावा उनके पास कोई दूसरा विकल्प् नहीं रहता। 
         अतः अपने नियमित स्वाभाविक कर्म करते हुए परमात्मा का स्मरण ही करते रहना चाहिये।  संसार के विषयों का चक्र माया की कृपा से चलता ही रहता है।  उसमें एक दृष्टा की तरह शामिल होना चाहिये। समय आने पर सारे काम हो जाते हैं यह विश्वास धारण कर जीवान आनंद से बिताना चाहिये।   

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Saturday, March 23, 2013

यजुर्वेद के आधार पर चिंत्तन-अनेकता के भाव पर व्यक्ति नष्ट हो जाता है (anekta ke bhaav se vyakti nasht hota hai-yajurved ke adhar par chittan)

        इस धरती पर अधिकतर जीव समूह बनाकर चलते हैं।  समूह बनाकर चलने की प्रवृत्ति अपनाने से  मन में सुरक्षा का भाव पैदा होता है। मनुष्य का जिस तरह का दैहिक जीवन है उसमें तो उसे हमेशा ही समूह बनाकर चलना ही चाहिये।  जिन व्यक्तियों में थोड़ा भी ज्ञान है वह जानते हैं कि मनुष्य को समूह में ही सुरक्षा मिलती है।  जब इस धरती पर मनुष्य सीमित में संख्या थे तब वह अन्य जीवों से अपनी प्राण रक्षा के लिये हमेशा ही समूह बनाकर रहते भी थे। जैसे जैसे मनुष्यों की संख्या बढ़ी वैसे अहंकार के भाव ने भी अपने पांव पसार दिये।  अब हालत यह है कि राष्ट्र, भाषा, जाति, धर्म और वर्णों के नाम पर अनेक समूह बन गये हैं।  उनमें भी ढेर सारे उप समूह हैं।  इन समूहों का नेतृत्व जिन लोगों के हाथ में है वह अपने स्वार्थ के लिये सामान्य सदस्यों का उपयोग करते हैं।  आधुनिक युग में भी अनेक मानवीय समूह  नस्ल, जाति, देश, भाषा, धर्म के नाम पर बने तो हैं पर उनमें संघभाव कतई नहीं है।  संसार का हर व्यक्ति  समूहों का उपयोग तो करना चाहता है पर उसके लिये त्याग कोई नहीं करता। यही कारण है कि पूरे विश्व में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा धार्मिक क्षेत्रों में भारी तनाव व्याप्त है।
यजुर्वेद में कहा गया है कि
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सम्भूर्ति च विनाशं च यस्तद्वेदोभयथ्सह।
विनोशेन मृतययुं तीत्वी सम्भूत्यामृत मश्नुते।।
     हिन्दी में भावार्थ-जो संघभाव को जानता है वह विनाश एवं मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है। इसके विपरीत जो उसे नहीं जानता वह हमेशा ही संकट को आमंत्रित करता है।

वाचमस्तमें नि यच्छदेवायुवम्।
      हिन्दी में भावार्थ-हम ऐसी वाणी का उपयोग करें जिससे सभी लोगों का एकत्रित हों।
              हृदय में संयुक्त या संघभाव धारण करने का यह मतलब कतई नहीं है कि हम अपनी समूह के सदस्यों से सहयोग या त्याग की आशा करें पर समय पड़ने पर उनका साथ छोड़ दें।  हमारे देश में संयुक्त परिवारों की वजह से सामाजिक एकता का भाव पहले तो था पर अब सीमित परिवार, भौतिकता के प्रति अधिक झुकाव तथा स्वयं के पूजित होने के भाव ने एकता की भावना को कमजोर कर दिया है।  हमने उस पाश्चात्य संस्कृति और व्यवस्था को प्रमाणिक मान लिया है जो प्रकृति के विपरीत चलती है। हमारा अध्यात्मिक दर्शन व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र के क्रम में चलता जबकि पश्चिम में राष्ट्र, समाज, परिवार और व्यक्ति के क्रम पर आधारित है।  हालांकि हमारा अध्यात्मिक दर्शन यह भी मानता है कि जब व्यक्ति स्वयं अपने को संभालकर बाद  समाज के हित के लिये भी काम करे तो वही वास्तविक धर्म है।  कहने का अभिप्राय है कि हमें अपनी खुशी के साथ ही अपने साथ जुड़े लोगों के हित के लिये भी काम करना चाहिये।
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Sunday, March 10, 2013

अथर्ववेद के आधार पर चिंत्तन लेख-आपस में फूट डालने वाले तत्वों से बचें (atharva ved ke aadhar par sandesh-aapas mein foot dalne walon se bachen)


               हम जब भारतीय राजनीतिक इतिहास का बात करते हैं तो यह देखकर दुःख होता है को हमारे देश में विदेशी आक्रान्ताओं को  यहीं के लोगों ने आक्रमण के लिये आमंत्रण दिया। इसका कारण यह है कि राजनीति, समाज, अर्थ, और धर्म के शिखर पर बैठे लोगों अपने अहंकाशवश  यहां हमेशा ही आम इंसान को तुच्छ समझा। यही कारण है कि विदेशी आक्रांताओं ने यहां जब इन्हीं लोगों का राज्य, समूह, तथा संगठन ध्वस्त कर उनके प्राणों का हरण किया तब भी समाज का समर्थन  कभी उनको नहीं मिला।  ऐसे शिखर पुरुषों को भले ही आज भी सम्मान से याद किया जाता है पर इतिहास ने कभी तत्कालीन हालातों को दर्ज करते हुए यह नहीं बताया  कि क्या वाकई तत्कालीन  समाज इनसे हमदर्दी रखता था।
अथर्ववेद मे कहा गया है कि
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अदारसृद भवतु
                          हिन्दी में भावार्थ-आपस में कोई फूट डालने वाला न हो।
ब्राह्म्ण स्पतेऽन्मि राष्ट्र वर्घव।
                                 हिन्दी में भावार्थ-सभी ज्ञानी मिलकर राष्ट्र का उत्थान करें।
             सच बात तो यह है कि धर्म, अर्थ, राज्य तथा समाज के सिर पर बैठै लोगों ने आमजन को पांव की जुती समझा। भौतिकता से संपन्न होने पर विपन्न को कीड़ा मकौड़ा समझा यही कारण है कि यहां के आमजनों ने विदेशी आक्रांताओं के हाथों से उनके कुचले जाने पर भी हमदर्दी नहीं दिखाई।  इतिहास से सबक लेना चाहिए पर लगता नहीं है कि हमारे देश में  सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक तथा आर्थिक शिखरों पर वर्चस्व के लिये अपास में द्वेरथ  करा  रहे लोगों ने ऐसा किया है।  धन, बल और पद को जहां शक्ति का पर्याय मान लिया गया है वहां ज्ञानियों की हैसियत केवल लिपिक या अनुवादक जितनी बन गयी है। यही कारण है कि ज्ञानी लोग मौन होकर सब देखते हैं।  हालांकि होना तो यह चाहिए कि सभी ज्ञान मिलकर देश के लिये काम करें पर इसके लिये आमजन को भी अपनी प्रतिबद्धता दिखानी होगी।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Sunday, February 24, 2013

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-विपत्ति का अनुमान पहले ही करें (kautilya ka athshastra-vipatti ka anuman pahale hi karen)

              अंग्रेजी शिक्षा पद्धति तथा आधुनिक प्रचार साधनों में-फिल्म, टीवी और इंटरनेट पर-शीघ्र अमीर और प्रसिद्ध होने के नुस्खे खूब बताये जाते हैं। सत्य तो यह है कि आधुनिक शिक्षा वैसे ही आदमी में चिंत्तन क्षमता निर्माण नहीं करती तो वही प्रचार माध्यम उसमें अधीरता के भाव का निर्माण करते हैं जिससे विश्व समाज असमंजस वातावरण में सांस ले रहा है।   फिल्मों में नायकों के पात्रों का सृजन कर लोगों का मनोरंजन किया जाता है पर उनकी पटकथायें हमेशा ही हिंसा से बेहतर परिणामों को प्रदर्शित करती है।  सभी नायक अपने सामने आने वाले खलनायकों को बल से मारते हैं। कहीं नीति से किसी खलनायक का पतन होते नहीं दिखाया जाता है।
     भारत ही नहीं विश्व के अधिकांश देशों की व्यवस्थायें आधुनिक समय में विफल साबित हो रही हैं।  जनाक्रोश बढ़ रहा है और इसका लाभ फिल्म वाले उठाते हैं।  हाल ही में भारत के एक प्रसिद्ध शायर ने कहा था कि भारत के एक अभिनेता की ‘‘नाखुश युवा’’ की छवि फिल्म के पटकथाकारों ने बनाई थी।  दरअसल उनका कहना था कि भारत में भेजा गया एक कुख्यात आतंकवादी इसी तरह का एक युवा था जिसे देश के दुश्मनों ने वास्तविक हमले की पटकथा का सृजन कर  भेजा अतः उसे भेजने वाले लोगों को भी कड़ी सजा देने या दिलाने का प्रयास करना चाहिए।  देश के कुछ बुद्धिमानों ने इस की  आपत्ति की कि एक महानायक की एक आतंकवादी से तुलना क्यों की गयी? जबकि उन महान शायर का आशय यह था कि जिस तरह पटकथाकार किसी कल्पित पात्र का सृजन करता है उसी पर कोई अभिनेता अपनी नायक की भूमिका निभाता है।  उसी तरह उस आतंकवादी को भारत के दुश्मनों ने ऐसे ही वास्तविक हमले की पटकथा रचकर यहां अपराध करने के लिये उकसाया।  दरअसल विश्व में हिंसा फैलाकर अपना मतलब साधने वाले ऐसे ही युवकों का उपयोग कर रहे हैं। आदमी आधुनिक रूप से शिक्षित हो या अशिक्षित कोई अंतर नहीं रह गया क्योंकि आध्यात्म्कि ज्ञान से सभी दूर हैं।  पूरे विश्व की सभी भाषाओं की फिल्मों में हिंसा दिखाई जाती है। कहा तो यह जाता है कि यह सब समाज में चल रहा है इसलिये दिखा रहे हैं पर यह भी सच यह है कि इससे हिंसक घटनायें बढ़ जाती हैं।  अगर आप न्यूयार्क में हुई हिंसक घटना को ऐसी फिल्म में दिखायेंगे जो सारे विश्व में दिखती है तो यह बात तय है कि उसकी पुनरावृत्ति करने के लिये अनेक अनीतिवान और अपराधी तत्व तैयार हो जायेंगे। यह अलग बात है कि ऐसे लोग एक दो बार ही ऐसे अपराध करते हैं बाद में स्वयं भी काल कलवित हो ही जाते हैं।
आशिक्षितनयः सिंहो हन्तीमं केवलं बलात्।
तच्च धीरो नरस्तेषां शातानि जातिमाञ्जायेत्।।
          हिन्दी में भावार्थ- अशिक्षित सिंह ने कोई नीति नहीं सीखी होती, वह केवल अपने बल से ही  नष्ट कर डालता है जबकि ज्ञानी और धीर पुरुष अपनी नीति से सैंकड़ों को मारता है।
         पश्चयद्भिर्दूरतोऽपायान्सूपायप्रतिपत्तिभिः।
          भवन्ति हि फलायव विद्वाद्भश्वन्तिताः क्रियाः।।
                    हिन्दी में भावार्थ-जो विद्वान पुरुष दूर से ही आती विपत्ति को देखकर उसके प्रतिकार का विचार करता है वह अपना बचाव करने में सक्षम होता है।
         जो लोग नीति और धीरज के साथ जीवन में रहते हैं उनकी शक्ति बहुत ज्यादा होती है।  महर्षि विवेकानंद ने अपने अल्प जीवन में पूरे विश्व में  भारतीय ज्ञान का प्रकाश फैलाया। उसी तरह भारतीय क्रिकेट के दो महान खिलाड़ियों  कपिल देव और धोनी ने अपनी कप्तानी में विश्व कप जितवाया। धोनी तो पहले बीस ओवर और अब पचास दो विश्व कप जितवा चुके हैं। अगर आदमी में धीरज और ज्ञान हो तो वह अपने सामर्थ्य से सारे समाज को प्रसन्न करने के साथ ही उसका मार्गदर्शन भी करता है।  इसलिये किसी भी प्रचार में आकर जल्दबाजी में सफलता हासिल करने की बजाय धीरज के साथ ही योजना बनाकर लक्ष्य प्राप्त करना चाहिये।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

यह ब्लाग/पत्रिका विश्व में आठवीं वरीयता प्राप्त ब्लाग पत्रिका ‘अनंत शब्दयोग’ का सहयोगी ब्लाग/पत्रिका है। ‘अनंत शब्दयोग’ को यह वरीयता 12 जुलाई 2009 को प्राप्त हुई थी। किसी हिंदी ब्लाग को इतनी गौरवपूर्ण उपलब्धि पहली बार मिली थी। ------------------------

Friday, January 4, 2013

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-दूसरे के धन पर दृष्टि रखना बक वृति (doosre ki sampatti par drishti dalna bak vriti-according of economics of kautilya)

         आधुनिक समाज में प्रचार तंत्र का बोलबाला है। फिल्म हो या टीवी इनमें अपना चेहरा देखने और दिखाने के लिये लोगों के मन में भारी इच्छा रहती है।  यही कारण है कि लोग अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिये तमाम तरह के पाखंड करते हैं।  हमारे देश में लोग धर्मभीरु हैं इसलिये अनेक पाखंडी धार्मिक पहचान वाले वस्त्र पहनकर उनके मन पर प्रभाव डालते हैं। अनेक गुरु बन गये हैं तो उनके शिष्य भी यही काम कर रहे हैं।  कौटिल्य के अर्थशास्त्र में इसे बिडाल वृत्ति कहा गया है। मूल रूप से धर्म अत्यंत निजी विषय हैं।  दूसरी बात यह है कि सांसरिक विषयों में लिप्त लोगों से यह अपेक्षा तो करना ही नहीं चाहिये कि वह धर्माचरण का उदाहरण प्रस्तुत करें।  सार्वजनिक स्थानों पर धर्म की चर्चा करना एक तरह से उसका बाजारीकरण करना है।  इससे कथित धर्म प्रचारकों को धन तथा प्रतिष्ठा मिलती है।  सच्चा धार्मिक आदमी तो त्यागी होता है। उसकी लिप्पता न धन में होती है न प्रतिष्ठा पाने में उसका मोह होता है।  उसकी प्रमाणिकता उसके मौन में होती है न कि जगह जगह जाकर यह बताने कि वह धर्म का पालन कर रहा है तो दूसरे भी करें।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है
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अधोदृष्टिनैष्कृतिकः स्वार्थसाधनतत्परः।
शठो मिथ्याविलीतश्च बक्रवतवरो द्विजः।।
         हिन्दी में भावार्थ-उस द्विज को बक वृत्ति का माना गया है जो असत्य भाव तथा अविनीत हो तथा जिसकी नजर हमेशा दूसरों को धन संपत्ति पर लगी रहती हो जो हमेशा बुरे कर्म करता है सदैव अपना ही कल्याण की  सोचता हो और हमेशा अपने स्वार्थ के लिये तत्पर रहता है।
धर्मध्वजी सदा लुब्धश्छाद्मिका  को लोकदम्भका।
बैडालवृत्तिको ज्ञेयो हिंस्त्र सर्वाभिसन्धकः।।
      हिन्दी में भावार्थ-अपनी प्रतिष्ठा के लिये धर्म का पाखंड, दूसरों के धन कर हरण करने की इच्छा हिंसा तथा सदैव दूसरों को भड़काने के काम करने वालाबिडाल वृत्तिका कहा जाता है।

        जैसे जैसे विश्व में धन का प्रभाव बढ़ रहा है धर्म के ध्वजवाहकों की सेना भी बढ़ती जा रही है।  इनमें कितने त्यागी और ज्ञानी हैं इसका आंकलन करना जरूरी है।  अध्यात्मिक और धर्म ज्ञानी कभी अपने मुख से ब्रह्म ज्ञान का बखान नहंी करते। उनका आचरण ही ऐसा होता है कि वह समाज के लिये एक उदाहरण बन जाता है।  उनका व्यक्तित्व और कृतित्व ही धर्म की पोथी का निर्माण करता है।  अगर उनसे आग्रह किया जाये तो वह संक्षिप्त शब्दों में ही अध्यात्मिक ज्ञान बता देते हैं।  जबकि आजकल पेशेवर ज्ञान  प्रवचक घंटों भाषण करने के बादी श्रोताओं को न तो धर्म का अर्थ समझा पाते हैं न उनके शिष्य कभी उनके मार्ग का अनुसरण करते हैं। यही कारण है कि इतने सारे धर्मोदेशक होते हुए भी हमारा समाज भटकाव की राह पर है। इस भटकाव से निकले बिना हमारे देश  का उद्धार नहीं हो सकता है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Thursday, December 27, 2012

चाणक्य नीति-सम्मान और दंड में दक्ष व्यक्ति ही लोकप्रिय होता है

                कहा जाता है कि फिट है वही हिट है। दरअसल भौतिक उपलब्धियों के लिये जुटा इंसान न तो अपनी देह को स्वस्थ रखने के लिये प्रयास करता है और न ही अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर आत्मबली हो पाता है। जीवन में एक बार ऐसा समय अवश्य ही आता है जब वह थक जाता है। यह थकावट उसे वृद्धावस्था में ही पहुंचा देती है। ऐसे में शारीरिक तथा आत्मिक रूप से क्षीण होकर मनुष्य के पास आर्तनाद करने के अलावा कोई मार्ग शेष नहीं रह जाता। हमारे देश में व्यायाम आदि को कभी आदत की तरह नहीं अपनाया गया। अपनी ही योग कला को केवल सिद्धों तथा नकारा लोगों के लिये आवश्यक माना गया है। यही कारण है कि आजकल हम अपने आसपास शारीरिक तथा दिमागी रूप से विकारग्रस्त लोगों का से भरा समाज देख रहे हैं।
                       महान नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि
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                        यस्मिन् रुष्टे भयं नास्ति तुष्टे नैंव धनऽऽगमः।
                       निग्रहोऽनुग्रहो नास्ति स रुष्टः किं करिष्यति।।
            ‘‘जिसके नाराज होने पर किसी प्रकार का भय नहीं हो और नही प्रसन्न होने पर किसी फल की आशा है और जो दण्ड देने का सामर्थ्य भी नहीं रखता वह गुस्सा होकर कर भी क्या लेगा?’’
                  पश्चिमी आधार पर किये गया व्यायाम भी बुरा नहीं है अगर नियमित रूप से किया जाये मगर हमारे देश में लोगों ने जीवन शैली तो ब्रिटेन और अमेरिका जैसी अपना ली है पर वहां जो कसरत करने का नियम है उसका पालन नहीं करते। सुविधाओं ने इतना विलासी बना दिया है कि हमारे यहां अस्वस्थ लोगों की संख्या बढ़ रही है। हमारे यहां की योग कला तो न केवल शारीरिक रूप से शक्तिशाली बनाती है वरन मानसिक रूप से दृढ़ भी बनाती है। आज के समय में जब भौतिकवाद के चलते आदमी अकेला होता जा रहा है तब यह आवश्यक है कि अपने बल को बनाये रखे। यह सभी जानते हैं कि जब तक हमारी देह में सामर्थ्य है तभी तक सारा संसार हमारे साथ है और असमर्थ होने पर अपने भी त्याग देते हैं। इसके बावजूद अगर कोई अपने स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं देता तो उसे अज्ञानी ही माना जा सकता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Monday, December 24, 2012

ऋग्वेद के आधार पर चिंत्तन-मनोरथ अगर शुद्ध हो तो सफलता मिलना संभव


              आशा निराशा जीवन में आती जाती रहती हैं।  मुख्य बात यह है कि आदमी खुशी में  होकर चुप नहीं बैठ सकता तो गम उसे खामोश कर देते हैं।  अपने जीवन की सफलता के लिये आदमी अपनी शक्ति और पराक्रम को श्रेय देता है तो असफलता के लिये दूसरों को जिम्मेदार ठहराता है। सच बात तो यह है कि हर आदमी अपने कर्म का स्वयं ही जिम्मेदार होता है।  सच बात तो यह है की आदमी का संकल्प होता है वैसा ही उसका संसार होता  है।
ऋग्वेद में कहा गया है कि
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यादृश्मिन्धपि तमपस्याया विदद् यऽस्वयं कहते सो अरे करत्

                    हिन्दी में भावार्थ- मनुष्य का हृदय जिस वस्तु में लगा रहता है वह उसे प्राप्त कर ही  लेता है। परिश्रम करने सारे पदार्थ प्राप्त किये जा सकते हैं।
अत्रा ना हार्दि क्रवणस्य रेजते यत्र मकतिर्विद्यते पूतबन्धीन।
हिन्दी में भावार्थ-जहां पवित्र बुद्धि का वास है वह हृदय के मनोरथ कभी व्यर्थ नहीं जाते।
         जब आदमी किसी विषय विशेष में हृदय लगाकर काम करता है तो उसे सफलता मिल ही जाती है। कुछ लोग अच्छे काम में भी अपना मन पवित्र नहीं रखते तब उनका परेशानी का सामना करना पड़ता है।  यह जीवन संकल्पों का खेल है इसलिये जब तक हम अपना हृदय, लक्ष्य तथा साधन पवित्र रखकर कार्य नहीं करेंगे तब तक सफलता नहीं मिलेगी।  सफलता का मूल मंत्र पवित्र तथा विचार की शुद्धता है। हमारे वेद शास्त्र इसी बात का संदेश देते हैं। जब भी कोई परिश्रम, ईमानदारी तथा पवित्रता से किया जाता है तो उसमें सफलता अवश्य मिलती है।  उसमें देर हो सकती है पर नाकामी मिलने की संभावना नहीं रहती।
लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Thursday, November 15, 2012

भर्तृहरि नीति शतक-धन का नहीं परमात्मा का ध्यान करें (dhan ka nahin bhagwan shiv ka dhyan karn-hindu dharma darshan)

         हमारे देश में श्रीमद्भागवत गीता की चर्चा एक पवित्र ग्रंथ की तरह होती है।  अनेक संत और साधु इसके ज्ञान का प्रचार भी करते हैं पर फिर भी लगता है कि बहुत कम लोग इस समझ पाये हैं।  इसका कारण यह है कि भले ही गीता का अध्ययन कर उसका ज्ञान रट लिया जाये पर जब तक हृदय में वह स्थापित नहीं होगा किसी आचरण मे दृष्टिगोचर न हो वह गीता सिद्ध नहीं माना जा सकता।  दरअसल गीता का नाम लेकर कोई राजयोग का प्रचार करता है तो कोई सहज योग की धारणा व्यक्त करता है। इससे आम भक्तों में यह भाव आता है कि योग केवल सिद्ध लोग ही कर सकते हैं अथवा योग एक कठिन विषय है।
      लोगों ने गीता ज्ञान में सिद्ध हैं या उसकी साधना करत हैं उनको यह बात समझ में तो आ जाती है कि योग एक महत्वपूर्ण विधा है पर उनमें भी बहुत कम लोग बाह्य स्थितियों पर चिंतन या मनन कर यह जान पाते हैं कि योग तो हर आदमी चाहे अनचाहे कर रहा है।  योग का सीधा मतलब यह है कि अपनी इंद्रियों को परमात्मा से जोड़ा जाये।  यह योग ज्ञान होने पर ही किया जा सकता है।  अगर ज्ञान न हो तो आदमी दुर्योग को प्राप्त होता है। मनुष्य की इंद्रियां वह चाहे या न चाहे संसार के विषयों से जुड़ती हैं अंतर यह है कि जो ज्ञानी या साधक हैं वह स्वविवेक से सहजता पूर्वक योग करता है पर अज्ञानी आदमी जहां उसके मन जोड़ दे वहीं बैठ जाता है।  ज्ञानी या साधक परमात्मा का स्मरण करते हुए अपनी इंद्रियों को सांसरिक विषयों से स्वयं जुड़ते हुए सहज स्थिति में ही रहता है जबकि अज्ञानी कभी अपने मन तो कभी दूसरे की राय पर अपने सारे काम करने के कारण क्षणिक सुख प्राप्त करने के बाद दुःख की स्थिति में होता है।
महाराज भर्तृहरि कहते हैं कि
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क्षान्तं न क्षमया गृहोचितसुखं त्यक्तं न संतोषत।
सोढो दुस्सहशीतापपवनक्लेशो न तप्तं पदं।।
ध्यातं वित्तमहर्निश नियमितप्राणैर्न शंभौः पदं।
     हिन्दी में भावार्थ-हमने दान तो किया किन्तु धर्मपूर्वक नहीं, हमने सुख का त्याग किया पर संतुष्ट होकर
नहीं, कष्ट सहन किये पर तप के लिये नहीं, ध्यान तो किया पर अपने प्राण भगवान शंकर की बजाय धन में फंसाये। यही कारण है कि मुनियों की तरह काम करने पर भी फल उन जैसा नहीं मिला।
               हम अगर पतंजलि योग   विज्ञान के साथ ही श्रीमद्भागवत गीता भी  अध्ययन करें तो यह पायेंगे कि ज्ञानी और ज्ञान साधक सहज योग करते हैं पर जिन लोगों के पास अध्यात्मिक ज्ञान नहीं है वह असहज योग को प्राप्त होते हैं।  इंद्रियों अच्छे विषय से भी जुड़ती है तो हमारा कभी उनको दुःखद स्थितियों की तरफ धकेल देता है।  ऐसे में अच्छे विषयों से जुड़ने पर भी अज्ञानी को वह सुख नहीं मिलता तो जो ज्ञानी को मिलता है।  दुःख के साथ  सुख तो जीवन में आते हैं पर ज्ञानी और अज्ञानी  अपने विवेक के अनुसार उसे अलग अलग दृष्टिकोण से देखते हैं।   ज्ञानी सहजयोग करते है जबकि अज्ञानी असहज योग में फंसा रहता है।
लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Writer-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Saturday, November 10, 2012

चाणक्य नीति-गुणों से विद्वानों को प्रसन्न किया जा सकता है (chankya neeti-guno se vidwano ko prasanna kiya ja sakta hai)

                  श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार तत्वज्ञानी इस संसार में अधिक नहीं होते। सामान्य सांसरिक जीवन तो केवल धन के आधार पर ही चलता है। इसलिये सामान्य मनुष्यों से यह आशा करना एकदम व्यर्थ है कि कि लोग गरीब मगर गुणी आदमी का सम्मान करें। अधिकतर लोग अपनी भौतिक आवश्यकताओं को लेकर परेशान रहते हैं। कई लोग तो उधार की आशा में साहुकारों की चाटुकारिता करते है कि उन्होंने उनसे उधार लिया है या फिर भविष्य में उससे लेना पड़ सकता है। हमेशा ही धन की चाहत में लगे लोगों के लिये धनवान और महल आकर्षण का केंद्र बने रहते हैं। यही कारण है कि समाज का नियंत्रण स्वाभाविक रूप से धनिकों के हाथ में रहता है।
                                   चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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                      यस्याऽर्थातस्थ्य मित्राणि यस्याऽर्थास्तस्य बान्धवाः।
                           यस्याऽर्थाः स पुमांल्लोकेयस्याऽर्था स च पंडितः।।
                  ‘‘यह इस सांसर के समस्त समाजों का सच है कि जिसके पास धन है उसके बंधु बांधव बहुत है। उसे विद्वान और सम्मानित माना जाता है। यहां तक कि अगर व्यक्ति के पास धन अधिक हो तो उसे महान ज्ञानी माना जाता है।’’
                         स्वर्गस्थितनामिह जीवलोके चत्वारि चिह्ननि वसन्ति देहे।
                        दानप्रसङ्गो मधुरा च वाणी देवाऽर्चनं ब्राह्मणतर्पणं च।।
                 "स्वर्ग से इस धरती पर अवतरित होने वाले दिव्य चार गुण पाये जाते हैं-दान देना, मधुर वचन बोलना देवताओं के प्रति निष्ठा तथा विद्वानों को प्रसन्न करना।’’
                     ऐसे में अल्पधनियों को कभी इस बात की चिंता नहीं करना चाहिए कि उनका हर आदमी सम्मान करे। उन्हें अपने सात्विक गुणों का विकास करना चाहिए। मूल बात यह है कि हम अपनी दृष्टि में बेहतर आदमी बने रहें। श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान दूसरों के सामने बघारना आसान है पर उसे धारण कर अपनी जीवन की राह पर चलना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण का गीता में दिया गया संदेश दूसरों को सुधारने की बजाय स्वयं का चेहरा दर्पण में देखने को प्रेरित करता है। वैसे हम धनी हों या अल्पधनी दूसरों से सच्चे सम्मान की अपेक्षा नहीं करना चाहिए। आम मनुष्यों के हृदय में दूसरों के लिये सम्मान की भावना कम ही रहती है। धनिक होने से भले ही समाज सम्मानीय और ज्ञानी माने पर इस कारण अपने स्वाभाविक गुणों का त्याग कर उसका पीछा नहीं करना चाहिए।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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