समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढ़ें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका


हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर
Showing posts with label literature. Show all posts
Showing posts with label literature. Show all posts

Saturday, November 10, 2012

चाणक्य नीति-गुणों से विद्वानों को प्रसन्न किया जा सकता है (chankya neeti-guno se vidwano ko prasanna kiya ja sakta hai)

                  श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार तत्वज्ञानी इस संसार में अधिक नहीं होते। सामान्य सांसरिक जीवन तो केवल धन के आधार पर ही चलता है। इसलिये सामान्य मनुष्यों से यह आशा करना एकदम व्यर्थ है कि कि लोग गरीब मगर गुणी आदमी का सम्मान करें। अधिकतर लोग अपनी भौतिक आवश्यकताओं को लेकर परेशान रहते हैं। कई लोग तो उधार की आशा में साहुकारों की चाटुकारिता करते है कि उन्होंने उनसे उधार लिया है या फिर भविष्य में उससे लेना पड़ सकता है। हमेशा ही धन की चाहत में लगे लोगों के लिये धनवान और महल आकर्षण का केंद्र बने रहते हैं। यही कारण है कि समाज का नियंत्रण स्वाभाविक रूप से धनिकों के हाथ में रहता है।
                                   चाणक्य नीति में कहा गया है कि
                                            -----------------------
                      यस्याऽर्थातस्थ्य मित्राणि यस्याऽर्थास्तस्य बान्धवाः।
                           यस्याऽर्थाः स पुमांल्लोकेयस्याऽर्था स च पंडितः।।
                  ‘‘यह इस सांसर के समस्त समाजों का सच है कि जिसके पास धन है उसके बंधु बांधव बहुत है। उसे विद्वान और सम्मानित माना जाता है। यहां तक कि अगर व्यक्ति के पास धन अधिक हो तो उसे महान ज्ञानी माना जाता है।’’
                         स्वर्गस्थितनामिह जीवलोके चत्वारि चिह्ननि वसन्ति देहे।
                        दानप्रसङ्गो मधुरा च वाणी देवाऽर्चनं ब्राह्मणतर्पणं च।।
                 "स्वर्ग से इस धरती पर अवतरित होने वाले दिव्य चार गुण पाये जाते हैं-दान देना, मधुर वचन बोलना देवताओं के प्रति निष्ठा तथा विद्वानों को प्रसन्न करना।’’
                     ऐसे में अल्पधनियों को कभी इस बात की चिंता नहीं करना चाहिए कि उनका हर आदमी सम्मान करे। उन्हें अपने सात्विक गुणों का विकास करना चाहिए। मूल बात यह है कि हम अपनी दृष्टि में बेहतर आदमी बने रहें। श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान दूसरों के सामने बघारना आसान है पर उसे धारण कर अपनी जीवन की राह पर चलना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण का गीता में दिया गया संदेश दूसरों को सुधारने की बजाय स्वयं का चेहरा दर्पण में देखने को प्रेरित करता है। वैसे हम धनी हों या अल्पधनी दूसरों से सच्चे सम्मान की अपेक्षा नहीं करना चाहिए। आम मनुष्यों के हृदय में दूसरों के लिये सम्मान की भावना कम ही रहती है। धनिक होने से भले ही समाज सम्मानीय और ज्ञानी माने पर इस कारण अपने स्वाभाविक गुणों का त्याग कर उसका पीछा नहीं करना चाहिए।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की धर्म संदेश पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका
6.दीपक भारतदीप की हिन्दी एक्सप्रेस-पत्रिका
7.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Wednesday, August 29, 2012

तन का मैल और मन का का मैल-योग साधना पर चिंत्तन

 
         तन का मैल नहाने और मन का मैल भक्ति से निकलता है, अक्सर प्रवचनकर्ता यह बात कहते हैं।  यह बरत सही भी है। जब हम अपनी देह और मन के विषय पर आत्ममंथन करते हैं तो पाते हैं कि कछ कमी रह जाती है। हम जमकर नहायें और हृदय से भक्ति करने का प्रयास भी करें तब भी लगता है कि कुछ छूट रहा है। इसका उपाय हमारे समझ में नहीं आता। यह कमी क्या है? क्यों रह जाती है।
    दरअसल हमारी देह गुणों के वशीभूत है। हम प्रतिदिन जो खाते हैं वह मल के रूप में हमारे अंदर विराजमान रहता ही है। महान नीति विशारद चाणक्य का कहते हैं कि हमारे निष्कासन अंग कभी पूरी तरह स्वच्छ नहीं रहते।
    यह मल हमारे मन मस्तिष्क को प्रभावित करता है। इससे बचने का उपाय है योग साधना।  सुबह या शाम हम जब मल विसर्जन करते हैं तब लगता है कि हमारी देह अंदर से स्वच्छ हो गयी पर ऐसा होता नहीं है। योग साधना का अनुभव होने पर यह पता चलता है कि हमारे अंदर मल बहुत बड़ी मात्रा में रह जाता है जो अंततः दैहिक तथा मन के विकारों को उत्पन्न करता है। श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार मनुष्य का मन, बुद्धि तथा देह गुणों के वशीभूत है। जब देह में विकार होत तो मन और बुद्धि में शुद्धता और पवित्रता की आशा करना व्यर्थ है।  दरअसल अपनी देह को एक दुष्टा की तरह देखने की आवश्यकता है।  हम अनेक बार तनाव तथा अशांति के दौर में पहुंच जाते हैं तब मानसिक संताप से स्वयं को कष्ट पहुंचाने के अलावा कुछ नहीं कर पाते। इससे बचने के उपाय के रूप  में योग साधना एक महत्वपूर्ण उपाय है।

   नियमित योग साधना को कोई लाभ होता है। एक समय ऐसा भी आता है जब हमारी देह इतनी आदी हो जाती है तब यह लगता है कि अब कोई नहीं हो रहा है, पर यह सोच गलत है

।  नियमित योग साधना करते हुए हमें यह भी सोचना चाहिये   हम उन हानियों से भी बचे रहते हैं जो इसका अभ्यास न करने पर पहुंचती हैं।
लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की धर्म संदेश पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका
6.दीपक भारतदीप की हिन्दी एक्सप्रेस-पत्रिका
7.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका




Saturday, June 2, 2012

पतंजलि योग साहित्य-क्लेश का संबंध सुख से है (patanjali yog sahitya-sukh aur kliesh ka sambamdh)

         पंचतत्वों से बनी इस देह में मन, बुद्धि और अहंकार प्रकृति स्वतः विराजती हैं। मनुष्य का मन तो अत्यंत चंचल माना जाता है। यही मन मनुष्य का स्वामी बन जाता है और जीवात्मा का ज्ञान नहीं होने देता। अध्यात्म के ज्ञान के अभाव में सांसरिक क्रियाओं के अनुकूल मनुष्य प्रसन्न होता है तो प्रतिकूल होने पर भारी तनाव में घिर जाता है। मकान नहीं है तो दुःख है और है उसके होने पर सुख होने के बावजूद उसके रखरखाव की चिंता भी होती है। धन अधिक है तो उसके लुटने का भय और कम है नहीं है या कम है, तो भी सांसरिक क्रियाओं को करने में परेशानी आती है मनुष्य सारा जीवन इन्हीं  अपनी कार्यकलापों के अंतद्वंद्वों में गुजार देता है। विरले ज्ञानी ही इस संसार में रहकर हर स्थिति में आनंद लेते हुए परमात्मा की इस संसार रचना को देखा करते हैं। अगर किसी वस्तु का सुख है तो उसके प्रति मन में राग है और यह उसके छिन जाने पर क्लेश पैदा होता है। कोई वस्तु नहीं है तो उसका दुःख इसलिये है कि वह दूसरे के पास है। यह द्वेष भाव है जिसे पहचानना सरल नहीं है। मृत्यु का भय तो समस्त प्राणियों को रहता है चाहे वह ज्ञानी ही क्यों न हो। मनुष्य का पक्षु पक्षियों में भी यह भय देखा जाता है।
पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
-------------------
सुखानुशयी रागः।
‘‘सुख के अनुभव के पीछे रहने वाला क्लेश राग है।’’
‘‘दुःखानुशयी द्वेषः।
‘‘दुःख के अनुभव पीछे रहने वाला क्लेश द्वेष है।’’
स्वरसवाही विदुषोऽपि तथा रूडोऽभिनिवेशः।।
            ‘‘मनुष्य जाति में परंपरागत रूप से स्वाभाविक रूप से जो चला आ रहा है वह मृत्यु का क्लेश ज्ञानियों में भी देखा जाता है। उसे अभिनिवेश कहा जाता है।’’
ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः।
           ‘‘ये सभी सूक्ष्मावस्था से प्राप्त क्लेश चित्त को अपने कारण में विलीन करने के साधन से नष्ट करने योग्य हैं।’’
ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः।।
‘‘उन क्लेशों की वृत्तियां ध्यान से नष्ट करने योग्य हैं।’’
       इस तरह अंतद्वंद्वों में फंसी अपनी मनस्थिति से बचने का उपाय बस ध्यान ही है। ध्यान में जो शक्ति है उसका बहुत कम प्रचार होता है। योगासन, प्राणायाम और मंत्रजाप से लाभ होते हैं पर उनकी अनुभूति के लिये ध्यान का अभ्यास होना आवश्यक है। दरअसल योग साधना भी एक तरह का यज्ञ है। इससे कोई भौतिक अमृत प्रकट नहीं होता। इससे अन्तर्मन   में जो शुद्ध होती है उसकी अमृत की तरह अनुभूति केवल ध्यान से ही की जा सकती है। इसी ध्यान से ही ज्ञान के प्रति धारणा पुष्ट होती है। हमें जो सुख या दुःख प्राप्त होता है वह मन के सूक्ष्म में ही अनुभव होते हैं और उनका निष्पादन ध्यान से ही करना संभव है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Friday, September 16, 2011

भर्तृहरि नीति शतक-जितना धन भाग्य में है उससे ज्यादा नहीं मिलता (bhritrihari neeti shatak-bhagya aur dhan, luck and money)

            मनुष्य के जीवन में धन का होना अनिवार्य है पर उसके लिये उसे पागलों की तरह इधर उधर भागकर अपना समय बर्बाद करना व्यर्थ है। यह सही है कि मनुष्य को अपनी जीविका के लिये प्रयास करना चाहिए। त्रिगुणमयी माया उसे     इस बात के लिये बाध्य भी करती है कि वह सांसरिक कर्म में लिप्त होकर समय बिताये। सामान्य मनुष्य माया के जाल में फंसकर केवल उसे इर्दगिर्द चक्कर काटते हुए जीवन बर्बाद कर देते हैं। जिनके पास पैसा अधिक नहीं होता वह अधिक पाने के चक्कर में रहते हैं तो जिनके पास अधिक धन आ गया वह अपने कर्मफल का प्रतीक बताते हुए मदांध हो जाते हैं। खेलती माया है पर आदमी सोचता है कि मैं खेल रहा हूं।
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
---------------------
यद्धात्रा निजभालपट्ट लिखित स्तोकं महद्वा धनं तत्प्राप्तनोति मरुस्थलेऽपि नितरां मेरी ततोनाधिकम्।
तद्धीरो भव वित्तवत्सु कृपणां वृत्ति वुथा सा कृथाः कृपे पश्य पयोनिधावपि घटो गृह्णाति तुल्यं जलम्।।
            ‘परमात्मा ने जिस मनुष्य के हाथ में थोड़ा धन भी लिखा है तो वही प्राप्त होता है। उससे अधिक की प्राप्ति तो सोने के सुमेरु पर्वत पर जाने से भी नहीं होती। इसलिये जितना मिले उसी में संतोष करते हुए कभी धनिकों में सामने दीन नहीं बनना चाहिए। याद रखो कुंऐं में डालो अथवा समंदर में, जितना घड़ा होता है उतना ही पानी उसमें मिलता है।’’
             आदमी के पास जब धन अल्प मात्रा में होता है तो वह धनिकों के मुख की तरफ ताकता है। इतना ही नहीं कोई धनी कुछ देता हो या नहीं वह उसकी तरफ ऐसे देखता है जैसे कि वह समाज का मालिक हो और कभी न कभी उसका भला करेगा। सच बात तो यह है कि अल्प धनिक कभी यह बात नहीं सोचते कि जिन लोगों ने धन कमाया ही इसलिये है कि वह समाज पर राज्य कर सकें वह कभी स्वयं व्यय कर प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं करते क्योंकि उनको लगता है कि धन कम होगा तो उनकी सम्मान कम होगा या फिर लोग उनको लाचार समझेंगे। जहां तक किसी का भला करने का सवाल है तो समय पर पड़ने पर कुछ लोग अनेपक्षित रूप से मदद कर जातेम हैं और जिनसे अपेक्षा होती है वह मुंह फेर कर चल देते हैं। परोपकार करना एक ऐसी प्रवृत्ति है जो अल्पधनिकों में अधिक पाई जाती है जिनसे समान वर्ग वाले लोग कभी अपेक्षा नहीं करते।
------------
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की धर्म संदेश पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका
6.दीपक भारतदीप की हिन्दी एक्सप्रेस-पत्रिका
7.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Saturday, September 10, 2011

भर्तृहरि नीति शतक-मायावी धन आदमी को घुमाता रहता है (money and man-bhrtrihari neeti shatak)

             मनुष्य का यह स्वभाव है कि वह अगर धनार्जन करता है तो उसे व्यय के लिये भी तत्पर रहता है। जैसे जैसे उसके पास धन संपदा बढ़ती है अपना वैभव दिखाने के लिये वह उतना ही उतावला होता हैै। अगर कोई अल्पधनी अपनी मेहनत से धनवान हो जाता है तो उसे इस बात की प्रसन्नता कम होती है बल्कि वह इस चिंता को अधिक पाल लेता है कि वह अपने वैभव का प्रदर्शन समाज के सामने कर अपनी गरीब की छवि से मुक्ति पाये।
         नवधनाढ्य आदमी समाज के सामने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने कें लिये अनेक पदार्थों का संचय करता है। अपनी चाल ढाल से वह यह सिद्ध करने का प्रयास करता है कि वह अब धनवान हो गया है। यही कारण है कि हमारे देश में धनवानों की बढ़ती संख्या के कारण भौतिक पदार्थों के संचय के साथ ही विलासिता का प्रदर्शन भी तेज हो गया है।
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
-------------------
परिक्षीणः कश्चित्स्पृहयति यवानां प्रसृतये स पश्चात्सम्पूर्णः कलयति धरित्रीं तृणसमाम्।
अतश्चानैकान्त्याद् गुरु लघुतयाऽर्थेषु धनिनामवस्था वस्तुनि प्रथयति च संकोचयति च।।
         ‘‘जब मनुष्य गरीब होता है तब वह अपने रहने के लिये एक गज जमीन की चाहत करता है पर जब अमीर होने पर वही पूरे भूमंडल की कामना करने लगता है। इस संसार में अनेक पदार्थ हैं और अमीरी गरीबी के अनुसार उनको पाने की कामना बदलती रहती है। वस्तुओं का महत्व भी मनुष्य की आर्थिक स्थिति के अनुसार बदलता रहता है।"
            जहां तक धन कम या ज्यादा होने का सवाल है तो यह त्रिगुणमयी माया अपने रंग रूप इंसान को इस तरह दिखाती है कि वह उसी को ही सत्य मानकर उसके इर्दगिर्द घूमता रहता है। अपनी आत्मा और परमात्मा विषयक अध्यात्म ज्ञान उसके लिये सन्यासियों का विषय होता है। धन न होने पर आदमी अपने सांसरिक संघर्ष में निरंतर व्यस्त रहता है इसलिये सत्संग तथा ज्ञान चर्चा उसके लिये दूर की कौड़ी हो जाती है तो धन आने पर आदमी ऐसे सात्विक स्थानों पर भी अपने राजस भाव का प्रदर्शन बहुत उत्तेजना के साथ करता है जहां अध्यात्मिक विषयक विचार हो रहा है। मजे की बात यह है कि धनवान लोगों को यह भ्रम रहता है कि उनके पास अध्यात्मिक ज्ञान है वह उसका बखान भी करते हैं। यह अलग बात है कि उनकी वाणी के पीछे ज्ञान का नहीं  वरन् धन का ओज होता है। उनके सामने प्रस्तुत लोग ज्ञान बघारते समय भले कुछ न कहें पर पीठ पीछे  उन पर हंसते हैं। वजह साफ है, ज्ञान का प्रमाण भौतिक पदार्थों की उपलिब्ध नहीं वरन! उनका त्याग है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की धर्म संदेश पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका
6.दीपक भारतदीप की हिन्दी एक्सप्रेस-पत्रिका
7.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Friday, August 26, 2011

चाणक्य नीति-मांस से दस गुना ज्यादा ताकत देशी घी में होती है (chankya neeti-ghee aur maans)

        आजकल जीवन और रहन सहन का स्वरूप बदल गया है। इतना ही नहीं दिनचर्या और कार्य करने की शैली भी इतनी इतनी बदल गयी है कि लोग अपने पेट के लिये कमाने का दावा अवश्यक करते हैं कि पर सेवन किये जाने वाले पदार्थ से उनके स्वास्थ्य पर कितना अच्छा या बुरा प्रभाव पड़ता है इसका अध्ययन नहीं करते। हमारे यहां दूध से बने भोज्य पदार्थ-दही, मक्खन और घी-शरीर के लिये अत्यंत लाभकारी और शक्तिबर्द्धक माने जाते हैं जबकि प्रचार इस बात का किया जाता है कि मांस से मनुष्य की शक्ति बढ़ती है। यह सिद्धांत भ्रम पर आधारित है। हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार देशी घी अत्यंत शक्तिवर्द्धक है और उसमें मांस से दस गुना अधिक शक्ति होती है।
महान नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि
----------------------
अन्नाद्दशगुणं पिष्टं पिष्टाद्दशगुणं पयः।
पयसोऽष्टगुणं मांसं मांसाद्दशगुणं घृतम्।
         ‘‘अनाज से दस गुना गुण आटे में, आटे से दस गुना अधिक शक्ति दूध में, दूध से आठ गुना अधिक मांस में है और मांस से दस गुना अधिक शक्ति घी में है।
शाकेन रोगा वर्धन्ते पयसा वर्धते तनुः।
धृतेन वर्धते वीर्य मांसान्मांसं प्रवर्धते।।
           ‘‘साग से रोग बढ़ते हैं, दूध से शरीर, घी से वीर्य और मांस से मांस बढ़ता है।’’
        आजकल फास्ट फूड के सेवन के नाम पर अस्वास्थ्यवर्द्धक वस्तुओं का सेवन बहुत तेजी से बढ़ा है जिस कारण अस्पतालों में मरीजों की भीड़ अधिक होने लगी है। अब हालत यह है कि युवा वर्ग में भी हृदय रोग, मधुमेह और अन्य ऐसे रोग घर करने लगे हैं जो आमतौर से बढ़ी आयु वर्ग के लोगों में दिखाई देते है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ देश में रोगी समाज की वृद्धि से चिंतित है पर इस मूल बात पर किसी का ध्यान नहीं है कि यह सब खानपान की बदलती प्रवृत्ति के कारण है। आज के युवा वर्ग को यह बात समझना चाहिए कि भारतीय स्थितियों के अनुकूल परंपरागत भोज्य पदार्थों को सेवन कर अपने स्वास्थ्य का उच्च स्तर बनाये रखे।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
4.दीपक भारतदीप की धर्म संदेश पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की अमृत संदेश-पत्रिका
6.दीपक भारतदीप की हिन्दी एक्सप्रेस-पत्रिका
7.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Saturday, July 9, 2011

वेद शास्त्रों से-कर्म और फल का कोई नियम नहीं है (ved shastron se-karma aur fal ka niyam nahin)

        किसी भी कर्म का फल मिलता है उसमें देर सबेर हो सकती है। हालांकि यह कोई नियम नहीं है कि सभी कर्मों का फल कर्ता की इच्छानुसार प्राप्त हो। शायद यही कारण है कि हमारे यहां अध्यात्मिक दर्शन में सांसरिक कर्म में निष्काम कर्म की बात कही गयी है।
वेदांत दर्शन में कहा गया है कि
---------------
उपलब्धिवदनियमः।
‘‘भोगों की प्रप्तियों की भांति कर्म करने में भी कोई नियम नहीं है।
यथा तक्षाभयथा।
इसके सिवाय जैसे कारीगर कभी काम करता है कभी नहीं करता है।
          वैसे फल की इच्छा करते हुए जब कर्म किया जाता है तो हमारा मन विचलित होने के साथ मस्तिष्क की एकाग्रता भंग होने की आशंका रहती है और कर्म उचित प्रकार से संपन्न नहीं हो पाता। दूसरी बात यह भी है कि जब कर्म के बाद फल प्राप्त नहीं होता या उसमें विलंब होता है तो व्यर्थ का तनाव पैदा होता है। हमें यह समझना चाहिए कि प्रकृति भी एक कारीगर की तरह है जो कभी कर्म करती है कभी नहीं करती है। मनुष्य का यह धर्म है कि वह अपना नियमित कर्म करे पर फल देने या न देने की का निर्णय प्रकृति पर छोड़ देना चाहिए।
मूल बात यह है कि हमें अधिक अपेक्षायें, इच्छायें और कामनायें मन में नहीं रखना चाहिए। कालांतर में उनके पूर्ण होने पर सुख मिलता है और न मिलने पर दुःख होने लगता है। तत्वज्ञानी इसलिये ही सुख, दुख, प्रसन्नता, शोक तथा मान सम्मान से परे हो जाते हैं क्योंकि वह जानते है इस संसार में सभी चीजें नश्वर हैं। सत्य जहां सूक्ष्म और स्थिर है वहीं माया विस्तार पाने के साथ ही रूप बदलती है। उत्पन्न होकर नष्ट होना फिर प्रकट होना माया की सामान्य प्रकृति है। जिस तरह सत्य या परमात्मा अनंत है वैसे ही माया भी अनंत है। उसके नियम समझना भी कठिन है।
इसके विपरीत सामान्य मनुष्य माया को अपने वश करने कें लिये पूरी जिंदगी दाव पर लगा देता है पर हाथ उसके कुछ नहीं आता। खेलती माया है उसके नियम अज्ञात हैं फिर भी आदमी यही सोचता है कि वह अपने नियमों के अनुसार खेल रहा है।
---------
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

Wednesday, May 25, 2011

चाणक्य नीति-कमाई से ज्यादा खर्च करना संकट का कारण (chankya niti-kamai aur kharch sankat ka karan)

              वैश्विक उदारीकरण के चलते विश्व में उधार लेकर उपभोग की वस्तुऐं क्रय करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। हमारे देश में तो वैसे ही रोजगार की कमी रहती है उस पर आजकल आधुनिक सुख सुविधाओं की वस्तुऐं जुटाने के लोग इतने आतुर हो जाते हैं कि अपने आय के साधनों की परवाह ही नहीं करते जिससे उनके यहां घरेलु आर्थिक संकट बिना बुलाये मेहमान की तरह हमेशा विराजमान रहता है। इसके अलावा कामकाज के आधुनिक साधनों की वजह से वैसे भी श्रम का उपयोग कम होने से बेरोजगारी बढ़ रही है जिसकी वजह से हमारे यहां युवाओं के लिये विकास का मार्ग अवरुद्ध हो रहा है। मगर उनको भी मोबाइल, कंप्यूटर, गाड़ी और अन्य सामान चाहिए जिससे उनमें से अनेक लोग अपराध की तरफ चले जाते हैं।
             इस विषय पर चाणक्य नीति में कहा गया है कि
                ---------------------------------------------------
            अनालोक्य व्ययं कर्ता ह्मनाथ‘ कलहप्रियः।
            आतुरः सर्वक्षेत्रेषु नरः शीघ्रं विनश्यति।।
             ‘‘बिना विचार किये अपनी आय से अधिक व्यय करने वाला, साथियों के बिना ही अपना सामूहिक अभियान या युद्ध प्रारंभ करने वाला तथा अनेक स्त्रियों में रुचि रखने वाला व्यक्ति शीघ्र ही प्राप्त होता है।’’
                  हम अगर आज अपने समाज की स्थिति पर नज़र डालें तो ऐसा लगता है कि वह एक पतनशील समाज हो गया है। लोभ, लालच और अहंकार के वश लोग एक दूसरे से भावनात्मक रूप से कट गये हैं और रिश्ते केवल नाम के रह गये हैं। उससे भी बदतर हालत यह है कि आजकल कोई आदमी संकट पड़ने पर किसी पर भरोसा नहंी करता। यही कारण है कि लोग कर्ज लेकर पहले तो घी पी लेते हैं पर जब मर्ज बढ़ जाता है तो उनको अपने आर्थिक संकट से उबरने का कोई मार्ग नहीं  दिखता। इसी कारण हमारे देश में आत्महत्या की घटनायें बढ़ गयी हैं। कहीं कहीं तो ऐसा भी होता है कि परिवार का मुखिया अपने पूरे परिवार को जहर देकर बाद में स्वयं भी खा लेता है। वैसे भी आजकल प्रचार माध्यमों ने आम आदमी की चिंत्तन क्षमता को हर लिया है। एक तरफ वह उपभोग की वस्तुऐं के लिये प्रेरित करते है तो दूसरी तरफ ऋण मार्ग का पता भी बताते हैं। ऐसे में जो ज्ञानी और व्यवहारिक लोग हैं वही अपना मानसिक संतुलन रख पाते हैं वरना तो पतन के मार्ग पर चलने को सभी आतुर दिखते हैं।

लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

Wednesday, March 16, 2011

दूसरे पर विश्वास करने की सीमा होती है-हिन्दू अध्यात्मिक लेख (vishvas aur sawdhani-hindu dharmik vichar)

कहा जाता है कि आजकल कलियुग चल रहा है और मनुष्य की प्रवृत्ति पर राक्षसत्व हावी है। ऐसे में सतयुग, त्रेतायुग तथा द्वापर काल में महामनीषियों की कही गयी बातें अधिक प्रासंगिक हो जाती हैं। हालांकि इन सात्विक संदेशों को देखें तो एक प्रश्न उठता है कि हमारे देश में कलियुग कब नहीं रहा। यह भी विचार आता है कि सतयुग, त्रेतायुग या द्वापर में मनुष्य की प्रवृत्तियां दैवीय होने का भ्रम ही है न कि सच। आखिर महान विद्वान विदुर क्यों कहते हैं कि जो अविश्वसनीय हो उस पर तो विश्वास करना ही नहीं चाहिए पर जो विश्वास योग्य हो उस पर भी अधिक विश्वास नहीं करना चाहिए।
महात्मा विदुर कहते हैं
-------------
न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत्।
विश्वासाद भयमुत्पन्नं मूलान्यपि निकृन्तति।
जिस मनुष्य का विश्वास प्रमाणिक न हो उस पर तो विश्वास करना ही नहीं चाहिए पर जिस पर जो योग्य हो उस भी अधिक विश्वास न करें। विश्वास से जो भय उत्पन्न होता है वह मूल लक्ष्य को ही नष्ट कर डालता है।
"अनीर्षुर्गुप्तदारश्च संविभागी पियंवदः।
श्लक्ष्णो मधुरपाक् स्वीणां न चासां वशगो भवेत्।।"
"मनुष्य ईर्ष्या रहित, स्त्रियों की रक्षा करने वाला, संपत्ति का न्यायपूर्वक बांटने वाला, प्रिय वाणी बोलने वाला, साफ सुथरा तथा स्त्रियों से सद्व्यवहार करने वाला हो परंतु किसी के वश में न हो।"
अगर हम आजकल अपने देश में हो रहे अपराधों को देखें तो उनमें से अधिकतर विश्वासघात का परिणाम होते हैं। खासतौर से स्त्रियों के प्रति हो रही अपराधों को देखें। आजकल ऐसी अनेक घटनायें होती हैं जिसमें स्त्रियों के साथ बलात्कार या हत्यायें की जाती हैं। अनेक जगह तो उनको गठरी में मारकर फैंक दिया जाता है। समाज और अपराध विशेषज्ञ कहते हैं कि स्त्रियों के प्रति अपराध उनके निकटस्थ लोग ही करते हैं। कहंी परिवार तो कहीं जानपहचान वाले ही उनको निशाना बनाते हैं। हमारे यहां संयुक्त परिवार की परंपरा के विघटन के बाद स्थितियां बदली हैं। अपने परिवार तथा रिश्तेदारों की बजाय लोग गैरों पर अधिक विश्वास करने लगे हैं। पुरुष के लिये धन का विषय हो या स्त्री के सम्मान का सवाल इसमें अब विश्वासघात अपना काम करने लगा है। आजकल पुरुष हो या स्त्री चिकनी चुकड़ी बातों में आकर हाल ही दूसरे पर विश्वास करने लगते हैं। ऐसे में जहां पुरुष अपना धन तो स्त्री अपने सम्मान के साथ जान तक से हाथ धो बैठती हैं।
हमारा अध्यात्मिक ज्ञान कितना शक्तिशाली और प्रासंगिक है यह हम तभी समझ सकते हैं जब उसका अध्ययन करते हुए ज्ञान को धारण करें। इसलिये भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों का नियमित अध्ययन करना चाहिए। ऐसा करने से जहां ज्ञान प्राप्त होता है वहीं किसी से व्यवहार करने में सतर्कता का भाव पैदा होता है। तब यह भी पता लगता है कि हम ऐसे लोगों पर ही भरोसा करते हैं जिन्होंने अपना साम्राज्य ही धोखे पर खड़ा किया है।
----------------
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

विशिष्ट पत्रिकायें