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Wednesday, August 3, 2011

चाणक्य नीति-अभ्यास न होने से अर्जित ज्ञान भी विष हो जाता है (chankya neeti-abhyas n ho to gyan vish saman)

                भारतीय शिक्षा पद्धति का यह सबसे बड़ा दोष यह है कि वह व्यवहार में कहीं काम नहीं आती। हमारे यहां बच्चों को इतिहास, भूगोल, सामान्य विज्ञान, गणित, अर्थशास्त्र, राजनीतिक शास्त्र तथा साहित्य पढ़ाया जाता है। पढ़ने वालों का एकमात्र उद्देश्य शिक्षा प्रमाणपत्र प्राप्त करना होता है ताकि कहीं उनको नौकरी आदि मिल सके। जिनको मिल गयी उनके लिये काम के दौरान उस ज्ञान का अभ्यास नहीं होता जिससे उन्होंने शिक्षा प्राप्त की है। इससे उनके मन में हमेशा यह कुंठा रहती है कि जो उन्होंने पढ़ा है उसका उपयोग नहीं हो रहा। धीरे धीरे यह कुंठा तनाव का कारण बन जाती है। जिनको नौकरी नहीं मिली वह अन्य कोई श्रमप्रधान काम नहीं कर सकते क्योंकि बचपन से ही उसकी आदत नहीं रही। ऐसे शिक्षित बेरोजगार बनकर समाज ही नहीं परिवार की नज़रों में भी वह लोग खटकते हैं। समय के अनुसार हम देख रहे हैं कि देश में श्रमप्रधान काम करने वालों की संख्या कम होने के साथ ही शैक्षणिक प्रमाणपत्र लेकर नौकरी मांगने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है।
आचार्य चाणक्य कहते हैं कि
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अनभ्यासं विषं शास्वमजीर्णे भोजनं विषम्।
दरिद्रस्य विषं गोष्ठी वृद्धस्वय तरुणी विषम्।।
          ‘‘जिस तरह अपच रोग होने से स्वादिष्ट से स्वादिष्ट भोजन भी विष हो जाता है उसी तरह अभ्यास के अभाव में अर्जित ज्ञान भी विष हो जाता है। दरिद्र आदमी के लिये गोष्ठियां और वृद्ध के लिये तरुणी भी विष समान हो जाती है’’
आलस्योपगता विद्या परहस्तगतं धनम्।
अल्पबीजं इसं क्षेत्रं हतं सैन्यमनायकम्।।
             ‘‘आलस्य मनुष्य का स्वभाव है। इसी दोष के कारण उसके प्रयासों से अर्जित विद्या भी अभ्यास न होने से नष्ट हो जाती है। दूसरे के हाथ में गया धन कभी वापस नहीं आता। बीज अच्छा न होने पर फसल भी वैसे ही होती है।’’
        कहने का अभिप्राय यह है कि आज की शिक्षा पद्धति एकदम बेकार है। देखा जाये तो यह शिक्षा प्रमाण पत्र प्राप्त कर गुलामी करने के लिये ही चलायी गयी है। भारतीय अध्यात्म ज्ञान का इसमें कोई स्थान नहीं है। जिससे मनुष्य में व्यक्तित्व, चरित्र, विचार और आचरण का निर्माण होता है उस ज्ञान का वर्तमान शिक्षा पद्धति में कोई स्थान नहीं है। यही कारण है कि देश में भ्रष्टाचार, अपराध तथा हिंसा की घटनायें आम हो गयी हैं। देखा जाये तो हमारे मनीषियों ने हमारे लिये महान ज्ञान का सृजन किया और उसे हम जानते भी है पर न स्वयं अभ्यास करते हैं न दूसरों को करने देते हैं। कई बार तो कहीं ज्ञान की बातें सुनते हैं तो वह विष की तरह लगती हैं क्योंकि कहीं न कहीं हमारे अंदर कुंठा होती है कि हम उस मार्ग पर नहीं चल रहे जहां सत्य स्थित है। अभ्यास नहीं है तो अध्यात्मिक ज्ञान पर चलते नहीं और इस वजह से जो कुंठा है वह हमारे अंदर मानसिक द्वंद्व को जन्म देती है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Saturday, July 9, 2011

वेद शास्त्रों से-कर्म और फल का कोई नियम नहीं है (ved shastron se-karma aur fal ka niyam nahin)

        किसी भी कर्म का फल मिलता है उसमें देर सबेर हो सकती है। हालांकि यह कोई नियम नहीं है कि सभी कर्मों का फल कर्ता की इच्छानुसार प्राप्त हो। शायद यही कारण है कि हमारे यहां अध्यात्मिक दर्शन में सांसरिक कर्म में निष्काम कर्म की बात कही गयी है।
वेदांत दर्शन में कहा गया है कि
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उपलब्धिवदनियमः।
‘‘भोगों की प्रप्तियों की भांति कर्म करने में भी कोई नियम नहीं है।
यथा तक्षाभयथा।
इसके सिवाय जैसे कारीगर कभी काम करता है कभी नहीं करता है।
          वैसे फल की इच्छा करते हुए जब कर्म किया जाता है तो हमारा मन विचलित होने के साथ मस्तिष्क की एकाग्रता भंग होने की आशंका रहती है और कर्म उचित प्रकार से संपन्न नहीं हो पाता। दूसरी बात यह भी है कि जब कर्म के बाद फल प्राप्त नहीं होता या उसमें विलंब होता है तो व्यर्थ का तनाव पैदा होता है। हमें यह समझना चाहिए कि प्रकृति भी एक कारीगर की तरह है जो कभी कर्म करती है कभी नहीं करती है। मनुष्य का यह धर्म है कि वह अपना नियमित कर्म करे पर फल देने या न देने की का निर्णय प्रकृति पर छोड़ देना चाहिए।
मूल बात यह है कि हमें अधिक अपेक्षायें, इच्छायें और कामनायें मन में नहीं रखना चाहिए। कालांतर में उनके पूर्ण होने पर सुख मिलता है और न मिलने पर दुःख होने लगता है। तत्वज्ञानी इसलिये ही सुख, दुख, प्रसन्नता, शोक तथा मान सम्मान से परे हो जाते हैं क्योंकि वह जानते है इस संसार में सभी चीजें नश्वर हैं। सत्य जहां सूक्ष्म और स्थिर है वहीं माया विस्तार पाने के साथ ही रूप बदलती है। उत्पन्न होकर नष्ट होना फिर प्रकट होना माया की सामान्य प्रकृति है। जिस तरह सत्य या परमात्मा अनंत है वैसे ही माया भी अनंत है। उसके नियम समझना भी कठिन है।
इसके विपरीत सामान्य मनुष्य माया को अपने वश करने कें लिये पूरी जिंदगी दाव पर लगा देता है पर हाथ उसके कुछ नहीं आता। खेलती माया है उसके नियम अज्ञात हैं फिर भी आदमी यही सोचता है कि वह अपने नियमों के अनुसार खेल रहा है।
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संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Friday, July 1, 2011

अध्ययन करने से पहले और बाद में आंखों से पानी को स्पर्श करना उपयोगी-हिन्दी चिंत्तन लेख (study, word and water-hindi chinttan lekh)

          वायु तथा जल को न केवल जीवन का आधार माना गया है कि बल्कि उनको ओषधि भी कहा जाता है। जिस तरह प्रातः प्राणायाम से शुद्ध वायु के प्रवेश से शरीर और मन के आंतरिक विकार बाहर निकलते हैं उसी तरह नहाने के दौरान जल के उपयोग से बाहरी अंगों पर शुद्धता आती है। आधुनिक विज्ञान जल की उपयोगिता को लेकर अनेक अनुंसधान कर चुका है। हालांकि हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों में भी इस विषय पर अनेक बातें कही गयी है।
          मनु स्मृति में कहा गया है कि
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            कृत्वा मूत्रं पूरीपं वा खान्याचान्त उपस्पृशेत्।
            वेदमध्येध्माणश्च अन्नमश्नंश्च सर्वदा
       "मल मूत्र करने के बाद व्यक्ति को सदैव हाथ धोकर आचमन करने के साथ ही पानी का स्पर्श आंखों पर करना चाहिए। सदैव वेद पढ़ने तथा भोजन करने से पहले भी हाथ धोकर आचमन करना चाहिए।"
                आजकल कंप्यूटर का उपयोग बढ़ता जा रहा है पर उससे होने वाली हानियों से रोकने और बचने के उपाय बहुत कम  लोग जानते हैं। कुछ स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि कंप्यूटर का उपयोग करने वालों को बीस मिनट से अधिक उस पर काम करने के बाद दो मिनट आंखें बंद रखना चाहिए। इसके अलावा कंप्यूटर से उठकर बाहर आसमान में ताकना चाहिए ताकि आंखों के उन सूक्ष्म तंतुओं का विस्तार होता है जो काम के दौरान सिकुड़ जाते है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कही गयी है कि कंप्यूटर पर काम करने वालों को अपनी आंखों में पानी की छींटें मारते रहना चाहिए। कंप्यूटर पर काम करते हुए आंखों में जल सूखने लगता है और आंखों में छींटे मारने से वहां ताजगी आती है। मनृस्मृति में भी कहा गया है कि वेद आदि का अध्ययन करने से पहले और बाद दोनों ही समय आंखों में जल का प्रवेश कराना चाहिए। यही बात हम कंप्यूटर पर काम करते समय भी लागू कर सकते हैं। ऐसे प्रयासों से बहुत सीमा तक कंप्यूटर से होने वाली हानियों से बचा जा सकता है।
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',ग्वालियर
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
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Saturday, June 25, 2011

चाणक्य नीति-आचरण में ज्ञान न दिखे वह निरर्थक (acharan aur gyan-chankya neeti)


       आजकल देश में धन की अधिकता के कारण धार्मिक कार्यक्रम अधिक ही होते हैं। इन कार्यक्रमों पर काला या सफेद चाहे जो भी धन खर्च होता है इस पर हम टिप्पणी नहीं करेंगे पर इनकी तादाद देखते हुए तो यह लगता है कि हमारा देश विश्व में एक आदर्श होना चाहिए पर बढ़ते अपराध, भ्रष्टाचार, व्याभिचार तथा अहंकार को देखते हुए यह नहीं लगता कि किसी को हमसे नैतिकता का उपदेश लेना चाहिए। इसका सीधा मतलब है कि लोग ज्ञान चर्चा करते हैं तो केवल यह दिखाने के लिये कि उनकी मनुष्य देह के अंदर भी एक मनुष्य है। धार्मिक सत्संग वाणी विलास तथा मनोरंजन के रूप में होते हैं। गीत संगीत और काव्य से सजे सत्संग मजा जरूर देते हैं पर उनसे ज्ञान प्राप्त नहीं होता। गीत और भजन में अब कोई अंतर नहीं दिखता। लोग यह दिखाने के लिये अधिक प्रयत्नशील हैं कि वह धर्मभीरु हैं पर आचरण पर उनके ज्ञान की छाया नहीं दिखती।
       इस विषय पर महर्षि चाणक्य अपनी नीति में कहते हैं कि
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           हतं ज्ञानं क्रियाहीनं हतश्चाऽज्ञानतो नरः।
         हतं निर्नायकं सैन्यं स्त्रियो नष्टा ह्यभर्तृकाः।।
       ‘‘अगर मनुष्य के पास ज्ञान है पर उसे आचरण में नहीं लाता तो वह व्यर्थ है। अज्ञानी पुरुष का जीवन निरर्थक है। अज्ञानी पुरुष हमेशा असफल रहता है। उसी तरह सेनापति रहित सेना और स्वामीरहित स्त्रियां नष्ट हो जाती हैं।"
           विकास के नाम पर विनाशलीला अपना रूप दिखा रही है। अपराधों के समाचारों को देखते हुए तो ऐसा लगता है कि जिस हम संस्कृति की बात करते हैं वह कभी की लुप्त हो गयी है। सामाजिक और पारिवारिक रिश्ते नाम के लिये हो गये हैं। धन हैं तो वह भी निभा लो नहीं तो भूल जाओ। पाश्चात्य सभ्यता को विकास का पर्याय माने लेने के बाद हमें भारतीय सस्कृति के प्रति मोह है पर अपनी स्वार्थ पूर्ति तक ही वह रहता है। कहने का अभिप्राय यह है कि ज्ञान हमारे पास खूब है पर आचरण में नहीं है इसलिये ही समाज अब टूटता जा रहा है। ऐसे में समूचे समाज को संबोधित कर उसे सुधरने का उपदेश देने से अच्छा है हम स्वयं आत्ममंथन करें और अपने आचरण सुधारे।
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',ग्वालियर
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Sunday, June 19, 2011

चाणक्य नीति-जिसका अनिष्ट करना हो उससे मधुर वाणी में बात करें(chankya neeti-jiska bura karna ho usse meetha bolen)

       वैसे तो हर आदमी को सदैव मीठा बोलना चाहिए पर इसकी परिवार और मित्रता के व्यवहार में इसकी सीमा है। अपने परिवार के सदस्यों और मित्रों में जिन लोगों का व्यवहार सुधारना है उनसे कभी कभी सख्ती से भी पेश आना चाहिए वरना उनके मार्ग से भटकने की संभावना भी रहती है। इतना ही नहीं अपने निकटस्थ व्यक्तियों के कार्यों पर नज़र हमेशा रखना चाहिए। अगर वह कोई ऐसा काम करते हैं जो कालांतर में उनके लिये दुःख का कारण बनने की संभावना हो तो उन्हें सख्त लहजे में समझाना चाहिए।
       हमारे यहां कुछ आधुनिक विद्वानों का मानना है कि अगर बेटे के पांव में जूता बाप की नाप के बराबर या बेटी की जुती का माप मां की माप के बराबर हो तो वह उनको मित्र या सहेली समझें। फिल्मों और टीवी धारावाहिकों में भी पात्र ऐसे रचे जाते हैं जिसमें माता पिता अपनी पुत्री या पुत्र से इस तरह व्यवहार शालीन व्यवहार करते हैं जैसे कि वह उनके बराबर हों। हम इसका विरोध नहीं कर रहे पर यह भी एक सच्चाई कि फिल्म और टीवी जैसेे आदर्श चरित्र सामान्य जीवन में दिखाई नहीं देते। समाज के सत्य उससे ज्यादा कटु हैं जितने उनके काल्पनिक कथानकों में दिखाई देते हैं। आज की लड़के लड़कियों पर उनके शैक्षणिक संस्थान दूर होने तथा उनके सत्रों के बड़े होने के कारण माता पिता कम ही नज़र रख पाते हैं जिस कारण ऐसी घटनायें सामने आती हैं जो वीभत्स दृश्य होने के कारण लोगों के मन में पीड़ित के प्रति करुणा का भाव पैदा करती हैं। पुत्र या पुत्री कारुणिक स्थिति में पहुंचे उससे अच्छा है कि मन मारकर उनके साथ सख्त व्यवहार रखना भी जरूरी लगता है
        महान नीति विशारद चाणक्य कहता है कि
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        यस्य चाप्रियामिच्छेत तस्य ब्रूयात् सदा प्रियम्।
          व्याधो मृगवधं कर्तृ गीतं गायति सुस्वरम्।।
            ‘जिसका बुरा करने की इच्छा हो उसके साथ हमेशा ही मीठा बोलना चाहिए जैसे शिकारी हिरण का      वध करने के लिये मीठे स्वर में   गीत गाता है।’’
          उसी तरह यह भी देखना चाहिए कि हमसे या परिवार और मित्र समुदाय के सदस्यों के साथ कोई अन्य मनुष्य अधिक प्रेमपूर्ण व्यवहार कर रहा है तो उसका उद्देश्य क्या है? इतना ही नहंी अगर हम किसी व्यक्ति का अनिष्ट चाहते हैं तो उसके प्रति सद्व्यवहार दिखायें। अनावश्यक रूप से उसकी प्रशंसा करें तब वह भ्रमित होकर अतिसक्रियता दिखायेगा जो कि कालांतर में उसके लिये घातक होगी।
           चाणक्य नीति केवल राजाओं के लिये ही नहीं  वरन् सामान्य जीवन में कितनी उपयोगी है यह उनके इस तरह के संदेशों से समझा जा सकता है। उनका आशय यही है कि किसी का बुरा न करें। हमेशा सतर्क रहें और अगर विरोधी अक्षम्य अपराध करे तो उसे इतनी चालाकी से अहिंसक होकर दंड दें कि उसे इसका आभास तक न हो।
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',ग्वालियर
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Friday, June 17, 2011

बंदर की तरह उछलकूद कर समाजसेवा नहीं होती-रहीम के दोहे (bandar ki tarah samaj seva-rahim ke dohe)

कविवर रहीम कहते है 
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बड़े दीन को दुख, सुनो, लेत दया उर आनि
हरि हाथीं सौं कब हुतो, कहूं रहीम पहिचानि

         "इस संसार में बड़े लोग तो वह जो छोट आदमी की पीड़ा सुनकर उस पर दया करते हैं, परंतु बंदर कभी हाथी नहीं हो सकता-कुछ लोग बंदर की तरह उछलकूद कर दया दिखाते हैं पर करते कुछ नहीं। वह कभी हाथी नहीं हो सकते।"
            हमारे देश में हमेशा  ही दान तथा परोपकार के जरिये समाज सेवा करने की परंपरा रही है।  यही कारण है की हमारे अधिकतर धार्मिक स्थानों पर तीर्थयात्रियों के धर्मशालाएँ बनवाईं गईं।  वहाँ लंगरखाने बनवाए गए। अब पाश्चत्य संस्कृति के प्रभाव ने समाज सेवा को न केवल व्यापार बना  दिया है बल्कि उसके लिए पैसा दूसरों से लेकर लोगों के कल्याण करने की परंपरा विकसित  की गई है। जिसे हम समाज सेवा की दलाली भी कह सकते हैं। यही कारण है कि आजकल बच्चों, विकलांगों, महिलाओं और तमाम के तरह की बीमारियों के मरीजों की सहायतार्थ संगीत कार्यक्रम, क्रिकेट मैच तथा अन्य मनोरंजक कार्यक्रम होते हैं-जो कि मदद के नाम पर दिखावे से अधिक कुछ नहीं है।  ऐसे कार्यक्रमों में  केवल बंदर की तरह उछलकूद होती है। ऐसे व्यवसायिक कार्यक्रम तो तमाम तरह के आर्थिक लाभ के लिये किये जाते हैं। जो सच्चे समाज सेवी हैं वह बिना किसी उद्देश्य के लोगों की मदद करते है, और वह प्रचार से परे अपना काम वैसे ही किये जाते हैं जैसे हाथी अपनी राह पर बिना किसी की परवाह किये चलता जाता है।
            समझदार लोग तो सब जानते हैं पर कुछ बंदर की तरह उछलकूद कर समाजसेवा का नाटक करने वालों को देखकर इस कटु सत्य को भूल जाते है। कई लोग ऐसे कार्यक्रमों की टिकिट यह सोचकर खरीद लेते हैं कि वह इस तरह दान भी करेंगे और मनोरंजन भी कर लेंगे। उन्हें यह भ्रम तोड़ लेना चाहिये कि वह दान कर रहे हैं क्योंकि सुपात्र को ही दिया दान फलीभूत होता है। अतः हमें अपने बीच एसे लोग की पहचान कर लेना चाहिए जो इस तरह समाज सेवा का नाटक करते है। इनसे तो दूर रहना ही बेहतर है।
       
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',ग्वालियर
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Wednesday, March 16, 2011

दूसरे पर विश्वास करने की सीमा होती है-हिन्दू अध्यात्मिक लेख (vishvas aur sawdhani-hindu dharmik vichar)

कहा जाता है कि आजकल कलियुग चल रहा है और मनुष्य की प्रवृत्ति पर राक्षसत्व हावी है। ऐसे में सतयुग, त्रेतायुग तथा द्वापर काल में महामनीषियों की कही गयी बातें अधिक प्रासंगिक हो जाती हैं। हालांकि इन सात्विक संदेशों को देखें तो एक प्रश्न उठता है कि हमारे देश में कलियुग कब नहीं रहा। यह भी विचार आता है कि सतयुग, त्रेतायुग या द्वापर में मनुष्य की प्रवृत्तियां दैवीय होने का भ्रम ही है न कि सच। आखिर महान विद्वान विदुर क्यों कहते हैं कि जो अविश्वसनीय हो उस पर तो विश्वास करना ही नहीं चाहिए पर जो विश्वास योग्य हो उस पर भी अधिक विश्वास नहीं करना चाहिए।
महात्मा विदुर कहते हैं
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न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत्।
विश्वासाद भयमुत्पन्नं मूलान्यपि निकृन्तति।
जिस मनुष्य का विश्वास प्रमाणिक न हो उस पर तो विश्वास करना ही नहीं चाहिए पर जिस पर जो योग्य हो उस भी अधिक विश्वास न करें। विश्वास से जो भय उत्पन्न होता है वह मूल लक्ष्य को ही नष्ट कर डालता है।
"अनीर्षुर्गुप्तदारश्च संविभागी पियंवदः।
श्लक्ष्णो मधुरपाक् स्वीणां न चासां वशगो भवेत्।।"
"मनुष्य ईर्ष्या रहित, स्त्रियों की रक्षा करने वाला, संपत्ति का न्यायपूर्वक बांटने वाला, प्रिय वाणी बोलने वाला, साफ सुथरा तथा स्त्रियों से सद्व्यवहार करने वाला हो परंतु किसी के वश में न हो।"
अगर हम आजकल अपने देश में हो रहे अपराधों को देखें तो उनमें से अधिकतर विश्वासघात का परिणाम होते हैं। खासतौर से स्त्रियों के प्रति हो रही अपराधों को देखें। आजकल ऐसी अनेक घटनायें होती हैं जिसमें स्त्रियों के साथ बलात्कार या हत्यायें की जाती हैं। अनेक जगह तो उनको गठरी में मारकर फैंक दिया जाता है। समाज और अपराध विशेषज्ञ कहते हैं कि स्त्रियों के प्रति अपराध उनके निकटस्थ लोग ही करते हैं। कहंी परिवार तो कहीं जानपहचान वाले ही उनको निशाना बनाते हैं। हमारे यहां संयुक्त परिवार की परंपरा के विघटन के बाद स्थितियां बदली हैं। अपने परिवार तथा रिश्तेदारों की बजाय लोग गैरों पर अधिक विश्वास करने लगे हैं। पुरुष के लिये धन का विषय हो या स्त्री के सम्मान का सवाल इसमें अब विश्वासघात अपना काम करने लगा है। आजकल पुरुष हो या स्त्री चिकनी चुकड़ी बातों में आकर हाल ही दूसरे पर विश्वास करने लगते हैं। ऐसे में जहां पुरुष अपना धन तो स्त्री अपने सम्मान के साथ जान तक से हाथ धो बैठती हैं।
हमारा अध्यात्मिक ज्ञान कितना शक्तिशाली और प्रासंगिक है यह हम तभी समझ सकते हैं जब उसका अध्ययन करते हुए ज्ञान को धारण करें। इसलिये भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों का नियमित अध्ययन करना चाहिए। ऐसा करने से जहां ज्ञान प्राप्त होता है वहीं किसी से व्यवहार करने में सतर्कता का भाव पैदा होता है। तब यह भी पता लगता है कि हम ऐसे लोगों पर ही भरोसा करते हैं जिन्होंने अपना साम्राज्य ही धोखे पर खड़ा किया है।
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Saturday, February 5, 2011

संकीर्ण मानसिकता वाले लोगों की कमी नहीं है-हिन्दी चिंत्तन आलेख

जैसे जैसे मनुष्य का अध्यात्मिक ज्ञान बढ़ता जाता है वैसे वैसे उसे इस संसार के भोग विलास की वास्तविकता समझ में आती है। उपभोग की प्रवृत्ति किस तरह मनुष्य को पशु बनाकर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये इस संसार में बांधे रहती है इसका आभास तत्वज्ञानी को हो जाता है। ‘दिल मांगे मोर’ का नारा बाज़ार में प्रचार के माध्यम से इसलिये उछाला जाता है कि लोग विज्ञापित वस्तु का क्रय करने के लिये लालायित हों।
समाज में बाज़ार तथा उसके परचार माध्यमों से उपभोग कि प्रवृति बढ़ाई जा रही है रोज देखा जा सकता है।
  एक विज्ञापन में तो भारतीय फिल्मों का एक अभिनेता साफ कहता है कि ‘आदमी को कभी संतुष्ट नहीं होना चाहिए। जो लोग संतुष्ट होते हैं वह जिंदगी में कुछ नहीं कर पाते।’
कहने का अभिप्राय यह है कि मनुष्य की लालच का कोई अंत नहीं है। अक्सर समाचारों में यह चर्चा आती है कि भारत के उच्च वर्ग का बहुत सारा काला धन विदेशी बैंकों में जमा है। यह उच्च वर्ग ऐसा है जो यहां भारत में रहकर आदर्शवाद, नैतिकतावाद तथा कल्याण वाद की राह पर चलने का दावा करते हुए समाज पर नियंत्रण रखता है मगर उसकी पैसे की हवस मिटती नहीं। अनेक राजकीय अधिकारी पकड़े गये हैं जिन्होंने इतना धन अर्जित किया कि उनकी आगे की दस पीढ़ियां भी नहीं खा सकती। इतने सारे आवास बना लिये कि उनकी पचास पीढ़ियों के वंशज भी उसमें रह जायें तो कम लगें। यह केवल उच्च वर्ग ही नहीं सामान्य वर्ग पर भी लागू है। लोगों में अध्यात्मिक ज्ञान के प्रति रुझान ही नहीं रहा। समाज में भौतिकवाद का इतना बोलाबाला है कि अगर तत्वज्ञानी उनमें बैठकर ज्ञानचर्चा करे तो उसे पागल समझा जाता है। जिनके पास अध्यात्मिक ज्ञान है वह सांसरिक विषय में चर्चा करने में रुचि नहीं लेते तो उनको अज्ञानी मान लिया जाता है।
पुण्यैर्मूलफलैस्तथा प्रणयिनीं वृत्तिं कुरुष्वाधुना
भूश्ययां नवपल्लवैरकृपणैरुत्तिष्ठ यावो वनम्।
क्षधद्राणामविवेकमूढ़मनसां यन्नश्वाराणां सदा
वित्तव्याधिविकार विह्व्लगिरां नामापि न श्रूयते।।
"भर्तृहरि महाराज अपने प्रजाजनों से कहते हैं कि अब तुम लोग पवित्र फल फूलों खाकर जीवन यापन करो। सजे हुए बिस्तर छोड़कर प्रकृति की बनाई शय्या यानि धरती पर ही शयन करो। वृक्ष की छाल को ही वस्त्र बना लो लो। अब यहां से चले चलो क्योंकि वहां उन मूर्ख और संकीर्ण मानसिकता वाले लोगों का नाम भी सुनाई नहीं देगा जो अपनी वाणी और संपत्ति से रोगी होने के कारण अपने वश में नहीं है।"
ऐसे में ज्ञानियों के लिये मौन ही अच्छा है। अपने नियमित कर्मं करने के साथ ही ज्ञानियों के लिये यह भी जरूरी है कि वह भौतिकवादी लोगों के बाहुल्य वाले समाज में अर्थ, प्रतिष्ठा या उच्च पद के अभाव में सम्मान या इनाम की आशा न करें। वह तो दृष्टा की तरह इस संसार को देखें और अपना काम करते जायें।
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संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका 

५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका
६.अमृत सन्देश पत्रिका

Saturday, September 11, 2010

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-प्रभाव बढ़ने के साथ शत्रु भी बढ़ते हैं (kautilya ka arthshastra-prabhav aur shatru)

कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया कि
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न जातु गच्छेद्धिश्वासे सन्धितोऽपि हि बुद्धिमान।
अद्रोहसमयं कृत्यां वृत्रमिन्द्रः पुरात्त्वद्यीत्।।

     हिन्दी में भावार्थ-अगर किसी कारणवश किसी से संधि भी की जाये तो उस पर विश्वास नहीं करना चाहिए। मैं वैर नहीं करूंगायह कहकर भी इन्द्र ने वृत्रासुर को मार डाला था।
विकारं याति पुत्रो हि राज्यान्नीचः पिता तथा।
तल्लोकवृत्तांन्नृपतेरन्यद्वृत्नं प्रचक्षते।।

     हिन्दी में भावार्थ-जिस प्रकार के व्यवहार से पुत्र तथा पिता नीच हो जाता है राजा का ऐसा व्यवहार लोक व्यवहार से भिन्न है। 
ज्यायांसं सिंहः साहसं यथं मध्नाति दन्तिनः।
तस्मार्तिह इवोदग्रमात्मानं वीक्ष्ण सम्पतेत्।।

     हिन्दी में भावार्थ-शक्तिशाली सेना को साथ लिए शत्रु को युद्ध में मारने पर राजा का प्रभाव बढ़ता है। इसी प्रताप के कारण सभी जगह उसके दूसरे शत्रु भी पैदा होते हैं।
     वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य जीवन अद्भुत है और रहस्यमय भी। मनुष्य को अन्य जीवों से अधिक बुद्धि वरदान में मिली है और वही उसकी सबसे शत्रु और मित्र भी है। जहां पशु पक्षी तथा अन्य जीव मनुष्य के एक बार मित्र हो जाते हैं तो फिर शत्रुता नहीं करते मगर स्वयं मनुष्य ही एक विश्वसनीय जीव नहीं है। वह परिस्थितियों के अनुसार अपनी वफादारी बदलता रहता है। अतः यह कहना कठिन है कि कोई मित्र अपने संकट निवारण या स्वार्थ सिद्धि का अवसर आने पर विश्वासघात नहीं करेगा। ऐसे में किसी शत्रु से संधि हो या मित्र से नियमित व्यवहार की पक्रिया उसमें कभी स्थाई विश्वास की अपेक्षा नहीं करना चाहिए।
इसके अलावा एक बात यह भी ध्यान रखना चाहिए कि दूसरे के प्रति कठोरता या हिंसा का व्यवहार न करें। अनेक बार मनुष्य अपने को प्रभावशाली सिद्ध करने के लिये अपने से हीन प्राणी पर अनाचार करता है या फिर हमला कर उसे मार डालता है। इससे अन्य मनुष्य डर अवश्य जाते हैं पर मन ही प्रभावशाली आदमी के प्रति शत्रुता का भाव भी पाल लेते हैं। समय आने पर प्रभावशाली आदमी जब संकट में फंसता है तो वह उनका मन प्रसन्न हो जाता है। इसलिये जहां तक हो सके क्रूर तथा हिंसक व्यवहार से बचना चाहिए। संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
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Friday, August 27, 2010

मनुस्मृति-भोजन के लिये जाति या गौत्र के नाम का उपयोग उचित नहीं (bhojan prapt karne ke liye-manu smriti in hindi)

उपासते ये गृहस्थाः परपाकमबुद्धयः।
तेन ते प्रेत्य पशुतां व्रजन्त्यन्नांदिदायिजः।।
हिन्दी में भावार्थ-
मनु महाराज के अनुसार जो निर्बुद्धि मनुष्य अच्छे खाने की लालच में दूसरे स्थान पर जाकर आतिथ्य सत्कार पाने का प्रयास करता है वह अगले जन्म में अन्न खिलाने वाले मनुष्यों के घर में पशु का रूप धारण कर रहता है।
न भोजनार्थ स्वे विप्र कुलगोत्रे निवेदयेत्।
भोजनार्थ हि ते शंसन्न्वान्ताशीत्युच्यते बुधैः।।
हिन्दी में भावार्थ-
किसी भी ज्ञानी आदमी को कहीं से खाना प्राप्त करने के लिये अपने कुल या जाति की सहायता नहीं लेना चाहिए। ऐसा करने वाला व्यक्ति वान्ताशी यानि उल्टी किए गऐ भोजन को खाने वाला माना जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य की जीभ स्वाद के लालायित रहती है। जो ज्ञानी लोग भोजन को केवल पेट भरने के लिये मानते हैं वह तो हर प्रकार के भोजन में संतुष्ट हो जाते हैं पर पेट भरना ही जीवन मानते हैं वह अच्छे खाने के लिये इधर उधर मुंह मारते हैं। जीवन के लिये भोजन आवश्यक है पर कुछ लोग तो भोजन को ही जीवन मानकर उसके पीछे फिरते हैं। ऐसे लोग हमेशा भूखे रहते हैं और अपने घर के खाने को विष समझकर इधर उधर ताकते रहते हैं। एसे लोगों की बुद्धि अत्यंत निकृष्ट होती है।
भोजन हमें इस उद्देश्य से ग्रहण करना चाहिये कि उससे हमारे शरीर को नियमित ऊर्जा मिलती रहे। भोजन में ऐसे पदार्थ ग्रहण करना चाहिए जो भले ही स्वादिष्ट न हों पर सुपाच्य होना चाहिए। जीभ के स्वाद के चक्कर में अज्ञानी लोग ऐसे पदार्थ ग्रहण करते हैं जो पेट के लिए हानिकारक हैं। आजकल हम देख भी रहे है कि स्वादिष्ट पदार्थों के सेवन से बीमारियों का प्रकोप बढ़ रहा है। इसलिये सुपाच्य पदार्थों का ज्ञान प्राप्त कर ही भोजन ग्रहण करना चाहिए।
उसी तरह भोजन प्राप्त करने के लिऐ कभी अपने कुल या गौत्र का नहीं लेकर सदाशयी गृहस्थ की सद्भावना पर ही निर्भर रहना चाहिए। जो लोग अपने भोजन के लिये कुल या जाति का आसरा लेते हैं वह ऐसे ही होते हैं जैसे कि उल्टी का भोजन करने वाले पशु होते हैं।
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Sunday, July 11, 2010

मनु स्मृति-गंदे स्थानों पर पैदा होने वाले पदार्थ खाने से बुद्धि भ्रष्ट होती है (bhojan aur buddhi-manu smriti)

लशुनं, गुंजनं चैव पलाण्डूंु कचकानि च।
अभ्याक्षाणि द्विजातीनामेध्यप्रवानि।
हिन्दी में भावार्थ-
लहसून, शलजम, प्याज, कुकरमुत्ता तथा अन्य ऐसे खाद्य पदार्थ जो गंदे स्थानों पर पैदा होते हैं, उनका सेवन करने से बुद्धि भृष्ट होती है। अतः इनके प्रयोग से बचना चाहिए।
लोहितान् वृक्षनिर्यासान् वश्चनप्रभवांस्तथा।
शेतुं गव्यं य पीयुषं प्रयत्नेन विवर्जयवेत्।
हिन्दी में भावार्थ-
लाल रंग वाले पेड़ों का गोंद, वृक्षों में छिद्र करने से निकलने वाला द्रव्य तथा लेस वाले फल तथा हाल ही में बच्चे को जन्म देने वाली गाय के दूध का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे अकाल मृत्यु की संभावना रहती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हम यह तो जानते हैं कि ‘स्वस्थ शरीर में ही प्रसन्न मन का निवास होता है’, तो हमें यह भी समझना चाहिए कि शीरर में मौजूद तत्व ही हमारी बुद्धि का संचालन करते हैं। हम पचने योग्य वस्तु का भक्षण करें यह बात स्वीकार्य है पर यह भी याद रखना चाहिये कि उनका बुद्धि पर क्या प्रभाव पड़ता है यह भी देखना चाहिए। अक्सर हम कहते हैं कि हमें यह पच जाता है या वह पच जाता है पर रक्त कणों में सम्मिलित उन खाद्य पदार्थों से आये जीवाणु किस मानसिकता के हैं यह भी देखना ठीक है।
देखा जाये तो मांस खाने से भी कोई मर नहीं जाता और लोग उसे पचा भी लेते हैं पर उससे आए विषाणु किस तरह मन को विकृत करते हैं यह उन लोगों की मानसिकता देखकर समझा जाता है जो इसका सेवन करते हैं। शराब तथा अन्य व्यसन करने वाले भी सभी कोई तत्काल नहीं मर जाते पर धीरे धीरे उनका दिमागी संतुलन बिगड़ने लगता है और उसका दुष्प्रभाव उनके जीवन में देखने को मिलता है।
प्याज और लहसुन को स्वास्थय के लिये अच्छा मानाा जाता है पर उनसे निर्मित होने वाली मानसिकता विकृत होती है शायद यही कारण है कि अनेक लोग इनके सेवन से बचते हैं। उसी तरह मांस खाना भी बहुत बुरा जाता है। वैसे मांस खाने वाले सभी उसे पचा लेते हैं पर प्रश्न यह है कि उसके साथ आये  विषैले विषाणु जो रक्त में घुलकर कलुषित मनुष्य की मानसिकता का निर्माण करते हैं उनका अध्ययन अभी तक नहीं किया गया है।
श्री मद्भागवत गीता में कहा गया है कि ‘गुण ही गुणों को बरतते है।’ उसी तरह यह भी एक महावत है कि ‘जैसा खायें अन्न वैसा हो जाये मन’। अन्न खाने से आशय केवल उसके अच्छे या बुरे होने सा नहीं है बल्कि वह किस कमाई से खरीदा गया और कहां पैदा हो यह भी महत्वपूर्ण है। श्री मद भागवत गीता में भोजन के तीन प्रकार-सात्विक, राजसी तथा तामसी-बताये गये हैं। उनका अर्थ और भाव समझ कर खाद्य पदार्थों का सेवन करना चाहिए।
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Saturday, July 10, 2010

पतंजलि योग साहित्य-निर्विचार समाधि से बुद्धि ऋतंभरा होती (patanjali yoga sahitya-nirvichar samadhi)

पतंजलि योग सूत्र एक संपूर्ण विज्ञान है। जिसमें अनेक श्लोक हैं और उनका अर्थ बहुत छोटा लगता है पर उनका प्रभाव अत्यंत व्यापक है। सच तो यह है कि अध्यात्मिक ज्ञान अत्यंत संक्षिप्त होता है पर अगर उनके बताये मार्ग पर चला जाये तो जीवन सहज हो जाता है।
निर्विचारवैशारद्योऽध्यात्मप्रसादः।।
ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा।।
हिन्दी में भावार्थ-
निर्विचार समाधि अत्यंत निर्मल होने पर अध्यात्मप्रसाद प्राप्त होता है। उस समय बुद्धि ऋतंभरा अर्थात किसी वस्तु के सत्य स्वरूप को ग्रहण करने वाली होती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य जाग्रत हो या निद्रा में उसके अंदर विचारों का क्रम चलता रहता है। मस्तिष्क का एक भाग दिन में सक्रिय रहता है जो रात में सुप्तावस्था को प्राप्त होता है। मस्तिष्क के दूसरे भाग से मनुष्य दिन में काम नहीं लेता पर वह रात को स्वप्न देखता है। वैज्ञानिक तथ्य तो यह है कि मनुष्य अपने मस्तिष्क का केवल पांच प्रतिशत भाग ही उपयोग करता है भले ही उसकी सक्रियता अधिक दिखती है।
कहने का मतलब है कि मस्तिष्क कभी विराम नहीं करता। कहने वाले तो यहां तक कहते हैं कि अगर रात के स्वप्न अगर सुबह याद रहें तो इसका मतलब यह है कि आप ने पूरी तरह से निद्रा का सुख प्राप्त नहीं किया।
सच बात तो यह है कि अगर कोई रात को सपना आये तो सुबह उसे याद करने का प्रयास तक नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे मस्तिष्क में अनावश्यक तनाव होता है। इससे बचने का एक ही उपाय है कि समय मिलने पर ध्यान लगाया जाये जिसकी चरम परिणति निर्विचार समाधि के रूप में होती है। जिस तरह शरीर में भोजन आदि ग्रहण किये पदार्थ योगसन से पूरी तरह बाहर विसर्जित किये जाते हैं उसी तरह समाधि से मस्तिष्क में व्याप्त चिंताओं का निराकरण किया जा सकता है। पुताई के लिये जिस तरह सारे घर का सामान बाहर निकालना आवश्यक है उसी तरह मस्तिष्क से विचारों का कचड़ा निकालने के लिये ध्यान लगाना जरूरी है।
जब ध्यान लगाते हैं तब मस्तिष्क में विचारों का क्रम चलता है पर इसकी परवाह न करते हुए अपनी दृष्टि भृकुटि पर ही रखना चाहिए। धीरे धीरे स्वतः लगने लगेगा कि मस्तिष्क में विचारों का क्रम थमता जा रहा है। जब ध्यान में विचारशून्यता की स्थिति उत्पन्न हो तब समझना चाहिये कि मस्तिष्क से विकार निकाल लिये। कई लोगों को यह मजाक लगता हो पर जिन लोगों ने इसका अनुभव किया है वह इसे समझते हैं और ज्ञानी माने जाते हैं। दूसरी बात यह है कि मस्तिष्क में कर्मकांडों का बोझा लिये इंसान इतना अभ्यस्त हो जाता है कि वह उससे निवृत होने का सुख जानता ही नहीं है। मगर जो लोग ध्यान के निर्विचार समाधि से अध्यात्म प्रसाद प्राप्त कर लेते हैं वह जानते हैं कि सच्चा सुख क्या होता है।
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Wednesday, June 23, 2010

मनुस्मृति-प्राणायाम करने से पाप तथा विकार नष्ट होते हैं (pranayam anivarya-hindu dharma sandesh)

प्राणायमाः ब्राहम्ण त्रयोऽपि विधिवत्कृताः।
व्याहृति प्रणवैर्युक्ताः विज्ञेयं परमं तपः।।
हिन्दी में भावार्थ-
किसी साधक द्वारा ओऽम तथा व्याहृति के साथ विधि के अनुसार किए गए तीन प्राणायामों को भी उसका तप ही मानना चाहिए।
दह्यान्ते ध्यायमानानां धालूनां हि यथा भलाः।
तथेन्द्रियाणां दह्यान्ते दोषाः प्राणस्य निग्राहत्।।
हिन्दी में भावार्थ-
अग्नि में सोना चादी, तथा अन्य धातुऐं डालने से जिस प्रकार उनकी अशुद्धता दूर होती है उसी प्राणायाम करने से इंद्रियों के सारे पाप तथा विकार नष्ट होते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-विश्व में आर्थिक उदारीकरण तथा औद्योगिकीरण के कारण प्राकृतिक पर्यावरण बिगड़ने के कारण मनुष्य की मनस्थिति भी बिगड़ी है। एक सर्वेक्षण के अनुसार देश में मनोरोगियों की संख्या 40 प्रतिशत से अधिक है। कई लोगों को तो यह आभास ही नहीं है कि वह मनोरोगी है। हममें से भी अनेक लोगों को दूसरे के मनोरोगी होने का अहसास नहीं होता क्योंकि स्वयं हमें अपने बारे में ही इसका ज्ञान नहीं है। इसके अलावा कंप्यूटर, मोबाईल तथा पेट्रोल चालित वाहनों के उपयोग से हमारे शरीर के स्वास्थ्य पर जो बुरा असर पड़ने से दिमागी संतुलन बिगड़ता है यह तो सभी जानते हैं। इधर हम यह भी देख सकते हैं कि चिकित्सालयों में मरीजों की भीड़ लगी रहती है। कहने का अभिप्राय यह है कि आधुनिक साधनों की उपलब्धता ने रोग बढ़ाये हैं पर उसका इलाज हमारे पास नहीं है।
इधर हम यह भी देख सकते हैं कि विश्व में भारतीय योग साधना का प्रचार बढ़ रहा है। इसका कारण यह है कि योगासन तथा प्राणायाम से शरीर के विकार निकल जाते हैं। सच बात तो यह है कि प्राणायाम के मुकाबले इस धरती पर किसी भी रोग का कोई इलाज नहीं है। इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि प्राणायाम करने पर यह आभास हो जाता है कि इस धरती पर तो किसी रोग की कोई दवा ही नहीं है क्योंकि प्राणायाम करने से जो तन और मन में स्फूर्ति आती है उसका अभ्यास करने पर ही पता चलता है। अतः तीक्ष्ण बुद्धि तथा शारीरिक बल बनाये रखने के लिये प्राणायाम करना एक अनिवार्य आवश्यकता है। कम से कम आज विषैले वातावरण का सामना करने के लिये इससे बेहतर और कोई साधन नज़र नहीं आता।
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Saturday, April 3, 2010

भर्तृहरि शतक-अल्पज्ञानियों के स्वर्ग पाने की इच्छा

उन्मतत्तप्रेमसंरम्भादारभन्ते यदंगनाः।
तत्र प्रत्यूहमाधातुं ब्रह्मापि खलु कातरः।
हिन्दी में भावार्थ-
प्रेम में उन्मत होकर युवतियां अपने प्रियतम को पाने के लिये कुछ भी करने लगती हैं। उनके इस कार्य को रोकने का ब्रह्मा भी सामर्थ्य नहीं रखता।
स्वपरप्रतारकोऽसौ निन्दति योऽलीपण्डितो युवतीः।
यस्मात्तपसोऽपि फलं स्वर्गस्तस्यापि फलं तथाप्सरसः।।
हिन्दी में भावार्थ-
शास्त्रों का अध्ययन करने वाले कुछ अल्पज्ञानी विद्वान व्यर्थ ही स्त्रियों की निंदा करते हुए लोगों को धोखा देते हैंे क्योंकि तपस्या तथा साधना के फलस्वरूप जिस स्वर्ग की प्राप्ति होती है उसमें भी तो अप्सराओं के साथ रमण करने का सुख मिलने की बात कही जाती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-विश्व के अनेक धर्मों की बड़ी बड़ी किताबें लिखी गयी हैं। उन सभी को पढ़ना कठिन है, पर कोई एक भी पढ़ी जाये तो उसमें तमाम तरह की विसंगतियां नज़र आती है। अधिकतर धार्मिक पुस्तकों के रचयिता पुरुष हैं इसलिये स्त्रियों पर नियंत्रण रखने के लिये विशेष रूप से कुछ कुछ लिखा गया है। यह शोध का विषय है कि आखिर सारे धर्म ही स्त्रियों पर नियंत्रण की बात क्यों करते हैं पुरुष को तो एक देवता मानकर प्रस्तुत किया जाता है। सच बात तो यह है कि अगर पुरुष देवता नहंी है तो नारी भी कोई देवी नहीं है। हर मनुष्य परिस्थतियों, संस्कारों और व्यक्तिगत बाध्यताओं के चलते अपना सामाजिक व्यवहार करता है। अब यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसे प्रेरणा कैसी मिलती है। अगर प्रेरणास्त्रोत बुरा है तो वह भी बुरा ही करेगा अगर अच्छा है तो वह अच्छे काम में लिप्त हो जायेगा।
दूसरी जो सबसे बड़ी अहम बात है वह यह कि हर पुरुष और स्त्री का व्यवहार तय करने में उसकी आयु का बहुत योगदान होता है। बाल्यकाल तो अल्लहड़पन में बीत जाता है। उसके बाद युवावस्था में स्त्री पुरुष दोनों का मन नयी दुनियां को देखने के लिये लालायित होता है। विपरीत लिंग का आकर्षण उनको जकड़ लेता है। ऐसे में उन पर जो नियंत्रण की बात करते हैं वह या तो बूढ़े हो चुके होते हैं या फिर जिनका जीवन असाध्य कष्टों के बीच गुजर रहा होता है। कभी कभी तो यह लगता है कि दुनियां के अनेक धर्म ग्रंथ बूढ़े लोगों द्वारा ही लिखे या लिखवाये गये हैं क्योंकि उसमें औरतों पर ही नियंत्रण की बात की जाती है पुरुष को तो स्वाभाविक रूप से आत्मनिंयत्रित माना जाता हैं स्त्रियों के लिये मुंह ढंकने, पिता या भाई के साथ ही घर के बाहर निकलने तथा ऊंची आवाज में न बोलने जैसी बातें कहीं जाती हैं। कभी कभी तो लगता है कि युवतियों की युवावस्था अनेक धर्म लेखकों और विद्वानों के बहुत बुरी लगती है। इसलिये अतार्किक और अव्यवाहारिक बातें लिखते हैं। स्त्री हो या पुरुष युवावस्था में स्वाभाविक रूप से हर जीव अनिंयत्रित होता है-मनुष्य ही नहीं पशु पक्षियों में भी काम वासना की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से देखी जाती है। इस पर युवा स्त्रियों पर नियंत्रण की बात तो व्यर्थ ही लगती है क्योंकि अपने प्रियतम को पाने के लिये जो वह करती हैं उसे रोकने का सामर्थ्य तो विधाता भी नहीं रखता। अलबत्ता सभ्य, कुलीन, शिक्षित तथा बुद्धिमान लड़कियां स्वयं पर नियंत्रण रखती हैं इसलिये ही समाज में अभी तक नैतिकता का आधार बना हुआ है। ऐसी लड़कियों को धार्मिक शिक्षक न भी समझायें तो भी वह मर्यादा में रहती हैं पर जो भटकने पर आमादा है उनको रोकना किसी के लिये संभव नहीं है। कम से कम भर्तृहरि महाराज की समझाइश के अनुसार तो स्त्रियों पर सामाजिक नियंत्रण की बात तो करना ही नहीं चाहिए।
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Monday, March 1, 2010

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-जुआ या सट्टा घृणित कृत्य (gambling is bed work-hindi sandesh)

प्रच्छन्नं वा प्रकाशं वा तन्निषेवेत यो नरः।
तस्य दण्डविकल्पः स्वाद्येेष्ठं नृपतेस्तथा।।
हिन्दी में भावार्थ-
अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से जुआ खेलने वाले लोगों को राज्य द्वारा दंड दिया जाना चाहिये।
द्युतमेतत्पुराकल्ये दुष्टं वैरकरं महत्।
तस्माद्द्यूतं न सेवेत हास्यार्थमपि बुद्धिमान्।।
द्यूत वह घृणित कृत्य है जिसमें खेलने वालों के बीच आपस वैमनस्य पैदा होता है। अतः बुद्धिमान पुरुष को अपने मनोरंजन के लिए जुआ में भाग नहीं लेना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे देश में अनेक ऐसे परिवार हैं जो जुआ या सट्टे के कारण बर्बाद हो गये हैं। अनेक ऐसे परिवार हैं जिनके पुरखे सात पीढ़ियों के लिये कमा गये पर उनकी दूसरी या तीसरी पीढ़ी ने पूरी कमाई सट्टे और जुआ में बर्बाद कर डाले हैं। जुआ जहां प्रत्यक्ष रूप से खेला जाता है वही सट्टा अप्रत्यक्ष रूप से जुआ का ही रूप है। आजकल तो हर बात पर सट्टा लगता है। चुनाव, क्रिकेट, फुटबाल, टेनिस तथा अन्य ऐसे क्षेत्र जहां अनिश्चताओं का खेल है वहां अब सट्टा खेला जाता है। नवधनाढ्य परिवारों के युवक युवतियां इसमें अपना धन बर्बाद करते हैं। जुआ या सट्टे का कृत्य इतना घृणित है कि समझदार लोग जुआ खेलने वालों पर कभी यकीन ही नहीं करते बल्कि उनसे घृण करते हैं। सबसे बड़ी बात यह कि जुआ या सट्टा खेलने वालें मनोविकारों का शिकार हो जाते हैं। स्थिति यह हो जाती है कि उनकी जेबे खाली हो जाती हैं। कहंी से कुछ पैसा मिलता है तो जुआ और सट्टा खेलने वाले उसी में लगा जाते हैं। वह अपने आत्मीय जनों को भी ठगने लगते हैं।
जुआ और सट्टा खेलने वाले बाहरी रूप से भले ही सामाजिक संबंध निभाने वाले दिखते हों पर उनका अंतकरण केवल अपने व्यसन के प्रति ही आकर्षित रहता है। अपने ही परिजनों, मित्रों और परिचतों से वह धन ऐंठकर इसमें बर्बाद करते हैं। अतः बुद्धिमान लोगों को चाहिए कि वह कभी जुआ और सट्टा न खेलें। इतना ही नहीं उनके जो अपने लोग इस व्यसन में रत हैं उन पर कभी न यकीन करें न ही उनसे आत्मीय संबंध कायम करें।
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Friday, February 26, 2010

श्रीगुरुग्रंथ साहिब-कीर्तन से कुमति दूर होती है (kirtan-shri guru granth sahib)

‘उदम करहि अनेक हरि नाम न गवाही।
भरमहि जोनि असंख पर जन्महि आवही।’
हिन्दी में भावार्थ-
श्री गुरुग्रंथ साहिब के अनुसार कोई मनुष्य चाहे कितना भी उद्यम करे पर अगर परमात्मा के नाम का स्मरण नहीं करता तो उसे मुक्ति नहीं मिल सकती और वह भटकता रहता है।
‘जो जो कथै सुने हरि कीरतन ता की दुरमति नासु।
सगल मनोरथ पावै नानक पूरन हौवे आसु।।’
हिन्दी में भावार्थ-
श्रीगुरुग्रंथ साहिब के अनुसार जो मनुष्य कीर्तन गाते और सुनते हैं उनकी कुमति नष्ट होती है तथा सभी प्रकार की मनोकामनायें पूरी होती हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-श्री गुरुग्रंथ साहिब का हमारे देश में बहुत अध्यात्मिक महत्व है। यह किसी धर्म विशेष की पुस्तक नहीं है क्योंकि इसमें मनुष्य को सहजता सिखाने वाले संदेश मौजूद हैं और इसे पढ़कर सभी लोग सीख सकते हैं। आज के समय में अनेक बुद्धिमान लोगों को सत्संग और कीर्तन एक ढोंग लगते हैं तो कुछ लोग इनको मनोरंजन का साधन मानते है। कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि जब आज आधुनिक मनोरंजन के साधन उपलब्ध हैं तो फिर क्यों इस पुराने प्रकार के चक्कर में पड़ा जाये।
यह अज्ञान से उपजा भ्रम हैं। सत्संग और कीर्तन में शामिल होने का मतलब है कि कुछ देर अपने ध्यान को इस संसार से हटकार निष्काम प्रवृत्तियों की तरफ लगाना। जबकि आधुनिक मनोरंजन प्रसारणों में इसी संसार की वह बातें होती हैं जिनके साथ हम पूरा दिन जुड़े रहते हैं। मूर्ति पूजा की अनेक आलोचक भले ही खिल्ली उड़ाते हैं पर उनको इस बात का पता नहीं कि यह ध्यान को इस संसार से हटकार उसमें शुद्धता लाने का यह एक महत्वपूर्ण साधन है। जिस तरह कोई गाड़ी हम धुलवाने के लिये गैरेज भेजते हैं उसी तरह अपने मन और बुद्धि को कामनाओं से हटाकर पूजा, कीर्तन और सत्संग में शामिल होकर एक तरह से अपने मन और बुद्धि को निष्काम गैरेज में शुद्ध किया जाता है।
गुरुनानक जी ने इस देश में फैले अंधविश्वास को दूर करने का संदेश दिया था। अगर उनके बताये मार्ग पर चला जाये तो हमारा देश स्वर्ग बन सकता है। कामनाओं की पूर्ति के लिये हम सदैव लगे रहते हैं पर इससे केवल हमारे पास भौतिक वैभव की प्रचुरता हो सकती है पर मन को शांति नहीं मिल सकती। अतः यह जरूरी है कि ध्यान, योग तथा भक्ति कर अपने अंदर शुद्धता लायी जाये।
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Friday, February 19, 2010

संत कबीर वाणी-परमात्मा के अलावा किसी दूसरे को स्वामी मानना कष्टप्रद

राम नाम जाना नहीं, जमा न अजपा जाप।
स्वामिपना माथे पड़ा, कोइ पुरबले पाप।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं परमात्मा के नाम महत्व और लाभ जाने बिना जपना और न जपना बराबर है। अपने अंदर अहंकार होने पर हर इंसान अनेक तरह के पाप कर बैठता है।
कबीर स्वामी कोय नहिं, स्वामी सिरजन हार।
स्वामी ह्ये करि बैठही, बहुत सहेगा मार।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी का कहना है कि इस संसार में कोई किसी का स्वामी नहीं है बल्कि सबका रचयिता और पालनहार परमात्मा ही सभी का स्वामी है। अगर यहां किसी को स्वामी माना तो सिवाय कष्ट और मार झेलने के कुछ नहीं मिलता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-पाश्चात्य शैक्षणिक प्रणाली ने इस देश के लोगों की मानसिकता ही गुलाम बना दी दी है और यही कारण है कि चाटुकारों की एक बहुत बड़ी फौज दिखाई देती है जो शिखर पुरुषों की जीहुजूरी में अपना जीवन गुजार देती है। यहां आदमी परमात्मा की बजाय इन शिखर पुरुषों को स्वामी मानकर पूजने लगता है। संभव है कुछ चाटुकारों को कुछ उपलिब्धयां मिलती हों पर सभी के लिये ऐसा करना सौभाग्यपूर्ण नहीं होता।

धन, पद, और बाहुबल की वजह से जिन लोगों को स्वामित्व मिलता है वह किसी दूसरे को स्वामी योग्य बनने नहीं देते। उनकी चाहे कितनी भी चाटुकारिता करें वह अपने स्वार्थ की पूर्ति से कम ही दाम चुकाते हैं। कभी कभी तो बहुत निर्दयता से व्यवहार करने लगते हैं। ऐसे में अच्छा यही है कि बजाय यहां किसी को स्वामी मानन के उस परमात्मा को ही सर्वस्व माने जो सबके जीवन सृष्टा और कर्म का दृष्टा होने के कारण वास्तव में स्वामित्व धारण किये हुए है।

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Wednesday, February 10, 2010

वेदांत दर्शन-यज्ञादि में विविधता को विरोध न समझें (vedant darshan in hindi)

विरोधः कर्मणीति चैन्नानेकप्रतिपत्तेर्दर्शनात्।।

हिन्दी में भावार्थ-यदि देवताओं की पूजा, यज्ञादि कर्म में विरोध आता है तो उसे ठीक नहीं मान लेना चाहिये क्योंकि उनके द्वारा एक ही समय में अनेक रूप धारण करना संभव है-ऐसा देखा गया है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-
हमारे देश में सांस्कृतिक, सांस्कारिक, तथा सामाजिक विविधता है और यही विश्व में हमारी पहचान भी है।  भगवत्स्वरूप को हर जगह विविध रूप में स्थापित किया जाता है और देवों की पूजा में भी भिन्नता दिखाई देती है।  उत्तर से दक्षिण तक विवाह आदि घरेलू कार्यों के अवसर पर यह विविधता दिखाई देती है।  इस विविधता को विरोध का प्रमाण नहीं समझना चाहिये।
इसके अलावा हमारे यहां, भगवान विष्णु, ब्रह्मा, तथा शिव को अपने अपने ढंग से अनेक भक्त अपना इष्ट मानते हैं।  भगवान विष्णु के तो 14 अवतार माने जाते हैं।  इन विविध रूपों के अनुसार भी अनेक क्षेत्रों में स्थापित प्रतिमाओं में भी विविधता देखी जाती है।  इसका अन्य धर्मावलंबी मजाक बनाते हैं पर यह उनके अज्ञान का प्रमाण है।  भारतीय अध्यत्मिक रहस्यों को समझे बिना भारत के ही अनेक लोग भी विपरीत टिप्पणियां करते हैं।  दरअसल मुख्य विषय भक्ति है और विभिन्न स्वरूपों की प्रतिमायें पूजने का आशय आकार से निरंकार की तरफ जाना होता है।  अगर हम देश की सीमाओं से उठकर देखें तो यहां से बाहर स्थापित स्वरूप भी इसी तरह विरोध भाव से परे हैं और यही कारण है कि भारतीय अध्यात्मिक पुरुषों ने कभी किसी दूसरे धर्म पर आक्षेप न कर उनको व्यापक दायरे में मान्यता दी। भारतीय अध्यात्मिक ज्ञानी कभी किसी दूसरे के धर्म को निशाना नहीं बनाते।
मुख्य बात यह है कि अपने धर्म पर दृढ़ता से स्थित रहते हुए अपना कर्म करना चाहिये और जिस रूप में नारायण का मानते हैं उसका ही स्मरण करना चाहिये। चाहे कैसा भी समय हो उसके स्वरूप में बदलाव न करने में ही हितकर नहीं है-उल्टे अविश्वास, दबाव या लालच में आकर ऐसा करना भारी मानसिक कष्ट का कारण होता है।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Sunday, February 7, 2010

मनुस्मृति-दुस्साहसी की उपेक्षा करने वाले जल्दी नष्ट हो जाते हैं

साहसे वर्तमानं तु यो मर्षयति पार्थिवः।
सः विनाशं व्रजत्याशु विद्वेषं चाधिगच्छति।।
हिन्दी में भावार्थ-
यदि राज्य प्रमुख  दुस्साहस करने वाले व्यक्ति को क्षमा या उसे अनदेखा करता है तो उसका अतिशीघ्र विनाश हो जाता है क्योंकि तब प्रजा में उसके विद्वेष की भावना पैदा होती है।
न मित्रकारणाद्राजा विपुलाद्वाधनागमात्।
समुत्सुजोत्साहसिकान्सर्वभुतभयावहान्।।
हिन्दी में भावार्थ-
राज्य प्रमुख को चाहिये कि वह स्नेह या लालच मिलने पर भी प्रजा में भय उत्पन्न करने वाले अपराधियों को क्षमा न करे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-क्षमा जीवन का मूलमंत्र है पर एक परिवार, समाज और राज्य के मुखिया को कहीं न कहीं अपने आश्रितों को बचाने के लिये दंड का उपयोग करना ही पड़ता है।  अगर वह इस दंड का उपयोग नहीं करेगा तो उसके आश्रित या प्रजाजन उसे कायर मानकर घृणा करने लगते हैं।  कहा जाता है कि योगियों को क्षमाक्षील होना चाहिये पर हमारी प्राचीन कथायें इस बात का प्रमाण हैं कि समय आने पर वही कोमल भाव वाले योगी अपने भक्तों और शिष्यों के लिये उग्र रूप धारण करते हुए अपराधियों को दंडित करते हैं। 

जिस परिवार, समाज या राज्य का मुखिया  अपराधियों और हिंसक तत्वों को क्षमा करता है या उनकी अनदेखी में भलाई समझता है वह शीघ्र नष्ट हो जाता है। उसके समूह या राज्य के विरोधी उसके आश्रित या प्रजा को लक्ष्य नहीं करते बल्कि उनका लक्ष्य मुखिया ही होता है।  फिर उसके विरोधी आंतरिक विरोधियों को सबसे पहले मैदान में उतारते हैं इसलिये समझदार मुखिया को चाहिये कि वह अंतर्विरोधियों का समूल नाश करे।
ऐसे आंतरिक शत्रु जो प्रजा में भय करते हुए विचरते हैं उनकी अनदेखी करना खतरे से खाली नहीं है।  जिस परिवार, समाज, या राज्य का प्रमुख अपने आंतरिक खतरों की अनदेखी करता है वह कायर मान लिया जाता है और उसके आश्रित प्रजाजन ही उसका सम्मान नहीं करते। अहिंसा का सिद्धात केवल अपने निजी जीवन में लागू किया जा सकता है पर जहां सार्वजनिक विषय हो वहां दंड का उपयोग करना चाहिये अन्यथा परिवार, समाज तथा राज्य में असंतोष का परिणाम मुखिया को भोगना पड़ता है।
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Sunday, January 10, 2010

विदुर नीति-शक्तिहीन होने पर क्रोध न करें (shakti aur krodh-hindi dharam sandesh)

द्वावेव न विराजेते विपरीतेन कर्मणा।
गृहस्थश्चय निरारम्भः कार्यवांश्चैव भिक्षुकः।।
हिन्दी में भावार्थ-
नीति विशारद विदुर जी के अनुसार अकर्मयण्य गृहस्थ और तथा सांसरिक बातों में लगा भिक्षुक सन्यासी अपने लिये निश्चित कर्म के विपरीत आचरण करने के कारण शोभा नहीं पाते।

द्वाविमौ कपटीकौ तीक्ष्णी शरीरपरिशोषिणी।
पश्चाधनः कामयते यश्च कुप्यत्यनीश्वरः।।
हिन्दी में भावार्थ-
नीति विशारद विदुर जी के अनुसार जो गरीब होकर भी कीमती वस्तु की कामना करता है और शक्तिहीन होने पर भी क्रोध करता है वह अपने शरीर को सुखाने के लिये काम करते हैं।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हर आदमी को अपनी स्थिति के अनुसार ही कदम बढ़ाना ही चाहिये। इसके अलावा अपने नियत कर्म से पृथक होकर अन्य गतिविधि में बिना उद्देश्य ही सक्रिय न हों क्योंकि हर चीज हरेक को शोभा नहीं देती। केवल उन्हीं वस्तुओं के संग्रह की चिंता करना चाहिये जो कि अपने परिवार के लिये आवश्यक हों पर इस बात का ध्यान रखें कि उसके लिये हमारे उसकी प्राप्ति के लिये पास आय का पर्याप्त साधन भी होना चाहिये। आजकल लोग पैसा न होने पर कर्जा लेते हैं और फिर उसे न चुकाने पर चिंता करते हुए अपने शरीर को सुखा डालते हैं। जहां तक मन की बात है तो किसी भी नयी चीज को देखकर उसे पाने के लिये मचलता है तब अपनी बुद्धि इसके लिये काम नहीं करती कि उसकी पूर्ति कैसे होगी?
इसके अलावा कहीं भी किसी भी समय क्रोध करने से बचना चाहिये। खासतौर से वहां जहां अपने से अधिक पदारूढ़, धनवान तथा बाहुबली लोग हों। यह कायरता का नहीं बल्कि सतर्कता बरतने का लक्षण है। मूर्खों को ज्ञान देने, नवधनाढ्य को दान के लिये कहने, पदारूढ़ को विनम्रता के लिये समझाने और बाहुबली को दया के लिये प्रेरित करने के लिये प्रयास में अपना समय व्यर्थ ही करना है। कहीं आपने क्रोध किया तो बहुत जल्दी अपनी शक्तिहीनता का पता भी लग जायेगा। कहने का अभिप्राय यह है कि हमेशा सोच समझकर कदम आगे बढ़ाना चाहिये, ताकि बाद में उसके लिये पछताना न पड़े।
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