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Saturday, June 25, 2011

चाणक्य नीति-आचरण में ज्ञान न दिखे वह निरर्थक (acharan aur gyan-chankya neeti)


       आजकल देश में धन की अधिकता के कारण धार्मिक कार्यक्रम अधिक ही होते हैं। इन कार्यक्रमों पर काला या सफेद चाहे जो भी धन खर्च होता है इस पर हम टिप्पणी नहीं करेंगे पर इनकी तादाद देखते हुए तो यह लगता है कि हमारा देश विश्व में एक आदर्श होना चाहिए पर बढ़ते अपराध, भ्रष्टाचार, व्याभिचार तथा अहंकार को देखते हुए यह नहीं लगता कि किसी को हमसे नैतिकता का उपदेश लेना चाहिए। इसका सीधा मतलब है कि लोग ज्ञान चर्चा करते हैं तो केवल यह दिखाने के लिये कि उनकी मनुष्य देह के अंदर भी एक मनुष्य है। धार्मिक सत्संग वाणी विलास तथा मनोरंजन के रूप में होते हैं। गीत संगीत और काव्य से सजे सत्संग मजा जरूर देते हैं पर उनसे ज्ञान प्राप्त नहीं होता। गीत और भजन में अब कोई अंतर नहीं दिखता। लोग यह दिखाने के लिये अधिक प्रयत्नशील हैं कि वह धर्मभीरु हैं पर आचरण पर उनके ज्ञान की छाया नहीं दिखती।
       इस विषय पर महर्षि चाणक्य अपनी नीति में कहते हैं कि
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           हतं ज्ञानं क्रियाहीनं हतश्चाऽज्ञानतो नरः।
         हतं निर्नायकं सैन्यं स्त्रियो नष्टा ह्यभर्तृकाः।।
       ‘‘अगर मनुष्य के पास ज्ञान है पर उसे आचरण में नहीं लाता तो वह व्यर्थ है। अज्ञानी पुरुष का जीवन निरर्थक है। अज्ञानी पुरुष हमेशा असफल रहता है। उसी तरह सेनापति रहित सेना और स्वामीरहित स्त्रियां नष्ट हो जाती हैं।"
           विकास के नाम पर विनाशलीला अपना रूप दिखा रही है। अपराधों के समाचारों को देखते हुए तो ऐसा लगता है कि जिस हम संस्कृति की बात करते हैं वह कभी की लुप्त हो गयी है। सामाजिक और पारिवारिक रिश्ते नाम के लिये हो गये हैं। धन हैं तो वह भी निभा लो नहीं तो भूल जाओ। पाश्चात्य सभ्यता को विकास का पर्याय माने लेने के बाद हमें भारतीय सस्कृति के प्रति मोह है पर अपनी स्वार्थ पूर्ति तक ही वह रहता है। कहने का अभिप्राय यह है कि ज्ञान हमारे पास खूब है पर आचरण में नहीं है इसलिये ही समाज अब टूटता जा रहा है। ऐसे में समूचे समाज को संबोधित कर उसे सुधरने का उपदेश देने से अच्छा है हम स्वयं आत्ममंथन करें और अपने आचरण सुधारे।
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',ग्वालियर
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
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Sunday, June 19, 2011

चाणक्य नीति-जिसका अनिष्ट करना हो उससे मधुर वाणी में बात करें(chankya neeti-jiska bura karna ho usse meetha bolen)

       वैसे तो हर आदमी को सदैव मीठा बोलना चाहिए पर इसकी परिवार और मित्रता के व्यवहार में इसकी सीमा है। अपने परिवार के सदस्यों और मित्रों में जिन लोगों का व्यवहार सुधारना है उनसे कभी कभी सख्ती से भी पेश आना चाहिए वरना उनके मार्ग से भटकने की संभावना भी रहती है। इतना ही नहीं अपने निकटस्थ व्यक्तियों के कार्यों पर नज़र हमेशा रखना चाहिए। अगर वह कोई ऐसा काम करते हैं जो कालांतर में उनके लिये दुःख का कारण बनने की संभावना हो तो उन्हें सख्त लहजे में समझाना चाहिए।
       हमारे यहां कुछ आधुनिक विद्वानों का मानना है कि अगर बेटे के पांव में जूता बाप की नाप के बराबर या बेटी की जुती का माप मां की माप के बराबर हो तो वह उनको मित्र या सहेली समझें। फिल्मों और टीवी धारावाहिकों में भी पात्र ऐसे रचे जाते हैं जिसमें माता पिता अपनी पुत्री या पुत्र से इस तरह व्यवहार शालीन व्यवहार करते हैं जैसे कि वह उनके बराबर हों। हम इसका विरोध नहीं कर रहे पर यह भी एक सच्चाई कि फिल्म और टीवी जैसेे आदर्श चरित्र सामान्य जीवन में दिखाई नहीं देते। समाज के सत्य उससे ज्यादा कटु हैं जितने उनके काल्पनिक कथानकों में दिखाई देते हैं। आज की लड़के लड़कियों पर उनके शैक्षणिक संस्थान दूर होने तथा उनके सत्रों के बड़े होने के कारण माता पिता कम ही नज़र रख पाते हैं जिस कारण ऐसी घटनायें सामने आती हैं जो वीभत्स दृश्य होने के कारण लोगों के मन में पीड़ित के प्रति करुणा का भाव पैदा करती हैं। पुत्र या पुत्री कारुणिक स्थिति में पहुंचे उससे अच्छा है कि मन मारकर उनके साथ सख्त व्यवहार रखना भी जरूरी लगता है
        महान नीति विशारद चाणक्य कहता है कि
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        यस्य चाप्रियामिच्छेत तस्य ब्रूयात् सदा प्रियम्।
          व्याधो मृगवधं कर्तृ गीतं गायति सुस्वरम्।।
            ‘जिसका बुरा करने की इच्छा हो उसके साथ हमेशा ही मीठा बोलना चाहिए जैसे शिकारी हिरण का      वध करने के लिये मीठे स्वर में   गीत गाता है।’’
          उसी तरह यह भी देखना चाहिए कि हमसे या परिवार और मित्र समुदाय के सदस्यों के साथ कोई अन्य मनुष्य अधिक प्रेमपूर्ण व्यवहार कर रहा है तो उसका उद्देश्य क्या है? इतना ही नहंी अगर हम किसी व्यक्ति का अनिष्ट चाहते हैं तो उसके प्रति सद्व्यवहार दिखायें। अनावश्यक रूप से उसकी प्रशंसा करें तब वह भ्रमित होकर अतिसक्रियता दिखायेगा जो कि कालांतर में उसके लिये घातक होगी।
           चाणक्य नीति केवल राजाओं के लिये ही नहीं  वरन् सामान्य जीवन में कितनी उपयोगी है यह उनके इस तरह के संदेशों से समझा जा सकता है। उनका आशय यही है कि किसी का बुरा न करें। हमेशा सतर्क रहें और अगर विरोधी अक्षम्य अपराध करे तो उसे इतनी चालाकी से अहिंसक होकर दंड दें कि उसे इसका आभास तक न हो।
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',ग्वालियर
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Thursday, April 14, 2011

भगवान तो भक्ति भाव में बसते हैं-हिन्दू धार्मिक लेख (bhagawan to bhakti ke bhookhe hain-hindu dharmik lekh)

भक्ति का संबंध मन के भावों से है-यह अंतिम सत्य है। परमात्मा के स्वरूप के बारे में कोई दावा नहीं कर सकता क्योंकि वह अनंत है। कई लोग कहते हैं कि वह एक है तो ज्ञानी कहते हैं कि न वह एक है न अनेक, न वह गोरा है न काला, न वह स्त्री है न पुरुष न ही वह ज्ञात है न अज्ञात है, बल्कि वह तो अनंत है। उसकी अनुभूति निरंकार भक्ति से भी की जा सकती है न और किसी स्वरूप की मूर्ति बनाकर भी उसे पाया जा सकता है। मुख्य विषय है कि हमारा भाव किस प्रकार का है। मानो तो भगवान नहीं तो वह पत्थर है। वह अनंत परमात्मा भाव पूर्ण भक्ति से ही पाया जा सकता है।
हमारे देश में मूर्ति पूजक तथा उनके विरोधियों की संख्या अधिक है। भारत में प्रवर्तित धर्मों को मूर्ति पूजक मानकर उनका विरोध किया जाता है जबकि अध्यात्मिक दृष्टि से हमारे यहां आकार तथा निराकार दोनों ही रूपों के साथ ही केवल ध्यान योग के माध्यम से भी भक्ति के महत्व को स्वीकार किया जाता है। हमारे अध्यात्म दर्शन की यह खूबी है कि वह मनुष्य की उसकी दैहिक तथा शारीरिक क्षमताओं की सीमाओं के अनुसार परमात्मा की भक्ति के लिये प्रेरित करता है। मूर्ति पूजा एक साधना एक क्रिया है पर साध्य तो परमात्मा की भक्ति पाना है।
इस विषय पर नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि
काष्ठापाषाणाधातूनां कृत्वा भावेद सेवनम्।
श्रद्धया चतथा सिद्धस्तस्य विष्णुंः प्रसीदति।।
‘‘लकड़ी, पत्थर अथवा किसी भी धातु से बनी प्रतिमाओं की सहृदयता से सेवा करना चाहिए। श्रद्धा एवं सदाशयता से सेवा करने पर भगवान विष्णु उत्तम फल प्रदान करते हैं।’’
न देवा विद्यते काष्ठे न पाषाणे न भृन्मये।
भावे हि विद्यते देवस्तस्माद् भावो हि कारणम्।।
‘‘देवता या परमात्मा लकड़ी में नहीं है, पत्थर में विराजमान नहीं है और न ही धातु में विद्यमान है। मिट्टी की प्रतिमा में उसका अस्तित्व नहीं है। परमात्मा का निवास तो भावना में है। जहां भक्ति भावना है वहां वह अवश्य प्रकट होते हैं।’’
हम अगर स्वयं मूर्तिपूजक हैं तो किसी निरंकार के उपासक का मजाक न बनायें। अगर हम निरंकार के उपासक हैं तो मूर्तिपूजक पर न हंसें-यही संदेश हमारा अध्यात्मिक दर्शन देता है। जो लोग मूर्तिपूजा करते हुए उसकी सेवा करते हुए भक्ति निच्छल भाव से करते हैं उनके लिये भी भगवान प्रकट होते हैं और जो निरंकार के उपासक हैं तो उनके हृदय में ही भगवान बसते हैं। मुख्य बात यह है कि भक्ति भाव पवित्र होने के साथ ही उदारतापूर्ण होना चाहिए।
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लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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Thursday, August 16, 2007

चाणक्य नीति:बिना पूछे दान देना

१.पाँव धोने का जल और संध्या के उपरांत शेष जल विकारों से युक्त हो जाता अत: उसे उपयोग में लाना अत्यंत निकृष्ट होता है। पत्थर पर चंदन घिसकर लगाना और अपना ही मुख पानी में देखना भी अशुभ माना गया है।
२.बिना बुलाए किसी के घर जाने की बात, बिना पूछे दान देना और दो व्यक्तियों के बीच वार्तालाप में बोल पडना भी अधर्म कार्य माना जाता है।
३.शंख का पिता रत्नों की खदान है। माता लक्ष्मी है फिर भी वह शंख भीख माँगता है तो उसमें उसके भाग्य का ही खेल कहा जा सकता है।
४.उपकार करने वाले पर प्रत्युपकार, मारने वाले को दण्ड दुष्ट और शठ के सख्ती का व्यवहार कर ही मनुष्य अपनी रक्षा कर सकता है। 1

Monday, August 13, 2007

चाणक्य नीति: धन के लिए धर्म त्यागना गलत

  1. ऐसा धन जो अत्यंत पीडा, धर्म त्यागने और बैरियों के शरण में जाने से मिलता है, वह स्वीकार नहीं करना चाहिए।
  2. धर्म, धन, अन्न, गुरू का वचन, औषधि आड़ हमेशा संग्रहित रखना चाहिए, जो इनको भलीभांति सहेज कर रखता है वह हेमेशा सुखी रहता है।
  3. बिना पढी पुस्तक की विद्या और अपना कमाया धन दूसरों के हाथ में देने पर समय पर न विद्या काम आती है न धनं

Thursday, August 9, 2007

चाणक्य नीति:प्रीति में चालाकी जरूरी

  1. जो बात बीत गयी उसका सोच नहीं करना चाहिए। समझदार लोग भविष्य की भी चिंता नहीं करते और केवल वर्तमान पर ही विचार करते हैं।
  2. हृदय में प्रीति रखने वाले लोगों को ही दुःख झेलने पड़ते हैं। प्रीति सुख का कारण है तो भय का भी। अतएव प्रीति में चालाकी रखने वाले लोग ही सुखी होते हैं
  3. जो व्यक्ति आने वाले संकट का सामना करने के लिए पहले से ही तैयारी कर रहे होते हैं वह उसके आने पर तत्काल उसका उपाय खोज लेते हैं।
  4. जो यह सोचता है कि भाग्य में लिखा है वही होगा वह जल्द खत्म हो जाता है।
  5. मन को विषय में लगाना बंधन है और विषयों से मन को हटाना मुक्ति है.

Wednesday, August 8, 2007

चाणक्य नीति:नीच और उच्च व्यक्ति की पहचान

  1. जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुचाने वाले मर्मभेदी वचन बोलते हैं, दूसरों की बुराई करने में खुश होते हैं। अपने वचनों द्वारा से कभी-कभी अपने ही वाचों द्वारा बिछाए जाल में स्वयं ही घिर जाते हैं और उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जिस तरह रेत की टीले के भीतर बांबी समझकर सांप घुस जाता है और फिर दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है।
  2. समय के अनुसार विचार न करना अपने लिए विपत्तियों को बुलावा देना है, गुणों पर स्वयं को समर्पित करने वाली संपतियां विचारशील पुरुष का वरण करती हैं। इसे समझते हुए समझदार लोग एवं आर्य पुरुष सोच-विचारकर ही किसी कार्य को करते हैं। मनुष्य को कर्मानुसार फल मिलता है और बद्धि भी कर्म फल से ही प्रेरित होती है। इस विचार के अनुसार विद्वान और सज्जन पुरुष विवेक पूर्णता से ही किसी कार्य को पूर्ण करते हैं।

Sunday, August 5, 2007

चाणक्य नीति: एक से भले दो होते हैं

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  1. संसार के दुखों से दुखित पुरुष को तीन ही स्थान पर थोडा विश्राम मिलता है- वह हैं संतान, स्त्री और साधू
  2. राजा की आज्ञा, पंडितों का बोलना और कन्यादान एक ही बार होता है।
  3. एक व्यक्ति का तपस्या करना, दो का एक साथ मिलकर पढ़ना, तीन का गाना, चार का मिलकर राह काटना, पांच का खेती करना और बहुतों का मिलकर युद्ध करना
  4. पक्षियों में कोआ, पशुओं में कुत्ता और मुनियों में पापी चांडाल होता है पर निंदा करने वाला सबसे बड़ा चांडाल होता है।

Thursday, July 26, 2007

चाणक्य नीति: नीच लोग स्वत: ही नष्ट हो जाते हैं

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१।जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के हृदय को चोट पहुँचाते है और अपनी वाणी से कटु वचन बोलते हैं,दूसरो की बुराई कर प्रसन्न होते है, वह कभी-कभी अपने विषैले और कटु वचनों से अपने को भी घायल कर बैठते हैं। अपने वचनों द्वारा बिछाये जाल में स्वयं भी घिर जाते हैं और उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जैसे रेत के टीले को बांबी समझकर सांप उसमें घुस जाता है और फिर निकल नहीं पाता और दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है।

।२।समर्थ पुरुष के लिए अयोग्य वस्तु भी आभूषण के रुप में होती है जबकि नीच के लिए योग्य भी अनुपयोगी और दोषयुक्त हो जाती है। देवताओं को अजर-और अमर बनाने वाला अमृत राहू के लिए प्राणघातक सिद्ध हुआ। वही प्राणघातक विष भगवान् शिव के लिए आभूषण बन गया।

Friday, July 13, 2007

चाणक्य नीति: आलस्य सबसे बड़ा दुर्गुण

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  1. आलस्य मनुष्य के स्वभाव का बहुत बड़ा दुर्गुण है। आलस्य के कारण प्राप्त की गयी विद्या भी नष्ट हो जाती है
  2. दुसरे के हाथ में गया धन कभी वापस नहीं आता।
  3. बीज अच्छा न हो तो फसल भी अच्छी नहीं होती और थोडा बीज डालने से भी खेत उजड़ जाते हैं
  4. सेनापति कुशल न हो तो सेना भी नष्ट हो जाती है।
  5. शील के संरक्षण में कुल का नाम उज्जवल होता है।

Sunday, July 8, 2007

चाणक्य नीति: मनुष्य की जांच

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  • जिस प्रकार सोने की चार विधियों-घिसना, काटना, तपाना तथा पीटने-से जांच की जाती है, उसी प्रकार मनुष्य की श्रेष्ठता की जांच भी चार विधियों-त्यागवृति, शील, गुण तथा सतकर्मो -से की जाती है।

Thursday, July 5, 2007

चाणक्य वाणी: माता-पिता के संतान के प्रति कर्तव्य

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  1. जो बुद्धिमान पुरुष होते हैं, वह सब अपने पुत्रों की नाना प्रकार के सदचारों की शिक्षा देकर उनको योग्य बनाते हैं, ताकि वह नीतिवान और शक्तिवान बनकर अपने कुल की परंपरा को आगे कायम रखकर समाज में अपना नाम कर सकें।
  2. जो माता- पिता अपने पुत्रों को शिक्षा नहीं दिलाते, उन्हें पढाते-लिखाते नहीं है वह उस पुत्र के शत्रु हैं क्योंकि फिर वह कहीं किसी सभा में बैठता है तो ऐसे लगता है जैसे कि हंसों में बगुला आकर बैठ गया हो।
  3. बच्चों की ज्यादा दुलारना अथवा ताडना देना दोनों ही हानिकारक है। इसीलिये पुत्र और शिष्य को उसी सीमा तक दुलाराना और ताड़ना देना चाहिऐ जहाँ तक उचित हो ।

Tuesday, July 3, 2007

चाणक्य नीति: ज्ञानी, अज्ञानी और अल्पज्ञानी

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  • अज्ञानी व्यक्ति को कोई भी बात समझायी जा सकती है क्योंक उस किसी बात का ज्ञान तो है नहीं। अत: उसे जो कुछ समझाया जाएगा वह समझ सकता है, ज्ञानी को तो कोई बात बिल्कुल सही तौर पर समझायी जा सकते है। परन्तु अल्पज्ञानी को कोई भी बात नही समझायी क्योंकि अल्पज्ञान के रुप में अधकचरे ज्ञान का समावेश होता है जो किसी भी बात को उसके मस्तिष्क तक पहुंचने ही नहीं देता।

*लेखक का मत है कि अल्पज्ञानी को अपने ज्ञान का अहंकार हो जाता है इसलिये वह कुछ सीखना ही नहीं चाहता, वह केवल अपने प्रदर्शन में ही लगा रहता है।

Saturday, June 30, 2007

चाणक्य नीति:केतकी के गुण से सीखें

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  1. विद्धान और गुणवान व्यक्ति का आदर सब जगह होता है। अगर आदमी एक ही गुण है तो वह उसके सारे अवगुण व दोषों की भी लोगों में अनदेखी करा देता है। ठीक उसी तरह जैसे केतकी जो हर समय साँपों से घिरी रहती है और उस पर फल भी नहीं लगते, और उसमे कांटे भी बहुत होते हैं। वह सीधी भी नहीं होती , कीचड़ में पैदा होती है और लोगों को आसानी से उपलब्ध भी नहीं होती पर उसकी गंध ऐसा गुण है जिसके कारण सब उसे पाने के लिए लालायित रहते हैं। इस प्रकार इतने सारे अवगुण होते हुए भी केतकी में लोगों का मोह होता है।

*लेखक का मत है लोगों को आत्ममंथन कर यह देखना चाहिए कि कौनसा उनमें गुण है और कौनसा अवगुण है और फिर अपने जीवन की रूपरेखा तय इस तरह करना चाहिए कि हम अपने गुण के अनुसार ही कार्य करें तो हमें समाज में लोकप्रियता मिलेगी।

  • २.किसी व्यक्ति का मान-सम्मान जिस क्षेत्र में न हो तो उसे वह क्षेत्र छोड़ देना चाहिऐ, क्योंकि सम्मान का आभाव में जीवन को कोई अर्थ नहीं होता है।

*लेखक का मानना है कि किसी भी व्यक्ति को वह स्थान त्याग देना चाहिए जहाँ उसकी आजीविका न हो क्योंकि जीविका रहित व्यक्ति कभी भी सम्मान योग्य नहीं होता।

Friday, June 29, 2007

चाणक्य नीति:बेईमानी का धन दस वर्ष बाद नष्ट हो जाता है

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  1. धूर्तता, अन्याय और बैईमानी आदि से अर्जित धन से संपन्न आदमी अधिक से अधिक दस वर्ष तक संपन्न रह सकता है, ग्यारहवें वर्ष में मूल के साथ-साथ पूरा अर्जित धन नष्ट हो जाता है।

*इसका सीधा आशय यह है कि भ्रष्ट और गलत तरीके से कमाया गया पैसा दस वर्ष तक ही सुख दे सकता है, हो सकता है कि इससे पहले ही वह नष्ट हो जाय।


२. अर्थाभाव में मित्र, स्त्री, नौकर स्नेहीजन भी व्यक्ति का आदर नहीं करते, यदि वही व्यक्ति पुन: संपन्न हो जाये तो अनादर करने वाले फिर आदर करने लगते हैं।



Thursday, June 28, 2007

चाणक्य नीति:दिन में दीपक जलाना व्यर्थ

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1. जिस प्रकार समुद्र के ऊपर वर्षा व्यर्थ है उसी प्रकार भोजन से तृप्त पुरुष से भोजन का अनुरोध करना भी व्यर्थ है। जिस प्रकार दिन में सूर्य के प्रकाश में दीपक जलना व्यर्थ है ठीक उसी प्रकार धन से संपन्न व्यक्ति को दान देना भी निरर्थक है। दान हमेशा अभाव पीड़ित को देना ही उचित है
२.अपने निरंतर अभ्यास से मनुष्य अनेक गुण प्राप्त कर लेता है पर कुछ गुण ऐसे होते हैं जो स्वाभाविक रुप से होते हैं-जैस दानशीलता, मधुर बोलना, शौर्यता तथा विद्वता।

Tuesday, June 26, 2007

चाणक्य नीति

१.जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के हृदय को चोट पहुँचाते है और अपनी वाणी से कटु वचन बोलते हैं,दूसरो की बुराई कर प्रसन्न होते है, वह कभी-कभी अपने विषैले और कटु वचनों से अपने को भी घायल कर बैठते हैं। अपने वचनों द्वारा बिछाये जाल में स्वयं भी घिर जाते हैं और उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जैसे रेत के टीले को बांबी समझकर सांप उसमें घुस जाता है और फिर निकल नहीं पाता और दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है।

२.समर्थ पुरुष के लिए अयोग्य वस्तु भी आभूषण के रुप में होती है जबकि नीच के लिए योग्य भी अनुपयोगी और दोषयुक्त हो जाती है। देवताओं को अजर-और अमर बनाने वाला अमृत राहू के लिए प्राणघातक सिद्ध हुआ। वही प्राणघातक विष भगवान् शिव के लिए आभूषण बन गया।

Monday, June 25, 2007

चाणक्य नीति

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१.बुद्धिमान पुरुष को तब तक ही भय की चिंता करना चाहिए जब तक वह सामने नहीं आ जाता, अगर एक बार वह सामने आ जाये तो उसका मुकाबला करना ही बेहतर है। भय के सामने आने पर घबडा कर छिपने की कोशिश करना समझदारी का काम नहीं है।
२.बुद्धिमान व्यक्ति को सदैव यह सोचना चाहिए कि उसके मित्र कितने है, और उसका समय कैसा चल रहा है। इसके अलावा अपने निवास स्थान और अपने आय व्यय पर भी विचार करते रहना चाहिए। उसे इस बात पर भी चिन्तन करना चाहिऐ कि वह कौन है, आत्मा या शरीर , स्वाधीन है अथवा पराधीन, तथा उसकी ताकत कितनी है, उसे इन बातों पर विचार करते रहना चाहिए वर्ना वह पत्थर की तरह निर्जीव हो जाता है।

Sunday, June 24, 2007

चाणक्य नीति

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१.जिस प्रकार कोई गायिका निर्धन प्रेमी को नहीं पूछती, पराजित राजा को जनता मान नहीं देती, उसी प्रकार से सूखे और टूटे वृक्ष को पक्षी छोड़ जाया करते हैं। अत: अतिथि को चाहिए कि वह भोजन के तुरन्त बाद मेजबान का घर छोड़ दे।
२.यजमान के घर सर पुरोहित दक्षिणा लेकर और विद्या अर्जन के बाद विद्यार्थी गुरू के द्वार से चला जाता है उसी प्रकार से वन के जल जाने पर पहु-पक्षी वन का त्याग कर अन्यत्र पलायन कर जाते हैं।
लेखकीय अभिमत-चाणक्य एक महान विद्धान थे और इन दोनों संदेशों में उनका यही आशय है कि आदमी को और परिस्थियों को ध्यान में रखते हुए अपनी शारीरिक सुरक्षा और मान-सम्मान के लिए सतर्कता बरतना चाहिए।

Saturday, June 23, 2007

चाणक्य नीति

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1.कुछ बातें किसी के समक्ष नहीं प्रकाशित करनी चाहिए जैसे -अपनी सिद्ध ओषधि, अपने धर्म-कर्म का रुप, घर के दोष, पति-पत्नी के आपसी संबंध, बुरा भोजन, और निंदा। दूसरों के सामने अपनी यह बातें कहने से बदनामी ही होती है, और किसी प्रकार के लाभ की आशा करना ही बेकार है।

२.मैले वस्त्र धारण करने, दांत साफ न रखने, सूर्योदय व सूर्यास्त के समय सोने , कटु वचन बोलने और अधिक भोजन करने वाले मनुष्यों को समाज में न तो धन प्राप्त होता है न यश। समाज में ऐसे व्यक्ति को ऊंची दृष्टि से नहीं देखा जाता। यदि साक्षात विष्णु भी हौं तो लक्ष्मी उन्हें छोड़ देती है, अन्यों का तो कहना ही क्या?

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