- एकता में बहुत शक्ति होती है। बिखरे हजारों तिनकों को हाथी रौंद डालता है, वह सब मिलकर ढाका के रुप में उसे वश में कर लेते हैं। तलवार का वार भी वर्षा के मेघ तृण समूह को काट नहीं सकता।
- जल में तेल पड़ते ही थोडी मात्रा में विस्तार आ जाता है।
- दुष्ट व्यक्ति से कही गुप्त बात बिजली की गति से फैलती है।
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Saturday, July 21, 2007
चाणक्य वाणी: तिनकों की एकता
Friday, July 13, 2007
चाणक्य नीति: आलस्य सबसे बड़ा दुर्गुण
- आलस्य मनुष्य के स्वभाव का बहुत बड़ा दुर्गुण है। आलस्य के कारण प्राप्त की गयी विद्या भी नष्ट हो जाती है
- दुसरे के हाथ में गया धन कभी वापस नहीं आता।
- बीज अच्छा न हो तो फसल भी अच्छी नहीं होती और थोडा बीज डालने से भी खेत उजड़ जाते हैं
- सेनापति कुशल न हो तो सेना भी नष्ट हो जाती है।
- शील के संरक्षण में कुल का नाम उज्जवल होता है।
Wednesday, July 11, 2007
चाणक्य वाणी: क्रोध अपनी शक्ति के अनुकूल ही व्यक्त करें
- समाज में लोकप्रियता प्राप्त करने के लिए सबसे पहले दूसरों की निंदा में लगी हुये वाणी पर रोक लगाओ। परनिन्दा में रस लेना दुष्ट लोगों के प्रवृति है । वाणी पर संयम तपस्या है। निंदा न करके दूसरों की प्रशंसा करने वाला ही लोकप्रिय होता है ।
- विद्वान् व्यक्ति वही माना जाता है जो अपने व्यक्तित्व के अनुसार वार्तालाप करता है। वह वार्तालाप के प्रसंग के अनुसार ही बात करता है। अच्छी से अच्छी बात अप्रासंगिक होकर भी अप्रभावी हो जाते है। यदि कोई अप्रिय बात हो और उसमें क्रोध की अभिव्यक्ति आवश्यक हो तो भी वह उतना ही प्रदर्शित करना चाहिये जितना अपनी शक्ति के अनुकूल हो।
Tuesday, July 10, 2007
चाणक्य वाणी: वेदों का महत्व
- वैद के ज्ञान की गहराई को न समझकर उनकी निंदा करने वाले उनमें वर्णित सच्चाई और महानता को कम नहीं कर सकते। शास्त्र निहित आचार व्यवहार को व्यर्थ बताने वाले अल्पज्ञ लोग शास्त्रों के उपयोगिता को नष्ट नहीं कर सकते। शांत, सज्जन व्यक्ति को दुर्बल कहने वाले दुर्जनों का प्रयास भी निरर्थक हो जाता है। किसी की निंदा कराने वाले का अपना ही नाश होता है।
- कामवासना से रहित व्यक्ति रोग रहित नहीं रह सकता है, कामंधता भी अपने आप में एक रोग है। अधिक मोह भी मनुष्य को कमजोर बना देता है। ममता अच्छा गुण है पर मोह बुरा है। बुद्धि पूर्वक प्रेम करना अच्छा है, मोह तो अज्ञानता के कारण होता है। क्रोध की आग में क्रोधी व्यक्ति ही भस्म होता है। आत्मज्ञान से बढ़कर इस संसार में कोई दूसरा सुख नहीं। सत्य के ज्ञान से मनुष्य अज्ञानता द्वारा पैदा हुए कष्ट से बच सकता है।
Monday, July 9, 2007
चाणक्य वाणी:शास्त्रो का सार ग्रहन करें
- शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आयुर्वेद तथा धनुर्वेद की विद्याओं की भी गणना भी नहीं की जा सकती है, इसके विपरीत मनुष्य की जीवन अल्प है और उस अल्पकाल के जीवन में रोग,शोक, कष्ट आदि अनेक प्रकार की बाधाएं उपस्थित होती रहती हैं। इस स्थिति में मनुष्य कि शास्त्रों का सार ग्रहण करना चाहिए।
Sunday, July 8, 2007
चाणक्य नीति: मनुष्य की जांच
- जिस प्रकार सोने की चार विधियों-घिसना, काटना, तपाना तथा पीटने-से जांच की जाती है, उसी प्रकार मनुष्य की श्रेष्ठता की जांच भी चार विधियों-त्यागवृति, शील, गुण तथा सतकर्मो -से की जाती है।
Saturday, July 7, 2007
चाणक्य वाणी:मुर्गे से भी सीखना चाहिए
मनुष्य को शेर व बगुले से एक-एक गुण, मुर्गे से चार गुण सीखने में संकोच नहीं करना चाहिए। कुत्ते से छ:, गधे से तीन और कौवे से पांच गुण सीखे जा सकते हैं।
- सिंह का जातिगत गुण-अपने शौर्य से अपना पेट भरना
- बगुले का विशिष्ट गुण-अपने साथियों को सज्जनता का विश्वास का विश्वास दिलाना।
- मुर्गे के जातिगत गुण-प्रेयसी पर अपना प्रभाव रखना, जाति बंधुओं से मिलकर रहना। प्रात: उठना और सदैव युद्ध के लिए तत्पर रहना
- कुत्ते के गुण-स्वामिभक्ति, संतोष,सहनशीलता,सावधानी, दृ-निश्चय और शत्रु पर झपटना।
- गधे के तीन गुण-भार ढोना, शांत रहना, फल की इच्छा न करना
Friday, July 6, 2007
चाणक्य वाणी: सिंह की गुफा और गीदड़ की माँद
- साहसी मनुष्य को अपने पराक्रम का पुरस्कार अवश्य मिलता है। सिंह की गुफा में जाने पर संभव है कि गजमुक्ता (काले रंग का मोती) मिल जाये, परंतु मनुष्य गीदड़ मी माँद में जाएगा तो उसे गाय की पूँछ और गधे के चमड़े के टुकड़े के अलावा और क्या मिल सकता है।
Thursday, July 5, 2007
चाणक्य वाणी: माता-पिता के संतान के प्रति कर्तव्य
- जो बुद्धिमान पुरुष होते हैं, वह सब अपने पुत्रों की नाना प्रकार के सदचारों की शिक्षा देकर उनको योग्य बनाते हैं, ताकि वह नीतिवान और शक्तिवान बनकर अपने कुल की परंपरा को आगे कायम रखकर समाज में अपना नाम कर सकें।
- जो माता- पिता अपने पुत्रों को शिक्षा नहीं दिलाते, उन्हें पढाते-लिखाते नहीं है वह उस पुत्र के शत्रु हैं क्योंकि फिर वह कहीं किसी सभा में बैठता है तो ऐसे लगता है जैसे कि हंसों में बगुला आकर बैठ गया हो।
- बच्चों की ज्यादा दुलारना अथवा ताडना देना दोनों ही हानिकारक है। इसीलिये पुत्र और शिष्य को उसी सीमा तक दुलाराना और ताड़ना देना चाहिऐ जहाँ तक उचित हो ।
Wednesday, July 4, 2007
चाणक्य वाणी: पानी भी ओषधि की तरह होता है
- पानी में बहुत से गुण हैं। अपचन हो तो भोजन न करके केवल पानी पीना ओषधि लेने के बराबर है। अपचन न हो तो भोजन पचने के पश्चात पानी पीना बल वर्धक है। भोजन चबाते हुए बीच-बीच में थोडा-थोडा पानी पीना अमृत तुल्य किन्तु भोजन करने के तुरन्त बाद पानी पीना विष तुल्य है।
- जल स्नान करना आवश्यक है। ते ल की मालिश करने, चिता का धुँआ लगने, रति क्रीडा तथा हजामत के पश्चात जब तक व्यक्ति स्नान नहीं कर लेता तब तक अस्पर्श्य माना जाता है इन कार्यों से निवृत होने का बात नहाने से आदमी कि बुद्धि शुद्ध हो जाती है।
Tuesday, July 3, 2007
चाणक्य नीति: ज्ञानी, अज्ञानी और अल्पज्ञानी
- अज्ञानी व्यक्ति को कोई भी बात समझायी जा सकती है क्योंक उस किसी बात का ज्ञान तो है नहीं। अत: उसे जो कुछ समझाया जाएगा वह समझ सकता है, ज्ञानी को तो कोई बात बिल्कुल सही तौर पर समझायी जा सकते है। परन्तु अल्पज्ञानी को कोई भी बात नही समझायी क्योंकि अल्पज्ञान के रुप में अधकचरे ज्ञान का समावेश होता है जो किसी भी बात को उसके मस्तिष्क तक पहुंचने ही नहीं देता।
*लेखक का मत है कि अल्पज्ञानी को अपने ज्ञान का अहंकार हो जाता है इसलिये वह कुछ सीखना ही नहीं चाहता, वह केवल अपने प्रदर्शन में ही लगा रहता है।
Monday, July 2, 2007
चाणक्य नीति: सोने में सुगंध क्यों नहीं?
ईश्वर ने सोने में सुगंध नहीं डाली, गन्ने में फल नहीं लगाए, चन्दन के पेड को फूलों से नहीं सजाया , विद्वान को धन से संपन्न नहीं बनाया और राजा को दीर्घायु प्रदान नहीं की। इनके साथ इस तरह के अभाव का रहस्य का कारण यही है इन वस्तुओं के उपयोग के साथ और मनुष्यों में उसकी प्रवृति में दुरूपयोग और अहंकार का भाव पैदा न हो। अगर इससे ज्यादा गुण होते तो यह दोनों के लिए घातक होता।
Saturday, June 30, 2007
चाणक्य नीति:केतकी के गुण से सीखें
- विद्धान और गुणवान व्यक्ति का आदर सब जगह होता है। अगर आदमी एक ही गुण है तो वह उसके सारे अवगुण व दोषों की भी लोगों में अनदेखी करा देता है। ठीक उसी तरह जैसे केतकी जो हर समय साँपों से घिरी रहती है और उस पर फल भी नहीं लगते, और उसमे कांटे भी बहुत होते हैं। वह सीधी भी नहीं होती , कीचड़ में पैदा होती है और लोगों को आसानी से उपलब्ध भी नहीं होती पर उसकी गंध ऐसा गुण है जिसके कारण सब उसे पाने के लिए लालायित रहते हैं। इस प्रकार इतने सारे अवगुण होते हुए भी केतकी में लोगों का मोह होता है।
*लेखक का मत है लोगों को आत्ममंथन कर यह देखना चाहिए कि कौनसा उनमें गुण है और कौनसा अवगुण है और फिर अपने जीवन की रूपरेखा तय इस तरह करना चाहिए कि हम अपने गुण के अनुसार ही कार्य करें तो हमें समाज में लोकप्रियता मिलेगी।
- २.किसी व्यक्ति का मान-सम्मान जिस क्षेत्र में न हो तो उसे वह क्षेत्र छोड़ देना चाहिऐ, क्योंकि सम्मान का आभाव में जीवन को कोई अर्थ नहीं होता है।
*लेखक का मानना है कि किसी भी व्यक्ति को वह स्थान त्याग देना चाहिए जहाँ उसकी आजीविका न हो क्योंकि जीविका रहित व्यक्ति कभी भी सम्मान योग्य नहीं होता।
Friday, June 29, 2007
चाणक्य नीति:बेईमानी का धन दस वर्ष बाद नष्ट हो जाता है
- धूर्तता, अन्याय और बैईमानी आदि से अर्जित धन से संपन्न आदमी अधिक से अधिक दस वर्ष तक संपन्न रह सकता है, ग्यारहवें वर्ष में मूल के साथ-साथ पूरा अर्जित धन नष्ट हो जाता है।
*इसका सीधा आशय यह है कि भ्रष्ट और गलत तरीके से कमाया गया पैसा दस वर्ष तक ही सुख दे सकता है, हो सकता है कि इससे पहले ही वह नष्ट हो जाय।
२. अर्थाभाव में मित्र, स्त्री, नौकर स्नेहीजन भी व्यक्ति का आदर नहीं करते, यदि वही व्यक्ति पुन: संपन्न हो जाये तो अनादर करने वाले फिर आदर करने लगते हैं।
Thursday, June 28, 2007
चाणक्य नीति:दिन में दीपक जलाना व्यर्थ
1. जिस प्रकार समुद्र के ऊपर वर्षा व्यर्थ है उसी प्रकार भोजन से तृप्त पुरुष से भोजन का अनुरोध करना भी व्यर्थ है। जिस प्रकार दिन में सूर्य के प्रकाश में दीपक जलना व्यर्थ है ठीक उसी प्रकार धन से संपन्न व्यक्ति को दान देना भी निरर्थक है। दान हमेशा अभाव पीड़ित को देना ही उचित है
२.अपने निरंतर अभ्यास से मनुष्य अनेक गुण प्राप्त कर लेता है पर कुछ गुण ऐसे होते हैं जो स्वाभाविक रुप से होते हैं-जैस दानशीलता, मधुर बोलना, शौर्यता तथा विद्वता।
Wednesday, June 27, 2007
चाणक्य नीति:सांप के साथ रहना ज्यादा अच्छा
दुर्जन और सांप के साथ रहना एक जैसा दुखदायी होता है, और दोनों में से एक के साथ मजबूरीवश रहना भी पडे तो दुर्जन के साथ रहने की अपेक्षा सांप के साथ रहना ज्यादा अच्छा है। क्योंकि सांप तो अपने जीवन पर संकट आने पर ही काटता है , पर दुष्ट तो समय-असमय और कारण-अकारण कष्ट देने के लिए प्रयास करता है। दुर्जन द्वारा पहुंचायी गयी पीडा सर्पदंश से ज्यादा खतरनाक होती है। इसीलिये दुर्जन से कोई संबंध नहीं रखना चाहिऐ, वह कभी भी विश्वासघात कर सकता है।
Tuesday, June 26, 2007
चाणक्य नीति
२.समर्थ पुरुष के लिए अयोग्य वस्तु भी आभूषण के रुप में होती है जबकि नीच के लिए योग्य भी अनुपयोगी और दोषयुक्त हो जाती है। देवताओं को अजर-और अमर बनाने वाला अमृत राहू के लिए प्राणघातक सिद्ध हुआ। वही प्राणघातक विष भगवान् शिव के लिए आभूषण बन गया।
Monday, June 25, 2007
चाणक्य नीति
१.बुद्धिमान पुरुष को तब तक ही भय की चिंता करना चाहिए जब तक वह सामने नहीं आ जाता, अगर एक बार वह सामने आ जाये तो उसका मुकाबला करना ही बेहतर है। भय के सामने आने पर घबडा कर छिपने की कोशिश करना समझदारी का काम नहीं है।
२.बुद्धिमान व्यक्ति को सदैव यह सोचना चाहिए कि उसके मित्र कितने है, और उसका समय कैसा चल रहा है। इसके अलावा अपने निवास स्थान और अपने आय व्यय पर भी विचार करते रहना चाहिए। उसे इस बात पर भी चिन्तन करना चाहिऐ कि वह कौन है, आत्मा या शरीर , स्वाधीन है अथवा पराधीन, तथा उसकी ताकत कितनी है, उसे इन बातों पर विचार करते रहना चाहिए वर्ना वह पत्थर की तरह निर्जीव हो जाता है।
Sunday, June 24, 2007
चाणक्य नीति
Saturday, June 23, 2007
चाणक्य नीति
1.कुछ बातें किसी के समक्ष नहीं प्रकाशित करनी चाहिए जैसे -अपनी सिद्ध ओषधि, अपने धर्म-कर्म का रुप, घर के दोष, पति-पत्नी के आपसी संबंध, बुरा भोजन, और निंदा। दूसरों के सामने अपनी यह बातें कहने से बदनामी ही होती है, और किसी प्रकार के लाभ की आशा करना ही बेकार है।
२.मैले वस्त्र धारण करने, दांत साफ न रखने, सूर्योदय व सूर्यास्त के समय सोने , कटु वचन बोलने और अधिक भोजन करने वाले मनुष्यों को समाज में न तो धन प्राप्त होता है न यश। समाज में ऐसे व्यक्ति को ऊंची दृष्टि से नहीं देखा जाता। यदि साक्षात विष्णु भी हौं तो लक्ष्मी उन्हें छोड़ देती है, अन्यों का तो कहना ही क्या?
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