- जो सुख चाहते है वह विद्या छोड़ दें। जो विद्या चाहते हैं वह सुख छोड़ दें। सुखार्थी को ज्ञान और ज्ञानार्थी को सुख कहाँ मिलता है।
- बिना सोचे-समझे खर्च करने वाला, अनाथ, झगडा करने वाला तथा असंयमित जीवन व्यतीत करने वाले व्यक्ति अल्पायु होते हैं।
- धन-धान्य के लेन-देन में, विद्या संग्रह में और वाद-विवाद में जो निर्लज्ज होता है, वही सुखी होता है।
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Sunday, August 12, 2007
चाणक्य नीति: सुख और विद्या
Saturday, August 11, 2007
चाणक्य नीति: कलियुग में ऐसा भी होता है
- कलियुग में दस हजार वर्ष बीत जाने पर भगवान विष्णु पृथ्वी को त्याग देते हैं, पांच हजार वर्ष बाद गंगाजल पृथ्वी को छोड़ देता है और ढाई हजार वर्ष व्यतीत होने पर ग्राम देवता पृथ्वी का त्याग करते हैं।
- जिस व्यक्ति पर परमपिता भगवान् विष्णु की कृपा दृष्टि हो जाती है उसके लिए तीनों लोक अपने ही घर के समान है। जिस पर प्रभु का स्नेह रहता है उसके सभी कार्य स्वयं सिद्ध हो जाते हैं।
- किसी भी कार्य को करने से पहले देख लेना चाहिए उसका प्रतिफल क्या मिलेगा? यदि प्राप्त लाभ से बहुत अधिक परिश्रम करना पडे तो ऐसा परिश्रम न करना ही अच्छा है। माला गूंथने से, चंदन घिसने से या ईश्वर की स्तुति का स्वयं गान करने से ही किसी भी मनुष्य का कल्याण नहीं हो सकता है, यह कार्य तो हर कोई कर सकता है। वैसे जिनका यह व्यवसाय है उन्हें ही शोभा देता है। मनुष्य को वही कार्य करना चाहिए जो उसके लिए उचित व कम परिश्रम से फलदायक हो।
Friday, August 10, 2007
चाणक्य नीति: जीवन में आडम्बर भी जरूरी
- राजा, बालक, दुसरे का कुत्ता, मूर्ख व्यक्ति, सांप, सिंह और सूअर इन सात जीवों को सोते हुए से कभी नहीं जगाना चाहिए, इन्हें जगाने से मनुष्य को हानि ही हो सकती है लाभ नहीं। इनके आक्रमण करने से अपनी रक्षा करना कठिन होगा। अत: अच्छा यही है यदि वह सो रहे हैं तो उन्हें सोता छोड़ आगे बढ जाना चाहिए।
- जो व्यक्ति निस्तेज यानी प्रभावहीन है न तो उसके प्रसन्न होने पर किसी व्यक्ति को अर्थ की प्राप्ति होती है न ही नाराजगी पर किसी सजा का भय ही प्रतीत होता है। जिसकी कृपा होने पर पुरस्कार न मिलता हो और न ही जो किसी को दण्ड देने का अधिकारी हो ऐसा व्यक्ति रुष्ट भी हो जाये तो कोई उसकी चिंता नहीं करता।
- आज के युग में आडम्बर का अपना अलग ही महत्व है। वह झूठ भी हो तो भी आदमी को कुछ न कुछ लाभ मिल ही जाता है। सर्प के मुख में विष न हो तो भी वह मुख तो फैला ही देता है जिससे लोग भयभीत होकर पीछे त जाते हैं। उसकी फुफकार ही दूसरों को डराने और अपनी रक्षा करने में पर्याप्त होती है। यदि सर्प अपने फन भी न फैलाये तो कोई बच्चा भी मार डालेगा। इसलिये कुछ न कुछ आडम्बर करना हर प्राणी के लिए आवश्यक है।
Saturday, August 4, 2007
चाणक्य वाणी: दुष्ट की संगत कष्टप्रद
- मूर्ख शिष्य को शिक्षा देने से कोई लाभ नहीं क्योंकि वह उसका उलटा ही अर्थ लेगा और उसका उपभोग भी नहीं कर पायेगा। अत: गुरू का सारा प्रयास व्यर्थ जाएगा।
- दुष्ट व्यक्ति का पालन करने से भी व्यक्ति को कष्ट उठाना पडता है। दुष्ट व्यक्ति कभी भी अपना स्वभाव नहीं छोड़ सकता और उसको पालना, प्रश्रय देना और सहयोग देना अंतत: बहुत कष्टकारी होता है।
- प्रत्येक व्यक्ति को सब कुछ उपलब्ध नहीं होता, यदि ऐसा होता तो व्यक्ति के लिए पृथ्वी ही स्वर्ग होती । ऐसा केवल व्यक्ति के भाग्य से संभव होता है,
Friday, August 3, 2007
चाणक्य वाणी: मन की भावना से प्रतिमा में भी भगवान्
- मन की शुद्ध भावना से यदि लकड़ी, पत्थर या किसी धातु से बनी मूर्ति की पूजा की जायेगी तो सब में व्याप्त परमात्मा वहां भी भक्त पर प्रसन्न होंगें। अगर भावना है तो जड़ वस्तु में भी भगवान का निवास होता है ।
- इस क्षण-भंगुर संसार में धन-वैभव का आना-जाना सदैव लगा रहेगा। लक्ष्मी चंचल स्वभाव की है। घर-परिवार भी नश्वर है। बाल्यकाल, युवावस्था और बुढ़ापा भी आते हैं और चले जाते हैं। कोई भी मनुष्य उन्हें सदा ही उन्हें अपने बन्धन में नहीं बाँध सकता। इस अस्थिर संसार में केवल धर्म ही अपना है। धर्म का नियम ही शाश्वत है और उसकी रक्षा करना ही सच्चा कर्तव्य है।
- सच्ची भावना से कोई भी कल्याणकारी काम किया जाये तो परमात्मा की कृपा से उसमें अवश्य सफलता मिलेगी। मनुष्य की भावना ही प्रतिमा को भगवान बनाती है। भावना का अभाव प्रतिमा को भी जड़ बना देता है।
Thursday, August 2, 2007
चाणक्य वाणी: संतोष नन्दन वन और विद्या कामधेनु के समान
- क्रोध यमराज के समान है, उसके कारण मनुष्य मृत्यु की गोद में चला जाता है।
- तृष्णा वैतरणी नदी की तरह है जिसके कारण मनुष्य को सदैव कष्ट उठाने पड़ते हैं।
- विद्या कामधेनु के समान है । मनुष्य अगर भलीभांति शिक्षा प्राप्त करे को वह कहीं भी और कभी भी फल प्रदान कर सकती है।
- संतोष नन्दन वन के समान है। मनुष्य अगर अपने अन्दर उसे स्थापित करे तो उसे वैसे ही सुख मिलेगा जैसे नन्दन वन में मिलता है।
- रुप की शोभा गुण है। अगर गुण नहीं है तो रूपवान स्त्री और पुरुष भी कुरूप लगने लगता है।
- कुल की शोभा शील मैं है। अगर शील नहीं है तो उच्च कुल का व्यक्ति भी नीच और गन्दा लगने लगता है।
- विद्या की शोभा उसकी सिद्धि में है । जिस विद्या से कोई उपलब्धि प्राप्त हो वही काम की है।
- धन की शोभा उसके उपयोग में है । धन के व्यय में अगर कंजूसी की जाये तो वह किसी मतलब का नहीं रह जाता है, अत: उसे खर्च करते रहना चाहिऐ
Wednesday, August 1, 2007
चाणक्य वाणी: दुष्टो की संगत विनाश का कारण
-
- बुरे व्यवहार करने वाले कर्मचारियों (सहयोगियों ) तथा बुरे स्थान पर रहने वाले दुष्ट लोगों से मित्रता करने वाला मनुष्य का संकट में पड़कर विनाश होना निश्चित है।
- पत्नी की मृत्यु, अपनों द्वारा अपमान, ऋण की वृद्धि, दुष्ट राजा की सेवा, दरिद्रता, दुष्टों की संगत मनुष्य का शरीर बिना आग के जलाया करती हैं।
- नदी के किनारे के पेड, दुसरे के घर जाकर बैठने वाली स्त्री बिना मंत्री का राजा यह सब शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।
- निश्चित वस्तु को छोड़कर जो व्यक्ति अनिश्चित की ओर भागता है वह निश्चित से भी हाथ धो बैठता है, अनिश्चित पाने की तो वैसे भी संभावना नहीं रहती।
Tuesday, July 31, 2007
चाणक्य वाणी: दुष्ट के साथ सख्ती करना चाहिए
- पाँव धोने का जल और संध्या के उपरांत शेष जल विकारों से युक्त हो जाता अत: उसे उपयोग में लाना अत्यंत निकृष्ट होता है। पत्थर पर चंदन घिसकर लगाना और अपना ही मुख पानी में देखना भी अशुभ माना गया है।
- बिना बुलाए किसी के घर जाने की बात, बिना पूछे दान देना और दो व्यक्तियों के बीच वार्तालाप में बोल पडना भी अधम कार्य माना जाता है।
- शंख का पिता रत्नों की खदान है। माता लक्ष्मी है फिर भी वह शंख भीख माँगता है तो उसमें उसके भाग्य का ही खेल कहा जा सकता है।
- उपकार करने वाले पर प्रत्युपकार, मारने वाले को दण्ड दुष्ट और शठ के सख्ती का व्यवहार कर ही मनुष्य अपनी रक्षा कर सकता है।
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Wednesday, July 25, 2007
चाणक्य वाणी: विद्वानों की स्थिति
- आजकल के विद्वान् चारों वेदों और धर्म शास्त्रों को पढ़ तो लेते है लेकिन उन्हें पढने में पारंगत होने के बाद भी उनके आत्मतत्व के ज्ञान से शून्य रहते हैं। उन विद्वानों की स्थिति वैसे ही है जैसे कलछी की होती है जो सब स्वादिष्ट पकवानों में से गुजर कर भी उनका स्वाद नहीं जानती।
- इस संसार में विद्वानों कि स्थिति बड़ी विचित्र और विपरीत होती है। यहाँ इस संसार रूपी सागर के नीचे जाएँ तो तर जाते हैं और ऊपर बैठे तो डूब जाते हैं।
Tuesday, July 24, 2007
चाणक्य वाणी: कटु वचन बोलने वाले नष्ट हो जाते हैं
१।जो नीच प्रवृति के लोग दूसरों के हृदय को चोट पहुँचाते है और अपनी वाणी से कटु वचन बोलते हैं,दूसरो की बुराई कर प्रसन्न होते है, वह कभी-कभी अपने विषैले और कटु वचनों से अपने को भी घायल कर बैठते हैं। अपने वचनों द्वारा बिछाये जाल में स्वयं भी घिर जाते हैं और उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जैसे रेत के टीले को बांबी समझकर सांप उसमें घुस जाता है और फिर निकल नहीं पाता और दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है।
२. समर्थ पुरुष के लिए अयोग्य वस्तु भी आभूषण के रुप में होती है जबकि नीच के लिए योग्य भी अनुपयोगी और दोषयुक्त हो जाती है। देवताओं को अजर-और अमर बनाने वाला अमृत राहू के लिए प्राणघातक सिद्ध हुआ। वही प्राणघातक विष भगवान् शिव के लिए आभूषण बन गया।
Sunday, July 22, 2007
चाणक्य वाणी
१.धूर्तता, अन्याय और बैईमानी आदि से अर्जित धन से संपन्न आदमी अधिक से अधिक दस वर्ष तक संपन्न रह सकता है, ग्यारहवें वर्ष में मूल के साथ-साथ पूरा अर्जित धन नष्ट हो जाता है।
*इसका सीधा आशय यह है कि भ्रष्ट और गलत तरीके से कमाया गया पैसा दस वर्ष तक ही सुख दे सकता है, हो सकता है कि इससे पहले ही वह नष्ट हो जाय।
२. अर्थाभाव में मित्र, स्त्री, नौकर स्नेहीजन भी व्यक्ति का आदर नहीं करते, यदि वही व्यक्ति पुन: संपन्न हो जाये तो अनादर करने वाले फिर आदर करने लगते हैं।
Friday, July 20, 2007
चाणक्य वाणी
- बुरे राजा के राज में भला जनता कैसे सुखी रह सकती है।
- बुरे मित्र से भला क्या सुख मिल सकता है। वह और भी गले की फांसी सिद्ध हो सकता है।
- बुरी स्त्री से भला घर में सुख शांति और प्रेम का भाव कैसे हो सकता है।
- बुरे शिष्य को गुरू लाख पढाये पर ऐसे शिष्य पर किसी भी प्रकार का प्रभाव नहीं पड़ सकता है।
Thursday, July 19, 2007
चाणक्य वाणी: विद्या है कामधेनु के समान
- मछली दर्शन से, कछ्वों ध्यान से, पक्षी स्पर्श से अपने बच्चों को पालते हैं, उस प्रकार सज्जनों की भी संगति में मनुष्य पलते हैं।
- विद्या कामधेनु के समान गुण वाली है। वह असंभव में भी फल देती है। विदेश में वह भाई के समान है। वह एक प्रकार का गुप्त धन है। इस कारण विद्या और ज्ञान का संचय अवश्य करना चाहिए।
- सामर्थ्य के आगे कोई वस्तु भारी नहीं। व्यापारी के लिए कोई देश दूर नहीं, विद्वान् के लिए कोई देश पराया नहीं और मधुर बोलने वाले के लिए कोई पराया नहीं।
Wednesday, July 18, 2007
चाणक्य वाणी: ईर्ष्या असफलता का दूसरा नाम
- ईर्ष्या असफलता का दूसरा नाम है। अपनी असफलता और दुसरे की सफलता से मनुष्य ईर्ष्यालु हो जाता। ईर्ष्याग्रस्त मनुष्य महत्वहीन होता है, अतएव ईर्ष्या करना अपना महत्व घटाता है,
- हजारों गायों के बीच बछ्दा केवल अपने माँ के पास जाता है, इसी प्रकार मनुष्य का कर्म भी उसी में पाया जाता है, जो उसका कर्ता होता है। कर्ता कर्म का फल भोगे बिना कैसे रह सकता है ।
Tuesday, July 17, 2007
चाणक्य वाणी
- यदि गंदे स्थान पर सोना पडा है उसे उठाने में गुरेज नहीं करना नहीं चाहिए, क्योंकि वह कीमती हैं। यदि विद्या निम्न कोटि के व्यक्ति से भी सीखना पडे तो संकोच नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह उपयोगी होती है।
- यदि विष से अमृत मिलता है जरूर प्राप्त करना चाहिए।
- युवावस्था में काम-क्रोध हावी होते हैं, इसी कारण व्यक्ति की विवेक शक्ति निष्क्रिय हो जाती है। काम वासना से व्यक्ति को कुछ नहीं सूझता। काम-क्रोध व्यक्ति को अँधा कर देता है।
Monday, July 16, 2007
चाणक्य वाणी: घर की रक्षा कुलीन स्त्री से होती है
- कोयल की मीठी वाणी उसका वास्तविक रुप है, वरना तो वह भी कॉए के समान काली और कुरूप होती है, परंतु उसका स्वर लोगों कि कानों को इतना मधुर और प्रिय लगता है कि उसके कुरूप होने कि परवाह न कर उसके भद्दी शक्ल की तरफ ध्यान न कर उससे स्नेह करते हैं।
- नदी के तेज बहाव के कारण उसके तट पर खडे वृक्ष नष्ट हो जाते है। उसी प्रकार जो नारी दूसरों के घर रहती है उस पर भी लोगों लांछन लगाते हैं और उसे अपने प्रतिष्ठा बचाने में कठिनाई होती है, इसलिये नारी को दुसरे के घर में निवास नहीं करना चाहिए ।
- धर्म सबसे अधिक शक्तिशाली है पर धन के बिना धार्मिक अनुष्ठान भी पूरे नहीं होते, इसलिये धर्म की रक्षा के लिए धन वांछित है।
- विद्या की रक्षा ज्ञान के अनुसार बार-बार स्मरण करने से होती है
- राज्य के रक्षा के लिए नीतिवान व दया पूर्ण व्यवहार जरूरी है।
- भर की रक्षा कुलीन स्त्री के द्वारा होती है।
Sunday, July 15, 2007
चाणक्य वाणी: विपरीत स्वभाव
Saturday, July 14, 2007
चाणक्य वाणी:मन की लगाव के बिना आत्मीयता होना कठिन
- जिसके प्रति सच्चा प्रेम हैं वह दूर रहते हुए भी समीप रहता है। इसके विपरीत जिससे लगाव नहीं है वह आदमी पास रहते हुए भी दूर रहता है। यह एक वास्तविकता है कि मन के लगाव के बिना आत्मीयता का भाव बन ही नहीं सकता है।
- जिस किसी व्यक्ति से मिलने की संभावना है उससे सदैव मधुर व्यवहार करना चाहिऐ। उदाहरण के लिए मृग का शिकार करने की इच्छा रखने वाला चालाक शिकारी उसके आसपास रहकर मधुर स्वर में गीत गाता रहता है ।
- अगर तुम्हें लोगों में अपना सम्मान बनाए रखना है तो किसी के सामने किसी की बुराई नहीं करो .
Thursday, July 12, 2007
चाणक्य वाणी
- बुद्धिमान माता-पिता को अपनी पुत्री का विवाह श्रेष्ठ परिवार में करना चाहिए। पुत्र को उत्तम शिक्षा और ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
- शत्रु को किसी न किसी संकट में उलझाए रखना चाहिऐ तथा मित्र को अच्छा कार्य करने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
- निरंतर परिश्रम ही गरीबी हटाने का एक सर्वश्रेष्ट उपाय है। परिश्रमी कभी भी निर्धन नहीं रह सकता।
Wednesday, July 11, 2007
चाणक्य वाणी: क्रोध अपनी शक्ति के अनुकूल ही व्यक्त करें
- समाज में लोकप्रियता प्राप्त करने के लिए सबसे पहले दूसरों की निंदा में लगी हुये वाणी पर रोक लगाओ। परनिन्दा में रस लेना दुष्ट लोगों के प्रवृति है । वाणी पर संयम तपस्या है। निंदा न करके दूसरों की प्रशंसा करने वाला ही लोकप्रिय होता है ।
- विद्वान् व्यक्ति वही माना जाता है जो अपने व्यक्तित्व के अनुसार वार्तालाप करता है। वह वार्तालाप के प्रसंग के अनुसार ही बात करता है। अच्छी से अच्छी बात अप्रासंगिक होकर भी अप्रभावी हो जाते है। यदि कोई अप्रिय बात हो और उसमें क्रोध की अभिव्यक्ति आवश्यक हो तो भी वह उतना ही प्रदर्शित करना चाहिये जितना अपनी शक्ति के अनुकूल हो।
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