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Tuesday, June 10, 2008

संत कबीर वाणीःजिनके बाल सफेद हो गये वह भी अज्ञानी हैं

आंखि न देखि बावरा,शब्द सुनै नहिं कान
सिर के केस उज्जल भये, अबहूं निपट अजान
संत शिरोमिणि कबीरदास जी कहते हैं कि संसार के लोग अपनी देह की अवस्था का विचार नहीं करते। इन बावलों को आंख से दिखते नहीं है और कानों से उपदेश और संतों के प्रवचन सुनाई नहीं देते है। सिर के बाल पूरी तरह सफेद हो और तब भी अज्ञानी हैं।

मूरख शब्द न मानई, धर्म न सुनै विचार
सत्य शब्द नहिं खोजई, जावैं जम के द्वारा


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मूर्ख व्यक्ति सत्य शब्द नहीं मानता न ही धर्म आदि का विचार करता। वह बिना सत्संग और भगवान भक्त के बिना ही मृत्यू को प्राप्त होता है।

संक्षिप्त व्याख्या-इस देश में इतने सारे कथित संत और उनके शिष्य हैं और इतने सारे धार्मिक अनुष्ठान होते हैं पर फिर भी समाज निरंतर संस्कृति, संस्कार और साहित्य के क्षेत्र में पतन की तरफ जा रहा है। लोग अपने संस्कारों को निरर्थक, संस्कृति को पिछड़ा और धार्मिक साहित्य को अप्रासंगिक मानने लगे हैं। इसका कारण यह है कि हमारे देश में पाखंड बहुत बढ़ चुका है। लोग ऐसे धार्मिक कार्यक्रमों में जाते हैं पर आखें होते हुए भी देखते नहीं, कान से सुनी बात दूसरे कान से निकाल देते हैं और बुद्धि का उपयोग करना तो उनको निरर्थक समय नष्ट करना होता है। वैसे वह फिल्मी और राजनीतिक विषयों पर बातचीत कर अपने आपको विद्वान और ज्ञानी समझते हैं पर सत्संग की बात करो तो कहते हैं-‘इनसे कोई संसार थोड़े ही चलता है।’

आधुनिक शिक्षा से भारतीय अध्यात्म विषय को दूर रखने की वजह से आजकल लोगों में मानसिक विकृतियां जन्म ले चुकी हैं। ऐसे में वही लोग थोड़ा बहुत ज्ञान धारण किये हुए हैं जिनको माता पिता या किसी योग्य गुरू द्वारा उससे परिचित कराया गया है वरन लोग तो मन की आखों से दृष्टिहीन, कान से बहरे और बुद्धि से विवेकहीन हो गये हैं। उनको केवल सांसरिक विषय ही प्रिय लगते हैं।

Friday, May 23, 2008

भृतहरि शतक:मूर्ख के साथ इन्द्र की सभा में बैठना भी ठीक नहीं

वरं पर्वतदुर्गेषु भ्रान्तं वनचरैः सह
न मूर्खजनसम्पर्कः सुरेन्द्रभवनेष्वपि
हिंदी में अर्थ- बियावान जंगल और पर्वतों के बीच खूंखार जानवरों के साथ रहना अच्छा है किंतु अगर मूर्ख के साथ इंद्र की सभा में भी बैठने का अवसर मिले तो भी उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए।
यदा किंचिज्ज्ञोऽहं द्विप इव मदान्धः समभवम्
तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिपतं मम मनः
यदा किञ्चित्किाञ्चिद् बुधजनसकाशादवगतम्
तदा मूर्खोऽस्मीति जवन इव मदो में व्यपगतः

हिंदी में अर्थ-जब मुझे कुछ ज्ञान हुआ तो मैं हाथी की तरह मदांध होकर उस पर गर्व करने लगा और अपने को विद्वान समझने लगा पर जब विद्वानों की संगत में बैठा और यथार्थ का ज्ञान हुआ तो वह अहंकार ज्वर की तरह उतर गया तब अनुभव हुआ कि मेरे समान तो कोई मूर्ख ही नहीं है।

Wednesday, July 11, 2007

संत कबीर वाणी: छलिया लोगों का हश्र

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बाना पहिरे सिंह का, चले भेड़ की चाल
बोली सियार की, कुता खावै काल
जो सिंह का वेश धारण कर , भेड़ की चाल चलते हैं और सियार की बोली बोलते हैं उन्हें अवश्य कुता फाड़ कर खा जाएगा।
कबीरदास जीं का आशय यह है कि जिनका वेश कुछ और है, कहते कुछ और हैं, एसे लोग छलिया प्रवृति के लोग अवश्य ही पिटते हैं।

चाणक्य वाणी: क्रोध अपनी शक्ति के अनुकूल ही व्यक्त करें

  1. समाज में लोकप्रियता प्राप्त करने के लिए सबसे पहले दूसरों की निंदा में लगी हुये वाणी पर रोक लगाओ। परनिन्दा में रस लेना दुष्ट लोगों के प्रवृति है । वाणी पर संयम तपस्या है। निंदा न करके दूसरों की प्रशंसा करने वाला ही लोकप्रिय होता है ।
  2. विद्वान् व्यक्ति वही माना जाता है जो अपने व्यक्तित्व के अनुसार वार्तालाप करता है। वह वार्तालाप के प्रसंग के अनुसार ही बात करता है। अच्छी से अच्छी बात अप्रासंगिक होकर भी अप्रभावी हो जाते है। यदि कोई अप्रिय बात हो और उसमें क्रोध की अभिव्यक्ति आवश्यक हो तो भी वह उतना ही प्रदर्शित करना चाहिये जितना अपनी शक्ति के अनुकूल हो।

Monday, July 9, 2007

चाणक्य वाणी:शास्त्रो का सार ग्रहन करें

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  • शास्त्रों की संख्या अनन्त, ज्योतिष,आयुर्वेद तथा धनुर्वेद की विद्याओं की भी गणना भी नहीं की जा सकती है, इसके विपरीत मनुष्य की जीवन अल्प है और उस अल्पकाल के जीवन में रोग,शोक, कष्ट आदि अनेक प्रकार की बाधाएं उपस्थित होती रहती हैं। इस स्थिति में मनुष्य कि शास्त्रों का सार ग्रहण करना चाहिए।

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