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Saturday, August 2, 2008

संत कबीर वाणीःपरमात्मा के स्मरण से होता है लाभ

सुमिरन तू घट में करै, घटी ही में करतार
घट ही भीतर पाइये, सुरति शब्द भण्डार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि परमात्मा तो हृदय के अंदर ही स्थिति है उसका स्मरण एकाग्रता से करने पर ही उसे प्राप्त किया जा सकता है। अपने घट में ही अपार ज्ञान का भंडार है बस आवश्यकता है तो उसे ध्यान लगाकर खोजने की।

सुमिरन सुरति लगाये के, मुख ते कुछू न बोल
बाहर के पट देय के, अंतर के पट खोल


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि चित्त को एकाग्रता से ध्यान लगाकर परमात्मा का स्मरण करना चाहिए। स्मरण के समय अपनी वाणी से कोई शब्द नहीं बोलना चाहिए। बाहर सक्रिय इंद्रियों को रोककर अंातरिक इंद्रियों को सक्रिय करना चाहिए।

जप तप संयम साधना, सब कुछ सुमिरन मांहि
कबीर जाने भक्त जन, सुमिरन सम क्रछु नांहि


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जप, तप, संयम और साधना के लाभ परमात्मा के स्मरण करने मात्र से ही प्राप्त हो जाते हैं। जो सच्चे भक्त हैं वह स्मरण के लाभों को जानते हैं।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Saturday, July 19, 2008

संत कबीर वाणीःपराई स्त्री से संपर्क रखना लहसुन खाने के समान

नारी नरक न जानिये, सब संतन की खान
जामें हरिजन ऊपजै, सोई रतन की खान


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि नारी को नरक नहीं समझना चाहिए वह तो सब संतों की जननी है। उससी कोख से ही सभी भक्त उत्पन्न हुए। वह मनुष्यों में अनमोल रत्न पैदा करने वाली खान है।

जग में भक्त कहावई, चुटकी चून न देय
सिध जोरू का ह्नै रहा, नाम गुरु का लेय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य अपने आपको इस जगत में भगत भी कहलाना चाहता है पर एक मुट्ठी भर दान भी किसी को नहीं दे सकता। वाणी से सद्गुरु का नाम लेता है पर नारी का असली भक्त रहता है।
परनारी का राचना, ज्यूं लहसुन की खान
कोने बैठ खाइये, परगट होय निदान


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि पराई स्त्री के साथ संपर्क रखना जैसे लहसून खाने के समान है। चाहे कितने भी एकांत में पराई नारी से संपर्क रखो उसकी गंध छिपाये नहीं छिप सकती।

Tuesday, July 15, 2008

रहीम के दोहेःसमय के अनुसार कर्म का फल प्रकट होता है

समय पाय फल होत है, समय पाय झरि जात
सदा रहै नहीं एक सौ, का रहीम पछितात?

कविवर रहीम कहते हैं कि समय चक्र तो घूमता रहता है और उसी के अनुसार मनुष्य को अपने कर्मो का फल मिलता है। समय कभी एक जैसा नहीं रहता इसलिये बुरा समय आने पर परेशान होने से कोई लाभ नहीं है।

उत्तम जाती ब्राह्मनी, देखत चित्त लुभाय
परम पाप पल में हरत, परसत वाके पास

कविवर रहीम कहते हैं कि मनुष्य की पहचान उसके उत्तम गुणों से होती है। ब्रह्मज्ञानी को देखते ही हृदय में प्रसन्नता के भावों का प्रवाह होता है। ऐसे विद्वान के सामने सिर झुकाने मात्र से ही सारे पाप धुल जाते है।

आदि रूप की परम दुति, घट घट रही समाई
लघु मति ते मो मन रसन, अस्तुति कही न जाई


कविवर रहीम कहते हैं कि आदि रूप परमात्मा का प्रकाश चारों तरफ फैला है। वह कणकण में समाया हुआ है। उसके प्रभाव करने में किसी का भी बौद्धिक ज्ञान कम पड़ जायेगा। उसकी महिमा गाने में तो शब्द भी कम पड़ जाते हैं।

Friday, July 11, 2008

विदुर नीतिःमित्र का ज्ञानी होना आवश्यक


1. जो मित्र न हो, मित्र होने पर भी ज्ञानी न हो, ज्ञानी होने पर जिसका अपने मन पर नियंत्रण न हो उसे अपना गुप्त मंत्र नहीं बताना चाहिये। किसी की परीक्षा किये बिना अपना सहयोगी नहीं बनाना चाहिये।
2.जो मोहवश बुरे कर्म करता है, उन कार्यों का विपरीत परिणाम होने से अपने जीवन को ही नष्ट कर देता है।
3.जिसके क्रोध और हर्ष व्यर्थ नहीं जाते और आवश्यक कार्य करते हुए स्वयं ही सतर्कता बरतता है और अपने आर्थिक स्थिति का पूरा ज्ञान जिसे है उसको पृथ्वी पर्याप्त संपदा प्रदान करती है।
4.जो संधि विग्रह आद छः गुणों का ज्ञान होने के लिये प्रसिद्ध है तथा अपनी स्थिति, विकास और पतन का समझता है और जिसके स्वभाव से सभी लोग प्रभावित होते हैं पृथ्वी उसकी रक्षा करती है।
5. उत्तम कर्मो का अनुष्ठान तो सुख देने वाला होता है, किंतु उन्हीं का अनुष्ठान न किया जाये तो पश्चाताप भी होता है।

Tuesday, July 8, 2008

चाणक्य नीतिःरोग और शत्रू सोते हुए पर हमला करते हैं

1.निरंतर परिश्रम करना ही अपनी निर्धनता हटाने का सबसे अधिक अच्छा उपाय है। परिश्रमी कभी निर्धन नहीं रह सकता। उद्यम करने वाले को उसका भाग्य का लिखा मिलता है। अगर कोई सिंह सो रहा है तो उसके मूंह में पशु अपने आप नहीं चले जाते। अगर वह परिश्रम न करे तो उसे भी भूखा मरना पड़ता है।
2.भगवान का नाम जपने से सभी पाप अपने आप नष्ट हो जाते हैं। प्राचीन ग्रंथों में पापों के प्रायश्चित को के रूप में तप का ही महत्व प्रतिपादित किया गया है, जो व्यक्ति निरंतर जप करता रहता है उसके पाप तो रह ही नहीं सकते।
3.उत्तर का प्रत्युत्तर देना ही झगड़े का कारण बनता है। अगर किसी ने अपशब्द कहें हैं और दूसरा भी उसके उत्तर में अपशब्द कहता है तो झगड़ा अपने आप शूरू हो जाता है। अगर की झगड़े का निराकरण करना है तो उसका सबसे अच्छा उत्तर मौन है।
4.जागरुक और सावधान व्यक्ति को किसी प्रकार के भय की आशंका नहीं रहती। प्रायः रोग, शत्रू तथा अपराधिक प्रवृत्ति के लोग असावधान और सोते व्यक्ति पर ही प्रहार करते हैं और उनके जागते ही भाग जाते हैं।

Friday, May 23, 2008

भृतहरि शतक:मूर्ख के साथ इन्द्र की सभा में बैठना भी ठीक नहीं

वरं पर्वतदुर्गेषु भ्रान्तं वनचरैः सह
न मूर्खजनसम्पर्कः सुरेन्द्रभवनेष्वपि
हिंदी में अर्थ- बियावान जंगल और पर्वतों के बीच खूंखार जानवरों के साथ रहना अच्छा है किंतु अगर मूर्ख के साथ इंद्र की सभा में भी बैठने का अवसर मिले तो भी उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए।
यदा किंचिज्ज्ञोऽहं द्विप इव मदान्धः समभवम्
तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिपतं मम मनः
यदा किञ्चित्किाञ्चिद् बुधजनसकाशादवगतम्
तदा मूर्खोऽस्मीति जवन इव मदो में व्यपगतः

हिंदी में अर्थ-जब मुझे कुछ ज्ञान हुआ तो मैं हाथी की तरह मदांध होकर उस पर गर्व करने लगा और अपने को विद्वान समझने लगा पर जब विद्वानों की संगत में बैठा और यथार्थ का ज्ञान हुआ तो वह अहंकार ज्वर की तरह उतर गया तब अनुभव हुआ कि मेरे समान तो कोई मूर्ख ही नहीं है।

Thursday, May 22, 2008

संत कबीर वाणी:अंहकार की रस्सी बांधकर भवसागर पार करना कठिन

मोर तोर की जेवरी, गल बंधा संसार
दास कबीरा क्यों बंधै, जाके नाम अधार


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि तेरे मेरे की रस्सी से बंधा आदमी इस संसार को पार करना चाहता है। परमात्मा के जो सच्चे भक्त है उनको इस संासरिक मोह माया से लगाव नहीं होता वह तो केवल भगवान के नाम से बंधे होते हैं।

नान्हा काती चित्त दे, महंगे मोल बिकाय
ग्राहक राजा राम है, और न नीरा जाय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने हृदय को एकाग्र कर परमात्मा के नाम लेकर ज्ञान के रूप में सूत कातो। उसके ग्राहक तो भगवान राम है जो घट घट वासी है। अन्य किसी के पास जाने का कोई लाभ नहीं है।

Tuesday, May 13, 2008

संत कबीर वाणी:कुल की चाल चलते हुए मन का हंस बिगड़ गया

दुनिया के धोखे मुआ, चल कुटुंब की कानि
तब कुल की क्या लाज है, जब ले धरा पसानि


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते है यह दुनियां एक धोखा है जिसमें आदमी केवल अपने परिवार के पालन पोषण के लिये हर समय जुटा रहता है। वह इस बात का विचार नहीं करता कि जब उसका शरीर निर्जीव होकर इस धरती पर पड़ा रहेगा तब उसके कुल शान का क्या होगा?



कुल करनी के कारनै, हंसा गया बिगोय
तब कुल काको लाजि, चारि पांव का होय


संता शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने परिवार की मर्यादा के लिये आदमी ने अपने आपको बिगाड़ लिया वरना वह तो हंस था। उस कुल की मर्यादा का तब क्या होगा जब परमार्थ और सत्संग के बिना जब भविष्य में उसे पशु बनना पड़ेगा।

संपादकीय व्याख्या-मनुष्य मन को हंस भी कहा जाता है पर उसे कोई उड़ने दे सके तभी समझा जा सकता है। हर कोई अपने विचार और लक्ष्यों का दायरा संकीर्ण कर लेता है। अपने और परिवार के हित के आगे उसे कुछ नहीं सूझता। कई लोग मन में शांति न होने की बात कहते हैं पर उसके लिये कोई यत्न नहीं करते। मन एकरसता से ऊब जाता है। स्वार्थ सिद्धि की एक ऐसा रस है जिसमें डूबे रहने से बोरियत लगती है-अगर थोड़ा परमार्थ भी कर लें तो एक सुख का अनुभव होता है। परमार्थ का यह आशय कतई नहीं है कि अपना सर्वस्व लुटा दें बल्कि हम किसी सुपात्र व्यक्ति की सहायता करें ने किसी बेबस का सहारा बने। वैसे लुटाने को लोग लाखों लुटा रहे हैं। अपने परिवार के नाम प्याऊ या किसी मंदिर में बैच या पंखा लगवाकर उस पर अपने परिवार का परिचय अंकित करवा देते हैं और स्वयं ही दानी होने का प्रमाणपत्र ग्रहण करते हैं। इससे मन को शांति नहीं मिलती। दूसरों से दिखावा कर सकते हो पर अपने आप से वह संभव नहीं है। हम हर जगह अपने कुल की परिवार की प्रतिष्ठा लिये घूमते हैं पर अपनी आत्मा से कभी परिचित नहीं होते। इसके लिये जरूरी है कि समय निकालकर भक्ति और संत्संग के कार्यों में बिना किसी दिखावे के निष्काम भाव से सम्मिलित हों।

Monday, May 12, 2008

संत कबीर वाणी:सत्य शब्द की खोज करे वह संत धन्य


खोजी हुआ शब्द का, धन्य संत जन सोय
कहैं कबीर गहि शब्द को, कबहु न जाय बिगोय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि वह सत्य धन्य है जो सत्य के शब्दों की खोज करता है। जो सत्य के शब्द के ज्ञान को धारण करता है वह गलती नहीं करता और उसका कभी पतन नहीं होता।

सोई शब्द जिन सार है, जो गुरू दिया बताय
बलिहार वा गुरुन की, सीष बियोग न जाय


वह शब्द ज्ञान सत्य है जो हमें अपनु गुरूओं से मिलता है। उस गुरू के सर्वस्व अर्पण कर दो जिससे शब्द ज्ञान मिला है और उससे कभी दूर न जाओ

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आजकल ढोंगी गुरूओं की बाढ़ इस देश में आयी है। कभी कभी तो लगता है कि अध्यात्मिक ज्ञान को रटने वाले पर स्वयं उसे धारण करने से वंचित लोग गुरू बनते जा रहे हैं। सकाम भक्ति का प्रचार इस समय जोरों पर है। सकाम भक्ति से तब तक ही मन में शांति रहती है जब तक हम उसे करते हैं और अधिकतर गुरू इसी प्रकार की भक्ति को प्रोत्साहन देते हैं ताकि जब तक भक्त या शिष्य जब तक उनके पास रहें उसमें मग्न रहें और फिर सांसरिक दुनियां में लौटकर दुःख भोगते हुए उनको याद करें। निष्काम भक्ति तो सदैव ह्ृदय में बनी रहती हैं और करने के बाद भी हमारा मन प्रफुल्लित रहता है। निष्काम भक्ति का आशय ईश्वर का ध्यान करते हुए निरंकार के रूप में उसे देखना। इससे हमारे मन, बुद्धि और विचारों का जो चक्र है वह घूमता रहता है और उससे उसमें शुद्धता आती है।

Thursday, May 1, 2008

रहीम के दोहे:यह जीवन फिर नहीं मिलता

रीति प्रीति सबसों भली, बैर न हित मित गोत
रहिमन याही जनम की, बहुरि न संगति होत

कविवर रहीम कहते है कि इस जीवन में सबसे प्रेम से पेश आओ। न किसी से बैर करो न अपने मित्र और गौत्र से हित की चाह करो। यह मनुष्य जीवन फिर मिलेगा कि नहीं कहना कठिन है।

वर्तमान संदर्भ मे व्याख्या-आप देखेंगे कई ऐसे पेशेवर प्रवचनकर्ता हैं जो लोगों को सकाम भक्ति की तरह प्रेरित कर दावा करते हैं कि अगले जन्म में भी मनुष्य योनि प्राप्त होगी। यह उनका ढोंग है। सच तो यह है कि यह जीवन अनंत रहस्यों से भरा पड़ा है और इसका पूरा ज्ञान किसी को नहींं। अगला जन्म होता है भी कि नहीं या अगली योनि में कौन क्या बनता है इसका आभास किसी को नहीं हो सकता चाहे कोई कितना बड़ा तत्वज्ञानी होने का दावा क्यों न करे। जो तत्वज्ञानी है वह जीवन जीने के बेहतर तरीके तो बताते हैं पर उसके बाद का अनुमान तो वह भी नहीं कर पाये। इसलिये बेहतर यही है कि हमें अपने जीवन में सबसे प्रेम का बर्ताव करना चाहिए और इस स्वार्थ से भरे संसार में अपने मित्रों और रिश्तेदारों से कोई आशा न कर निष्काम भाव से अपना कर्म करना चाहिए। हम अगर दूसरे को सुख देते हैं तो हमें सुख मिलेगा, और अगर दूसरे को दुख देंगे तो हमें चैन से रहने की आशा भी नहीं करना चाहिए। अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए अपने दैनिक कार्यों के साथ भगवान की भक्ति भी करना चाहिए। इसके साथ ही जो अगले जन्म में मनुष्य योनि दिलाने का दावा करते हैं ऐसे कथित लोगों की बातों को अनदेखा कर देना चाहिए।

Friday, April 18, 2008

संत कबीर वाणी:खुद को पानी नहीं मिले दूसरों को बांटे खीर

पानी मिले न आपको, औरन बकसत छीर
आपन मन निहचल नहीं और बंधावत धीर


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कुछ लोगों को पानी तक नहीं मिलता और दूसरों को खीर प्रदान करने की बात करते हैं और अपनी बुद्धि निश्चयात्मक नहीं है और दूसरों को धीरज प्रदान करते हैं।

पढि पढि के समुझावई, मन नहीं धरि धीर
रोटी का संसै पड़ा, यौं कहें दास कबीर

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कई लोग धर्मग्रंथों को पढ़कर उसे रट लेते हैं और दूसरों को समझाने लगते हैं पर उनका आचरण भी कोई अच्छा नहीं होता। सदैव अपनी रोटी की जुगाड़ में रहते हैं दूसरों को ज्ञान बघारते हैं

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आजकल धर्मोंपदेश करना व्यवसाय हो गया है। ऐसे अनेक संत हैं जो केवल धन कमाने के लिए ही कथा या उपदेश काम काम करते हैं। ऐसी बातें करते हैं जैसे कि बहुत बड़े ज्ञानी हों और अनेक लोग उनको गुरू मानकर उनकी चरण वंदना करने लगते हैं। यह उनका भ्रम होता है। कई धर्मोपदेशक तो स्वयं भी उस ज्ञान को ग्रहण नहीं करते और अपने अपना काम समाप्त कर उसका दाम वसूल करते हैं। कई जगह जाने से पहले ही दाम तय कर लेते हैं।

यहां हमारा आशय किसी की निंदा करना नहीं है। हम तो बस यह कहना चाहते हैं कि वह व्यवसाय करते हैं यह सभी भक्तों को समझ लेना चाहिए। इन पंक्तियों का लेखक स्वयं ही कई कथाओं में समय पास करने या ज्ञान पाने के लिये जाता है पर उसका उद्देश्य केवल धर्मग्रंथें में पढ़े हुए ज्ञान को स्मरण करना मात्र होता है। ऐसे धर्मोपदेशकों को साधु या संत मानकर सेवा करने या दान से कोई लाभ नहीं होता। उनकी चरणवदंना के कभी भक्ति प्राप्त नहीं होता और जो उनको गुरू बनाते हैं वह भी कोई भगवान का आर्शीवाद नहीं पाते। इनके प्रवचन तो सुनना चाहिए पर फिर भगवान का ध्यान लगाना चाहिए न कि इनके आकर्षण में बंधकर भगवान की भक्ति से विमुख होना जरूरी है। ऐसे लोगों पर माया की कृपा तो होती है पर भगवान की कृपा तो गरीब की सहायता करने, प्यासे को पानी पिलाने और परमार्थ के अन्य काम करने से होती है।

Wednesday, April 16, 2008

संत कबीर वाणी:जो शिक्षा भ्रम में रखे वह किस काम की

पढ़ै गुनै सीखै सुनै, मिटी न संसे सूल
कहैं कबीर कासों कहूं, ये ही दुख का मूल

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि बहुत पढ़ा सीखा और गुना पर मन में जो संशय के कांटे हैं वह न नहीं निकल सके। यह बात किसको बतायें कि यह पढ़ना लिखना ही दुःख का मूल कारण है।

पण्डित पोथी बांधि के, दे सिरहाने सोय
वह अक्षर इनमे नहंी, हंसि दे भावे रोय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपनी पोथी बांध कर अपने सिरहाने रख दो क्योंकि इनमें वह अक्षर ज्ञान नहीं है जो रोते हुए को अच्छा लगे और वह हंसने लगे।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-ऐसा लगता है कि कबीर दास जी के समय ही लोग अध्यात्मिक शिक्षा से दूर होने लगे थे और धर्म में नाम पर भी केवल सांसरिक कार्यों तथा कर्मकांडों की शिक्षा दी जा रही थी इसलिये कबीरदास जी ने ऐसा शिक्षा की आलोचना की। आज तो पूरी तरह से अंग्रेजों द्वारा निर्मित शिक्षा पद्धति को-जो उन्होंने भारत की पुरातत्व ज्ञान को यहां के लोगों के दिमाग से निकाल फैंकने तथा उन्हें हमेशा गुलाम बनाये रखने के लिये बनायी-अपनाये हुए हैं। दुनियां में बहुत लोग अंग्रेजी बोलते हैं पर सभी सभ्य और धनी नहीं है। अंग्रेजी से सबको रोटी भी नहीं देती। फिर यहां हर आदमी अपने बच्चे को अंग्रेजी सिखाना क्यों चाहता है? कहीं उसे अच्छी नौकरी मिल जायेगी। बड़े-बड़े धनाढ्य सेठ अंगूठा टेक हैं फिर समाज में उनकी इज्जत है क्योंकि वह किसी की नौकरी यानि गुलामी नहीं करते। नौकरी कितनी भी अच्छी क्यों न हो गुलामी होती है इस सत्य को कोई बदल नहीं सकता फिर भी करोड़ों की संख्या में लोग इसीलिये पढ़ रहे हैं कि उनको कही नौकरी मिल जाये।

अब आदमी पढ़ा लिखा भी है तो क्या केवल गुलामी करने वास्त ही न! तब ऐसी किताबों को पढ़ने से क्या फायदा जो गुलामी करने के लिये मजबूर करतीं है। इसलिये अच्छा है कि अध्यात्मिक शिक्षा भी प्राप्त की जाये। चूंकि आजकल की शिक्ष से एकदम परे होने का मतलब है अक्षर ज्ञान से वंचित होना इसलिये जितनी आवश्यक हो उतनी प्राप्त कर अपना स्वतंत्र काम करते हुए भगवान भजन करना चााहिए।

Tuesday, April 1, 2008

संत कबीर वाणी:माया वृक्ष की छाया की भांति अस्थिर

तीन गुनन की बादरी, ज्यों तरुवर की छांहि
बाहर रहै सो ऊबरै, भींजै मन्दिर मांहि


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं तीनों वाली माया रूपी बदली ऐसे ही जैसै वृक्ष की छाया स्थिर नहीं रहती। जो इस माया के जंजाल से परे रहता है। उसी का उद्धार होता है।

सूम सदा ही उद्धरै, दाता जाय नरवक
कहैं कबीर यह साखि सुनि, मति कोय जाव सरक्क


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने वीर्य को कंजूसी से व्यय करने वाला तो स्वर्ग में जा सकता है पर जो कामी इसका दान करता है नरक में ही जायेगा। इस साखी को जो लोग सुनकर सरकें नहीं बल्कि विचार करें।

व्याख्या-कबीरदास जी व्यंजना विधा में अपनी बात कहने के सिद्ध थे इसलिये कई जगह उनकी बात का अर्थ समझना पड़ता है और उपरोक्त साखी में कबीरदास जी ने जो बात कही है उसका आशय यही है कि अपनी ऊर्जा पर नियंत्रण रखकर ही अपना उद्धार हो सकता है।

Monday, January 21, 2008

रहीम के दोहे:ओछे व्यक्ति से कोई संपर्क न रखें

रहिमन ओछे नरन सों, बैर भलो ना प्रीति
कटे चाटै स्वान के, दोउ भांति विपरीति

कविवर रहीम कहते हैं की तुच्छ विचार वाले नीच मनुष्य से प्रेम और द्वेष नहीं करना चाहिए, उससे किसी प्रकार का संबंध नहीं रखना चाहिऐ.

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