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Wednesday, December 24, 2008

कबीर वाणी:अपना ऊंचा आवास देख कर घमंड न करें

कबीर गर्व न कीजिए, ऊंचा देखि आवास
काल परौं भूईं लेटना, ऊपर जमसी घास


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं की अपना शानदार मकान और शानशौकत देख कर अपने मन में अभिमान मत पालो जब देह से आत्मा निकल जाती हैं तो देह जमीन पर रख दी जाती है और ऊपर से घास रख दी जाती है।

आज के संदर्भ में व्याख्या-यह कोई नैराश्यवादी विचार नहीं है बल्कि एक सत्य दर्शन है। चाहे अमीर हो या गरीब उसका अंत एक जैसा ही है। अगर इसे समझ लिया जाये तो कभी न तो दिखावटी खुशी होगी न मानसिक संताप। सबमें आत्मा का स्वरूप एक जैसा है पर जो लोग जीवन के सत्य को समझ लेते हैं वह सबके साथ समान व्यवहार करते हैं। हम जब किसी अमीर को देखते हैं तो उसको चमत्कृत दृष्टि से देखते हैं और कोई गरीब हमारे सामने होता है तो उसे हेय दृष्टि से देखते हैं। यह हमारे अज्ञान का प्रतीक है। यह अज्ञान हमारे लिए कष्टकारक होता है। जब थोडा धन आता है तो मन में अंहकार आ जाता है और अगर नहीं होता तो निराशा में घिर जाते हैं और अपने अन्दर मौजूद आत्मा को नहीं जान पाते। यह आत्मा जब हमारी देह से निकल जाता है तो फिर कौन इस शरीर को पूछता है, यह अन्य लोगों की मृतक देह की स्थिति को देख सीख लेना चाहिये।
कई शानदार मकान बनते हैं पर समय के अनुसार सभी पुराने हो जाते हैं। कई महल ढह गये और कई राजा और जमींदार उसमें रहते हुए पुजे पर समय की धारा उनको बहा ले गयी। इनमें से कई का नाम लोग याद तक नहीं करते। हां, इतिहास उन लोगों को याद करता है जो समाज को कुछ दे जाते हैं। वैसे अपने इहकाल में भी किसी धनी को वही लोग सम्मान देते हैं जो उससे स्वार्थ की पूर्ति करते हैं पर जो ज्ञानी,प्रतिभाशाली और दयालु है समाज उसको वैसे ही सम्मान देता है यह जाने बगैर कि उसका घर कैसा है?
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Wednesday, August 27, 2008

विदुर नीति:मित्र निर्धन हो तो भी उसका सम्मान करें

१.जो मित्रों से सत्कार और सहायता पाकर कृतार्थ होकर भी उनका साथ नहीं निभाते ऐसे कृत्घ्नों के मरने पर उनका मांस तो मांसाहारी पशु भी नहीं खाते।
२.धनवान हो धनहीन मित्र का सम्मान करें। मित्रों से न तो किसी प्रकार की याचना करें और न ही उनकी परीक्षा लें।
३.दुष्ट पुरुषों का स्वभाव मेघ के समान चंचल होता है, वे सहसा क्रोध कर बैठते हैं और अकारण ही प्रसन्न हो जाते हैं।
४.हंस जिस प्रकार सूखे सरोवर के पास मंडरा कर रह जाते हैं उनके अन्दर प्रवेश नहीं करते उसी प्रकार जिसके ह्रदय में चंचलता का भाव विद्यमान है और अज्ञानी हैं वह भी इन्द्रियों के वश में रहता है अरु उसे अर्थ की प्राप्ति नहीं होती।
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Saturday, May 17, 2008

भृतहरि शतक:स्त्री को अबला मानने वाले कवि विपरीत बुद्धि के

नूनं हि ते कविवरा विपरीत वाचो
ये नित्यमाहुरबला इति कामिनीनाम् ।
याभिर्विलालतर तारकदृष्टिपातैः
शक्रायिऽपि विजितास्त्वबलाः कथं ताः


इस श्लोक का आशय यह है कि जो कवि सुंदर स्त्री को अबला मानते हैं उनको तो विपरीत बुद्धि का माना जाना चाहिए। जिन स्त्रियों ने अपने तीक्ष्ण दृष्टि से देवताओं तक को परास्त कर दिया उनको अबला कैसे माना जा सकता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अधिकतर कवि और रचयिता स्त्री को अबला मानते हैं पर भर्तुहरि महाराज ने उसके विपरीत उन्हें सबला माना है। सुंदर स्त्री से आशय समूची स्त्री जाति से ही माना जाना चाहिए, क्योंकि स्त्री का सौंदर्य उसके हृदय में स्थित लज्जा और ममता भाव में है जो कमोवेश हर स्त्री में होती है। माता चाहे किसी भी रंग या नस्ल की हो बच्चे पर अपनी ममता लुटा देती है। बच्चा भी अपनी मां को बड़े प्रेम से निहारता है। पूरे विश्व मेंे अनेक कवि और लेखक नारी को अबला मानकर उस पर अपनी विषय सामग्री प्रस्तुत करते हैं। वास्तव में बहुत अज्ञानी होते हैं। उन्हें अपनी रचना के समय यह आभास नहीं होता कि हर स्त्री का किसी न किसी पुरुष-जिसमें पिता, भाई, पति और रिश्ते-से संबंध होता है। वह सबके साथ निभाते हुए उनसे संरक्षण पाती है। जो लोग स्त्री को अबला मानकर अपनी रचना लिखते हैं वह वास्तव में अपने आसपास स्थित नारियों से अपने संबंधों पर दृष्टिपात किये बिना ही केवल नाम पाने के लिये लिखते हैं और इसी कारण आजकल पूरे विश्व में नारी को लेकर असत्य साहित्य की भरमार है। अनेक कहानियां और कवितायें नारियों को अबला और शोषित मानकर कर लिखीं जातीं हैं और उनमें सच कम कल्पना अधिक होती है। ऐसे लोग विपरीत बुद्धि के महत्वांकाक्षी लेखक लोगों की बुद्धि तरस योग्य है।

Tuesday, May 13, 2008

संत कबीर वाणी:कुल की चाल चलते हुए मन का हंस बिगड़ गया

दुनिया के धोखे मुआ, चल कुटुंब की कानि
तब कुल की क्या लाज है, जब ले धरा पसानि


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते है यह दुनियां एक धोखा है जिसमें आदमी केवल अपने परिवार के पालन पोषण के लिये हर समय जुटा रहता है। वह इस बात का विचार नहीं करता कि जब उसका शरीर निर्जीव होकर इस धरती पर पड़ा रहेगा तब उसके कुल शान का क्या होगा?



कुल करनी के कारनै, हंसा गया बिगोय
तब कुल काको लाजि, चारि पांव का होय


संता शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने परिवार की मर्यादा के लिये आदमी ने अपने आपको बिगाड़ लिया वरना वह तो हंस था। उस कुल की मर्यादा का तब क्या होगा जब परमार्थ और सत्संग के बिना जब भविष्य में उसे पशु बनना पड़ेगा।

संपादकीय व्याख्या-मनुष्य मन को हंस भी कहा जाता है पर उसे कोई उड़ने दे सके तभी समझा जा सकता है। हर कोई अपने विचार और लक्ष्यों का दायरा संकीर्ण कर लेता है। अपने और परिवार के हित के आगे उसे कुछ नहीं सूझता। कई लोग मन में शांति न होने की बात कहते हैं पर उसके लिये कोई यत्न नहीं करते। मन एकरसता से ऊब जाता है। स्वार्थ सिद्धि की एक ऐसा रस है जिसमें डूबे रहने से बोरियत लगती है-अगर थोड़ा परमार्थ भी कर लें तो एक सुख का अनुभव होता है। परमार्थ का यह आशय कतई नहीं है कि अपना सर्वस्व लुटा दें बल्कि हम किसी सुपात्र व्यक्ति की सहायता करें ने किसी बेबस का सहारा बने। वैसे लुटाने को लोग लाखों लुटा रहे हैं। अपने परिवार के नाम प्याऊ या किसी मंदिर में बैच या पंखा लगवाकर उस पर अपने परिवार का परिचय अंकित करवा देते हैं और स्वयं ही दानी होने का प्रमाणपत्र ग्रहण करते हैं। इससे मन को शांति नहीं मिलती। दूसरों से दिखावा कर सकते हो पर अपने आप से वह संभव नहीं है। हम हर जगह अपने कुल की परिवार की प्रतिष्ठा लिये घूमते हैं पर अपनी आत्मा से कभी परिचित नहीं होते। इसके लिये जरूरी है कि समय निकालकर भक्ति और संत्संग के कार्यों में बिना किसी दिखावे के निष्काम भाव से सम्मिलित हों।

Friday, May 9, 2008

संत कबीर वाणी:ध्यान के लिए बाहर के द्वार बंद कर अन्दर के खोलें


सुमिरन सुरति लगाय के, मुख ते कछु न बोल
बाहर के पट देय के, अंतर के पट खोल


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मन का एकाग्र और वाणी पर नियंत्रण करते हुए परमात्मा का स्मरण करो। आपनी बाह्य इंदियों के द्वार बंद कर अंदर के द्वार खोलो।

संपादकीय व्याख्या-इससे पता चलता है कि कबीरदास जी ध्यान की चरम स्थिति प्राप्त कर चुके थे और यही उनकी भक्ति और शक्ति का निर्माण करता था। भगवान की भक्ति का श्रेष्ठ रूप भी ध्यान ही है। अक्सर लोग कहते हैं कि हमारा ध्यान नहीं लगता या थोड़ी देर लगता है फिर भटक जाता है। दरअसल हम लोग शोरशराबे से भक्ति करने के आदी हो जाते हैं इसलिये यह सब होता है। इसके अलावा ध्यान के लिये गुरू की आवश्यकता होती है वह मिलते नहीं है। अधिकतर गुरू सकाम भक्ति के लिए प्रेरित कर केवल अपने प्रति लोगों का आकर्षण बनाये रखना चाहते हैं।

ध्यान लगाना सरल भी है और कठिन भी। यह हम पर निर्भर करता है कि हमारे मन और विचारों पर हमारा नियंत्रण कितना है। इस संसार के दो मार्ग हैं। एक सत्य का दूसरा माया का। हमारा मन माया के प्रति इतना आकर्षित रहता है कि उसे वहां से हटाने के लिये दृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है। अगर हमने तय कर लिया कि हमें ध्यान लगाना ही है तो दुनियां की कोई ताकत उसे लगने से रोक नहीं सकती और अगर संशय है तो कोई गुरू उसे लगवा नहीं सकता।
इन पंक्तियों का लेखक कोई सिद्ध पुरुष नहीं है पर ध्यान की विधि जो अनुभव से आई है उसे तो बता ही सकता है। कहीं शांत स्थान पर सुखासन में बैठ जाईये और आंखें बंद कर शरीर को ढीला छोड़ दें। अपने हृदय में चक्रधारी देव की कल्पना कर उसे पर अपनी दृष्टि रखें। अपना पूरा नाक के बीच में भृकुटि पर ही रखें। दुनियां के विचार आयें आने दीजिये। आप तो तय कर लीजिये कि मुझे ध्यान लगाना है। जो विचार आते हैं उनके बारे में चिंतित होने की बजाय यह सोचिये कि वह आपके जीवन के जो घटनाक्रम आपने देखे और अनुभव किये हैं उनसे उत्पन्न विकार है जो वहां भस्म हो रहे हैं। जिस तरह हम कोई पदार्थ मुख से ग्रहण करते हैं पर शरीर में वह गंदगी के रूप में बदल जाता है। हम मुख से करेला खायें यह क्रीमरोल उसका हश्र एक जैसा ही होता है। हम काढ़ा पियें या शर्बत वह भी कीचड़ के रूप में परिवर्तित हो जाता है। यही हाल आखों से देखे गये अच्छे बुरे दृश्य और कानों से सुने गये प्रिय और कटु स्वर का भी होता है। उसके विकार हम देख नहीं पाते पर वह हमारी देह में होते है और उसको वहां से निकालने के लिये ब्रह्मास्त्र का काम करता है ध्यान। जब ध्यान लगाते हैं और जो विचार हमारे दिमाग में आते हैं उनके बारे में यह समझना चाहिए कि वह विकार हैं जो वहां भस्म होने आ रहे हैं और हमारा मन शुद्ध हो रहा है। धीरे-धीरे हमारी बाह्य इंद्रियों के द्वार ध्यान के कारण स्वतः बंद होने लगेंगे। बस अपने अंदर दृढ़ इच्छा शक्ति की आवश्यकता है।

Tuesday, April 29, 2008

रहीम के दोहे:जल के बिना जीवन में सब होता है सूना

रहिमन पानी राखिये, बिनु पानी सब सून
पानी गए न ऊबरै, मोती, मानुष, चून


कविवर रहीम कहते हैं कि पानी को बचा कर रखें क्योंकि पानी बिना सब सून। पानी अगर न रहा तो मोती, मनुष्य और अनाज किसी का उद्धार नहीं हो सकता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-जिनके पास पानी की अभाव है वह तड़प रहे हैं पर जिनके पास है वह भी फैलाने में लगेे हैं। अपनी कारों और मोटर साइकिलों को ऐसे ही रोज नहलाते हैं जैसे कि वह गाय या बैल हों। लोग पानी को ऐसे फैलाये जा रहे हैं जैसे कभी खत्म नहीं होगा। यह आश्चर्य की बात है कि आज कई जगह जल बचाने के लिऐ आंदोलन चल रहे हैं।

जबकि रहीम जी का यह दोहा तो सैंकड़ों बरसों से इस देश में प्रचलित है और लोग इसे अक्सर अपना ज्ञान बघारने के लिये सुनाते हैं। सच बात तो यह है कि ज्ञान सुनना अलग बात है और उसे धारण करना अलग बात है। इस देश मेंं संत हो या आम आदमी सभी लोग ज्ञान और ध्यान की किताबें पढ़-पढ़कर उसका लिखा एक दूसरे को सुनाते हैं पर धारण कोई नहीं करता। अगर धारण करने वाले लोग होते तो आज इस तरह पानी के लिये बेहाल नहीं होते। समस्या यह नहीं है कि जल की कमी है बल्कि बढ़ते शहरीकरण के कारण उसके स्त्रोतों में कमी आयी है पर उपयोगिता की मात्रा बढ़ गयी है। आजकल कूलरों में पानी डालने के अलावा अपने वाहनों को साफ करने पर भी उसका अपव्यय होता है। ऐसे में इतना तो हो ही सकता है कि गर्मियों में लोग पानी फैलाने का काम न करें पर शायद ही कोई यह बात माने।

Tuesday, April 15, 2008

रहीम के दोहे:जहाँ शील और सदाचार न हो वह स्थान त्याग दें

रहिमन रहिबो वा भलो जो लौं सील समूच
सील ढील जब देखिए, तुरत कीजिए कूच


कविवर रहीम कहते हैं कि वही रहना ठीम है जहां लोगों में शील और सदाचार का भाव है। जहां इसमें कमी दिखाई दे वहां से हट जाना चाहिए।

रहिमन वित्त अधर्म को, जरत न लागे बार
चोरी करि होरी रची, भई तनिक में छार


कविवर रहीम कहते हैं कि अधर्म से प्राप्त धन को नष्ट हाने में समय नहीं लगता। होली के अवसर पर लोग चोरी की लकड़ी लाते हैं पर उसको जलकर रख होने में क्षण भी नहीं लगता।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-वैसे तो देखा जाय बुरे लोग तो रहीम जी के समय में ही रहे हैं इसलिये तो उन्होंने ऐसी बातें कहीं हैं जो आज भी प्रासंगिक लगतीं हैं। एक बात जरूर है कि उस समय आवागमन के साधन इतना तीव्र नहीं थे इसलिये आदमी अधिकतर अपने सीमित क्षेत्र में ही जीवन व्यतीत करता था। वर्तमान में कई कारणों से अपने मूल स्थान से दूर जाना पड़ता है और ऐसे में भले और बुरे दोनों प्रकार के लोगों का कार्यक्षेत्र भी विस्तृत हुआ है अतः दुष्ट लोग अपराध कर अपने क्षेत्र आसानी से बदलने लगते हैं ताकि दूसरी जगह उनकी पहचान न हो पाये। कई जगह तो उनकी बहुतायत हो जाती है और उससे लगता है कि इस दुनियां में भलाई और सदाचार नाम की कोई चीज नहीं है। यह हमारा एक भ्रम है। अगर इस दुनिया से बुराई को लोप नहंी हुआ है तो भलाई का भी नहीं हुआ है। हम अगर ऐसी जगह पहुंच जाते हैं जहां दुष्ट और निंदक प्रवृत्ति के लोगों का जमघट है तो हमें वहां से निकल जाना चाहिए। अगर वहां रहेंगे तो हमारे विचारों में दुष्टता का भाव और अधर्म से पैसा कमाने की प्रवृत्ति उत्पन्न होगी। अधर्म को धन वैसे भी अधिक देर नहीं ठहर जाता और कभी कभी तो वह अपने स्वामी को भी नष्ट कर देता है। अतः कुविचारों की बहुतायत वाले स्थान को त्यागने के साथ अधर्म से धन प्राप्त करने को मोह त्याग देना चाहिए।

Sunday, April 13, 2008

संत कबीर वाणी:दूसरे को प्रसन्न करें ऐसे लोगों का है अकाल

मानुस खोजत मैं फिरा, मानुस बड़ा सुकाल
जाको देखत दिल घिरे, लाका पड़ा दुकाल


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मैं इधर-उधर फिरकर मनुष्य ढूंढता फिरा जिनमें शुद्ध भावना हो उनका एकदम अकाल है। ऐसे मनुष्य जिनको देखकर दिल में प्रसन्नता हो उनका तो यहां मिलना दुर्लभ है।

कायर सेरी ताकवै, सूरा भांड़ पांव
सीस जीव दोऊ दिया, पीठ न आया घाव


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कायर तो भाग जाता है पर जो योद्धा होता है वह अपना पांव अड़ा कर खड़ा हो जाता है। भगवान के दर पर सच्चा भक्त अपना सिर झुकाता है और पीठ देकर वहां से भागता नहीं है।


वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस दुनियां में मनुष्य तो बहुत हैं पर उनमें कितने लोग ऐसे है जिनको देखकर दूसरे लोग प्रसन्न होते है यह एक विचारणीन विषय है। सभी लोग अपने स्वार्थवश एक दूसरे से संपर्क करते हैं और इसी कारण किसी से हार्दिक प्रेम हो नहीं पाता है। फिर मनुष्य को उसके मन से पहचाना जाता है और वह उस अपने स्वार्थो के बंधन में रख देता है इसलिये किसी को किसी का मिलना सुहाता नहीं है।

हम लोगों को लगता है कि हमारी नीयत और कुविचारों को कोई नहीं जानता है-यह वास्तव में भ्रम है। कोई अपनी नीयत खराब रखकर हमसे कोई अच्छी बात कहता है तो हम उसकी कुटिलता को समझ जाते हैं। उसी तरह अगर हम ऐसा करते हैं तो दूसरा व्यक्ति भी समझ जाता है। असल में हमारे विचारो कहीं न कहीं हमारे चेहरे और वाणी से भी बाहर संप्रेक्षण होता है जिसकी अनुभूति हमारी आंतरिक इंद्रियां कर लेतीं हैं इसलिये ही किसी का भी सच किसी से छिप नहीं पाता। यही कारण है कि ऐसे लोग नहीं मिल पाते जिनको देखते ही मन प्रफुल्लित हो उठता है। अगर हम चाहते हैं कि हम दूसरों को प्रसन्न करें तो उसके लिये पहले अपनी नीयत और विचारों में शुद्धता लायें।

Saturday, April 12, 2008

संत कबीर वाणी:पशुओं को काटने वाले राम को नहीं जानते

काटा कूटी जो करै, ते पाखंड को भेष
निश्चय राम न जानहीं, कहैं कबीर संदेस


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो पशु को मारकर उसकी देह काटा करते हैं वह सब पाखंडी हैं और भगवान श्री राम को नहीं जानते-यही मेरा संदेश है।

बकरी पाती खात है, ताकी काढ़ी खाल
जो बकरी को खात है, तिनका कौन हवाल


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो बकरी केवल घासी खाती है उसकी खाल खींच ली जाती है तो उन मनुष्यों का क्या हाल होता होगा जो बकरी का मांस खाते हैं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आजकल समाज में मांस खाने का प्रचलन बढ़ रहा है और अंग्रेजी के आकर्षक नाम रखकर उसके खाद्य पदार्थ बनाये जाते हैं। सच तो यह है कि मांस भक्षण करने के लिये मनुष्य की देह उपयुक्त नहीं है और वर्तमान समय में हम देखें तो अनेक रोग इसी कारण फेल रहे हैं क्योंकि लोग गरिष्ठ भोजन कर रहे है।
मांस खाने से शरीर में मांस बढ़ता है और इससे हमारी नसों में रक्त प्रवाह बाधित होता हैं। एक बात यह याद रखने योग्य है कि हम वैसा ही सोचते और बोलते है जैसे तत्व हमारे रक्त में हेाते हैं। इतना ही नहीं हमारी देह से वैसे ही गंध भी निकलती है जिसके अनुरूप दूसरे लोगों पर हमारा अच्छा प्रभाव पढ़ता है। यह बहुत सूक्ष्म ज्ञान है पर इसकी तरफ लोगों का ध्यान नहीं जाता।

अतः हमें अपना खान-पान में अधिक से अधिक सात्विकता रखनी चाहिए ताकि हमारे तन, मन और विचारों में पवित्रता रहे और लोगों पर उसका अच्छा प्रभाव पड़े।

Thursday, April 10, 2008

रहीम का दोहे:प्रेम में सीधी चाल चलें

फरजी सह न ह्म सकै गति टेढ़ी तासीर
रहिमन सीधे चालसौं, प्यादा होत वजीर

कविवर रहीम कहते हैं कि प्रेम में कभी भी टेढ़ी चाल नहीं चली जाती। जिस तरह शतरंज के खेल में पैदल सीधी चलकर वजीर बन जाता है वैसे ही अगर किसी व्यक्ति से सीधा और सरल व्यवहार किया जाये तो उसका दिल जीता जा सकता है।

प्रेम पंथ ऐसी कठिन, सब कोउ निबहत नाहिं
रहिमन मैन-तुरगि बढि, चलियो पावक माहिं


कविवर रहीम कहते हैं कि प्रेम का मार्ग ऐसा दुर्गम हे कि सब लोग इस पर नहीं चल सकते। इसमें वासना के घोड़े पर सवाल होकर आग के बीच से गुजरना होता है।

आज के संदर्भ में व्याख्या-आजकल जिस तरह सब जगह प्रेम का गुणगान होता है वह केवल बाजार की ही देन है जो युवक-युवतियों को आकर्षित करने तक ही केंद्रित है। उसे प्रेम में केवल वासना है और कुछ नहीं है। सच्चा प्रेम किसी से कुछ मांगता नहीं है बल्कि उसमें त्याग किया जाता है। सच्चे प्रेम पर चलना हर किसी के बस की बात नहीं है। प्रेम में कुछ पाने का आकर्षण होतो वह प्रेम कहां रह जाता है। सच तो यह है कि लोग प्रेम का दिखावा करते हैं पर उनके मन में लालच और लोभ भरा रहता है। लोग दूसरे का प्यार पाने के लिये चालाकियां करते हैं जो कि एक धोखा होता है।

Tuesday, April 8, 2008

संत कबीर वाणी:संसार में रमे तो राम का नाम भूल गए

राम नाम जाना नहीं, पाला सकल कुटुम्ब
धन्धाही में पचि मरा, बार भई नहिं बुम्ब


संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि इस संसार में माया-मोह में रमकर अपने परिवार का भरण-भोषण किया पर राम का नाम नही ले पाये। सारा समय अपने व्यवसाय में बीत गया और न उससे सत्संग मिला न प्रतिष्ठा।

दुनिया के धोखे मुआ, चला कुटुंब की कानि
तब कुल की क्या लाज है, जब ले धरा मसानि


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यह संसार तो एक तरह से धोखा है। इसमें आदमी जीवन भर अपने कुटुंब के बंधन में जकड़ा रह कर उसकी प्रतिष्ठा का यत्न करता है। यह नहीं सोचता कि तब इस कुटुंब के लोग ही उस श्मशान में पहुंचा देंगे तब कुल की क्या इज्जत होगी।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-हर कोई अपने कुल की वृद्धि चाहता है। समस्या यही नहीं है। कुछ लोग जिन को अपने समाज का मार्गदर्शन करने का दायित्व है वह भी लोगों को अपने समाज की वृद्धि के लिये प्रेरित करते है। हर आदमी अपने परिवार, जाति, भाषा और धर्म के लोगों की वृद्धि चाहता है। उससे लगता है कि उसकी भी इससे प्रतिष्ठा बढ़ती है। यह सब देह में बैठी आत्मा है जिसकी वजह से सब जगह सम्मान है। जब वह इसमें से निकल जायेगी तब अपने ही लोग श्मशान में पहुंचा देते है तब उनको यह परवाह नही रहती है कि यह हमारा आदमी था।
इसलिये अपने भ्रम को भूलकर भगवान का नाम लेना चाहिए ताकि
हमें प्रेरणा और भक्ति मिलती रहे। इस वंश,जात और धर्म की वृद्धि के चक्कर में तो सारा जीवन संताप मेंे गुजर जाता है। अतः भगवान का नाम लेकर ही हम उससे उबर सकते है।

Saturday, April 5, 2008

रहीम के दोहे:अपनी पीडा दूसरों को सुनाकर उपहास का पत्र बने

रहिमन निज मन की बिधा, मन ही राखो गोय
सुनि अठिलैहैं लोग सब, बांटि न लैहैं कोय


कविवर रहीम कहते है अपने मन के दुःख दर्द किसी से मत करो। लोग उसे सुनकर उपहास करेंगे। कोई भी उसे बांटने वाला नहीं मिलेगा।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-जीवन में दुख दर्द तो सभी को होता है पर जो उसे दूसरों को सुनाकर उसे हल्का करने का प्रयास करते हैं उन्हें समाज में उपहास का पात्र बनना पड़ता है। अब तो वैसे भी लोगों की पीड़ाएं इतनी हो गयीं हैं कि कोई किसी की पीड़ा क्या सुनेगा? सब अपनी कह रहे हैं पर कोई किसी की सुनता नहीं है। अमीर हो या गरीब सब अपने तनाव से जूझ रहे हैं। ऐसे में बस सबके पास हंसने का बस एक ही रास्ता है वह यह कि दूसरा अपनी पीड़ा कहे तो दिल को संतोष हो कि कोई अन्य व्यक्ति भी दुखी है। उसकी पीड़ा का मजाक उड़ाओ ‘‘देख हम भी झेल रहे हैं पर भला किसी से कह रहे हैं‘।

कई चालाक लोग अपने दुख को कहते नहीं है पर अपनी पीड़ा को हल्का करने के लिये दूसरों की पीड़ा को सबके सामने सुनाकर उसे निशाना बनाते हैं। ऐसे लोगों को अपनी थोड़ी पीड़ा बताना भी मूर्खता है। वह सार्वजनिक रूप से उसकी चर्चा कर उपहास बनाते है। ऐसे में अपना दर्द कम होने की बजाय बढ़ और जाता है। अपने दुःख दर्द जब हमें खुद ही झेलने हैं तब दूसरों को वह बताकर क्या मिलने वाला है? जब हमारे दर्द को कोई इलाज करने वाला नहीं है उसकी दवा हमें ढूंढनी है तो फिर क्योंकर उसे सार्वजनिक चर्चा का विषय बनाएं। उसका हल हो न हो पर लोग पूछते फिरेंगे-‘‘क्या हुआ उसका?’’

हम अपनी उस पीड़ा को भूल गये हों पर लोग उसे याद कर बढ़ा देते हैं। ऐसे में कुछ अन्य विषय पर सोच रहे हों तो उससे ध्यान हटकर अपनी उसी समस्या की तरफ चला जाता है। बेहतर है अपने दर्द अपने मन में रखें।

Friday, April 4, 2008

रहीम के दोहे:राम-राम करने वाले सभी मित्र नहीं हो जाते

सब को सब कोऊ करै, कै सलाम कै राम
हित रहीम तब जानिए, जब कछु अटकैं काम


कविवर रहीम कहते है कि कभी लोग एक दूसरे को सलाम और राम-राम तो करते हैं पर मित्र वही जब काम पड़ने पर अपना कर्तव्य निभाता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अब पहले की तरह लोगों के काम के दायरे सीमित नहीं रहे। वर्तमान शिक्षा पद्धति से सब जगह नौकरी करने वालों की संख्या बढ़ रही है। अक्सर लोग जहां नौकरी करते हैं वहां अनेक लोग उनके साथ काम करने वाले साथी जुड़ने लगते हैं। प्रतिदिन आपस में हाथ मिलाते और सब एक दूसरे को अपना दोस्त कहने लगते हैं पर उनके यह संबंध कार्यस्थल तक ही सीमित रहते हैं और किसी पर्र अगर घरेलू परेशानी आतीं है तो वह उसके किसी काम के नहीं होते। बीमारी वगैरह की खबर आने पर कभी यह नहीं सोचते कि उसके घर जाकर हालचाल जाने। कहीं उसे किसी डाक्टर के यहां जाने या दवा लाने के लिये सहयोग की जरूरत तो नहीं है।

ऐसे ही किसी के घर में शादी या गमी का अवसर हो तो सहकर्मी से कोई न तो मदद के लिये कहता है न ही वह कोई प्रस्ताव करते हैं। आजकल ऐसे बहुत सारे औपचारिक संबंध बन जाते हैं जिनमें हम आत्मीयता ढूंढते हैं पर निराशा हाथ लगती है। ऐसे में यह भी सोचना चाहिए कि हर एक सहकर्मी के रूप में हम किसी के साथ मित्रता निभाते है।

इस निराशाजनक स्थिति के बचने के लिये लोगों को अपने काम करने के स्थान पर भी अपने साथियों के साथ व्यक्तिगत संबंध बनाने चाहिए और न केवल समय-असमय उनके काम आने के लिये तैयार होना चाहिए बल्कि उनसे भी काम पड़ने पर सहयोग का आग्रह करना चाहिए।

Thursday, April 3, 2008

रहीम के दोहे:किसी के कहने से बडे लोग छोटे नहीं हो जाते

जो बड़ेन को लघु कहें, नहिं रहीम घटि जाहिं
गिरधर मुरलीधर कहे, कछु दुख मानत नाहिं

कविवर रहीम कहते हैं कि बड़े लोगों को कोई छोटा कहता है तो वह छोटे नहीं हो जाते। भगवान श्री कृष्ण जिन्होंने गिरधर पर्वत उठाया उनको कुछ लोग मुरलीधर भी कहते हैं पर इससे उनकी मर्यादा कम नहीं हो जाती।

जो मरजाद चली सदा, सोई तो ठहराय
जो जल उमगै पारतें, कहे रहीम बहि जाय

कविवर रहीम कहते हैं कि जो सदा से मर्यादा चली आती है, वही स्थिर रहती है। जो पानी नदी के तट को पार करके जाता है वह बेकार हो जाता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-कई लोगों को तब बहुत पीड़ा होती है जब कोई उनको छोटा या महत्वहीन बताता है। सच बात तो यह है कि आजकल हर कोई एक-दूसरे को छोटा बताकर अपना महत्व साबित करना चाहता है। ऐसे में कोई व्यक्ति अगर हमको छोटा कहता है या आलोचना करता है तो उसे सहज भाव से ग्रहण करना चाहिए। अपने मन में यह सोचना चाहिए कि जो हम और हमारा कार्य है वह अपने आप हमारा महत्व साबित कर देगा। भौतिक साधनों की उपलब्धता आदमी को बड़ा नही बनाती और उनका अभाव छोटा नहीं बनाती। आजकल के युग में जिसके पास भौतिक साधनों का भंडार है लोग उसे बड़ा कहते है और जिसके पास नहीं है उसे छोटा कहते है। जबकि वास्तविकता यह है कि जो अपने चरित्र में दृढ़ रहते हुए मर्यादित जीवन व्यतीत करता है वही व्यक्ति बड़ा है। इसलिये अगर हम इस कसौटी पर अपने को खरा अनुभव करते हैं तो फिर लोगों की आलोचना को अनसुना कर देना चाहिए।

Wednesday, April 2, 2008

संत कबीर वाणी:प्रेम तो होता है स्वार्थ का

प्रीत रीत सब अर्थ की, परमारथ की नाहिं
कहैं कबीर परमारथी, बिरला कोई कलि माहिं


संत शिरोमणि कबीरदासजी कहते हैं कि प्रेम की बात तो केवल स्वार्थ से युक्त होती है उसमें कोई परमार्थ नहीं करता। इस युग में परमार्थी तो कोई विरला ही होता है।

आज के संदर्भ में व्याख्या-आजकल आप चाहे जो भी टीवी चैनल या रेडियो खोल लें उसमें प्रेम-प्रेम एक नारे के रूप में सुनाई देगा। इसी तरह फिल्मी गानों में तो कोई ऐसा नहीं होता जिसमें प्रेम शब्द न हो। यह प्रेम केवल दैहिक है और स्वार्थ पर आधारित है। हिंदी में प्रेम के बहुत व्यापक अर्थ हैं पर इसे अब इसे केवल स्त्री-पुरुष तक ही सीमित कर दिया गया है। कई बार तो हंसी आती है। कोई लड़का-लड़की घर से भाग जाते हैं और उनके परिवार वाले उसका विरोध करते हैं और प्रचार माध्यम कथित पवित्र प्रेम के समर्थन में नारे लगाने लगते हैं। अब बताईये क्या उनका प्रेम कामना से रहित हो सकता है? कतई नहीं! कुछ उर्दू शायरों ने अपने शायरियों में प्यार को स्त्री-पुरुष के प्यार के इर्द-गिर्द ही केद्रित रखा और हिंदी फिल्मी गीत लेखकों ने भी वही शैली अपनाई। एक तरह से जो प्रेम भारतीय अध्यात्म में व्यापक आधार वाला है वही विदेशी विचारधाराओं में संकीर्ण अर्थ वाला है। केवल यह एक शब्द नहीं बल्कि कई ऐसे शब्द हैं जो हमारी भाषा में व्यापक आधार वाले हैं पर पाश्चात्य सभ्यता मे उसे छोटे रूप में ही लिया जाता है। जैसे धर्म-पश्चिम में व्यक्ति का धर्म उसके इष्ट के आधार पर तय किया जाता है जबकि हमारे भारत में उसका निर्धारण उस व्यक्ति के कार्यों के आधार होता है।

आशय यह है कि प्रेम वह है जो निष्काम है जिसमें प्रेम करने वाला अपने किसी स्वार्थ की पूर्ति नहीं करता और न ही कोई आकांक्षा करता है। जहां कामना है वहां काम है और उसकी पूर्ति होते ही वह भाव नष्ट हो जाता है जबकि प्रेम कभी भी नष्ट नहीं होता।

Monday, March 31, 2008

संत कबीर वाणी:शराब और तमाखू का सेवन करने वालों से दूरी भली

सुरापान अचवन करैं, पिवै तमाखू भंग
कहैं कबीरा राम जन, ताको करो न संग


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते है कि जो लोग शराब और तंबाकु का सेवन करते हैं उनकी तो कभी संगत नहीं करना चाहिए।

राखें बरत एकादसी, करै अन्न को त्याग
भांग तमाखू न तजै, कहैं कबीर अभाग


संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि जो लोग एकादशी पर व्रत में अन्न का त्याग कर देते हैं पर तमाखू का त्याग नहीं कर पाते वह अभागे हैं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आजकल लोगों में शराब और तमाखू का सेवन बहुत बढ़ गया है। खासतौर से तमाखू का सेवन तो इतना हो गया है कि कई लोग बाजार से पाउच खरीद कर खा लेते और उससे होने वाली बीमारियों को शिकार होते जा रहे हैं। पहले सादा तमाखू का सेवन लोग इतना नहीं करते थे जितना आजकल सजीसजाई पन्नी में बिकते देख करने लगे हैं। इससे लोग शारीरिक और मनोरोग का शिकार हो रहे हैं। कई लड़कों को यह आदत तो केवल इसलिये लग जाती है क्योंकि वह अपने दोस्तों को देखकर स्वयं भी उसे लेने लगते हैं।

पहले सादा तमाखू का उपयोग भी अच्छा नहीं माना जाता था पर जबकि वह आज बिकने वाली तंबाकू से कम हानिकारक थी। आजकल उसमें तमाम रसायन डाले जाते हैं जो और अधिक हानिप्रद होते है। जिस तरह समाज में दुव्र्यसनों को परंपरा के तौर पर अपनाया गया उससे समाज का वातावरण भी विषाक्त हो गया है। उसे देखते हुए तो लगता है कि जो शराब और तमाखू को सेवन करते हैं उनसे दूर ही रहना चाहिए और अपने बच्चों को ऐसे लोगों की संगत नहीं करने देना चाहिए। व्यसन चाहे जो भी हो मनुष्य को शारीरिक और मानसिक हानि पहुंचाता है और जिसके दुष्परिणाम परिवार और समाज को बाद में भोगने पड़ते हैं।

Sunday, March 30, 2008

संत कबीर वाणी:पंडित और मशालची को कुछ नहीं सूझता

पण्डित और मसालची, दोनों सूझत नांहि
औरन को करै चांदना, आप अंधेरे मांहि


संत शिरोमणि कबीरदासजी कहते हैं कि पोथी पढ़कर अपने आपको पंडित कहलाने वाले और मशाल लेकर दूसरे को मार्ग बतलाने वाले दोनों ही अज्ञान और अंधेरे में रहते हैं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या- आपने देखा होगा कि अनेक लोग धार्मिक पुस्तकें पढ़ते हैं और अवसर मिलने पर लोगों के बीच अपना ज्ञान बघारते हैं। ऐसे लोगों का व्यवहार और कार्य देखें तो यह लगेगा कि उनका ज्ञान केवल गले तक ही सीमित है और उन्होंने उसे अपने मस्तिष्क में धारण नहीं किया है। कुछ मामलों में तो आम सांसरिक व्यक्ति से भी अधिक लोभी, लालची, कामी, और क्रोधी होते है।

आज के समय तो धार्मिक प्रवचन करना एक व्यवसाय होता है। प्रवचनकर्ता अपने कार्यक्रमों के लिये भारी फीस वसूल करते हैं और अपने यजमानों की प्रशंसा में अपने भक्तों के सामने ही तमाम वाक्य व्यक्त करते हैं। कार्यक्रमों की समाप्ति के बाद अपने सामान्य भक्तों से वह ऐसे ही दूर हो जाते हैं जैसे कि कोई वी.आई.पी. हो। इतना ही नहीं कुछ घटनाएं ऐसीं भीं हुंईं हैं कि कम पैसा मिलने पर वह ऐसे तथाकथित ज्ञानी कार्यक्रम बीच में ही छोडकर चले जाते है। वह लोग अपने को कभी भगवान का सामान्य भक्त तक नहीं कहते क्योंकि उनमें अपने ज्ञान का इतना अहंकार होता है कि ऐसा कहने में अपने को छोटा अनुभव करते है। कुल मिलाकर वह दूसरों को उपदेश करते हैं पर खुद अज्ञान के अंधेरे में रहते है।

ऐसे लोगों के कार्यक्रम में जाकर उनके प्रवचन कार्यक्रम में अपना समय पास करने या ज्ञान के वचन सुनने में कोई बुराई नहीं है पर उनके आकर्षण में आकर उन्हें अपना गुरू बनाना कभी लाभदायक नहीं हो सकता।

Saturday, March 29, 2008

संत कबीर वाणी:दिखावे की भक्ति से कोई लाभ नहीं

बाहर क्या दिखलाइए, अंतर जपिये राम
कहा महोला खल्क सौं, परिहों धनी सौं काम


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अनेक तरह का प्रदर्शन कर लोग क्या दिखलाना चाहते हैं? इस तरह के दिखावे से कोई लाभ नही होता। हमारा संबंध तो परमात्मा से है और उसको ह्रदय से एकांत में स्मरण करने से ही हमें लाभ होता है।

आज के संदर्भ में व्याख्या- हमारे देश में दिखावे की भक्ति करने वाले भी बहुत लोग रहे है। कई लोग तो ऐसे हैं जो ऊंची आवाज में प्रार्थना और आरती गाते हैं ताकि लोग यह समझें कि वह भगवान के भक्त हैं और उनका सम्मान करें। हालांकि कुछ लोगों को इसका सांसरिक लाभ होता है और वह अपनी इस छवि का फायदा उठाकर अपने कई काम निकाल लेते हैं पर उनके मानसिक और शारीरिक संताप कभी कम नहीं होते। वे लोग अवसर आने पर छल, कपट और बेईमानी से भी नहीं चूकते।

जो लोग वास्तव में भक्त हैं वह एकांत साधना करते है और इसका अपने मुख से प्रचार नहीं करते। ऐसे लोगों के चेहरे पर भगवान की निष्काम भक्ति के कारण तेज टपकता हैं। उनके व्यवहार में सदाचार, सहजता और ज्ञान का आभास उनके संपर्क में आने वाले हर व्यक्ति को स्वाभावकि रूप से होता है। ऐसे लोग जीवन में सुख की अनुभूति करते हैं और परमात्मा की उन पर कृपा होती है।

बाहर भक्ति दिखाने की बजाय एकांत में ही करना चाहिये।

Friday, March 28, 2008

रहीम के दोहे:चन्द्रमा की तरह शीतलता देने वाला राज्य ही सराहनीय

रहिमन राज सराहिए ससिसम सुखद जो होय
कहा वापुरी भानु है, तपैं तरैवन खोय

कविवर रहीम कहते है की उसी राज्य की प्रशंसा करना चाहिऐ जो चन्द्रमा के समान शीतल सुखदाई है। उस सूरज की क्या कहैं जो तपने पर शीतलता को नष्ट कर देता है।

आज के संदर्भ में व्याख्या-आजकल देश में लोकतंत्र है। अब राजा तो नहीं है पर राजकाज चलाने के लिए लोग तो हैं। ऐसे में जिनके पास राजकाज है उनका आंकलन उनके कार्यों के आधार पर ही हो सकता है। जिनके कार्यों से लोग खुश हैं उनकी तो सराहना की जानी चाहिऐ पर जो अपने पद पर बैठकर अपना दायित्व भूलकर केवल उसके लाभ उठाना चाहते हैं पर अपने प्रयासों से आज आदमी को लाभ नहीं दिला सकते उनकी प्रशंसा कोई नहीं करता। सामने भले कोई कुछ नहीं कहता पर पीठ पीछे उनकी हर कोई निंदा करता है। यहाँ अब कोई एक राजा नहीं है बल्कि राजकाज चलाने वाले लोगों की ऊपर से लेकर नीचे तक एक पंक्ति है और उसमें सबके अपने पदनाम और दायित्व हैं।
राजकाज से जुडे लोग अपने अधिकारों की बात तो खूब करते हैं पर अपने दायित्वों का बोध उनको नहीं होता और न ही इस बात की परवाह है की उनकी लोगों में क्या छवि है। कई अपनी शक्ति दिखाते हैं। अपने से छोटे को दबाकर या उसकी उपेक्षा कर यह दिखाते हैं कि उनके पास क्या ताकत है? अपनी ताकत आम आदमी के प्रयोग में करने के काम को हेयसमझते हैं। राजकाज से संबधित कार्य करने वाले कुछ लोग फिर भी ऐसे होते हैं जो लोगों में लोकप्रिय होते हैं क्योंकि वह अपने दायित्व पूरे करते हैं। उनके बारे में लोग कहते हैं कि 'अमुक अधिकारी अच्छा है", ''अमुक अधिकारी और कर्मचारी का व्यवहार अच्छा है"। मैं बडे पदों के नाम इसलिए नहीं ले रहा क्योंकि आम आदमी के रूप में हमारा काम तो निचले पद वाले लोगों से ही पड़ता है। गाँवों में तो राजकाज के नाम पर वही लोग देखे और पहचाने जाते हैं।
इसलिए जनता से सीधे जुडे राजकाजी लोगों को अपना व्यवहार अच्छा रखना चाहिऐ और नहीं रखते हैं तो उन्हें भी यह समझना चाहिऐ कि वह किसी काम के नहीं है। लोग उनको पीठ पीछे कटुवचन कहते हुए उनकी निंदा करते हैं।

Thursday, March 27, 2008

रहीम के दोहे:प्रेम में कुछ न दे वह पशु समान

नाद रीझि तन देत मृग, नर धन हेत समेत

ते रहीम पशु से अधिक, रीझेहु कछु न देत

कविवर रहीम कहते हैं कि बंसी की धुन पर रीझकर हिरन शिकार हो जाता है उसी तरह मनुष्य भी प्रेम के वशीभूत होकर अपना तन, मन और धन न्योछावर कर देता है लेकिन वह लोग पशु से भी बदतर हैं जो किसी से खुशी तो पाते हैं पर उसे देते कुछ नहीं है।

आज के संदर्भ में व्याख्या-वैसे देखा जाये तो आज के युग भी यह सत्य है कि अधिकतर लोग मुफ्त में मजे करना चाहते हैं। किसी से बिना लिए-दिए काम करने में चतुराई समझी जाती है। कई सरल ह्रदय लोग प्रेमवश दूसरों का काम कर देते हैं तो उनको मूर्ख समझा जाता है। हालांकि चतुर लोग भी प्रेम में ही मूर्ख बनते हैं। आजकल आपने देखा होगा कि तमाम तरह के विज्ञापन आते हैं जिनमें बडे प्रेम से विनिवेश और अन्य लाभों के बारे में बताया जाता है और लोग उसके शिकार हो जाते हैं। अनेक पढी-लिखी लडकियां प्रेम में अपना सर्वस्व लुटा बैठतीं है और बाद में उनके पास पछताने का भी अवसर नहीं होता। हालात यह है कि अपने से बहुत अधिक आयु और अकमाऊ व्यक्ति के साथ घर से भाग कर विवाह कर अपना जीवन तबाह कर बैठतीं हैं।

कुछ लड़के भी ऐसे हैं जो सुन्दर और शिक्षित लडकी से प्रेम का ढोंग करते हैं पर विवाह के समय अपने परिवार वालों का वास्ता देकर नाता तोड़ लेते हैं। इतना ही नहीं कई माता-पिता भी लड़की के सुयोग्य होते हुए भी बिना दहेज़ के विवाह करने से इनकार कर देते हैं। कहते हैं कि हर माता-पिता अपने बच्चे से प्रेम करते हैं पर कई ऐसे लड़के हैं जो विवाह की आयु पार कर चुके हैं पर उनका दिल नहीं पसीजता कि उसका विवाह कम दहेज़ में कर दें। कुल मिलाकर प्रेम एक दिखावा हो गया है और कहा जाये तो अब मानव भेष में पशु होने लगे हैं। अत: समझदार लोगोंको चाहिए कि अगर कोई उनको प्रसन्न करता है तो उसे भी कुछ दें तभी वह अपने इंसान होने की अनुभूति कर सकते हैं और यही ईश्वर भक्ति कीतरह भी है।

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