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Sunday, July 27, 2008

संत कबीर वाणी:सच्चे भक्त हो तो निंदा करना त्याग दो

माखी गहै कुबास को, फूल बास नहिं लेय
मधुमाखी है साधुजन, गुनहि बास चित देय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहत हैं कि मक्खी हमेशा दुर्गंध ग्रहण करती है कि न फूलों की सुगंध, परंतु मधुमक्खी साधुजनों की तरह है जो कि सद्गण रूपी सुगंध का ही अपने चित्त मेंे स्थान देती है।

तिनका कबहूं न निंदिये, पांव तले जो होय
कबहुं उडि़ आंखों पड़ै, पीर धनेरी होय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कभी पांव के नीच आने वाले तिनके की भी उपेक्षा नहीं करना चाहिए पता नहीं कब हवा के सहारे उड़कर आंखों में घुसकर पीड़ा देने लगे।

जो तूं सेवा गुरुन का, निंदा की तज बान
निंदक नेरे आय जब कर आदर सनमान


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अगर सद्गुरु के सच्चे भक्त हो तो निंदा को त्याग दो और कोई अपना निंदा करता है तो निकट आने पर उसका भी सम्मान करो

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग ‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। मेरे अन्य ब्लाग
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Saturday, May 17, 2008

भृतहरि शतक:स्त्री को अबला मानने वाले कवि विपरीत बुद्धि के

नूनं हि ते कविवरा विपरीत वाचो
ये नित्यमाहुरबला इति कामिनीनाम् ।
याभिर्विलालतर तारकदृष्टिपातैः
शक्रायिऽपि विजितास्त्वबलाः कथं ताः


इस श्लोक का आशय यह है कि जो कवि सुंदर स्त्री को अबला मानते हैं उनको तो विपरीत बुद्धि का माना जाना चाहिए। जिन स्त्रियों ने अपने तीक्ष्ण दृष्टि से देवताओं तक को परास्त कर दिया उनको अबला कैसे माना जा सकता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अधिकतर कवि और रचयिता स्त्री को अबला मानते हैं पर भर्तुहरि महाराज ने उसके विपरीत उन्हें सबला माना है। सुंदर स्त्री से आशय समूची स्त्री जाति से ही माना जाना चाहिए, क्योंकि स्त्री का सौंदर्य उसके हृदय में स्थित लज्जा और ममता भाव में है जो कमोवेश हर स्त्री में होती है। माता चाहे किसी भी रंग या नस्ल की हो बच्चे पर अपनी ममता लुटा देती है। बच्चा भी अपनी मां को बड़े प्रेम से निहारता है। पूरे विश्व मेंे अनेक कवि और लेखक नारी को अबला मानकर उस पर अपनी विषय सामग्री प्रस्तुत करते हैं। वास्तव में बहुत अज्ञानी होते हैं। उन्हें अपनी रचना के समय यह आभास नहीं होता कि हर स्त्री का किसी न किसी पुरुष-जिसमें पिता, भाई, पति और रिश्ते-से संबंध होता है। वह सबके साथ निभाते हुए उनसे संरक्षण पाती है। जो लोग स्त्री को अबला मानकर अपनी रचना लिखते हैं वह वास्तव में अपने आसपास स्थित नारियों से अपने संबंधों पर दृष्टिपात किये बिना ही केवल नाम पाने के लिये लिखते हैं और इसी कारण आजकल पूरे विश्व में नारी को लेकर असत्य साहित्य की भरमार है। अनेक कहानियां और कवितायें नारियों को अबला और शोषित मानकर कर लिखीं जातीं हैं और उनमें सच कम कल्पना अधिक होती है। ऐसे लोग विपरीत बुद्धि के महत्वांकाक्षी लेखक लोगों की बुद्धि तरस योग्य है।

Sunday, February 10, 2008

अपने ब्लोग पर नियमित रूप से लिखें-आलेख

आज सामने टीवी पर भारत और आस्ट्रेलिया के बीच क्रिकेट मैच चल रहा है और मैं ब्लोग पर कुछ लिखना चाहता हूँ। दिमाग क्योंकि मैच में लगा इसलिए कोई नया विषय सूझ नहीं रहा है. ऐसे में क्या लिखना जरूरी है? कोई भी कहेगा कि'यार फिर मैच अच्छा लग रहा है तो वही देखो काहे बोर कर रहे हो?''यह सही है कि मैं कोई व्यवासायिक ब्लोग लेखक नहीं हूँ पर ब्लोग बनाने से पहले जब में अंतर्जाल पर पत्रिकाओं में लिख रहा था तब मुझे इसके बारे में जानकारी होने के बावजूद ब्लोग नहीं बनाया पर इसमें मेरी दिलचस्पी थी. इस बारे में शहर के एक वाचनालय में एक पत्रिका में पढा था। उस समय इस विषय में मैंने एक आलेख पढा जो इन ब्लोग के बारे में था। उस समय मेरा ब्लोग बनाने का कोई विचार नहीं था फिर भी मैंने उसे पढा।
उस लेख में यह लिखा था कि अगर ब्लोग बनाते हैं तो अपने ब्लोग पर नियमित रूप से लिखना चाहिए। अगर आप हर दिन लिखते हैं तो फिर वैसा ही लिखिए। इसी तरह साप्ताहिक, पाक्षिक, या मासिक जो भी आपने अवधि तय की है उस पर जरूर लिखिए। नहीं तो जो पाठक आपको पढ़ रहे हैं वह विश्वास नहीं करेंगे-क्योंकि कई लोग आपके ब्लोग को अपना आईकोन बनाकर भी रख सकते हैं। जब उन्हें उसे पर नियमित रूप से कुछ पढ़ने को नहीं मिलेगा तो वह निराश हो जायेंगे। दूसरी बात उसमें यह लिखी थी कि आप यह मत सोचिये कि क्या लिखूं और कितना लिखूं? आप तो लिखिए और अच्छे बुरे का निर्णय पाठको को करने दीजिये। लिखे का क्या? किसी को आपका वह लिखा भी पसंद आ सकता है जो आपको खुद पसंद नहीं आया हो और जो आपको अपना लिखा पसंद है वह किसी को न भी पसंद हो सकता है। अगर आप अच्छे भाव से लिखेंगे तो आपका लिखा अपने आप अच्छा होगा-आप अपने मन में कोई संशय न रखें।
दूसरे वाले नियम का तो अपने लेखन-जीवन में पालन करता हुआ आया हूँ। अपना लिखा भेजने और छपने के बाद मैं उसका पीछा नहीं करता और समय मिलते ही अगली रचना में जुट जाता हूँ। पहले वाले नियम का पालन करने के बारे में अब यह विचार है कि अपने सभी ब्लोगों के दिन तय कर दूं ताकि लोग रोज खोलकर निराश न हों। इस ब्लोग जगत में तकनीकी जानकारी होना बहुत महत्वपूर्ण है और खास तौर से अपने ब्लोगर साथियों के साथ आम पाठको की रुचियाँ और उनके ब्लोग पर आने के रास्तों की जानकारी होना बहुत महत्वपूर्ण है। जब तक ब्लागस्पाट के ब्लोगों पर मैंने काऊंटर नहीं लगाया था तब तक वहाँ के पाठकों के बारे में अधिक जानकारी नहीं होती थी, पर जब से वह लगाया है तो आम पाठकों के बारे में बहुत कुछ पता लगता है। साथ ही यह भी पता लगता है कि हमारा लिखा किन-किन रूपों में कहाँ-कहाँ पहुँचता है।
बहुत ब्लोग होने के कारण मैंने कुछ ब्लोगों पर नियमित नहीं लिखा और पता लगा कि मेरा यह ब्लोग शब्दलेख सारथी अपने आप में सबसे अधिक लोकप्रिय ब्लोग है और उसके बाद अनंत शब्दयोग का नंबर आता है। यह आश्चर्य की बात हैं कि मैंने जब अपनी दृष्टि से कुछ अच्छा और गंभीर समझा उसे इन दो ब्लोग पर ही रखा-हालांकि इसके लिए कोई मैंने रणनीति नहीं बनायी पर यह आदत हो गई । शब्द लेख सारथी तो पहले छद्म नाम से था पर बाद में उसे अपने असली नाम से किया। इस ब्लोग पर मैंने नियमित रूप से महापुरुषों के संदेशों पर अधिक लिखा और इसलिए शायद इसे पाठक मिले। इस ब्लोग से मुझे यही सन्देश मिलता है कि आप लाख अच्छा लिखने की करो पर भारतीय अध्यात्म के प्रति लोगों का आकर्षण आज भी है और वह इससे अधिक प्रभावित है चाणक्य, कबीर, रहीम, मनु, कौटिल्य जैसे महापुरुषों के सन्देश जो मानव हित में हैं आज भी लोगों के हृदय में स्थान रखते हैं। इस ब्लोग पर मेरी स्वरचित रचनाएं न के बराबर हैं और मुझे इस पर खुशी होती हैं कि लोग इन महापुरुषों को पढ़ना चाहते हैं। इन पर रचनाएं में ज्ञान बघारने के लिए बल्कि स्वाध्याय के लिए लिखता हूँ ताकि खुद भी कुछ सीख सकूं।
पिछले कुछ दिनों से ब्लोग स्पॉट के ब्लोग पर लिप्यान्तरण काम नहीं कर रहा तो मैंने इस पर लिखना बंद कर वर्डप्रेस पर एक नये ब्लोग पर लिखना शुरू कर दिया था पर आज इस पर पाठक देखकर मैंने सोचा कि उनको भी वास्तविकता बता दूं और साथी ब्लोगरों के साथ भी यह अनुभव बाँटू कि अवधि चाहे कोई भी हो पर अपने ब्लोग पर नियमित रूप से लिखें। ब्लोगिंग के दौरान मुझे कई और भी अनुभव हुए हैं जिन पर में लिख कर आपको बताऊंगा।

Wednesday, May 16, 2007

धर्म के नाम पर फिर बवाल मचने का प्रयास

NARAD:Hindi Blog Aggregator
पता नहीं धर्म को लेकर मेरे दिमाग में संशय है या मेरा ज्ञान ही अल्प है। मैं आज तक धर्म और अध्यात्म में भेद नहीं समझ पाया-और कभी कोशिश भी की तो उलझकर रह जाता हूँ । अगर हम अपने मन और मस्तिष्क को स्थिर कर जीवन को भरपूर ढंग से जीना चाहते हैं तो मेरे विचार से हमारे लिए अध्यात्म का ज्ञान ही पर्याप्त है जबकि हम अपने स्थित मन के अहंकार के अवगुण के कारण अपने आपको अन्य लोगों से श्रेष्ठ साबित करना चाहते है तो धर्म की नाम पर तमाम कर्मकांड अपनाकर ऐसा प्रयास करते है।
भारत को विश्व का आध्यात्म गुरू कहा जाता है पर लोग अपने धार्मिक कर्मकांड को ही आध्यात्म समझ लेते है और उनको संपन्न करने तक ही सीमित रहते हैं। इसके बाद भी यदि व्यक्ति की व्यक्ति पर परिवार की समाज पर और एक समाज की दुसरे समाज पर श्रेष्ठता प्रमाणित न हो तो शोरशराबे से और उससे भी प्रमाणित न हो तो हिंसक प्रदर्शन से प्रमाणित कराने का प्रयास किया जाता है। जितनी शांति की बात इस देश में की जाती है उतनी ही अशांति यहां फैलती है। आजकल पंजाब में जो बवाल मचा है उस पर मुझे हैरानी हो रही है। मैं समझ ही नहीं पा रहा हूँ कि माजरा क्या है? ऐसा लगता है कुछ राजनीति तो कुछ लोगों के निहित स्वार्थ ऐसे संघर्षों से ही सिध्द होते हैं । इस पूरे मसले पर अपनी राय कायम करने से पहले मैं अपने मन को टटोल रहा हूँ और पा ता हूँ कि सिख गुरुओं के प्रति मेरे मन में अपार श्रध्दा भरी हुई है और भगवान् गुरू नानक देव मेरे ह्रदय पटल पर जिस तरह स्थित हैं उसको व्यक्त करने के लिए यह लेख छोटा पड जाएगा और मैं अपनी मूल बात से हट जाऊंगा। वैसे भी पानी श्रध्दा अपने मन में रखनी चाहिए। जब मैं छोटा था और बीमार पड़ता तब तब मेरी नानी गुरुद्वारे के लिए पांच या दस रूपये का कराह(एक तरह का प्रसाद ) की मनौती मानती थी। जब मैं ठीक हो जाता तो वह लेकर मुझे खिलाती थी। मेरी माताजी श्री गीता पढ़ती थी और नानी मुझे गुरूद्वारे मत्था टेकने ले जाती। आज भी जब मैं किसी गुरुद्वारे जाता हूँ तो उनकी बहुत याद आती है। । मेरी नानी ने अपने एक पुत्र की कामना में उसे सिख बनाने की मनौती मानी थी और वह आज एक सिख हैं और हनुमान चालीसा उन्हें कंठस्थ है। मतलब यह कि गुरुद्वारा और मंदिर में आस्था का जो प्रश्न है उसके मेरे पास तो कोई ऐसा पैमाना नहीं है नाप सकूं कि किस्में कम है और किस्में ज्यादा । हाँ, इतना जरूर कह सकता हूँ कि मुझे दोनों जगह सहजता के भाव का अनुभव एक जैसा रहता है। गुरुनानक देव के जीवन चरित्र के बारे में सब जानते हैं । एक व्यापारी परिवार मैं पैदा हुए और समाज के अंधविश्वासों और कुरीतियों के विरूध्द समाज में जाग्रति लाने का प्रयास किया। उन्होने निराकार और निरंकार परमात्मा के उपासना के प्रेरणा दीं थी। उनकी मान्यताओं को मानने वाले बड़ी संख्या में हैं और जरूरी नहीं कि सभी सिख धर्म की रीतियों और रिवाजों को अपनाते हौं ।
देश में राजनीतिक दाव्पेंचों के चलते तमाम तरह के भेद स्थापित किये गये हैं जिसमें एक यह भी कि सिख धर्म और हिंद्दू धर्म अलग-अलग हैं। मुझे इस पर भी कोई टिप्पणी नहीं करनी पर इस समय जिस तरह देश में विभिन्न धर्मों के नाम पर संघर्ष भड़काये जा रहे है उससे निराशा होती है। बताया जा रहा है किसी ने सिख गुरुओं पर प्रतिकूल टिप्पणी की जिस पर सिख समुदाय में नाराजगी है और इसे इस तरह रंग दिया गया कि पंजाब के बाहर भी प्रदर्शन हो रहे हैं । जिसने सिख गुरुओं पर टिप्पणियां की है न तो मैं उनके बारे में जानता हूँ न ही मुझे पता ही है कि कैसी बाते उन्होंने की हैं। एक खबर में सिख गुरुओं पर टिप्पणी की बात है तो दूसरी में किसी विज्ञापन पर चर्चा है पर उनके विरूध्द प्रदर्शन कर रहे लोगों के विचारों से ही पता लगा कि किसी ने टिप्पणियां की हैं या कोई विज्ञापन दिया है। मतलब यह कि अगर प्रदर्शन नही होते तो ऎसी टिप्पणियाँ या विज्ञापन कराने वाले और उनके कारनामे कहीं अँधेरे कोने में पडे होते , और कोई उन्हें घास भी नहीं डालता पर ऎसी हालत में धर्म के नाम पर बवाल मचाने वालों के हित थोड़े ही सधते । ऐसा लगता है सिख्गुरुओं के प्रति प्रतिकूल टिप्पणियां या विज्ञापन और प्रदर्शन दोनों ही किसी योजना का ही हिस्सा है वरना इस देश में कौन है जो ऎसी टिप्पणियां करेगा। इस देश में सिख गुरुओं का सम्मान हिंदू और सिख समान रुप से करते हैं फिर इस तरह का बवाल मचना अपने आप में आश्चर्य के बात है , केंद्र और सरकारों को मिलकर इस बात के जांच करना चाहिए कि कौन लोग इस देश में अशांति फैलाना चाहते हैं? सिख गुरुओं के उपदेशों की प्रमाणिकता निर्विवाद है और कोई उन्हें चुनौती दे रहा है तो यह केवल सिख धर्म का मामला नहीं है बल्कि कोई राजनीतिक चाल भी हो सकती है और उसे हमारे विरोधी राष्ट्रों का समर्थन भी प्राप्त हो सकता है। ऐसे में हर नागरिक- चाहे वह सिख हो या हिंदू उसे सतर्क होना चाहिय और इस तरह की घटनाओं से निपटने का कम सरकार पर छोड़ना चाहिए न कि समाज में आग भड़काने का कम करना चाहिए । सिख हमारे समाज का एक अटूट अंग हैं और उनके धार्निक भावनाओं का सम्मान होना चाहिए पर उन्हें भड़काया भी नहीं जाना चाहिए।

Thursday, May 10, 2007

वाद और नारों से देश नहीं चला करते

NARAD:Hindi Blog Aggregatorमैं नारों से उतेजित नहीं होता और किसी वाद से प्रभावित नहीं होता, इतिहास कभी पढा था पर अब उस पर यकीन नहीं करता मैं अपनी बात बता त सकता हूँ कि उस समय क्या हुआ था जो इतिहास में दर्ज तथ्यों से मेल नहीं खायेगी, इतिहास लिखा नहीं लिखवाया जाता उन लोगों द्वारा जो अपना नाम अपने हिसाब से मरने के बाद भी अपना नाम जिन्दा चाहते हैं और उसे जो दोहराते हैं वह भ्रम पैदा कर आदमी की सोच को अपने पास गिरवी रखना चाहते हैं । मैं कोई ज्ञानी नहीं हूँ पर ज्ञान के अर्थ समझता हूँ। आख़िर मैं कैसे अपनी सोच कायम करता हूँ। सरल सी बात है, एक घटना यहं कई बार दोहराती है और उस घटना को देखकर इतिहास वाली घटना पर पेस्ट कर दीजिए, और मान लीजिये कि उस समय भी वही हुआ था-आप पाएँगे जिसने इतिहास लिखा था उसने कई घटनाओं को तोड़ा-मरोडा है। आज नारद ने सोमवार से पहले ही ब्लोग को अपने यहां खींच लिया तो मुझे अपने धर्म ग्रंथों में वर्णित नारदजी की याद आयी चाहे जब जहाँ पहुच जाते थे। अपने अध्यात्म में मेरी गहरी रूचि है पर इससे मुझे पोंगा मत समझ लेना । अपने विचार व्यक्त करने का मेरा एक अपना ही तरीका है , मैं दूसरों से प्रश्न नहीं करता उनके उत्तर खुद ही ढूँढता हूँ । जैसे मैं किसी अजनबी से बात करता हूँ तो उसका परिचय नहीं पूछता और देता हूँ -मुझे मालुम है कि जब वार्तालाप का दौर चल रहा है तो दोनों एक-दुसरे को जान लेंगे-न भी जाने तो क्या? जरूरी नहीं है कि सबको जाना जाये या अपको सब जाने ?
बात चल रही थी वाद और नारों की हो रही थी। कुछ नारे इस देश में लोकप्रिय हुए जैसे -अंग्रेजों देश छोडो का नारा लगा तो पूरे देश्में एक लहर चल पडी और देश आज़ाद हो गया। आजादी के बाड़े एक नारा गूंजा "सारे जहाँ से हिदोस्तान हमारा" जो एक ऐसे शायर के गीत से लिया गया जो बाद में पाकिस्तान चला गया । उसका गीत आज भी स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस सुनने को मिल जाता है। अब बताईये क्या यह नारा मुझे प्रभावित कर सकता है? और फिर क्या देश के जो हालत सामाजिक, आर्थिक, नैतिक, और वैचारिक दृष्टि से हैं उसे देखकर हम यह दावा कर सकते हैं । धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद, और गरीबी हटाओ के नारे इस देश में बहुत लोकप्रिय हुए पर क्या हुआ उनका? इनसे भ्रमित हुए और उन लोगों को अपने सिर पर बैठाते रहे किसी वाद को ओढ़ने और नारे लगाने के आलावा और कुछ नहीं जानते थे । झूठ और भ्रष्टाचार पर आधारित चरित्र लोकप्रिय हुए और सत्य और ईमानदारी को मूर्खता का पर्याय माना जाता है। धनी, उच्च पदस्थ और प्रतिष्ठित व्यक्ति के इर्द गिर्द मंडराने का लोभ कितने लोग छोड़ पाते हैं और कभी ऐसे लोगों की असलियत जानने की कोशिश करते हैं और जान पाते हैं तो क्या उनके सामने कहने का हम में साहस होता है। इस पर भी मैं जवाब नहीं मांगूंगा क्योंकि जैसा मैं हूँ वैसे तुम भी हो और पहले भी ऐसे लोग थे। देश का बंटवारा हुआ, उस पर वही लिखा गया जो उस समय के लोग चाहते थे, उनमें भी कुछ लोग थे जिन्होंने भावावेश मैं लिखा तो कुछ ने अपने आदर्श व्यक्तित्वों के लिए लिखते हुए अति की है जैसे आज के लोग कर रहेहैं । क्या कभी किसी ने ऎसी कल्पना की कि इस देश का बंटवारा नहीं होता तो कैसा होता इस देश का परिद्रश्य ?अच्छा या बुरा ? इस बारे में आम लोग सोचें नहीं इसीलिये तमाम तरह के "वाद" और नारे रचे गये ताकी उनकी सोच में उन्हीं लोगों का व्यक्तित्व रहे जो आजादी के समय था। उद्देश्य यही था कि अब स्वदेशी नेतृत्व अब अपने संघर्ष के बदले सत्ता का सुख भोगता रहे और इसके लिए अंग्रेजों द्वारा रची गयी लार्ड मैकाले की शिक्षा पध्दती को ही बनाए रखा गया जो गुलाम पैदा करती है योध्दा नहीं । भारत की जो पुराणी गुरुकुल प्रणाली है उसे धर्मनिरपेक्षता के सिध्दांत के तहत दूर रखा गया।
आज प्रथम स्वतंत्रा संग्राम की १५०वी वर्षगांठ है यह बात मुझे यह बात लिखते लिखते याद आयी , उस संग्राम के शहीदों को मेरी श्रध्दांजलि । मैं जब आजादी के उन दीवानों के बारे में सोचता हूँ , तो एक विचार मेरे दिमाग में आता है कि क्या आजाद भारत के इस स्वरूप के उन्होने कल्पना की होगी ? जवाब भी मैं खुद ही देता हूँ नहीं । केवल किसी "वाद" या नारे पर देश नहीं चला करते यह एक सर्व मान्य तथ्य है पर यह देश चला और जो हालत है हमारे सामने हैं । सवाल अपने से करना और जवाब भी खुद देना तभी सोचने में गहराई आयेगी जो इस देश का एक बहुत बड़ा वर्ग नहीं चाहता। शेष फिर कभी

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