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Monday, August 15, 2011

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-जहां से लाभ न हो वहां व्यय न करें (economics of kautiylaya arthshastra-incom and espendeture)

               सांसरिक पदार्थों का मोह ऐसा है कि हर आदमी उसे प्राप्त करना चाहता है। यह अलग बात है कि सभी का कर्म एक जैसा नहीं होता अतः उसका परिणाम भी भिन्न होता है। अनेक लोग अपने सामर्थ्य से अधिक लक्ष्य निर्धारित करते हैं तो अनेक ऐसे हैं जो सहज प्राप्य वस्तु को प्राप्त करना ही नहीं चाहते। कुछ लोग समय बीत जाने पर अपना अभियान प्रारंभ करते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि लोग अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार चलते हैं वैसे ही उनका जीवन भी चलता है। ज्ञानी लोग देशकाल और अपने सामर्थ्य के अनुसार किसी वस्तु या लक्ष्य की प्राप्ति के लिये अपना काम आरंभ करते हैं। भले ही वह अधिक धनवान न बने पर उनका जीवन शांति से गुजरता है। इसके विपरीत अनेक लोग लालच, लोभ और काम के वशीभूत होकर अपना काम प्रारंभ करते हैं। भाग्यवश किसी को सफलता मिल जाये तो अलग बात है वरना अधिकरत तो अपना पूरा जीवन ही अशांति में नष्ट कर देते हैं।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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मनुष्य युग्यापचयक्षयो हि हिरण्यधान्यावचयव्यस्तु।
तस्मादिमान्नैव विदग्धबुद्धिः क्षयव्ययायासकरीमुपेयात्।।
            ‘‘मनुष्य और पशु आदि जीवधारियों की देह का ह्रास  ही क्षय है। सोने आदि भौतिक पदार्थों का नाश व्यय है। जिसमें दोनों प्रकार का क्षय दिखे वह कार्य या अभियान प्रारंभ न करें। राजा का कर्तव्य है कि वह विशेष संहार और व्यय कर भी फल न मिलने वाले कार्य को रोके।
वस्तुष्वशक्येषु समुद्यमश्वेच्छक्येषु मोहादसमुद्यमश्च।
शक्येषु कालेन समुद्यश्वश्व त्रिघैव कार्यव्यसनं वदन्ति।।
          "किसी भी कार्य के तीन व्यसन होते हैं। एक तो अपने सामर्थ्य से अधिक वस्तु की प्राप्ति करने का प्रयास करना दूसरा सहजता से प्राप्त वस्तु के लिये उद्यम करना। तीसरा समय बीत जाने पर किसी वस्तु को प्राप्त करने का प्रयास करना।
         हमारी देह का ह्रास होता है तो स्वर्ण आदि भौतिक पदार्थों का व्यय भी करना पड़ता है। ऐसे में यह निश्चित कर कोई काम हाथ में लेना चाहिए जिसमें दोनों ही प्रकार की हानियों से बचा जा सके या फिर वह कम से कम हो। धन का सीधा नियम है कि जहां सें लाभ हो वहीं विनिवेश करें। राजनीति करने वालों के लिये यह नियम बहुत विचारपूर्ण है। अक्सर हम लोग देख रहे हैं कि सरकार के माध्यम से वितरित सहायता गरीब और निम्न वर्ग तक नहीं पहुंचती है। उस पर ढेर सारा व्यय हो रहा और देश के सभी शिखर पुरुष भी यह मानते हैं कि जनता तक वह सहायता नहीं पहुंच रही है। ऐसे में उस सहायता पर धन देने से क्या लाभ जिससे राज्य का लक्ष्य पूरा न होता हो। उल्टे इससे भ्रष्टाचार बढ़ रहा है।
       इसी तरह हमें अपने जीवन में भी व्यय करते हुए इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उससे हमें प्राप्त क्या हो रहा है। हम लोग अधिक धन होने पर अनेक संस्थाओं को दान आदि देते हैं इस विचार से कि उसका पुण्य मिलेगा पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सुपात्र को दिया गया दान ही फलीभूत होता है। उसी तरह जिन मदों पर व्यय करना विलासिता लगता है उनको कभी नहीं करना चाहिए। वैसे भी कहा जाता है कि लक्ष्मी चंचल है और कभी स्थिर नहीं रहती अतः सोच समझकर ही कहीं विनिवेश करना चाहिए।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Tuesday, August 9, 2011

वेद शास्त्रों से-विषयों से रसरहित होना ही मोक्ष है (ved shastron se-vishayon se ras rahit hona moksh)

        हमारे देश के अनेक कथित ज्ञानी अपने अल्पज्ञान से लोगों को मोक्ष का गलत पाठ पढ़ाते हैं। इसका आशय यह है कि मनुष्य मरने के बाद पुनः इस संसार में न लौटे। इससे अनेक लोग घबड़ा जाते हैं। हर मनुष्य यह चाहता है कि वह इस संसार में पुनः मनुष्य यौनि में ही आये। उसकी इस भावना का धर्म के ठेकेदार बहुत लाभ उठाते हैं और उसे दान पुण्य कर सकाम भक्ति के लिये प्रेरित करते हैं। इतना ही नहीं मनुष्य यौनि से पहले स्वर्ग का सुख भोगने की भी यह लोग गांरटी देते हैं। इस तरह धर्म एक सीमित अर्थ वाला विषय रह गया है। दरअसल मोक्ष का मतलब यह कतई नहीं है कि मरने के बाद आदमी फिर इस संसार में नहीं लौटेगा। अभी तक यह तय नहीं है कि मनुष्य या अन्य जीवों का इस संसार में लौटना होता है कि नहीं। आत्मा अमर है यह निश्चित है पर परमात्मा अनंत है और उसकी लीला को वही जानता है।
        दरअसल हमारा अध्यात्म मनुष्य को मन पर इस तरह नियंत्रण करना सिखाता है कि वह कम से कम इस अलौकिक मनुष्य यौनि में अपना जीवन व्यर्थ के विषयों के बर्बाद न करे। आनंद का अर्थ समझे। वरना तो स्थिति यह होती है कि आदमी अपने मन को प्रसन्न करते हुए अनेक साधन जुटा लेता है पर सुख ले नहीं पाता। सुख कोई दिखने या हाथ आने वाली चीज नहीं है बल्कि अनुभूति का विषय है और यही समझने वाले ज्ञानी कहलाते हैं जिनकी संख्या उंगलियों पर गिनने लायक हैं।
वेदशास्त्रों में कहा गया है कि
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मोक्षो विषयवैरस्यं बन्धो वैषयिको रसः।
सतावदेव विज्ञानं यथेच्छसि तथा कुरु।।
           ‘‘विषयों में से रस का चला जाना ही मोक्ष है और विषयों में रस का होना ही बंधन है। विज्ञान इतना ही। वैसे जिसकी इच्छा है वही काम करे।’’
इन्द्रियाण विचरतां विषयेष्वपहारिषु।
संयम यत्नमातिष्ठेद् विद्वान् यन्तेव वाजिनाम्।।
             ‘इंद्रियों का स्वभाव है कि वह विषयों में ही विचरती हैं। मनुष्य को कुशल सारथि की भांति उन पर नियंत्रण करना चाहिए।’’
        किसी वस्तु की प्राप्ति से पहले आदमी संघर्ष करता है पर बाद में वह कितना सुख अनुभव कराती है यह कौन विचार करता है। आसक्ति वस्तु प्राप्त करने तक ही सीमित है पर उसके उपयोग से सुविधा मिलती है न कि सुख का अनुभव होता है। सुख या आनंद त्याग में है। किसी वस्तु के मिलने पर हर्ष या न मिलने पर जब निराशा न हो तब यह समझना चाहिए कि हमने मोक्ष पा लिया। आसक्ति तनाव का कारण बनती है और विरक्ति सहजता का भाव पैदा करती है। इसी विरक्ति को मोक्ष कहा जाता है। मोक्ष का मतलब है आसक्ति का मर जाना। आसक्ति मरने का मतलब है तनावरहित जीवन गुजारना। यही ज्ञान और विज्ञान है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Wednesday, August 3, 2011

चाणक्य नीति-अभ्यास न होने से अर्जित ज्ञान भी विष हो जाता है (chankya neeti-abhyas n ho to gyan vish saman)

                भारतीय शिक्षा पद्धति का यह सबसे बड़ा दोष यह है कि वह व्यवहार में कहीं काम नहीं आती। हमारे यहां बच्चों को इतिहास, भूगोल, सामान्य विज्ञान, गणित, अर्थशास्त्र, राजनीतिक शास्त्र तथा साहित्य पढ़ाया जाता है। पढ़ने वालों का एकमात्र उद्देश्य शिक्षा प्रमाणपत्र प्राप्त करना होता है ताकि कहीं उनको नौकरी आदि मिल सके। जिनको मिल गयी उनके लिये काम के दौरान उस ज्ञान का अभ्यास नहीं होता जिससे उन्होंने शिक्षा प्राप्त की है। इससे उनके मन में हमेशा यह कुंठा रहती है कि जो उन्होंने पढ़ा है उसका उपयोग नहीं हो रहा। धीरे धीरे यह कुंठा तनाव का कारण बन जाती है। जिनको नौकरी नहीं मिली वह अन्य कोई श्रमप्रधान काम नहीं कर सकते क्योंकि बचपन से ही उसकी आदत नहीं रही। ऐसे शिक्षित बेरोजगार बनकर समाज ही नहीं परिवार की नज़रों में भी वह लोग खटकते हैं। समय के अनुसार हम देख रहे हैं कि देश में श्रमप्रधान काम करने वालों की संख्या कम होने के साथ ही शैक्षणिक प्रमाणपत्र लेकर नौकरी मांगने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है।
आचार्य चाणक्य कहते हैं कि
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अनभ्यासं विषं शास्वमजीर्णे भोजनं विषम्।
दरिद्रस्य विषं गोष्ठी वृद्धस्वय तरुणी विषम्।।
          ‘‘जिस तरह अपच रोग होने से स्वादिष्ट से स्वादिष्ट भोजन भी विष हो जाता है उसी तरह अभ्यास के अभाव में अर्जित ज्ञान भी विष हो जाता है। दरिद्र आदमी के लिये गोष्ठियां और वृद्ध के लिये तरुणी भी विष समान हो जाती है’’
आलस्योपगता विद्या परहस्तगतं धनम्।
अल्पबीजं इसं क्षेत्रं हतं सैन्यमनायकम्।।
             ‘‘आलस्य मनुष्य का स्वभाव है। इसी दोष के कारण उसके प्रयासों से अर्जित विद्या भी अभ्यास न होने से नष्ट हो जाती है। दूसरे के हाथ में गया धन कभी वापस नहीं आता। बीज अच्छा न होने पर फसल भी वैसे ही होती है।’’
        कहने का अभिप्राय यह है कि आज की शिक्षा पद्धति एकदम बेकार है। देखा जाये तो यह शिक्षा प्रमाण पत्र प्राप्त कर गुलामी करने के लिये ही चलायी गयी है। भारतीय अध्यात्म ज्ञान का इसमें कोई स्थान नहीं है। जिससे मनुष्य में व्यक्तित्व, चरित्र, विचार और आचरण का निर्माण होता है उस ज्ञान का वर्तमान शिक्षा पद्धति में कोई स्थान नहीं है। यही कारण है कि देश में भ्रष्टाचार, अपराध तथा हिंसा की घटनायें आम हो गयी हैं। देखा जाये तो हमारे मनीषियों ने हमारे लिये महान ज्ञान का सृजन किया और उसे हम जानते भी है पर न स्वयं अभ्यास करते हैं न दूसरों को करने देते हैं। कई बार तो कहीं ज्ञान की बातें सुनते हैं तो वह विष की तरह लगती हैं क्योंकि कहीं न कहीं हमारे अंदर कुंठा होती है कि हम उस मार्ग पर नहीं चल रहे जहां सत्य स्थित है। अभ्यास नहीं है तो अध्यात्मिक ज्ञान पर चलते नहीं और इस वजह से जो कुंठा है वह हमारे अंदर मानसिक द्वंद्व को जन्म देती है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Friday, June 17, 2011

बंदर की तरह उछलकूद कर समाजसेवा नहीं होती-रहीम के दोहे (bandar ki tarah samaj seva-rahim ke dohe)

कविवर रहीम कहते है 
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बड़े दीन को दुख, सुनो, लेत दया उर आनि
हरि हाथीं सौं कब हुतो, कहूं रहीम पहिचानि

         "इस संसार में बड़े लोग तो वह जो छोट आदमी की पीड़ा सुनकर उस पर दया करते हैं, परंतु बंदर कभी हाथी नहीं हो सकता-कुछ लोग बंदर की तरह उछलकूद कर दया दिखाते हैं पर करते कुछ नहीं। वह कभी हाथी नहीं हो सकते।"
            हमारे देश में हमेशा  ही दान तथा परोपकार के जरिये समाज सेवा करने की परंपरा रही है।  यही कारण है की हमारे अधिकतर धार्मिक स्थानों पर तीर्थयात्रियों के धर्मशालाएँ बनवाईं गईं।  वहाँ लंगरखाने बनवाए गए। अब पाश्चत्य संस्कृति के प्रभाव ने समाज सेवा को न केवल व्यापार बना  दिया है बल्कि उसके लिए पैसा दूसरों से लेकर लोगों के कल्याण करने की परंपरा विकसित  की गई है। जिसे हम समाज सेवा की दलाली भी कह सकते हैं। यही कारण है कि आजकल बच्चों, विकलांगों, महिलाओं और तमाम के तरह की बीमारियों के मरीजों की सहायतार्थ संगीत कार्यक्रम, क्रिकेट मैच तथा अन्य मनोरंजक कार्यक्रम होते हैं-जो कि मदद के नाम पर दिखावे से अधिक कुछ नहीं है।  ऐसे कार्यक्रमों में  केवल बंदर की तरह उछलकूद होती है। ऐसे व्यवसायिक कार्यक्रम तो तमाम तरह के आर्थिक लाभ के लिये किये जाते हैं। जो सच्चे समाज सेवी हैं वह बिना किसी उद्देश्य के लोगों की मदद करते है, और वह प्रचार से परे अपना काम वैसे ही किये जाते हैं जैसे हाथी अपनी राह पर बिना किसी की परवाह किये चलता जाता है।
            समझदार लोग तो सब जानते हैं पर कुछ बंदर की तरह उछलकूद कर समाजसेवा का नाटक करने वालों को देखकर इस कटु सत्य को भूल जाते है। कई लोग ऐसे कार्यक्रमों की टिकिट यह सोचकर खरीद लेते हैं कि वह इस तरह दान भी करेंगे और मनोरंजन भी कर लेंगे। उन्हें यह भ्रम तोड़ लेना चाहिये कि वह दान कर रहे हैं क्योंकि सुपात्र को ही दिया दान फलीभूत होता है। अतः हमें अपने बीच एसे लोग की पहचान कर लेना चाहिए जो इस तरह समाज सेवा का नाटक करते है। इनसे तो दूर रहना ही बेहतर है।
       
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',ग्वालियर
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Wednesday, May 25, 2011

चाणक्य नीति-कमाई से ज्यादा खर्च करना संकट का कारण (chankya niti-kamai aur kharch sankat ka karan)

              वैश्विक उदारीकरण के चलते विश्व में उधार लेकर उपभोग की वस्तुऐं क्रय करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। हमारे देश में तो वैसे ही रोजगार की कमी रहती है उस पर आजकल आधुनिक सुख सुविधाओं की वस्तुऐं जुटाने के लोग इतने आतुर हो जाते हैं कि अपने आय के साधनों की परवाह ही नहीं करते जिससे उनके यहां घरेलु आर्थिक संकट बिना बुलाये मेहमान की तरह हमेशा विराजमान रहता है। इसके अलावा कामकाज के आधुनिक साधनों की वजह से वैसे भी श्रम का उपयोग कम होने से बेरोजगारी बढ़ रही है जिसकी वजह से हमारे यहां युवाओं के लिये विकास का मार्ग अवरुद्ध हो रहा है। मगर उनको भी मोबाइल, कंप्यूटर, गाड़ी और अन्य सामान चाहिए जिससे उनमें से अनेक लोग अपराध की तरफ चले जाते हैं।
             इस विषय पर चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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            अनालोक्य व्ययं कर्ता ह्मनाथ‘ कलहप्रियः।
            आतुरः सर्वक्षेत्रेषु नरः शीघ्रं विनश्यति।।
             ‘‘बिना विचार किये अपनी आय से अधिक व्यय करने वाला, साथियों के बिना ही अपना सामूहिक अभियान या युद्ध प्रारंभ करने वाला तथा अनेक स्त्रियों में रुचि रखने वाला व्यक्ति शीघ्र ही प्राप्त होता है।’’
                  हम अगर आज अपने समाज की स्थिति पर नज़र डालें तो ऐसा लगता है कि वह एक पतनशील समाज हो गया है। लोभ, लालच और अहंकार के वश लोग एक दूसरे से भावनात्मक रूप से कट गये हैं और रिश्ते केवल नाम के रह गये हैं। उससे भी बदतर हालत यह है कि आजकल कोई आदमी संकट पड़ने पर किसी पर भरोसा नहंी करता। यही कारण है कि लोग कर्ज लेकर पहले तो घी पी लेते हैं पर जब मर्ज बढ़ जाता है तो उनको अपने आर्थिक संकट से उबरने का कोई मार्ग नहीं  दिखता। इसी कारण हमारे देश में आत्महत्या की घटनायें बढ़ गयी हैं। कहीं कहीं तो ऐसा भी होता है कि परिवार का मुखिया अपने पूरे परिवार को जहर देकर बाद में स्वयं भी खा लेता है। वैसे भी आजकल प्रचार माध्यमों ने आम आदमी की चिंत्तन क्षमता को हर लिया है। एक तरफ वह उपभोग की वस्तुऐं के लिये प्रेरित करते है तो दूसरी तरफ ऋण मार्ग का पता भी बताते हैं। ऐसे में जो ज्ञानी और व्यवहारिक लोग हैं वही अपना मानसिक संतुलन रख पाते हैं वरना तो पतन के मार्ग पर चलने को सभी आतुर दिखते हैं।

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Friday, April 29, 2011

धन शुक्ल, शबलम तथा कृष्ण तीन प्रकार का होता है-हिन्दू धार्मिक चिंत्तन (money three tpye,shukla,shabalama and black-hindu dharmik chintan)

         धन के दो नहीं तीन रूप होते हैं। इनमें सबसे पवित्र शुक्ल धन माना गया है। हमारे पवित्र ग्रंथ हमेशा ही यज्ञ के उपयोग  में किये जाने वाले धन की पवित्रता पर जोर देते हैं। अनाधिकृत रूप से प्राप्त धन को शबलम तथा ठगी, चोरी, ब्याज तथा मिलावट से प्राप्त धन कृष्ण याकाला कहा जाता है। शबलम या कृष्ण धन से धार्मिक यज्ञ या कार्यक्रम करना वर्जित है।
हमारे धर्म ग्रंथों में कहा गया है कि
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शुक्लशबलोऽसितश्चार्थ।
धन के तीन प्रकार होते हैं-शुक्ल, शबल तथा असित।
स्ववृत्युपार्जितं सर्व सर्वेषां शुक्लम्।‘
अपनी वृति से न्यायपूर्वक धन को शुक्ल या स्वच्छ धन कहा जाता है।
अनंतरवृत्युपातं शबलम्।
उत्कोचशुल्कप्राप्तमविक्रयस्य विक्रये।
कृतोपोरादास च शबलम् समुदाह्य्तम्।।
दूसरों की वृत्ति से उपार्जित तथा उत्कोच यानि अनाधिकृत रूप में घूस से प्राप्त तथा जो बेचने योग्य वस्तु नहीं  है उससे बेचकर प्राप्त धन या दूसरे के उपकार से प्राप्त धन शबलम धन कहलाता है।
अंमकरवृत्यापातं च कृष्णम्।
पाश्चिकद्यूतचौयासं प्रतिरूपकसाहरसोः।
व्याजेनोपार्जित यच्य तत्कृष्णं समेदाहतम्।।
बुरी प्रवृत्ति प्राप्त अशुद्ध तथा कपट से प्राप्त कृष्ण या काला धन कहलाता है। छल, ठगी, बेईमानी, जुआ, चोरी, मिलावट डकैती तथा ब्याज से प्राप्त धन काला धन कहलाता है।
             आजकल हम जब समाज की स्थिति देखते हैं तो घोर कलियुग की बात एकदम समझ में आती है। पूरे देश में काले धन के विरुद्ध बहुत सारी मुहिमें चल रही है पर सवाल यह है कि उसका नेतृत्व भी कौन कर रहा है? क्या उनके पास आया पूरा धन शुक्लपक्षीय है। यकीनन नहीं है। अगर हम अपने धर्मग्रंथों की बात माने तो धर्म के लिये एकत्रित पैसा हमेशा ही साफ मार्ग से आया होना चाहिए जबकि हम आजकल के अपने धार्मिक संतों और संगठनों के पास एकत्रित धन संपदा को देखें तो यकीनन वह शबलम या काले धन से एकत्रित प्रतीत होती है। जब भारत में आम आदमी के पास इतना शुक्लपक्षीय धन उपलब्ध नहीं है कि वह धर्म पर खर्च कर सकें तब यह संभव नहीं है कि इतने बड़े पैमाने पर चल रही धार्मिक गतिविधियों शबलम् या कृष्णपक्षीय धन शामिल न हो। कुछ कट्टर धार्मिक लोग धर्म के नाम पर प्राप्त धन के पवित्र होने का दावा अवश्य करें पर हमारे धर्मग्रंथ इस बात का समर्थन नहीं करते। ऐसे में आम भक्तों को ऐसे कार्यक्रमों से भी बचना चाहिए जहां पवित्र धन के पूर्ण उपयोग की संभावना न हो। इससे बेहतर तो यही है कि स्वयं ही योगसाधना, ध्यान, गायत्री मंत्र और ओम शब्द का जाप कर भक्ति करना चाहिए। दूसरी बात यह भी दूसरे के धन पर टिप्पणियां करने से अच्छा है कि भक्त स्वयं अपने ही कर्म पर ध्यान दें।
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Wednesday, April 27, 2011

असली ‘दम’ की पहचान करें-हिन्दी धार्मिक संदेश (asali dum ki pahachan-hindi dharmik sandesh)

         किसी आदमी में कितना ‘दम’ है उसकी प्रहार क्षमता से नहीं वरन् सहने की क्षमता से प्रमाणित होता है। अक्सर हम देखते हैं कि अनावश्यक रूप से दूसरों पर हमला करने, शस्त्रों से दूसरों को डराने और ऊंचे सपंर्कों की धौंस से समाज को आतंकित करने वालों को हम दमदार आदमी कहते हैं। उसी तरह जो लोग उपभोग की प्रवृत्ति में अधिक लिप्त होते हैं उनको ताकतवर मान लिया जाता है। यह केवल भ्रम है।
इस विषय में हमारे शास्त्रों के अनुसार
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           ‘‘इन्द्रियाणां जयो लोके दम इत्यभिधीयते।
           नादान्तस्य क्रियाः काशिचद् भवन्तहि द्विजोत्तमा।।
        ‘‘इस लोक में इंद्रियों पर विजय प्राप्त करना ही ‘दम’ माना जाता है। जो मनुष्य दमयुक्त नहीं है उसकी कोई क्रिया सफल नहीं हो सकती।’’
         इन्द्रियाणां प्रसंगेन दोषमृच्छति मानवः।
        संनियभ्य तु तान्येव सिद्धिं समधिनगच्छनि।।
         ‘‘इन्द्रियों के विशेष संग से मनुष्य स्वाभाविक रूप से विकार को प्राप्त होता है परंतु इन्द्रियों को नियंत्रित रखने से उसे सिद्धि ही प्राप्त होती है।’’
               बाहर कुछ कर दिखाकर अपना दम दिखाने वालों की इस संसार में कमी नहीं है। लोग इस कदर सम्मान पाने के आतुर रहते हैं कि छल कपट और मूर्खताऐं करते हुए उनका पूरा दम निकल जाता है। इतना ही नहीं अपने से कमजोर, बालक तथा स्त्रियों के प्रति आक्रामक रवैया अपनाना हमारे देश के दमदार लोग अपनी प्रतिष्ठा और योग्यता का प्रमाण मानते हैं। सच बात तो यह है कि लोगों की वाणी वाचाल होती है जो प्रायः अपनी दमखम का प्रचार करती है। जबकि सच बात यह है कि समाज में सहिष्णुता, विद्वेष तथा लालच की भावना इस कदर बढ़ गयी है कि लोग अत्यंत कमजोर हो गये हैं। त्याग, सहयोग तथा प्रेम का भाव कमजोर लोगों का तो लूट, वैमनस्य तथा गाली गलौच करना ताकतवर लोगों की निशानी मान ली गयी है। यही कारण है कि हमारा समाज अपराध तथा घृणा के भाव का शिकार हो गया है।
            अगर हम दम या शक्ति का सही रूप समझें तो अपनी मानसिकता बदल सकते हैं। चिल्लाने में कोई दम नहीं लगता बल्कि मौन में दम का पता चलता है। लूटने में भला कैसा दम? दम तो त्याग में पता चलता है। अतः अपने दमदार रूप को दिखाने के लिये अच्छे आचरण की नीति को अपनाना चाहिए।
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Thursday, April 14, 2011

भगवान तो भक्ति भाव में बसते हैं-हिन्दू धार्मिक लेख (bhagawan to bhakti ke bhookhe hain-hindu dharmik lekh)

भक्ति का संबंध मन के भावों से है-यह अंतिम सत्य है। परमात्मा के स्वरूप के बारे में कोई दावा नहीं कर सकता क्योंकि वह अनंत है। कई लोग कहते हैं कि वह एक है तो ज्ञानी कहते हैं कि न वह एक है न अनेक, न वह गोरा है न काला, न वह स्त्री है न पुरुष न ही वह ज्ञात है न अज्ञात है, बल्कि वह तो अनंत है। उसकी अनुभूति निरंकार भक्ति से भी की जा सकती है न और किसी स्वरूप की मूर्ति बनाकर भी उसे पाया जा सकता है। मुख्य विषय है कि हमारा भाव किस प्रकार का है। मानो तो भगवान नहीं तो वह पत्थर है। वह अनंत परमात्मा भाव पूर्ण भक्ति से ही पाया जा सकता है।
हमारे देश में मूर्ति पूजक तथा उनके विरोधियों की संख्या अधिक है। भारत में प्रवर्तित धर्मों को मूर्ति पूजक मानकर उनका विरोध किया जाता है जबकि अध्यात्मिक दृष्टि से हमारे यहां आकार तथा निराकार दोनों ही रूपों के साथ ही केवल ध्यान योग के माध्यम से भी भक्ति के महत्व को स्वीकार किया जाता है। हमारे अध्यात्म दर्शन की यह खूबी है कि वह मनुष्य की उसकी दैहिक तथा शारीरिक क्षमताओं की सीमाओं के अनुसार परमात्मा की भक्ति के लिये प्रेरित करता है। मूर्ति पूजा एक साधना एक क्रिया है पर साध्य तो परमात्मा की भक्ति पाना है।
इस विषय पर नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि
काष्ठापाषाणाधातूनां कृत्वा भावेद सेवनम्।
श्रद्धया चतथा सिद्धस्तस्य विष्णुंः प्रसीदति।।
‘‘लकड़ी, पत्थर अथवा किसी भी धातु से बनी प्रतिमाओं की सहृदयता से सेवा करना चाहिए। श्रद्धा एवं सदाशयता से सेवा करने पर भगवान विष्णु उत्तम फल प्रदान करते हैं।’’
न देवा विद्यते काष्ठे न पाषाणे न भृन्मये।
भावे हि विद्यते देवस्तस्माद् भावो हि कारणम्।।
‘‘देवता या परमात्मा लकड़ी में नहीं है, पत्थर में विराजमान नहीं है और न ही धातु में विद्यमान है। मिट्टी की प्रतिमा में उसका अस्तित्व नहीं है। परमात्मा का निवास तो भावना में है। जहां भक्ति भावना है वहां वह अवश्य प्रकट होते हैं।’’
हम अगर स्वयं मूर्तिपूजक हैं तो किसी निरंकार के उपासक का मजाक न बनायें। अगर हम निरंकार के उपासक हैं तो मूर्तिपूजक पर न हंसें-यही संदेश हमारा अध्यात्मिक दर्शन देता है। जो लोग मूर्तिपूजा करते हुए उसकी सेवा करते हुए भक्ति निच्छल भाव से करते हैं उनके लिये भी भगवान प्रकट होते हैं और जो निरंकार के उपासक हैं तो उनके हृदय में ही भगवान बसते हैं। मुख्य बात यह है कि भक्ति भाव पवित्र होने के साथ ही उदारतापूर्ण होना चाहिए।
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Friday, April 8, 2011

राजपद मनुष्य की बुद्धि को भ्रष्ट कर देता है-तुलसीदास के रामचरित मानस से (rajniti aur buddhi-ramcharitmanas of tulsidas)

जौं जिएँ होति न कपट कुव्वाली। केहि सोहाति रथ बाजि गजाली।।
भरतंहि दोसु देह को जाएँ । जग बोराइ राज पदु पाएँ।।
यह पद तुलसीकृत रामचरित मानस से है। बनवास में जब भरत अपने बड़े भ्राता श्रीरामचंद्र तथा लघु भ्राता लक्ष्मण से मिलने आ रहे थे तब उनके साथ गये दल के लोगों की पदचाप तथा हाथी, घोड़ों तथा रथों की तीव्र आवाजों से आकाश गुंजायमान था। उसकी ध्वनि उस स्थान तक पहुंच रही थी जहां भगवान श्रीराम अपनी धर्मपत्नी सीता तथा भ्राता लक्ष्मण सहित विराजमान थे। श्री भरत जी को दलबदल सहित आता देखकर श्रीलक्ष्मण को उनपर संशय हो गया था तब उन्होंने यह संदेह जाहिर किया कि वह हमें मारने आ रहे हैं। श्री भरत ऐसे नहीं थे पर श्रीलक्ष्मण ने जो कहा वह संसार में मनुष्य की प्रवृत्ति पर एकदम लागू होता है।
उनका कहना था कि जब किसी को राज्य प्राप्त होता है तो उस मनुष्य की देह में स्थित अहंकार की प्रवृति चरम पर पहुंच जाती है। राजा का पद किसी को भी भ्रष्ट कर देता है।
हम अक्सर समाज के शिखर पुरुषों से दया और परोपकार की आशा करते हैं पर देखते हैं कि वह तो अपने वैभव का विस्तार तथा उसके प्रदर्शन में ही अपना धर्म निभाते हैं। पद, पैसा और प्रतिष्ठा का बोझ कोई ज्ञानी ही ढो सकता है वरना तो लोगों की बुद्धि उसके नीचे दब जाती है। आदमी अपने को भगवान समझने लगता है।
राजकाज में जिसको हिस्सा मिल गया समझ लीजिये उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी। वह उसकी शक्ति प्रदर्शन करता है और अपने लिये आयी भेंट को शान समझता है। मतलब साफ है कि हम पद, पैसा, प्रतिष्ठा के शिखर पुरुषों से दया की याचना करें पर पूरी न हो तो निराश न हों क्योंकि यह तो मनुष्य का चरित्र है जिसकी व्याख्या हमारे महान लोग समय समय पर करते रहे हैं।
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Sunday, April 3, 2011

मौत से अधिक घातक व्यसन-हिन्दू धार्मिक चिंत्तन (vyasan adhik ghatak-hindu dharamik chittan)

पहले आदमी प्रारंभ में शौक के लिये जुआ, सट्टा या तंबाकू सेवन का व्यसन अपने अंदर पालता है और बाद में वह सब उसके मन के ऐसे स्वामी बन जाते हैं जिसके बिना जीवित रहना ही उसे कठिन लगता है। यह तो प्रमाणिक व्यसन हैं पर कुछ ऐसे भी हैं जिनको व्यसन के रूप में हमारे प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में कहीं वर्णित नहीं किया गया क्योंकि उनका प्रादुर्भाव तो आधुनिक युग की देन है। क्रिकेट मैच, फिल्में, मोबाइल पर अनावश्यक रूप से चिपके रहना तथा टीवी धारावाहिकों को देखना भी ऐसे ही व्यसन हैं जिनमें आंखें और मन दोनों ही खराब होता है। वैसे आजकल हम अनावश्यक रूप से मोबाइल का उपयोग करना भी व्यवसन मान सकते हैं। ऐसे व्यसन पश्चिम की ही देन है और वहां के विशेषज्ञ ही यह मानते हैं कि रंगीन टीवी सतत देखना या मोबाइल का अधिक उपयोग इंसान के शरीर और मन के लिये घातक है।
व्यसनों के विषय में मनुमहाराज कहते हैं कि
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व्यसनस्य च मृत्योश्च व्यसनं कष्टमुच्यते।
व्यसन्यधोऽधोव्रजति स्वर्यात्यव्यसनी मृतः।।
‘‘मृत्यु तथा व्यसन में व्यसन अधिक पीड़ा देने वाला होता है। व्यसन करने वाले व्यक्ति का सतत पतन होता जाता है जबकि व्यसन रहित मृत्यु के बाद भी स्वर्ग प्राप्त करता है।’’
आधुनिक व्यापार जगत ने आम समाज के लिये मनोरंजन के नाम पर ऐसी व्यवस्था की है जिसमें एक के बाद एक नया दृश्य सामने आता है। पहले क्रिकेट तो फिर फिल्म और फिर कहीं फुटबाल होती थी अब तो मोबाइल भी एक ऐसा मनोरंजन का साधन बन गया है जिसमें लोग प्राणप्रण से जुटे रहते हैं। कहीं भीड़ में खड़े हो जाओ तो आसपास दस में से पांच लोग मोबाइल पर बात करते नज़र आते हैं।
यह समाज पहले भी तो चल रहा था पर ऐसा क्या हो गया है कि अब उसके लिये मोबाइल, किक्रेट या फिल्म का होना अनिवार्य हो गया है। सच तो यह है कि विकास के साथ सामाजिक संबंध सिकुड़ रहे हैं और इसी वजह से तनाव से उपजने वाली बीमारियां बढ़ भी रही हैं। हमने सुविधाओं का उपयोग व्यसन बना दिया है। ध्यान और योग की बजाय शोर शराबे से भक्ति करने की आदत बन गयी है। तत्वज्ञान से परे होकर हम संसार की वस्तुओं और व्यक्तियों में प्रसन्नता ढूंढने लगे हैं। किसी व्यक्ति का स्वभाव, आदतें तथा व्यवहार देखने की बजाय उसके मुख तथा आभामंडल देखकर उसके प्रशसंक बन जाते हैं। व्यसनों ने हमारी चिंत्तन क्षमता को समाप्त कर दिया है। ऐसे में उनसे बचने का विचार करना चाहिए।
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Sunday, March 27, 2011

शब्द चोरी करने वाला सबसे बड़ा चोर-हिन्दू धार्मिक लेख (shabd chori karane wala sabse bada chor-hindu dharmik lekh)

हमारी पांच इंद्रियां आंख, कान, नाम. मुख तथा हाथ पांव अपना काम करती हैं। यह देह में स्थित मन, बुद्धि तथा अहंकार की प्रकृतियों से नियंत्रित होती है। हमारी देह बाहरी गतिविधियों से प्रभावित होती है। वह नाक से सुगंध ग्रहण करती है, आंखों से सांसरिक रूप देखती और कान से शब्द स्वर सुनती है। मुख से रस ग्रहण करती है और शरीर से स्पर्श अनुभव करती है। हम बाहरी गतिविधियों से प्रभावित होते हैं इसलिये शब्द बोलने और सुनने का प्रभाव भी अनुभव करते हैं। जिन लोगों के पास तत्वज्ञान नहीं है वह अपनी इंद्रियों की गतिविधियों और उनके प्रभाव से अवगत न होने के कारण हमेशा असहजता की स्थिति में रहते हैं। खासतौर से शब्दों में मामले में लापरवाह होते हैं। न केवल अनाप शनाप शब्द बोलते हैं बल्कि बकवास करने वालों की संगत भी करते हैं।
मनुस्मृति में कहा गया गया है कि
.................................................................
वाच्यार्था नियताः सर्वेवांमूलाः वाग्विनिःसृताः।
तां तु यः स्तेदयेद्वाचं स सर्वस्तेयकृन्नरः।।
‘‘शब्द से सभी अर्थ उत्पन्न होते हैं। उनके बोलने से ही सभी का ज्ञान होता है। समस्त शास्त्रों ं का प्रादुर्भाव शब्द से ही हुआ है। अतः शब्द ही संसार का मूलाधार है। अतः झूठ बोलने वाला या दूसरे के शब्द चोरी करने वाला सबसे बड़ा चोर है।’
एक दूसरी बात भी सामने आती है। अक्सर कुछ लोग दूसरे की कही बात अपने नाम से कहते हैं। वैसे हम हिन्दी साहित्य जगत में यह भी देखते हैं कि विचार, कविता और कथाऐं चोरी कर ली जाती हैं। हिन्दी में इंटरनेट पर कुछ सामान्य लोग अपनी रचनाऐं लिखते हैं और अनेक पत्र पत्रिकाऐं चोरी कर उसे छाप देती हैं। ऐसा भी हुआ है कि अध्यात्मिक विषयों के लेखों की चोरी कर लेखक से कहा जाता है कि ‘आप तो वैसे ही सेवा कर रहे हैं पर नाम की चिंता क्यों करते हैं।’
कहने का अभिप्राय यह है कि यह चोरी सबसे बड़ा पाप है। इसके अलावा आजकल तो झूठ बोलने का फैशन हो गया है। लोग झूठ बोलना चालाकी मानने लगे हैं। समाज में इसलिये ही नैतिक पतन चरम पर पहुंच गया है। संवेदनाऐं मर गयी हैं और भले मनुष्य होने का दावा सभी करते हैं पर कुछ लोग पशुओं से अधिक बुरा व्यवहार करने लगे हैं। हमें ऐसी बुराई से बचना चाहिए जिसके पाप का पश्चाताप नहीं किया जा सके, पर इसके लिये यह जरूरी है कि पाप क्या है और पुण्य क्या, इस बात को समझें।
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Saturday, March 19, 2011

क्रोध और निराशा आने पर ओम शब्द का जाप करें-हिन्दी चिन्त्तन लेख (krodh aur nirasha mein om shabd ka jaap karen-hindi chinttan aalekh)

क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। क्रोध की उत्पति अहंकार से होती है जो कि अज्ञानियों में कूटकुटकर भरा होता है। जीवन से लेकर मृत्यु तक के सफर को तत्वज्ञान की दृष्टि से देखने वाले जानते हैं कि यहां कुछ भी अच्छा या बुरा नहीं है। यह संसार त्रिगुणमयी माया से संचालित है और हर जीव अपने गुणों के वशीभूत होकर व्यवहार करता है। जिन लोगों का रहन सहन गलत स्थान और वातावरण में है उनसे सद्व्यवहार करने की आशा करना ही मूर्खता है। जिनके पास अध्यात्मिक ज्ञान नहीं है वह इस संसार को अपनी शक्ति से संचालित होने का भ्रम पालकर अपने कर्म का परिणाम सम्मान और दान के रूप में चाहते हैं। ऐसा न होने पर वह क्रोध का शिकार होकर हिंसा करते हैं और फिर अंततः उसका दुष्परिणाम भी उनके सामने आता है तब वह उन पलों को कोसते हैं जब उनको क्रोध आया था। आजकल की युवा पीढ़ी व्यसनों के साथ ही जुआ और सट्टे जैसे अपराधों के साथ जुड़ रही है। फिल्म और टीवी धारावाहिकों में मेकअप से सजे कृत्रिम सौंदर्य से उनकी बृद्धि दिग्भ्रमित हो जाती है और उनके अंदर यौन अपराध की वृत्तियां पनपती हैं। सब तरफ से निराश होने पर उनके अंदर क्रोध पैदा होता है और अंततः वह हिंसक मार्ग पर चल पड़ते हैं।
इस विषय पर मनुमहाराज कहते हैं कि
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परस्यं दण्डं नोद्यच्छेत्क्रुद्धोनैनं।
अन्यत्र पुत्राच्छिष्याद्वा शिष्टयर्थ ताडयेत्तु तौ।।
"कभी क्रोध भी आये तब भी किसी अन्य मनुष्य को मारने के लिये डंडा नहीं उठाना चाहिये। मनुष्य केवल अपने पुत्र या शिष्य को ही पीटने का हक रखता है।"
ताडयित्त्वा तृपोनापि संरम्भान्मतिपूर्वकम्।
एकविंशतिमाजातोः पापयेनिषु जायसे।।
"अपनी जाग्रतावस्था में जो व्यक्ति अपने गुरु या आचार्य को तिनका भी मारता है तो वह इक्कीस बार पाप योनियों में जन्म लेता है।"
जिन लोगों ने क्रोधवश हिंसा की है और उसका परिणाम भोगा है, उनसे अगर अपने अपराध की चर्चा की जाये तो वह इस बात को मानते हैं कि उन्होंने आवेश में आकर ऐसा अपराध किया जिससे वह बच सकते थे। इसका सीधा मतलब यह है कि उनसे हुआ अपराध हालातों से नहीं बल्कि उनके स्वयं के अपने आवेश की वजह से हुआ था। अनेक जगह तो ऐसे झगड़े होते हैं जिनमें विषय इतना गौण होता है कि देखने और सुनने वाले हंसते हैं। क्रोध का शिकार होने वाले पीड़ित हों या अपराधी अपनी जान ऐसे विषय पर गंवाते हैं जिससे टाला जा सकता था। अंतः जब अपने अंदर क्रोध आये तो उस पर नियंत्रण करना चाहिए। इसका सीधा उपाय यह है कि जब हमें लगे कि निराशा और क्रोध हमारे अंदर आ रहा है तब ओम शब्द का जाप करें। अगर कोई दूसरा मंत्र जपते हैं तो उसका जाप आरंभ करें।
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Wednesday, March 16, 2011

दूसरे पर विश्वास करने की सीमा होती है-हिन्दू अध्यात्मिक लेख (vishvas aur sawdhani-hindu dharmik vichar)

कहा जाता है कि आजकल कलियुग चल रहा है और मनुष्य की प्रवृत्ति पर राक्षसत्व हावी है। ऐसे में सतयुग, त्रेतायुग तथा द्वापर काल में महामनीषियों की कही गयी बातें अधिक प्रासंगिक हो जाती हैं। हालांकि इन सात्विक संदेशों को देखें तो एक प्रश्न उठता है कि हमारे देश में कलियुग कब नहीं रहा। यह भी विचार आता है कि सतयुग, त्रेतायुग या द्वापर में मनुष्य की प्रवृत्तियां दैवीय होने का भ्रम ही है न कि सच। आखिर महान विद्वान विदुर क्यों कहते हैं कि जो अविश्वसनीय हो उस पर तो विश्वास करना ही नहीं चाहिए पर जो विश्वास योग्य हो उस पर भी अधिक विश्वास नहीं करना चाहिए।
महात्मा विदुर कहते हैं
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न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत्।
विश्वासाद भयमुत्पन्नं मूलान्यपि निकृन्तति।
जिस मनुष्य का विश्वास प्रमाणिक न हो उस पर तो विश्वास करना ही नहीं चाहिए पर जिस पर जो योग्य हो उस भी अधिक विश्वास न करें। विश्वास से जो भय उत्पन्न होता है वह मूल लक्ष्य को ही नष्ट कर डालता है।
"अनीर्षुर्गुप्तदारश्च संविभागी पियंवदः।
श्लक्ष्णो मधुरपाक् स्वीणां न चासां वशगो भवेत्।।"
"मनुष्य ईर्ष्या रहित, स्त्रियों की रक्षा करने वाला, संपत्ति का न्यायपूर्वक बांटने वाला, प्रिय वाणी बोलने वाला, साफ सुथरा तथा स्त्रियों से सद्व्यवहार करने वाला हो परंतु किसी के वश में न हो।"
अगर हम आजकल अपने देश में हो रहे अपराधों को देखें तो उनमें से अधिकतर विश्वासघात का परिणाम होते हैं। खासतौर से स्त्रियों के प्रति हो रही अपराधों को देखें। आजकल ऐसी अनेक घटनायें होती हैं जिसमें स्त्रियों के साथ बलात्कार या हत्यायें की जाती हैं। अनेक जगह तो उनको गठरी में मारकर फैंक दिया जाता है। समाज और अपराध विशेषज्ञ कहते हैं कि स्त्रियों के प्रति अपराध उनके निकटस्थ लोग ही करते हैं। कहंी परिवार तो कहीं जानपहचान वाले ही उनको निशाना बनाते हैं। हमारे यहां संयुक्त परिवार की परंपरा के विघटन के बाद स्थितियां बदली हैं। अपने परिवार तथा रिश्तेदारों की बजाय लोग गैरों पर अधिक विश्वास करने लगे हैं। पुरुष के लिये धन का विषय हो या स्त्री के सम्मान का सवाल इसमें अब विश्वासघात अपना काम करने लगा है। आजकल पुरुष हो या स्त्री चिकनी चुकड़ी बातों में आकर हाल ही दूसरे पर विश्वास करने लगते हैं। ऐसे में जहां पुरुष अपना धन तो स्त्री अपने सम्मान के साथ जान तक से हाथ धो बैठती हैं।
हमारा अध्यात्मिक ज्ञान कितना शक्तिशाली और प्रासंगिक है यह हम तभी समझ सकते हैं जब उसका अध्ययन करते हुए ज्ञान को धारण करें। इसलिये भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों का नियमित अध्ययन करना चाहिए। ऐसा करने से जहां ज्ञान प्राप्त होता है वहीं किसी से व्यवहार करने में सतर्कता का भाव पैदा होता है। तब यह भी पता लगता है कि हम ऐसे लोगों पर ही भरोसा करते हैं जिन्होंने अपना साम्राज्य ही धोखे पर खड़ा किया है।
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Sunday, March 6, 2011

अधर्म का धन होली पर्व पर चुराई गयी लकड़ी की तरह शीघ्र नष्ट होता है-रहीम के दोहे (adharm ka dhan holi ke parva ki lakdi ki tarah-rahim ke dohe)

अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि‘आजकल समय खराब हो गया है और नयी पीढ़ी व्यसनों का शिकार हो रही है।’
हम समाज के नैतिक और अध्यात्मिक पतन के लिये बढ़ते हुए भौतिकतावद को दोष देते हैं। यह सही है पर इसके लिये मनुष्य के की शारीरिक सुख सुविधा तथा मनोरंजन के लिये बनी वस्तुओं का उपभोग नहीं बल्कि उनको खरीदने की लिये धन का वह स्वरूप है जो अधर्म पर आधारित होता है। सच तो यह है कि जब पहले देश में जब कृषि आधारित व्यवस्था में श्रम की प्रधानता थी तब लोग ईमानदारी और परिश्रम के मार्ग से अपना भौतिक विकास करते थे। यह मार्ग लंबा होता था पर लोग सहजता से जीवन व्यतीत करते थे। विश्व में आर्थिक उदारीकरण की लहर के बाद देश की सामान्य कार्यप्रणाली में परिवर्तन आया है। अब जिसे देखो नौकरी के पीछे भाग रहा है। जिनके पास शिक्षा की उपाधि है उनमें कोई भी व्यवसाय या कृषि को अपना लक्ष्य नहीं बनाता। जल्दी जल्दी धन कमाने के लिये अनेक व्यक्ति अधर्म तथा अपराध का काम करने लगते हैं। ऐसे में उनकी उपभोग की प्रवृत्ति भी वैसी होती जा रही है। शराब, जुआ तथा सट्टा जैसे व्यसनों का प्रकोप बड़ रहा है।
कविवर रहीम कहते हैं कि
रहिमन वित्त अधर्म को, जरत न लागै बार।
चोरी करि होरी रची, भई तनिक में छार।।
‘‘पाप के धन को नष्ट होने में अधिक समय नहीं लगता। ठीक उसी तरह जैसे होली के अवसर पर कुछ लोग लकड़ी चुराकर लाते हैं और वह जलकर जल्दी नष्ट हो जाती है।’’
पाप का धन होली के लिये चुराई गयी लकड़ी की तरह ही नष्ट होता है। जिन लोगों के पास अधर्म की कमाई है उनका पैसा भी वैसे ही खर्च होता है। किसी को स्वयं ही शराब, जुआ, तथा सट्टे की आदत लग जाती है या फिर उनके परिवार के सदस्य इसका शिकार होते हैं। यह भी नहीं हुआ तो बीमारी अपना रौद्र रूप प्रकट कर पैसा बाहर निकलवाती है। इसलिये जहां तक संभव हो धर्म की कमाई करें क्योंकि शरीर के अच्छ स्वास्थ्य और मन की प्रसन्नता का यही एक उपाय है।
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Thursday, March 3, 2011

तीनों लोकों की संपदा पाने के लिये लोग जीवन नष्ट कर देते हैं-हिन्दी धार्मिक लेख (aadmi ka jivan-hindi dharmik lekh)

सिख गुरु गोविंद सिंह जी का कहना था कि ‘धन बहुत बड़ी चीज है, पर आदमी को खाने के लिये बस दो रोटी चाहिए।’
इसका आशय यही है कि भले ही आदमी कितना भी कमा ले पर उसका पेट अन्न के बिना नहीं भर सकता। हम इसका व्यापक तथा गुढ़ भाव देखें तो यह बात समझ में आती है कि खाने के लिये जहां हमें रोटी चाहिए तो प्यास बुझाने के लिये पानी। देह को बचाने के लिये कपड़ा चाहिये और रात गुजारने के लिये छत की आवश्यकता होती है। यह धन से प्राप्त होती हैं पर दैहिक आवश्यकता की पूर्ति वस्तुओं से होती है कि कागज के नोटों से। यह बात लोग नहीं समझते और पैसा कमाने का लक्ष्य रखकर ही चलते जाते हैं और फिर अंततः उनकी देह नष्ट हो जाती है। इस दुनियां के अधिकतर मनुष्य जितना कमाते हैं उतना खर्च नहंी कर पाते। वह ऐसा भौतिक संसार रच जाते हैं जो बाद में दूसरों के काम आता है।
इस विषय पर संत कबीरदास कहते हैं कि
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कबीरा औंधी खोपड़ी, कबहूं धापै नाहिं
तीन लोक की सम्पदा, कब आवै घर माहिं
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य की खोपड़ी उल्टी होती है क्योंकि वह कभी भी धन प्राप्ति से थकता नहीं है। वह अपना पूरा जीवन इस आशा में नष्ट कर देता है कि तीनों लोकों की संपदा उसके घर कब आयेगी।
हालांकि लोग धन का पीछा करते हुए थकते नहीं हैं पर एकरसता से जो ऊब पैदा होती है उसको भी नहीं समझ पाते। योगसाधना, ध्यान, और मंत्रजाप उनके लिये फालतु की चीज हैं। कुछ लोग पैसे के कारण भी भक्ति का दिखावा करते हुए बड़े बड़े कार्यक्रम भी करते हैं पर उनका आचरण, व्यवहार और वाणी हमेशा ही उनके अंदर के विकारों से ग्रसित दिखाई देती है। आजकल तो ऐसे लोग भी हो गये हैं जो धर्म का व्यापार इसलिये करते हैं ताकि उनके लिये सुखसुविधा का संग्रह होता रहे। अनेक लोग समाज पर दबदबा बनाये रखने के लिये भगवान की आड़ लेते हैं। ऐसे लोग वैभव, पद और बाहुबल से संपन्न दिखते जरूर हैं पर मानसिक रूप से विकृति को प्राप्त हो जाते हैं।
इस संसार में सुख से रहने का मार्ग अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने से ही सुलभ होता है। यही सोचकर तत्व ज्ञानी जितना मिलता है उसी से संतोष कर लेते हैं। वह न केवल अपना जीवन आनंद से बिताते हैं बल्कि दूसरों को भी सुख देते हैं।

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Sunday, February 20, 2011

दूसरे लोगों का मुख कभी न ताकें-हिन्दू धार्मिक चिंत्तन

जीवन में उतार चढ़ाव आते हैं। यदि मनुष्य सतर्कता, सजगता तथा परिश्रम से सक्रिय रहे तो उसके पास समय आता है। कहा भी जाता है कि भगवान के यहां देर है पर अंधेर नहीं। अपने अंदर आत्मविश्वास हमेशा रखना चाहिये। इस बात को मन ही मन दोहराना चाहिए कि एक न एक दिन हमारा समय भी आयेगा। इस कुंठा को मन में स्थान नहीं देना चाहिए कि हमारा भाग्य खराब है या हमारी कर्म शक्ति में क्षीणता है इसलिये सीधे मार्ग से कोई उपलब्धि नहीं मिलेगी। अपने जीवन में संक्षिप्त राह अपनाने या अपने से बड़ों का चाटुकारिता इस आशा से करना कि वह कोई मदद करेंगे,एकदम बेकार है। दूसरों का मुख ताकने से कोई लाभ नहीं होता।
इस विषय में भर्तृहरि महाराज का कहना है कि
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किं कन्दाः कन्दरेभ्यः प्रलयमुपगता निर्झरा वा गिरिभ्यः
प्रघ्वस्ता तरुभ्यः सरसफलभृतो वल्कलिन्यश्च शाखाः।
वीक्ष्यन्ते यन्मुखानि प्रस्भमपगतप्रश्रयाणां खलानां
दुःखाप्तसवल्पवित्तस्मय पवनवशान्नर्तितभ्रुलतानि ।।
"वन और पर्वतों पर क्या फल और अन्य खाद्य सामग्री नष्ट हो गयी है या पहाड़ों से निकलने वाले पानी के झरने बहना बंद हो गये हैं? क्या वृक्षों से रस वाले फलों की शाखायें नहीं रहीं हैं। उनसे तो तन ढंकने के लिये वल्कल वस्त्र भी प्राप्त होते हैं। ऐसा क्या कारण है कि गरीब लोग उन अहंकारी और दुष्ट लोगों की और मुख ताकते हैं जिन्होंनें थोड़ा धन अर्जित कर लिया हैं।"
जीवन में दूसरों से अपेक्षा करना या अपने काम के लिये निर्भर रहना अंततः दुःख का कारण बनता है। यदि कोई मदद करता भी है तो उसका कोई स्वार्थ होता है। कई बार तो यह कि मदद से अधिक तो वह अपने स्वार्थ पूरे करते हैं। कई बार तो होता यह है कि बड़े लोग आश्वासन देकर छोटों से काम कराकर अपने कहे से मुकर जाते हैं। ऐसे में बेहतर यही है कि अपनी योग्यता, शक्ति और उपलब्ध साधनों के सामर्थ्य के अनुसार काम प्रारंभ करना चाहिए। अपने काम से उपलब्धि की आशा भी उतनी ही करना चाहिए जितनी तर्कसंगत स्वयं को लगे। न दूसरों के कहने पर अपनी आशाओं को विस्तार देना चाहिए और न किसी अपना काम छोड़कर बेफिक्र होने की सोचें।
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Wednesday, January 26, 2011

योग्य आदमी कभी अपनी प्रतिभा का दावा नहीं करते-हिन्दी धार्मिक लेख (yogyata aur pratibha-hindi dharmik lekh)

यह मानवीय स्वभाव है कि वह चाहता है कि उसका व्यक्तित्व दूसरे लोगों को आकर्षक लगे। दूसरों से मान पाने की भावना मनुष्य में तीव्रतर होती है मगर इसके लिये यह जरूरी है कि मनुष्य अपने हाथ से परोपकार के काम करे तथा अपने अच्छे आचरण का उदाहरण समाज के सामने प्रस्तुत करे। इसके लिये यह आवश्यक है कि कुछ कर्म निष्काम भाव से करने के साथ ही उद्देश्य हीन दया की जाये। यह सभी के लिये संभव नहीं है पर भला दिखने की चाहत होने के कारण मनुष्य आत्मप्रवंचना करता है। वह ऐसे कामों को अपने खाते में दिखाता है जो उसने किये ही नहीं-वरन् वह तो हुए भी नहीं।
सारा मनुष्य समुदाय अपना पूरा जीवन अपने तथा परिवार की स्वार्थपूर्ति में लगा देता है पर जहां अवसर मिले वहां अपने को बुद्धिमान तथा परोपकारी साबित करने के साथ ही दयालु होने का दावा करता है। विरले ही ज्ञानी तथा संत प्रवृत्ति के लोग होते हैं जो स्वार्थों की लीक से हटकर समाज के लिये निष्काम भाव से करने के साथ ही निष्प्रयोजन दया करते हैं। ऐसे लोग कभी दावे कर गाते नहीं है।
संत कबीरदास जी कहते हैं कि
.......................................................
बड़ा बड़ाई ना करै, बड़ा न बोले बोल।
हीरा मुख से ना कहै, लाख टका मेरी मोल।
‘‘जो आदमी अपने अंदर बड़प्पन का भाव लेकर जीता है वह बड़ी बातें नहीं करता जिस तरह हीरा कभी अपने मुख से अपनी लाख टके कीमत होने की बात नहीं कहता।’’
आदमी के अंदर अगर योग्यता, प्रतिभा तथा ज्ञान है तो उसके आचरण तथा कर्म से प्रकट होता है। इसलिये ही ज्ञानी लोग अपने जीवन में नियमित कर्म के साथ ही ज्ञान संग्रह का काम भी करते हैं। समय मिलने पर सत्संग तथा हृदय से भगवान की भक्ति करते हैं। उनकी साधना, तप और ज्ञान का प्रकाश स्वयं ही सभी के सामने फैलता है। वह कभी दावा नहीं करते कि वह श्रेष्ठ व्यक्ति हैं। इसके विपरीत जिनके पास न ज्ञान है न साधना और तप करने की प्रवृत्ति वह खाली पीली अपनी डींगें मारते हैं। उनको कोई सामने कहता नहीं क्योंकि उनकी संगत भी तो ऐसे ही लोगों से होती है।
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संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
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Saturday, December 11, 2010

चाणक्य नीति-कृपा और दंड की शक्ति न होने वाला प्रभावहीन (chankya neeti-kripa aur dand ka prabhav)

यस्मिन रुष्टे भयं नास्ति तुष्टे नैव धनाऽगमः।
निग्रहोऽनुग्रहो नास्ति स कष्टः किं कारिष्यति।
हिन्दी में भावार्थ-
जिसके नाराज होने पर किसी प्रकार का भय न हो और जिसके प्रसन्न होने पर भी धन प्राप्ति की आशा न हो और जो दंड देने और कृपा करने की सामर्थ्य नहीं रखता वह अप्रसन्न होकर भी क्या करेगा?
निर्विषणाऽपि सर्पेण कर्त्तव्या महतो फणा।
विषमस्तु न चाप्यस्तु घटाटोपो भयंकर।।
हिन्दी में भावार्थ-
विषहीन सर्प भी समय आने पर अपना फन फैलाता है। इस तरह जीवन में कभी आडम्बर होना भी आवश्यक है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे देश में चाणक्य जैसा कोई राजनीति विशारद नहीं हुआ है। कहने को कथित रूप से हमारे देश के अनेक वरिष्ठ नेता अपने आपको चाणक्य कहलाते हुए प्रसन्न होते हैं पर सच यह है कि कोई उनके चरित्र के सामने पासंग भी नहीं ठहरता। देश के राजकाज में संलग्न लोग केवल अपने घर भरने और अपनी कुर्सी बचाने तक ही अपनी गतिविधियां सीमित रखते हैं। स्थिति यह है कि राजकाज के होने के बावजूद अपराधी तथा राष्ट्रद्रोही तत्व उनसे खौफ नहीं खाते। खज़ाने की लूट में सकिय लोगों के मन में राज्य के दंड का कोई खौफ नहीं है। अधिक बात की क्या जाये हमारे अनेक राजकाज कर्मी किसी को दंड दिलाने की कार्यवाही करें, यह तो सोचना भी व्यर्थ है वह तो ऐसा करने की धमकी भी नहीं दे पाते। राज्य और प्रजा के प्रति अपराध करने वालों का स्तर अब इतना ऊंचा हो गया है कि राज्य काज में संलग्न लोग उनको सलाम ठोकते हैं। विद्वान उनके लिये दलाली का काम करते हैं और प्रजा के प्रहरी उसकी बजाय शिखर पुरुषों की सुरक्षा करते हैं। इसका कारण यह है कि हमारे देश की व्यवस्था को एक मुर्दा सर्प बना दिया गया है। जिसके पास फुफकारने तक की न शक्ति है न इच्छा।
चाणक्य एक महान विद्वान थे। जिन्होंने समाज के लिये राजनीतिक सिद्धांतों का सृजन किया जबकि आज के पेशेवर राजनेता केवल अपने परिवार और मित्रों के लिये स्वार्थ की राजनीति करते हैं। ऐसे में जो नयी पीढ़ी के लोग राजनीति करना चाहते हैं वर चाणक्य की वास्तविक शिक्षा को समझें और उस मार्ग पर चलें तभी इस देश का उद्धार संभव है।
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Sunday, December 5, 2010

मनुस्मृति-प्रजा का शोषक करने वाले की प्राणशक्ति कम होती है (manu smriti-praja ka shoshak raja)

शरीरकर्षणात्प्राणाः क्षीयन्ते प्राणिनां यथा।
तथा राज्ञामपि प्राणाः क्षीयन्ते राष्ट्रकर्षणात्।।
हिन्दी में भावार्थ-
जिस प्रकार शरीर को भोजन पानी न देकर उसका शोषण करने से उसकी प्राणशक्ति कमजोर हो जाती है उसी तरह राष्ट्र या प्रजा का शोषण करने से राजा की प्राणशक्ति कमजोर हो जाती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-जिन लोगों ने मनुस्मृति को नारी तथा निम्न जातियों के लोगों के लिये अपमानजनक बताकर इसको जलाया और अपमान किया वह लोग कौन थे?
यकीनन इनमें से कई लोग अपने अभियान को पूरा कर राजकीय पदों पर सुशोभित हुए। वह मनुस्मृति का दुष्प्रचार कर जनता में भेद डालकर आधुनिक लोकतंत्र के सहारे उसका मत लेकर राजसत्ता चाहते रहे होंगे। वह मिली और आधुनिक पदों के नाम से राजा भी वही लोग बने। वह डरते थे कि मनुस्मृति के अनेक संदेश उनकी आत्मा को रुलायेंगे, उनका सच कोई बतायेगा तो स्वयं का काला चेहरा ही अपने अंतर्मन के कांच में दिखाई देगा। सच से भागने वाले इसे सत्ता भोगियों ने मनृस्मृति से ही न केवल दूर रहने का फैसला किया बल्कि प्रजा को भी दूर रहने का प्रयास आरंभ किया।
हम आज देखें तो देश की क्या हालत है? घोटालों, भ्रष्टाचार तथा आतंक के साये में आम लोग जी रहे हैं। मनृस्मृति में नारी के लिये अपमाजनक टिप्पणियां दिखाने वाले विद्वान आज के युग में ही नारी की पहले से अधिक दुर्गति पर रोते हैं पर उसका हल नहीं बता पाते। वह विद्वान राज्य को दोष देते हैं पर उसी के सहारे उनकी दुकान चल रही है। ऐसा नहीं है कि इस देश में ईमानदार राज्य कर्मी या अधिकारी नहीं हैं पर कुछ लोगों ने अपना वर्चस्व इस तरह स्थापित कर लिया है कि राज्य का केंद्र बिंदु उनके इर्दगिर्द ही घूमता है और वह उसका गलत इस्तेमाल कर अपने लिये घर भरते हैं। इन भ्रष्ट लोगों के मन में बस जनता की शोषण करने की भयानक प्रवृत्ति है। इससे उनकी प्राणशक्ति कमजोर हो गयी है और भले ही वह जनता की रक्षा का कथित दावा करें पर कर नहीं  पाते।
कभी कभी तो प्रतीत होता  है कि आम और गरीब जनता के माध्यम से जो राजस्व आता है उसकी लूट के लिये एक तरह से बहुत सारे गिरोह बन गये हैं। कहीं न कहीं न वह सफेद चेहरा लेकर राज्य के निकट पहुंचकर वह अपना कालाचरित्र धन और पद के सफेद रंग से पोतकर उसे आकर्षक ढंग से सजा लेते हैं। ऐसे लोगों की प्राणशक्ति कमजोर होती है। बाहर से भले ही वह ढीठता दिखायें पर पर अंदर से वह अपने काले कारनामों की वजह से खौफ में जीते हैं। ऐसे में अगर कोई मनृस्मृति के राज्य से जुड़े अंश पढ़कर सुनायें तो उनको लगेगा कि कोई उनका सच ही उनके सामने बयान कर रहा है। प्राणशक्ति से क्षीण ऐसे लोग अज्ञानी पुरुष की तरह सत्य से छिपते और भागते हैं। एक बात याद रखना चाहिए कि समाज और राष्ट्र की सेवा वही कर सकते हैं जिनकी प्राणशक्ति प्रबल है और यह उनके लिये ही संभव है जो गलत काम नहीं  करते।
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Saturday, November 20, 2010

भर्तृहरि नीति संदेश-ज्ञान के भी अनेक प्रभाव(bharathari neeti shatak-gyan ka prabhav)

ज्ञानं सतां मानमदादिनाशनं केषांचिदेतन्मदमानकारणम्
स्थानं विविक्तं यमिनां विमुक्तये कामातुराणामपिकामकरणम्।
हिन्दी में भावार्थ-
ज्ञान संतों के लिये मान और मद का काम करता है। उसी तरह वही ज्ञान दुष्टों के लिये अहंकार तो योगियों के लिये मोक्ष का कारण बनता है। इसके विपरीत कामी पुरुषों के काम को भी बढ़ा देता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-ऐसी बात केवल हमारे अध्यात्मिक दर्शन में भर्तृहरि महाराज जैसे लोग ही संदेश के रूप में दे सकते हैं। ज्ञान दो तरह का होता है एक जीवन तत्व का रहस्य तो दूसरा सांसरिक ज्ञान। जिन लोगों को तत्व ज्ञान है वह जीवन तत्व रहस्य को जान जाते हैं तब उनका जीवन सात्विकता की अग्रसर होता है और वही संत कहलाते हैं। उसी तरह जिनको यही तत्व ज्ञान-जो कि केवल सांसरिकता तक ही सीमित है-आक्रामक भी बना देता है। यह संसार और जीवन नश्वर है यह सोच होने पर अनेक लोग इस जीवन का जमकर उपभोग करना चाहते हैं। इसलिये वह अच्छे और बुरे के भाव से परे होकर ऐसे काम करने लगते हैं। जैसा कि सभी लोग जानते हैं कि रावण एक विद्वान था पर उसने यह मंतव्य धारण कर लिया था कि वह जीवन अपने अनुसार ही व्यतीत करेगा तब अपराध के रास्ते पर ही चला और भगवान श्री राम के बाणों से वध को प्राप्त हुआ।
हालांकि ऐसे अपवाद स्वरूप ही होता है क्योंकि तत्वज्ञान जीवन के प्रति ऐसा आत्मविश्वास देता है जिसे मनुष्य में सकारात्मकता का भाव आने के साथ ही आशाओं को भी संचार होता है। आज नहीं तो इस मायावी संसार में लक्ष्मी का चक्कर अपने घर भी लगेगा यही सोचकर ज्ञानी निष्काम भाव से अपने काम में लगे रहते हैं। वैसे अगर हम देखें तो आज भी अनेक लोग ऐसे हैं जो कहते हैं कि इस जीवन के बाद उनका क्या होगा इसलिये जो करना है वह अभी करेंगे। युवा पीढ़ी में यही सोचकर अंधाधुंध आनंद के लिये दौड़ती रहती है कि अगर यह अवस्था बीत गयी तो फिर तो कुछ लाभ नहीं है। विवाहोपरांत तो बस घर के झंझट ही उनका पूरा जीवन लील लेंगे। देखा जाये तो यह भी एक तरह से यह सीमित तत्व ज्ञान है जो जीवन में आक्रामक बना देता है।

इसके विपरीत जो लोग अध्यात्मिक ज्ञान का पूर्ण अर्थ समझते हैं वह एकांत में बैठकर जीवन और उसके रहस्य का विचार करते हैं। इस सांसरिक जीवन के उतार चढ़ाव के उतार चढ़ाव पर दृष्टि रखते हैं। वह इस चिंतन से पैदा ज्ञान को धारण करते हुए जीवन में तनाव से मुक्ति पाते हैं।
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