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Friday, December 30, 2011

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-उपेक्षासन कर आनंद लें (kautilya ka arthshastra-upekshasan ka anand-economics of kautilya)

               आज के युग में इस तरह के आसन का विशेष महत्व है। पहले तो छोटे राज्यों की वजह युद्ध आमतौर से होते थे पर आधुनिक लोकतंत्र प्रणाली से राज्यों स्वरूप बृहद बन जाने से युद्धों की आशंका समाप्त कर दी है। जब भौतिकवाद में डूबे विश्व समाज के लोग अहंकार और मद में एक दूसरे को नीचा दिखाने में लगे हों और उनसे बहस करने का कोई परिणाम नहीं निकलता हो तब ज्ञानी आदमी के लिये उपेक्षासन एक तरह से ब्रह्मास्त्र की तरह काम कर सकता है। आपसी वार्तालाप में लोग भौतिक साधनों की चर्चा करते हुए अपनी उपलब्धियों का बखान करने से नहीं चूकते। टीवी चैनलों और समाचार पत्रों के साथ इंटरनेट में बाज़ार के विज्ञापनों से प्रेरित होकर उपभोग संस्कृति को बढ़ावा दिया जा रहा है। ऐसे में हमें अपने मन को ऐसी चर्चाओं से मन व्यथित करने की बजाय सात्विक विषयों की तरफ अपना ध्यान ले जाना चाहिए। यह अलग बात है कि इस तरह उपेक्षासन करने पर लोग आपको पौंगापंथी समझें पर सच बात यह है कि इससे आपको आराम मिलेगा। जिस तरह मोर नाचने के बाद अपने गंदे पांव देखकर रोता है उसी आजकल लोग नववर्ष, वैलंटाईन डे तथा अन्य पाश्चात्य पर्व आने पर नाच गाकर और गलत सलत खाकर एंजॉयमेंट यानि आंनद करने का पाखंड करते हैं पर उसके बाद फिर जिंदगी के तनाव उनको घेरकर अधिक दुख देते हैं। पैसा खर्च होने के साथ ही शरीर टूटता है सो अलग।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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आस्त प्रेक्ष्यारिमधिकमुपेक्षासनमुच्यते।
उपेक्षा कृतवानिन्द्र पारिजातग्रहं प्रति।।
              ‘‘जब कोई मनुक्ष्य अपने शत्रु या विरोधी को अपने से अधिक जानकर उसके प्रति उपेक्षा का भाव दिखाता है तब उसे उपेक्षासन कहा जाता है। जब भगवान श्रीकृष्ण ने सत्यभावा के लिये स्वर्ग से कल्पवृक्ष उठा लिया तो देवराज ने अपनी शक्ति को कम मानते हुए उसे युद्ध करने की बजाय उपेक्षासन किया था।"
उपेर्क्षितत्स चान्येस्तु कारणेनेह केन चित्त।
आसनं रुक्मिण इव तदुपेक्षासनं स्पुतम्।।
               ‘‘उसी तरह जिस समय रुक्मणी के भाई रुक्मी ने जब कृष्ण के साथ युद्ध में किसी ने सहायता की तो वह उपेक्षासन कर बैठ गया।’’
                 दरअसल आजकल हम चारों तरफ धन के सहारे फैल रहे आकर्षक वातावरण को देखकर अपने मन में अनेक तरह के सपने पाल लेते हैं। खासतौर से आजकल के मध्यम तथा निम्नवर्गीय युवा फिल्म, इंटरनेट तथा पत्रिकाओं में भौतिकतावाद के चलते आकर्षक संसार के उपभोग का जो सपना देखते हैं वह सभी के लिये साकार होना संभव नहीं है। जिनको विरासत में धन मिलता है वह तो चहकते हैं पर जिनको अपनी रोजी रोटी कमाने के लिये ही संघर्ष करना पड़ता है उनके लिये अपने अभावों का मानसिक तनाव झेलने के अलावा अन्य मार्ग नहीं रह जाता। ऐसे में कुछ युवा बहककर अपराध की तरफ बढ़ जाते हैं। उनके लिये बचने का तो बस यह एक ही मार्ग है कि वह भौतिक संसार के आकर्षण के प्रति उपेक्षासन कर जीवन का आनंद लें।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Tuesday, November 29, 2011

तुलसीदास के दोहे-मधुर वाणी पर सोच समझकर विचार करना चाहिए (tulsi sahitya-madhur vano par sochkar vichar karen)

           आजकल बाज़ार का प्रभाव धर्म तथा समाज के विषयों में बहुत अधिक हो गया है। उपभोग संस्कृति ने लोगों के अंदर अध्यात्म ज्ञान के प्रति विरक्ति पैदा की है जिसके कारण उनके पास सामान्य व्यवहारिक ज्ञान भी नहीं रहा है। लोगों के अंदर पैसा पाने का मोह इतना अधिक हो गया है कि दूसरों की बातों में आकर अपना कमाया भी सब कुछ गंवा बैठते हैं। हमने ऐसे अनेक समाचार सुने और देखे होंगे कि लोगों को अतिशीघ्र अपने धन का दोगुना या चार गुना देकर उनसे भारी रकम की ठगी की गयी। अनेक कंपनियों ने तो शहर में एक नहंी बल्कि चार पांच सौ लोगों को चूना सामूहिक रूप से चूना लगा लिया। यह समाज में अपराध बढ़ने की प्रवृत्ति का परिचायक है पर साथ ही आम जनमानस में बौद्धिक सोच के अभाव का प्रमाण भी है। इस तरह की घटनायें चिंताजनक हैं। दो चार व्यक्ति हों तो ठीक पर यहां तो हजारों के हजारों एक साथ ठगे जाते हैं।
          ठगी करने वाले लोग अपनी मीठी बातों के साथ ही आकर्षण प्रलोभन भी देते हैं। कहीं तो आरंभ में ही उपहार भी दे दिया जाता है। ऐसे में यह सवाल उठता है कि आखिर इतने सारे लोग कैसे जाल में फंस जाते हैं। इसमें फंसने वाले लोग ग्रामीण या अशिक्षित पृष्ठभूमि वाले नहीं वरन् पढ़े लिखे और नौकरीशुदा लोग ही होते हैं। इस तरह आधुनिक शिक्षा को लेकर भी संशय पैदा होता है।
महाकवि तुलसी दास जी कहते हैं कि
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‘तुलसी’ खल बानी मधुर, मुनि समुझिअं हियं हेरि।
राम राज बाधक भई, मूढ़ मंथरा चेरि।।
‘‘कभी किसी की मधुर वाणी सुनकर उस पर मोहित नहीं होना चाहिए। दासी मंथरा ने कैकयी को मधुर वाणी में समझाकार भगवान श्री राम के राज्याभिषेक में बाधा डाली थी।’’
         कभी कभी तो ऐसा लगता है कि हमारे देश के ग्रामीण तथा अशिक्षित लोग कथित आधुनिक समाज से अधिक चतुर हैं। वह भी ठगे अवश्य जाते हैं पर सामूहिक रूप से उनको कोई चूना नहीं लगा सकता। ऐसे में यह सवाल उठता है कि भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान से परे रहकर आधुनिक समाज कहीं बौद्धिक क्षमता खो तो नहीं बैठा है?
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Saturday, October 22, 2011

मनुस्मृति-अतिथि सत्कार पवित्र मनुष्य को प्रदान करना चाहिए (atithi satkar pavitra manushya ka pradan karna chahiye-manu smriti)

       हमारे देश में संस्कार तथा संस्कृति के नाम पर भी कई नारे प्रचलित हो गये हैं। इनमें एक है ‘अतिथि देवो भव‘। इसको लेकर बहुत सारी बातें कही जाती हैं जबकि हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है कि मेहमान की पात्रता तभी स्वीकार्य है जब वह पवित्र मनुष्य हो। ऐसा नहीं है कि हर किसी को घर के दरवाजे पर आने पर मेहमान का दर्जा देकर उसका स्वागत किया जाये। दरअसल इस तरह के नारे अध्यात्मिक ग्रंथों में वर्णित तत्वज्ञान के अभाव में ही समाज में प्रचलित हो गये हैं। कुछ लोग तो यह कहते हैं कि अतिथि सत्कार धर्म का सर्वोच्च रूप है और एक तरह से यज्ञ करने से अधिक श्रेष्ठ है। यह सत्य है कि अगर सुपात्र मनुष्य का अतिथि रूप में सत्कार करना एक तरह यज्ञ ही है पर इसमें पवित्रता का विचार भी होना चाहिए। ज्ञानी लोग हर क्रिया को यज्ञ की तरह मानते हैं। जिस तरह यज्ञ पवित्र स्थान पर पवित्र वस्तुओं से किया जाता है उसी तरह अतिथि सत्कार का धर्म भी पवित्र व्यक्ति को प्रदान किया जाना चाहिए।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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ज्ञानेनैवापरे विप्राः यजन्ते तैमंखेःसदा।
ज्ञानमूलां क्रियामेषां पश्चन्तो ज्ञानचक्षुषा।
            ‘‘तत्वाज्ञानी सभी क्रियाओं को अपने ज्ञान नेत्रों से देखते हुए उसके प्रेरक तत्वों को पहचानते हैं। इस तरह वह अपने ज्ञान से ही यज्ञानुष्ठान करना सबसे महत्वपूर्ण मानते है।
पाषण्डिनो विकर्मस्थान्बैडाव्रतिकांछठान्।
हैंतुकान्वकवृत्तश्चि वांड्मात्रेण्णापि नार्चयेत्।।
          ‘‘पांखडी, दृष्ट, ठग, दूसरों को दुःख पहुंचाने वाला तथा धर्म ग्रंथों में अरुचि रखने भले ही सज्जनता का व्यवहार करे पर उसे कभी मेहमान नहीं बनाना चाहिए। इतना ही नहीं उसका वाणी से भी कभी स्वागत नहीं करना चाहिए।’’
         हमारे देश में पहले शिक्षा के अभाव में लोगों को अध्यात्मिक ग्रंथों का ज्ञान नहीं था तो अब आधुनिक शिक्षा ने उनको एक तरह से विरक्त ही कर दिया गया है। इसलिये चालाक लोग दूसरों को अतिथि सत्कार का धर्म निभाने की राय देते हैं और स्वयं मजे करते हैं। इसलिये यह आवश्यक है कि तत्वज्ञान को समझा जाये। अपनी हर क्रिया को अपने ज्ञान चक्षुओं से देखते हुए यज्ञ होने की अनुभूति की जाये। जीवन में आनंद लेने का यह भी एक तरीका है।
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Sunday, October 9, 2011

सामवेद से संदेश-दोगला व्यवहार आनंद नहीं देता (dogla vyavahar anana nahina deta-samved se sandesh)

             संसार के जिस आदमी ने मिलो यही कहता है कि ‘मै दुखी हूं’, क्योंकि सामान्य मनुष्य सुख तो चाहते हैं पर उसे पाने का कौशल बहुत कम लोग हैं। इसका कारण यह भी है कि संसार में अधिकांश मनुष्य दोहरे आचरण के मार्ग पर चलने वाले हैं। आदर्शों, सिद्धांतों और नैतिकता की दुहाई सभी लोग देते हैं पर व्यवहार में सात्विकता केवल ज्ञानियों में ही दिखाई देती है। ज्ञानी इस बात को जानते हैं कि दोगला व्यवहार हमेशा स्वयं के लिये ही कष्टकारक है। लोग किसी के मित्र नहीं है भले ही दावा करते हों कि उन्होंने ढेर सारे मित्रों से व्यवहार निभाया है। अपने ही आत्मीय जनों की पीठ पीछे निंदा करते हैं। इस बात को जाने बिना बिना कि एक कान से दूसरे कान में पहुंच ही जाती है। नतीजा यह है कि समाज में वैमनस्य भी बढ़ रहा है। हम जब यह कहते हैं कि आजकल समाज में वैसा सद्भाव नहीं है तो यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि उसके लिये स्वयं ही जिम्मेदार हैं।
सामवेद में कहा गया है कि
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मा ते रसस्य मत्सत द्वयाविनः।
            ‘‘दोहरा आचरण करने वाले आनंदित नहीं होते।’
ऋतस्य जिह्वा पवते मधु।
           ‘‘सच्च मनुष्य की जिह्वा से मधु टपकता है।’’
         लोगों की वाणी, विचार तथा व्यवहार स्वार्थों के अनुसार मधुर और कठोर होता है। ताकतवर के आगे सिर झुकाते हैं तो कमजोर पर आग की तरह झपटते हैं। आपसी वार्तालाप में ऐसी पवित्र बातें करते हैं गोया कि महान धार्मिक हों पर व्यवहार में शुद्ध रूप से स्वार्थ दिखता है। ऐसे में संसार या समाज को बिगड़ने का दोष देकर आत्ममंथन से बचना एक दोगला प्रयास है। ऐसे प्रयासों के चलते कोई सुख या आनंद नहीं प्राप्त कर सकता। इसके विपरीत निराशा, तनाव, तथा मानसिक विकारों को मनुष्य शरीर में शासन स्थापित हो जाता है। इसलिये जहां तक हो सके आत्ममंथन कर अपने दोषों का निराकरण करना चाहिए। संसार या समाज के दूषित होने की बात करना व्यर्थ है।
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Tuesday, September 27, 2011

अथर्ववेद से संदेश-प्रभावशाली आदमी परोपकार करने पर ही स्वामी बन सकता है (atharvaved se sandesh-parakravi aur paropakari)

     प्रथ्वी पर स्थित हर जीव का यह स्वभाव है कि वह अपने समाज में श्रेष्ठ दिखना चाहता है। एक वन में एक शेर ही रह सकता है या गली में एक कुत्ता रह सकता है। दो होने पर संघर्ष होता है। मनुष्य भी इससे अलग नहंी है। यह अलग बात है कि वह श्रेष्ठ दिखने के लिये अपनी गली या मोहल्ला खाली नहीं करवाता बल्कि अपनी गतिविधियों से योग्यता प्रमाणित करने का प्रयास करता। प्रयास नहीं भी करे तो अपने मुख से अपनी बड़ाई अवश्य करता है। कुछ लोग तो अपने लिये समाज में विद्यमान शक्ति स्तोत्रों पर अपना वर्चस्व स्थापित करते हैं ताकि उन्हें श्रेष्ठ समझा जाये। समाज के आर्थिक, राजनीतिक, कला तथा धार्मिक शिखरों पर लोग इसलिये पहुंचना चाहते हैं ताकि वह समाज में प्रभावी दिखें। यह अलग बात है कि ऐसे शिखर या संस्थान समाज में  अपनी गतिविधियों से उसकी रक्षा करने के लिये बने होते हैं इसलिये उनके पदों पर बैठे लोग अच्छी नजरों से देखे जाते हैं। मगर अपने पद पर बैठकर समाज का भला करना ऐसे लोगों के बूते का नहीं होता जो कि केवल इन पर बैठना ही अपना धर्म समझते हैं।
अथर्ववेद में कहा गया है कि
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भूतो भूतेष पयाआ दधाति स भूतानामाधिपतिर्वभव।
      ‘‘जो स्वयं प्रभावशाली बनकर सब लोगों की सहायता करता है वह सबका स्वामी हो जाता है।’’
ओम्सूर्यमन्यान्तस्वापाचयुर्ष जागृततादहमिन्द्र इवारिष्टो अक्षितः।
              ‘‘अन्य लोग भले ही सोते रहें पर पराक्रमी मनुष्य हानि तथा ह्रास से रहित होकर जागता रहे।’’
        लोग समाज के उच्च शिखर पदों पर बैठकर आत्ममुग्ध हो जाते हैं कि वह तो अब समाज के प्रभावशाली लोग हैं और उनको अब कुछ करने के लिये जरूरत नहीं है। वह अपना सारा काम मातहतों के सहारे छोड़ देते हैं जिनका लक्ष्य समाज का भला करना नहीं बल्कि अपने मालिक को प्रसन्न करना ही ध्येय रह जाता है। इस तरह हमारे देश में प्रभावशाली लोगों का बहुत बड़ा झुंड है पर समाज निरंतर गर्त में जा रहा है। प्रभावशाली होने के लिये चतुर होने के साथ ही पराक्रमी होना जरूरी है जबकि हम देख रहे हैं कि चालाक लोगों की सीमा केवल पद प्राप्त करना ही रह गया है।
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Saturday, September 10, 2011

भर्तृहरि नीति शतक-मायावी धन आदमी को घुमाता रहता है (money and man-bhrtrihari neeti shatak)

             मनुष्य का यह स्वभाव है कि वह अगर धनार्जन करता है तो उसे व्यय के लिये भी तत्पर रहता है। जैसे जैसे उसके पास धन संपदा बढ़ती है अपना वैभव दिखाने के लिये वह उतना ही उतावला होता हैै। अगर कोई अल्पधनी अपनी मेहनत से धनवान हो जाता है तो उसे इस बात की प्रसन्नता कम होती है बल्कि वह इस चिंता को अधिक पाल लेता है कि वह अपने वैभव का प्रदर्शन समाज के सामने कर अपनी गरीब की छवि से मुक्ति पाये।
         नवधनाढ्य आदमी समाज के सामने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने कें लिये अनेक पदार्थों का संचय करता है। अपनी चाल ढाल से वह यह सिद्ध करने का प्रयास करता है कि वह अब धनवान हो गया है। यही कारण है कि हमारे देश में धनवानों की बढ़ती संख्या के कारण भौतिक पदार्थों के संचय के साथ ही विलासिता का प्रदर्शन भी तेज हो गया है।
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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परिक्षीणः कश्चित्स्पृहयति यवानां प्रसृतये स पश्चात्सम्पूर्णः कलयति धरित्रीं तृणसमाम्।
अतश्चानैकान्त्याद् गुरु लघुतयाऽर्थेषु धनिनामवस्था वस्तुनि प्रथयति च संकोचयति च।।
         ‘‘जब मनुष्य गरीब होता है तब वह अपने रहने के लिये एक गज जमीन की चाहत करता है पर जब अमीर होने पर वही पूरे भूमंडल की कामना करने लगता है। इस संसार में अनेक पदार्थ हैं और अमीरी गरीबी के अनुसार उनको पाने की कामना बदलती रहती है। वस्तुओं का महत्व भी मनुष्य की आर्थिक स्थिति के अनुसार बदलता रहता है।"
            जहां तक धन कम या ज्यादा होने का सवाल है तो यह त्रिगुणमयी माया अपने रंग रूप इंसान को इस तरह दिखाती है कि वह उसी को ही सत्य मानकर उसके इर्दगिर्द घूमता रहता है। अपनी आत्मा और परमात्मा विषयक अध्यात्म ज्ञान उसके लिये सन्यासियों का विषय होता है। धन न होने पर आदमी अपने सांसरिक संघर्ष में निरंतर व्यस्त रहता है इसलिये सत्संग तथा ज्ञान चर्चा उसके लिये दूर की कौड़ी हो जाती है तो धन आने पर आदमी ऐसे सात्विक स्थानों पर भी अपने राजस भाव का प्रदर्शन बहुत उत्तेजना के साथ करता है जहां अध्यात्मिक विषयक विचार हो रहा है। मजे की बात यह है कि धनवान लोगों को यह भ्रम रहता है कि उनके पास अध्यात्मिक ज्ञान है वह उसका बखान भी करते हैं। यह अलग बात है कि उनकी वाणी के पीछे ज्ञान का नहीं  वरन् धन का ओज होता है। उनके सामने प्रस्तुत लोग ज्ञान बघारते समय भले कुछ न कहें पर पीठ पीछे  उन पर हंसते हैं। वजह साफ है, ज्ञान का प्रमाण भौतिक पदार्थों की उपलिब्ध नहीं वरन! उनका त्याग है।
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Friday, August 12, 2011

भारतीय वेद शास्त्रों से-एक हाथ से अभिवादन करना अधर्म का प्रमाण (ek hath se abhivadan amuchit-bhartiya ved shastron se)

           हमारे देश में अनेक प्रकार के सांस्कृतिक विरोधाभास रहे हैं और जैसे जैसे अंग्रेज सभ्यता ने यहां पांव पसारे तो वह अधिक बढ़े भी हैं। एक तरफ हमारे देश के लोग अपने रक्त प्रवाह में बह रहे प्राचीन संस्कारों को विस्मृत नहीं कर पाते दूसरी तरफ पाश्चात्य सभ्यता में रचबसकर आकर्षक दिखने का मोह उसे ऐसे कर्मो के लिये प्रेरित करता है जो न केवल अधार्मिक बल्कि हास्यास्पद भी होते हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण अभिवादन का तरीके भी हैं जो आजकल हम अपना रहे हैं। एक तो हम लोग अभिवादन के समय हाथ मिलाते हैं दूसरा यह कि एक हाथ हिलाकर कुछ शब्द बुदबुदा देते हैं जैसे कि ‘हलो’ या फिर ‘क्या हाल हैं’ आदि। हाथ मिलाने की प्रक्रिया को तो अब पश्चिमी चिकित्सा विशेषज्ञ भी नकारने लगे हैं। उनका कहना है कि इससे एक मनुष्य के हाथ में जो विषैले जीवाणु हैं वह दूसरे में प्रविष्ट कर जाते हैं इससे स्पर्श के माध्यम से फैलने वाले रोगों के संचरण की आशंका रहती है। एक हाथ हिलाकर अभिवादन करना पश्चात्य सभ्यता में बड़े लोगों का तरीका है। जहां भीड़ है वहां नेता, अभिनेता और खिलाड़ी एक हाथ हिला हिलाकर लोगों का अभिवादन करते हैं। इसमें कहीं न कहीं देह का अहंकार बाहर प्रकट होता है। यही कारण है कि पश्चिम में भी कुछ लोग दोनों हाथ हिलाकर अभिवादन करते हैं।
एक हाथ से अभिवादन करना हमारे धर्म ग्रंथों में वर्जित किया गया है।
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जन्मप्रभृति यत्किंचित् सुकृतं समुपार्जितम्।
तत्सर्व निष्फलं याति एकहस्ताभिवादनात्।।
       ‘‘एक हाथ से कभी अभिवादन नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से पूरा जीवन और पुण्य निष्फल हो जाता है।’’
           हमारे देश में दोनों हाथ जोड़कर अभिवादन या प्रणाम करने की परंपरा है पर आजकल कुछ लोग ऐसे हैं जो हाथ मिलाने की औपचारिकता से समय बचाने या फिर किसी अनावश्यक व्यक्ति के सामने होने पर उसका एक हाथ से अभिवादन कर आगे बढ़ जाते हैं। इससे यह तो स्पष्ट होता है कि अभिवादन करने वाला आदमी दूसरे को जानता है पर वह उससे रुककर बात नहीं करना चाहता। अपने को सभ्य साबित करने के लिये अभिवादन भी वह जरूरी समझता है इसलिये एक हाथ हिला देता है। यह एक अधार्मिक व्यवहार है। इससे तो अच्छा है कि मुंह ही फेर लिया जाये कि सामने वाले को देखा ही नहीं। हमारे देश में दोनों हाथों से प्रणाम और अभिवादन करने की जो परंपरा है वह विश्व में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। इसमें न एक व्यक्ति दूसरे का स्पर्श करता है न एक ही अधर्म की प्रक्रिया में लिप्त होता है। जब किसी व्यक्ति का अभिवादन करना ही है तो फिर एक हाथ का उपयोग क्यों करें? दोनों हाथों की सक्रियता इस बात का प्रमाण होती है कि हम हृदय से दूसरे व्यक्ति का सम्मान कर रहे हैं।
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Tuesday, August 9, 2011

वेद शास्त्रों से-विषयों से रसरहित होना ही मोक्ष है (ved shastron se-vishayon se ras rahit hona moksh)

        हमारे देश के अनेक कथित ज्ञानी अपने अल्पज्ञान से लोगों को मोक्ष का गलत पाठ पढ़ाते हैं। इसका आशय यह है कि मनुष्य मरने के बाद पुनः इस संसार में न लौटे। इससे अनेक लोग घबड़ा जाते हैं। हर मनुष्य यह चाहता है कि वह इस संसार में पुनः मनुष्य यौनि में ही आये। उसकी इस भावना का धर्म के ठेकेदार बहुत लाभ उठाते हैं और उसे दान पुण्य कर सकाम भक्ति के लिये प्रेरित करते हैं। इतना ही नहीं मनुष्य यौनि से पहले स्वर्ग का सुख भोगने की भी यह लोग गांरटी देते हैं। इस तरह धर्म एक सीमित अर्थ वाला विषय रह गया है। दरअसल मोक्ष का मतलब यह कतई नहीं है कि मरने के बाद आदमी फिर इस संसार में नहीं लौटेगा। अभी तक यह तय नहीं है कि मनुष्य या अन्य जीवों का इस संसार में लौटना होता है कि नहीं। आत्मा अमर है यह निश्चित है पर परमात्मा अनंत है और उसकी लीला को वही जानता है।
        दरअसल हमारा अध्यात्म मनुष्य को मन पर इस तरह नियंत्रण करना सिखाता है कि वह कम से कम इस अलौकिक मनुष्य यौनि में अपना जीवन व्यर्थ के विषयों के बर्बाद न करे। आनंद का अर्थ समझे। वरना तो स्थिति यह होती है कि आदमी अपने मन को प्रसन्न करते हुए अनेक साधन जुटा लेता है पर सुख ले नहीं पाता। सुख कोई दिखने या हाथ आने वाली चीज नहीं है बल्कि अनुभूति का विषय है और यही समझने वाले ज्ञानी कहलाते हैं जिनकी संख्या उंगलियों पर गिनने लायक हैं।
वेदशास्त्रों में कहा गया है कि
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मोक्षो विषयवैरस्यं बन्धो वैषयिको रसः।
सतावदेव विज्ञानं यथेच्छसि तथा कुरु।।
           ‘‘विषयों में से रस का चला जाना ही मोक्ष है और विषयों में रस का होना ही बंधन है। विज्ञान इतना ही। वैसे जिसकी इच्छा है वही काम करे।’’
इन्द्रियाण विचरतां विषयेष्वपहारिषु।
संयम यत्नमातिष्ठेद् विद्वान् यन्तेव वाजिनाम्।।
             ‘इंद्रियों का स्वभाव है कि वह विषयों में ही विचरती हैं। मनुष्य को कुशल सारथि की भांति उन पर नियंत्रण करना चाहिए।’’
        किसी वस्तु की प्राप्ति से पहले आदमी संघर्ष करता है पर बाद में वह कितना सुख अनुभव कराती है यह कौन विचार करता है। आसक्ति वस्तु प्राप्त करने तक ही सीमित है पर उसके उपयोग से सुविधा मिलती है न कि सुख का अनुभव होता है। सुख या आनंद त्याग में है। किसी वस्तु के मिलने पर हर्ष या न मिलने पर जब निराशा न हो तब यह समझना चाहिए कि हमने मोक्ष पा लिया। आसक्ति तनाव का कारण बनती है और विरक्ति सहजता का भाव पैदा करती है। इसी विरक्ति को मोक्ष कहा जाता है। मोक्ष का मतलब है आसक्ति का मर जाना। आसक्ति मरने का मतलब है तनावरहित जीवन गुजारना। यही ज्ञान और विज्ञान है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Saturday, July 30, 2011

संतकबीर दर्शन-सत्संगति से मन की कल्पना और कलह दूर होती है

        यह सही है कि हमारे अध्यात्मिक दर्शन में हर तरह की भक्ति को स्वीकार किया जाता है पर उसमें कहींे भी यह नहीं कहा गया है कि कोई जगह सिद्ध है या कहीं जाने से अमुक लाभ होता है। साकार और निराकार भक्ति दोनों को हृदय से करने पर मनुष्य को लाभ होता है पर यह तभी संभव है जब वह निष्काम भाव से की जाये।
         हमारे अध्यात्मिक दर्शन में निराकार और निष्काम भक्ति की धारण को प्रतिपादित किया गया है पर यह केवल ज्ञानी लोगों के लिये ही संभव है। सामान्य लोगों के लिये यह कठिन है और शायद इसलिये मूर्तिपूजा के माध्यम से उसे ध्यान लगाने की कोशिश को मान्यता दी गयी। यह अच्छी बात है पर इससे हुआ यह कि कुछ लोगों ने अपनी व्यवसायिक सुविधा के लिये मूर्तियों मंदिरों और पहाड़ों की सिद्धि का प्रचार किया। जिससे देश में अनेक तीर्थकेंद्र बन गये और वहां जाना ही धर्म का निर्वाह घोषित किया गया। जैसे जैसे समाज भौतिकता के विकास में उलझा उसका विवेक सिकुड़ता गया। मगर मन तो मन है वह आदमी को नचाता है। जिनके पास धन है वह उसे खर्च कर सिद्ध स्थानों पर पर्यटन की दृष्टि से जाते हैं तो जिनके पास समय है वह भी कष्ट उठाकर वहां अपनी आस्थाओं निभाने जाते हैं। एक तरह से यह मान लिया गया है कि भक्ति रूपी यह मनोरंजन ही प्रसन्न रहने का साधन है। ज्ञान चर्चा और सत्संग को तो भक्ति का रूप ही नहीं माना जाता है जबकि मन और विचारों की शुद्धि के लिये यही आवश्यक है।
कबीरदास जी कहते हैं कि
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कबीर कलह रु कल्पना, सत्संगति से जाय।
दुख वासो भागा फिरै, सुख में रहै समाय।।
          मन की सभी प्रकार की कलह और कल्पनायें सत्संगति से परे होती हैं। ऐसे में दुख भी उससे भागा फिरता है और आदमी का मन सुखी रहता है।’’
मथुरा काशी द्वारिका हरिद्धार जगनाथ।
साधु संगति हरिभजन बिन, कछु न आवै हाथ।।
           ‘‘चाहे मथुरा हो या काशी, द्वारिका, हरिद्वार और जगन्नाथ हो उसे घूमने से कुछ हाथ नहीं आता। इससे अच्छा तो साधु संगति और हरिभजन में लिप्त होने से मन वैसे ही प्रसन्न होता है।’’
           जिन महापुरुषों ने मूर्तिपूजा को मान्यता दी होगी उनका उद्देश्य यही रहा होगा कि अभ्यास करते हुए कालंातर में लोग निराकार की कल्पना करने लगेंगे पर हुआ यह कि लोग केवल से ही भक्ति समझने लगे हैं। परिणाम यह है कि हमारे देश में भक्तिभाव के नाम पर धार्मिक स्थानों पर भारी भीड़ लगती है पर जब उसका प्रभाव देखते हैं तो आचरण में निरंतर आती गिरावट निराश करती है। लोग भक्ति करते हैं पर तनाव मुक्त नहंी दिखते। इसका मतलब साफ है कि सत्संग और ज्ञान चर्चा से जब तक विचार और मन की शुद्ध नहीं होगी तब मनुष्य शांति नहीं पा सकता।
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Wednesday, July 27, 2011

भर्तृहरि शतक-अल्पधनी और नवधनाढ्य इतराते हैं (bhartri shatak-alpadhani aur navdhanadhya)

         हमारे देश में विकास बढ़ रहा है तो साथ में एक ऐसा वर्ग भी पैदा हो रहा है जिसके लिये अधिक धन मानसिक रूप से विकृत होने का कारण बन रहा है। अनेक लोगों के पास इतना धन आ रहा है कि वह समझते ही नहीं कि उसको खर्च कहां करें? उनमें स्वयं और उनके परिवार के लोगों में धन का अभिमान इस कदर घर कर जाता है कि वह समझते हैं कि उनके आगे निर्धन या अल्पधनी तो पशुओं जैसा जीव है। वैसे भी हमारे अनेक सामाजिक विशेषज्ञ नवधनाढ्यों में बढ़ती अपसंस्कृति को लेकर चिंतित है। समाज में अनेक प्रकार के वर्ण, वर्ग तथा भाषा समूंहों में वैमनस्य बढ़ रहा है। इसका मुख्य कारण यही है कि एक तरफ ऐसे लोग हैं जिनके पास धन की बहुतायत है दूसरी तरफ ऐसे भी है जिनके पास खाने के लिये भी पर्याप्त नहीं है। पाश्चात्य सभ्यता के चलते जहां दान, दया और परोपकार की प्रवृति का हृास हुआ है वहीं नवधनाढ्यों के अहंकार ने समाज में संवदेनहीनता का ऐसा वातावरण बना दिया है जो अंततः वैमनस्य का कारण बनता है।
       नीति विशारद भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि
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            विपुलहृदयैरीशैरेतज्जगज्जनितं पुरा विधृतमपरैर्दत्तं चान्यैर्विजित्य तृणं यथा।
           इह हि भुवनान्यन्यै धीराश्चयतुर्दशभुञ्जते कतिपयपुरस्वाम्ये पुंसां क एष मदज्वर।।
           ‘‘बहुत समय पहले उदारचित्त महापुरुषों ने इस धरती को अपनाया। कुछ ने इसका जमकर उपभोग किया। कुछ ने इसे प्राप्त कर दूसरों को दान दिया। आज भी कई महान बलशाली राजा धरती के विशाल भूभाग के स्वामी हैं पर उनको अभिमान तनिक भी नहीं है। मगर जो कुछ ही गांवों में स्वामी है वह अपनी संपत्ति पर इतराते हैं।
        अब यह स्थिति है कि जिनके पास धन है वह दान, या परोपकार कर समाज में प्रभुत्व स्थापित करने की बजाय उसका अनाप शनाप खर्च कर अपने वैभव दिखाना चाहते हैं। यही कारण है कि समाज के असंतोष तत्व अपराध की तरफ भी आकृष्ट हो रहे हैं। कभी कभी तो लगता है कि ऐसे अनेक लोगों के पास धन आ गया है जो उसे पाने योग्य ही नहीं है या फिर उनको धन पचाने का मंत्र नहीं मालुम। हम देख रहे हैं कि देश में उपभोग संस्कृति का प्रचार हो रहा है जिससे अध्यात्मिक ज्ञान के प्रति लोगों का रुझान न के बराबर रह गया है। जबकि अध्यात्मिक ज्ञान के बिना मनुष्य दंभी, लालची और कामुक हो जाता है और उसमें पशुवत व्यवहार करने की इच्छा बवलती हो उठती है।
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Saturday, July 9, 2011

वेद शास्त्रों से-कर्म और फल का कोई नियम नहीं है (ved shastron se-karma aur fal ka niyam nahin)

        किसी भी कर्म का फल मिलता है उसमें देर सबेर हो सकती है। हालांकि यह कोई नियम नहीं है कि सभी कर्मों का फल कर्ता की इच्छानुसार प्राप्त हो। शायद यही कारण है कि हमारे यहां अध्यात्मिक दर्शन में सांसरिक कर्म में निष्काम कर्म की बात कही गयी है।
वेदांत दर्शन में कहा गया है कि
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उपलब्धिवदनियमः।
‘‘भोगों की प्रप्तियों की भांति कर्म करने में भी कोई नियम नहीं है।
यथा तक्षाभयथा।
इसके सिवाय जैसे कारीगर कभी काम करता है कभी नहीं करता है।
          वैसे फल की इच्छा करते हुए जब कर्म किया जाता है तो हमारा मन विचलित होने के साथ मस्तिष्क की एकाग्रता भंग होने की आशंका रहती है और कर्म उचित प्रकार से संपन्न नहीं हो पाता। दूसरी बात यह भी है कि जब कर्म के बाद फल प्राप्त नहीं होता या उसमें विलंब होता है तो व्यर्थ का तनाव पैदा होता है। हमें यह समझना चाहिए कि प्रकृति भी एक कारीगर की तरह है जो कभी कर्म करती है कभी नहीं करती है। मनुष्य का यह धर्म है कि वह अपना नियमित कर्म करे पर फल देने या न देने की का निर्णय प्रकृति पर छोड़ देना चाहिए।
मूल बात यह है कि हमें अधिक अपेक्षायें, इच्छायें और कामनायें मन में नहीं रखना चाहिए। कालांतर में उनके पूर्ण होने पर सुख मिलता है और न मिलने पर दुःख होने लगता है। तत्वज्ञानी इसलिये ही सुख, दुख, प्रसन्नता, शोक तथा मान सम्मान से परे हो जाते हैं क्योंकि वह जानते है इस संसार में सभी चीजें नश्वर हैं। सत्य जहां सूक्ष्म और स्थिर है वहीं माया विस्तार पाने के साथ ही रूप बदलती है। उत्पन्न होकर नष्ट होना फिर प्रकट होना माया की सामान्य प्रकृति है। जिस तरह सत्य या परमात्मा अनंत है वैसे ही माया भी अनंत है। उसके नियम समझना भी कठिन है।
इसके विपरीत सामान्य मनुष्य माया को अपने वश करने कें लिये पूरी जिंदगी दाव पर लगा देता है पर हाथ उसके कुछ नहीं आता। खेलती माया है उसके नियम अज्ञात हैं फिर भी आदमी यही सोचता है कि वह अपने नियमों के अनुसार खेल रहा है।
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Friday, July 1, 2011

अध्ययन करने से पहले और बाद में आंखों से पानी को स्पर्श करना उपयोगी-हिन्दी चिंत्तन लेख (study, word and water-hindi chinttan lekh)

          वायु तथा जल को न केवल जीवन का आधार माना गया है कि बल्कि उनको ओषधि भी कहा जाता है। जिस तरह प्रातः प्राणायाम से शुद्ध वायु के प्रवेश से शरीर और मन के आंतरिक विकार बाहर निकलते हैं उसी तरह नहाने के दौरान जल के उपयोग से बाहरी अंगों पर शुद्धता आती है। आधुनिक विज्ञान जल की उपयोगिता को लेकर अनेक अनुंसधान कर चुका है। हालांकि हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों में भी इस विषय पर अनेक बातें कही गयी है।
          मनु स्मृति में कहा गया है कि
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            कृत्वा मूत्रं पूरीपं वा खान्याचान्त उपस्पृशेत्।
            वेदमध्येध्माणश्च अन्नमश्नंश्च सर्वदा
       "मल मूत्र करने के बाद व्यक्ति को सदैव हाथ धोकर आचमन करने के साथ ही पानी का स्पर्श आंखों पर करना चाहिए। सदैव वेद पढ़ने तथा भोजन करने से पहले भी हाथ धोकर आचमन करना चाहिए।"
                आजकल कंप्यूटर का उपयोग बढ़ता जा रहा है पर उससे होने वाली हानियों से रोकने और बचने के उपाय बहुत कम  लोग जानते हैं। कुछ स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि कंप्यूटर का उपयोग करने वालों को बीस मिनट से अधिक उस पर काम करने के बाद दो मिनट आंखें बंद रखना चाहिए। इसके अलावा कंप्यूटर से उठकर बाहर आसमान में ताकना चाहिए ताकि आंखों के उन सूक्ष्म तंतुओं का विस्तार होता है जो काम के दौरान सिकुड़ जाते है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कही गयी है कि कंप्यूटर पर काम करने वालों को अपनी आंखों में पानी की छींटें मारते रहना चाहिए। कंप्यूटर पर काम करते हुए आंखों में जल सूखने लगता है और आंखों में छींटे मारने से वहां ताजगी आती है। मनृस्मृति में भी कहा गया है कि वेद आदि का अध्ययन करने से पहले और बाद दोनों ही समय आंखों में जल का प्रवेश कराना चाहिए। यही बात हम कंप्यूटर पर काम करते समय भी लागू कर सकते हैं। ऐसे प्रयासों से बहुत सीमा तक कंप्यूटर से होने वाली हानियों से बचा जा सकता है।
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Wednesday, June 29, 2011

कबीर संदेश-लोग कर्मकांडों को धर्म के भ्रम मे पालते हैं (kabir sandesh-karmkand aur dharma)

          मूलतः भारतीय समाज प्रगतिवादी माना जाता है। हालांकि कुछ विदेशी भारतवासियों की धर्मभीरुता का मजाक उड़ाते हैं पर जिस तरह हमारा समाज समय के अनुसार नई शिक्षा, विज्ञान तथा साधनों के उपयोग की तरफ प्रवृत्त होता है उससे यह प्रमाणित होता है कि रूढ़ता का भाव उसमें नहीं है पर इसके बावजूद फिर भी धर्म के नाम पर अनेक कर्मकांड हैं जिसे लोग केवल सामाजिक दबाव में इसलिये अपनाते हैं कि लोग क्या कहेंगे। आधुनिक शिक्षा से जीवन में आगे बढ़े लोग भी अंधविश्वास और कर्मकांडों पर इसलिये विश्वास करते दिखते हैं क्योंकि उन पर कहीं न कहीं से दूसरे लोगो का दबाव होता है। स्थिति यह है कि अनेक धार्मिक ठेकेदार तो इन्हीं कर्मकांडों को ही धर्म का आधार कहकर प्रचारित करते हैं।
            इस विषय पर संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि
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            ‘कबीर’ मन फूल्या फिरै, करता हूं मैं ध्रंम।
                कोटि क्रम सिरि ले चल्या, चेत न देखै भ्रम।।
          "आदमी अपने सिर पर कर्मकांडों का बोझ ढोते हुए फूलता है कि वह धर्म का निर्वाह कर रहा है। वह कभी अपने विवेक का उपयोग करते हुए इस बात का विचार नहीं करता कि यह उसका एक भ्रम है।"
              संत कबीरदास जी ने अपने समाज के अंधविश्वासों और कुरीतियों पर जमकर प्रहार किये हैं। कितने आश्चर्य की बात है कि अनेक संत और साधु उनके संदेशों को ग्रहण करने का उपदेश तो देते हैं पर समाज में फैले अंधविश्वास और कर्मकांडों पर खामोश रहते हैं। आदमी के जन्म से लेकर मृत्यु तक ढेर सारे ऐसे कर्मकांडों का प्रतिपादन किया गया है जिनका कोई वैज्ञानिक तथा तार्किक आधार नहीं है। इसके बावजूद बिना किसी तर्क के लोग उनका निर्वहन कर यह भ्रम पालते हैं कि वह धर्म का निर्वाह कर रहे हैं। किसी कर्मकांड को न करने पर अन्य लोग नरक का भय दिखाते हैं यह फिर धर्म भ्रष्ट घोषित कर देते हैं। इसीलिये कुछ आदमी अनचाहे तो कुछ लोग भ्रम में पड़कर ऐसा बोझा ढो रहे हैं जो उनके दैहिक जीवन को नरक बनाकर रख देता है। कोई भी स्वयं ज्ञान धारण नहीं करता बल्कि दूसरे की बात सुनकर अंधविश्वासों और रूढ़ियों का भार अपने सिर पर सभी उसे ढोते जा रहे हैं। इस आर्थिक युग में कई लोग तो ऋण लेकर ऐसी परंपराओं को निभाते हैं और फिर उसके बोझ तले आजीवन परेशान रहते हैं। इससे तो अच्छा है कि हम अपने अंदर भगवान के प्रति भक्ति का भाव रखते हुए केवल उसी कार्य को करें जो आवश्यक हो। अपना जीवन अपने विवेक से ही जीना चाहिए।
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Tuesday, June 28, 2011

संत कबीर वाणी-मनुष्य को अपनी देह का ज्ञान नहीं होता (sant kabir wani-manshya deh ka gyan)

           भारतीय योग विधा के बारे में अनेक लोग अनेक तरह के प्रचार करते हैं पर यह बात कम ही लोग बताते हैं कि योग साधना के अभ्यास से मनुष्य को अपनी देह और आत्मा के बीच के अंतर का आभास स्वतः होने लगता है। अज्ञानी मनुष्य देह को सर्वस्व मानकर पूरा जीवन नष्ट कर देता है जबकि ज्ञानी योग साधक अपने अभ्यास से देह और आत्मा के साथ ही परमात्मा के तत्व का भी आभास कर जीवन मजे से गुजारते हैं
सामान्य मनुष्य आंखों से देखते हैं पर दृश्य के संपूर्ण तत्व उनमें प्रविष्ट नहीं होते। अच्छे दृश्य का जहां वह पूरा आनंद नहीं उठा पाते वही बुरे दृश्य उनको अंदर तक हिला देते हैं। उसी तरह हर आदमी कान से अपनी प्रशंसा के साथ ही अपने को अच्छी बातें सुनना चाहता है। तत्व ज्ञान की बात सुनने की बजाय वह अपनी वाणी से सांसरिक बातों की बखान करता है।
             इस विषय पर संत कबीर कहते हैं कि
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            आंखि न देखि बावरा, शब्द सुनै नहिं कान।
           सिर के केस उज्वल भये, अबहुं निपट अज्ञान।।
          ‘‘संसार के लोगों को अपनी देह के संचालन का ही ज्ञान नहीं है। इन पगली आंखों से बावला नहीं देखता और न ही कानों से अच्छी बात सुनता है। सिर के बाल भी सफेद हो जाने पर भी लोग अज्ञानी बने रहते हैं।’’
             नर नारायन रूप हैं तू मति जानै देह।
            जो समझे तो समझ ले, खलक पलक में खेह।।
       ‘हे मनुष्य! तुम साक्षात नारायण हो इसलिये अपने को केवल देह मत जान। समझना है अपनी देह से प्रथक उस परमात्मा को समझ जो तेरी आत्मा का आधार है।’’
         कहने का अभिप्राय है कि देह से अलग आत्मा और आत्मा के अस्तित्व का ज्ञान होने पर जीवन का आनंद कम होने की बजाय बढ़ जाता है। जिन लोगों के पास अध्यात्मिक ज्ञान नहीं है वह अपने बाल सफेद हो जाने पर भी अज्ञानी बने रहते हैं। कुछ लोगो को लगता है कि तत्वज्ञान से आदमी जीवन से विरक्त हो जाता है यह बात गलत है। दरअसल तत्वज्ञानी जीवन में व्यर्थ चेष्टा, प्रमाद और निंदा से परे रहते हैं तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि वह असांसरिक लोग हैं।

लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',ग्वालियर
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Friday, June 17, 2011

बंदर की तरह उछलकूद कर समाजसेवा नहीं होती-रहीम के दोहे (bandar ki tarah samaj seva-rahim ke dohe)

कविवर रहीम कहते है 
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बड़े दीन को दुख, सुनो, लेत दया उर आनि
हरि हाथीं सौं कब हुतो, कहूं रहीम पहिचानि

         "इस संसार में बड़े लोग तो वह जो छोट आदमी की पीड़ा सुनकर उस पर दया करते हैं, परंतु बंदर कभी हाथी नहीं हो सकता-कुछ लोग बंदर की तरह उछलकूद कर दया दिखाते हैं पर करते कुछ नहीं। वह कभी हाथी नहीं हो सकते।"
            हमारे देश में हमेशा  ही दान तथा परोपकार के जरिये समाज सेवा करने की परंपरा रही है।  यही कारण है की हमारे अधिकतर धार्मिक स्थानों पर तीर्थयात्रियों के धर्मशालाएँ बनवाईं गईं।  वहाँ लंगरखाने बनवाए गए। अब पाश्चत्य संस्कृति के प्रभाव ने समाज सेवा को न केवल व्यापार बना  दिया है बल्कि उसके लिए पैसा दूसरों से लेकर लोगों के कल्याण करने की परंपरा विकसित  की गई है। जिसे हम समाज सेवा की दलाली भी कह सकते हैं। यही कारण है कि आजकल बच्चों, विकलांगों, महिलाओं और तमाम के तरह की बीमारियों के मरीजों की सहायतार्थ संगीत कार्यक्रम, क्रिकेट मैच तथा अन्य मनोरंजक कार्यक्रम होते हैं-जो कि मदद के नाम पर दिखावे से अधिक कुछ नहीं है।  ऐसे कार्यक्रमों में  केवल बंदर की तरह उछलकूद होती है। ऐसे व्यवसायिक कार्यक्रम तो तमाम तरह के आर्थिक लाभ के लिये किये जाते हैं। जो सच्चे समाज सेवी हैं वह बिना किसी उद्देश्य के लोगों की मदद करते है, और वह प्रचार से परे अपना काम वैसे ही किये जाते हैं जैसे हाथी अपनी राह पर बिना किसी की परवाह किये चलता जाता है।
            समझदार लोग तो सब जानते हैं पर कुछ बंदर की तरह उछलकूद कर समाजसेवा का नाटक करने वालों को देखकर इस कटु सत्य को भूल जाते है। कई लोग ऐसे कार्यक्रमों की टिकिट यह सोचकर खरीद लेते हैं कि वह इस तरह दान भी करेंगे और मनोरंजन भी कर लेंगे। उन्हें यह भ्रम तोड़ लेना चाहिये कि वह दान कर रहे हैं क्योंकि सुपात्र को ही दिया दान फलीभूत होता है। अतः हमें अपने बीच एसे लोग की पहचान कर लेना चाहिए जो इस तरह समाज सेवा का नाटक करते है। इनसे तो दूर रहना ही बेहतर है।
       
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Friday, May 27, 2011

चाणक्य नीति से संदेश-दुष्ट मनुष्य के सभी अंगों में विष रहता है (chanakya neeti se sandesh-dushta manushya ke sabhi angon mein vish)

          समुद्र मंथन के समय जब इस संसार में अमृत प्रकट हुआ तभी विष भी उत्पन्न हुआ। देवताओं ने अमृत का सेवन किया तो विष को भगवान शंकर ने पी लिया जिससे उनका कंठ नीला हो गया और वह नीलकंठ है। विष या अमृत केवल पेय द्रव्य नहीं है बल्कि उसका अभौतिक रूप भी है। जिस तरह सर्प, मक्खी तथा बिच्छू में रस के रूप में विद्यमान रहता है वैसे ही मनुष्य के भाव में उसकी उपस्थिति देखी जाती है। विषैले स्वभाव वाले लोग दूसरों को कष्ट देकर खुश होते हैं। उनके मन में ही दूसरे के प्रति घृणा, द्वेष और ईर्ष्या के भाव हमेशा ही रहते हैं।
          इस विषय पर नीति विशारद महाराज चाणक्य कहते हैं कि
            तक्षकस्य विषं दन्ते मक्षिकायास्तु मस्तके।
            वृश्चिकस्य विषं पुच्छे सर्वांग दुर्जने विषम्।।
         '‘सर्प के दांत, मक्खी के मस्तक और बिच्छू की पूंछ में विष होता है किन्तु दुर्जन व्यक्ति के अंग अंग में विष होता है।
           दरअसल हम लोग हमेशा ही बुद्धि और विवेक से अपने मस्तिष्क को सक्रिय नहीं रखते इसलिये दुर्जन और सज्जन व्यक्ति की पहचान नहीं करते। उस पर भी जब यह आभास हो जाये कि अमुक व्यक्ति हमारे प्रति विषैला भाव रखता है तो उससे दूरी नहीं बनाते यह सोचकर हमें क्या करना? यह सोच गलत है। अगर हम अपने प्रति विषैला भाव रखने वाले व्यक्ति के साथ निरंतर संपर्क रखेंगे तो अंततः उसका दुष्प्रभाव स्वयं पर कभी न कभी पड़ेगा यह विचार कर उससे दूर हो जाना चाहिए। इतना ही नहीं अगर हमें लगे कि कोई व्यक्ति सभी लोगों के प्रति बुरा भाव रखते हुए हमारे साथ सद्व्यवहार करते हुए मधुर वचन बोल रहा है तो यह मान लेना चाहिए कि वह केवल दिखावा कर रहा है। जिस व्यक्ति के मन में विषैला भाव है वह सदैव सभी के प्रति समय आने पर दृष्टता का प्रदर्शन करता है इसलिये उसे सतर्क रहना चाहिए।
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Thursday, April 21, 2011

सभी लोकों में सम्मान दिलाने वाला राजपद मिलना कठिन-हिन्दू धर्मिक चिंत्तन (lokpriya rajpan milna kathin-hindu dharmik chinttan)

                   अक्सर हम कोई कार्य करते हैं तो यह विचार करते हैं कि उसका परिणाम क्या होगा या लोग उस विषय पर क्या कहेंगे? ऐसी स्थिति में हम कोई नया काम प्रारंभ करने से कतराते हैं या विलंब करते हैं। दोनों ही स्थितियां अच्छी नहीं हैं। हमें यह मान लेना चाहिए कि इस संसार में सभी लोगों से प्रशंसा नहीं प्राप्त की जा सकती। राज्य प्रमुख होकर राज्य चलाना हो या मुखिया बनकर परिवार की गाड़ी, हमें कई बार अप्रिय निर्णय लेने पड़ते हैं। इसलिये अपने काम की अच्छाई बुराई विचार कर उसे प्रारंभ करने या न करने का निर्णय लेना चाहिए।
                   कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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                     दुरारोहं पदं राज्ञां सर्वलोकनमस्कृतम्।
                     अल्पेनाप्यपचारेण ब्राह्मण्मित दुर्ष्यति।।
                    ‘‘सब लोकों में सम्मान पाने वाले राजा के पद पर आरूढ् होना कठिन है, थोड़े ही दुष्कर्म से ब्राह्मणत्व दूषित हो जाता है।’’
                 प्रारब्धानि यथाशास्त्रं कार्याण्यासनबुद्धिपिः।
                 बनानीव मनोहारि प्रयच्छन्तयचिरात्फलम्।।
                    ‘‘जिस कार्य को उचित ढंग से बुद्धि के अनुकूल होकर प्रारंभ किया जाता है वह मनोहर फल के समान जल्दी परिणाम देने वाले होते हैं।
                  सार्वजनिक जीवन हो या पारिवारिक, हमें सदैव अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये सक्रिय होना चाहिए। खासतौर से सार्वजनिक कार्यों में प्रमुख की भूमिका मिलना कठिन होता है और मिल जाये तो उसका निर्वहन करना भी आसान नहीं होता। इस संसार में दुष्ट और देव दोनों ही प्रकृति के लोग रहते हैं। जब हम कोई जनहित में अभियान या कार्य प्रारंभ करते हैं तो दुष्ट प्रकृति के लोगों को असुविधा होती है। वह उसमें व्यवधान डालते हैं। वह भी नहीं कर सकते तो अच्छा काम करने वाले को स्वार्थ सिद्धि का आरोप लगाकर बदनाम करते हैं। ऐसे में जनहित के कार्य करने वालों का मन भी डांवाडोल होने लगता है।
               सच बात तो यह है कि इस संसार में सहृदय लोगों के संगठन कम बनते हैं। बनते हैं तो उनका संचालन नहीं होता। इसका कारण यह है कि सज्जन लोगों के आपसी स्वार्थ नहीं होते इसलिये वह काम सिद्धि में अपने परिवार से समय मिलने पर ही सक्रिय होते हैं। इसके विपरीत दुष्ट लोगों के संगठन अधिक ताकतवर होकर काम करते हैं क्योंकि उनके सभी सदस्य स्वार्थ होने के कारण प्राणप्रण से काम करते हैं क्योंकि उनके अर्थ की प्राप्ति होती है। यही स्थिति परिवार चलाने में भी आती है। परिवार के जिस सदस्य का मतलब नहीं सिद्ध होता वह विरोधी हो जाता है।
               अतः विरोध की परवाह किये बिना अपने कार्यों को नियम और समय के अनुसार प्रारंभ कर देना चाहिए। यह समझ लेना चाहिए कि इस संसार में कोई ऐसा पद नहीं मिलना जिससे सभी जगह लोकप्रियता मिले। बड़े पद पर बैठकर उसे निभाते हुए भी नैतिक दृढ़ता का परिचय देना चाहिए। किसी भी स्थिति में अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करना चाहिए क्योंकि एक दाग लगने पर ही व्यक्तित्व कलुषित हो जाता है।
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लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
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Saturday, February 19, 2011

माया के खेल को आदमी अपना समझता है-हिन्दी धार्मिक विचार (maya ke khel aur aadmi-hindi dharmik vichar)

इस संसार में माया का खेल अत्यंत विचित्र है। जिसके पास कम है वह उसे बढ़ाने के लिये संघर्षरत है और जिसके पास है वह उसकी सुरक्षा को लेकर परेशान है। पैसा नहीं है तो दिन का चैन हराम है नहीं है तो उसके खोने, छिनने या लुटने के भय रात की नींद गायब है। पैसा मित्र जुटाकर देता है तो शत्रु भी पैदा करता है। जो लोग यह सोचकर धन का संचय करते हैं कि उनका परिवार तथा रिश्तेदार उसका उपयोग या उपभोग कर कृतज्ञ होंगे और समाज इज्जत करेगा पर जब अपने उसका अधिकार की तरह उपयोग करते हैं असामाजिक तत्व वक्र दृष्टि डालकर उसे लूटने के लिये योजनाऐं बनाते हैं तो आदमी हताश और भयभीत होकर जीवन गुजारता है।
इस विषय में संत कबीरदास जी कहते हैं कि
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माया दासी संत की साकट की शिर ताज
साकुट की सिर मानिनी, संतो सहेली लाज
" माया तो संतों के लिए दासी की तरह होती है पर अज्ञानियों का ताज बन जाती है। अज्ञानी लोग का माया संचालन करती है जबकि संतों के सामने उसका भाव विनम्र होता है।"
गुरू का चेला बीष दे, जो गांठी होय दाम
पूत पिता को मारसी, ये माया के काम
" शिष्य अगर गुरू के पास अधिक संपत्ति देखते हैं तो उसे विष देकर मार डालते है और पुत्र पिता की हत्या तक कर देता है।"
माया तो सभी के पास आनी है। संत हो या मज़दूर सभी के पास माया अपनी अपनी नियति के अनुसार आती जाती है। सेठों के घर भी विराजती है तो डकैतों को भी भाती है। अलबत्ता संत उसके साथ दासी की तरह व्यवहार करते हैं मगर कुछ लोग हैं जो उसके मद में अंधे हो जाते हैं। वह ताज की तरह उनके मन मस्तिष्क पर राज करती है। स्थिति यह है कि अनेक धनपति जब वृद्ध हो जाते हैं तो उनके वही कुटुंबीजन उनकी मौत की कामना करते हैं। कहंी कहीं तो ऐसा भी होता है कि पिता के पाप के धन का उपयोग करते हुए पुत्र इतना पापाचारी हो जाता है कि वह अपने पिता की हत्या तक कर डालता है। कहीं कहीं शिष्य अपने ही गुरु को मार डालते हैं ताकि वह उसके बाद गुरु का पद और धन हड़प सकें। लब्बोलुआब कहने का यही है कि खेलती है माया और आदमी अपनी पूरी जिंदगी इस भ्रम में गुजार देता है कि वह खेल रहा है।
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लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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Saturday, December 4, 2010

पतंजलि योग साहित्य-चेतन शक्ति से एकाकार होने पर ज्ञान हो जाता है (patanjali yoga sahitya-chetan shakti se gyan)

चितेरप्रतिसंक्रमायास्तदाकारापत्त्ली स्वबुद्धिसंवेदनम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
मनुष्य के अंदर स्थित चेतन शक्ति क्रिया से रहित और असंग है तो भी उससे एकाकार हो जाने पर बुद्धि का ज्ञान हो जाता है।
द्रष्टदृश्योपरक्तं चित्तं सर्वार्थम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
द्रष्टा और दृश्य के मेल से चित सब अर्थवाला हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हर जीव में स्थित प्राण को हम आत्मा के रूप में जानते हैं। यही चेतन शक्ति भी है। मूलतः यह निष्क्रिय रहता है क्योंकि हर जीव भोजन, मनोरंजन तथा सोने की क्रियाओं में इतना व्यस्त रहता है कि उसके लिये यह संभव नहीं हो पाता कि वह अपने चेतन का साक्षात्कार कर सके। पशुओं के लिये तो यह संभव नहीं है पर वह शक्ति होने पर भी मनुष्य उसका साक्षात्कार नहीं कर पाता। इसके लिये योगाभ्यास करना आवश्यक है। हम मन, बुद्धि तथा अहंकार की प्रकृत्तियों को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा समझ लेते हैं और उनके निर्देश पर होने वाली दैहिक गतिविधियों को अपने हाथ से संपन्न मानते हैं। यह भ्रम है। वास्तव में हम वही चेतन शक्ति या आत्मा है जो निष्क्रिय है और बिना उसकी तरफ ध्यान किये उसे सक्रिय नहीं किया जा सकता है। सुनने, बोलने और देखने की क्रियाओं का बोध उसमें तभी आता है जब मनुष्य ध्यान के माध्यम से उस चेतना शक्ति को सक्रिय करता है।
जब हम ध्यान करते हैं तब अपने अंदर स्थित समस्त अंगों पर दृष्टि जाती है। उस समय प्राण मस्तिष्क में स्थित होकर संपूर्ण देह से साक्षात्कार करता है जिससे उसमें सक्रियता आती है। तब मनुष्य दृष्टा हो जाता है और अपने सामने घटित समस्त दृश्यों पर वह उसी चेतन शक्ति से चिंतन करता है। यही कारण है कि हमारे अध्यात्मिक दर्शन में ध्यान की अत्यंत महिमा बताई गयी है।
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Sunday, October 10, 2010

संत कबीरदास-संत लोग मान अपमान के भाव से परे होते हैं (sant kabir das-man aur apman se pare hote sant)

निर्बेरी निहकामता, स्वामी सेती नेह।
विषया सो न्यारा रहे, साधुन का मत येह।।
संत कबीरदास जी का कहना है कि किसी से विवाद न करे, बैर न पाले और किसी विषया या वस्तु में कामना न रखे वहर सच्चे संत हैं। संतों का विषयों से प्रेम नहीं होता बल्कि उनका सारा ध्यान तो परमात्मा की भक्ति पर ही केंद्रित होता है।
मान अपमान न चित्त धरै, औरन का सनमान।
जो कोई आशा करै, उपदेशै तेहि ज्ञान।।
संत कबीर दास का मानना है कि संत लोग मान और अपमान को अपने हृदय में स्थान नहीं देते। वह सभी को सम्मान देते हैं और कोई आशा लेकर आये तो उसका उचित मार्गदर्शन करते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अक्सर लोग सवाल पूछते हैं कि सही गुरु कैसे ढूंढा जाये? ज्ञान तो अनेक कथित संतों ने रट लिया है और वह उसका व्यवसायिक उपयोग अपने प्रवचनों में करते हैं। दक्षिणा लेकर अनेक शिष्य वह बनाते हैं। उनमें अनेक शिष्य बाद में अपने गुरु का व्यवहारिक सत्य देखकर निराश हो जाते हैं। अनेक लोग कथित पेशेवर संतों को देखकर यह भी कहते हैं कि‘ आजकल सच्चे गुरु मिलते कहां हैं? फिर हमें उनकी पहचान भी तो नहीं पता।’
संतों की सबसे बड़ी पहचान यह है कि वह स्थिरप्रज्ञ होते हैं। उनका हृदय केवल भक्ति में लीन रहता है। सांसरिक विषयों में वह निर्लिप्त भाव से सक्रिय रहते हुए मान अपमान का विचार नहीं करते। वह अपशब्द बोलने वाले की बातों को अनसुना कर उनसे भी सद्व्यवहार करते हैं। सबसे बड़ी बात यह कि वह अपने निष्काम कम के बदले कोई दक्षिणा या उपहार स्वीकार नहीं करते। अतः ऐसे ही लोगों को गुरु मानकर चलना चाहिए।
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