समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढ़ें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका


हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर
Showing posts with label अध्यात्मिक संदेश. Show all posts
Showing posts with label अध्यात्मिक संदेश. Show all posts

Saturday, April 23, 2011

सुख की चाहत हो दूसरे को भी प्रदान करें-हिन्दू धार्मिक चिंत्तन (sukh aur dukh ka fal-hindu dharmik vichar)

      जिस तरह विद्युत प्रवाह दो तारों से होता है उसी तरह हमारा जीवन भी सुख दुःख दो आधारों पर चलता है। हमारे पास जो आज चीज नयी है कल उसे पुरानी होना है। हम अच्छी चीजों का उपयोग करते हैं अंततः वह कूड़े के रूप में परिवर्तित हो जाती हैं। यही स्थिति हमारे कर्म की है। हम जो भी कर्म करते हैं वह फल में परिवर्तित होकर हमारे पास ही आता है। इसलिये हमें यह प्रयास करना चाहिए कि हम दूसरे को प्रसन्न रखें। अपनी खुशी ही नहीं पूरे समाज की खुशी का विचार करें। कर्म और उसका फल जीवन का प्रवार बनाये रखने वाली उन दो तारों की तरह ही है जो विद्युत प्रवाह बनाये रखती हैं।
दक्ष स्मृति में कहा गया है कि
-------------
यथैवात्मा परस्तद्वद् द्रष्टव्य सुखमिच्छाता।
सुखदु खानि तुल्यानि यथात्मीन तथा परे।।
सुखा वा यदि वा दुःखं यतिकांचित् क्रियते परे।
ततस्ततु पुनः पश्चात् सर्वमात्यनि जायति।।
‘‘इस संसार में सुख की इच्छा रखने वाले पुरुष की चाहिये कि वह दूसरे को सुख प्रदान करे क्योंकि यहां संसार में सभी सुख दुःख बराबर है। दूसरे को दिया गया सुख दुःख हमेशा ही स्वयं को प्राप्त होता है।’’
         हम एक बात ध्यान रखें कि हम जैसा व्यवहार किसी दूसरे से व्यक्ति करते हैं वह भले ही उसका तुरंत प्रतिफल न दे पर संभव है कि वह किसी अन्य व्यक्ति से प्राप्त हो। जैसे कि हमने किसी राह चलते हुए आदमी को पानी पिलाया तो यह जरूरी नहीं कि वह हमें वहीं तत्काल कुछ फल दे पर यह संभव है कि कहीं दूसरे स्थान पर हमें प्यास लगे तो कोई दूसरा व्यक्ति हमें पानी प्रदान करे। उसी तरह हम किसी कमजोर आदमी का अपमान करें और वह हमारी ताकत देखकर चुप हो जाये पर उसका परिणाम किसी अन्य व्यक्ति से हमें अन्यत्र मिल सकता है। एक जगह हमारे माध्यम से हुआ अपमान दूसरे स्थान पर हमारे सामने अपने अपमान के रूप में प्रकट हो सकता है।
         कहने का अभिप्राय यह है कि कर्मफल से बचना मुश्किल है। इसलिये जहां तक हो सके अपने कर्म सोच विचारकर पवित्रता के साथ करना चाहिए। आनंदपूर्वक जीवन जीने का यही एक मंत्र है।
--------------


लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

Thursday, April 21, 2011

सभी लोकों में सम्मान दिलाने वाला राजपद मिलना कठिन-हिन्दू धर्मिक चिंत्तन (lokpriya rajpan milna kathin-hindu dharmik chinttan)

                   अक्सर हम कोई कार्य करते हैं तो यह विचार करते हैं कि उसका परिणाम क्या होगा या लोग उस विषय पर क्या कहेंगे? ऐसी स्थिति में हम कोई नया काम प्रारंभ करने से कतराते हैं या विलंब करते हैं। दोनों ही स्थितियां अच्छी नहीं हैं। हमें यह मान लेना चाहिए कि इस संसार में सभी लोगों से प्रशंसा नहीं प्राप्त की जा सकती। राज्य प्रमुख होकर राज्य चलाना हो या मुखिया बनकर परिवार की गाड़ी, हमें कई बार अप्रिय निर्णय लेने पड़ते हैं। इसलिये अपने काम की अच्छाई बुराई विचार कर उसे प्रारंभ करने या न करने का निर्णय लेना चाहिए।
                   कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
                       ------------------
                     दुरारोहं पदं राज्ञां सर्वलोकनमस्कृतम्।
                     अल्पेनाप्यपचारेण ब्राह्मण्मित दुर्ष्यति।।
                    ‘‘सब लोकों में सम्मान पाने वाले राजा के पद पर आरूढ् होना कठिन है, थोड़े ही दुष्कर्म से ब्राह्मणत्व दूषित हो जाता है।’’
                 प्रारब्धानि यथाशास्त्रं कार्याण्यासनबुद्धिपिः।
                 बनानीव मनोहारि प्रयच्छन्तयचिरात्फलम्।।
                    ‘‘जिस कार्य को उचित ढंग से बुद्धि के अनुकूल होकर प्रारंभ किया जाता है वह मनोहर फल के समान जल्दी परिणाम देने वाले होते हैं।
                  सार्वजनिक जीवन हो या पारिवारिक, हमें सदैव अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये सक्रिय होना चाहिए। खासतौर से सार्वजनिक कार्यों में प्रमुख की भूमिका मिलना कठिन होता है और मिल जाये तो उसका निर्वहन करना भी आसान नहीं होता। इस संसार में दुष्ट और देव दोनों ही प्रकृति के लोग रहते हैं। जब हम कोई जनहित में अभियान या कार्य प्रारंभ करते हैं तो दुष्ट प्रकृति के लोगों को असुविधा होती है। वह उसमें व्यवधान डालते हैं। वह भी नहीं कर सकते तो अच्छा काम करने वाले को स्वार्थ सिद्धि का आरोप लगाकर बदनाम करते हैं। ऐसे में जनहित के कार्य करने वालों का मन भी डांवाडोल होने लगता है।
               सच बात तो यह है कि इस संसार में सहृदय लोगों के संगठन कम बनते हैं। बनते हैं तो उनका संचालन नहीं होता। इसका कारण यह है कि सज्जन लोगों के आपसी स्वार्थ नहीं होते इसलिये वह काम सिद्धि में अपने परिवार से समय मिलने पर ही सक्रिय होते हैं। इसके विपरीत दुष्ट लोगों के संगठन अधिक ताकतवर होकर काम करते हैं क्योंकि उनके सभी सदस्य स्वार्थ होने के कारण प्राणप्रण से काम करते हैं क्योंकि उनके अर्थ की प्राप्ति होती है। यही स्थिति परिवार चलाने में भी आती है। परिवार के जिस सदस्य का मतलब नहीं सिद्ध होता वह विरोधी हो जाता है।
               अतः विरोध की परवाह किये बिना अपने कार्यों को नियम और समय के अनुसार प्रारंभ कर देना चाहिए। यह समझ लेना चाहिए कि इस संसार में कोई ऐसा पद नहीं मिलना जिससे सभी जगह लोकप्रियता मिले। बड़े पद पर बैठकर उसे निभाते हुए भी नैतिक दृढ़ता का परिचय देना चाहिए। किसी भी स्थिति में अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करना चाहिए क्योंकि एक दाग लगने पर ही व्यक्तित्व कलुषित हो जाता है।
--------------
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com
-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

Sunday, January 30, 2011

सभी गृहस्थ यज्ञ नहीं करते- हिन्दी चिंत्तन लेख (grahastha aur yagya-hindi chintan lekh)

कुछ लोग प्रत्यक्ष रूप से भक्त तथा यज्ञ करते नहीं दिखते हैं और न ही भक्त होने का पाखंड रचते हैं जबकि समाज में ऐसे लोगों की संख्या अधिक है जो धर्म के नाम पर कर्मकांड अथवा यज्ञ करने के लिये दबाव बनाते हैं। अनेक लोग बिना किसी दिखावे के सात्विक जीवन जीते हैं पर चूंकि वह हवन तथा यज्ञ आदि नहीं करते तो लोग उनको नास्तिक होने का ताना देते हैं। सच बात तो यह है कि यज्ञ तथा हवन आदि करने से अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि मनुष्य हृदय में तत्व ज्ञान धारण करे। इसके लिये प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए। नियमित अध्ययन करने से जिज्ञासा बढ़ती है और अभ्यास से तत्वज्ञान का अनुभव हो जाता है।
इस विषय पर मनुस्मृति में कहा गया है कि
-----------------
यथायथा हि पुरुषः शास्त्रं समधिगच्छति।
तथातथा विज्ञानाति विज्ञानं चास्य रोचते।।
‘‘जैसे जैसे कोई व्यक्ति शास्त्र का अभ्यास करता है वैसे ही उसे गूढ़ ज्ञान की प्राप्ति होती है और उसकी प्रवृत्ति और जिज्ञासा ज्ञान विज्ञान में बढ़ती जाती है।’’
एक बात निश्चित है कि हमारे पुराने ग्रंथों में ज्ञान के साथ विज्ञान भी अंतर्निहित है। कुछ लोग आज विज्ञान के युग में भारतीय अध्यात्मिक दर्शन को हेय मानते हैं पर उनको यह पता ही नहीं कि विज्ञान का आधार भी तत्वज्ञान है जिसके कारण हमारे प्राचीन अध्यात्मिक ग्रंथ विज्ञान के विषय में सामग्री से परिपूर्ण हैं।
कुछ लोग मंदिर न जाने या यज्ञों तथा हवनों में सक्रिय भागीदारी न करने वाले लोगों पर कटाक्ष करते हैं पर यह उनका ही अज्ञान है।
इस विषय पर मनुस्मृति में कहा गया है कि
-----------------
‘‘शास्त्रों के ज्ञाता कुछ गृहस्थ यज्ञादि नहीं करते पर अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण कर अपनी अध्यात्मिक शक्ति में वृद्धि करते हैं। उनके लिये लिये नाक, जीभ, त्वचा, तथा कान पर संयम रखना ही एक तरह से महायज्ञ है।
सच बात तो यह है कि धर्म तभी ही प्रशंसनीय है जब वह आचरण तथा कर्म में दृष्टिगोचर हो न कि केवल कर्मकांड और दिखावे में। कुछ लोग जो प्रतिदिन मंदिर जाते हैं वह दूसरों को अभक्त समझते हैं जो कि उनके अज्ञान का प्रमाण है। इतना ही नहीं कुछ तो लोग ऐसे हैं जो प्रतिदिन पूजा आदि करते हैं पर व्यवहार में ऐसा अहंकार दिखाते हैं जैसे कि वही भगवान के इकलौते भक्त हों। जो वास्तव में भक्त और ज्ञानी हैं वह दिखावे से अधिक आत्मनियंत्रण तथा आचरण से उसे प्रमाणित करते हैं।
-----------------------

संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com

-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका 

५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका
६.अमृत सन्देश पत्रिका

Saturday, January 29, 2011

अल्पचित्त वालों को बुढ़ापा जल्दी घेरता है-हिन्दी चिंत्तन आलेख (alpachitta vale aur budhape-hindi chittan aalekh)

कुछ पुरुषों का स्वभाव ही ऐसा होता है कि वह किसी स्त्री का चेहरा देखने के लिये व्यग्र रहते हैं। वैसे यह तो मानवीय स्वभाव है कि विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण रहता है पर कुछ पुरुष स्त्रियों को देखकर अपनी सुधबुध खो बैठते हैं। इतना ही नहीं कुछ तो ऐसे भी होते हैं जो वैसे बहुत खामोश रहते हैं पर स्त्री पास हो तो वाचाल हो उठते हैं। ऐसे पुरुष अल्पचित वाले होते हैं। उनके चित्त में दृढ़ता का अभाव होता है। परिणाम यह होता है कि युवावस्था बीत जाने पर उनकी दैहिक सक्रियता समाप्त हो जाती है और बुढ़ापे का रोग उनको घेर लेता है।
इस बारे में कौटिल्य महाराज अपने अर्थशास्त्र में कहते हैं कि
---------------------
स्त्रीमुखालोकतनया व्यग्राणामल्पचेतसां।
ईहितानि हि गच्छन्ति यौवनेन सह क्षयम्।।
‘‘जिन पुरुषों का चित्त का भाव अल्प है वह हमेशा किसी स्त्री का मुख देखने के लिये व्यग्र रहते हैें। उनकी सब चेष्टायें उनकी जवानी बीतने के साथ ही समाप्त हो जाती हैं।’’
हमारी फिल्मों ने युवा पीढ़ी में अतिशीघ्र बुढ़ापा लाने का काम बखूबी किया है। उन फिल्मों में कहानी के नाम पर तो पूरा केंद्र नायक रहता है और नायिका का पात्र केवल नाच गाने या रोने हंसने तक ही सीमित रह जाता है। कभी कभी तो ऐसी फिल्में भी बनायी जाती हैं जिनका उद्देश्य यही होता है कि स्त्री चेहरों की चमक दिखाकर युवा दर्शक से पैसा ऐंठा जाये। सच कहें तो फिल्में केवल युवाओं के मन में युवा स्त्री चेहरे देखने की व्यग्रता देखने की इच्छा का दोहन करने के लिये बनायी जाती हैं। यही कारण है कि कई फिल्मों में कहानियां तो नाम की होती हैं जो केवल इसलिये ही लिखी जाती हैं कि अच्छी अच्छी हीरोईनों का चेहरा किसी तरह दिखाकर युवाओं को भ्रमित किया जाये।
अविवाहित युवक अपने जीवन में ऐसी ही अभिनेत्रियों जैसी पत्नी की कामना करने लगते हैं जो कि संभव नहीं हो पाता। जब यथार्थ में जीवन संगिनी मिलती है शुरुआती दौर के बाद उससे युवाओं का मोह भंग हो जाता है। फिर शुरुआत होता है उदासीनता का दौर जो कहीं तनाव का कारण बनता है तो कहीं बुढ़ापे का। यह संभव नहीं है कि यथार्थ जीवनी में कोई स्त्री प्रतिदिन वैसा ही श्रृंगार करे जैसा कि फिल्मों में होता है।
सच बात तो यह है कि इन्हीं फिल्मों की वजह से ही हमारे देश की युवापीढ़ी अल्प चित वाली हो गयी है और इस वजह से लोग ही चिंतन, मनन तथा अध्यात्मिक अध्ययन से दूर होते जा रहे हैं।
-------------
संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com

-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका 

५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका
६.अमृत सन्देश पत्रिका

Sunday, January 9, 2011

काम से ही उत्पन्न होती है मांस तथा मदिरा के सेवन की प्रवृत्ति-हिन्दी चिंतन लेख (kaam, maans or meat tatha madira-hindi chitan lekh)

मनुष्य के जीवन में विपत्ति इसलिये ही आती है क्योंकि वह वासनाओं और कामनाओं के वशीभूत होकर ऐसे कर्म करता है जिनका परिणाम देखने में तत्काल सुखदायक पर कालांतर में दुःखदायी होता है। याद रखें पंचतत्वों से बनी इस देह में जब हम अपने मुख से कोई पदार्थ सेवन कर अंदर पेट में पहुंचाते हैं तो वह अपना काम करता है। कामभावना के वशीभूत मनुष्य पदार्थों के उपभोग के परिणाम से अनजान रहता है या जानते हुए भी उसे अनदेखा करता है।
आजकल तंबाकू के गंदे रासायनिक पदार्थों के पाउचों का सेवन बढ़ता जा रहा है जो अत्यंत घातक हैं। एक रुपये में आने वाले यह पाउच आज के युवाओं को बाह्य रूप से भले ही असुंदर न बना पाते हों पर आंतरिक रूप से उनको जर्जर किये जा रहे हैं। अनेक विशेषज्ञ बताते हैं कि इनमें शामिल रसायन फेफड़ों तथा हृदय पर बुरा प्रभाव डालने के साथ ही हड्डियों को भी गलाते हैं। हैरानी की बात है कि आज के शिक्षित और कंप्यूटर में दक्ष युवक युवतियां इसका उपयोग धड़ल्ले से करते हैं।
इसके अलावा शादी विवाहों पर मदिरा का सेवन एक फैशन बनता जा रहा है। हम बात तो संस्कारों और संस्कृति की करते हैं पर फैशन के नाम पर विनाश करने वाली प्रवृत्तियों का भी पालन पोषण करते हैं। धर्म की आड़ में काम को प्रश्रय दे रहे हैं। मनृस्मृति में मनु महाराज कहते हैं कि-
पानभक्षाः स्त्रियश्चैव मृगया च यथाक्रमम्।
एतत्कष्टतमृ विद्याच्चतुकं कामजे गयो।।
"काम से चार दोष मदिरा का सेवन, मांसाहार का उपभोग, स्त्रियों से संपर्क बढ़ाने तथा शिकार करने की प्रवृत्तियां स्वभाविक रूप पैदा होती हैं। इन चारों कोे जीतने का कार्य बहुत ही पीड़ादायक माना जाता है।"
दरअसल हमने संस्कारों के निवर्हन तथा कर्मकांडों की आड़ में वस्तुओं के लेनदेन और उपभोग को एक फैशन बना लिया है। अध्यात्म से इसका कोई संबंध नहीं है। यह सांसरिक पदार्थ तो केवल काम तथा वासना में वृद्धि के लिये सहायक होते हैं। यही कारण है कि हमारे देश में विलासिता की वस्तुओं के उपभोग तथा व्यसनों के सेवन के कारण अपराध तथा अहंकार की प्रवृत्ति बढ़ रही है। इसके रोकने कें लिये यह आवश्यक है कि अध्यात्म के प्रति अपना ध्यान बढ़ाया जाये।
-----------
संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com

-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका 

५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका
६.अमृत सन्देश पत्रिका

Tuesday, January 12, 2010

भर्तृहरि शतक-अपना लक्ष्य बीच में नहीं छोड़ें (hindu dharm sandesh-apna lakshya

 रत्नैर्महाहैंस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरेभीमविषेण भीतिम्।

सुधा विना न प्रययुर्विरामं न निश्चिततार्थाद्विरमन्ति धीराः।।

हिन्दी में भावार्थ-
समुद्र मंथन करने से देवता लोग अनमोल रत्न पाकर भी प्रसन्न नहीं हुए। भयंकर विष भी निकला पर उनको उससे भय नहीं हुअ और न ही वह विचलित हुए। जब तक अमृत नहीं मिला तब तक वह समुद्र मंथन के कार्य पर डटे रहे। धीर, गंभीर और विद्वान पुरुष जब तक अपना लक्ष्य नहीं प्राप्त हो तब अपना कार्य बीच में नहीं छोड़ते

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-वैसे तो जीवन में अपना लक्ष्य तक करना बहुत कठिन है क्योंकि लोग अपने विवेक से कुछ नया करने की बजाय दूसरे की उपलब्धियों को देखकर ही अपना काम प्रारंभ करते हैं। अगर तय कर लिया तो फिर उस पर निरंतर चलना कठिन है।  होता यह है कि दूसरे की उपलब्धि देखकर वैसे बनने की तो कोई भी ठान लेता है पर उसने अपने लक्ष्य पाने में क्या पापड़ बेले यह किसी को नहीं दिखाई देता।  उसने लक्ष्य प्राप्ति के लिये कितना परिश्रम करते हुए अपमान और तिरस्कार सहा होगा यह वही जानते है।  जिन्होंने  बड़ी उपलब्धि प्राप्त की है उसके पीछे उनका धीरज और एकाग्रता बहुत बड़ा योगदान होता है।

इसके अलावा एक बात यह भी है कि बहुत कम लोगों में धीरज होता है। आज कल संक्षिप्त मार्ग से उपलब्धि प्राप्त करने की परंपरा चल पड़ी है। अगर किसी युवक को धीरज या शांति से काम करने का उपदेश दें तो वह यही कहते हैं कि‘आजकल तो फटाफट का जमाना है।’

वह लगे रहते हैं फटाफट उपलब्धि प्राप्त करने में  पर वह कभी लक्ष्य प्राप्त नहीं कर पाते।  अनेक युवक इसी तरह अपराध मार्ग पर चले जाते हैं।  उसके परिणाम बुरे होते हैं।

जिनको अपना जीवन सात्विक ढंग से शांतिपूर्वक बिताना है उनको समुद्र मंथन के अध्यात्मिक धार्मिक उदाहरण से प्रेरणा लेना चाहिये।


संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

Sunday, December 27, 2009

भर्तृहरि शतक-स्वतंत्र व्यक्ति का राजा से क्या काम? (state and free man-hindu dharm sandesh)

न नटा न विटा न गायकाः न च सभ्येतरवादचुंचवः।
नुपमीक्षितुमत्र के वयं स्तनभारानमिता न योषितः।।

हिन्दी में भावार्थ- न तो हम नट न हैं न भांड है न गायक है और न ही सभ्यता से हटकर वार्तालाप करने वाले न ही हमें सुंदरियों से कोई मतलब है तब राजाओं से हमारा क्या काम है?

स जात कोऽप्यासन्मदनरिपुण मूघ्र्नि घवलं कपालं यस्योच्चैर्विनिहितमलंारविधये।
नृभिः प्राणत्राणप्रवणमतिभिः कैश्चिदधुना नमदिभ् कः पंसामयतुलदर्प ज्वरभरः।
हिन्दी में भावार्थ-पुरातनकाल में अनेक मनुष्य ऐसे हुए जिनकी खोपड़ियों की माला भगवान शिव ने अपने गले डालकर अपना श्रृंगार किया। अब तो ऐसे मनुष्य है जो अपना पेट भरने के लिये अभिवादन करने वालों से प्रतिष्ठा पाकर ही अहंकार के बुखार में तप रहे हैं।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-एक मनुष्य की सही पहचान उसकी स्वतंत्र स्थिति है। वह अपना व्यवसाय करे, अपना चिंतन स्वयं करे, अपने निर्णय स्वयं ले और परमपिता परमात्मा के अलावा किसी अन्य के आगे नतमस्तक होने की उसे आवश्यकता न पड़े। यही नहीं उसके सज्जन होने का यह भी प्रमाण है कि कोई अन्य व्यक्ति भय, लालच अथवा स्वार्थवश बिना किसी दबाव के उसका सम्मान करे। आज स्थितियां बदल गयी हैं। हालांकि भर्तृहरि के जीवन काल में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं थी यही कारण है कि वह मनुष्य के स्वतंत्र अस्तित्व की पहचान बता गये पर आजकल तो हालत यह है कि मनुष्य स्वयं नौकरी कर रहे हैं पर उससे मिली भौतिक उपलब्धियों को ऐसे बखान करते हैं जैसे कि वह किसी स्वतंत्र व्यवसाय के स्वामी हों।
पूरे विश्व में व्यवस्था ऐसी हो गयी है कि स्वतंत्र व्यवसाय करने वाले न चाहते हुए भी शासकीय नौकरी करने वालों को सम्मान देते हैं और जरूरत पड़े तो उनको कमीशन भी देते हैं। जैसे जैसे उदारीकरण बढ़ रहा है निजी क्षेत्रों में भी यही हो रहा है। सभी जगह अधिकारी और कर्मचारी करने को तो नौकरी कर रहे हैं पर उनका भाव ऐसा होता है जैसे कि वह समाज के शासक हों। उनको कोई व्यक्ति अपने स्वार्थवश अभिवादन करता है तो वह अपने आप को साहब समझकर फूलने लगते हैं।
भारतीय इतिहास में गुलाम वंश के शासन का उल्लेख मिलता है। ऐसा लगता है कि अब तो गुलाम समाज का ही शासन चल रहा है। स्वतंत्र रूप से मनुष्य का सांस लेना पूरे विश्व में कठिन हो रहा है। कहने को पश्चिमी राष्ट्र आधुनिक सभ्यता का दंभ भरते हैं पर उनकी कंपनी प्रणाली भी गुलामी का ही प्रतीक है। उनको आधुनिक शासन प्रणाली का जनक कहा जाता है जिसमें आदमी को एक देश से दूसरे जाने के लिये पासपोर्ट और वीजा की आवश्यकता होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि प्रतिबंधों को आधुनिक सभ्यता का प्रतीक मानते हैं। यह प्रतिबंध बीमार मानसिकता का प्रमाण है पर दुनियां हैं कि अपने आधुनिक सभ्यता का भाग होने पर फूल रही है।



संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

Thursday, November 12, 2009

भर्तृहरि शतक-नौकरी करना कठिन काम है (sevak kam hota kathin-hindi sandesh)

मौनान्मूकः प्रवचनपटुर्वातुलो जल्प वा धृष्टः पाश्र्वे वसति च सदा दूरश्चाऽप्रगल्भः।
क्षान्त्या भीरुर्यदि न सहते प्रायशा नाभिजातः सेवाधर्म परमगहनो योगिनामपयगभ्यः।।
हिंदी में भावार्थ-
सेवा करने वाला यदि मौन रहे तो गूंगा, वाक्पट् हो तो बकवादी, समीप रहे तो ढीठ और दूरी बनाकर रखे तो मूर्ख, क्षमाशील हो तो भीरु, असहनशील हो अकुलीन कहा जाता है। यह सेवा धर्म अत्यंत ही कठिन है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-यहां सेवा से आशय गरीबों की सेवा से नहीं बल्कि नौकरी से है। कहते हैं न नौकरी क्यों करी? आधुनिक शिक्षा प्रणाली से शिक्षित अधिकतर युवा नौकरी के लिये इधार फिरते हैं। नौकरी तो नौकरी है चाहे जैसी भी हो-एक तरह से गुलामी है। सच तो यह है कि इसमें स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त ही हो जाता है। यह सही है कि नौकरी करने वाले को वेतन मिलता है पर उसको काम का दबाव और स्वामी या उच्च अधिकारी के व्यवहार का भय घर तक पीछा नहीं छोड़ता। अगर स्वामी या अधिकारी की हां में हां मिलाओ तो वह मूर्ख समझते हैं। अगर कोई सलाह दो तो सही होने पर भी मातहत के सामने हेठी न हो इसलिये अस्वीकार कर दी जाती है। नौकरी करने वाला अपने स्वामी या अधिकारी को रोज झुककर सलाम ठोके तो चमचा कहलाता है और न करे तो मक्कार!
नौकरी करने वाले तो अनेक लोग तो यही कहते हैं कि ‘कितना भी काम करो अपने बोस को खुश नहीं रखा जा सकता’। सच तो यह है कि नौकरी में बंधी बंधायी आय मिलने से खर्च भी वैसे ही हो जाते हैं और उसके खोने का खतरा आदमी को एक तरह गुलाम बना देता है। एक दूसरी बात भी है कि अवकाश के दिनों में आदमी आराम करना चाहता है और उसे घर के अन्य काम बोझ लगते हैं। इस तरह उसकी सामाजिक स्थिति भी अधिक सुदृढ़ नहीं रहती।
इसके विपरीत जो स्वतंत्र व्यवसाय करते है उनका जीवन संघर्षमय होने के कारण उनका दिमाग और देह हमेशा ही सक्रिय रहती है। फिर उनको भविष्य में विकास की संभावना अधिक काम के लिये स्वतः प्रेरित करती है जबकि नौकरी करने वाले के लिये विकास तो छोटी से बड़ी गुलामी में ही है।
एक स्वतंत्र व्यवसायी और नौकरी करने वाले की मासिक आय एक समान भी हो तब भी व्यवसायी अधिक आजादी से सांस ले पाता है। वह आगे चलकर अपने एक रुपये का दो कर सकता है पर नौकरी वाले के लिये यह संभव नहीं है। हालांकि अनेक नौकरी वाले छोटे व्यवसाय करने वालों को हेय समझते हैं पर सच तो यह है कि वह उनके मुकाबले अधिक आजादी से सांस ले पाते हैं। नौकरी में दिल का चैन केवल कहने के लिये है क्योंकि वह तो एक तरह से रोटी का गुलाम हो जाता है। भले ही उपरी कमाई से धन भी अधिक हो जाता है पर इतिहास गवाह रहा है कि अनेक गुलामों ने भी बहुत धन पाया पर कहलाये तो गुलामी ही न!
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

Friday, October 30, 2009

मनुस्मुति-घर में किसी प्रकार का अभाव न होने दें (ghar ki nari ka samman-manu smriti)


शोचन्ति जामयो यत्र विनशत्याशु तत्कुलम्।
न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा।।
                 हिंदी में भावार्थ-
उस परिवार का शीघ्र नाश हो जाता है जिसकी स्त्रियां दुःख या अभाव के फलस्वरूप परेशान रहती हैं। जहां स्त्रियां इस दुःख से परे होती हैं वह हमेशा घर परिवार उत्थान की तरफ अग्रसर रहते हैं।

तत्समदेताः सदा पूज्याः भूषणच्छादानाशनैः।
भूतिकामैर्नरर्नितयं सत्कारेषूस्वेषु च ।।
               हिंदी में भावार्थ-अपने परिवार की तरक्की चाहने चाले को अपने घर में होने वाले उत्सवों के अवसर पर अपनी स्त्रियों का आदर सत्कार करना चाहिए और उन्हें सदा स्वादिष्ट उत्तम भोजन तथा वस्त्राभूषण आदि देकर उनकी पूजा करनी चाहिए।

                वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-मनु महाराज के संदेशों से यह स्पष्ट है कि मनुष्य जीवन स्त्री और पुरुष के समन्वय के बिना सहजता ने नहीं चल सकता। यही कारण है कि हमारे समाज में पवित्र अवसरों पर पत्नी के साथ ही पूजा आदि करने की परंपरा है। पति पत्नी साथ साथ मंदिर जाते हैं। धार्मिक अनुष्ठानों में पति पत्नी साथ साथ ही बैठकर उनको पूर्ण करते हैं। दरअसल इन परंपराओं के द्वारा ही यह प्रकट होता है कि सामान्य दिनचर्या में भले ही पुरुष की प्रधानता दिखती हो पर धार्मिक और अध्यात्मिक रूप से स्त्री का महत्व भी उतना ही जितना गृहकार्य में वह अपने हाथ से काम कर साबित करती है।
इसके अलावा मनु महाराज यह भी मानते हैं कि पुरुष का यह दायित्व है कि वह अपने घर की समस्त स्त्रियों को-माता, पत्नी, बहिन तथा बेटी- कभी किसी प्रकार का अभाव न होने दे। जो लोग अपना धन अय्याशी और व्यसनों में बर्बाद कर अपने घर की स्त्री के अधिकार का हनन करते हैं-वह पशु के समान हैं। अपनी स्त्रियों के साथ मारपीट या अपमानजनक व्यवहार करने वाले पुरुषों को अपने घर के नष्ट होने की स्थिति में कोई सहारा नहीं देता। उनका घर इसी कारण जल्दी नष्ट हो जाता है। इसलिये जितना हो सके अपने घर की स्त्री का सम्मान करने के साथ ही उसको किसी प्रकार का अभाव नहीं देना चाहिए।

-------------------------
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://rajlekh.blogspot.com
-----------------------------

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

विशिष्ट पत्रिकायें