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Tuesday, May 3, 2011

समय के अनुसार पराक्रमी और नम्र बने-हिन्दू धार्मिक चिंत्तन (samay ke anusar prakrami aur namra bane-hindu dharmik chittan)

                 हमें अपने जीवन में अनेक उतार चढ़ाव का सामना करना पड़ता है। कई बार इष्ट लोग साथ होते हैं तो दुष्ट लोग भी सामने आते हैं। ऐसे में हमेशा एकरसता में बहकर नहीं जिया जा सकता। हमें शांति पूर्ण जीवन व्यतीत करना चाहिए पर उसमें खलल डालने वाले के साथ अगर द्वैरथ यानि दो दो हाथ भी करना पड़े तो चूकना नहीं चाहिए। आत्मरक्षा करना हमारा अधिकार और धर्म है। जिस तरह दुनियां में ऐसे दानवीरों की कमी नहीं है जो दूसरे को दान देकर कृतार्थ करते हैं तो ऐसे दुष्ट भी कम नहीं हैं जो दूसरे का हक मारने के लिये तत्पर रहते हैं। उनसे जूझना अच्छा नहीं लगता पर उनको छोड़ने का मतलब भी अपनी शांति भंग करना है। अतः अपने अधिकार के लिये पराक्रम प्रकट करना पड़ता है।
                 इस विषय पर कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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बलीयसि प्रणमतां काले विक्रमतामपि।
सम्पदो नापसर्पनित प्रतीपमिप निम्नगाः।
                      ‘‘जो लोग समय आने पर अपना कौशल तथा पराक्रम करने के साथ ही समय पर विनम्रता का भाव दिखाते हैं उनकी सपंत्ति उनका कभी साथ नहीं छोड़ती है।’’
जमदग्नेः सूतस्येव सर्वः सर्वत्र संवदा।
अनेकवृद्धजयिन प्रतापादेव भुज्यते।।
               ‘‘जमदग्नि के पुत्र परशुराम के समान सर्वत्र युद्ध जीतने वाले ही अपने प्रताप से राज करते हैं।’’
                   यह सही है कि इस संसार में अधिकतर लोग अहिंसक प्रवृत्ति के होते हैं। किसी से वाद विवाद हो तो विनम्रता से निपटना चाहिए। विनम्रता हिंसक से हिंसक मनुष्य को अहिंसक बना देती है। उसका दामन कभी नहीं छोड़ना चाहिए। हालांकि इस संसार में ऐसे लोग भी बहुत हैं जो अकारण दूसरे को कष्ट देते हैं, उनके अधिकारों का अपहरण करते हैं और दूसरे को धोखा देने में उनको मजा देता है। उनके अपराध के अनुसार उनका दण्डित करने के लिये पराक्रम प्रकट करना भी आवश्यक है। जो समय के अनुसार चलते हैं उनकी संपत्ति, वैभव तथा प्रतिष्ठा में उत्तरोत्तर वृद्धि होती है और उनका पतन नहीं होता।

लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com
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Wednesday, March 23, 2011

व्यसनों में लिप्त होने की इच्छा पतन का कारण-हिन्दी धार्मिक चिंत्तन (vyasan ki iccha patan ka karan-hindi dharmik chittan)

हमारे देश में बढ़ते आर्थिक विकास के साथ ही व्यसनों की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। कितनी हैरानी की बात है कि हम दावा करते हैं कि देश में शिक्षा का विकास हुआ है पर यह नहीं दिखाई देता कि लोगों की की ज्ञान तथा चिंतन क्षमता का भी बुरी तरह ह्रास  हुआ है। सिगरेट के पैकेट पर लिखा रहता है कि ‘सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है’, लोग इसे पहले तो पढ़ते नहीं और पढ़ते हैं तो उसे धूंऐं की तरह अपने दिमाग से उड़ा देते हैं। शराब की बोतल पर लिखा मिलता है कि ‘शराब पीना स्वास्थ्य के लिये खतरनाक है’, पर दिन प्रतिदिन उसका सेवन बढ़ता जा रहा है। शादी जैसे सामाजिक कार्यक्रमों के साथ ही त्यौहार के अवसर पर शराब का व्यसन अब फैशन बन गया है। कहां तो पहले यह स्थिति थी कि लोग शराब पीने वाले से ही नहीं बल्कि सिनेमा देखने वाले लड़के के साथ अपनी बेटी का ब्याह करना पसंद नहीं करते थे और कहां अब यह स्थिति अब पूरा समाज ही इसे फैशन मानकर मद में लिप्त हो रहा है।
इस विषय पर कौटिल्य महाराज कहते हैं कि
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स्निग्धदीपशिखालोकविलेभितक्लिोचनः।
मृत्युमृच्छत्य सन्देहात् पतंगः सहसा पतन्।।
"दीपक की स्निग्ध शिखा के दर्शन से जिस पतंगे के नेत्र ललचा जाते हैं और वह उसमें जलकर जान देता है। यह रूप का विषय है इसमें संदेह नहीं है।"
गन्धलुब्धो मधुकरो दानासवपिपासया।
अभ्येत्य सुखसंजवारां गजकर्णझनज्झनाम्
"गंध की वजह से लोभी हो चुका मद रूपी आसव पीने की इच्छा करने वाला भंवरा सुख का अनुभव कराने वाली झनझन ध्वनि हाथी के कान के समीप जाकर मरने के लिये ही करता है।"

हैरानी इस बात की है कि हमारे देश में समाज पर नैतिक तथा धार्मिक रूप से नियंत्रण करने वाले शिखर पुरुष स्वयं ही ऐसे कामों में लिप्त हो जाते हैं जो पारंपरिक रूप से वर्जित हैं। उनकी देखा देखी छोटे लोग भी उसका अनुसरण करते हैं। शराब, जुआ, परस्त्रीमगन तथा सट्टे की प्रवृत्ति के दुष्परिणाम होते हैं पर देश में जिन लोगों को धन पचाने की शक्ति नहीं है वह व्यसनों की तरफ चले जाते हैं। धन का मजा व्यसन से जुड़ने पर ही होता है-ऐसा उनका मानना है। यही कारण है कि धन चूक जाने पर ऐसे व्यसनी अपरहण तथा हत्या जैसे कुत्सित कार्य में लिप्त हो जाते हैं। जिनको अवसर नहीं मिलता वह आत्महत्या कर लेते है। कहने को हम लोग रौशनी में पतंगे के जल मरने या मौत आने पर गीदड़ के शहर में घुसने की बातें करते हैं पर सच यह है कि यह इंसानों को समझाने के लिये ही कही गयी हैं।
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लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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Saturday, March 12, 2011

विषयों में आसक्ति मनुष्य को नष्ट कर देती है-हिन्दू धार्मिक विचार (vishay mein asakti-hindu dharmik vichar)

इस सृष्टि का सबसे बुद्धिमान जीव मनुष्य को माना जाता है पर मजे की बात यह है कि अपनी बुद्धि की शक्ति से अनभिज्ञ आदमी विषयों में इस तरह फंस जाता है कि चालाक लोग दूसरों को भेड़ों की तरह हांक लेते हैं। अगर हम वर्तमान हालातों को देखें तो यह बात सामने आती है कि हमारे देश के लोगों का एक बहुत बड़ा वर्ग क्रिकेट, फिल्म तथा अन्य प्रकार के मनोरंजन के साधनों में अपनी बुद्धि यह जानते हुए भी लिप्त कर रहा है कि उनके प्रभाव अच्छे नहीं है। फिल्मों में उन काल्पनिक कथानकों पर आधारित होती हैं जिनका समाज की स्थिति से कोई संबंध नहीं है। इतना ही नहीं मनोरंजन के यह सब विषय न केवल समाज का काल्पनिक चित्रण प्रस्तुत कर लोगों को डरपोक बना रहे हैं बल्कि उनसे सट्टबाजी,जुआ और शराब के सेवन की प्रवृत्तियों को भी प्रोत्साहन भी मिल रहा है। लोग जानते हैं कि इन विषयों मेें आसक्ति का परिणाम विष पीने जैसा है मगर फिर भी लिप्त हो रहे हैं।
महान नीति विशारद कौटिल्य अपने अर्थशास्त्र में कहते हैं कि
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स्निग्धदीपशिखालोकविलेभितक्लिोचनः।
मृत्युमृच्छत्य सन्देहात् पतंगः सहसा पतन्।।
"दीपक की स्निग्ध शिखा के दर्शन से जिस पतंगे के नेत्र ललचा जाते हैं और वह उसमें जलकर जान देता है। यह रूप का विषय है इसमें संदेह नहीं है।"
गन्धलुब्धो मधुकरो दानासवपिपासया।
अभ्येत्य सुखसंजवारां गजकर्णझनज्झनाम्
"गंध की वजह से लोभी हो चुका दान मद रूपी आसव पीने की इच्छा करने वाला भंवरा सुख का अनुभव कराने वाली झनझन ध्वनि हाथी के कान के समीप जाकर मरने के लिये ही करता है।"

मनुस्मृति में प्रमाद न करने का संदेश दिया जाता है। दरअसल जीवन में आनंद उठाने के लिये अपनी इंद्रियों में अनुभूति का भाव स्थापित करने की कला आना चाहिए। तब हम फूलों की सुगंध को सूंघकर, पेड़ों की हवा के देह को स्पर्श करने पर और नदी या झील में बहते हुए जल को देखकर प्रकृति प्रदत्त मनोरंजन का सुख लिया जा सकता है। सांसरिक विषयों की प्रस्तुति में मनोरंजन की अनुभूति करने का मतलब यह कि हम आनंद का अर्थ ही नहीं जानते। सच तो यह है कि सांसरिक द्वंद्वों में रुचि लेना मनुष्य का स्वभाव है। यही कारण है कि आजकल खेलों तथा उनके प्रचार में सद्भावना कम द्वंद्व का प्रचार अधिक किया जाता है। एक टीम या खिलाड़ी को हारते तो दूसरे को जीतते देख लोग खुश हो जाते हैं पर यह नहीं जानते कि यह सब उनके जेब से माया के हरण के लिये किया जा रहा है। फिर मनोरंजन केवल आंखें, मुख तथा कान तक सीमित होकर रह जाता है, हृदय को छू तक नहीं पाता। ऐसे में समय, पैसा तथा मानसिक तथा दृढ़ता में गिरावट के अलावा कोई दूसरा फल नहीं मिलता।

लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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Saturday, January 29, 2011

अल्पचित्त वालों को बुढ़ापा जल्दी घेरता है-हिन्दी चिंत्तन आलेख (alpachitta vale aur budhape-hindi chittan aalekh)

कुछ पुरुषों का स्वभाव ही ऐसा होता है कि वह किसी स्त्री का चेहरा देखने के लिये व्यग्र रहते हैं। वैसे यह तो मानवीय स्वभाव है कि विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण रहता है पर कुछ पुरुष स्त्रियों को देखकर अपनी सुधबुध खो बैठते हैं। इतना ही नहीं कुछ तो ऐसे भी होते हैं जो वैसे बहुत खामोश रहते हैं पर स्त्री पास हो तो वाचाल हो उठते हैं। ऐसे पुरुष अल्पचित वाले होते हैं। उनके चित्त में दृढ़ता का अभाव होता है। परिणाम यह होता है कि युवावस्था बीत जाने पर उनकी दैहिक सक्रियता समाप्त हो जाती है और बुढ़ापे का रोग उनको घेर लेता है।
इस बारे में कौटिल्य महाराज अपने अर्थशास्त्र में कहते हैं कि
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स्त्रीमुखालोकतनया व्यग्राणामल्पचेतसां।
ईहितानि हि गच्छन्ति यौवनेन सह क्षयम्।।
‘‘जिन पुरुषों का चित्त का भाव अल्प है वह हमेशा किसी स्त्री का मुख देखने के लिये व्यग्र रहते हैें। उनकी सब चेष्टायें उनकी जवानी बीतने के साथ ही समाप्त हो जाती हैं।’’
हमारी फिल्मों ने युवा पीढ़ी में अतिशीघ्र बुढ़ापा लाने का काम बखूबी किया है। उन फिल्मों में कहानी के नाम पर तो पूरा केंद्र नायक रहता है और नायिका का पात्र केवल नाच गाने या रोने हंसने तक ही सीमित रह जाता है। कभी कभी तो ऐसी फिल्में भी बनायी जाती हैं जिनका उद्देश्य यही होता है कि स्त्री चेहरों की चमक दिखाकर युवा दर्शक से पैसा ऐंठा जाये। सच कहें तो फिल्में केवल युवाओं के मन में युवा स्त्री चेहरे देखने की व्यग्रता देखने की इच्छा का दोहन करने के लिये बनायी जाती हैं। यही कारण है कि कई फिल्मों में कहानियां तो नाम की होती हैं जो केवल इसलिये ही लिखी जाती हैं कि अच्छी अच्छी हीरोईनों का चेहरा किसी तरह दिखाकर युवाओं को भ्रमित किया जाये।
अविवाहित युवक अपने जीवन में ऐसी ही अभिनेत्रियों जैसी पत्नी की कामना करने लगते हैं जो कि संभव नहीं हो पाता। जब यथार्थ में जीवन संगिनी मिलती है शुरुआती दौर के बाद उससे युवाओं का मोह भंग हो जाता है। फिर शुरुआत होता है उदासीनता का दौर जो कहीं तनाव का कारण बनता है तो कहीं बुढ़ापे का। यह संभव नहीं है कि यथार्थ जीवनी में कोई स्त्री प्रतिदिन वैसा ही श्रृंगार करे जैसा कि फिल्मों में होता है।
सच बात तो यह है कि इन्हीं फिल्मों की वजह से ही हमारे देश की युवापीढ़ी अल्प चित वाली हो गयी है और इस वजह से लोग ही चिंतन, मनन तथा अध्यात्मिक अध्ययन से दूर होते जा रहे हैं।
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संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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