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Sunday, January 30, 2011

सभी गृहस्थ यज्ञ नहीं करते- हिन्दी चिंत्तन लेख (grahastha aur yagya-hindi chintan lekh)

कुछ लोग प्रत्यक्ष रूप से भक्त तथा यज्ञ करते नहीं दिखते हैं और न ही भक्त होने का पाखंड रचते हैं जबकि समाज में ऐसे लोगों की संख्या अधिक है जो धर्म के नाम पर कर्मकांड अथवा यज्ञ करने के लिये दबाव बनाते हैं। अनेक लोग बिना किसी दिखावे के सात्विक जीवन जीते हैं पर चूंकि वह हवन तथा यज्ञ आदि नहीं करते तो लोग उनको नास्तिक होने का ताना देते हैं। सच बात तो यह है कि यज्ञ तथा हवन आदि करने से अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि मनुष्य हृदय में तत्व ज्ञान धारण करे। इसके लिये प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए। नियमित अध्ययन करने से जिज्ञासा बढ़ती है और अभ्यास से तत्वज्ञान का अनुभव हो जाता है।
इस विषय पर मनुस्मृति में कहा गया है कि
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यथायथा हि पुरुषः शास्त्रं समधिगच्छति।
तथातथा विज्ञानाति विज्ञानं चास्य रोचते।।
‘‘जैसे जैसे कोई व्यक्ति शास्त्र का अभ्यास करता है वैसे ही उसे गूढ़ ज्ञान की प्राप्ति होती है और उसकी प्रवृत्ति और जिज्ञासा ज्ञान विज्ञान में बढ़ती जाती है।’’
एक बात निश्चित है कि हमारे पुराने ग्रंथों में ज्ञान के साथ विज्ञान भी अंतर्निहित है। कुछ लोग आज विज्ञान के युग में भारतीय अध्यात्मिक दर्शन को हेय मानते हैं पर उनको यह पता ही नहीं कि विज्ञान का आधार भी तत्वज्ञान है जिसके कारण हमारे प्राचीन अध्यात्मिक ग्रंथ विज्ञान के विषय में सामग्री से परिपूर्ण हैं।
कुछ लोग मंदिर न जाने या यज्ञों तथा हवनों में सक्रिय भागीदारी न करने वाले लोगों पर कटाक्ष करते हैं पर यह उनका ही अज्ञान है।
इस विषय पर मनुस्मृति में कहा गया है कि
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‘‘शास्त्रों के ज्ञाता कुछ गृहस्थ यज्ञादि नहीं करते पर अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण कर अपनी अध्यात्मिक शक्ति में वृद्धि करते हैं। उनके लिये लिये नाक, जीभ, त्वचा, तथा कान पर संयम रखना ही एक तरह से महायज्ञ है।
सच बात तो यह है कि धर्म तभी ही प्रशंसनीय है जब वह आचरण तथा कर्म में दृष्टिगोचर हो न कि केवल कर्मकांड और दिखावे में। कुछ लोग जो प्रतिदिन मंदिर जाते हैं वह दूसरों को अभक्त समझते हैं जो कि उनके अज्ञान का प्रमाण है। इतना ही नहीं कुछ तो लोग ऐसे हैं जो प्रतिदिन पूजा आदि करते हैं पर व्यवहार में ऐसा अहंकार दिखाते हैं जैसे कि वही भगवान के इकलौते भक्त हों। जो वास्तव में भक्त और ज्ञानी हैं वह दिखावे से अधिक आत्मनियंत्रण तथा आचरण से उसे प्रमाणित करते हैं।
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संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com

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Saturday, January 29, 2011

अल्पचित्त वालों को बुढ़ापा जल्दी घेरता है-हिन्दी चिंत्तन आलेख (alpachitta vale aur budhape-hindi chittan aalekh)

कुछ पुरुषों का स्वभाव ही ऐसा होता है कि वह किसी स्त्री का चेहरा देखने के लिये व्यग्र रहते हैं। वैसे यह तो मानवीय स्वभाव है कि विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण रहता है पर कुछ पुरुष स्त्रियों को देखकर अपनी सुधबुध खो बैठते हैं। इतना ही नहीं कुछ तो ऐसे भी होते हैं जो वैसे बहुत खामोश रहते हैं पर स्त्री पास हो तो वाचाल हो उठते हैं। ऐसे पुरुष अल्पचित वाले होते हैं। उनके चित्त में दृढ़ता का अभाव होता है। परिणाम यह होता है कि युवावस्था बीत जाने पर उनकी दैहिक सक्रियता समाप्त हो जाती है और बुढ़ापे का रोग उनको घेर लेता है।
इस बारे में कौटिल्य महाराज अपने अर्थशास्त्र में कहते हैं कि
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स्त्रीमुखालोकतनया व्यग्राणामल्पचेतसां।
ईहितानि हि गच्छन्ति यौवनेन सह क्षयम्।।
‘‘जिन पुरुषों का चित्त का भाव अल्प है वह हमेशा किसी स्त्री का मुख देखने के लिये व्यग्र रहते हैें। उनकी सब चेष्टायें उनकी जवानी बीतने के साथ ही समाप्त हो जाती हैं।’’
हमारी फिल्मों ने युवा पीढ़ी में अतिशीघ्र बुढ़ापा लाने का काम बखूबी किया है। उन फिल्मों में कहानी के नाम पर तो पूरा केंद्र नायक रहता है और नायिका का पात्र केवल नाच गाने या रोने हंसने तक ही सीमित रह जाता है। कभी कभी तो ऐसी फिल्में भी बनायी जाती हैं जिनका उद्देश्य यही होता है कि स्त्री चेहरों की चमक दिखाकर युवा दर्शक से पैसा ऐंठा जाये। सच कहें तो फिल्में केवल युवाओं के मन में युवा स्त्री चेहरे देखने की व्यग्रता देखने की इच्छा का दोहन करने के लिये बनायी जाती हैं। यही कारण है कि कई फिल्मों में कहानियां तो नाम की होती हैं जो केवल इसलिये ही लिखी जाती हैं कि अच्छी अच्छी हीरोईनों का चेहरा किसी तरह दिखाकर युवाओं को भ्रमित किया जाये।
अविवाहित युवक अपने जीवन में ऐसी ही अभिनेत्रियों जैसी पत्नी की कामना करने लगते हैं जो कि संभव नहीं हो पाता। जब यथार्थ में जीवन संगिनी मिलती है शुरुआती दौर के बाद उससे युवाओं का मोह भंग हो जाता है। फिर शुरुआत होता है उदासीनता का दौर जो कहीं तनाव का कारण बनता है तो कहीं बुढ़ापे का। यह संभव नहीं है कि यथार्थ जीवनी में कोई स्त्री प्रतिदिन वैसा ही श्रृंगार करे जैसा कि फिल्मों में होता है।
सच बात तो यह है कि इन्हीं फिल्मों की वजह से ही हमारे देश की युवापीढ़ी अल्प चित वाली हो गयी है और इस वजह से लोग ही चिंतन, मनन तथा अध्यात्मिक अध्ययन से दूर होते जा रहे हैं।
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संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
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