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Friday, July 1, 2011

अध्ययन करने से पहले और बाद में आंखों से पानी को स्पर्श करना उपयोगी-हिन्दी चिंत्तन लेख (study, word and water-hindi chinttan lekh)

          वायु तथा जल को न केवल जीवन का आधार माना गया है कि बल्कि उनको ओषधि भी कहा जाता है। जिस तरह प्रातः प्राणायाम से शुद्ध वायु के प्रवेश से शरीर और मन के आंतरिक विकार बाहर निकलते हैं उसी तरह नहाने के दौरान जल के उपयोग से बाहरी अंगों पर शुद्धता आती है। आधुनिक विज्ञान जल की उपयोगिता को लेकर अनेक अनुंसधान कर चुका है। हालांकि हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों में भी इस विषय पर अनेक बातें कही गयी है।
          मनु स्मृति में कहा गया है कि
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            कृत्वा मूत्रं पूरीपं वा खान्याचान्त उपस्पृशेत्।
            वेदमध्येध्माणश्च अन्नमश्नंश्च सर्वदा
       "मल मूत्र करने के बाद व्यक्ति को सदैव हाथ धोकर आचमन करने के साथ ही पानी का स्पर्श आंखों पर करना चाहिए। सदैव वेद पढ़ने तथा भोजन करने से पहले भी हाथ धोकर आचमन करना चाहिए।"
                आजकल कंप्यूटर का उपयोग बढ़ता जा रहा है पर उससे होने वाली हानियों से रोकने और बचने के उपाय बहुत कम  लोग जानते हैं। कुछ स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि कंप्यूटर का उपयोग करने वालों को बीस मिनट से अधिक उस पर काम करने के बाद दो मिनट आंखें बंद रखना चाहिए। इसके अलावा कंप्यूटर से उठकर बाहर आसमान में ताकना चाहिए ताकि आंखों के उन सूक्ष्म तंतुओं का विस्तार होता है जो काम के दौरान सिकुड़ जाते है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कही गयी है कि कंप्यूटर पर काम करने वालों को अपनी आंखों में पानी की छींटें मारते रहना चाहिए। कंप्यूटर पर काम करते हुए आंखों में जल सूखने लगता है और आंखों में छींटे मारने से वहां ताजगी आती है। मनृस्मृति में भी कहा गया है कि वेद आदि का अध्ययन करने से पहले और बाद दोनों ही समय आंखों में जल का प्रवेश कराना चाहिए। यही बात हम कंप्यूटर पर काम करते समय भी लागू कर सकते हैं। ऐसे प्रयासों से बहुत सीमा तक कंप्यूटर से होने वाली हानियों से बचा जा सकता है।
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',ग्वालियर
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com
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Sunday, April 3, 2011

मौत से अधिक घातक व्यसन-हिन्दू धार्मिक चिंत्तन (vyasan adhik ghatak-hindu dharamik chittan)

पहले आदमी प्रारंभ में शौक के लिये जुआ, सट्टा या तंबाकू सेवन का व्यसन अपने अंदर पालता है और बाद में वह सब उसके मन के ऐसे स्वामी बन जाते हैं जिसके बिना जीवित रहना ही उसे कठिन लगता है। यह तो प्रमाणिक व्यसन हैं पर कुछ ऐसे भी हैं जिनको व्यसन के रूप में हमारे प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में कहीं वर्णित नहीं किया गया क्योंकि उनका प्रादुर्भाव तो आधुनिक युग की देन है। क्रिकेट मैच, फिल्में, मोबाइल पर अनावश्यक रूप से चिपके रहना तथा टीवी धारावाहिकों को देखना भी ऐसे ही व्यसन हैं जिनमें आंखें और मन दोनों ही खराब होता है। वैसे आजकल हम अनावश्यक रूप से मोबाइल का उपयोग करना भी व्यवसन मान सकते हैं। ऐसे व्यसन पश्चिम की ही देन है और वहां के विशेषज्ञ ही यह मानते हैं कि रंगीन टीवी सतत देखना या मोबाइल का अधिक उपयोग इंसान के शरीर और मन के लिये घातक है।
व्यसनों के विषय में मनुमहाराज कहते हैं कि
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व्यसनस्य च मृत्योश्च व्यसनं कष्टमुच्यते।
व्यसन्यधोऽधोव्रजति स्वर्यात्यव्यसनी मृतः।।
‘‘मृत्यु तथा व्यसन में व्यसन अधिक पीड़ा देने वाला होता है। व्यसन करने वाले व्यक्ति का सतत पतन होता जाता है जबकि व्यसन रहित मृत्यु के बाद भी स्वर्ग प्राप्त करता है।’’
आधुनिक व्यापार जगत ने आम समाज के लिये मनोरंजन के नाम पर ऐसी व्यवस्था की है जिसमें एक के बाद एक नया दृश्य सामने आता है। पहले क्रिकेट तो फिर फिल्म और फिर कहीं फुटबाल होती थी अब तो मोबाइल भी एक ऐसा मनोरंजन का साधन बन गया है जिसमें लोग प्राणप्रण से जुटे रहते हैं। कहीं भीड़ में खड़े हो जाओ तो आसपास दस में से पांच लोग मोबाइल पर बात करते नज़र आते हैं।
यह समाज पहले भी तो चल रहा था पर ऐसा क्या हो गया है कि अब उसके लिये मोबाइल, किक्रेट या फिल्म का होना अनिवार्य हो गया है। सच तो यह है कि विकास के साथ सामाजिक संबंध सिकुड़ रहे हैं और इसी वजह से तनाव से उपजने वाली बीमारियां बढ़ भी रही हैं। हमने सुविधाओं का उपयोग व्यसन बना दिया है। ध्यान और योग की बजाय शोर शराबे से भक्ति करने की आदत बन गयी है। तत्वज्ञान से परे होकर हम संसार की वस्तुओं और व्यक्तियों में प्रसन्नता ढूंढने लगे हैं। किसी व्यक्ति का स्वभाव, आदतें तथा व्यवहार देखने की बजाय उसके मुख तथा आभामंडल देखकर उसके प्रशसंक बन जाते हैं। व्यसनों ने हमारी चिंत्तन क्षमता को समाप्त कर दिया है। ऐसे में उनसे बचने का विचार करना चाहिए।
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लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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Sunday, March 27, 2011

शब्द चोरी करने वाला सबसे बड़ा चोर-हिन्दू धार्मिक लेख (shabd chori karane wala sabse bada chor-hindu dharmik lekh)

हमारी पांच इंद्रियां आंख, कान, नाम. मुख तथा हाथ पांव अपना काम करती हैं। यह देह में स्थित मन, बुद्धि तथा अहंकार की प्रकृतियों से नियंत्रित होती है। हमारी देह बाहरी गतिविधियों से प्रभावित होती है। वह नाक से सुगंध ग्रहण करती है, आंखों से सांसरिक रूप देखती और कान से शब्द स्वर सुनती है। मुख से रस ग्रहण करती है और शरीर से स्पर्श अनुभव करती है। हम बाहरी गतिविधियों से प्रभावित होते हैं इसलिये शब्द बोलने और सुनने का प्रभाव भी अनुभव करते हैं। जिन लोगों के पास तत्वज्ञान नहीं है वह अपनी इंद्रियों की गतिविधियों और उनके प्रभाव से अवगत न होने के कारण हमेशा असहजता की स्थिति में रहते हैं। खासतौर से शब्दों में मामले में लापरवाह होते हैं। न केवल अनाप शनाप शब्द बोलते हैं बल्कि बकवास करने वालों की संगत भी करते हैं।
मनुस्मृति में कहा गया गया है कि
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वाच्यार्था नियताः सर्वेवांमूलाः वाग्विनिःसृताः।
तां तु यः स्तेदयेद्वाचं स सर्वस्तेयकृन्नरः।।
‘‘शब्द से सभी अर्थ उत्पन्न होते हैं। उनके बोलने से ही सभी का ज्ञान होता है। समस्त शास्त्रों ं का प्रादुर्भाव शब्द से ही हुआ है। अतः शब्द ही संसार का मूलाधार है। अतः झूठ बोलने वाला या दूसरे के शब्द चोरी करने वाला सबसे बड़ा चोर है।’
एक दूसरी बात भी सामने आती है। अक्सर कुछ लोग दूसरे की कही बात अपने नाम से कहते हैं। वैसे हम हिन्दी साहित्य जगत में यह भी देखते हैं कि विचार, कविता और कथाऐं चोरी कर ली जाती हैं। हिन्दी में इंटरनेट पर कुछ सामान्य लोग अपनी रचनाऐं लिखते हैं और अनेक पत्र पत्रिकाऐं चोरी कर उसे छाप देती हैं। ऐसा भी हुआ है कि अध्यात्मिक विषयों के लेखों की चोरी कर लेखक से कहा जाता है कि ‘आप तो वैसे ही सेवा कर रहे हैं पर नाम की चिंता क्यों करते हैं।’
कहने का अभिप्राय यह है कि यह चोरी सबसे बड़ा पाप है। इसके अलावा आजकल तो झूठ बोलने का फैशन हो गया है। लोग झूठ बोलना चालाकी मानने लगे हैं। समाज में इसलिये ही नैतिक पतन चरम पर पहुंच गया है। संवेदनाऐं मर गयी हैं और भले मनुष्य होने का दावा सभी करते हैं पर कुछ लोग पशुओं से अधिक बुरा व्यवहार करने लगे हैं। हमें ऐसी बुराई से बचना चाहिए जिसके पाप का पश्चाताप नहीं किया जा सके, पर इसके लिये यह जरूरी है कि पाप क्या है और पुण्य क्या, इस बात को समझें।
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लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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Saturday, March 19, 2011

क्रोध और निराशा आने पर ओम शब्द का जाप करें-हिन्दी चिन्त्तन लेख (krodh aur nirasha mein om shabd ka jaap karen-hindi chinttan aalekh)

क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। क्रोध की उत्पति अहंकार से होती है जो कि अज्ञानियों में कूटकुटकर भरा होता है। जीवन से लेकर मृत्यु तक के सफर को तत्वज्ञान की दृष्टि से देखने वाले जानते हैं कि यहां कुछ भी अच्छा या बुरा नहीं है। यह संसार त्रिगुणमयी माया से संचालित है और हर जीव अपने गुणों के वशीभूत होकर व्यवहार करता है। जिन लोगों का रहन सहन गलत स्थान और वातावरण में है उनसे सद्व्यवहार करने की आशा करना ही मूर्खता है। जिनके पास अध्यात्मिक ज्ञान नहीं है वह इस संसार को अपनी शक्ति से संचालित होने का भ्रम पालकर अपने कर्म का परिणाम सम्मान और दान के रूप में चाहते हैं। ऐसा न होने पर वह क्रोध का शिकार होकर हिंसा करते हैं और फिर अंततः उसका दुष्परिणाम भी उनके सामने आता है तब वह उन पलों को कोसते हैं जब उनको क्रोध आया था। आजकल की युवा पीढ़ी व्यसनों के साथ ही जुआ और सट्टे जैसे अपराधों के साथ जुड़ रही है। फिल्म और टीवी धारावाहिकों में मेकअप से सजे कृत्रिम सौंदर्य से उनकी बृद्धि दिग्भ्रमित हो जाती है और उनके अंदर यौन अपराध की वृत्तियां पनपती हैं। सब तरफ से निराश होने पर उनके अंदर क्रोध पैदा होता है और अंततः वह हिंसक मार्ग पर चल पड़ते हैं।
इस विषय पर मनुमहाराज कहते हैं कि
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परस्यं दण्डं नोद्यच्छेत्क्रुद्धोनैनं।
अन्यत्र पुत्राच्छिष्याद्वा शिष्टयर्थ ताडयेत्तु तौ।।
"कभी क्रोध भी आये तब भी किसी अन्य मनुष्य को मारने के लिये डंडा नहीं उठाना चाहिये। मनुष्य केवल अपने पुत्र या शिष्य को ही पीटने का हक रखता है।"
ताडयित्त्वा तृपोनापि संरम्भान्मतिपूर्वकम्।
एकविंशतिमाजातोः पापयेनिषु जायसे।।
"अपनी जाग्रतावस्था में जो व्यक्ति अपने गुरु या आचार्य को तिनका भी मारता है तो वह इक्कीस बार पाप योनियों में जन्म लेता है।"
जिन लोगों ने क्रोधवश हिंसा की है और उसका परिणाम भोगा है, उनसे अगर अपने अपराध की चर्चा की जाये तो वह इस बात को मानते हैं कि उन्होंने आवेश में आकर ऐसा अपराध किया जिससे वह बच सकते थे। इसका सीधा मतलब यह है कि उनसे हुआ अपराध हालातों से नहीं बल्कि उनके स्वयं के अपने आवेश की वजह से हुआ था। अनेक जगह तो ऐसे झगड़े होते हैं जिनमें विषय इतना गौण होता है कि देखने और सुनने वाले हंसते हैं। क्रोध का शिकार होने वाले पीड़ित हों या अपराधी अपनी जान ऐसे विषय पर गंवाते हैं जिससे टाला जा सकता था। अंतः जब अपने अंदर क्रोध आये तो उस पर नियंत्रण करना चाहिए। इसका सीधा उपाय यह है कि जब हमें लगे कि निराशा और क्रोध हमारे अंदर आ रहा है तब ओम शब्द का जाप करें। अगर कोई दूसरा मंत्र जपते हैं तो उसका जाप आरंभ करें।
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लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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Sunday, January 30, 2011

सभी गृहस्थ यज्ञ नहीं करते- हिन्दी चिंत्तन लेख (grahastha aur yagya-hindi chintan lekh)

कुछ लोग प्रत्यक्ष रूप से भक्त तथा यज्ञ करते नहीं दिखते हैं और न ही भक्त होने का पाखंड रचते हैं जबकि समाज में ऐसे लोगों की संख्या अधिक है जो धर्म के नाम पर कर्मकांड अथवा यज्ञ करने के लिये दबाव बनाते हैं। अनेक लोग बिना किसी दिखावे के सात्विक जीवन जीते हैं पर चूंकि वह हवन तथा यज्ञ आदि नहीं करते तो लोग उनको नास्तिक होने का ताना देते हैं। सच बात तो यह है कि यज्ञ तथा हवन आदि करने से अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि मनुष्य हृदय में तत्व ज्ञान धारण करे। इसके लिये प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए। नियमित अध्ययन करने से जिज्ञासा बढ़ती है और अभ्यास से तत्वज्ञान का अनुभव हो जाता है।
इस विषय पर मनुस्मृति में कहा गया है कि
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यथायथा हि पुरुषः शास्त्रं समधिगच्छति।
तथातथा विज्ञानाति विज्ञानं चास्य रोचते।।
‘‘जैसे जैसे कोई व्यक्ति शास्त्र का अभ्यास करता है वैसे ही उसे गूढ़ ज्ञान की प्राप्ति होती है और उसकी प्रवृत्ति और जिज्ञासा ज्ञान विज्ञान में बढ़ती जाती है।’’
एक बात निश्चित है कि हमारे पुराने ग्रंथों में ज्ञान के साथ विज्ञान भी अंतर्निहित है। कुछ लोग आज विज्ञान के युग में भारतीय अध्यात्मिक दर्शन को हेय मानते हैं पर उनको यह पता ही नहीं कि विज्ञान का आधार भी तत्वज्ञान है जिसके कारण हमारे प्राचीन अध्यात्मिक ग्रंथ विज्ञान के विषय में सामग्री से परिपूर्ण हैं।
कुछ लोग मंदिर न जाने या यज्ञों तथा हवनों में सक्रिय भागीदारी न करने वाले लोगों पर कटाक्ष करते हैं पर यह उनका ही अज्ञान है।
इस विषय पर मनुस्मृति में कहा गया है कि
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‘‘शास्त्रों के ज्ञाता कुछ गृहस्थ यज्ञादि नहीं करते पर अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण कर अपनी अध्यात्मिक शक्ति में वृद्धि करते हैं। उनके लिये लिये नाक, जीभ, त्वचा, तथा कान पर संयम रखना ही एक तरह से महायज्ञ है।
सच बात तो यह है कि धर्म तभी ही प्रशंसनीय है जब वह आचरण तथा कर्म में दृष्टिगोचर हो न कि केवल कर्मकांड और दिखावे में। कुछ लोग जो प्रतिदिन मंदिर जाते हैं वह दूसरों को अभक्त समझते हैं जो कि उनके अज्ञान का प्रमाण है। इतना ही नहीं कुछ तो लोग ऐसे हैं जो प्रतिदिन पूजा आदि करते हैं पर व्यवहार में ऐसा अहंकार दिखाते हैं जैसे कि वही भगवान के इकलौते भक्त हों। जो वास्तव में भक्त और ज्ञानी हैं वह दिखावे से अधिक आत्मनियंत्रण तथा आचरण से उसे प्रमाणित करते हैं।
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संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका
६.अमृत सन्देश पत्रिका

Sunday, December 30, 2007

मनुस्मृति:जिसका मांस खाएं उसके भक्षक

मनुस्मृति से
  • जो जिस जीव का मांस खाता है, वह उसका भक्षक होता है। मछली सभी जीवों का मांस खाती है अत: उसको खाने वाला सर्वभक्षक होता है। सर्व भक्षक बनने के पाप से बचने के लिए मछली का नही खाएं.
  • यदि घी वाले मिठाई, जो जौ-गेहूँ आदि को दूध में पकाकर बनाई गयी हो, बहुत दिनों से रखी हुई भी हो तब भी उसे खा लेना चाहिए।
  • भैंस के अतिरिक सभी वनैले पशुओं का दूध पीने योग्य नहीं होता।
  • सभी प्रकार के अन्न प्रजापति ब्रह्माजी ने प्राणों के रक्षा के लिए ही बनाए हैं।

Saturday, December 8, 2007

मनु स्मृति: धर्म के होते हैं दस लक्षण

  1. वेद स्मृति के अनुसार चारों आश्रमों में गृहस्थाश्रम श्रेष्ठ है। इसका कारण यह है कि गृहस्थाश्रम में रहने वाला ही आदमी इन तीन आश्रमों में रहने वालों का पालन करता है।
  2. वेद मंत्रों का जाप सभी को अभीष्ट फल प्रदान करता है, चाहे ज्ञानी करें या अज्ञानी, स्वर्ग के सुखों की इच्छा करने वाला करे अथवा मोक्ष की इच्छा करने वाला।
  • संकलन कर्ता का अभिमत है यहाँ स्वर्ग के सुखों से आशय यह नहीं है जो मरने के बाद प्राप्त होते है वरन इस इहलोक में भी हम वह तमाम आनंद इन मंत्रों के हृदय से उच्चारण कर प्राप्त कर सकते हैं जो इस देह के लिए अभीष्ट होते हैं।

3. धर्म के दस लक्षण हैं १.धैर्य रखना २.क्षमा करना ३.मन पर नियंत्रण करना ४,चोरी नहीं करना ५.मन,वचन और कर्म करना ६.ज्ञानेद्रियाँ एवं कामेद्रियाँ अर्थात सभी इन्द्रियों पर नियंत्रण करना ७.शास्त्र का ज्ञान प्राप्त करना ८.ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करना ९.सच बोलना १०.क्रोध नहीं करना।

4. आत्म साक्षात्कार कर लेने वाला योगी कर्मों के बंधनों में नहीं पड़ता। जो ब्रह्म के दर्शन नहीं कर पाता वही कर्तापन के अहंकार से अच्छे-बुरे कर्मों के परिणाम स्वरूप आवागमन के चक्र में पड़ता है।

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