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Saturday, May 14, 2011

शक्ति के अनुसार ही धर्म का अनुसरण करें-हिन्दू धर्म विचार

                  विश्व में अनेक प्रकार के धर्म प्रचलित हैं। इन धर्मो की स्थिति यह है कि उनमें भाषा, राष्ट्र, पवित्र पुस्तकों से उनको पहचाना जाता है। उनको अलग अलग नामों से भी पुकारा जाता है। हमारे धर्मग्रंथों की बात माने तो धर्म का कोई नाम नहीं है। न हिन्दू धर्म न सनातन धर्म। धर्म का सीधा संबंध मनुष्य के आचरण से है। कहने का अभिप्राय यह है कि मनुष्य धर्म के मार्ग पर चलता है या अधर्म का अनुसरण करता है, उसकी कोई तीसरी स्थिति नहीं है जिससे नाम से पुकारा जाये। धर्म शब्द ही अपने आप में परिपूर्ण है उसकी आचरण से व्याख्या तो की जा सकती है पर कोई नाम नहीं दिया जा सकता । हमारे धर्मग्रंथों में दान की अत्यंत व्यापक दृष्टि से व्याख्या की गयी है। उसमें निष्काम कर्म के साथ ही निष्प्रयोजन दया का भाव रखने के लिये कहा गया है। दान देने में कोई शर्त लगाना अनुचित है क्योंकि वह निष्फल हो जाता है।
          इस विषय पर हमारे धर्मग्रंथ कहते हैं कि
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          अभिगम्य कृते दानं त्रेतास्वाहूय दीयते।
          द्वापरे याचमानाय सेवया दीयते कलौ।।
              सेवादानं च निष्फलम्।।
              ‘‘सतयुग में दान सुपात्र को घर जाकर दिया जाता था। त्रेतायुग में सुपात्र को घर बुलाकर दान दिया जाता था जबकि द्वापर में याचना करने पर दान दिया जाने लगा और कलियुग में तो सेवा कराकर दान दिया जाता है। इस तरह सतयुग का दान उत्तम, त्रेतायुग का मध्यम तथा द्वापर का अधर्म का प्रतीक माना गया जबकि कलियुग में दिया गया दान तो एकदम निष्फल है।
                    कृते तु मानवो धर्मस्त्रेतायां गौतमः स्मृतः।
                 द्वापरै शंखलिखितः कलौ पाराशरः स्मृतः।।
                इस तरह पाराशर ऋषि के मतानुसार मानव को हमेशा ही धर्म का पालन करना चाहिये। जहां तक हो सके कदाचार से दूर रहते हुए अपनी सामर्थ्य के अनुसार धर्म का पालन करना ही उचित है।
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                       यह जरूरी नहीं है कि हम दूसरों की देखादेखी धर्म के सारे कर्मकांडों का अनुसरण करने लगें क्योंकि सामर्थ्य से अधिक धर्म करना भी तामस बुद्धि का परिचायक माना गया है। धर्म का संबंध मन के भाव से है। अगर मन में शुद्धता नहीं है तो सारे कर्मकांड तथा दान व्यर्थ है। अहंकार के भाव के रहते तो ज्ञान धारण करना संभव ही नहीं है और अज्ञान तो केवल अधर्म के मार्ग पर ले जाता है। इसलिये अपने नियमित कर्मों का निर्वाह सात्विक ढंग से करने के साथ ही भगवान की भक्ति तथा सामर्थ्य के अनुसार निष्प्रयोजन दया भी करना चाहिए।

लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com
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Friday, April 8, 2011

राजपद मनुष्य की बुद्धि को भ्रष्ट कर देता है-तुलसीदास के रामचरित मानस से (rajniti aur buddhi-ramcharitmanas of tulsidas)

जौं जिएँ होति न कपट कुव्वाली। केहि सोहाति रथ बाजि गजाली।।
भरतंहि दोसु देह को जाएँ । जग बोराइ राज पदु पाएँ।।
यह पद तुलसीकृत रामचरित मानस से है। बनवास में जब भरत अपने बड़े भ्राता श्रीरामचंद्र तथा लघु भ्राता लक्ष्मण से मिलने आ रहे थे तब उनके साथ गये दल के लोगों की पदचाप तथा हाथी, घोड़ों तथा रथों की तीव्र आवाजों से आकाश गुंजायमान था। उसकी ध्वनि उस स्थान तक पहुंच रही थी जहां भगवान श्रीराम अपनी धर्मपत्नी सीता तथा भ्राता लक्ष्मण सहित विराजमान थे। श्री भरत जी को दलबदल सहित आता देखकर श्रीलक्ष्मण को उनपर संशय हो गया था तब उन्होंने यह संदेह जाहिर किया कि वह हमें मारने आ रहे हैं। श्री भरत ऐसे नहीं थे पर श्रीलक्ष्मण ने जो कहा वह संसार में मनुष्य की प्रवृत्ति पर एकदम लागू होता है।
उनका कहना था कि जब किसी को राज्य प्राप्त होता है तो उस मनुष्य की देह में स्थित अहंकार की प्रवृति चरम पर पहुंच जाती है। राजा का पद किसी को भी भ्रष्ट कर देता है।
हम अक्सर समाज के शिखर पुरुषों से दया और परोपकार की आशा करते हैं पर देखते हैं कि वह तो अपने वैभव का विस्तार तथा उसके प्रदर्शन में ही अपना धर्म निभाते हैं। पद, पैसा और प्रतिष्ठा का बोझ कोई ज्ञानी ही ढो सकता है वरना तो लोगों की बुद्धि उसके नीचे दब जाती है। आदमी अपने को भगवान समझने लगता है।
राजकाज में जिसको हिस्सा मिल गया समझ लीजिये उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी। वह उसकी शक्ति प्रदर्शन करता है और अपने लिये आयी भेंट को शान समझता है। मतलब साफ है कि हम पद, पैसा, प्रतिष्ठा के शिखर पुरुषों से दया की याचना करें पर पूरी न हो तो निराश न हों क्योंकि यह तो मनुष्य का चरित्र है जिसकी व्याख्या हमारे महान लोग समय समय पर करते रहे हैं।
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लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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Saturday, September 4, 2010

भर्तृहरि नीति शतक-असिधारा व्रत का पालन करें (bhartrihari neeti shatak-asidhara vrat)

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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सन्तपन्येऽपि बृहस्पतिप्रभृतयः सम्भाविताः पञ्चषास्तान्प्रत्येष विशेष विक्रमरुची राहुर्न वैरायते।
द्वावेव प्रसते दिवाकर निशा प्रापोश्वरौ भास्करौ भ्रातः! पर्वणि पश्य दानवपतिः शीर्षावशेषाकृतिः।।

     हिन्दी में भावार्थ-आसमान में बृहस्पति समेत अनेक शक्तिशाली ग्रह हैं किन्तु पराक्रम में दिलचस्पी रखने वाला राहु उनसे कोई लड़ाई मोल नहीं लेता क्योंकि वह तो पूर्णिमा और अमावस्या के दिन अति देदीप्यमान सूर्य तथा चंद्र को ही ग्रसित करता है।
असन्तो नाभ्यर्थ्याः सुहृदपि न याच्यः कृशधनः प्रियान्यारूया वतिर्मलिनमसुभंगेऽप्यसुकरं।
विपद्युच्चैः स्थेयं पदमनुविधेयं च महतां सतां केनोद्दिष्टं विषमसिधाराव्रतमिदम्।।

     हिन्दी में भावार्थ-सदाशयी मनुष्यों के लिये कठोर असिधारा व्रत का आदेश किसने दिया? जिसमें दुष्टों से किसी प्रकार की प्रार्थना नहीं की जाती। न ही मित्रों से धन की याचना की जाती है। न्यायिक आचरण का पालन किया जाता है। मौत सामने आने पर भी उच्च विचारों की रक्षा की जाती है और महान पुरुषों के आचरण की ही अनुसरण किया जाता है।
     वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हर मनुष्य को अपने पराक्रम में ही यकीन करना चाहिए न कि अपने लक्ष्यों को दूसरों के सहारे छोड़कर आलस्य बैठना चाहिए। इतना ही नहीं मित्रता या प्रतिस्पर्धा हमेशा अपने से ताकतवर लोगों की करना चाहिये न कि अपने से छोटे लोगों पर अन्याय कर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना चाहिए।
      अनेक मनुष्य अपने आसपास के लोगों को देखकर अपने लिये तुच्छ लक्ष्य निर्धारित करते हैं। थोड़ा धन आ जाने पर अपने आपको धन्य समझते हुए उसका प्रदर्शन करते हैं। यह सब उनके अज्ञान का प्रमाण है। अगर स्थिति विपरीत हो जाये तो उनका आत्मविश्वास टूट जाता है और दूसरों के कहने पर अपना मार्ग छोड़ देते हैं। अनेक लोग तो कुमार्ग पर चलने लगते हैं। सच बात तो यह है कि हर मनुष्य को भगवान ने दो हाथ, दो पांव तथा दो आंखों के साथ विचारा करने के लिये बुद्धि भी दी है। अगर मनुष्य असिधारा व्रत का पालन करे-जिसमें दुष्टों ने प्रार्थना तथा मित्रों से धना की याचना न करने के साथ ही किसी भी स्थिति में अपने सिद्धांतों का पालन किया जाता है-तो समय आने पर अपने पराक्रम से वह सफलता प्राप्त करता है। --------------
संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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Thursday, September 2, 2010

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-आलस्य छोड़कर नियत समय पर काम प्रारंभ करना श्रेयस्कर

न कार्यकालं मतिमानतिक्रामेत्कदायन।
कथञ्चिदेव भवति कार्ये योगः सुदृर्ल्लभः।।
हिन्दी में भावार्थ-
ज्ञानी और बुद्धिमान मनुष्य को चाहिये कि अपने कार्य को निश्चित समय पर पूरा करे और इसमें किसी प्रकार की कोताही न बरते। कारण यह कि किसी भी कार्य में मन लगाना दुर्लभ है। फिर जीवन में संयोग बार बार नहीं आते।
सतां मार्गेण मतिमान् काले कर्म्म समाचरेत्।
काले समाचरन्साधु रसवत्फल्मश्नुते।।
हिन्दी में भावार्थ-
ज्ञानी और बुद्धिमान मनुष्य को सत्य मार्ग पर स्थिर होकर समय आने अपना कार्य निश्चित रूप से आरंभ करना चाहिऐ। समय पर कार्य करने पर सारे फल प्रकट होते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य स्वभाव में आलस्य का भाव स्वाभाविक रूप से रहता है। संत कबीर दास जी ने कहा भी है कि ‘काल करे सो आज कर, आज करे सो अब, पल में प्रलय हो जायेगी बहुरि करेगा कब।’ हर मनुष्य सोचता है कि अपना काम तो वह कभी भी कर सकता है पर ऐसा सोचते हुए उसका समय निकलता जाता है। चतुर मनुष्य इस बात को जानते हैं इसलिये ही वह विकास के पथ पर चलते हैं। अक्सर लोग अपनी असफलता और निराशा को लेकर भाग्य को कोसते हैं जबकि वास्तविकता यह है कि विकास का समय हर आदमी के पास आता है और जो अपने ज्ञान और विवेक से उसका लाभ उठाते हैं उनकी पीढ़ियों का भी भविष्य सुधर जाता है। संसार में सफल और प्रभावशाली व्यक्त्तिव का स्वामी, उद्योगपति, तथा प्रतिष्ठाप्राप्त लोगों की संख्या आम लोगों से कम होती है इसका कारण यह है कि सभी लोग समय का महत्व नहीं समझते और आलस्य के भाव से ग्रसित रहते हैं।
जीवन में निरंतर सक्रिय रहने से मनुष्य के चेहरे और मन में स्फूर्ति बनी रहती है और बड़ी आयु होने पर भी उसका अहसास नहीं होता। आलस्य मनुष्य का एक बड़ा शत्रु माना जाता है इसलिये उससे मुक्ति पाना ही श्रेयस्कर है। कोई काम सामने आने पर उसको तुरंत प्रारंभ कर देना चाहिये यही जीवन में सफलता का मूलमंत्र है। 
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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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Wednesday, July 28, 2010

रहीम के दोहे-किसी के कहने से मर्यादा कम नहीं हो जाती (maryada-rahim ke dohe)

आजकल हर कोई प्रशंसा का भूखा है। मुश्किल यह है कि लोग आजकल केवल धनिकों तथा उच्च पदस्थ लोगों की झूठी प्रशंसा करने के इस कदर हावी हैं कि निष्काम भाव से कार्यरत लोगों को फालतू का आदमी समझा जाता है। सज्जन आदमी की बजाय धन तथा स्वार्थ पूर्ति के लिये दुष्ट की ही प्रशंसा करते हैं। यही कारण है कि समाज में उच्छ्रंखल प्रवृत्ति के लोग मर्यादाऐं तोड़ते हुए वाहवाही बटोरते हैं। हालांकि इसके बाद में न केवल उनको बल्कि समाज को भी दुष्परिणाम भोगने पड़ते हैं। इसलिये न तो तो उच्छ्रंखलता स्वयं बरतनी चाहिए न किसी को प्रोत्साहित करना चाहिए।
जो बड़ेन को लघु कहें, नहिं रहीम घटि जाहिं
गिरधर मुरलीधर कहे, कछु दुख मानत नाहिं
कविवर रहीम कहते हैं कि बड़े लोगों को कोई छोटा कहता है तो वह छोटे नहीं हो जाते। भगवान श्री कृष्ण जिन्होंने गिरधर पर्वत उठाया उनको कुछ लोग मुरलीधर भी कहते हैं पर इससे उनकी मर्यादा कम नहीं हो जाती।
जो मरजाद चली सदा, सोई तो ठहराय
जो जल उमगै पारतें, कहे रहीम बहि जाय
कविवर रहीम कहते हैं कि जो सदा से मर्यादा चली आती है, वही स्थिर रहती है। जो पानी नदी के तट को पार करके जाता है वह बेकार हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-कई लोगों को तब बहुत पीड़ा होती है जब कोई उनको छोटा या महत्वहीन बताता है। सच बात तो यह है कि आजकल हर कोई एक-दूसरे को छोटा बताकर अपना महत्व साबित करना चाहता है। ऐसे में कोई व्यक्ति अगर हमको छोटा कहता है या आलोचना करता है तो उसे सहज भाव से ग्रहण करना चाहिए। अपने मन में यह सोचना चाहिए कि जो हम और हमारा कार्य है वह अपने आप हमारा महत्व साबित कर देगा। भौतिक साधनों की उपलब्धता आदमी को बड़ा नही बनाती और उनका अभाव छोटा नहीं बनाती। आजकल के युग में जिसके पास भौतिक साधनों का भंडार है लोग उसे बड़ा कहते है और जिसके पास नहीं है उसे छोटा कहते है। जबकि वास्तविकता यह है कि जो अपने चरित्र में दृढ़ रहते हुए मर्यादित जीवन व्यतीत करता है वही व्यक्ति बड़ा है। इसलिये अगर हम इस कसौटी पर अपने को खरा अनुभव करते हैं तो फिर लोगों की आलोचना को अनसुना कर देना चाहिए।
वैसे भी आजकल लोग आत्मप्रशंसा में ही अपनी प्रसन्नता समझते हैं और दूसरे के गुण देखने का न तो उनके पास समय और न ही इच्छा। इसलिये अच्छा काम करने के बाद यह अपेक्षा तो कतई नहीं करना चाहिये कि स्वार्थी, लालची और अहंकार लोग उसकी प्रशंसा करेंगे। कोई भी परोपकार और परमार्थ का काम अपने दिल की तसल्ली के लिये ही करना श्रेयस्कर है क्योंकि इससे ही हमारी आत्मा प्रसन्न होती है। अपने कर्तव्य और धर्म का एकाग्रता के साथ निर्वाह निष्काम भाव से करना ही श्रेयस्कर क्योंकि दूसरे से प्रशंसा या तो चाटुकारिता करने पर मिलती है यह उसके स्वार्थ पूरा करने पर।
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Sunday, June 20, 2010

श्रीगुरुग्रंथ साहिब-जाति पाति का भाव विकार बढ़ाता है

जाति का गरबु न करि मूरख गवारा।
इस गरब ते चलहि बहुतु विकारा।।
हिन्दी में भावार्थ-
गुरुवाणी में मनुष्यों को संबोधित करते हुए कहा गया है कि ‘हे मूर्ख जाति पर गर्व न कर, इसके चलते बहुत सारे विकार पैदा होते हैं।
‘हमरी जाति पाति गुरु सतिगुरु’
हिन्दी में भावार्थ-
गुरुग्रंथ साहिब में भारतीय समाज में व्याप्त जाति पाति का विरोध करते हुए कहा गया है कि हमारी जाति पाति तो केवल गुरु सत गुरु है।
‘भै काहू को देत नहि नहि भै मानत आनि।
कहु नानक सुनि रे मना गिआनी ताहि बखानि।।’
हिन्दी में भावार्थ-
गुरुग्रंथ साहिब के अनुसार जो व्यक्ति न किसी को डराता है न स्वयं किसी से डरता है वही ज्ञानी कहलाने योग्य है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-प्राचीनकाल में भारत में जाति पाति व्यवस्था थी पर उसकी वजह से समाज में कभी विघटन का वातावरण नहीं बनता था। कालांतर में विदेशी शासकों का आगमन हुआ तो उनके बौद्धिक रणनीतिकारों ने यहां फूट डालने के लिये इस जाति पाति की व्यवस्था को उभारा। इसके बाद मुगलकाल में जब विदेशी विचारधाराओं का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा था तब सभी समाज अपना अस्तित्व बचाये रखने के लिये संगठित होते गये जिसकी वजह से उनमें रूढ़ता का भाव आया और जातीय समुदायों में आपसी वैमनस्य बढ़ा जिसकी वजह से मुगलकाल लंबे समय तक भारत में जमा रहा। अंग्रेजों के समय तो फूट डालो राज करो की स्पष्ट नीति बनी और बाद मेें उनके अनुज देसी वंशज इसी राह पर चले। यही कारण है कि देश में शिक्षा बढ़ने के साथ ही जाति पाति का भाव भी तेजी से बढ़ा है। जातीय समुदायों की आपसी लड़ाई का लाभ उठाकर अनेक लोग आर्थिक, सामजिक तथा धार्मिक शिखरों पर पहुंच जाते है। यह लोग बात तो जाति पाति मिटाने की करते हैं पर इसके साथ ही कथित रूप से जातियों के विकास की बात कर आपसी वैमनस्य भी बढ़ाते है।
भारत भूमि सदैव अध्यात्म ज्ञान की पोषक रही है। हर जाति में यहां महापुरुष हुए हैं और समाज उनको पूजता है, पर कथित शिखर पुरुष अपनी आने वाली पीढ़ियों को अपनी सत्ता विरासत में सौंपने के लिये समाज में फूट डालते हैं। जो जातीय विकास की बात करते हैं वह महान अज्ञानी है। उनको इस बात का आभास नहीं है कि यहां तो लोग केवल ईश्वर में विश्वास करते हैं और जातीय समूहों से बंधे रहना उनकी केवल सीमीत आवश्यकताओं की वजह से है।
जातीय समूहों से आम लोगों के बंधे रहने की एक वजह यह है कि यहां सामूहिक हिंसा का प्रायोजन अनेक बार किया जाता है ताकि लोग अकेले होने से डरें। इस समय देश में बहुत कम ऐसे लोग होंगे जो अपने जातीय समुदायों के शिखर पुरुषों से खुश होंगे पर सामूहिक हिंसक घटनाओं की वजह से उनमें भय बना रहता है। आम आदमी में यह भय बनाये रखने के लिये निंरतर प्रयास होते हैं ताकि वह अपने जातीय शिखर पुरुषों की पकड़ में बने रहें ताकि उसका लाभ उससे ऊपर जमे लोगों को मिलता रहे। मुश्किल यह है कि आम आदमी में भी चेतना नहीं है और वह इन प्रयासों का शिकार हो जाता है। इसलिये सभी लोगों को यह समझना चाहिए कि यह जाति पाति बनाये रखकर हम केवल जातीय समुदायों के शिखर पुरुषों की सत्ता बचाते हैं जो दिखाने के लिये हमदर्द बनते हैं वरना वह तो सभी अज्ञानी है। अपने से बड़े से भय खाने और और अपने से छोटे को डराने वाले यह लोग महान अज्ञानी हैं और हमारे अज्ञान की वजह से हमारे सरताज बन जाते है।
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संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक भारतदीप
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Sunday, May 9, 2010

संत कबीर के दोहे-मोल लिया ईश्वर बोलता नहीं (parmatma ka mahatva-kabir ke dohe)

मूरति धरि धंधा रखा, पाहन का जगदीश
मोल लिया बोलै नहीं, खोटा विसवा बीस
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि लोग मूर्ति का भगवान बनाकर उसकी सेवा करने के बहाने अपना धंधा करते हैं, पर वह मोल लिया ईश्वर बोलता नहीं है इसलिये नकली है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या संपादकीय-आज से नहीं बरसों से मूर्ति पूजा के नाम पर नाटक इस देश में चल रहा है। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि और तपस्वी यही कह गये है कि ईश्वर हमारे मन में ही पर फिर भी लोग ऐसी अज्ञानता के अंधेरे में भटकते हैं जहां हर पल उनको रोशनी मिलने की आशा रहती है। मंदिर जो कभी बहुत छोटे थे वह अब बड़े होते गये और उनकी कथित चरणसेवा करने वाले कारों में घूमने लगे हैं फिर भी लोग हैं कि अंधविश्वास के लिये दौड़े जा रहे है। जिसके पास माया का शिखर है वह भी दिखावे के लिये वहां जाता है और अपने दिल को संतोष देने के अलावा वह अन्य लोगों को भी यह संदेश देता है कि वह देख वह कैसा भक्त है। जिसके पास धनाभाव है वह भी वहीं जाता है और देखता है कि वहां धनी लोगों की पूछ है पर फिर भी शायद पत्थर की प्रतिमा की दया हो जाये इस मोह में वह उस पर अपनी श्रद्धा रखता है।
दरअसल मूर्तियों की कल्पना इसलिये की गयी कि मानव मस्तिष्क में इन दैहिक आंखों से देखकर ईश्वर की कल्पना को अपने मन में स्थापित कर ध्यान लगाया जाये और फिर निरंकार की तरफ जाये। इसका कुछ लोगों ने फायदा उठाया और यह कहकर कि ‘अमुक मूर्ति सिद्ध’ है और ‘अमुक जगह सिद्ध है' जैसे भ्रम फैलाकर धंधा करते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि अशिक्षित तो ठीक शिक्षित लोग भी इन चक्करों में आ जाते है। हम देश में अनेक व्यवसायों में लोगों की संख्या का अनुमान करते हैं पर इस धर्म के धंधे में कितने लोग हैं यह कोई बता नहीं सकता है। सच तो यह है कि इस तरह की मूर्ति पूजा एक धंधा ही है जिससे बचा जाना चाहिए। जहां तक भारतीय अध्यात्म दर्शन का सवाल है तो उसमें ईश्वर को अनंत बताया गया है और ध्यान में निरंकार की कल्पना करने के लिये कहा गया है। एकदम निरंकार में ध्यान नहीं लगता इसलिये मूर्तियों की कल्पना की गयी है। इसी परंपरा का लाभ उठाकर कुछ लोग पत्थरों की मूर्तियों को सिद्ध बताकर लोगों की धार्मिक भावनाओं का दोहन करते हैं और उनकी चालों को समझना चाहिए।
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Saturday, May 8, 2010

संत कबीर के दोहे-अपनी मति नहीं तो बड़े होने से क्या लाभ (bade hone se kya labh-hindu dharma sandesh)

हाथी चढि के जो फिरै, ऊपर चंवर ढुराय
लोग कहैं सुख भोगवे, सीधे दोजख जाय
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहत हैं कि तो हाथी पर चढ़कर अपने ऊपर चंवर डुलवाते हैं और लोग समझते हैं कि वह सुख भोग रहे तो यह उनका भ्रम है वह तो अपने अभिमान के कारण सीधे नरक में जाते हैं।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जोरे बड़ मति नांहि
जैसे फूल उजाड़ को, मिथ्या हो झड़ जांहि
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि आदमी धन, पद और सम्मान पाकर बड़ा हुआ तो भी क्या अगर उसके पास अपनी मति नहीं है। वह ऐसे ही है जैसे बियावन उजड़े जंगल में फूल खिल कर बिना किसी के काम आये मुरझा जाता है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-समय ने ऐसी करवट ली है कि इस समय धर्म और जनकल्याण के नाम पर भी व्यवसाय हो गया है। इस मायावी दुनियां में यह पता ही नहीं लगता कि सत्य और माया है क्या? जिसे देखो भौतिकता की तरफ भाग रहा है। क्या साधु और क्या भक्त सब दिखावे की भक्ति में लगे हैं। राजा तो क्या संत भी अपने ऊपर चंवर डुलवाते हैं। उनको देखकर लोग वाह-वाह करते हैं। सोचते हैं हां, राजा और संत को इस तरह रहना चाहिये। सत्य तो यह है कि इस तरह तो वह भी लोग भी भ्रम में हो जाते हैं और उनमें अहंकार आ जाता है और दिखावे के लिये सभी धर्म करते हैं और फिर अपनी मायावी दुनियां में अपना रंग भी दिखाते हैं। ऐसे लोग पुण्य नहीं पाप में लिप्त है और उन्हें भगवान भक्ति से मिलने वाला सुख नहीं मिलता और वह अपने किये का दंड भोगते हैं।
यह शाश्वत सत्य है कि भक्ति का आनंद त्याग में है और मोह अनेक पापों को जन्म देता है। सच्ची भक्ति तो एकांत में होती है न कि ढोल नगाड़े बजाकर उसका प्रचार किया जाता है। हम जिन्हें बड़ा व्यक्ति या भक्त कहते हैं उनके पास अपना ज्ञान और बुद्धि कैसी है यह नहीं देखते। बड़ा आदमी वही है जो अपनी संपत्ति से वास्तव में छोटे लोगों का भला करता है न कि उसका दिखावा। आपने देखा होगा कि कई बड़े लोग अनेक कार्यक्रम गरीबों की भलाई के लिये करते हैं और फिर उसकी आय किन्हीं कल्याण संस्थाओं को देते हैं। यह सिर्फ नाटकबाजी है। वह लोग अपने को बड़ा आदमी सबित करने के लिये ही ऐसा करते हैं उनका और कोई इसके पीछे जनकल्याण करने का भाव नहीं होता।
कभी कभी तो लगता है कि जनकल्याण का नारा देने वाले लोग बड़े पद पर प्रतिष्ठत हो गये हैं पर लगता नहीं कि उनके पास अपनी मति है क्योंकि वह दूसरों की राय लेकर काम करने आदी हो गये हैं। ऐसे लोगों के लिये कल्याण तो बस दिखावा है वह तो उसके नाम पर सुख तथा एश्वर्य प्राप्त करने में ही अपने को धन्य समझते हैं।
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Sunday, April 4, 2010

श्रीगुरुग्रंथ साहिब-चिंता तो अनहोनी घटना की करना चाहिये (shri guru granth sahib-chinta n karen

‘चिंता ता की कीजीअै जो अनहोनी होइ।’
इहु मारगु संसार को नानक थिरु नहीं कोइ।।
हिन्दी में भावार्थ-
चिंता तो उस घटना की करना जो अनहोनी हो। इस संसार में तो सभी कुछ स्वाभाविक रूप घटता रहता है और यहां कुछ भी स्थिर नहीं है।
‘सहस सिआणपा लख होहि त इ न चलै नालि।’
हिन्दी में भावार्थ-
गुरुवाणी के अनुसार मनुष्य चाहे लाख चतुराईयां कर ले उसके साथ एक भी नहीं जाती।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अगर हम दृष्टा की तरह अपने जीवन को देखें तो सारे संसार में कुछ भी अस्वाभाविक नहीं दिखाई देता। श्रीमद्भागवत गीता के मतानुसार ‘गुण ही गुणों को बरतते हैं’। इसका आशय यह है कि मनुष्य को उसके कर्म के अनुसार ही फल प्राप्त होता है और जैसा व्यवहार दूसरों से वह करता है वैसा ही आता है। वह जैसी वस्तुओं का उपभोग करता है वैसा ही उसका स्वभाव होता है। जब यह बात समझ में आयेगी तब ही इस जीवन को सहजता से देखा जा सकता है। आजकल के युग में टीवी चैनल तथा अन्य प्रकाशन उद्योग विज्ञापन पर चल रहे हैं। उनको जिन स्त्रोतों से विज्ञापन मिलते हैं वह उनकी नीतियों के अनुसार ही काम करते हैं। इन विज्ञापनों के द्वारा उनको अपने ग्राहकों के उत्पाद लोगों के सामने प्रस्तुत करना होता है। ऐसे में वह अपने विज्ञापनों में ऐसे शब्द और नारे भरते हैं कि देखने, सुनने और पढ़ने वाले के मन में आकर्षण पैदा हो और वह अपनी जेब ढीली करे। अब आदमी आकर्षण के वश में आकर पैसा तो खर्च करता है पर उसकी सहजता का दौर। चीज अगर कर्जा लेकर खरीदी गयी है तो उसको चुकाने की चिंता और अगर चीज खराब हो गयी तो उसको बनवाने के लिये जूझना।
इतना ही नहीं टीवी, फिल्म और समाचार पत्रों में किसी की शादी के तो किसी के स्वयंवर के तथा किसी मर जाने पर इतना शोर मचाया जाता है जैसे कि अस्वाभाविक रूप से सब कुछ घटित हुआ हो। लोग भी उनको देखते हैं और उनका मन कभी खुशी से झूमता है तो की द्रवित होता है। यह काल्पनिक मनोरंजन कभी हृदय के लिये प्रसन्नतादायक नहीं हो सकता।

भगवान श्रीगुरुनानक देव इसलिये ही लोगों को अपने संदेशों में सहज भाव धारण करने का संदेश देते रहे क्योंकि वह जानते थे कि मनुष्य मन को विचलित कर उससे मानसिक रूप से बंधक बनाया जाता है। तमाम तरह के कर्मकांडों का निर्माण मनुष्य के मन में भय पैदा करने के लिये ही किया गया है। जन्म खुशी तो मृत्यु दुःख का विषय बन जाती है। जबकि दोनों सहज घटनायें हैं। जो बना है वह नष्ट होगा, यह इस दुनियां का सर्वमान्य सत्य है। तब चिंता किस बात की करना? चिंता को उस बाद की करना चाहिये जिसका घटना अस्वाभाविक है। मनुष्य का मन चंचल, बुद्धि भयभीत और अहंकार आसमान में टंगा है। उन पर नियंत्रण न होना ही अस्वाभाविक बात है इसलिये उसकी चिंता करना चाहिये। इसके लिये जरूरी है कि भगवान की हृदय से भक्ति की जाये।

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Saturday, January 23, 2010

संत कबीर वाणी-राम का नाम छोड़ने पर नर्क में वास होता है (ram ka nam-sant kabir vani)

मुख से नाम रटा करैं, निस दिन साधुन संग।
कहु धौं कौन कुफेर तें, नाहीं लागत रंग।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि लोग दिन रात भगवान के नाम का जाप करते हैं, साधुओं के पास जाते हैं ऐसे में किसे दोष दें कि उनके जीवन में रंग नहीं चढ़ता।
राम नाम को छाड़ि कर, करे और की आस।
कहैं कबीर ता नर को, होय नरक में वास।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं जो मनुष्य राम नाम का स्मरण छोड़कर विषय वासना में रत हो जाते हैं उनको नरक में जाकर निवास करना पड़ता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अगर हम अपने देश की वर्तमान दशा को देखें तो दुःख होने के साथ कभी कभी हंसी भी आती है।  शायद ही दुनियां में कोई ऐसा देश हो जहां भगवान नाम का स्मरण इतना होता हो पर जितना सामाजिक तथा आर्थिक भ्रष्टाचार है वह भी कहीं नहीं होगा।  लोग एक दूसरे को दिखाने के लिये भगवान का नाम लेने  साथ ही सत्संगों में जाकर साधुओं के प्रवचन सुनते हैं पर घर आकर सभी का व्यवहार मायावी हो जाता है। बड़े शहरों में नित प्रतिदिन धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन होने पर वहां लोगों के झुंड के झुंड शामिल होते हैं। कोई प्रवचन सुनता है तो कोई सुनते हुए दूसरे को भी सुनाता है।  कहने का तात्पर्य यह है कि भगवान की भक्ति लोग केवल दिखावे के लिये करते हैं और उनका लक्ष्य केवल स्वयं को धार्मिक या अध्यात्मिक व्यक्तित्व का स्वामी होने का दिखावा करना होता है।
वैसे हम लोग विषयों के पीछे भागते हैं जबकि सच तो यह है कि वह हमें कभी छोड़ते ही नहीं अलबत्ता हम उनकी सोच को अपने दिमाग में इस तरह बसा लेते हैं कि भगवान का नाम स्मरण करने का विचार ही नहीं आता।  अगर आता भी है तो खाली जुबान से लेते हैं पर उसका स्पंदन हृदय में नहीं पहुंचता क्योंकि बीच रास्ते में विषयों की सोच रूपी पहाड़ उनका मार्ग अवरुद्ध करता है। यही कारण है कि भगवान भक्ति अधिक होने के बावजूद इस देश में नैतिक आचरण गिरता जा रहा है।  बहुत कम लोग ऐसे रह गये हैं जिनमें मानवीय संवेदनायें और सद्भावना बची है।
इस दिखावे का ही परिणाम है कि मायावी समृद्धि की तरफ बढ़ रहे देश में अहंकार, संवेदनहीनता तथा भ्रष्टाचार के कारण नारकीय स्थिति की अनुभूति होती है।
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Sunday, January 17, 2010

मनुस्मृति-आलस्य छोड़कर गायत्री मंत्र और शांति पाठ का जाप करें (gaytri mantra aur shanti path,yog sadhna,pranayam-hindi lekh)

मंगलचारयुक्त्तः स्यात्प्रयतात्मजितेन्द्रियः।
जपेच्च जुहुयाच्यैव नित्यमग्निमतन्द्रितः।।
हिन्दी में भावार्थ-
व्यक्ति को सदा शुभ कर्मों में प्रवृत्त रहकर, अपने शरीर को स्वच्छ तथा हृदय को पवित्र रखते हुए, आलस्य का त्यागकर सदैव जप तथा होम अवश्य करना चाहिए।
सावित्रांछान्ति होमाश्य कुर्यात्पर्वसु नित्यशः।
पितृंश्चैवाष्टकास्वर्चयेन्तिन्त्यमन्वष्टकासु च।।
हिन्दी में भावार्थ-
अमावस्या, पूर्णमासी तथा अन्य त्यौहारों पर गायत्री मंत्र तथा शांति मंत्र का जाप अवश्यक करना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सुबह का समय हमें अपने शरीर के अंदर स्थित विकार बाहर निकाल कर ऊर्जा संचय का अवसर प्रदान करने के साथ ही मन और विचारों की शुद्धता के लिये मंत्र जपने का अवसर प्रदान करता है। प्रातःकाल धर्म संचय, मध्यान्ह अर्थ संग्रह, सायंकाल मनोरंजन और रात्रि अस्थाई मोक्ष यानि निद्रा के लिये है। प्रातःकाल को धर्म संचय को छोड़कर बाकी तीनों का तो सभी उपयोग करते हैं। आजकल तो सुबह उठते ही चाय पीन का रिवाज चल गया है। चाय हमेशा ही वायु विकार पैदा करती है और हम उसका सेवन कर सुबह से ही अपने अंदर विकार एकत्रित करने की प्रक्रिया प्रारंभ कर देते हैं।
इसके विपरीत जो लोग प्रातःकाल सैर करने के बाद नहाधोकर पूजा आदि का कार्य करते हैं उन लोगों की वाणी और विचारों की शुद्धता देखने लायक होती है। प्रातःकाल जो योग साधना, प्राणायाम, ध्यान और मंत्रोच्चार करने वाले तो वास्तव में आदर्श जीवन जीते हैं। हालांकि सुबह सैर या जिम में जाकर व्यायाम करना स्वास्थ्य के लिये लाभदायक है पर जब हम उनका त्याग करते हैंे तो फिर शरीर बेडौल होने लगता है। इसके विपरीत योग साधना का प्रभाव लंबे समय तक रहता है। इसलिये योग साधना करना ही श्रेयस्कर है। उसका महत्व इस कारण भी ज्यादा है कि उसमें प्राणायाम, ध्यान और मंत्रोच्चार की प्रक्रिया भी शामिल होती है जिसका लाभ बहुत होता है। इस दौरान गायत्री और शांति मंत्र का जाप हृदय के प्रसन्नता प्रदान करता है।
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Saturday, January 9, 2010

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-असफलता के तनाव से उपेक्षासन कर छुटकारा पायें (upekshasan-hindi sandesh)

रिपूं वातस्य बलिनः संप्राप्याविश्कृतं फलम्।
उपेक्ष्यतनिमत्रयानमुयेक्षायानमुच्यते।।
हिन्दी में भावार्थ-
जब शक्तिशाली राजा किसी अन्य राज्य पर आक्रमण करे और सफलता न मिले तो उसकी उपेक्षा कर देना चाहिये।
निवातकवचान् हित्वा हिरण्यपुरवासिनः।
उपेक्षयानमास्याय निजधान धनजयः।।
हिन्दी में भावार्थ-
महाभारत काल में अर्जुन ने हिरण्यपुर वासी जनों को छोड़कर उनकी उपेक्षा करते हुए निवातकवचों का सहंार किया था।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन में कभी भी असफलता से घबड़ाने की बजाय उसकी उपेक्षा करते हुए अपने नये लक्ष्य की तरफ बढ़ना चाहिये। यह उपेक्षासन हमें तनाव से मुक्ति दिलाता है। सभी मनुष्य अपनी बुद्धि और विवेक से जीवन में विकास पथ पर अग्रसर होते हैं पर कहीं सफलता तो कहीं असफलता मिलती है। समझदार मनुष्य अपनी असफलताओं से विचलित हुए बिना उपेक्षासन करते हुए अपनी राह पर दूसरे लक्ष्य की तरफ आगे बढ़ जाते हैं। इसके विपरीत जो असफलताओं की सोचकर बैठे रहते हैं वह जीवन में कभी खुश नहीं रह पाते। वैसे हमें अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिये योजनापूर्वक काम करना चाहिये पर यह दुनियां हमेशा हमारे अनुसार नहीं चलती। इसलिये हमारी योजना का जो भाग दूसरे पर निर्भर है उसके बारे में कोई बात निश्चितता से नहीं कही जा सकती है। अनुमान सही न होने या गलत निकलने पर जब दूसरे के योगदान का विषय गड़बड़ाता है तब हमारा अभियान अनेक बार शिथिल पड़ जाता है। इससे घबड़ाना नहीं चाहिये। मनुष्य का धर्म है कि वह हमेशा कर्म करता रहे। सफलता का आनंद तो वह उठाता ही है पर अगर असफलता मिले तो उपेक्षासन कर उसके तनाव से मुक्ति भी पा सकता है। समय का फेर होता है कभी कभी असफलता भी प्रेरणा कर कारण बनती है-इतिहास में ऐसे अनेक प्रमाण मौजूद हैं।
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Monday, December 28, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-कपटी से मित्रता में धर्म की हानि होती है (kautilya sandesh-kapti se dosto se dharm kee hani)

 मित्रं विचार्य बहुशो ज्ञातदोषं परित्येजेत्।

त्यंजन्नभूतेदोषं हि धर्मार्थावुपहन्ति हिं।।

हिन्दी में भावार्थ-
नीति विशारद कौटिल्य के अनुसार अपने मित्रों के बारे में विचार करना चाहिए। अगर उनमें छल कपट या अन्य दोष दिखाई दे तो उसे त्याग दें।  ऐसा न करने पर न केवल धर्म की हानि होती है बल्कि जीवन में कष्ट भी उठाना पड़ता है।

सा बन्धुर्योऽनुबंघाति हितऽर्ये वा हितादरः।

अनुरक्तं विरक्त वा तन्मिंत्रमुपकारि यत्।।

हिन्दी में भावार्थ-
वही बंधु है जो हमारे उद्देश्य की पूर्ति में सहायक होने के साथ आदर करने वाला हो। अनुरक्त हो या विरक्त पर उपकार आवश्यक करे वही सच्चा बंधु है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-समय के साथ समाज में खुलापन आ रहा है और मित्र संग्रह में लोगों की लापरवाही का नतीजा यह है कि सभी जगह खुद के साथ धोखे की शिकायत करते हुए मिलते हैं।  इतना ही नहीं युवा पीढ़ी तो हर मिलने और बातचीत करने वाले को अपना मित्र समझ लेती है। मित्र के गुणों की पहचान कोई नहीं करता।

मित्र का सबसे बड़ा गुण है कि वह हर समय सहयोग के लिये तत्पर दिखता  हो। इसके अलावा वह अन्य लोगों के सामने अपमानित न करे और साथ ही समान विचारधारा वाला हो। स्वभाव के विपरीत होने पर या विचारों की भिन्नता वाले से अधिक समय तक मित्रता नहीं चलती अगर चलती है तो धर्म की हानि उठानी पड़ सकती है।   इसके अलावा मित्र वह है जो कहीं अपने मित्र की गुप्त बातों को कहीं उजागर न करता हो।  इतना ही नहीं मित्र का अन्य मित्रों का समूह और कुल भी अनुकूल होना चाहिये।   अगर वह केवल दिखावे की मित्रता करता है तो आपके वह रहस्य जो दूसरों के जानने योग्य नहीं है सभी को पता चल जाते हैं।  दूसरी बात यह है कि मित्र जब हमारे साथ होता है तब हमारा लगता है पर जब दूसरी जगह होता है तो दूसरों का होता है-यह विचार भी करना चाहिये।

कुछ लोग केवल स्वार्थ की वजह से मित्रता करते हैं-वैसे आजकल अधिकतर संख्या ऐसे ही लोगों की है-इस विचार करना चाहिऐ। एकांत में  हमेशा अपने मित्र समूह पर चिंतन करते हुए जिनमें दोष दिखता है या जिनकी मित्रता सतही प्रतीत होती है उनका त्याग कर देना चाहिये।
इसके अलावा निकट रहने पर मित्र के प्रति अपने भाव का अवलोकन भी उससे कुछ समय दूर रहकर करना चाहिये। निकट रहने पर उसके प्रति मोह रहता है इसलिये यह पता नहीं लगता कि उसकी नीयत क्या है? दूर रहने पर उससे मोह कम हो जाता है तब यह पता लगता है कि उसके प्रति हमारे मन में क्या है? इतना ही न अपने बच्चों के मित्रों और मिलने जुलने वालों पर भी दृष्टिपात करना चाहिये। आजकल काम की व्यस्तताओं की वजह  से माता पिता को अपने बच्चों की देखभाल का पूरी तरह अवसर नहीं मिल पाता इसलिये उनको बरगलाने की घटनायें बढ़ रही है।  ऐसा उन्हीं माता पिता के साथ होता है जो अपने बच्चों के मित्रों की यह सोचकर उपेक्षा कर देते हैं कि ‘वह क्या कर लेगा?’
कहने का तात्पर्य यह है कि अपने घर के सदस्यों के मित्रों पर दृष्टिपात करना चाहिये। अगर अपने मित्र दोषपूर्ण लगें तो उनसे दूरी बनायें और घर के सदस्यों के हों तो उन्हें इसके लिये प्रेरित करें।  मित्र के गलत होने पर धर्म की हानि अवश्य होती है।


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Wednesday, December 23, 2009

संत कबीर वाणी-तत्वज्ञान के बिना जीवन अंधियारा (sant kabir vani-tatvagyan)

कबीर गुरु की भक्ति बिन, राज ससभ होय।
माटी लदै कुम्हार की, घास न डारै कोय।।
महात्मा कबीरदास जी कहते हैं कि गुरु की भक्ति के बिना राजा भी गधा होता है जिस पर कुम्हार दिन भर मिट्टी लादेगा और कोई घास भी नहीं डालेगा।
चौसठ दीवा जाये के, चौदह चन्दा माहिं।
तेहि घर किसका चांदना, जिहि घर सतगुरु नाहिं।
महात्मा कबीरदास जी कहते हैं कि चौसठ कलाओं और चौदह विद्याओं की जानकारी होने पर पर अगर सत्गुरु का ज्ञान नहीं है तो समझ लीजिये अंधियारे में ही रह रहे हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-समाज में बढ़ती भौतिकतावादी प्रवृत्ति ने अध्यात्मिक ज्ञान से लोगों को दूर कर दिया है। हालांकि टीवी चैनलों, रेडियो और समाचार पत्र पत्रिकाओं में अध्यात्मिक ज्ञान विषयक जानकारी प्रकाशित होती है पर व्यवसायिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिये लिखी गयी उस जानकारी में तत्व ज्ञान का अभाव होता है। कई जगह तो अध्यात्मिक ज्ञान की आड़ में धार्मिक कर्मकांडों का प्रचार किया जा रहा है। इसके अलावा टीवी चैनलों में अनेक बाबाओं के अध्यात्मिक प्रवचनों के कार्यक्रम भी प्रस्तुत होते हैं पर उनका उद्देश्य केवल मनोरंजन करना ही है। वैसे भी समाज में ऐसे गुरुओं का अभाव है जो तत्वज्ञान प्रदान कर सकें क्योंकि उसके जानने के बाद तो मनुष्य का हृदय निरंकार में लीन हो जाता है जबकि पेशेवर धर्म विक्रेता अपने शब्दों को सावधि जमा में निवेश करते हैं जिससे कि वह हमेशा पैसा और सम्मान वसूल करते रहें। कभी कभी तो लगता है कि लोग धर्म के नाम पर केवल शाब्दिक बोझा अपने सिर पर ढो रहे हैं।
दूसरी बात यह है कि मनुष्य के हृदय में अगर तत्वज्ञान स्थापित हो जाये तो वह अपने सांसरिक कार्य निर्लिप्त भाव से कार्य करते हुए किसी की परवाह नहीं करता जबकि सभी लोग चाहते हैं कि कोई उनकी परवाह करे। तत्वाज्ञान के अभाव में मनुष्य को एक तरह से गधे की तरह जीवन का बोझ ढोना पड़ता है। यह बात समझ लेना चाहिये कि जीवन तो सभी जीते हैं पर तत्वाज्ञानियों के चेहरे पर जो तेज दिखता है वह सभी में नहीं होता।
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Tuesday, December 22, 2009

विदुर नीति-अधिक धन होने पर भी अनुशासन रखना जरूरी (dhan aur anushasan-hindu dharam sandesh)

विदुर नीति में कहा गया है कि
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धर्मार्थोश्यः परित्यज्य स्यादिन्द्रियवशानगुः।
श्रीप्राणधनदारेभ्यः क्षिप्र स परिहीयते।।

           
हिन्दी में भावार्थ- जो मनुष्य धर्म और अर्थ इंद्रियों के वश में हो जाता है वह शीघ्र ही अपने ऐश्वर्य, प्राण, धन, स्त्री को अपने हाथ से गंवा बैठता है।
अर्थानामीश्वरो यः स्यादिन्द्रियाणमीनश्वरः।
इन्द्रियाणामनैश्वर्यर्दिश्वर्याद भ्रश्यते हि सः।।

     हिन्दी में भावार्थ-अधिक धन का स्वामी होने भी इंद्रियों पर अधिकार करने की बजाय उसके वश में हो जाने वाला भी मनुष्य ऐश्वर्य से भ्रष्ट हो जाता है।
     वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अनेक लोगों को यह लगता है कि अगर अधिक धन आ गया तो जैसे सारा संसार जीत लिया। इस भ्रम में अनेक लोग धन के कारण अनुशासहीनता पूर्वक जीवन व्यतीत करने लगते हैं जिसका परिणाम यह होता है कि शीघ्र ही न केवल अपना वैभव गंवाते हैं बल्कि कहीं कहीं उनको शारीरिक हानि भी झेलनी पड़ती हैं। जीवन में दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये धन का होना जरूरी है। अधिक धन है तो भी समाज में सम्मान प्राप्त होता है पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि अनुशासनहीनता बरती जाये। ऐसे ढेर सारे उदाहरण है जिसमें अनेक धनपतियों की औलादें मदांध होकर ऐसे अपराधिक कार्य इस आशय से करती हैं कि उनके पालक धन से कानून खरीद लेंगे। ऐसा होता भी है पर उसकी एक सीमा होती है जहां उसका अतिक्रमण होता है वहां फिर सींखचों के अंदर भी जाना पड़ता है। इस समय ऐसा दौर भी है जिसमें धनपति स्वयं और उनकी औलादें समाज में अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिये अनुशासन हीनता दिखाते हैं। धन उनकी आंखों बंद कर देता है और उनको यह ज्ञान नहीं रहता कि आजकल प्रचार माध्यम सशक्त हो गये हैं जिनकी वजह से हर समाचार बहुत जल्दी ही लोगों तक पहुंचता है। भले ही यह प्रचार माध्यम भी धनपतियों के हैं पर उनको अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिये सनसनीखेज खबरों की आवश्यकता होती है और ऐसे में किसी धनी, प्रतिष्ठित या बाहुबली द्वारा किसी प्रकार के अपराध की जानकारी मिलने पर उसे जोरदार ढंग से प्रसारित भी करते हैं।
कहने का तात्पर्य यह है कि अब वह समय चला गया जब धन और वैभव का प्रदर्शन करने के लिये अनुशासनहीनता बरतना आवश्यक लगता था।
      आदमी के पास चाहे कितना भी धन हो उसे जीवन में अनुशासन अवश्य रखना चाहिये। याद रहे धन की असीमित शक्ति है पर देह की सीमायें हैं और किसी प्रकार की अनुशासनहीनता का दुष्परिणाम उसे ही भोगना पड़ता है। संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Monday, December 21, 2009

चाणक्य नीति-नयी पीढ़ी को पवित्र काम की शिक्षा देना जरूरी (santan ko shiksha-hindu dharm sandesh)

पुत्राश्च विविधेः शीलैर्नियोज्याः संततं बुधैः।
नीतिज्ञा शीलसम्पनना भवन्ति कुलपजिताः।।
हिन्दी में भावार्थ-
बुद्धिमान व्यक्ति अपने बच्चों को पवित्र कामों में लगने की प्रेरणा देते हैं क्यों श्रद्धावान, चरित्रवान तथा नीतिज्ञ पुरुष ही विश्व में पूजे जाते हैं।
माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः।
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा।।
हिन्दी में भावार्थ--
ऐसे माता पिता अपनी संतान के बैरी है जो उससे शिक्षित नहीं करते। अशिक्षित व्यक्ति कभी भी बुद्धिमानो की सभा में सम्मान नहीं पाता। वहां उसकी स्थिति हंसों के झुण्ड में बगुले की तरह होती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-ऐसे समाचार अक्सर आते हैं कि माता पिता को उनके बच्चों ने छोड़ दिया या उनकी देखभाल नहीं करते। अपने देश में बुजुर्गों की देखभाल बच्चों के ही द्वारा की जाये इसके लिये कानून भी बनाया गया। मगर एक सवाल जो कोई नहीं उठाता कि आखिर बुजुर्गों की ऐसी स्थिति ऐसी होती क्यों है? पहले तो ऐसा नहीं होता था। दरअसल पाश्चात्य शिक्षा में केवल रोजगार प्राप्त करने का ही पाठ्यक्रम होता है-वह भी सेठ या पूंजीपति बनने की नहीं बल्कि गुलाम बनाने की योजना का ही हिस्सा है। ऐसे में शिक्षित व्यक्ति नौकरी आदि के चक्कर में अपने परिवार से दूर हो जाता है। ऐसे कई परिवार हैं जिसमें तीन तीन लड़के हैं पर सभी नौकरी के लिये अपने माता पिता को छोड़ जाते हैं। माता पिता अपनी संपत्ति की रक्षा उनके लिये करते हुए अकेले रह जाते हैं। इसके अलावा अगर उनके पास संपत्ति नहीं भी है तो नौकरी पर लगे बेटे के पास दूसरे शहर में वैसा मकान या रहने की स्थिति नहीं है जिससे वह अपने माता पिता को दूर रखता है। जहां तक समाज का काम है वह तो कहता ही रहता है कि अमुक आदमी ऐसा है या वैसा है पर सच यही है कि पाश्चात्य रहन सहन ने समाज में एक तरह से विघटन पैदा किया है और इसके लिये जिम्मेदारी वह माता पिता भी हैं जो अपनी संतान को सही शिक्षा नहीं देते। वह आधुनिक विद्यालयों में अपने बच्चों को शिक्षा के लिये भेजकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं।
दूसरा भी एक सवाल है जिससे कोई नहीं उठाता कि माता पिता यह कहते हैं कि हमने बच्चे को पढ़ाया लिखाया पर उससे वह आखिर बना ही क्या? एक नौकर न! ऐसे में आजकल के लोगों के सामने यह भी समस्या है कि अपनी नौकरी से जूझते हुए अपने परिवार की देखभाल उनके लिये कठिन हो जाती है। ऐसे में पारिवारिक तनाव भी उनके लिये एक संकट हो जाता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि माता पिता अपने बच्चों से उन संस्कारों का फल चाहते हैं जो उन्होंने उनमें बोये ही नहीं। वह केवल अपने बच्चों को कमाने और खाने के अलावा कोई अन्य शिक्षा देते ही नहीं-जिससे वह समाज या धर्म का मतलब समझे-फिर बाद में उसे ही कोसते हैं। इसलिये होना तो यह चाहिए कि बच्चों को आधुनिक शिक्षा के साथ प्राचीन ज्ञान भी प्रदान करने का माता पिता दायित्व स्वयं उठायें।
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Sunday, December 20, 2009

श्रीगुरु ग्रंथ साहिब से-अहंकार अनेक रोगों की जड़ है (ahanakr ek rog-shri guru granth sahib)

जह गिआन प्रगासु अगिआन मिटंतु।
हिन्दी में भावार्थ-
गुरु ग्रंथ साहिब के मतानुसार जिस प्रकार अंधेरे को दूर करने के लिये चिराग की आवश्यकता होती है उसी तरह अज्ञान रूपी अंधेरे को दूर करने के लिये प्रकाश आवश्यक है।
‘हउमै नावै नालि विरोध है, दोए न वसहि इक थाई।।’
हिन्दी में भावार्थ-
मनुष्य का सबसे बड़ा दुर्गुण अहंकार है और इससे अन्य बुराईयां भी पैदा होती है।
‘हउमै दीरघ रोग है दारु भी इस माहि।
किरपा करे जो आपणी ता गुर का सब्दु कमाहि।।’
हिन्दी में भावार्थ-
अहंकार एक भयानक रोग है जिसकी जड़ें बहुत गहरे तक फैल जाती हैें। इसका इलाज गुरु की कृपा से प्राप्त शब्द ज्ञान से ही संभव हो सकता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सभी जानते हैं कि अहंकार करना एक बुराई है पर इस रोग को पहचानना भी कठिन है। इसकी वजह यह है कि पंच तत्वों से बनी इस देह में मन और बुद्धि के साथ अहंकार की प्रकृत्ति भी स्वयंमेव बनती है। अनेक बार एक मनुष्य को दूसरे का अहंकार दिखाई देता है पर स्वयं का नहीं। इतना ही नहीं जब कोई व्यक्ति आक्रामक होकर दूसरों के विरुद्ध विषवमन करता है तब सभी लोग उसे अहंकारी कहते हैं जबकि सच यह है कि अहंकार कभी न कभी किसी में आता है या यूं कहें कि यह सभी में रहता है।
किसी भी कर्म में अपने कर्तापन की अनुभूति करना ही अहंकार है। जब मन में यह विचार आये कि ‘मैंने यह किया’ या ‘वह किया’ तब समझ लीजिये कि वह हमारे अंदर बैठा अहंकार बोल रहा है। फिर इससे आगे यह भी होता है कि जब हम किसी का कार्य करते हैं और उसका प्रतिफल भौतिक रूप से नहीं मिलता तब भारी निराशा घेर लेती है। आजकल आप किसी से भी चर्चा करिये वह अपने रिश्तेदारेां, मित्रों और सहकर्मियों के विश्वासघात की शिकायत करता मिलेगा। अहंकार का एक रूप यह भी है कि किसी से एक मनुष्य का काम कर दिया तो वह इस कारण भी उसका काम नहीं करता क्योंकि उसको लगता है कि वह छोटा हो जायेगा-अधिकतर लोग ऐसे भी हैं जो दूसरे के द्वारा कार्य करने पर अहसान मानने की बजाय हक अनुभव करते हैं तो कुछ लोगों को लगता है कि उनके गुणों के कारण कोई स्वार्थवश सेवा कर रहा है तो यह हमारी श्रेष्ठता का प्रमाण है। यही अहंकार मनुष्यों के बीच संघर्ष का कारण बनता है। समस्या इसे पहचानने की है।
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Saturday, December 19, 2009

श्रीगुरु ग्रंथ साहिब-जिसने दुनियां बनायी वही इसे जानता है (shri guru granth sahib in hindi)

 ‘जा करता सिरठी कउ साजे, आपे जाणै सोई।’

श्री गुरु ग्रंथ साहिब के अनुसार जिस परमपिता परमात्मा ने यह सृष्टि रची है वह इसका आदि और अंत जानता है।

पाताल पाताल लख, आगासा आगास।

ओड़क ओड़क भालि थके वेद कहनि इक वात।।

श्री गुरु ग्रंथ साहिब के अनुसार इस सृष्टि में लाखों पाताल और आकाश हैं।

इसे जानने जानने का प्रयास करते हुए अनेक  विद्वान थककर हार गये।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-दुनियां के वैज्ञानिक हमेशा ही अंतरिक्ष में इस बात की खोज करते हैं कि इस ब्रह्मांड में कहीं अन्य जीवन है कि नहीं।  हमारे भारतीय अध्यात्म ने इस बात की खोज तो पहले ही कर ली है कि इस प्रथ्वी, आकाश और समुद्र के अलावा भी अन्य लाखों सृष्टियां हैं।  यही कारण है कि जहां पश्चात्य विचारधारायें  एक ही ईश्वर की कल्पना करती हैं वहीं भारतीय विचारधारायें उसके अनंत होने की बात कहती हैं।  पश्चिमी विचाराधारायें केवल इस सृष्टि और मनुष्य के भौतिक स्वरूप के आधार पर जीवन दर्शन की व्याख्या प्रस्तुत करती हैं जबकि भारतीय विचाराधारायें अव्यक्त तथा अदृश्य तत्व के प्रभावों का भी अध्ययन कर अपने निष्कर्ष प्रस्तुत करती हैं।

सच बात यही है कि इंसान की देह में इंद्रियां हैं और उसी से उसका संचालन भी होता है। इन इंद्रियों पर देह के साथ ही उपजी तीन प्रकृतियों मन, बुद्धि और अहंकार का नियंत्रण होता है। ऐसे में जो जीवात्मा इस देह में उसका अध्ययन केवल भारतीय विचारधाराओं में ही किया जाता है। यही कारण है कि हमारे देश का अध्यात्मिक ज्ञान हर दृष्टि से संपूर्ण माना जाता है।  इतना ही नहीं इसमें विज्ञान का भी समावेश है। देह, मन और विचार की स्वच्छता के साथ ही इस सृष्टि की रचना और उसके संचालन का ज्ञान भी हमारे महापुरुषों ने बताया है। जो लोग अपने ही देश की विचाराधाराओं से परिपूर्ण ग्रंथों का अध्ययन करते हैं उनको किसी अन्य प्रकार के ज्ञान और विज्ञान की आवश्यकता ही नहीं पड़ती।
यह अलग बात है कि हमारे देश के नवीनकाल के विद्वान पाश्चात्य विज्ञान की तरफ देखकर अपने विचार कायम करते हैं जबकि पाश्चात्य विद्वान हमारे ही देश की आध्यात्मिक विचारधाराओं पर भी दृष्टिपात करते हुए अपने प्रयोग करते हैं।
 
 
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Friday, December 18, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-सत्पुरुषों से मित्रता कभी व्यर्थ नहीं जाती (bhale logon ki dosti-hindu dharam sandesh)

 आदौ तन्त्र्यो बृहन्मध्या विस्तारिण्यः पदे पदे।

यामिन्यो न निवर्तन्ते सतां मैत्र्यः सरित्समाः।।

हिन्दी में भावार्थ-
मुख से सू़क्ष्म, मध्य में विस्तृत फिर आगे विस्तार से निरंतर बहने वाली नदी के समान ही सत्पुरुषों की मित्रता कभी व्यर्थ नहीं जाती।

औरसं कृतसम्बद्ध तथा वंशक्रमागतं।

रक्षितं व्यसनेभ्यभ्व मित्रं ज्ञेयं चतुर्विधं।।

हिन्दी में भावार्थ-
मनुष्य के जीवन में चार प्रकार के सहोदर, संबंधी, परंपरा तथा व्यसनों से रक्षित मित्र होते हैं।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मित्रों के चार प्रकार होते हैं जिनमें एक तो वह बंधु होते हैं जिनसे रक्त संबंध होता है। दूसरे वह जो रिश्ते में होते हैं। तीसरे वह होते हैं जो पारंपरिक पारिवारिक  संबंधों के कारण बनते हैं। चौथे वह जो एक ही जैसे व्यसनों के कारण बनते हैं।  दरअसल मित्रता के अर्थ व्यापक हैं और इसके आगे सारे संबंध व्यर्थ हो जाते हैं। यही कारण है कि रिश्तों के खटास हो जाती है पर मित्रता अक्षुण्ण रहती है क्योंकि उसमें कोई स्वार्थ नहीं होता।

महत्वपूर्ण बात यह है कि सज्जन पुरुषों में कभी प्रत्यक्ष तात्कालिक स्वार्थ पूरा होता नहीं दिखता पर समय पड़ने पर वही सबसे अधिक काम आते हैं।  इसके विपरीत जिनसे व्यसनों के कारण संबंध हैं वह तभी तक चलते हैं जब तक वह मनुष्य में बने रहते हैं।  कार्यस्थलों पर साथ चाय या शराब पीने को लेकर अनेक मित्र समूह बन जाते हैं पर जैसे ही कार्यस्थल बदलता है या व्यसन छूटता है वैसे ही वह मित्रता भी छूट जाती है। आजकल समस्या यही है कि लोग ऐसी सतही मित्रता में ही सत्य ढूंढते हैं और सत्पुरुषों से मित्रता करना उनको एक फालतू विषय लगता है जबकि वही ऐसे होते हैं जो बिना किसी स्वार्थ के समय पर संकट निवारण का कार्य करते हैं।

 
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Sunday, December 13, 2009

संत कबीर वाणी-निंदक तो नकटा होता है (nindak bura hota hai-sant kabir vani)

निन्दक ते कुत्ता भला, हट कर मांडे शर
कुत्ते ते क्रोधी बुरा, गुरू दिलावै गार।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी का कहना है कि निन्दक से कुत्ता भला है जो दूर होकर भौंकता है। इतना ही नहीं कुत्ते से बुरा वह क्रोधी व्यक्ति है जो अपने गुरु को अपने आचरण के कारण गाली पड़वाता है।
निन्दक तो है नाक बिन, सोहै नकटो मांहि।
साधूजन गुरुभक्त जो, तिनमें सोहै नांहि।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी के मतानुसार निन्दक तो बिना नाक वाला है। वह नकटों में ही शोभा पता है। जो साधु प्रवृत्ति के लोग हैं वह नकटों में नहीं शोभा पा सकता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि वह दूसरे की निंदा कर अपने को श्रेष्ठ साबित करता है। यह इतनी स्वाभाविक है कि इसका आभास थोड़ा बहुत अध्यात्मिक ज्ञान रखने को भी घेर लेती है। किसी दूसरे के दुर्गुण का बखान या पीड़ा का मजाक उड़ाना अत्यंत निकृष्ट कार्य है पर इससे कौन बच पाता है। स्थिति यह है कि आजकल प्रचार माध्यमों में दूसरे के दोषों या पीड़ाओ का बखान एक व्यवसायिक प्रवृत्ति बन गयी है। अपने दोष कोई नहीं देखता। दूसरे के व्यक्तित्व का नकारात्मक अध्ययन कर लोग बहुत प्रसन्न होते हैं जबकि आत्ममंथन कर अपने दोष देखने का काम किसी को न करना आता न ही करना चाहते हैं। कहना चाहिये कि हम एक तरह से नकटे समुदाय के सदस्य हैं।
अक्सर लोग कुत्ते को लेकर तमाम तरह की टिप्पणियां करते हैं पर उसका यह गुण है कि वह दूर होकर भौंकता है पर काटता नहीं जबकि इंसान की स्थिति तो उससे भी बदतर है कि वह न केवल पास रहकर भी दूसरे के सामने निंदा करता है और जरूरत समझे तो एक ही थाली में खाकर विश्वासघात भी करता है। सच बात तो यह है कि दूसरे की निंदा करना ही एक पाप है। यह अलग बात है कि इसका ज्ञान तो सभी देते हैं पर इस राह पर बड़े बड़े संत भी नहीं चल पाते। जिसे मनुष्य जीवन का पूरा आनंद प्राप्त करना है वह अगर परनिंदा छोड़ दे तो इस धरती पर ही स्वर्ग की अनुभूति अनुभव करता है।
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