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Sunday, January 3, 2010

संत कबीर के दोहे-ज्ञानी और भक्त अपनी आलोचना से विचलित नहीं होते (gyani aur bhakt-sant kabir ke dohe)

जिनके नाम निशान हैं, तिन अटकावै कौन।
पुरुष खजाना पाइया, मिटि गया गौन।।
जिनके मन में भगवान के प्रति भक्ति और ज्ञान है उनको भला कौन अटका सकता है। उस तत्व ज्ञान को पाकर तो मनुष्य जीवन मृत्यु के भाव से मुक्त हो जाता है।
ऐसे साच मानई, तिलकी देखो जोस
जारि जारि कोयला करै, जमता देखो सोय।।
यदि किसी बात को सच नहीं मानते तो तिल के काष्ट को जाकर देखो। उसे जलाकर राख कर दिया जाता है पर वह फिर अंकुरित होकर प्रकट होता है। जो तत्व ज्ञान है वह हर परीक्षा की कसौटी पर खरा उतरता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-ज्ञानी और भक्त किसी की परवाह नहीं करते। यह अलग बात है कि वह इसे प्रकट नहीं करते और संसार के कार्यों में लिप्तता प्रदर्शित करते हैं। ज्ञानी और भक्त की पहचान यह है कि वह तमाम तरह की आलोचना और निंदा को झेलते हुए भी अपने पथ से विचलित नहीं होते। इस संसार में मनुष्य का तो स्वभाव है कि वह अल्प ज्ञान क आधार पर ही सम्मान पाना चाहता है और वह इसके लिये दूसरे की निंदा भी करने को तैयार हो जाता है। जिनके पास ज्ञान और भक्ति का भंडार है वह कभी छोटी मोटी बातों से विचलित नहीं होते। उनकी पहचान यह है कि अगर उनका निंदक भी उनके सामने आ जाये तो उसे अपमानित नहीं करते। क्षमा उनका स्वाभाविक गुण होता है।
इसके विपरीत जिन्होंने ज्ञान की किताबें रट ली है उनकी भक्ति का प्रयोजन केवल अन्य लोगों पर अपना प्रभाव जमाना होता है। वह उस ज्ञान का अक्सर बखान करते हैं पर उनके आचार विचार में वह धारण किया हुआ प्रकट नहीं होता। ऐसे लोग थोड़ी सी आलोचना पर भी उत्तेजित हो जाते हैं। अगर सच्चे और ढोंगेी ज्ञानी का पहचान करनी हो तो इस बात को देखें कि कौन अपनी बात पर अमल करता है और कौन केवल मौखिक बात कहकर उसे भूल जाता है।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Tuesday, December 29, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-निंदा से परे मनुष्य देहधारी देवता ही समझें (ninda se pare insan hote devta-hindu dharmik sandesh)

कौटिल्य महाराज ने अपने अर्थशास्र में कहा  है कि
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ये प्रियाणि प्रभाषन्ते प्रयच्छन्ति च सत्कृतिम्।
श्रीमन्तोऽनिद्य चरिता देवास्ते नरविग्रहाः।।

     हिन्दी में भावार्थ-जो मनुष्य सदैव प्रिय और मधुर वाणी बोलने के साथ ही सत्पुरुषों की निंदा से रहित होते हैं उनको शरीरधारी देवता ही समझना चाहिये।
स्वभावेन हरेन्मित्रं सद्भावेन व बान्धवान्।
स्त्रीभृत्यान् प्रेमदानाभ्यां दाक्षिण्येनेतरं जनम्।।
     हिन्दी में भावार्थ-स्वभाव से मित्र, सद्भाव स बंधुजन, प्रेमदान से स्त्री और भृत्यों को चतुराई से वश में करें।
     वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कौटिल्य का अर्थशास्त्र न केवल अध्यात्मिक ज्ञान बल्कि जीवन जीने की कला का रूप भी हमारे सामने प्रस्तुत करता है। अगर हम गौर करें तो देखेंगे कि हम अपने शत्रु और मित्र स्वयं ही बनाते हैं। अपने लिये सुख और कष्ट का प्रबंध हमारे व्यवहार से ही होता है। अक्सर हम लोग ऐसे व्यक्ति की निंदा करते हैं जो हमारे सामने मौजूद नहीं रहता। यह प्रवृत्ति बहुत आत्मघाती होती है क्योंकि हम स्वयं भी इस बात से आशंकित रहते हैं कि हमारे पीछे कोई निंदा न करे। एक बात पर ध्यान दें कि कुछ ऐसे लोग हमारे आसपास जरूर विचरण करते हैं जो दूसरे की निंदा आदि में नहीं लगे रहते उनकी छवि हमेशा ही अच्छी रहती है। महिलाओं में परनिंदा की प्रवृत्ति अधिक देखी जाती है पर जो महिलाऐं इससे दूर रहती हैं अन्य महिलायें स्वयं उनको देखकर अचंभित रहती हैं-वह स्वयं ही कहती हैं कि अमुक स्त्री बहुत शालीन है और किसी की निंदा वगैरह जैसे कार्य में लिप्त नहीं होती।
      दूसरे की बुराई कर अपनी श्रेष्ठता का प्रचार मानवीय मन की स्वभाविक बुराई है और जो इससे परे रहता है उसे तो शरीरधारी देवता शायद इसलिये ही समझा जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि जिन लोगों को अपनी छवि बनाने का मोह हो वह परनिंदा करना छोड़ दें तो उनकेा अपना लक्ष्य पाने में अत्यंत सहजता और सरलता अनुभव होगी। संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Monday, December 28, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-कपटी से मित्रता में धर्म की हानि होती है (kautilya sandesh-kapti se dosto se dharm kee hani)

 मित्रं विचार्य बहुशो ज्ञातदोषं परित्येजेत्।

त्यंजन्नभूतेदोषं हि धर्मार्थावुपहन्ति हिं।।

हिन्दी में भावार्थ-
नीति विशारद कौटिल्य के अनुसार अपने मित्रों के बारे में विचार करना चाहिए। अगर उनमें छल कपट या अन्य दोष दिखाई दे तो उसे त्याग दें।  ऐसा न करने पर न केवल धर्म की हानि होती है बल्कि जीवन में कष्ट भी उठाना पड़ता है।

सा बन्धुर्योऽनुबंघाति हितऽर्ये वा हितादरः।

अनुरक्तं विरक्त वा तन्मिंत्रमुपकारि यत्।।

हिन्दी में भावार्थ-
वही बंधु है जो हमारे उद्देश्य की पूर्ति में सहायक होने के साथ आदर करने वाला हो। अनुरक्त हो या विरक्त पर उपकार आवश्यक करे वही सच्चा बंधु है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-समय के साथ समाज में खुलापन आ रहा है और मित्र संग्रह में लोगों की लापरवाही का नतीजा यह है कि सभी जगह खुद के साथ धोखे की शिकायत करते हुए मिलते हैं।  इतना ही नहीं युवा पीढ़ी तो हर मिलने और बातचीत करने वाले को अपना मित्र समझ लेती है। मित्र के गुणों की पहचान कोई नहीं करता।

मित्र का सबसे बड़ा गुण है कि वह हर समय सहयोग के लिये तत्पर दिखता  हो। इसके अलावा वह अन्य लोगों के सामने अपमानित न करे और साथ ही समान विचारधारा वाला हो। स्वभाव के विपरीत होने पर या विचारों की भिन्नता वाले से अधिक समय तक मित्रता नहीं चलती अगर चलती है तो धर्म की हानि उठानी पड़ सकती है।   इसके अलावा मित्र वह है जो कहीं अपने मित्र की गुप्त बातों को कहीं उजागर न करता हो।  इतना ही नहीं मित्र का अन्य मित्रों का समूह और कुल भी अनुकूल होना चाहिये।   अगर वह केवल दिखावे की मित्रता करता है तो आपके वह रहस्य जो दूसरों के जानने योग्य नहीं है सभी को पता चल जाते हैं।  दूसरी बात यह है कि मित्र जब हमारे साथ होता है तब हमारा लगता है पर जब दूसरी जगह होता है तो दूसरों का होता है-यह विचार भी करना चाहिये।

कुछ लोग केवल स्वार्थ की वजह से मित्रता करते हैं-वैसे आजकल अधिकतर संख्या ऐसे ही लोगों की है-इस विचार करना चाहिऐ। एकांत में  हमेशा अपने मित्र समूह पर चिंतन करते हुए जिनमें दोष दिखता है या जिनकी मित्रता सतही प्रतीत होती है उनका त्याग कर देना चाहिये।
इसके अलावा निकट रहने पर मित्र के प्रति अपने भाव का अवलोकन भी उससे कुछ समय दूर रहकर करना चाहिये। निकट रहने पर उसके प्रति मोह रहता है इसलिये यह पता नहीं लगता कि उसकी नीयत क्या है? दूर रहने पर उससे मोह कम हो जाता है तब यह पता लगता है कि उसके प्रति हमारे मन में क्या है? इतना ही न अपने बच्चों के मित्रों और मिलने जुलने वालों पर भी दृष्टिपात करना चाहिये। आजकल काम की व्यस्तताओं की वजह  से माता पिता को अपने बच्चों की देखभाल का पूरी तरह अवसर नहीं मिल पाता इसलिये उनको बरगलाने की घटनायें बढ़ रही है।  ऐसा उन्हीं माता पिता के साथ होता है जो अपने बच्चों के मित्रों की यह सोचकर उपेक्षा कर देते हैं कि ‘वह क्या कर लेगा?’
कहने का तात्पर्य यह है कि अपने घर के सदस्यों के मित्रों पर दृष्टिपात करना चाहिये। अगर अपने मित्र दोषपूर्ण लगें तो उनसे दूरी बनायें और घर के सदस्यों के हों तो उन्हें इसके लिये प्रेरित करें।  मित्र के गलत होने पर धर्म की हानि अवश्य होती है।


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Friday, December 25, 2009

श्री गुरु ग्रंथ साहिब-जहां गरीब की सेवा हो, वही भगवान की कृपा बरसती (garib aur bhagvan-shri guru granth sahib)

‘जाति जनमु नह पूछीअै, सच घर लेहु बताई।

सा जाति सा पति है, जेहे करम होई।।’

हिन्दी में भावार्थ-
श्री गुरुग्रंथ साहिब के अनुसार किसी की जाति या जन्म के बारे में न पूछें। सभी एक ही सर्वशक्तिमान के घर से जुड़े हुए हैं।  आदमी की जाति और समाज (पति) वही है जैसे  उसका कर्म है।

‘नीचा अंदरि नीच जाति, नीची हू अति नीचु।

नानक तिल कै संगि साथि, वडिआ सिउ किआ रीस।

जिथै नीच समालिअन, तिथे नदर तेरी बख्सीस।

हिन्दी में भावार्थ-
श्री गुरुनानकदेव कहते हैं जे नीच से भी नीच जाति का है हम उसके साथ हैं। बड़ी जाति वालों से होड़ करना व्यर्थ है बल्कि जहां गरीब, पीड़ित और निचले वर्ग के व्यक्ति की सहायता की जाती है वहीं सर्वशक्तिमान की कृपा बरसती है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जन्म के आधार पर किसी व्यक्ति को निम्न जाति का मानकर उसकी अवहेलना करना बहुत बड़ा अपराध है। आज के समय में तो यह हास्यास्पद लगता है।  दरअसल पहले व्यवसायों के आधार पर जातियों का वर्गीकरण एक तरह से तर्कपूर्ण भी लगता था पर आजकल तो लोगों ने अपने परंपरागत पारिवारिक व्यवसाय ही त्याग दिये हैं पर फिर भी वह पुरानी जातिप्रथाओं के आधार पर अपने को श्रेष्ठ और दूसरे को नीच बताते हैं।  न केवल लोगों ने अपने व्यवसाय बदले हैं बल्कि उनका आचरण भी बदल गया है। भ्रष्टाचार और अहंकार में डूबे लोग अर्थ के आधार पर सभी का आंकलन करते हैं मगर जब किसी की निंदा करनी हो तो उसकी जाति की निंदा करते हैं।

फिर आजकल पाश्चात्य जीवन शैली अपनाने की वजह से पुराने सामाजिक आधार ध्वस्त हो गये हैं।  आप किसी भी शहर में नये बने बाजार या कालोनियों में चले जायें वहां के कारोबारी और रहवासी विभिन्न संप्रदायों के होते हैं।  उनके दुकान और मकान जितने बड़े और आकर्षक होते हैं उतना ही समाज उनका सम्मान करता है।  हर कोई अपनी आर्थिक श्रेणी के अनुसार एक दूसरे से संपर्क रखता है। इतना ही नहीं अगर जाति में अपनी श्रेणी के समकक्ष अपनी संतान का रिश्ता मिल गया तो ठीक नहीं तो दूसरी जाति में भी विवाह करने को लोग अब तैयार होने लगे हैं।  कहने का तात्पर्य यह है कि धनवानों को ही समाज बड़ा मानता है पर वह अपने समाज की चिंता नहीं करते।  सच बात तो यह है कि धर्म, जाति, और भाषाओं की सेवा जितने गरीब और निम्न वर्ग के लोग करते हैं उतना अमीर और बड़े वर्ग के नहीं करते।  भारतीय समाजों का मजबूत ढांचा अगर ध्यान से देखें तो हमें यह साफ लगेगा कि भारतीय संस्कृति, संस्कारों, भाषाओं तथा नैतिक मूल्यों की रक्षा निचले तबके के लोगों ने अधिक की है।  यही कारण कि देश के सभी महापुरुष गरीब की सेवा को सर्वाधिक महत्व देते हैं।  
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Wednesday, December 23, 2009

संत कबीर वाणी-तत्वज्ञान के बिना जीवन अंधियारा (sant kabir vani-tatvagyan)

कबीर गुरु की भक्ति बिन, राज ससभ होय।
माटी लदै कुम्हार की, घास न डारै कोय।।
महात्मा कबीरदास जी कहते हैं कि गुरु की भक्ति के बिना राजा भी गधा होता है जिस पर कुम्हार दिन भर मिट्टी लादेगा और कोई घास भी नहीं डालेगा।
चौसठ दीवा जाये के, चौदह चन्दा माहिं।
तेहि घर किसका चांदना, जिहि घर सतगुरु नाहिं।
महात्मा कबीरदास जी कहते हैं कि चौसठ कलाओं और चौदह विद्याओं की जानकारी होने पर पर अगर सत्गुरु का ज्ञान नहीं है तो समझ लीजिये अंधियारे में ही रह रहे हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-समाज में बढ़ती भौतिकतावादी प्रवृत्ति ने अध्यात्मिक ज्ञान से लोगों को दूर कर दिया है। हालांकि टीवी चैनलों, रेडियो और समाचार पत्र पत्रिकाओं में अध्यात्मिक ज्ञान विषयक जानकारी प्रकाशित होती है पर व्यवसायिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिये लिखी गयी उस जानकारी में तत्व ज्ञान का अभाव होता है। कई जगह तो अध्यात्मिक ज्ञान की आड़ में धार्मिक कर्मकांडों का प्रचार किया जा रहा है। इसके अलावा टीवी चैनलों में अनेक बाबाओं के अध्यात्मिक प्रवचनों के कार्यक्रम भी प्रस्तुत होते हैं पर उनका उद्देश्य केवल मनोरंजन करना ही है। वैसे भी समाज में ऐसे गुरुओं का अभाव है जो तत्वज्ञान प्रदान कर सकें क्योंकि उसके जानने के बाद तो मनुष्य का हृदय निरंकार में लीन हो जाता है जबकि पेशेवर धर्म विक्रेता अपने शब्दों को सावधि जमा में निवेश करते हैं जिससे कि वह हमेशा पैसा और सम्मान वसूल करते रहें। कभी कभी तो लगता है कि लोग धर्म के नाम पर केवल शाब्दिक बोझा अपने सिर पर ढो रहे हैं।
दूसरी बात यह है कि मनुष्य के हृदय में अगर तत्वज्ञान स्थापित हो जाये तो वह अपने सांसरिक कार्य निर्लिप्त भाव से कार्य करते हुए किसी की परवाह नहीं करता जबकि सभी लोग चाहते हैं कि कोई उनकी परवाह करे। तत्वाज्ञान के अभाव में मनुष्य को एक तरह से गधे की तरह जीवन का बोझ ढोना पड़ता है। यह बात समझ लेना चाहिये कि जीवन तो सभी जीते हैं पर तत्वाज्ञानियों के चेहरे पर जो तेज दिखता है वह सभी में नहीं होता।
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Sunday, December 20, 2009

श्रीगुरु ग्रंथ साहिब से-अहंकार अनेक रोगों की जड़ है (ahanakr ek rog-shri guru granth sahib)

जह गिआन प्रगासु अगिआन मिटंतु।
हिन्दी में भावार्थ-
गुरु ग्रंथ साहिब के मतानुसार जिस प्रकार अंधेरे को दूर करने के लिये चिराग की आवश्यकता होती है उसी तरह अज्ञान रूपी अंधेरे को दूर करने के लिये प्रकाश आवश्यक है।
‘हउमै नावै नालि विरोध है, दोए न वसहि इक थाई।।’
हिन्दी में भावार्थ-
मनुष्य का सबसे बड़ा दुर्गुण अहंकार है और इससे अन्य बुराईयां भी पैदा होती है।
‘हउमै दीरघ रोग है दारु भी इस माहि।
किरपा करे जो आपणी ता गुर का सब्दु कमाहि।।’
हिन्दी में भावार्थ-
अहंकार एक भयानक रोग है जिसकी जड़ें बहुत गहरे तक फैल जाती हैें। इसका इलाज गुरु की कृपा से प्राप्त शब्द ज्ञान से ही संभव हो सकता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सभी जानते हैं कि अहंकार करना एक बुराई है पर इस रोग को पहचानना भी कठिन है। इसकी वजह यह है कि पंच तत्वों से बनी इस देह में मन और बुद्धि के साथ अहंकार की प्रकृत्ति भी स्वयंमेव बनती है। अनेक बार एक मनुष्य को दूसरे का अहंकार दिखाई देता है पर स्वयं का नहीं। इतना ही नहीं जब कोई व्यक्ति आक्रामक होकर दूसरों के विरुद्ध विषवमन करता है तब सभी लोग उसे अहंकारी कहते हैं जबकि सच यह है कि अहंकार कभी न कभी किसी में आता है या यूं कहें कि यह सभी में रहता है।
किसी भी कर्म में अपने कर्तापन की अनुभूति करना ही अहंकार है। जब मन में यह विचार आये कि ‘मैंने यह किया’ या ‘वह किया’ तब समझ लीजिये कि वह हमारे अंदर बैठा अहंकार बोल रहा है। फिर इससे आगे यह भी होता है कि जब हम किसी का कार्य करते हैं और उसका प्रतिफल भौतिक रूप से नहीं मिलता तब भारी निराशा घेर लेती है। आजकल आप किसी से भी चर्चा करिये वह अपने रिश्तेदारेां, मित्रों और सहकर्मियों के विश्वासघात की शिकायत करता मिलेगा। अहंकार का एक रूप यह भी है कि किसी से एक मनुष्य का काम कर दिया तो वह इस कारण भी उसका काम नहीं करता क्योंकि उसको लगता है कि वह छोटा हो जायेगा-अधिकतर लोग ऐसे भी हैं जो दूसरे के द्वारा कार्य करने पर अहसान मानने की बजाय हक अनुभव करते हैं तो कुछ लोगों को लगता है कि उनके गुणों के कारण कोई स्वार्थवश सेवा कर रहा है तो यह हमारी श्रेष्ठता का प्रमाण है। यही अहंकार मनुष्यों के बीच संघर्ष का कारण बनता है। समस्या इसे पहचानने की है।
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Friday, December 18, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-सत्पुरुषों से मित्रता कभी व्यर्थ नहीं जाती (bhale logon ki dosti-hindu dharam sandesh)

 आदौ तन्त्र्यो बृहन्मध्या विस्तारिण्यः पदे पदे।

यामिन्यो न निवर्तन्ते सतां मैत्र्यः सरित्समाः।।

हिन्दी में भावार्थ-
मुख से सू़क्ष्म, मध्य में विस्तृत फिर आगे विस्तार से निरंतर बहने वाली नदी के समान ही सत्पुरुषों की मित्रता कभी व्यर्थ नहीं जाती।

औरसं कृतसम्बद्ध तथा वंशक्रमागतं।

रक्षितं व्यसनेभ्यभ्व मित्रं ज्ञेयं चतुर्विधं।।

हिन्दी में भावार्थ-
मनुष्य के जीवन में चार प्रकार के सहोदर, संबंधी, परंपरा तथा व्यसनों से रक्षित मित्र होते हैं।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मित्रों के चार प्रकार होते हैं जिनमें एक तो वह बंधु होते हैं जिनसे रक्त संबंध होता है। दूसरे वह जो रिश्ते में होते हैं। तीसरे वह होते हैं जो पारंपरिक पारिवारिक  संबंधों के कारण बनते हैं। चौथे वह जो एक ही जैसे व्यसनों के कारण बनते हैं।  दरअसल मित्रता के अर्थ व्यापक हैं और इसके आगे सारे संबंध व्यर्थ हो जाते हैं। यही कारण है कि रिश्तों के खटास हो जाती है पर मित्रता अक्षुण्ण रहती है क्योंकि उसमें कोई स्वार्थ नहीं होता।

महत्वपूर्ण बात यह है कि सज्जन पुरुषों में कभी प्रत्यक्ष तात्कालिक स्वार्थ पूरा होता नहीं दिखता पर समय पड़ने पर वही सबसे अधिक काम आते हैं।  इसके विपरीत जिनसे व्यसनों के कारण संबंध हैं वह तभी तक चलते हैं जब तक वह मनुष्य में बने रहते हैं।  कार्यस्थलों पर साथ चाय या शराब पीने को लेकर अनेक मित्र समूह बन जाते हैं पर जैसे ही कार्यस्थल बदलता है या व्यसन छूटता है वैसे ही वह मित्रता भी छूट जाती है। आजकल समस्या यही है कि लोग ऐसी सतही मित्रता में ही सत्य ढूंढते हैं और सत्पुरुषों से मित्रता करना उनको एक फालतू विषय लगता है जबकि वही ऐसे होते हैं जो बिना किसी स्वार्थ के समय पर संकट निवारण का कार्य करते हैं।

 
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Thursday, October 15, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-मित्र की भी होती हैं तीन श्रेणियां (kautilya ka arthshastra in hindi)

मित्राणामन्तरं विद्याण्मध्यज्यायः कनीयसाम्।
मध्यज्यायः कनीयांसि कर्मणि च पृथकपृथक्।।
हिंदी में भावार्थ-
मित्रों की उच्च, मध्य और निम्न कोटि की पहचान करते हुए उनके पृथक पृथक कार्यों का अध्ययन करें।
प्रकाशपक्षग्रहणं न कुर्यात्सुहृदां स्वयम्।
अन्योन्यमत्सजंवषां स्वयमेवाशु धारयेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
किसी वाद विवाद में अपने सहृदय और मित्रों का प्रत्यक्ष रूप से पक्ष न लेते हुए उनको गुप्त रूप से सहायता करें।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मित्र बनाने में कभी जल्दी नहीं करना चाहिये। मित्रों भी आम इंसान की तरह तीन श्रेणियां होती हैं-उच्च, मध्यम और निम्न। जिस तरह उच्च मनुष्यों की इस संसार में कमी दिखती है वैसे ही मित्रों कभी है। रोज रोज मिलने वाला हर आदमी मित्र नहीं हो जाता। सच तो यह है कि उस आदमी को बहुत कम धोखा मिलता है जो दोस्त कम बनाता है। वैसे इस समय इंटरनेट का जमाना है और इसलिये अधिक सतर्कता बरतना चाहिये। अभी हाल ही में ऐसे अनेक मामले सामने आये हैं जिसमें इंटरनेट पर लड़कों ने दोस्ती कर अनेक लड़कियों का जीवन बर्बाद कर दिया। इंटरनेट पर किसी का भी फोटो कोई भी लगा सकता है। अपनी आयु कम बता सकता है। अपने व्यवसाय को छिपा सकता है। कहने का तात्पर्य है कि जब सामान्य रूप से निभाने वाला मित्र बड़ी कठिनता से मिलता है तो इंटरनेट पर कहां से मिल जायेगा? इंटरनेट पर सक्रिय लोग कोई आसमानी नहीं है बल्कि इसी समाज से हैं। अतः मित्रों की पहचान कर ही आगे बढ़ना चाहिये।
इसके अलावा वाद विवाद के समय मित्र या सहृदय का सीधे पक्ष लेने की बजाय रणनीति से काम लेते हुए गुप्त रूप से उसकी सहायता करना चाहिये ताकि उसके विरोधी या शत्रु से आप गुप्त रहकर निरंतर उसकी रक्षा कर सकें। इसलिये अपने सहृदय और मित्र की सहायता के लिये उसके विरोधी या शत्रु के सामने किसी ऐसे व्यक्ति को प्रस्तुत करना चाहिये जो आपका सहायक हो और विरोधी या शत्रु उसकी पहचान न कर सके।
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Saturday, September 26, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-मोर की वाणी किसे प्रिय नहीं होती (kautilya ka arthshastra)

मियमेवाभिघातव्यं नित्यं सत्सु द्विषत्सु च।
शिखीव केकामघुरः प्रियावाक् कस्य न प्रियः।।
हिंदी में भावार्थ-
मित्र हो या शत्रु सबसे ही मधुरवाणी में वार्तालाप करना चाहिए। आप देखें मोर की मधुर वाणी सभी को कितना प्रिय होती है।
तीव्राण्युद्वेगकारीणि विसृश्टान्यनवात्मकैः।
कृन्तन्ति देहिनां मम्र्भ शस्त्राणीव वर्चासि च।।
हिंदी में भावार्थ-
किसी के हृदय को उद्वेलित करने वाले वचन कुछ अनाचारी लोग उपयोग करते हैं उससे दूसरे को शस्त्र लगने के समान विदीर्ण हो जाते हैं पर सज्जन लोग कभी कटु शब्द और कर्कश वाणी से किसी अन्य को कष्ट नहीं देते।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हम अपनी इंद्रियों के वशीभूत होकर अपना जीवन व्यतीत करते हैं। हमारी प्रकृतियां मन, बुद्धि और अहंकार है जो हमारे व्यवहार का निर्धारण करती हैं। ऐसे में जिनकी प्रकृतियां नीच हैं वह अपनी कटु वाणी और व्यवहार से दूसरे को कष्ट देते हैं जबकि उच्च प्रकृति वाले सदैव अपने वचनों से दूसरों को प्रभावित करते हैं। इसलिये जहां तक हो सके दृष्टा की तरह अपना आत्ममंथन करते रहे ताकि अपने बुरे व्यवहार से समाज में हमें अलोकप्रियता प्राप्त न हो। अपना परीक्षण का सबसे अच्छा उपाय यह है कि हम पर किसी के अच्छे या बुरे व्यवहार और वाणी का क्या प्रभाव पड़ता है इसे देखें और उसके बाद यह तय करें कि हमें अब कौनसे मार्ग पर चलना है।
यह बात आत्मपरीक्षण से ही समझी जा सकती है कि जिस तरह दूसरे के व्यवहार से हम पर अच्छा या बुरा प्रभाव पड़ता है वैसे ही हमारे व्यवहार का भी दूसरे पर प्रभाव होता है। जहां हमने आत्मुग्धता का दृष्टिकोण अपने अंदर पाला वहीं से हमारा वैचारिक और नैतिक पतन प्रारंभ हो जाता है।
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Monday, September 21, 2009

संत कबीर वाणी-एक बूंद के कारण संसार रोता है (sant kabir sandesh-ek boond aur sansar)

एक बूंद के कारनै, रोता सब संसार।
अनेक बुंद खाली गये, तिनका नहीं विचार।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि एक बूंद से इस जीव की रचना होती है और उसी के चले जाने पर सारा संसार रोता है। अनेक बूंदें खाली गयी उसका विचार नहीं करता।
आंखि न देखि बावरा, शब्द सुनौ नहिं कान।
सिर के केस उज्जल भये, अबहूं निपट अज्ञान।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इंसान बावरा होकर जीता है। न उसकी आंख कुछ देखती है न कान सुनते हैं। सिर के बाल सफेद हो जाने पर भी वह अज्ञानी बना रहता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे अध्यात्मिक ज्ञानी महापुरुष न केवल भक्ति का उपदेश देते हैं पर उसके साथ विज्ञान का भी कराते हैं यह बात कबीरदास जी के संदेशों से स्पष्ट हो जाती है। पश्चिमी विज्ञान अब बता रहा है कि एक पुरुष करोड़ों बूंदें वीर्य की छोड़ता है उसमें से कोई एक बूंद स्त्री के गर्भ में स्थापित होती है शेष व्यर्थ चली जाती हैं। कितने आश्चर्य की बात है कि संत कबीरदास जी के काल में भारतीय इस बात को जानते थे। इस एक बूंद से ही जीव की रचना होती है और उसके जन्म पर खुशी तथा निधन पर लोग शोक मनाते हैं। यह हंसने की बात है कि एक बूंद जिसे अधिक जीवन मिला और शेष क्षण मात्र में नष्ट हो गयी पर जिनको अधिक जीवन मिला उसके लिये प्रसन्नता व्यक्त करने और रोने वाले बहुत हो जाते हैं। जीवन तो उन बूंदों में भी होता है जो क्षण मात्र में नष्ट हो जाती हैं पर वह दृश्यव्य नहीं है उनके लिये कौन रोता या हंसता है?

इतना अद्भुत तत्वज्ञान हमारे अध्यात्म में भरा हुआ है जिसे सुनकर आज हम इसलिये हतप्रभ रह जाते हैं क्योंकि एक योजनाबद्ध ढंग से उसे हमसे दूर रखा जाता है। इस बूंद से बनने वाले जीवन में भी मौजूद जीव न पैदा होता और न मरता है-इस मान्यता के कारण हमारे यहां जन्मतिथि और पुण्यतिथि मनाने की कोई आधिकारिक परंपरा नहीं है पर आजकल ऐसे लोग भी जन्म और पुण्यतिथि कार्यक्रम मनाते हैं जो दावा करते हैं कि वह भारतीय अध्यात्म के कट्टर समर्थक हैं। इस तरह की अज्ञान से भरपूर परंपरायें हमारे देश में खूब चल रही हैं। श्रीगीता में भी प्रथम अध्याय में श्री अर्जुन ने अपना विषाद भगवान श्रीकृष्ण के समक्ष प्रस्तुत किया था जिसमें कहा था कि जब पूरा कुनबा ही खत्म हो जायेगा तब हमारे पितरों के लिये तर्पण कौन करेगा। श्री कृष्ण जी ने उनके सारे विषादों को भ्रम बताते हुए श्री गीता का ज्ञान दिया था। इसके बावजूद कर्मकांडों के नाम पर हमारे यहां श्राद्ध के साथ जन्मतिथि और पुण्यतिथि मनाये जाते हैं। इस अज्ञानजनित कार्य में ऐसे कथित संत भी लिप्त मिलते हैं जो यह दावा करते हैं कि उन्होंने तपस्या से भगवान का दर्शन किया है। इनमें कई बूढ़े हो गये हैं और अपनी आरती भक्तों से करवाते हैं। सच बात तो यह है कि उन लोगों को लिये अध्यात्मिक ज्ञान सुनाना एक व्यवसाय है जबकि वस्तुतः होते तो वह सामान्य आदमी की तरह अज्ञानी हैं जिसकी आंखें हैं पर देखती नहीं और कान शब्द सुनते हुए भी अनसुना कर जाते हैं।
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Wednesday, September 16, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-निंदा रहित, परोपकारी, कर्तव्यनिष्ठ और मधुर वक्ता ही सच्चे धार्मिक (sachcha dharm-kautilya ka arthshastra)

हृदि विद्ध इवात्यर्थ यदा सन्तप्यते जनः।
पीडितोऽपि हि न मेघावीन्तां वाचमुदीरयेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
क्रूर वाणी से हर आदमी का मन त्रस्त हो जाता है इसलिये विद्वान लोगों को चाहिए कि वह कठोर वाणी न बोलें। भले ही अन्य लोग अपनी कठोर वाणी से संताप देते रहें।
अनिन्दापरकृत्येषु स्वधम्र्मपरिपालनम्।
कृपणेषु दयालुत्वं सव्र्वत्र मधुरा गिरः।।
हिंदी में भावार्थ-
दूसरे के कार्य की निंदा न करते हुए अपना धर्म पालन करना , दीनों पर दया करना तथा मीठे वचनों से दूसरों को तृप्त करना ही धर्म है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस दुनियां में प्रचलित अनेक धर्मों की व्याख्या करती हुई अनेक किताबें मौजूद हैंे पर फिर भी अशांति व्याप्त है। कहीं आतंकवाद है तो कहीं युद्ध की आशंकायें। इसके अलावा लोगों के अंदर मानसिक तनाव की ऐसी धारा प्रवाहित हो रही है जिससे किसी की मुक्ति नहीं है। दरअसल धर्म के नाम सभी जगह भ्रम फैलाया जा रहा है। कहने को तो कहा जाता है कि हिन्दू धर्म है पर वास्तव में यह एक जीवन शैली है। वैसे हिन्दू धर्म के नाम पर कर्मकांडों का प्रचार भी भ्रम से कम नहीं है। धर्म का मूल स्वरूप इतना बड़ा और कठिन नहीं है जितना बताया जाता है। धर्म से आशय यह है कि हम मनुष्य हैं और न केवल अपनी देह का पालन करें बल्कि दूसरों की भी सहायता करें, किसी को कष्ट न पहुंचायें। सभी को अपनी मधुर वाणी से प्रसन्न करते हुए अपनी मनुष्य यौनि का का आनंद उठायें।
मगर इसके विपरीत धर्म के नाम पर भ्रम का प्रचार करने वाले लोगों की कमी नहीं है, जो यह बताते हैं कि कर्मकांड करने पर स्वर्ग मिलता है। कई तो ऐसे भी हैं जो बताते हैं कि यह खाओ, यह पहनो, इस तरह चलो तो स्वर्ग मिलेगा। स्वर्ग की यह कपोल कल्पना आदमी की बुद्धि को बंधक बनाये रखती है और धर्म के ठेकेदार अपने इन्हीं बंधकों के सहारे राज्य कर रहे हैं। कई तो ऐसे भी हैं जो अपने धर्म का राज्य लाने के लिये प्रयत्नशील हैं तो कुछ ऐसे है जो तमाम तरह की किताबों से ज्ञान उठाकर बताते हैं कि उनका धर्म श्रेष्ठ है। सच तो यह है कि धर्म से आशय केवल इतना ही है कि अपने कर्तव्यों का पालने करते हुए दूसरे पीड़ितों की भी मदद करें। हमेशा ही मधुर वाणी में बोलें और यह सिद्ध करें कि आपको परमात्मा ने जो जिव्हा दी है उसका आप सदुपयोग कर रहे हैं।
दूसरे की निंदा कर अपने को श्रेष्ठ साबित करना या कड़े शब्दों का उपयोग कर किसी को दुःख देना तो बहुत आसान है मुश्किल तो दूसरे को खुश करने में आती है जो कि धर्म का सबसे बड़ा परिचायक है।
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Saturday, April 11, 2009

चाणक्य नीतिः खाने पीने के विषय में कतई संकोच न करें

धन-धान्यप्रयोगेषु विद्य-संग्रहणेषु च।
आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत्।

हिंदी में भावार्थ-धन धान्य के व्यवहार, ज्ञान विद्या के संग्रह और खाने पीने में जो व्यक्ति संकोच या लज्जा नहीं करते वही जीवन में सुखी रहते हैं।

अर्थनाशं मनस्तापं गृहे दुश्चरितानि च।
वंचनं चाऽपमानं च मतिमान्न प्रकाशयेत्।।

हिंदी में भावार्थ-अपने धन का नाश, मन का दुःख, स्त्री की चरित्रहीनता और किसी अन्य व्यक्ति द्वारा वचनों के द्वारा कष्ट देने की बात सभी के सामने प्रकाशित नहीं करना चाहियै
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कुछ बातों सभी से कहना चाहिये और कुछ नहीं। अक्सर हम व्यग्र होने पर ऐसी बातें लोगों से कह जाते हैं जो नहीं कहना चाहिये। कभी व्यग्रता इतनी बढ़ जाती है कि कह ही नहीं पाते। नीति विशारद चाणक्य के अनुसार जिस बात से अपना अपमान होता हो या अपमान हो चुका हो वह बात किसी को नहीं बताना चाहिये। खासतौर से जब हमारे धन का नाश हमारी गलती से हो गया हो।
इसके अलावा कुछ बातें छिपानी भी नहीं चाहिये। अगर हमारे पास धन या खाद्यान्न नहीं है तो स्पष्टतः उस आदमी को बता देना चाहिये जिससे हमें मदद अपेक्षित है। किसी से कोई बात सीखने के लिये उसके सामने अपने अज्ञान को छिपाना ठीक नहीं है। अगर पेट में भूख हो कहीं अपने खाने का जुगाड़ नहीं हो पाता और कोई अन्य हमें भोजन का आग्रह करता है तो उसे अस्वीकार करना मूर्खता का काम है। कहने का तात्पर्य है कि जहां सम्मान की बात है तो ऐसी बात लोगों को नहीं बताना चाहिये जिससे हमारे अपमान का विस्तार हो साथ ही अपनी दैहिक और मानसिक आवश्यकताओं को दूसरों से छिपाना भी नहीं चाहिये।
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Saturday, December 6, 2008

कौटिल्य का अर्थशास्त्र: धर्म रहित व्यक्ति से कभी संधि न करें

1. दूर्भिक्ष और आपत्तिग्रस्त स्वयं ही नष्ट होता है और सेना का व्यसन को प्राप्त हुआ राज प्रमुख युद्ध की शक्ति नहीं रखता।
2. विदेश में स्थित राज प्रमुख छोटे शत्रु से भी परास्त हो जाता है। थोड़े जल में स्थित ग्राह हाथी को खींचकर चला जाता है।
3. बहुत शत्रुओं से भयभीत हुआ राजा गिद्धों के मध्य में कबूतर के समान जिस मार्ग में गमन करता है, उसी में वह शीघ्र नष्ट हो जाता है।
4.सत्य धर्म से रहित व्यक्ति के साथ कभी संधि न करें। दुष्ट व्यक्ति संधि करने पर भी अपनी प्रवृति के कारण हमला करता ही है।
5.डरपोक युद्ध के त्याग से स्वयं ही नष्ट होता है। वीर पुरुष भी कायर पुरुषों के साथ हौं तो संग्राम में वह भी उनके समान हो जाता है।अत: वीर पुरुषों को कायरों की संगत नहीं करना चाहिऐ।
6.धर्मात्मा राजप्रमुख पर आपत्ति आने पर सभी उसके लिए युद्ध करते हैं। जिसे प्रजा प्यार करती है वह राजप्रमुख बहुत मुश्किल से परास्त होता है।
7.संधि कर भी बुद्धिमान किसी का विश्वास न करे। 'मैं वैर नहीं करूंगा' यह कहकर भी इंद्र ने वृत्रासुर को मार डाला।
8.समय आने पर पराक्रम प्रकट करने वाले तथा नम्र होने वाले बलवान पुरुष की संपत्ति कभी नहीं जाती। जैसे ढलान के ओर बहने वाली नदियां कभी नीचे जाना नहीं छोडती।

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Saturday, November 8, 2008

भृतहरि शतकः कामनाओं की अग्नि सदगुणों को जला देती है

तावन्महत्तवं पाण्डित्यं कुलीनत्वं विवेकता
यावज्जवलति नांगेषु हतः पञ्वेषु पावकः


हिंदी में भावार्थ-हृदय में विद्वता, कुलीनता और विवेक का प्रभाव तब तक ही रहता है जब तक ही जब तक कामना, वासना और इच्छा की अग्नि प्रज्जवलित नहीं हो उठती है। मन में लोभ और लालच का भाव आते ही सब सदगुण नष्ट हो जाते है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में मनुष्य के जीवन व्यतीत करने के दो ही मार्ग हैं-एक है ज्ञान मार्ग और दूसरा मोहमाया का मार्ग। मनुष्य तो अपने मन का दास है जैसे वह कहता है उसकी पांव वही चलते जाते है। यह उसका भ्रम है कि वह स्वयं चल रहा है। कुछ मनुष्य अपना जीवन ज्ञान के साथ व्यतीत करते हैं। वह सासंरिक कार्य करते हुए भी धन और मित्र के संग्रह में लोभ नहीं करते। जितना धन मिल गया उसी में संतुष्ट हो जाते हैं पर कुछ लोगों की लालच और लोभ का अंत ही नहीं है। वह धन और मित्र संग्रह से कभी संतुष्ट नहीं होते हैं और मोहमाया के मार्ग पर चलते जाते हैं।

हां, कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अधिक अवसर न मिल पाने की वजह से धन और मित्र संग्रह सीमित मात्रा में कर पाते हैं। वह तब खूब ज्ञान की बातें सुनते और करते हैं। उनकी बातों ये यह भ्रम भी हो जाता है कि वह संत या साधु प्रवृत्ति के हैं पर ऐसे लोगों को जब धन और मित्र बनाने के अधिक अवसर अचानक प्राप्त होते हैं तब वह सारा ज्ञान भूलकर उसका लाभ उठा लेते है।। तब उनका सारा ज्ञान एक तरह से बह जाता है। फिर वह पूरी तरह से धन संपदा और अपने निजी संबंधों के विस्तार पर अपना ध्यान केंद्रित कर देते हैं और उनके लिये पहले अर्जित ज्ञान निरर्थक हो जाता है।


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Thursday, October 23, 2008

संत कबीर सन्देश:अपने निज कर्मों को ही धर्म समझना भ्रम

‘कबीर’ मन फूल्या फिरै, करता हूं मैं ध्रंम
कोटि क्रम सिरि ले चल्या, चेत न देखै भ्रम

संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि आदमी अपने सिर पर कर्मकांडों का बोझ ढोते हुए फूलता है कि वह धर्म का निर्वाह कर रहा है। वह कभी अपने विवेक का उपयोग करते हुए इस बात का विचार नहीं करता कि यह उसका एक भ्रम है।
त्रिज्ञणा सींची ना बुझै, दिन दिन बधती जाइ
जवासा के रूष ज्यूं, घण मेहां कुमिलाइ


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मन में जो त्रृष्णा की अग्नि कभी बुझती नहीं है जैसे उस पर पानी डालो वैसे ही बढ़ती जाती है। जैसे जवासे का पौधा भारी वर्षा होने पर भी कुम्हला जाता है पर फिर हरा भरा हो जाता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-संत कबीरदास जी ने अपने समाज के अंधविश्वासों और कुरीतियों पर जमकर प्रहार किये हैं। कितने आश्चर्य की बात है कि अनेक संत और साधु उनके संदेशों को ग्रहण करने का उपदेश तो देते हैं पर समाज में फैले अंधविश्वास और कर्मकांडों पर खामोश रहते हैं। आदमी के जन्म से लेकर मृत्यु तक ढेर सारे ऐसे कर्मकांडों का प्रतिपादन किया गया है जिनका कोई वैज्ञानिक तथा तार्किक आधार नहीं है। इसके बावजूद बिना किसी तर्क के लोग उनका निर्वहन कर यह भ्रम पालते हैं कि वह धर्म का निर्वाह कर रहे हैं। किसी कर्मकांड को न करने पर अन्य लोग नरक का भय दिखाते हैं यह फिर धर्म भ्रष्ट घोषित कर देते हैं। इसीलिये कुछ आदमी अनचाहे तो कुछ लोग भ्रम में पड़कर ऐसा बोझा ढो रहे हैं जो उनके दैहिक जीवन को नरक बनाकर रख देता है। कोई भी स्वयं ज्ञान धारण नहीं करता बल्कि दूसरे की बात सुनकर अंधविश्वासों और रूढि़यों का भार अपने सिर पर सभी उसे ढोते जा रहे हैं। इस आर्थिक युग में कई लोग तो ऋण लेकर ऐसी परंपराओं को निभाते हैं और फिर उसके बोझ तले आजीवन परेशान रहते हैं। इससे तो अच्छा है कि हम अपने अंदर भगवान के प्रति भक्ति का भाव रखते हुए केवल उसी कार्य को करें जो आवश्यक हो। अपना जीवन अपने विवेक से ही जीना चाहिए।
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Thursday, July 31, 2008

संत कबीर वाणीः जो सत्य हो उसी के अनुसार बोलें

शब्द कहै सो कीजिये, बहुतक गुरु लबार
अपने अपने लाभ को, ठौर ठौर बटपार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो शब्द सत्य के अनुसार है उसी का विचार कर कहो। अधिक बोलने वाले गुरु बहुत है जो अपने स्वार्थ के लिये दूसरों को बातें बनाकर ठगते हैं। ऐसे गुरुओं की बात पर विचार न कर अपने विवेक क अनुसार वचन बोलो।

शब्द पाय सुरति राखहि, सो पहुंचे दरबार
कहैं कबीर तहां देखिए, बैठा पुरुष हमार


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो सत्य वचनों के ज्ञान को ग्रहण कर लेता है वह परमात्मा की भक्ति पा लेता है। उसे ऐसा लगता है कि वह भगवान की दरबार में ही बैठा है।
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