जिनके नाम निशान हैं, तिन अटकावै कौन।
पुरुष खजाना पाइया, मिटि गया गौन।।
जिनके मन में भगवान के प्रति भक्ति और ज्ञान है उनको भला कौन अटका सकता है। उस तत्व ज्ञान को पाकर तो मनुष्य जीवन मृत्यु के भाव से मुक्त हो जाता है।
ऐसे साच मानई, तिलकी देखो जोस
जारि जारि कोयला करै, जमता देखो सोय।।
यदि किसी बात को सच नहीं मानते तो तिल के काष्ट को जाकर देखो। उसे जलाकर राख कर दिया जाता है पर वह फिर अंकुरित होकर प्रकट होता है। जो तत्व ज्ञान है वह हर परीक्षा की कसौटी पर खरा उतरता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-ज्ञानी और भक्त किसी की परवाह नहीं करते। यह अलग बात है कि वह इसे प्रकट नहीं करते और संसार के कार्यों में लिप्तता प्रदर्शित करते हैं। ज्ञानी और भक्त की पहचान यह है कि वह तमाम तरह की आलोचना और निंदा को झेलते हुए भी अपने पथ से विचलित नहीं होते। इस संसार में मनुष्य का तो स्वभाव है कि वह अल्प ज्ञान क आधार पर ही सम्मान पाना चाहता है और वह इसके लिये दूसरे की निंदा भी करने को तैयार हो जाता है। जिनके पास ज्ञान और भक्ति का भंडार है वह कभी छोटी मोटी बातों से विचलित नहीं होते। उनकी पहचान यह है कि अगर उनका निंदक भी उनके सामने आ जाये तो उसे अपमानित नहीं करते। क्षमा उनका स्वाभाविक गुण होता है।
इसके विपरीत जिन्होंने ज्ञान की किताबें रट ली है उनकी भक्ति का प्रयोजन केवल अन्य लोगों पर अपना प्रभाव जमाना होता है। वह उस ज्ञान का अक्सर बखान करते हैं पर उनके आचार विचार में वह धारण किया हुआ प्रकट नहीं होता। ऐसे लोग थोड़ी सी आलोचना पर भी उत्तेजित हो जाते हैं। अगर सच्चे और ढोंगेी ज्ञानी का पहचान करनी हो तो इस बात को देखें कि कौन अपनी बात पर अमल करता है और कौन केवल मौखिक बात कहकर उसे भूल जाता है।
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Thursday, October 15, 2009
कौटिल्य का अर्थशास्त्र-मित्र की भी होती हैं तीन श्रेणियां (kautilya ka arthshastra in hindi)
मित्राणामन्तरं विद्याण्मध्यज्यायः कनीयसाम्।
मध्यज्यायः कनीयांसि कर्मणि च पृथकपृथक्।।
हिंदी में भावार्थ-मित्रों की उच्च, मध्य और निम्न कोटि की पहचान करते हुए उनके पृथक पृथक कार्यों का अध्ययन करें।
प्रकाशपक्षग्रहणं न कुर्यात्सुहृदां स्वयम्।
अन्योन्यमत्सजंवषां स्वयमेवाशु धारयेत्।।
हिंदी में भावार्थ-किसी वाद विवाद में अपने सहृदय और मित्रों का प्रत्यक्ष रूप से पक्ष न लेते हुए उनको गुप्त रूप से सहायता करें।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मित्र बनाने में कभी जल्दी नहीं करना चाहिये। मित्रों भी आम इंसान की तरह तीन श्रेणियां होती हैं-उच्च, मध्यम और निम्न। जिस तरह उच्च मनुष्यों की इस संसार में कमी दिखती है वैसे ही मित्रों कभी है। रोज रोज मिलने वाला हर आदमी मित्र नहीं हो जाता। सच तो यह है कि उस आदमी को बहुत कम धोखा मिलता है जो दोस्त कम बनाता है। वैसे इस समय इंटरनेट का जमाना है और इसलिये अधिक सतर्कता बरतना चाहिये। अभी हाल ही में ऐसे अनेक मामले सामने आये हैं जिसमें इंटरनेट पर लड़कों ने दोस्ती कर अनेक लड़कियों का जीवन बर्बाद कर दिया। इंटरनेट पर किसी का भी फोटो कोई भी लगा सकता है। अपनी आयु कम बता सकता है। अपने व्यवसाय को छिपा सकता है। कहने का तात्पर्य है कि जब सामान्य रूप से निभाने वाला मित्र बड़ी कठिनता से मिलता है तो इंटरनेट पर कहां से मिल जायेगा? इंटरनेट पर सक्रिय लोग कोई आसमानी नहीं है बल्कि इसी समाज से हैं। अतः मित्रों की पहचान कर ही आगे बढ़ना चाहिये।
इसके अलावा वाद विवाद के समय मित्र या सहृदय का सीधे पक्ष लेने की बजाय रणनीति से काम लेते हुए गुप्त रूप से उसकी सहायता करना चाहिये ताकि उसके विरोधी या शत्रु से आप गुप्त रहकर निरंतर उसकी रक्षा कर सकें। इसलिये अपने सहृदय और मित्र की सहायता के लिये उसके विरोधी या शत्रु के सामने किसी ऐसे व्यक्ति को प्रस्तुत करना चाहिये जो आपका सहायक हो और विरोधी या शत्रु उसकी पहचान न कर सके।
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मध्यज्यायः कनीयांसि कर्मणि च पृथकपृथक्।।
हिंदी में भावार्थ-मित्रों की उच्च, मध्य और निम्न कोटि की पहचान करते हुए उनके पृथक पृथक कार्यों का अध्ययन करें।
प्रकाशपक्षग्रहणं न कुर्यात्सुहृदां स्वयम्।
अन्योन्यमत्सजंवषां स्वयमेवाशु धारयेत्।।
हिंदी में भावार्थ-किसी वाद विवाद में अपने सहृदय और मित्रों का प्रत्यक्ष रूप से पक्ष न लेते हुए उनको गुप्त रूप से सहायता करें।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मित्र बनाने में कभी जल्दी नहीं करना चाहिये। मित्रों भी आम इंसान की तरह तीन श्रेणियां होती हैं-उच्च, मध्यम और निम्न। जिस तरह उच्च मनुष्यों की इस संसार में कमी दिखती है वैसे ही मित्रों कभी है। रोज रोज मिलने वाला हर आदमी मित्र नहीं हो जाता। सच तो यह है कि उस आदमी को बहुत कम धोखा मिलता है जो दोस्त कम बनाता है। वैसे इस समय इंटरनेट का जमाना है और इसलिये अधिक सतर्कता बरतना चाहिये। अभी हाल ही में ऐसे अनेक मामले सामने आये हैं जिसमें इंटरनेट पर लड़कों ने दोस्ती कर अनेक लड़कियों का जीवन बर्बाद कर दिया। इंटरनेट पर किसी का भी फोटो कोई भी लगा सकता है। अपनी आयु कम बता सकता है। अपने व्यवसाय को छिपा सकता है। कहने का तात्पर्य है कि जब सामान्य रूप से निभाने वाला मित्र बड़ी कठिनता से मिलता है तो इंटरनेट पर कहां से मिल जायेगा? इंटरनेट पर सक्रिय लोग कोई आसमानी नहीं है बल्कि इसी समाज से हैं। अतः मित्रों की पहचान कर ही आगे बढ़ना चाहिये।
इसके अलावा वाद विवाद के समय मित्र या सहृदय का सीधे पक्ष लेने की बजाय रणनीति से काम लेते हुए गुप्त रूप से उसकी सहायता करना चाहिये ताकि उसके विरोधी या शत्रु से आप गुप्त रहकर निरंतर उसकी रक्षा कर सकें। इसलिये अपने सहृदय और मित्र की सहायता के लिये उसके विरोधी या शत्रु के सामने किसी ऐसे व्यक्ति को प्रस्तुत करना चाहिये जो आपका सहायक हो और विरोधी या शत्रु उसकी पहचान न कर सके।
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Saturday, September 26, 2009
कौटिल्य का अर्थशास्त्र-मोर की वाणी किसे प्रिय नहीं होती (kautilya ka arthshastra)
मियमेवाभिघातव्यं नित्यं सत्सु द्विषत्सु च।
शिखीव केकामघुरः प्रियावाक् कस्य न प्रियः।।
हिंदी में भावार्थ-मित्र हो या शत्रु सबसे ही मधुरवाणी में वार्तालाप करना चाहिए। आप देखें मोर की मधुर वाणी सभी को कितना प्रिय होती है।
तीव्राण्युद्वेगकारीणि विसृश्टान्यनवात्मकैः।
कृन्तन्ति देहिनां मम्र्भ शस्त्राणीव वर्चासि च।।
हिंदी में भावार्थ-किसी के हृदय को उद्वेलित करने वाले वचन कुछ अनाचारी लोग उपयोग करते हैं उससे दूसरे को शस्त्र लगने के समान विदीर्ण हो जाते हैं पर सज्जन लोग कभी कटु शब्द और कर्कश वाणी से किसी अन्य को कष्ट नहीं देते।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हम अपनी इंद्रियों के वशीभूत होकर अपना जीवन व्यतीत करते हैं। हमारी प्रकृतियां मन, बुद्धि और अहंकार है जो हमारे व्यवहार का निर्धारण करती हैं। ऐसे में जिनकी प्रकृतियां नीच हैं वह अपनी कटु वाणी और व्यवहार से दूसरे को कष्ट देते हैं जबकि उच्च प्रकृति वाले सदैव अपने वचनों से दूसरों को प्रभावित करते हैं। इसलिये जहां तक हो सके दृष्टा की तरह अपना आत्ममंथन करते रहे ताकि अपने बुरे व्यवहार से समाज में हमें अलोकप्रियता प्राप्त न हो। अपना परीक्षण का सबसे अच्छा उपाय यह है कि हम पर किसी के अच्छे या बुरे व्यवहार और वाणी का क्या प्रभाव पड़ता है इसे देखें और उसके बाद यह तय करें कि हमें अब कौनसे मार्ग पर चलना है।
यह बात आत्मपरीक्षण से ही समझी जा सकती है कि जिस तरह दूसरे के व्यवहार से हम पर अच्छा या बुरा प्रभाव पड़ता है वैसे ही हमारे व्यवहार का भी दूसरे पर प्रभाव होता है। जहां हमने आत्मुग्धता का दृष्टिकोण अपने अंदर पाला वहीं से हमारा वैचारिक और नैतिक पतन प्रारंभ हो जाता है।
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शिखीव केकामघुरः प्रियावाक् कस्य न प्रियः।।
हिंदी में भावार्थ-मित्र हो या शत्रु सबसे ही मधुरवाणी में वार्तालाप करना चाहिए। आप देखें मोर की मधुर वाणी सभी को कितना प्रिय होती है।
तीव्राण्युद्वेगकारीणि विसृश्टान्यनवात्मकैः।
कृन्तन्ति देहिनां मम्र्भ शस्त्राणीव वर्चासि च।।
हिंदी में भावार्थ-किसी के हृदय को उद्वेलित करने वाले वचन कुछ अनाचारी लोग उपयोग करते हैं उससे दूसरे को शस्त्र लगने के समान विदीर्ण हो जाते हैं पर सज्जन लोग कभी कटु शब्द और कर्कश वाणी से किसी अन्य को कष्ट नहीं देते।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हम अपनी इंद्रियों के वशीभूत होकर अपना जीवन व्यतीत करते हैं। हमारी प्रकृतियां मन, बुद्धि और अहंकार है जो हमारे व्यवहार का निर्धारण करती हैं। ऐसे में जिनकी प्रकृतियां नीच हैं वह अपनी कटु वाणी और व्यवहार से दूसरे को कष्ट देते हैं जबकि उच्च प्रकृति वाले सदैव अपने वचनों से दूसरों को प्रभावित करते हैं। इसलिये जहां तक हो सके दृष्टा की तरह अपना आत्ममंथन करते रहे ताकि अपने बुरे व्यवहार से समाज में हमें अलोकप्रियता प्राप्त न हो। अपना परीक्षण का सबसे अच्छा उपाय यह है कि हम पर किसी के अच्छे या बुरे व्यवहार और वाणी का क्या प्रभाव पड़ता है इसे देखें और उसके बाद यह तय करें कि हमें अब कौनसे मार्ग पर चलना है।
यह बात आत्मपरीक्षण से ही समझी जा सकती है कि जिस तरह दूसरे के व्यवहार से हम पर अच्छा या बुरा प्रभाव पड़ता है वैसे ही हमारे व्यवहार का भी दूसरे पर प्रभाव होता है। जहां हमने आत्मुग्धता का दृष्टिकोण अपने अंदर पाला वहीं से हमारा वैचारिक और नैतिक पतन प्रारंभ हो जाता है।
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Monday, September 21, 2009
संत कबीर वाणी-एक बूंद के कारण संसार रोता है (sant kabir sandesh-ek boond aur sansar)
एक बूंद के कारनै, रोता सब संसार।
अनेक बुंद खाली गये, तिनका नहीं विचार।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि एक बूंद से इस जीव की रचना होती है और उसी के चले जाने पर सारा संसार रोता है। अनेक बूंदें खाली गयी उसका विचार नहीं करता।
आंखि न देखि बावरा, शब्द सुनौ नहिं कान।
सिर के केस उज्जल भये, अबहूं निपट अज्ञान।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इंसान बावरा होकर जीता है। न उसकी आंख कुछ देखती है न कान सुनते हैं। सिर के बाल सफेद हो जाने पर भी वह अज्ञानी बना रहता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे अध्यात्मिक ज्ञानी महापुरुष न केवल भक्ति का उपदेश देते हैं पर उसके साथ विज्ञान का भी कराते हैं यह बात कबीरदास जी के संदेशों से स्पष्ट हो जाती है। पश्चिमी विज्ञान अब बता रहा है कि एक पुरुष करोड़ों बूंदें वीर्य की छोड़ता है उसमें से कोई एक बूंद स्त्री के गर्भ में स्थापित होती है शेष व्यर्थ चली जाती हैं। कितने आश्चर्य की बात है कि संत कबीरदास जी के काल में भारतीय इस बात को जानते थे। इस एक बूंद से ही जीव की रचना होती है और उसके जन्म पर खुशी तथा निधन पर लोग शोक मनाते हैं। यह हंसने की बात है कि एक बूंद जिसे अधिक जीवन मिला और शेष क्षण मात्र में नष्ट हो गयी पर जिनको अधिक जीवन मिला उसके लिये प्रसन्नता व्यक्त करने और रोने वाले बहुत हो जाते हैं। जीवन तो उन बूंदों में भी होता है जो क्षण मात्र में नष्ट हो जाती हैं पर वह दृश्यव्य नहीं है उनके लिये कौन रोता या हंसता है?
इतना अद्भुत तत्वज्ञान हमारे अध्यात्म में भरा हुआ है जिसे सुनकर आज हम इसलिये हतप्रभ रह जाते हैं क्योंकि एक योजनाबद्ध ढंग से उसे हमसे दूर रखा जाता है। इस बूंद से बनने वाले जीवन में भी मौजूद जीव न पैदा होता और न मरता है-इस मान्यता के कारण हमारे यहां जन्मतिथि और पुण्यतिथि मनाने की कोई आधिकारिक परंपरा नहीं है पर आजकल ऐसे लोग भी जन्म और पुण्यतिथि कार्यक्रम मनाते हैं जो दावा करते हैं कि वह भारतीय अध्यात्म के कट्टर समर्थक हैं। इस तरह की अज्ञान से भरपूर परंपरायें हमारे देश में खूब चल रही हैं। श्रीगीता में भी प्रथम अध्याय में श्री अर्जुन ने अपना विषाद भगवान श्रीकृष्ण के समक्ष प्रस्तुत किया था जिसमें कहा था कि जब पूरा कुनबा ही खत्म हो जायेगा तब हमारे पितरों के लिये तर्पण कौन करेगा। श्री कृष्ण जी ने उनके सारे विषादों को भ्रम बताते हुए श्री गीता का ज्ञान दिया था। इसके बावजूद कर्मकांडों के नाम पर हमारे यहां श्राद्ध के साथ जन्मतिथि और पुण्यतिथि मनाये जाते हैं। इस अज्ञानजनित कार्य में ऐसे कथित संत भी लिप्त मिलते हैं जो यह दावा करते हैं कि उन्होंने तपस्या से भगवान का दर्शन किया है। इनमें कई बूढ़े हो गये हैं और अपनी आरती भक्तों से करवाते हैं। सच बात तो यह है कि उन लोगों को लिये अध्यात्मिक ज्ञान सुनाना एक व्यवसाय है जबकि वस्तुतः होते तो वह सामान्य आदमी की तरह अज्ञानी हैं जिसकी आंखें हैं पर देखती नहीं और कान शब्द सुनते हुए भी अनसुना कर जाते हैं।
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अनेक बुंद खाली गये, तिनका नहीं विचार।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि एक बूंद से इस जीव की रचना होती है और उसी के चले जाने पर सारा संसार रोता है। अनेक बूंदें खाली गयी उसका विचार नहीं करता।
आंखि न देखि बावरा, शब्द सुनौ नहिं कान।
सिर के केस उज्जल भये, अबहूं निपट अज्ञान।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इंसान बावरा होकर जीता है। न उसकी आंख कुछ देखती है न कान सुनते हैं। सिर के बाल सफेद हो जाने पर भी वह अज्ञानी बना रहता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे अध्यात्मिक ज्ञानी महापुरुष न केवल भक्ति का उपदेश देते हैं पर उसके साथ विज्ञान का भी कराते हैं यह बात कबीरदास जी के संदेशों से स्पष्ट हो जाती है। पश्चिमी विज्ञान अब बता रहा है कि एक पुरुष करोड़ों बूंदें वीर्य की छोड़ता है उसमें से कोई एक बूंद स्त्री के गर्भ में स्थापित होती है शेष व्यर्थ चली जाती हैं। कितने आश्चर्य की बात है कि संत कबीरदास जी के काल में भारतीय इस बात को जानते थे। इस एक बूंद से ही जीव की रचना होती है और उसके जन्म पर खुशी तथा निधन पर लोग शोक मनाते हैं। यह हंसने की बात है कि एक बूंद जिसे अधिक जीवन मिला और शेष क्षण मात्र में नष्ट हो गयी पर जिनको अधिक जीवन मिला उसके लिये प्रसन्नता व्यक्त करने और रोने वाले बहुत हो जाते हैं। जीवन तो उन बूंदों में भी होता है जो क्षण मात्र में नष्ट हो जाती हैं पर वह दृश्यव्य नहीं है उनके लिये कौन रोता या हंसता है?
इतना अद्भुत तत्वज्ञान हमारे अध्यात्म में भरा हुआ है जिसे सुनकर आज हम इसलिये हतप्रभ रह जाते हैं क्योंकि एक योजनाबद्ध ढंग से उसे हमसे दूर रखा जाता है। इस बूंद से बनने वाले जीवन में भी मौजूद जीव न पैदा होता और न मरता है-इस मान्यता के कारण हमारे यहां जन्मतिथि और पुण्यतिथि मनाने की कोई आधिकारिक परंपरा नहीं है पर आजकल ऐसे लोग भी जन्म और पुण्यतिथि कार्यक्रम मनाते हैं जो दावा करते हैं कि वह भारतीय अध्यात्म के कट्टर समर्थक हैं। इस तरह की अज्ञान से भरपूर परंपरायें हमारे देश में खूब चल रही हैं। श्रीगीता में भी प्रथम अध्याय में श्री अर्जुन ने अपना विषाद भगवान श्रीकृष्ण के समक्ष प्रस्तुत किया था जिसमें कहा था कि जब पूरा कुनबा ही खत्म हो जायेगा तब हमारे पितरों के लिये तर्पण कौन करेगा। श्री कृष्ण जी ने उनके सारे विषादों को भ्रम बताते हुए श्री गीता का ज्ञान दिया था। इसके बावजूद कर्मकांडों के नाम पर हमारे यहां श्राद्ध के साथ जन्मतिथि और पुण्यतिथि मनाये जाते हैं। इस अज्ञानजनित कार्य में ऐसे कथित संत भी लिप्त मिलते हैं जो यह दावा करते हैं कि उन्होंने तपस्या से भगवान का दर्शन किया है। इनमें कई बूढ़े हो गये हैं और अपनी आरती भक्तों से करवाते हैं। सच बात तो यह है कि उन लोगों को लिये अध्यात्मिक ज्ञान सुनाना एक व्यवसाय है जबकि वस्तुतः होते तो वह सामान्य आदमी की तरह अज्ञानी हैं जिसकी आंखें हैं पर देखती नहीं और कान शब्द सुनते हुए भी अनसुना कर जाते हैं।
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Wednesday, September 16, 2009
कौटिल्य का अर्थशास्त्र-निंदा रहित, परोपकारी, कर्तव्यनिष्ठ और मधुर वक्ता ही सच्चे धार्मिक (sachcha dharm-kautilya ka arthshastra)
हृदि विद्ध इवात्यर्थ यदा सन्तप्यते जनः।
पीडितोऽपि हि न मेघावीन्तां वाचमुदीरयेत्।।
हिंदी में भावार्थ-क्रूर वाणी से हर आदमी का मन त्रस्त हो जाता है इसलिये विद्वान लोगों को चाहिए कि वह कठोर वाणी न बोलें। भले ही अन्य लोग अपनी कठोर वाणी से संताप देते रहें।
अनिन्दापरकृत्येषु स्वधम्र्मपरिपालनम्।
कृपणेषु दयालुत्वं सव्र्वत्र मधुरा गिरः।।
हिंदी में भावार्थ-दूसरे के कार्य की निंदा न करते हुए अपना धर्म पालन करना , दीनों पर दया करना तथा मीठे वचनों से दूसरों को तृप्त करना ही धर्म है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस दुनियां में प्रचलित अनेक धर्मों की व्याख्या करती हुई अनेक किताबें मौजूद हैंे पर फिर भी अशांति व्याप्त है। कहीं आतंकवाद है तो कहीं युद्ध की आशंकायें। इसके अलावा लोगों के अंदर मानसिक तनाव की ऐसी धारा प्रवाहित हो रही है जिससे किसी की मुक्ति नहीं है। दरअसल धर्म के नाम सभी जगह भ्रम फैलाया जा रहा है। कहने को तो कहा जाता है कि हिन्दू धर्म है पर वास्तव में यह एक जीवन शैली है। वैसे हिन्दू धर्म के नाम पर कर्मकांडों का प्रचार भी भ्रम से कम नहीं है। धर्म का मूल स्वरूप इतना बड़ा और कठिन नहीं है जितना बताया जाता है। धर्म से आशय यह है कि हम मनुष्य हैं और न केवल अपनी देह का पालन करें बल्कि दूसरों की भी सहायता करें, किसी को कष्ट न पहुंचायें। सभी को अपनी मधुर वाणी से प्रसन्न करते हुए अपनी मनुष्य यौनि का का आनंद उठायें।
मगर इसके विपरीत धर्म के नाम पर भ्रम का प्रचार करने वाले लोगों की कमी नहीं है, जो यह बताते हैं कि कर्मकांड करने पर स्वर्ग मिलता है। कई तो ऐसे भी हैं जो बताते हैं कि यह खाओ, यह पहनो, इस तरह चलो तो स्वर्ग मिलेगा। स्वर्ग की यह कपोल कल्पना आदमी की बुद्धि को बंधक बनाये रखती है और धर्म के ठेकेदार अपने इन्हीं बंधकों के सहारे राज्य कर रहे हैं। कई तो ऐसे भी हैं जो अपने धर्म का राज्य लाने के लिये प्रयत्नशील हैं तो कुछ ऐसे है जो तमाम तरह की किताबों से ज्ञान उठाकर बताते हैं कि उनका धर्म श्रेष्ठ है। सच तो यह है कि धर्म से आशय केवल इतना ही है कि अपने कर्तव्यों का पालने करते हुए दूसरे पीड़ितों की भी मदद करें। हमेशा ही मधुर वाणी में बोलें और यह सिद्ध करें कि आपको परमात्मा ने जो जिव्हा दी है उसका आप सदुपयोग कर रहे हैं।
दूसरे की निंदा कर अपने को श्रेष्ठ साबित करना या कड़े शब्दों का उपयोग कर किसी को दुःख देना तो बहुत आसान है मुश्किल तो दूसरे को खुश करने में आती है जो कि धर्म का सबसे बड़ा परिचायक है।
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पीडितोऽपि हि न मेघावीन्तां वाचमुदीरयेत्।।
हिंदी में भावार्थ-क्रूर वाणी से हर आदमी का मन त्रस्त हो जाता है इसलिये विद्वान लोगों को चाहिए कि वह कठोर वाणी न बोलें। भले ही अन्य लोग अपनी कठोर वाणी से संताप देते रहें।
अनिन्दापरकृत्येषु स्वधम्र्मपरिपालनम्।
कृपणेषु दयालुत्वं सव्र्वत्र मधुरा गिरः।।
हिंदी में भावार्थ-दूसरे के कार्य की निंदा न करते हुए अपना धर्म पालन करना , दीनों पर दया करना तथा मीठे वचनों से दूसरों को तृप्त करना ही धर्म है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस दुनियां में प्रचलित अनेक धर्मों की व्याख्या करती हुई अनेक किताबें मौजूद हैंे पर फिर भी अशांति व्याप्त है। कहीं आतंकवाद है तो कहीं युद्ध की आशंकायें। इसके अलावा लोगों के अंदर मानसिक तनाव की ऐसी धारा प्रवाहित हो रही है जिससे किसी की मुक्ति नहीं है। दरअसल धर्म के नाम सभी जगह भ्रम फैलाया जा रहा है। कहने को तो कहा जाता है कि हिन्दू धर्म है पर वास्तव में यह एक जीवन शैली है। वैसे हिन्दू धर्म के नाम पर कर्मकांडों का प्रचार भी भ्रम से कम नहीं है। धर्म का मूल स्वरूप इतना बड़ा और कठिन नहीं है जितना बताया जाता है। धर्म से आशय यह है कि हम मनुष्य हैं और न केवल अपनी देह का पालन करें बल्कि दूसरों की भी सहायता करें, किसी को कष्ट न पहुंचायें। सभी को अपनी मधुर वाणी से प्रसन्न करते हुए अपनी मनुष्य यौनि का का आनंद उठायें।
मगर इसके विपरीत धर्म के नाम पर भ्रम का प्रचार करने वाले लोगों की कमी नहीं है, जो यह बताते हैं कि कर्मकांड करने पर स्वर्ग मिलता है। कई तो ऐसे भी हैं जो बताते हैं कि यह खाओ, यह पहनो, इस तरह चलो तो स्वर्ग मिलेगा। स्वर्ग की यह कपोल कल्पना आदमी की बुद्धि को बंधक बनाये रखती है और धर्म के ठेकेदार अपने इन्हीं बंधकों के सहारे राज्य कर रहे हैं। कई तो ऐसे भी हैं जो अपने धर्म का राज्य लाने के लिये प्रयत्नशील हैं तो कुछ ऐसे है जो तमाम तरह की किताबों से ज्ञान उठाकर बताते हैं कि उनका धर्म श्रेष्ठ है। सच तो यह है कि धर्म से आशय केवल इतना ही है कि अपने कर्तव्यों का पालने करते हुए दूसरे पीड़ितों की भी मदद करें। हमेशा ही मधुर वाणी में बोलें और यह सिद्ध करें कि आपको परमात्मा ने जो जिव्हा दी है उसका आप सदुपयोग कर रहे हैं।
दूसरे की निंदा कर अपने को श्रेष्ठ साबित करना या कड़े शब्दों का उपयोग कर किसी को दुःख देना तो बहुत आसान है मुश्किल तो दूसरे को खुश करने में आती है जो कि धर्म का सबसे बड़ा परिचायक है।
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Saturday, April 11, 2009
चाणक्य नीतिः खाने पीने के विषय में कतई संकोच न करें
धन-धान्यप्रयोगेषु विद्य-संग्रहणेषु च।
आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत्।
हिंदी में भावार्थ-धन धान्य के व्यवहार, ज्ञान विद्या के संग्रह और खाने पीने में जो व्यक्ति संकोच या लज्जा नहीं करते वही जीवन में सुखी रहते हैं।
अर्थनाशं मनस्तापं गृहे दुश्चरितानि च।
वंचनं चाऽपमानं च मतिमान्न प्रकाशयेत्।।
हिंदी में भावार्थ-अपने धन का नाश, मन का दुःख, स्त्री की चरित्रहीनता और किसी अन्य व्यक्ति द्वारा वचनों के द्वारा कष्ट देने की बात सभी के सामने प्रकाशित नहीं करना चाहियै
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कुछ बातों सभी से कहना चाहिये और कुछ नहीं। अक्सर हम व्यग्र होने पर ऐसी बातें लोगों से कह जाते हैं जो नहीं कहना चाहिये। कभी व्यग्रता इतनी बढ़ जाती है कि कह ही नहीं पाते। नीति विशारद चाणक्य के अनुसार जिस बात से अपना अपमान होता हो या अपमान हो चुका हो वह बात किसी को नहीं बताना चाहिये। खासतौर से जब हमारे धन का नाश हमारी गलती से हो गया हो।
इसके अलावा कुछ बातें छिपानी भी नहीं चाहिये। अगर हमारे पास धन या खाद्यान्न नहीं है तो स्पष्टतः उस आदमी को बता देना चाहिये जिससे हमें मदद अपेक्षित है। किसी से कोई बात सीखने के लिये उसके सामने अपने अज्ञान को छिपाना ठीक नहीं है। अगर पेट में भूख हो कहीं अपने खाने का जुगाड़ नहीं हो पाता और कोई अन्य हमें भोजन का आग्रह करता है तो उसे अस्वीकार करना मूर्खता का काम है। कहने का तात्पर्य है कि जहां सम्मान की बात है तो ऐसी बात लोगों को नहीं बताना चाहिये जिससे हमारे अपमान का विस्तार हो साथ ही अपनी दैहिक और मानसिक आवश्यकताओं को दूसरों से छिपाना भी नहीं चाहिये।
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आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत्।
हिंदी में भावार्थ-धन धान्य के व्यवहार, ज्ञान विद्या के संग्रह और खाने पीने में जो व्यक्ति संकोच या लज्जा नहीं करते वही जीवन में सुखी रहते हैं।
अर्थनाशं मनस्तापं गृहे दुश्चरितानि च।
वंचनं चाऽपमानं च मतिमान्न प्रकाशयेत्।।
हिंदी में भावार्थ-अपने धन का नाश, मन का दुःख, स्त्री की चरित्रहीनता और किसी अन्य व्यक्ति द्वारा वचनों के द्वारा कष्ट देने की बात सभी के सामने प्रकाशित नहीं करना चाहियै
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कुछ बातों सभी से कहना चाहिये और कुछ नहीं। अक्सर हम व्यग्र होने पर ऐसी बातें लोगों से कह जाते हैं जो नहीं कहना चाहिये। कभी व्यग्रता इतनी बढ़ जाती है कि कह ही नहीं पाते। नीति विशारद चाणक्य के अनुसार जिस बात से अपना अपमान होता हो या अपमान हो चुका हो वह बात किसी को नहीं बताना चाहिये। खासतौर से जब हमारे धन का नाश हमारी गलती से हो गया हो।
इसके अलावा कुछ बातें छिपानी भी नहीं चाहिये। अगर हमारे पास धन या खाद्यान्न नहीं है तो स्पष्टतः उस आदमी को बता देना चाहिये जिससे हमें मदद अपेक्षित है। किसी से कोई बात सीखने के लिये उसके सामने अपने अज्ञान को छिपाना ठीक नहीं है। अगर पेट में भूख हो कहीं अपने खाने का जुगाड़ नहीं हो पाता और कोई अन्य हमें भोजन का आग्रह करता है तो उसे अस्वीकार करना मूर्खता का काम है। कहने का तात्पर्य है कि जहां सम्मान की बात है तो ऐसी बात लोगों को नहीं बताना चाहिये जिससे हमारे अपमान का विस्तार हो साथ ही अपनी दैहिक और मानसिक आवश्यकताओं को दूसरों से छिपाना भी नहीं चाहिये।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप
Saturday, December 6, 2008
कौटिल्य का अर्थशास्त्र: धर्म रहित व्यक्ति से कभी संधि न करें
1. दूर्भिक्ष और आपत्तिग्रस्त स्वयं ही नष्ट होता है और सेना का व्यसन को प्राप्त हुआ राज प्रमुख युद्ध की शक्ति नहीं रखता।
2. विदेश में स्थित राज प्रमुख छोटे शत्रु से भी परास्त हो जाता है। थोड़े जल में स्थित ग्राह हाथी को खींचकर चला जाता है।
3. बहुत शत्रुओं से भयभीत हुआ राजा गिद्धों के मध्य में कबूतर के समान जिस मार्ग में गमन करता है, उसी में वह शीघ्र नष्ट हो जाता है।
4.सत्य धर्म से रहित व्यक्ति के साथ कभी संधि न करें। दुष्ट व्यक्ति संधि करने पर भी अपनी प्रवृति के कारण हमला करता ही है।
5.डरपोक युद्ध के त्याग से स्वयं ही नष्ट होता है। वीर पुरुष भी कायर पुरुषों के साथ हौं तो संग्राम में वह भी उनके समान हो जाता है।अत: वीर पुरुषों को कायरों की संगत नहीं करना चाहिऐ।
6.धर्मात्मा राजप्रमुख पर आपत्ति आने पर सभी उसके लिए युद्ध करते हैं। जिसे प्रजा प्यार करती है वह राजप्रमुख बहुत मुश्किल से परास्त होता है।
7.संधि कर भी बुद्धिमान किसी का विश्वास न करे। 'मैं वैर नहीं करूंगा' यह कहकर भी इंद्र ने वृत्रासुर को मार डाला।
8.समय आने पर पराक्रम प्रकट करने वाले तथा नम्र होने वाले बलवान पुरुष की संपत्ति कभी नहीं जाती। जैसे ढलान के ओर बहने वाली नदियां कभी नीचे जाना नहीं छोडती।
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2. विदेश में स्थित राज प्रमुख छोटे शत्रु से भी परास्त हो जाता है। थोड़े जल में स्थित ग्राह हाथी को खींचकर चला जाता है।
3. बहुत शत्रुओं से भयभीत हुआ राजा गिद्धों के मध्य में कबूतर के समान जिस मार्ग में गमन करता है, उसी में वह शीघ्र नष्ट हो जाता है।
4.सत्य धर्म से रहित व्यक्ति के साथ कभी संधि न करें। दुष्ट व्यक्ति संधि करने पर भी अपनी प्रवृति के कारण हमला करता ही है।
5.डरपोक युद्ध के त्याग से स्वयं ही नष्ट होता है। वीर पुरुष भी कायर पुरुषों के साथ हौं तो संग्राम में वह भी उनके समान हो जाता है।अत: वीर पुरुषों को कायरों की संगत नहीं करना चाहिऐ।
6.धर्मात्मा राजप्रमुख पर आपत्ति आने पर सभी उसके लिए युद्ध करते हैं। जिसे प्रजा प्यार करती है वह राजप्रमुख बहुत मुश्किल से परास्त होता है।
7.संधि कर भी बुद्धिमान किसी का विश्वास न करे। 'मैं वैर नहीं करूंगा' यह कहकर भी इंद्र ने वृत्रासुर को मार डाला।
8.समय आने पर पराक्रम प्रकट करने वाले तथा नम्र होने वाले बलवान पुरुष की संपत्ति कभी नहीं जाती। जैसे ढलान के ओर बहने वाली नदियां कभी नीचे जाना नहीं छोडती।
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3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप
Saturday, November 8, 2008
भृतहरि शतकः कामनाओं की अग्नि सदगुणों को जला देती है
तावन्महत्तवं पाण्डित्यं कुलीनत्वं विवेकता
यावज्जवलति नांगेषु हतः पञ्वेषु पावकः
हिंदी में भावार्थ-हृदय में विद्वता, कुलीनता और विवेक का प्रभाव तब तक ही रहता है जब तक ही जब तक कामना, वासना और इच्छा की अग्नि प्रज्जवलित नहीं हो उठती है। मन में लोभ और लालच का भाव आते ही सब सदगुण नष्ट हो जाते है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में मनुष्य के जीवन व्यतीत करने के दो ही मार्ग हैं-एक है ज्ञान मार्ग और दूसरा मोहमाया का मार्ग। मनुष्य तो अपने मन का दास है जैसे वह कहता है उसकी पांव वही चलते जाते है। यह उसका भ्रम है कि वह स्वयं चल रहा है। कुछ मनुष्य अपना जीवन ज्ञान के साथ व्यतीत करते हैं। वह सासंरिक कार्य करते हुए भी धन और मित्र के संग्रह में लोभ नहीं करते। जितना धन मिल गया उसी में संतुष्ट हो जाते हैं पर कुछ लोगों की लालच और लोभ का अंत ही नहीं है। वह धन और मित्र संग्रह से कभी संतुष्ट नहीं होते हैं और मोहमाया के मार्ग पर चलते जाते हैं।
हां, कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अधिक अवसर न मिल पाने की वजह से धन और मित्र संग्रह सीमित मात्रा में कर पाते हैं। वह तब खूब ज्ञान की बातें सुनते और करते हैं। उनकी बातों ये यह भ्रम भी हो जाता है कि वह संत या साधु प्रवृत्ति के हैं पर ऐसे लोगों को जब धन और मित्र बनाने के अधिक अवसर अचानक प्राप्त होते हैं तब वह सारा ज्ञान भूलकर उसका लाभ उठा लेते है।। तब उनका सारा ज्ञान एक तरह से बह जाता है। फिर वह पूरी तरह से धन संपदा और अपने निजी संबंधों के विस्तार पर अपना ध्यान केंद्रित कर देते हैं और उनके लिये पहले अर्जित ज्ञान निरर्थक हो जाता है।
यावज्जवलति नांगेषु हतः पञ्वेषु पावकः
हिंदी में भावार्थ-हृदय में विद्वता, कुलीनता और विवेक का प्रभाव तब तक ही रहता है जब तक ही जब तक कामना, वासना और इच्छा की अग्नि प्रज्जवलित नहीं हो उठती है। मन में लोभ और लालच का भाव आते ही सब सदगुण नष्ट हो जाते है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में मनुष्य के जीवन व्यतीत करने के दो ही मार्ग हैं-एक है ज्ञान मार्ग और दूसरा मोहमाया का मार्ग। मनुष्य तो अपने मन का दास है जैसे वह कहता है उसकी पांव वही चलते जाते है। यह उसका भ्रम है कि वह स्वयं चल रहा है। कुछ मनुष्य अपना जीवन ज्ञान के साथ व्यतीत करते हैं। वह सासंरिक कार्य करते हुए भी धन और मित्र के संग्रह में लोभ नहीं करते। जितना धन मिल गया उसी में संतुष्ट हो जाते हैं पर कुछ लोगों की लालच और लोभ का अंत ही नहीं है। वह धन और मित्र संग्रह से कभी संतुष्ट नहीं होते हैं और मोहमाया के मार्ग पर चलते जाते हैं।
हां, कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अधिक अवसर न मिल पाने की वजह से धन और मित्र संग्रह सीमित मात्रा में कर पाते हैं। वह तब खूब ज्ञान की बातें सुनते और करते हैं। उनकी बातों ये यह भ्रम भी हो जाता है कि वह संत या साधु प्रवृत्ति के हैं पर ऐसे लोगों को जब धन और मित्र बनाने के अधिक अवसर अचानक प्राप्त होते हैं तब वह सारा ज्ञान भूलकर उसका लाभ उठा लेते है।। तब उनका सारा ज्ञान एक तरह से बह जाता है। फिर वह पूरी तरह से धन संपदा और अपने निजी संबंधों के विस्तार पर अपना ध्यान केंद्रित कर देते हैं और उनके लिये पहले अर्जित ज्ञान निरर्थक हो जाता है।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप
Thursday, October 23, 2008
संत कबीर सन्देश:अपने निज कर्मों को ही धर्म समझना भ्रम
‘कबीर’ मन फूल्या फिरै, करता हूं मैं ध्रंम
कोटि क्रम सिरि ले चल्या, चेत न देखै भ्रम
संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि आदमी अपने सिर पर कर्मकांडों का बोझ ढोते हुए फूलता है कि वह धर्म का निर्वाह कर रहा है। वह कभी अपने विवेक का उपयोग करते हुए इस बात का विचार नहीं करता कि यह उसका एक भ्रम है।
त्रिज्ञणा सींची ना बुझै, दिन दिन बधती जाइ
जवासा के रूष ज्यूं, घण मेहां कुमिलाइ
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मन में जो त्रृष्णा की अग्नि कभी बुझती नहीं है जैसे उस पर पानी डालो वैसे ही बढ़ती जाती है। जैसे जवासे का पौधा भारी वर्षा होने पर भी कुम्हला जाता है पर फिर हरा भरा हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-संत कबीरदास जी ने अपने समाज के अंधविश्वासों और कुरीतियों पर जमकर प्रहार किये हैं। कितने आश्चर्य की बात है कि अनेक संत और साधु उनके संदेशों को ग्रहण करने का उपदेश तो देते हैं पर समाज में फैले अंधविश्वास और कर्मकांडों पर खामोश रहते हैं। आदमी के जन्म से लेकर मृत्यु तक ढेर सारे ऐसे कर्मकांडों का प्रतिपादन किया गया है जिनका कोई वैज्ञानिक तथा तार्किक आधार नहीं है। इसके बावजूद बिना किसी तर्क के लोग उनका निर्वहन कर यह भ्रम पालते हैं कि वह धर्म का निर्वाह कर रहे हैं। किसी कर्मकांड को न करने पर अन्य लोग नरक का भय दिखाते हैं यह फिर धर्म भ्रष्ट घोषित कर देते हैं। इसीलिये कुछ आदमी अनचाहे तो कुछ लोग भ्रम में पड़कर ऐसा बोझा ढो रहे हैं जो उनके दैहिक जीवन को नरक बनाकर रख देता है। कोई भी स्वयं ज्ञान धारण नहीं करता बल्कि दूसरे की बात सुनकर अंधविश्वासों और रूढि़यों का भार अपने सिर पर सभी उसे ढोते जा रहे हैं। इस आर्थिक युग में कई लोग तो ऋण लेकर ऐसी परंपराओं को निभाते हैं और फिर उसके बोझ तले आजीवन परेशान रहते हैं। इससे तो अच्छा है कि हम अपने अंदर भगवान के प्रति भक्ति का भाव रखते हुए केवल उसी कार्य को करें जो आवश्यक हो। अपना जीवन अपने विवेक से ही जीना चाहिए।
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कोटि क्रम सिरि ले चल्या, चेत न देखै भ्रम
संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि आदमी अपने सिर पर कर्मकांडों का बोझ ढोते हुए फूलता है कि वह धर्म का निर्वाह कर रहा है। वह कभी अपने विवेक का उपयोग करते हुए इस बात का विचार नहीं करता कि यह उसका एक भ्रम है।
त्रिज्ञणा सींची ना बुझै, दिन दिन बधती जाइ
जवासा के रूष ज्यूं, घण मेहां कुमिलाइ
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मन में जो त्रृष्णा की अग्नि कभी बुझती नहीं है जैसे उस पर पानी डालो वैसे ही बढ़ती जाती है। जैसे जवासे का पौधा भारी वर्षा होने पर भी कुम्हला जाता है पर फिर हरा भरा हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-संत कबीरदास जी ने अपने समाज के अंधविश्वासों और कुरीतियों पर जमकर प्रहार किये हैं। कितने आश्चर्य की बात है कि अनेक संत और साधु उनके संदेशों को ग्रहण करने का उपदेश तो देते हैं पर समाज में फैले अंधविश्वास और कर्मकांडों पर खामोश रहते हैं। आदमी के जन्म से लेकर मृत्यु तक ढेर सारे ऐसे कर्मकांडों का प्रतिपादन किया गया है जिनका कोई वैज्ञानिक तथा तार्किक आधार नहीं है। इसके बावजूद बिना किसी तर्क के लोग उनका निर्वहन कर यह भ्रम पालते हैं कि वह धर्म का निर्वाह कर रहे हैं। किसी कर्मकांड को न करने पर अन्य लोग नरक का भय दिखाते हैं यह फिर धर्म भ्रष्ट घोषित कर देते हैं। इसीलिये कुछ आदमी अनचाहे तो कुछ लोग भ्रम में पड़कर ऐसा बोझा ढो रहे हैं जो उनके दैहिक जीवन को नरक बनाकर रख देता है। कोई भी स्वयं ज्ञान धारण नहीं करता बल्कि दूसरे की बात सुनकर अंधविश्वासों और रूढि़यों का भार अपने सिर पर सभी उसे ढोते जा रहे हैं। इस आर्थिक युग में कई लोग तो ऋण लेकर ऐसी परंपराओं को निभाते हैं और फिर उसके बोझ तले आजीवन परेशान रहते हैं। इससे तो अच्छा है कि हम अपने अंदर भगवान के प्रति भक्ति का भाव रखते हुए केवल उसी कार्य को करें जो आवश्यक हो। अपना जीवन अपने विवेक से ही जीना चाहिए।
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Thursday, July 31, 2008
संत कबीर वाणीः जो सत्य हो उसी के अनुसार बोलें
शब्द कहै सो कीजिये, बहुतक गुरु लबार
अपने अपने लाभ को, ठौर ठौर बटपार
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो शब्द सत्य के अनुसार है उसी का विचार कर कहो। अधिक बोलने वाले गुरु बहुत है जो अपने स्वार्थ के लिये दूसरों को बातें बनाकर ठगते हैं। ऐसे गुरुओं की बात पर विचार न कर अपने विवेक क अनुसार वचन बोलो।
शब्द पाय सुरति राखहि, सो पहुंचे दरबार
कहैं कबीर तहां देखिए, बैठा पुरुष हमार
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो सत्य वचनों के ज्ञान को ग्रहण कर लेता है वह परमात्मा की भक्ति पा लेता है। उसे ऐसा लगता है कि वह भगवान की दरबार में ही बैठा है।
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अपने अपने लाभ को, ठौर ठौर बटपार
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो शब्द सत्य के अनुसार है उसी का विचार कर कहो। अधिक बोलने वाले गुरु बहुत है जो अपने स्वार्थ के लिये दूसरों को बातें बनाकर ठगते हैं। ऐसे गुरुओं की बात पर विचार न कर अपने विवेक क अनुसार वचन बोलो।
शब्द पाय सुरति राखहि, सो पहुंचे दरबार
कहैं कबीर तहां देखिए, बैठा पुरुष हमार
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो सत्य वचनों के ज्ञान को ग्रहण कर लेता है वह परमात्मा की भक्ति पा लेता है। उसे ऐसा लगता है कि वह भगवान की दरबार में ही बैठा है।
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