समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढ़ें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका


हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर
Showing posts with label man. Show all posts
Showing posts with label man. Show all posts

Saturday, April 11, 2009

चाणक्य नीतिः खाने पीने के विषय में कतई संकोच न करें

धन-धान्यप्रयोगेषु विद्य-संग्रहणेषु च।
आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत्।

हिंदी में भावार्थ-धन धान्य के व्यवहार, ज्ञान विद्या के संग्रह और खाने पीने में जो व्यक्ति संकोच या लज्जा नहीं करते वही जीवन में सुखी रहते हैं।

अर्थनाशं मनस्तापं गृहे दुश्चरितानि च।
वंचनं चाऽपमानं च मतिमान्न प्रकाशयेत्।।

हिंदी में भावार्थ-अपने धन का नाश, मन का दुःख, स्त्री की चरित्रहीनता और किसी अन्य व्यक्ति द्वारा वचनों के द्वारा कष्ट देने की बात सभी के सामने प्रकाशित नहीं करना चाहियै
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कुछ बातों सभी से कहना चाहिये और कुछ नहीं। अक्सर हम व्यग्र होने पर ऐसी बातें लोगों से कह जाते हैं जो नहीं कहना चाहिये। कभी व्यग्रता इतनी बढ़ जाती है कि कह ही नहीं पाते। नीति विशारद चाणक्य के अनुसार जिस बात से अपना अपमान होता हो या अपमान हो चुका हो वह बात किसी को नहीं बताना चाहिये। खासतौर से जब हमारे धन का नाश हमारी गलती से हो गया हो।
इसके अलावा कुछ बातें छिपानी भी नहीं चाहिये। अगर हमारे पास धन या खाद्यान्न नहीं है तो स्पष्टतः उस आदमी को बता देना चाहिये जिससे हमें मदद अपेक्षित है। किसी से कोई बात सीखने के लिये उसके सामने अपने अज्ञान को छिपाना ठीक नहीं है। अगर पेट में भूख हो कहीं अपने खाने का जुगाड़ नहीं हो पाता और कोई अन्य हमें भोजन का आग्रह करता है तो उसे अस्वीकार करना मूर्खता का काम है। कहने का तात्पर्य है कि जहां सम्मान की बात है तो ऐसी बात लोगों को नहीं बताना चाहिये जिससे हमारे अपमान का विस्तार हो साथ ही अपनी दैहिक और मानसिक आवश्यकताओं को दूसरों से छिपाना भी नहीं चाहिये।
----------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग ‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। मेरे अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्दलेख-पत्रिका
2.दीपक भारतदीप का चिंतन
3.अनंत शब्द योग
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Saturday, October 11, 2008

रहीम सन्देश: दिल से काम करें तो इन्सान क्या भगवान बस में होते हैं

रहिमन मनहि लगाईं कै, देखि लेहू किन कोय
नर को बस करिबो कहा, नारायन बस होय

कविवर रहीम के मतानुसार मन लगाकर कोई काम कर देखें तो कैसे सफलता मिलती है। अगर अच्छी नीयत से प्रयास किया जाये तो नर क्या नारायण को भी अपने बस में किया जा सकता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-लोग बहुत जल्दी सफलता हासिल करना चाहते हैं। काम में मन कम उससे होने वाली उपलब्धि पर अधिक दृष्टि रखते हैं यही कारण है कि उनको सफलता नहीं मिलती। भक्ति हो या सांसरिक काम उसमें मन लगाकर ही आदमी कोई उपलब्धि प्राप्त कर सकता है। अधिकतर लोग अपना काम करते हुए केवल इस बात की चिंता करते हैं कि उससे उनको क्या मिलेगा? जो भक्ति करते हैं वह सोचते हैं कि भगवान बस तत्काल उनका काम बना दें। मन भक्ति में कम अपने काम में अधिक होता है। न उनको इससे भक्ति का लाभ होता है और न काम बनने की संभावना होती है। भक्ति में काम का भाव और जो काम है उससे करने की बजाय भगवान की भक्ति में लगने से दोनों में उनकी सफलता संदिग्ध हो जाती है और फिर ऐसा करने वाले लोग अपनी नाकामी का दोष दूसरों को देते हैं।

अगर मन लगाकर भक्ति या सांसरिक काम किया जाये तो उसमें सफलता मिलती है। आदमी क्या भगवान भी बस में किये जा सकते हैं।
------------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्दलेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Wednesday, August 13, 2008

रहीम के दोहेःमन से काम करें तो नर क्या नारायण बस में हो जाते हैं

रहिमन मनहि लगाईं कै, देखि लेहू किन कोय
नर को बस करिबो कहा, नारायन बस होय

कविवर रहीम के मतानुसार मन लगाकर कोई काम कर देखें तो कैसे सफलता मिलती है। अगर अच्छी नीयत से प्रयास किया जाये तो नर क्या नारायण को भी अपने बस में किया जा सकता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-लोग बहुत जल्दी सफलता हासिल करना चाहते हैं। काम में मन कम उससे होने वाली उपलब्धि पर अधिक दृष्टि रखते हैं यही कारण है कि उनको सफलता नहीं मिलती। भक्ति हो या सांसरिक काम उसमें मन लगाकर ही आदमी कोई उपलब्धि प्राप्त कर सकता है। अधिकतर लोग अपना काम करते हुए केवल इस बात की चिंता करते हैं कि उससे उनको क्या मिलेगा? जो भक्ति करते हैं वह सोचते हैं कि भगवान बस तत्काल उनका काम बना दें। मन भक्ति में कम अपने काम में अधिक होता है। न उनको इससे भक्ति का लाभ होता है और न काम बनने की संभावना होती है। भक्ति में काम का भाव और जो काम है उससे करने की बजाय भगवान की भक्ति में लगने से दोनों में उनकी सफलता संदिग्ध हो जाती है और फिर ऐसा करने वाले लोग अपनी नाकामी का दोष दूसरों को देते हैं।

अगर मन लगाकर भक्ति या सांसरिक काम किया जाये तो उसमें सफलता मिलती है। आदमी क्या भगवान भी बस में किये जा सकते हैं।
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्दलेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

विशिष्ट पत्रिकायें