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Saturday, June 25, 2011

चाणक्य नीति-आचरण में ज्ञान न दिखे वह निरर्थक (acharan aur gyan-chankya neeti)


       आजकल देश में धन की अधिकता के कारण धार्मिक कार्यक्रम अधिक ही होते हैं। इन कार्यक्रमों पर काला या सफेद चाहे जो भी धन खर्च होता है इस पर हम टिप्पणी नहीं करेंगे पर इनकी तादाद देखते हुए तो यह लगता है कि हमारा देश विश्व में एक आदर्श होना चाहिए पर बढ़ते अपराध, भ्रष्टाचार, व्याभिचार तथा अहंकार को देखते हुए यह नहीं लगता कि किसी को हमसे नैतिकता का उपदेश लेना चाहिए। इसका सीधा मतलब है कि लोग ज्ञान चर्चा करते हैं तो केवल यह दिखाने के लिये कि उनकी मनुष्य देह के अंदर भी एक मनुष्य है। धार्मिक सत्संग वाणी विलास तथा मनोरंजन के रूप में होते हैं। गीत संगीत और काव्य से सजे सत्संग मजा जरूर देते हैं पर उनसे ज्ञान प्राप्त नहीं होता। गीत और भजन में अब कोई अंतर नहीं दिखता। लोग यह दिखाने के लिये अधिक प्रयत्नशील हैं कि वह धर्मभीरु हैं पर आचरण पर उनके ज्ञान की छाया नहीं दिखती।
       इस विषय पर महर्षि चाणक्य अपनी नीति में कहते हैं कि
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           हतं ज्ञानं क्रियाहीनं हतश्चाऽज्ञानतो नरः।
         हतं निर्नायकं सैन्यं स्त्रियो नष्टा ह्यभर्तृकाः।।
       ‘‘अगर मनुष्य के पास ज्ञान है पर उसे आचरण में नहीं लाता तो वह व्यर्थ है। अज्ञानी पुरुष का जीवन निरर्थक है। अज्ञानी पुरुष हमेशा असफल रहता है। उसी तरह सेनापति रहित सेना और स्वामीरहित स्त्रियां नष्ट हो जाती हैं।"
           विकास के नाम पर विनाशलीला अपना रूप दिखा रही है। अपराधों के समाचारों को देखते हुए तो ऐसा लगता है कि जिस हम संस्कृति की बात करते हैं वह कभी की लुप्त हो गयी है। सामाजिक और पारिवारिक रिश्ते नाम के लिये हो गये हैं। धन हैं तो वह भी निभा लो नहीं तो भूल जाओ। पाश्चात्य सभ्यता को विकास का पर्याय माने लेने के बाद हमें भारतीय सस्कृति के प्रति मोह है पर अपनी स्वार्थ पूर्ति तक ही वह रहता है। कहने का अभिप्राय यह है कि ज्ञान हमारे पास खूब है पर आचरण में नहीं है इसलिये ही समाज अब टूटता जा रहा है। ऐसे में समूचे समाज को संबोधित कर उसे सुधरने का उपदेश देने से अच्छा है हम स्वयं आत्ममंथन करें और अपने आचरण सुधारे।
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',ग्वालियर
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com
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Saturday, October 30, 2010

चाणक्य नीति-हिसाब किताब में संकोच न करें (chankya neeti-hisab kitab mein sankoch n karen)

अर्थनाशं मनस्तापं गृहे दुश्चरितानि च।
वंचनृ चाऽपमानं च मतिमान्न प्रकाशयेत्।
हिन्दी में भावार्थ-
अपने धन की हानि, मन का दुःख, घर की कमियां, अपने साथ हुई ठगी तथा किसी के द्वारा अपमानित करने की चर्चा किसी के साथ नहीं करना चाहिए।
धन धान्यप्रयोगेषु विद्यासंग्रहपोषु च ।
आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत्।
हिन्दी में भावार्थ-
धन तथा अनाज के लेनेदेन, किसी कला को सीखने, खाने पीने तथा हिसाब किताब में संकोच न करने वाला व्यक्ति ही जीवन का आनंद उठाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-वैसे तो कहा जाता है कि अपना दुःख किसी से कहने पर दिल हल्का होता है पर ऐसा करते हुए यह भी देखना चाहिए कि वह किस प्रकृत्ति का है। अपने पैसे का नुक्सान होने पर अगर हम किसी व्यक्ति को अपना दुःख बताते हैं तो वह हंस कर कहता है कि ‘तुमने यह काम किया ही क्यों? मुझसे पूछा होता!’
वह दस जगह अपनी बात कहेगा और आपके नुक्सान का मज़ाक बना सकता है। मन की पीड़ा मन ही में रहे तो अच्छा है पर कहीं   उसे दूसरे को बताकर सार्वजनिक बना दिया तो वह अपने ही अपमान का कारण बनत सकती है। अपने घर की शिकायतें बाहर के लोगों से करने पर वह सार्वजनिक चर्चा का विषय बनते हैं जिससे परिवार के सदस्य ही अपने को अपमानित अनुभव करते हैं। हमारे देश के अनेक बुजुर्ग पुरुष तथा महिलायें अपने बहु बेटों की शिकायतें इधर उधर करते हैं जिससे उनका स्वयं का ही सामाजिक सम्मान कम होता है और परिवार के सदस्य मानसिक संताप झेलते हैं सो अलग। इससे बचना चाहिए।
उसी तरह कोई काम सीखने में कभी संकोच नहीं करना चाहिए। हिसाब किताब भाई से हो साले से हमेशा साफ रखने का प्रयास करना चाहिए। आमतौर से अधिकतर पारिवारिक तथा सामाजिक विवाद इसी कारण होते हैं कि पहले व्यवहार में संकोच किया जाता है और बाद में वही बवाल बन जाते हैं।
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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com

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Saturday, October 31, 2009

चाणक्य नीति-धीरज हो तो गरीबी की परवाह नहीं रहती (chankya niti-dhiraj aur garibi)

अधमा धनमिच्छन्ति मानं च मध्यमाः।
उत्तमा मानमिच्छन्ति मानो हि महतां धनम्।।
हिंदी में भावार्थ-
अधम प्रकृत्ति का मनुष्य केवल धन की कामना करता है जबकि मध्यम प्रकृत्ति के धन के साथ मान की तथा उत्तम पुरुष केवल मान की कामना करते हैं।
दरिद्रता श्रीरतया विराजते कुवस्त्रता शुभ्रतया विराजते।
कदन्नता चोष्णतया विराजते कुरूपता शीतया विराजते।।
हिंदी में भावार्थ-
अगर मनुष्य में धीरज हो तो गरीबी की पीड़ा नहीं होती। घटिया वस्त्र धोया जाये तो वह भी पहनने योग्य हो जाता है। बुरा अन्न भी गरम होने पर स्वादिष्ट लगता है। शील स्वभाव हो तो कुरूप व्यक्ति भी सुंदर लगता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस विश्व में धन की बहुत महिमा दिखती है पर उसकी भी एक सीमा है। जिन लोगों के अपने चरित्र और व्यवहार में कमी है और उनको इसका आभास स्वयं ही होता है वही धन के पीछे भागते हैं क्योंकि उनको पता होता है कि वह स्वयं किसी के सहायक नहीं है इसलिये विपत्ति होने पर उनका भी कोई भी अन्य व्यक्ति धन के बिना सहायक नहीं होगा। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने ऊपर यकीन तो करते हैं पर फिर भी धन को शक्ति का एक बहुत बड़ा साधन मानते हैं। उत्तम और शक्तिशाली प्रकृत्ति के लोग जिन्हें अपने चरित्र और व्यवहार में विश्वास होता है वह कभी धन की परवाह नहीं करते।
धन होना न होना परिस्थितियों पर निर्भर होता है। यह लक्ष्मी तो चंचला है। जिनको तत्व ज्ञान है वह इसकी माया को जानते हैं। आज दूसरी जगह है तो कल हमारे पास भी आयेगी-यह सोचकर जो व्यक्ति धीरज धारण करते हैं उनके लिये धनाभाव कभी संकट का विषय नहीं रहता। जिस तरह पुराना और घटिया वस्त्र धोने के बाद भी स्वच्छ लगता है वैसे ही जिनका आचरण और व्यवहार शुद्ध है वह निर्धन होने पर भी सम्मान पाते हैं। पेट में भूख होने पर गरम खाना हमेशा ही स्वादिष्ट लगता है भले ही वह मनपसंद न हो। इसलिये मन और विचार की शीतलता होना आवश्यक है तभी समाज में सम्मान प्राप्त हो सकता है क्योंकि भले ही समाज अंधा होकर भौतिक उपलब्धियों की तरफ भाग रहा है पर अंततः उसे अपने लिये बुद्धिमानों, विद्वानों और चारित्रिक रूप से दृढ़ व्यक्तियों की सहायता आवश्यक लगती है। यह विचार करते हुए जो लोग धनाभाव होने के बावजूद अपने चरित्र, विचार और व्यवहार में कलुषिता नहीं आने देते वही उत्तम पुरुष हैं।
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Thursday, September 17, 2009

चाणक्य नीति-जिसके पास अपनी बुद्धि नहीं वेद शास्त्र उसका क्या भला करेंगे (chankya niti-buddhi aur ved shastra)

यस्य नास्ति प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम्।
लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः कि करिव्यति।।
हिंदी में भावार्थ-
जिसके पास स्वयं की बुद्धि नहीं है उसका वेद शास्त्र आदि क्या लाभ कर सकते हैं। जन्मांध व्यक्ति को दर्पण से क्या वास्ता हो सकता है?
दुर्जनं सज्जनं कर्तृमुपायो न हि भूतले।
अपानं शतधा धौतं न श्रेष्ठमिन्द्रििय भवेतु।।
हिंदी में भावार्थ-
दुष्ट व्यक्ति को सज्जन बनाने के लिये इस धरती पर कोई उपाय या साधन नहीं मिल सकता, जैसे अपने मल त्याग करने वाली इंद्रियां बहुत धोने के बाद भी श्रेष्ठ नहीं बन सकती।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-ज्ञान उसी व्यक्ति को दिया जा सकता है जिसके मन में जिज्ञासा हो। अगर किसी व्यक्ति ने यह तय कर लिया है कि उसके पर्याप्त ज्ञान का भंडार है और तर्कशास्त्र में उसका कोई सानी नहीं तो उसे समझाना कठिन है। उसका अहंकार उसे दुर्जन और अहंकारी बना देता है। आज की शिक्षा पद्धति में भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान को संभवतः इसलिये शामिल नहीं किया गया क्योंकि अंग्रेजी विषयों से आदमी गुलाम बनाये रखने में सुविधा मिल जाती है। चारों तरफ मूर्खों की बहस देखी जा सकती है जिसमें निष्कर्ष निकलना तो दूर आपस में वैमनस्य की भावना फैल जाती है। हर जगह ऐसे बुद्धिजीवी मिल जायेंगे जो विदेशी किताबों से ज्ञान लेकर ऐसे बघारते हैं जैसे कि कोई अंतिम सत्य प्रस्तुत कर रहे हों।
मजे की बात है कि भारतीय विचारधारा के समर्थक भी अपने अध्यात्मिक ग्रंथों से थोड़ा बहुत विचार लेकर उनका प्रतिकार करते हैं। भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों में जो तत्वज्ञान है उसे वह भी नहीं जानते। धर्म प्रचार और धर्मपरिवर्तन जैसे विषयों पर अनवरत बहस चलती है। हर कोई अपने धर्म मानने वालों की संख्या बढ़ाना चाहता है भले ही वह अज्ञानी लोगों का समूह बन जाये।
सच बात तो यह है कि भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों में केवल धर्म से संबंधित विषयों पर अच्छी जानकारी है बल्कि संासरिक विषयों पर भी वैज्ञानिक ज्ञान उसमें दर्ज है पर उससे परे होकर अल्पज्ञानी केवल आत्मप्रचार के लिये उसका अध्ययन करते हैं। धर्म,ज्ञान और सत्संग बाजार में बिकने वाली शय की तरह हो गया है। अपने को धार्मिक तथा अपने धर्म को श्रेष्ठ साबित करने के लिये एक ऐसी दौड़ लगी हुई है जिसे अध्यात्मिक ज्ञानी को अपने ही ज्ञान पर संदेह हो सकता है। जिज्ञासुओं से अधिक तो कथित ज्ञानी मिल जायेंगे। ऐसे में उनको समझाना कठिन है क्योंकि उनकी बुद्धि अपहृत हो चुकी है और भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों का ज्ञान वही समझ सकता है जिसके पास अपना विवेक हो। अपने को ज्ञानी समझने वाले कथित बुद्धिमानों को सत्य का ज्ञान कराना कतई संभव नहीं है। ऐसे में भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों में जो ज्ञान और विज्ञान है उसका अध्ययन कर अपने जैसे जिज्ञासुओं में बांटना चाहिये। समाज में कुशल, ज्ञानी, और शक्तिशाली सदस्य होना चाहिये भले ही उनकी संख्या कम हो।
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Thursday, September 10, 2009

चाणक्य नीति-कौए से सीखें जागरुकता (kauva aur jagrukta-chakyna niti)

गूढ़मैथुनचरित्वं च काले काले संग्रहम्।
अप्रमत्तमविश्वासं पंच शिक्षेच्च वायसात्।।
हिंदी में भावार्थ-
छिपकर मैथुन करना, ढीठपना दिखाना, नियत समय पर संग्रह करना तथा सदैव प्रमादरहित होकर जागरुक रहना तथा किसी पर विश्वास न करना-यह पांच गुण कौए से सीखना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-खुल्लम खुल्ला प्यार करेंगे के बोलों की तर्ज पर आजकल लोग अपनी यौन क्रीड़ाओं की खुलेआम चर्चा कर गौरव की अनभूति करते हैं। अगर कानूनी बंदिश न हो तो शायद लोग सरेआम ही वह सारे कार्य करने लगें जिनको पर्दे के पीछे करना ही उचित है।
कहा जाता है कि कौआ स्याना पक्षी है। किसी भी स्याने मनुष्य को कौआ कहकर संबोधित किया जाता है। एक तरह से कहा जाये कि लोग कौए को हिकारत की दृष्टि से देखते हैं जबकि उसी से सीखने लायक बहुत कुछ है।
जिस ढीठपन को हम कौए का दुर्गुण समझते हैं वह उसका गुण है क्योंकि वह अपने चरित्र और खानपान पर दृढ़ रहता है। समय आने पर संचय भी करता है। उसे जाल में फंसाना मुश्किल माना जाता है।
इसके विपरीत हम अपने समाज को देखें कि पश्चिम द्वारा प्रदत्त प्रमाद और विलासिता के साधनों में अपना मन फंसा कर हम अपना स्वविवेक खो बैठे हैं। कौआ प्रमाद में न फंसकर हमेशा जागरुक रहता है जबकि हमारे देश में प्रमाद का इतना बोलाबाला है कि लगता ही नहीं कि लोग सतर्क और जागरुक हैं। अपराध इसलिये नहीं बढ़े कि प्रशासन सतर्क नहीं है बल्कि लोग जागते हुए भी सुप्तावस्था में रहते हैं। यही हाल स्त्रियों के प्रति बढ़े अपराधों का है। उनके खिलाफ बढ़ती हिंसा असावधानियों के कारण अधिक है। सच बात तो यह है कि हमारा समाज अपनी कर्मण्यता और सुप्तावस्था की वजह से ही भारी संकट में फंस गया है। हमारे अंदर प्रमाद और विलासिता की जो भावना है उसकी वजह से ही विदेशी बैंकों की जमा राशि बढ़ रही है। एक तरह से हम आर्थिक गुलाम बन गये हैं।
देश में कौवों की संख्या कम होती जा रही है। ऐसा लगता है कि उनकी कमी से हमारे देश में सतर्कता और जागरुकता के गुणों की कमी हुई है। वह शायद चलते फिरते और उड़ते हुए यहां अपने गुणों का विर्सजन करते थे। संभवतः कौओं को देखकर इंसान इसलिये ही हिकारत की दृष्टि से देखते हैं क्योंकि तब उनको अपनी विलासिता और मानसिक कमजोरी का अहसास होता है। उनको लगता है कि जैसे वह उनको मीठी नींद से जगा रहा है। हां, यह भी सच है कि आदमी को सोना ही अच्छा लगता है चाहे वह शारीरिक रूप से हो या मानसिक रूप से।
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Wednesday, July 22, 2009

चाणक्य नीति-थोड़े अभ्यास से भी ज्ञान का घड़ा भर जाता है (chankya niti-abhyas aur gyan)

जलबिन्दुनिपातेन क्रमशः पूर्वते घटः।
स हेतुः सर्वविद्यानां धर्मस्य च धनस्य च।।
हिंदी में भावार्थ-
जिस तरह एक एक बूंद से घड़ा भर जाता है उसी तरह नित प्रतिदिन थोड़े थोड़े अभ्यास से समस्त विद्यायें, धन और धर्म में भी श्रीवृद्धि की जा सकती है।
नाह्यरं चिन्तयेत् प्राज्ञो धर्ममेक्र हि चिन्तयेत्।
आहारो हि मनुष्याणां जन्मना सह जायते।।
हिंदी में भावार्थ-
जो मनुष्य ज्ञानी और धर्मपरायण होते हैं वह कभी भी भोजनादि की चिंता त्यागकर हमेशा ही धर्म संचय में लगे रहते हैं क्योंकि वह जानते हैं कि मनुष्य के आहार का भाग तो उसके जन्म के साथ ही इस धरती पर उत्पन्न हो गया था।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अक्सर लोग भक्ति, योगसाधना और प्राणायम का अभ्यास न करने का कारण समय न मिलना बताते हैं जबकि यह केवल झूठ के अलावा कुछ नहीं होता। हम सब जानते हैं कि कितना समय आलस्य और फालतू कामों में बिताते हैं। इसके अलावा कुछ लोग कहते हैं कि हमें किसी ने सिखाया नहीं है या कोई सिखाने वाला नहीं मिल रहा जबकि सच यह होता है कि उनके अंदर सीखने का संकल्प ही नहीं होता। जो व्यक्ति तय कर ले कि वह भगवान भक्ति और साधना करेगा उसके लिये सीखने और ज्ञान प्राप्त करने के मार्ग स्वतः ही खुल जाते हैं। आदमी एक बार सीखकर नित प्रतिदिन अभ्यास करे तो शेष ज्ञान तो स्वतः ही उसके पास आ जाता है। श्रीगीता का रोज एक श्लोक भी पढ़ा जाये तो भी वह हमें ज्ञानी बना सकता है। जिस तरह एक बूंद बूंद से घड़ा भरता है उसी तरह एक या दो श्लोक का अभ्यास किया जाये तो ज्ञान का घड़ा भी निश्चित रूप से भर सकता है।
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Thursday, June 18, 2009

चाणक्य नीति-वर्तमान में ही जीने का प्रयास करना अच्छा

मुहूर्तमपि जीवेच्च नरः शुक्लेन कर्मणा।
न कल्पमपि कष्टेन लोक़द्वयविरोधिना।।
हिदी में भावार्थ-
अगर अच्छे काम करते हुए मनुष्य एक मुहूर्त भी जीवित रहे तो वह उत्तम है पर दूसरे के संकट खड़ा करने के साथ अनावश्यक विरोध करने वाला लंबे समय तक जीवित रहे तो भी अच्छा नहीं।
गते शोको न कत्र्तव्यो भविष्यं नैव चिन्तयेत्।
वर्तमानेन कालेन प्रवर्तन्ते विचक्षणाः।।
हिंदी में भावार्थ-
भूतकाल में किये गये कार्य का शोक नहीं करते हुए भविष्य की चिंता करना चाहिये। विद्वान लोग वर्तमान के अनुसार अपने कार्य को योजनाबद्ध ढंग से करते हुए भविष्य संवारते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्यों में कुछ देवत्व और राक्षसत्व दोनों भाव रहते हैं। मुख्य बात यह है कि मनुष्य चलना किस राह चाहते हैं और इसी आधार पर उनके द्वारा व्यवहार किया जाता है। जिन लोगों के मस्तिष्क में लोभ, लालच और अहंकार की प्रवृत्ति की प्रधानता है वह सिवाय अपने स्वार्थ की पूर्ति के अलावा कुछ अन्य नहीं देखते। धीरे धीरे वह इतने आत्मकेंद्रित हो जाते हैं कि वह किसी दूसरे का काम बनता देख उनके हृदय ईष्र्या और द्वेष के भाव पैदा होने लगते हैं। इतना ही नहीं किसी दूसरे का काम बिगाड़ने में भी उनको मजा आता है। ऐसे लोगों की जिंदगी पशु के समान हो जाती है और वह समाज के लिये कष्टदायी होते हैं। इसके विपरीत कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो पाखंड से परे होकर शांति से परोपकार का कार्य करते हुए प्रचार से दूर रहते हैं। ऐसे लोगों को पूरा समाज आदर भी करता है।
जो बीत गया सो बीत गया। अपने हाथ से कोई अच्छा काम हुआ हो या कोई गलती हो गयी हो तो उसकी चिंता को छोड़ते हुए भविष्य की योजना बनाना चाहिए। अपने वर्तमान में ही ऐसे कार्य करने की सोचना चाहिये जिससे भूतकाल की गल्तियां स्वतः सुधरने के साथ ही भविष्य में भी लाभ होता है।
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Monday, June 15, 2009

चाणक्य नीति-संतोष सबसे बड़ा धन है

संतोषस्त्रिशु कत्र्तव्यः स्वदारे भोजने धने।
त्रिषु चैव न कत्र्तव्योऽध्ययने तपदानयोः।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुष्य को अपनी पत्नी, भोजन और धन से ही संतोष करना चाहिये पर ज्ञानार्जन, भक्ति और दान देने के मामले में हमेशा असंतोषी रहे यही उसके लिये अच्छा है।

संतोषाऽमृत-तुप्तानां यत्सुखं शान्तचेतसाम्।
न च तद् धनलूब्धानामितश्चयेतश्च धावताम्।।
हिंदी में भावार्थ-
जो मनुष्य संतोष रुपी अमृत से तुप्त है उसका ही हृदय शांत रह सकता है। इसके विपरीत जो मनुष्य असंतोष को प्राप्त होता है उसे जीवन भर भटकना ही पड़ता है उसे कभी भी शांति नहीं मिल सकती।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-नीति विशारद चाणक्य के संदेशों के ठीक विपरीत हमारा देश चल रहा है। जिन लोगों के पास धन है उनके पास भी संतोष नहीं है और जिनके पास नहीं है उनसे तो आशा करना ही व्यर्थ है। अपनी पत्नी और घर के भोजन से धनी लोगों को संतोष नहीं है। जीभ का स्वाद बदलने के लिये ऐसी वस्तुओं का सेवन बढ़ता जा रहा है जो स्वास्थ्य के लिये हितकर नहीं है। कहा जाता है कि खाने पीने की वस्तुओं को स्वच्छता होना चाहिये पर होटलों और बाजार की वस्तुओं में कितनी स्वच्छता है यह हम देख सकते हैं। किसी रात एक साफ रुमाल घर में रख दीजिये और सुबह देखिये तो उस पर धूल जमा है तब बाजार में कई दिनों से रखी चीजों में स्वच्छता की अपेक्षा कैसे रखी जा सकती है। घर में गृहिणी सफाई से भोजन बनाती है पर क्या वैसी अपेक्षा होटलों के भोजन में की जा सकती है। ढेर सारे ट्रक, ट्रेक्टर,बसेें, मोटर साइकिलें तथा अन्य वाहन सड़कों से गुजरते हुए तमाम तरह की धूल और धूंआ उड़ाते हुए जाते हैं उनसे सड़कों पर स्थित दुकानों,चायखानों और होटलों में रखी वस्तुओं के विषाक्त होने की आशंका हमेशा बनी रहती है। ऐसे में बाजारों में खाने वाले लोगों के साथ अस्पतालों में मरीजों की संख्या भी बढ़ रही है तो आश्चर्य की बात क्या है?
इसके विपरीत लोगों की आध्यात्मिक ज्ञान और भक्ति के भाव के प्रति कमी भी आ रही है। लोगों को ऐसा लगता है कि यह तो पुरातनपंथी विचार है। असंतोष को बाजार उकसा रहा है क्योंकि वहां उसे अपने उत्पाद बेचने हैं। प्रचार के द्वारा बैचेनी और असंतोष फैलाने वाले तत्वों की पहचान करना जरूरी है और यह तभी संभव है कि जब अपने पास आध्यात्मि ज्ञान हो।
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Thursday, June 4, 2009

चाणक्य नीति-दीपक अंधेरे को खाकर काजल पैदा करता है

चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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दीपो भक्षयते थ्वान्तं कज्जलं च प्रसूयते।
यदन्नं भक्षयतेन्नित्यं जायते तादृशी प्रजा।।

     हिंदी में भावार्थ-नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि जिस तरह दीपक अंधेरे को खाकर काजल को उत्पन्न करता है वैसे ही इंसान जिस तरह का अन्न खाता है वैसे उसके विचार उत्पन्न होते हैं और उसके इर्दगिर्द लोग भी वैसे ही आते हैं। उनकी संतान भी वैसी ही होती है।
अधमा धनमिच्छन्ति धनं माने च मध्यमा।
उत्तमा मानमिच्छन्ति मानो हि महतां धनम्।।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या -यह एक तरह का दर्पण है जिसमें हर इंसान अपने चरित्र का चेहरा देख सकता है। केवल धन की कामना पूरी करने के लिये कोई भी कार्य करने के लिये तैयार होना निम्नकोटि होने का प्रमाण है। कहने को तो सभी कहते हैं कि यह पेट के लिये कर रहे हैं पर जिनके पास वास्तव में धन और अन्न का अभाव है वह आजकल किसी अपराध में नहीं लिप्त दिखते जितने धन धान्य से संपन्न वर्ग के लोग बुरे कामों में व्यस्त हैं। धन का आकर्षण लोगों को लिये इतना है कि वह उसके लिये अपना धर्म बदलने और बेचने के लिये तैयार हो जाते हैं। उनके लिये मान और अपमान का अंतर नहीं रह जाता। आजकल शिक्षित और सभ्रांत वर्ग के लोगों ने यह मान्यता पाल ली है कि धन से सम्मान होता है और वह स्वयं भी निर्धनों से घृणा करते हैं। सच बात तो यह है कि अधम प्रकृति के लोग धन प्राप्त कर उच्चकोटि का दिखने का प्रयास करते हैं।
समाज में अनैतिक धनार्जन की बढ़ती प्रवृति ने नैतिक ढांचे को ध्वस्त कर दिया है और जिस वर्ग के लोगों पर समाज का मार्गदर्शन करने का दायित्व है वही कदाचार और ठगी में लगे हुए हैं। परिणामतः उनके इर्दगिर्द ऐसे ही लोगों का समूह एकत्रित हो जाता है और उनकी संतानें भी अब ऐसे काम करने लगी हैं जो पहले नहीं सुने जाते थे। नयी पीढ़ी की बौद्धिक और चिंतन क्षमता का हृास हो गया है और कहीं पुत्र तो कहीं पुत्री ही माता पिता पर दैहिक आक्रमण के लिये आरोपित हो जाती है। नित प्रतिदिन समाचार पत्रों और टीवी चैनलों पर ऐसे समाचार आते हैं जिसमें संतान ही उस माता पिता को तबाह कर देती है जिसकों उन्होंने जन्म दिया है।
ऐसे में ज्ञानी लोगों को यह ध्यान रखना चाहिये कि जो धन वह कमा रहे हैं उनका स्त्रोत पवित्र हो। अल्प धन होने से कोई समस्या नहीं है क्योंकि चरित्र से सम्मान सभी जगह होता है पर बेईमानी और ठगी से कमाया गया धन अंततः स्वयं के लिये कष्टदायी होता है।
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Tuesday, May 26, 2009

चाणक्य नीति-धार्मिक स्थानों पर तोड़फोड़ करने वाले म्लेच्छ

परकार्यविहन्ता च दाम्भिकः स्वार्थसाधकः।
छली द्वेषी मृदः क्रूरो विप्रो मार्जार उच्यते।।
हिंदी में भावार्थ-
जो मनुष्य दूसरे के कार्यों को बिगाड़ने वाला, पाखंडी, अपना मतलबी साधने वाला, छलिया, दूसरों की उन्नति देखकर जलने वाला तथा बाहर से कोमल और अंदर कपट भाव रखने वाला है वह भले ही विद्वान क्यों न हो पशु के समान है।
चापी-कूप-तडागानामाराम-सुर-वेश्मनाम्।
उच्छेद निरऽऽशंकः स विप्रो म्लेच्छ उच्यते।।
हिंदी में भावार्थ-
जो मनुष्य बावड़ी, कुआं तालाब, बगीचे और धर्म स्थानों में तोड़फोड़ और उनको नष्ट करने से जो डरते नहीं है वह भले ही विद्वान हों म्लेच्छ कहलाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सभी को अपने जीवन में अपना स्वयं के धर्म और कर्म केंद्रित करना चाहिये। कुछ ऐसे मनुष्य भी हैं जो केवल धर्म का दिखावा करते हैं पर उनका लक्ष्य उसकी आड़ में व्यवसाय या उसके सहारे अपना समाज पर वर्चस्व स्थापित करना है। ऐसे लोग धर्म के आधार पर निकृष्ट कर्म करते हैं जो केवल पाप की श्रेणी में आते हैं। हालांकि कहा जाता है अशिक्षित और गंवार लोग ही ऐसे हैं जो धर्म की आड़ में पाप काम करते हैं पर चाणक्य महाराज की बात को देखें तो यह काम पहले भी विद्वान और शिक्षित लोगों के द्वारा होता रहा है। बस अंतर इतना है कि अब यह काम केवल विद्वान आर शिक्षित लोग ही कर नजर आते हैं। कथित अशिक्षित और गंवार लोगों को तो अपनी रोजी रोटी कमाने से ही आजकल फुरसत कहां मिल पाती है?
देश, प्रदेश, और शहर की संपत्ति और धार्मिक स्थानों पर तोड़फोड़ करने वाले भारी पाप करते हैं और उनको एक तरह से म्लेच्छ कहा जाता है। चाहे अपने धर्म का हो या दूसरे धर्म का उसमें तोड़फोड़ करने वाले महापापी हैं और उनका कभी समर्थन न करे। ऐसे लोग धर्म के नाम पर विवाद कर समाज का ध्यान अपनी ओर ध्यान आकर्षित कर उसका लाभ उठाते हैं। अगर हम उनकी तरफ देखें तो भी समझ लेना चाहिये कि पाप हो गया।
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Monday, April 27, 2009

चाणक्य नीति-दूसरे के धन को मिट्टी का ढेला समझें

यो मोहन्मन्यते मूढो रक्तेयं मयि कामिनी।
स तस्य वशगो मूढो भूत्वा नृत्येत् क्रीडा-शकुन्तवत्।।

हिंदी में भावार्थ-नीति विशारद चाणक्य के अनुसार कुछ पुरुषों में विवेक नहीं होता और वह सुंदर स्त्री से व्यवहार करते हुए यह भ्रम पाल लेते हैं कि वह वह उस पर मोहित है। वह भ्रमित पुरुष फिर उस स्त्री के लिये ऐसे ही हो जाता है जैसे कि मनोरंजन के लिये पाला गया पक्षी।
मातृवत् परदारांश्चय परद्रव्याणि लोष्ठवत्।
आत्मवत् सर्वभूतानि यः पश्यति स नरः।।

हिंदी में भावार्थ-दूसरों की पत्नी को माता तथा धन को मिट्टी के ढेले की भांति समझना चाहिये। इस संसार में वह यथार्थ रूप से मनुष्य है जो सारे प्राणियों को अपनी आत्मा की भांति देखने वाला मानता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हर व्यक्ति को अपने अंदर विवेक धारण करना चाहिये। कुछ लोग स्त्रियों के विषय में अत्यंत भ्रमित होते हैं। उनको लगता है कि कोई स्त्री उनसे अच्छी तरह बात कर रही है तो इसका आशय यह है कि वह उन पर मोहित है-यह उनका केवल एक भ्रम है। स्त्रियों का स्वभाव तथा वाणी कोमल होती है और इसी कारण वह हमेशा मृदभाषा से पुरुषों का मन मोह लेती हैं पर कुछ अज्ञानी और अविवेकी पुरुष यह भ्रम पाल कर अपने आपको ही कष्ट देते हैं कि वह उनके प्रति आकर्षित है।
नीति विशारद चाणक्य ऐसे व्यक्तियों की तरफ संकेत करते हुए कहते हैं कि दूसरे की स्त्री को माता के समान समझना चाहिये। उसी तरह दूसरे के धन को मिट्टी का ढेला समझना चाहिये। वह यह भी कहते हैं कि इस संसार में वही मनुष्य श्रेष्ठ है जो सभी लोगों को देह नहीं बल्कि इस संसार में दृष्टा की तरह उपस्थित आत्मा ही मानता है।
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Thursday, April 23, 2009

चाणक्य नीतिः मनुष्य सत्य के पथ पर है तो पवित्र स्थान पर जाकर स्नान की आवश्यकता नहीं

लोभश्चेदगुणेन किं पिंशुनता यद्यस्ति किं पासकैः सत्यं चेतपसा च किं शुचि मनो यद्यस्ति तीर्थेन किम्।
सौजन्यं यदि किं गुणैः सुमहिमा यस्ति किं मण्डनैः सद्विद्या यदि किं धनैरपयशो यस्ति किं मृत्युना।।


हिंदी में भावार्थ-मनुष्य में यदि लोभ का भाव है तो फिर किसी दूसरे दोष की उसे आवश्यकता नहीं है। यदि उसके स्वभाव ही निंदा और चुगली करने का है तो उसे कोई अन्य पाप कर्म करने की आवश्यकता नहीं है। अगर व्यक्ति सत्य के पथ पर है तो उसे किसी तप की आवश्यकता नहीं है। इसी तरह यदि मन ही पवित्र है तो उसे किसी पवित्र स्थान पर जाकर स्नान करने की आवश्यकता नहीं है। हृदय में सद्भावना है तो फिर कोई दूसरा गुण क्या कर लेगा? संसार में अपने कर्मो से यश फैल रहा है तो फिर आभूषणों या सुंदर वस्त्रों को धारण करने से क्या लाभ? विद्या है तो धनहीन होना महत्वपूर्ण नहीं है। अगर अपयश फैल गया है तो फिर मृत्यु से भी मुक्ति नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में आकर अपने दैहिक निर्वहन के लिये भौतिक पदार्थों की आवश्यकता होती है पर उसके लिये अपनी आत्मा को भुलाकर उनमें लिप्त होने से कोई लाभ नहीं है। इस संसार के सभी भौतिक पदार्थ नष्ट प्रायः है पर मनुष्य द्वारा अपने सतकर्मों से अर्जित यश ही उसके बाद चलता रहता है। दुर्गुण तो स्वाभाविक रूप से आते हैं पर गुणों को बनाये रखने के लिये प्रयास करना पड़ता है। उसी तरह अपकीर्ति तो स्वतः ही फैलती है पर कीर्ति फैलाने के लिये प्रयास करना पड़ता है। आशय यह है कि अगर हम अपने ऊपर मानसिक रूप से नियंत्रण नहीं करेंगे तो हमारे कदम स्वतः ही भटकाव की राह पर चल पड़ेंगे।
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Saturday, April 18, 2009

चाणक्य नीतिः नदी किनारे स्थित वृक्ष शीघ्र नष्ट हो जाते हैं (chankya niti)

नदी तीरे च ये वृक्षाः परगृहेषु कामिनी।
मन्त्रिहीनश्चय राजानः शीघ्रं नश्चाननसंशयम्

हिंदी में भावार्थ-नदी के किनारे वृक्ष, दूसरे के घर रहने वाली स्त्री, मंत्री के बिना राजा शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।
निर्धनं पुरुषं वेश्या प्रजा भग्नं नृपं त्यजेत्।
खग चीतफल वृक्षं भुक्त्वा चाऽभ्यागता गृहम्।।

हिंदी में भावार्थ-निर्धन पुरुष को वैश्या, पराजित और शक्तिहीन राजा को प्रजा, फलहीन वृक्ष को पक्षी जिस तरह त्याग देते हैं उसी तरह भोजन करने के बाद अतिथि को गृहस्थ का त्याग कर देना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अपने जीवन के लक्ष्य और कार्य पर स्वयं ही निर्भर रहना चाहिये। यह सही है कि अपने अनेक कार्यों के लिये दूसरों की सहायता की आवश्यकता होती है पर उस समय इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि अपनी निर्भरता किसी एक व्यक्ति की बजाय अनेक पर हो ताकि एक अगर सहायता न तो दूसरा कर दे। अपने कार्य तथा उद्देश्य की पूर्ति के सदैव स्वयं ही विचार करते हुए सक्रिय रहना चाहिये। दूसरों निर्भर रहने से जीवन में असफलता की आशंका बलवती होती है।

परिवार समाज और राष्ट्र के मुखिया को सदैव अपनी शक्ति और अर्थ का संचय करते रहना चाहिये। जहां उसकी शक्ति में शिथिलता आने के साथ ही धनाभाव घेर लेता है वहां उसके अंतर्गत सक्रिय अन्य लोग ही नहीं वरन् स्वजन ही उसका त्याग कर देते हैं। अपनी शक्ति और संपन्नता बनाये रखने के लिये अपने गुणों और दुर्गुणों पर निरंतर दृष्टिपात करते हुए आत्म मंथन करते हुए नये प्रयोग करते रहने से शक्ति अर्जित होती है और साथ में अपने प्रति लोगों में नवीनता का भाव बनाये रखा जा सकता है। वैसे आयु अनुसार शक्ति और समयानुसार धन का हृास होता है पर गुणवान और ज्ञानी लोग अपने अभ्यास से इसका आभास किसी को नहीं होने देते जिससे उनकी शक्ति यथावत रहती है।
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Monday, April 13, 2009

चाणक्य नीतिः विद्या के लिये सुख का त्याग जरूरी

सुखार्थी वा त्यजेविद्वधां विद्याथी वा त्यजेत् सुखम्
सुखार्थिनः कुतो विद्वा विद्यार्थिनः कुतो सुखम्।।

हिंदी में भावार्थ-नीति विशारद चाणक्य का कहना है कि सुख की कामना हो तो विद्या की इच्छा त्याग दें और यदि विद्या प्राप्त करने का उद्देश्य हो तो सुख की कामना त्याग दें। सुख की चाहत करने वालों को विद्या और विद्या प्राप्त की चाहता करने वाले का सुख का विचार नहीं करना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-पहले गुरुकुलों में शिक्षा दी जाती थी जहां शिष्य को हर तरह के विषय का ज्ञान प्रदान किया जाता था । जब गुरुकुल से शिष्य निकलता था तो वह हर विधा में पारंगत होता था। राजा महाराजा तक के बच्चे वहां गुरु और आश्रम की सेवा में ऐसे काम करते थे जिनको मजदूर करते हैं। इस तरह अधिक शिक्षि होने पर भी उनमें छोटे काम के प्रति उपेक्षा का भाव नहीं होता था।
आधुनिक शिक्षा में छात्रों को अपने ही छात्रावास में अनेक प्रकार की सुविधा दिलाने के विज्ञापन देखने पर यह आभास होता है कि विद्यालयों और महाविद्यालयों में विद्या कम सुविधायें अधिक देने पर विचार होता है। फिर अपने घर पर ही शिक्षा प्राप्त करने की प्रवृत्ति ने छात्रों के ज्ञान को सीमित कर दिया है। वह विद्यालयों और महाविद्यालयों में अपने विषय से संबद्ध शिक्षा प्राप्त तो कर लेते हैं पर जीवन के रहस्य, चरित्र और नैतिकता के सिद्धांतों को उनको ज्ञान नहीं रहता।

शिक्षित तो हमारे समाज में बहुत हैं पर विद्याधर और ज्ञानी कितने हैं यह हम देख ही रहे हैं। सारे सुख और सुविधायें होते हुए अक्षर ज्ञान तो प्राप्त किया जा सकता है पर अक्षर विद्या बहुत बृहद है उसे समझने के लिये यह जरूरी है कि सुखों का त्याग किया जाये। विद्या से आशय अपने विषय के साथ ही अध्यात्मिक ज्ञान होने से भी है जो आजकल बहुत कम लोगों के पास है। इसका कारण यह है कि छात्रों को शिक्षा के दौरान ही विलासित की वस्तुओं के उपभोग की आदत पड़ जाती है।
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Saturday, April 11, 2009

चाणक्य नीतिः खाने पीने के विषय में कतई संकोच न करें

धन-धान्यप्रयोगेषु विद्य-संग्रहणेषु च।
आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत्।

हिंदी में भावार्थ-धन धान्य के व्यवहार, ज्ञान विद्या के संग्रह और खाने पीने में जो व्यक्ति संकोच या लज्जा नहीं करते वही जीवन में सुखी रहते हैं।

अर्थनाशं मनस्तापं गृहे दुश्चरितानि च।
वंचनं चाऽपमानं च मतिमान्न प्रकाशयेत्।।

हिंदी में भावार्थ-अपने धन का नाश, मन का दुःख, स्त्री की चरित्रहीनता और किसी अन्य व्यक्ति द्वारा वचनों के द्वारा कष्ट देने की बात सभी के सामने प्रकाशित नहीं करना चाहियै
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कुछ बातों सभी से कहना चाहिये और कुछ नहीं। अक्सर हम व्यग्र होने पर ऐसी बातें लोगों से कह जाते हैं जो नहीं कहना चाहिये। कभी व्यग्रता इतनी बढ़ जाती है कि कह ही नहीं पाते। नीति विशारद चाणक्य के अनुसार जिस बात से अपना अपमान होता हो या अपमान हो चुका हो वह बात किसी को नहीं बताना चाहिये। खासतौर से जब हमारे धन का नाश हमारी गलती से हो गया हो।
इसके अलावा कुछ बातें छिपानी भी नहीं चाहिये। अगर हमारे पास धन या खाद्यान्न नहीं है तो स्पष्टतः उस आदमी को बता देना चाहिये जिससे हमें मदद अपेक्षित है। किसी से कोई बात सीखने के लिये उसके सामने अपने अज्ञान को छिपाना ठीक नहीं है। अगर पेट में भूख हो कहीं अपने खाने का जुगाड़ नहीं हो पाता और कोई अन्य हमें भोजन का आग्रह करता है तो उसे अस्वीकार करना मूर्खता का काम है। कहने का तात्पर्य है कि जहां सम्मान की बात है तो ऐसी बात लोगों को नहीं बताना चाहिये जिससे हमारे अपमान का विस्तार हो साथ ही अपनी दैहिक और मानसिक आवश्यकताओं को दूसरों से छिपाना भी नहीं चाहिये।
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