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Saturday, May 25, 2013

ऋग्वेद के आधार पर चिंत्तन-मन में पवित्र संकल्प धारण करें (rigved ke adhar par chinttan-man mein pavitra sankalp dharan karen)

      इस संसार में जो सफल तथा  व्यक्ति प्रसिद्ध हुए हैं उन्होंने अपने लक्ष्य का निर्माण बाल्यकाल में ही कर लिया था। कुछ ने युवा होने पर संकल्प धारण किया पर उनके प्रयास निष्काम होने के साथ ही दृढ़ संकल्प के साथ जुड़े हुए थे। इसलिये वह सफल व्यक्ति कहलाये।  सच बात तो यह है कि अनेक लोग अपने लक्ष्य तथा संकल्प बदलते रहते है। परिणामस्वरूप उनके हाथ कुछ नहीं आता।  इसके अलावा जो लोग  अपने लक्ष्य के साथ कामनाओं की संभावना अधिक ही मन में  रखते हैं, वह भी अधिकतर नाकाम ही होते हैं।  अधिकतर लोग किसी कार्य को पेट पालने या कमाने का लक्ष्य रखकर प्रारंभ करते हैं।  उनके लिये कमाना ही फल है।  ऐसे में उनकी बुद्धि संकीर्ण हो जाती है जिससे व्यापक रूप से कार्य करना संभव नहीं हो पाता।  पहले तो यह समझना चाहिये कि सबका दाता परमात्मा है।  दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम!  मनुष्य को अपना काम यह सोचकर करना चाहिये कि वह तो उसे करना ही है।  बिना काम किये शरीर जर्जर हो ंजाता है।  उस काम से जो उसे भौतिक उपलब्धि होती है वह कोई फल नहीं होता क्योंकि वह तो आगे के काम में व्यय हो जाती है।  नौकरी में वेतन मिले या व्यापार में लाभ हो वह कोई साथ नहीं रखता बल्कि परिवार और अपने पर खर्च करता है। यह उपलब्धि कर्म का विस्तार करती है न कि वह फल है। इसलिये काम अपने हृदय को संतोष देने के लिये करना चाहिये।
 ऋग्वेद में कहा गया है कि
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आकृतिः सत्या मनसो में असतु।
           हिन्दी में भावार्थ-मन के संकल्प और प्रार्थना सत्य हो।
समाना व आकृतिः  आकूतिः समाना हृदयान वः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसह्यसति।।
            हिन्दी में भावार्थ-मनुष्यों  के संकल्प एक समान रहें और हृदय भी एक समान हों जिससे संगठित होने पर कार्य संपन्न होता है। जब संकल्प, मन और विचार का मेल होता है तब एकता स्वतः हो जाती है।
         दूसरी बात यह कि अपना मेल उन लोगों से करना चाहिये जिनका संकल्प, विचार तथा लक्ष्य समान हो। विपरीत यह प्रथक चाल चलन वाले से संबंध रखने से कोई लाभ नहीं होता।  समान विचाराधारा वाले के साथ चलने पर संगठन बनता है और कोई लक्ष्य आसानी से प्राप्त किया जा सकता है।  जीवन में संकल्प का अत्यंत महत्व है। जिस तरह का संकल्प हम करते हैं वैसा ही वातावरण हमारे सामने आता है।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Saturday, February 16, 2013

ऋग्वेद के आधार पर चिंत्तन-जिस वस्तु में हृदय लगायें वह मिल ही जाती है (jis vastu mein dridya lagaa den vah mil hee jaatee hai-hindu thouhgt on besad the rigved )


              एक बात निश्चित है कि अगर आदमी किसी वस्तु या विषय में अपना संकल्प दृढ़ कर ले तो वह उसे प्राप्त कर ही लेता है। इसके लिये आवश्यकता है परिश्रम तथा ईमानदारी का भाव धारण करने की।आशा निराशा जीवन में आती जाती रहती हैं।  मुख्य बात यह है कि आदमी खुशी में अधिक आनंद होकर चुप नहीं बैठ सकता तो गम उसे खामोश कर देते हैं।  अपने जीवन की सफलता के लिये आदमी अपनी शक्ति और पराक्रम को श्रेय देता है तो असफलता के लिये दूसरों को जिम्मेदार ठहराता है। सच बात तो यह है कि हर आदमी अपने कर्म का स्वयं ही जिम्मेदार होता है।
ऋग्वेद में कहा गया है कि
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यादृश्मिन्धपि तमपस्याया विदद् यऽस्वयं कहते सो अरे करत्

                    हिन्दी में भावार्थ- मनुष्य का हृदय जिस वस्तु में लगा रहता है वह उसे प्राप्त कर ही  लेता है। परिश्रम करने सारे पदार्थ प्राप्त किये जा सकते हैं।
अत्रा ना हार्दि क्रवणस्य रेजते यत्र मकतिर्विद्यते पूतबन्धीन।
हिन्दी में भावार्थ-जहां पवित्र बुद्धि का वास है वह हृदय के मनोरथ कभी व्यर्थ नहीं जाते।
         जब आदमी किसी विषय विशेष में हृदय लगाकर काम करता है तो उसे सफलता मिल ही जाती है। कुछ लोग अच्छे काम में भी अपना मन पवित्र नहीं रखते तब उनका परेशानी का सामना करना पड़ता है।  यह जीवन संकल्पों का खेल है इसलिये जब तक हम अपना हृदय, लक्ष्य तथा साधन पवित्र रखकर कार्य नहीं करेंगे तब तक सफलता नहीं मिलेगी।  सफलता का मूल मंत्र पवित्र तथा विचार की शुद्धता है। हमारे वेद शास्त्र इसी बात का संदेश देते हैं। जब भी कोई परिश्रम, ईमानदारी तथा पवित्रता से किया जाता है तो उसमें सफलता अवश्य मिलती है।  उसमें देर हो सकती है पर नाकामी मिलने की संभावना नहीं रहती।
लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Wednesday, November 23, 2011

तुलसीदास के दोहे-दुर्जन लोग काम पड़ने पर सज्जन की तरह पेश आते हैं (sant mahakavi tulsidas ke dohe-dusht aur sanp ka vyavhar ek jaisa)

                सारे विश्व में जिस भी प्रसिद्ध आदमी को देखो वह समाज सेवा के दावे करता दिख रहा है। अब तो स्थिति यह है कि मनुष्य का आर्थिक, मानसिक तथा शरीरिक शोषण कर धन के साथ प्रसिद्धि अर्जित कर चुके अनेक कथित महान लोग समाज सेवा के लिये अपने संगठन खड़े करते हैं। अनेक जगह संस्थाओं तथा कथित समाज सेवकों को दान देते हैं। यह सब प्रचार में देखकर उनके अनेक लोग प्रशंसक भी हो जाते हैं, मगर बहुत लोग इस बात को जानते हैं कि यह सब ढोंग है। उनके व्यवसायिक प्रचारक उनको देवता सिद्ध करते हैं जिससे केवल पैसा ही कमाया जाता है। अपनी छत्रछाया के नीचे रहने वालों का शोषण कर धन जुटाने वाले या मनोरंजन के माध्यम से लोगों के मानस में कल्पित नायक की तरह स्थापित लोग कभी भी हृदय में सेवा भाव धारण नहीं कर सकते क्योंकि उन्होंने अपना लक्ष्य ही इस भौतिक संसार पर राज्य करना रहा होता है। सेवा का भाव तो बचपन में ही माता पिता के संस्कारों तथा अध्यात्मिक दर्शन के अध्ययन के माध्यम से मनुष्य में स्थापित हो जाता है और पचपन में तो केवल आदमी अपनी प्रतिष्ठा पाने की दृष्टि से समाज सेवा करता है। धन, प्रतिष्ठा और पद के साथ बरसों तक जुड़े लोग अपनी बोरियत दूर करने क्रे लिये समाज सेवा का काम हाथ लेते हैं उसमें भी इस बात का ध्यान रखते हैं कि उनका धन इस तरह उपयोग में आये कि उसका व्यय तो हो पर आय भी हो जाये। कई धनिक लोग तो ऐसे होते हैं जो समाज सेवकों को दान लेकर उनका उपयोग अपने प्रचार के साथ ही सामाजिक संस्थाओं पर अपना नियंत्रण करने के लिये करते हैं।
कविवर संत तुलसीदास कहते हैं कि
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‘तुलसी’ जग जीबन अहित, कतहुं कोउ हित जानि।
सोषक भानु कृसानु महि, पवन एक घन दानि।।
          ‘‘इस संसार में दूसरों को दुःख देने वाले बहुत हैं जबकि सुख देने वाले विरले ही होते हैं। जिस तरह सूर्य, अग्नि, वायु और पृथ्वी जल को सुखाने वाले हैं पर जल देने वाला बादल तो एक ही है।’’
मिलै जो सरलहि सरल ह्वै, कुटिल न सहज बिहाइ।
सो सहेतु ज्यों बक्र गति, ब्याल न बिलहिं समाइ।।
           ‘‘दुष्ट लोग अपना काम करने पही सज्जनता का इस तरह ढोंग करते हैं जैसे कि टेढ़ीमेड़ी चाल चलने वाला सांप सीधी चाल से अपने बिल में प्रवेश करता है।’’
        हम महान कवि और संत तुलसी दास के दर्शन को माने तो इस संसार में कल्याण करने वाले अत्यंत कम होते हैं। अधिकतर लोग तो केवल दूसरे के शोषण की योजना बनाते हुए अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहते है। यही कारण है कि आजकल हमारे देश में हजारों समाज सेवी संस्थायें खुल गयी हैं। इनके साथ अनेक सामान्य लोग जुड़ते हैं पर बाद में उनको पता चलता है कि यह सेवा केवल एक ढोंग है। दूसरी बात यह कि समूह में कभी सेवा नहीं होती क्योंकि यह संभव ही नहीं है कि कहीं सत्य में सेवा भाव रखने वाले लोगों का कोई समूह बन जाये। समाज सेवा करने वाले विरले ही होते हैं और उनका समूह बन जाये यह संभव नहीं है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Wednesday, January 26, 2011

योग्य आदमी कभी अपनी प्रतिभा का दावा नहीं करते-हिन्दी धार्मिक लेख (yogyata aur pratibha-hindi dharmik lekh)

यह मानवीय स्वभाव है कि वह चाहता है कि उसका व्यक्तित्व दूसरे लोगों को आकर्षक लगे। दूसरों से मान पाने की भावना मनुष्य में तीव्रतर होती है मगर इसके लिये यह जरूरी है कि मनुष्य अपने हाथ से परोपकार के काम करे तथा अपने अच्छे आचरण का उदाहरण समाज के सामने प्रस्तुत करे। इसके लिये यह आवश्यक है कि कुछ कर्म निष्काम भाव से करने के साथ ही उद्देश्य हीन दया की जाये। यह सभी के लिये संभव नहीं है पर भला दिखने की चाहत होने के कारण मनुष्य आत्मप्रवंचना करता है। वह ऐसे कामों को अपने खाते में दिखाता है जो उसने किये ही नहीं-वरन् वह तो हुए भी नहीं।
सारा मनुष्य समुदाय अपना पूरा जीवन अपने तथा परिवार की स्वार्थपूर्ति में लगा देता है पर जहां अवसर मिले वहां अपने को बुद्धिमान तथा परोपकारी साबित करने के साथ ही दयालु होने का दावा करता है। विरले ही ज्ञानी तथा संत प्रवृत्ति के लोग होते हैं जो स्वार्थों की लीक से हटकर समाज के लिये निष्काम भाव से करने के साथ ही निष्प्रयोजन दया करते हैं। ऐसे लोग कभी दावे कर गाते नहीं है।
संत कबीरदास जी कहते हैं कि
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बड़ा बड़ाई ना करै, बड़ा न बोले बोल।
हीरा मुख से ना कहै, लाख टका मेरी मोल।
‘‘जो आदमी अपने अंदर बड़प्पन का भाव लेकर जीता है वह बड़ी बातें नहीं करता जिस तरह हीरा कभी अपने मुख से अपनी लाख टके कीमत होने की बात नहीं कहता।’’
आदमी के अंदर अगर योग्यता, प्रतिभा तथा ज्ञान है तो उसके आचरण तथा कर्म से प्रकट होता है। इसलिये ही ज्ञानी लोग अपने जीवन में नियमित कर्म के साथ ही ज्ञान संग्रह का काम भी करते हैं। समय मिलने पर सत्संग तथा हृदय से भगवान की भक्ति करते हैं। उनकी साधना, तप और ज्ञान का प्रकाश स्वयं ही सभी के सामने फैलता है। वह कभी दावा नहीं करते कि वह श्रेष्ठ व्यक्ति हैं। इसके विपरीत जिनके पास न ज्ञान है न साधना और तप करने की प्रवृत्ति वह खाली पीली अपनी डींगें मारते हैं। उनको कोई सामने कहता नहीं क्योंकि उनकी संगत भी तो ऐसे ही लोगों से होती है।
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संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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Saturday, November 20, 2010

भर्तृहरि नीति संदेश-ज्ञान के भी अनेक प्रभाव(bharathari neeti shatak-gyan ka prabhav)

ज्ञानं सतां मानमदादिनाशनं केषांचिदेतन्मदमानकारणम्
स्थानं विविक्तं यमिनां विमुक्तये कामातुराणामपिकामकरणम्।
हिन्दी में भावार्थ-
ज्ञान संतों के लिये मान और मद का काम करता है। उसी तरह वही ज्ञान दुष्टों के लिये अहंकार तो योगियों के लिये मोक्ष का कारण बनता है। इसके विपरीत कामी पुरुषों के काम को भी बढ़ा देता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-ऐसी बात केवल हमारे अध्यात्मिक दर्शन में भर्तृहरि महाराज जैसे लोग ही संदेश के रूप में दे सकते हैं। ज्ञान दो तरह का होता है एक जीवन तत्व का रहस्य तो दूसरा सांसरिक ज्ञान। जिन लोगों को तत्व ज्ञान है वह जीवन तत्व रहस्य को जान जाते हैं तब उनका जीवन सात्विकता की अग्रसर होता है और वही संत कहलाते हैं। उसी तरह जिनको यही तत्व ज्ञान-जो कि केवल सांसरिकता तक ही सीमित है-आक्रामक भी बना देता है। यह संसार और जीवन नश्वर है यह सोच होने पर अनेक लोग इस जीवन का जमकर उपभोग करना चाहते हैं। इसलिये वह अच्छे और बुरे के भाव से परे होकर ऐसे काम करने लगते हैं। जैसा कि सभी लोग जानते हैं कि रावण एक विद्वान था पर उसने यह मंतव्य धारण कर लिया था कि वह जीवन अपने अनुसार ही व्यतीत करेगा तब अपराध के रास्ते पर ही चला और भगवान श्री राम के बाणों से वध को प्राप्त हुआ।
हालांकि ऐसे अपवाद स्वरूप ही होता है क्योंकि तत्वज्ञान जीवन के प्रति ऐसा आत्मविश्वास देता है जिसे मनुष्य में सकारात्मकता का भाव आने के साथ ही आशाओं को भी संचार होता है। आज नहीं तो इस मायावी संसार में लक्ष्मी का चक्कर अपने घर भी लगेगा यही सोचकर ज्ञानी निष्काम भाव से अपने काम में लगे रहते हैं। वैसे अगर हम देखें तो आज भी अनेक लोग ऐसे हैं जो कहते हैं कि इस जीवन के बाद उनका क्या होगा इसलिये जो करना है वह अभी करेंगे। युवा पीढ़ी में यही सोचकर अंधाधुंध आनंद के लिये दौड़ती रहती है कि अगर यह अवस्था बीत गयी तो फिर तो कुछ लाभ नहीं है। विवाहोपरांत तो बस घर के झंझट ही उनका पूरा जीवन लील लेंगे। देखा जाये तो यह भी एक तरह से यह सीमित तत्व ज्ञान है जो जीवन में आक्रामक बना देता है।

इसके विपरीत जो लोग अध्यात्मिक ज्ञान का पूर्ण अर्थ समझते हैं वह एकांत में बैठकर जीवन और उसके रहस्य का विचार करते हैं। इस सांसरिक जीवन के उतार चढ़ाव के उतार चढ़ाव पर दृष्टि रखते हैं। वह इस चिंतन से पैदा ज्ञान को धारण करते हुए जीवन में तनाव से मुक्ति पाते हैं।
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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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Wednesday, November 17, 2010

विदुर नीति-ज्ञानी दूसरों के वाग्बाणों की परवाह नहीं करते (vidur neeti-gyani manushya parvah nahin karte)

परश्चेदेनभिविध्येत वाणीमुंशं सुतीक्ष्यौरनलार्कदीप्तैः।
स विध्यमानोऽप्यतिदहृामानो विद्यात् कविः सुकृतं में दधाति।।
हिन्दी में भावार्थ-
विद्वान मनुष्य अन्य व्यक्ति के मुख से अपने प्रति वाग्बाण तथा कटुशब्दों से चोट पहुंचाने पर वेदना होने के बावजूद यह सोचकर मौन हो जाते हैं कि वह मेरे ही पुण्यों को पुष्ट कर रहा है।
यदि सन्तं सेवति यद्यसन्तं तपस्विनं यदि वा स्तेनमेव।
वासो तथा रंगवशं प्रवानि तथा स तेषां वशमभ्युवैति।।
हिन्दी में भावार्थ-
जिस तरह किसी कपड़े को रंगा जाये तो वह भी उसी रंग का हो जाता है। उसी तरह सज्जन पुरुष दुष्ट से संगत करने पर उस जैसा प्रभाव हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में कलुषित वाणी बोलने वालों की कमी नहीं है। उससे भी अधिक संख्या तो उन लोगों की है जो दूसरे के दुःख पर हंसते हैं। किसी की परेशानी आने पर उसका मजाक उड़ाते हैं। अगर हम देखें तो आम इंसान सबसे ज्यादा इसी बात पर चिंतित रहते हैं कि कहीं उनके पास दुःख न आये। इसलिये नहीं कि वह उससे लड़ नहीं सकते बल्कि कहीं अपने ही लोग उनका मजाक न उड़ायें यही चिंता उनको खाये जाती है।
तत्वज्ञानी तथा जीवन रहस्य को समझने वाले विद्वान इस प्रकार के भय से मुक्त होते हैं। वह जानते हैं कि मनुष्य मन की यह स्थिति यह है कि वह अपने दुःख से कम दुखी बल्कि दूसरे के सुख से अधिक सुखी होता है। लोभ, लालच तथा अहंकार से भरा मनुष्य कभी संतुष्ट या सुखी नहीं रह सकता इसलिये वह दूसरे के दुःख तथा क्षोभ में अपने लिये संतोष ढूंढता है। इतना ही नहीं अनेक लोग तो दूसरों की रचनात्मक प्रवृत्तियों का भी उपहास उड़ाते हैं।
यही कारण है कि विद्वान तथा समझदार लोग दूसरों की आलोचना की परवाह तथा प्रशंसा का लोभ त्यागकर अपने सत्य पथ पर बढ़ते जाते हैं।
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Tuesday, April 20, 2010

विदुर नीति-मित्र का पहले से परिचित या संबंधी होना जरूरी नहीं (hindu dharma sandesh-religion of friendship)

सत्कृतताश्च श्रुतार्थाश्च मित्राणं न भविन्त ये।
तान् मुतानपि क्रव्यादाः कृतध्नान्नोपर्भुजते।।
हिन्दी में भावार्थ-
जो अपने मित्र से सम्मान और सहायता पाने के बाद भी उनके नहीे होते ऐसे कृतघ्न मनुष्य के मरने पर उनका मांस तो मांस खाने वाले जंतु भी नहीं खाते।
न कश्चिदप्यसम्बद्धो मित्रभावेन वर्तते।
स एवं बन्धुस्तमित्रं सा गतिस्तत् परायणम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
पूर्व में कोई परिचय या संबंध न होने पर भी जो मित्रता का कर्तव्य निभाये वही बंधु और मित्र है। वही सहारा और आश्रय देने वाला है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मित्रता का धर्म सबसे बड़ा है और इसे निभाना इतना आसान नहंी है जितना समझा जाता है। हमारे साथ कार्य तथा व्यवसायिक स्थल पर अनेक लोग प्रतिदिन मिलते हैं पर वह मित्र की श्रेणी में नहंी आते। उसी तरह बंधु बांधव भी बहुत होते हैंे पर विपत्ति में सभी नहीं आते। ऐसा भी अवसर आता है कि विपत्ति के समक्ष होने पर कोई अपरिचित या पूर्व में किसी भी प्रकार का संबंध न रखने वाला व्यक्ति भी उससे मुक्ति दिलवाता है। इस तरह तो मित्र वही कहा जाता है। कहने का अभिप्राय यह है मित्रता का धर्म यही है कि विपत्ति या काम करने पर किसी की सहायता की जाये। प्रतिदिन मिलते जुलते रहना, व्यर्थ के विषयों पर वाद विवाद करना या साथ साथ काम करना मित्रता की श्रेणी में नहीं आता।
जब कोई व्यक्ति हमारे साथ मित्रता निभाता है तो फिर उसकी सहायता के लिये भी तत्पर रहना चाहिये। ऐसा न करने पर बहुत बड़ा अधर्म हो जाता है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है-यह बात नहीं भूलना चाहिये। इसका अभिप्राय यह है कि एक मनुष्य दूसरे की सहायता करे। इसे ही मित्रता निभाना कहा जाता है। मित्रता के लिये पूर्व परिचय या संबंध होना आवश्यक नहीं है।
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Friday, July 31, 2009

रहीम के दोहे-ग़लत आदतों में आदमी अपनी संपत्ति गँवा देता है (rahim ke dohe-bhram aur galat adat)

संपति भरम गंवाइ के, हाथ रहत कछु नाहिं
ज्यों रहीम ससि रहत है, दिवस अकासहिं मांहि

कविवर रहीम कहते हैं कि भ्रम में आकर आदमी तमाम तरह की आदतों का शिकार हो जाता है और उसमें अपनी संपत्ति का अपव्यय करता रहता है और एक दिन ऐसा आ जाता है जब उसके पास कुछ भी शेष नहीं रह जाता। इसके साथ ही समाज में उसकी प्रतिष्ठा खत्म हो जाती है।
संतत संपति जानि कै, सबको सब कुछ देत
दीन बंधु बिन दीन की, कौ रहीम सुधि लेत

कविवर रहीम कहते हैं कि जिनके पास धन पर्याप्त मात्रा में लोग उनको सब कुछ देने को तैयार हो जाते हैं और जिसके पास कम है उसकी कोई सुधि नहीं लेता।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस संसार में माया का खेल विचित्र है। वह कभी स्थिर नहीं रहती। आजकल जितने धन के उद्भव के काले स्त्रोत बने हैं उतने उसके पराभव के मार्ग बने हैं। ऐसे अनेक लोग हैं जिन्होंने अपने पद, प्रतिष्ठा और परिवार के नाम पर गलत तरीके से अथाह धनार्जन किया पर उनके घर के सदस्यों ने ही गलत मार्ग अपना कर जूए, शराब, सट्टे तथा अन्य व्यसनों में तबाह कर दिया। देखने के लिये अनेक भले लोग अपने धन का अहंकार दिखते हैं पन अपने बच्चों की आदतों से उनका मन हमेशा विचलित होता है। हालांकि कुछ लोग अनाप-शनाप पैसा कमा रहे हैं और अपने बच्चों के विरुद्ध शिकायत न तो सुनते हैं और न ही कोई उनके सामने करता है।

यह कारण है कि आजकल जो कथित बड़े लोग उनके अनेक घर के रहस्य जब सामने आते हैं तो लोग हैरान रह जाते हैं। उनका अपने परिवार पर बस नहीं हैं। कई लोग तो जिनका नाम था अब इसलिये गुमनाम हो गये क्योंकि उनका धन पूरी तरह गलत कामों की वजह से तबाह हो गया। उनकी चर्चा अब इसलिये नहीं होती क्योंकि जिनके पास धन नहीं है उनकी चर्चा भला कौन करता है? इसके बावजूद भी शिक्षित और कथित ज्ञानी लोग भी वैभवशाली लोगों का चाटुकारिता करते हैं और गरीब को अनदेखा करते हैं। अमीर के दौलत से कुद पाने के लिये ही वह लोग उनके इर्दगिर्द चक्कर लगाते है। गरीब को तो वह पांव की जुती समझते हैं। इसके बावजूद हमें समझदार होना चाहिए और सबके प्रति समान व्यवहार करना चाहिए। ऐसा भी होता है कि अमीर की चाटुकारिता करते रहो पर हाथ कुछ नहीं आता। कोई अमीर किसी की बिना कारण सहायता नहीं करता। यह हमें समझना चाहिए। अगर कोई हमारी सहायता करने आ रहा है तो समझ लो उसका कोई स्वार्थ है।
अतः अगर अपने पास अगर धन कम हो तो यह मान लेना चाहिए कि लोग आर्थिक सहयोग तैयार करने के लिये कम ही तैयार होंगे। साथ ही इस बात की चिंता नहीं करना चाहिए कि कोई सम्मान करेगा या नहीं। अगर धन अधिक हो तो दूसरों द्वारा सहयोग की पेशकश को अपने गुणों का प्रभाव न समझते हुए यह मान लेना चाहिए कि हमारे धन की वजह से दूसरे प्रभावित हैं।
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Sunday, July 5, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-जीवन में कभी आलस्य न करें (kautilya ka arthshastra)

भोक्तं पुरुषकारेण दृष्टसित्रयमिव वियम्।
व्यवसायं सदैवेच्छेन्न हि कलीववदाचरेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
दुष्ट स्त्री के समान धन पाने की इच्छा यानि लक्ष्मी को पुरस्कार से भोगने के लिये सदा उद्योग करते रहें। कभी आलस्य न करें।
प्रयत्नप्रेर्यर्वमणेन महता चितहस्तिना।
रूढ़वैरिद्रु मोत्खतमकृत्देव कुतः सुखम्।।
हिंदी में भावार्थ-
चित्त रूपी हाथी को अपने नियंत्रण में करने के प्रयास के साथ ही वैर रूपी वृक्ष को उखाउ़ फैंके बिना भला सुख कहां प्राप्त हो सकता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-यह सच है कि जीवन में मानसिक शांति के लिये अध्यात्मिक ज्ञान आवश्यक है पर दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति और सांसरिक दायित्वों के निर्वहन के लिये धन की आवश्यकता होती है। इसकी प्राप्ति के लिये भी उद्योग करना चाहिये। कभी जीवन में आलस्य न करें। भगवान श्री कृष्ण ने भी गीता में यही कहा है कि अपने सांसरिक कर्म करते हुए भक्ति करने के साथ ही ज्ञान प्राप्ति का प्रयास करें। निष्काम कर्म का श्रीगीता में आशय अक्सर गलत बताया जाता है। सच तो यह है उसमें धन की उपलिब्धयों को फल नहीं माना गया बल्कि उनसे तो सांसरिक कार्य का ही हिस्सा कहा जाता है। अपने परिश्रम से जो धन प्राप्त होता है उससे हम दूसरे दायित्वों का निर्वहन करते हैं। वह अपने साथ नहीं ले जाते इसलिये उसे फल नहीं मानना चाहिये। सांसरिक कार्य के लिये धन जरूरी है और उसी से ही दान और यज्ञ भी किये जाते हैं।

इसके अलावा अपने मन में दूसरे की भौतिक उपलब्धियां देखकर निराशा या बैर नहीं पालना चाहिये। हमारे मानसिक दुःख का कारण यही है कि हम दूसरों के प्रति अनावश्यक रूप से द्वेष और बैर पाल लेते हैं। उनसे अगर विरक्त हो जायें तो आधा दुःख तो वैसे ही दूर हो जाये।
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Thursday, May 14, 2009

भर्तृहरि शतकः दुर्जन को बताया रहस्य उजागर हो जाता है

जले तैलं खले गुह्यं पात्रे दानं मनागपि।
प्राज्ञे शास्त्रं स्वयं याति विस्तरं वस्तुशक्तितः।।
हिंदी में भावार्थ-
जल में मिलाया गया तेल, दुर्जन को बताया गया गुप्त रहस्य, सुपात्र को दिया गया धन का दान और बुद्धिमान को प्रदाय किया ज्ञान स्वतः वृद्धि को प्राप्त होते हैं।
धर्माऽऽख्याने श्मशाने च रोगिणां या मतिर्भवेत्।
सा सर्वदैव तिष्ठेयेत् को न मुच्येत बंधानात्।।
हिंदी में भावार्थ-
किसी भी धर्म स्थान पर जब कोई व्यक्ति सत्संग का लाभ उठाता है, श्मशान में किसी के शव दाहसंस्कार होते देखता है या किसी रोगी को अपनी पीड़ा से छटपटाता हुआ देखता है तो इस भौतिक दुनियां को निरर्थक मानने लगता है परंतु जैसे ही वहां से हट जाता है वैसे ही उसकी बुद्धि फिर इसी संसार के भौतिक स्वरूप की तरफ आकर्षित होती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-व्यक्ति को अपने राज किसी अन्य से नहीं कहना चाहिये। अगर कोई व्यक्ति हमारे सामने अच्छा बर्ताव करता है पर अगर उसके मन में हमारे प्रति कपट,ईष्र्या या द्वेष का भाव है तो वह उसे जाकर सभी को बता देगा जिससे अधिक कष्ट प्राप्त होता है। उसी तरह अपने घन का दान किसी अगर अच्छे और गुणी को दिया जाये तो वह उसका सदुपयोग कर उसमें वृद्धि करेगा।
ऐसा अनेक बार जीवन में हमारे सामने अवसर आता है जब कहीं किसी सत्संग में जाते हैं या कहीं श्मशान में किसी प्रियजन और मित्र के दाह संस्कार को देखते हैं या कहीं कोई रोगी तड़तपा हुआ दिखता है तब हमें यह सारा संसार मिथ्या नजर आता है पर अगर उस स्थान से हटते हैं तो फिर सब भूल जाते है। दुनियां के इस भौतिक स्वरूप की महिमा कुछ ऐसी है कि जो इसे बाह्य आंखों से देखता है उसे प्रभावित करता है पर जो ज्ञानी हैं वह इसे जानते हैं और हमेशा ही सुख दुःख, प्रसन्नता शोक और लाभ हानि में समबुद्धिरूप से स्थित रहकर जीवन व्यतीत करते हैं।
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Saturday, April 18, 2009

चाणक्य नीतिः नदी किनारे स्थित वृक्ष शीघ्र नष्ट हो जाते हैं (chankya niti)

नदी तीरे च ये वृक्षाः परगृहेषु कामिनी।
मन्त्रिहीनश्चय राजानः शीघ्रं नश्चाननसंशयम्

हिंदी में भावार्थ-नदी के किनारे वृक्ष, दूसरे के घर रहने वाली स्त्री, मंत्री के बिना राजा शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।
निर्धनं पुरुषं वेश्या प्रजा भग्नं नृपं त्यजेत्।
खग चीतफल वृक्षं भुक्त्वा चाऽभ्यागता गृहम्।।

हिंदी में भावार्थ-निर्धन पुरुष को वैश्या, पराजित और शक्तिहीन राजा को प्रजा, फलहीन वृक्ष को पक्षी जिस तरह त्याग देते हैं उसी तरह भोजन करने के बाद अतिथि को गृहस्थ का त्याग कर देना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अपने जीवन के लक्ष्य और कार्य पर स्वयं ही निर्भर रहना चाहिये। यह सही है कि अपने अनेक कार्यों के लिये दूसरों की सहायता की आवश्यकता होती है पर उस समय इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि अपनी निर्भरता किसी एक व्यक्ति की बजाय अनेक पर हो ताकि एक अगर सहायता न तो दूसरा कर दे। अपने कार्य तथा उद्देश्य की पूर्ति के सदैव स्वयं ही विचार करते हुए सक्रिय रहना चाहिये। दूसरों निर्भर रहने से जीवन में असफलता की आशंका बलवती होती है।

परिवार समाज और राष्ट्र के मुखिया को सदैव अपनी शक्ति और अर्थ का संचय करते रहना चाहिये। जहां उसकी शक्ति में शिथिलता आने के साथ ही धनाभाव घेर लेता है वहां उसके अंतर्गत सक्रिय अन्य लोग ही नहीं वरन् स्वजन ही उसका त्याग कर देते हैं। अपनी शक्ति और संपन्नता बनाये रखने के लिये अपने गुणों और दुर्गुणों पर निरंतर दृष्टिपात करते हुए आत्म मंथन करते हुए नये प्रयोग करते रहने से शक्ति अर्जित होती है और साथ में अपने प्रति लोगों में नवीनता का भाव बनाये रखा जा सकता है। वैसे आयु अनुसार शक्ति और समयानुसार धन का हृास होता है पर गुणवान और ज्ञानी लोग अपने अभ्यास से इसका आभास किसी को नहीं होने देते जिससे उनकी शक्ति यथावत रहती है।
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Monday, April 6, 2009

चाणक्य नीतिः ज्ञान मनुष्य का सेनापति होता है

हर्त ज्ञार्न क्रियाहीनं हतश्चाऽज्ञानतो नर।
हर्त निर्नायकं सैन्यं स्त्रियो नष ह्यभर्तृकाः ।।

हिंदी में भावार्थ- जिस ज्ञान को आचरण में प्रयोग न किया जाये वह व्यर्थ है। अज्ञानी पुरुष हमेशा ही संकट में रहता हुआ ऐसे ही शीघ्र नष्ट हो जाता है जैसे सेनापति से रहित सेना युद्ध में स्वामीविहीन स्त्री जीवन में परास्त हो जाती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- मनुष्य का सेनापित उसका ज्ञान होता है। उसके बिना वह किसी का गुलाम बन जाता है या फिर पशुओं की तरह जीवन जीता है। ज्ञान वह होता है जो जीवन के आचरण में लाया जाये। खालीपीली ज्ञान होने का भी कोई लाभ नहीं है जब तक उसको प्रयोग में न लाया जाये। हमारे देश में ज्ञानोपदेश करने वाले ढेर सारे लोग है जो ‘दान, तत्वज्ञान, तपस्या, धर्म, अहिंसा, प्रेम, और भक्ति की महिमा’ का बखान करते हैं पर उनका जीवन उसके विपरीत विलासिता, धन संग्रह, और अपने बड़े होने के अभिमान में व्यतीत होता है। देखा जाये तो उनके लिये ज्ञान विक्रय और उनके अनुयायियों के लिये क्रय की वस्तु होती है। उसके आचरण से न तो गुरु का और न ही शिष्य का लेना देना होता है।

यही कारण है कि हमारा समाज जितना धार्मिक माना जाता है उतना ही व्यवसायिक भी। भारतीय प्राचीन ग्रथों का तत्वज्ञान का मूल सभी जानते हैं पर उसके भाव को कोई नहंीं जानता। अनेक गुरु ज्ञानोपदेश करते हुए बीच में ही यह बताने लगते हैं कि ‘धर्म के प्रचार के लिये धन की आवश्यकता है’। वह अपने भक्तों में दान और त्याग का भाव पैदा कर अपने लिये धन जुटाते है। भक्त भी अपने मन में स्थित दान भाव की शांति के लिये उनकी बातों में आकर अपनी जेब ढीली कर देते हैं। कथित गुरु अपने शिष्यों को ज्ञान के पथ पर लाकर उनका भौतिक दोहन कर फिर उनको अज्ञान के पथ पर ढकेल देते हैं। यही कारण है कि अध्यात्मिक गुरु कहलाने वाला अपना देश भौतिकता के ऐसे जंजाल में फंस कर रह गया है जहां विकास केवला एक नारा है जिसकी अंतिम मंजिल विनाश है।
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Friday, March 27, 2009

संत कबीर वाणीः अपने विश्वास में बदलाव बनता है तनाव कारण

सौ वर्षहि भक्ति करि, एक दिन पूजै आन
सो अपराधी आत्मा, पैर चौरासी खान

संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि सौ वर्ष तक अपने इष्ट या गुरु की भक्ति करने के बाद एक दिन किसी दूसरे देवी देवता की पूजा कर ली तो समझ लो कि पहले की भक्ति गड़ढे में गयी और अपनी आत्मा ही रंज होने लगती है।
कामी तिरै क्रोधी तिजै, लोभी की गति होय
सलिल भक्त संसार में, तरत न देखा कोय

कामी क्रोधी और लोभी व्यक्ति थोड़ी भक्ति करने के बाद भी इस भवसागर को तैर कर पार कर सकता है पर शराब का सेवन करने वालों की कोई गति नहीं हो सकती।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-एक बार जिस इष्ट की आराधना करना प्रारंभ किया तो फिर उसमें परिवर्तन नहीं करना चाहिये। सभी जानते हैं कि परमात्मा का एक ही है पर इंसान उसे अलग अलग स्वरूपों में पूजता है। जिस स्वरूप की पूजा करें उसमें पूर्ण रूप से विश्वास करना चाहिये। जीवन में उतार चढ़ाव आते रहते हैं पर दूसरों के कहने में आकर इष्ट का स्वरूप नहीं बदलना चाहिये। दरअसल विश्वास में बदलाव अपने अंदर मौजूद आत्मविश्वास का ही कमजोर करता है और हम अपने जीवन में आयी परेशानियों से लड़ने की क्षमता खो बैठते हैं।
अपने देश में जितना भक्तिभाव है उससे अधिक अधविश्वास है। किसी की कोई परेशानी हो तो दस लोग आते हैं कि अमुक जगह चलो वहां के पीर या बाबा तुम्हारी परेशानी दूर कर देंगे और परेशान आदमी उनके कहने पर चलने लगता है और अपने इष्ट से उसका विश्वास हटने लगता है। कालांतर में यही उसके लिये दुःखदायी होने लगता है। इस तरह अनेक प्रकार की सिद्धों की दुकानों बन गयी हैं जहां लोगों की भावनाओंं का दोहन जमकर दिया जाता है। सच बात तो यह है कि जीवन का पहिया घूमता है तो अनेक काम रुक जाते हैं और रुके हुए काम बन जाते हैं किसी सिद्ध के चक्कर लगाने से कोई काम नहीं बनता। इस तरह का भटकाव जीवन में तनाव का कारण बनता है। कोई एक काम बन गया तो दूसरे काम के लिये सिद्ध के पास भाग रहे हैं। इस तरह विश्वास में बदलाव हमारी संघर्ष की भावना का कमजोर करता है।

अपनी जिंदगी में हमेशा एक ही इष्ट पर यकीन करना चाहिये। यह मानकर चलें कि अगर कोई काम रुका है तो उनकी मर्जी से और जब समय आयेगा तो वह भी पूरा हो जायेगा। वैसे जीवन में प्रसन्न रहने का सबसे अच्छा उपाय तो निष्काम भक्ति ही है पर उसके लिये दृष्टा बनकर जीना पड़ता है। यह मानकर चलना पड़ता है कि इस तरह के उतार चढ़ाव जीवन का एक अभिन्न अंग है। साथ में निष्प्रयोजन दया भी करते रहना चाहिये यह सोचकर कि पता नहीं इस देह पर आये संकट के लिये कब कौन सहायता करने आ जाये।
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Tuesday, February 17, 2009

कबीर के दोहेःपहले आदमी को परखें फिर संपर्क बढ़ायें

संत कबीर कहते हैं कि
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कबीर देखी परखि ले, परखि के मुखा बुलाय
जैसी अन्तर होयगी, मुख निकलेगी आय
जब कोई मिले तो उसे पहले अच्छी प्रकार देख परख के पश्चात् ही उससे मुख मिलाओ। जैसी उसके मन में बात होगी वैसी कहीं न कहीं मुंह से निकल ही आयेगी।
पहिले शब्द पिछानिये, पीछे कीजै मोल
पारख परखै रतन को,शब्द का मोल न तोल

पहले किसी की बात सुनकर उसके शब्द पर विचार करें फिर अपने विवेक से निर्णय ले। हीरे का मोल तो होता है इसलिये उसके लिये मोलभाव किया जाता है पर सच्चे शब्दों का कोई मोल नहीं होता-यानि दूसरे के जो शब्द हैं उनमें अगर कमी दिखाई दे तो उस पर यकीन न करें और केवल अच्छी संभावना को मानकर संपर्क न बढ़ायें।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-प्रचार माध्यमों ने आदमी की मन बुद्धि पर अधिकार कर लिया है इसलिये लोगों की अपने विवेक से काम करने की शक्ति नष्ट हो गयी है। अभिनेता,कलाकार,लेखक और बुद्धिजीवियों को उनके सुंदर शब्दों पर ही योग्य मान लिया जाता है। फिल्मों में अभिनेता और अभिनेत्रियां दूसरे लेखकों द्वारा बोले गये शब्द बोलते हैं पर यह भ्रम हो जाता है कि जैसे वह स्वयं बोल रहे हैं। अनेक विज्ञापन आते हैं जिसमें सुंदर शब्दों के साथ प्रचार होता है और लोग मान लेते हैं। शब्दों के जाल मं किसी को भी फंसाना आसान हो गया है और जो एक बार किसी के जाल में फंस गया तो उसके हितैषी चाहें भी तो उसे नहीं निकाल सकते।

इस मायावी दुनियां में पहले भी कोई कम छल नहीं था पर अब तो खुलेआम होने लगा है। अनेक ऐसे लोग हैं जो बदनाम हैं पर वह पर्दे पर चमक रहे हैं क्योंकि वह बोलते बहुत सुंदर हैं। प्रचार माध्यमों में अपराधियों का महिमा मंडन हो रहा है और वह भी अपने को पवित्र बताते हैं। तब लगता है कि जब सभी लोग पवित्र हैं तब इस दुनियां में अपराध क्यों हो रहा है? यह सब समाज की विवेक शक्ति के पतन का परिचायक हैं क्योंकि हम दूसरें के शब्दों पर विचार नहीं करते जबकि होना यह चाहिये कि जब कोई दूसरा व्यक्ति बोल रहा है तो उसके शब्दों पर विचार करें। इतना ही नहीं जब तक किसी के शब्दों को परख न लें तब तक उस पर यकीन न करें। अपना किसी से संपर्क धीरज से बढ़ायें क्योंकि बातचीत में कहीं न कहीं आदमी में मूंह से सच निकल ही आता है।
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Wednesday, January 28, 2009

भर्तृशतकः विषय हमें छोड़े इससे पहले उनको छोड़ दो

अवश्यं यातारिश्चतरमुषित्वाऽपि विषया वियोगे को भेदस्त्यजति न जनो यत्स्वयममून्।
व्रजन्तः स्वातंत्र्यादतुलपरितापाय मनसः स्वयं त्यक्ता ह्येते शमसुखमनन्तं विदधति।


हिन्दी में भावार्थ-अपने जीवन में हम कितना भी विषय को भोगें पर एक दिन वह छोड़ देते हैं। यह विचार करते हुए हम उनसे स्वयं ही अलग क्यों न हो जायें? मनुष्य जब विषयों को निरंतर भोगता है और जब उनके अलग होने पर बहुत मानसिक कष्ट झेलता है पर जब वह स्वयं त्याग करता है तो उससे सुख की अनुभुति होती है और उनके अलग होने की पीड़ा का उसे अनुभव नहीं होता।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस चराचर जगत में सभी वस्तुऐं और विषय नष्ट प्रायः हैं। कभी न कभी उनसे साथ छूटता है। यह जीवन धारा की तरह बहता जाता है और कहीं एक ठिकाना पकड़ कर बैठना संभव नहंी है पर इंसान अपने सुखों के पल को पकड़े रखना चाहता है और इसी प्रयास में वह विषयों के फेरे में पड़ा रहता है। इंसान के मन में सुख भोगने की इच्छा उसे अज्ञान क अंधेरे में डालती है और जिससे कई ऐसे विषयों, वस्तुओं और व्यक्तियों में मोह डाल लेता है जिनसे उसका बिछड़ना तय है। परिवार,मित्र,रिश्तेदार और व्यवसाय कभी न कभी साथ छोड़ते हैं और उस समय आदमी के मन में भारी संताप उत्पन्न होता है। यह जरूरी नहीं है कि जीवन के नष्ट होने पर ही उनसे बिछोह होता है बल्कि जीवन काल में भी ऐसा अवसर आ जाता है। बच्चों में आदमी का मोह होता है पर जब अपनी नौकरी और व्यापार के लिये मां बाप का साथ छोड़ जाते हैं। वह उच्च स्थान पर स्थापित होते है तो मां बाप समाज में अपना सम्मान समझते हैं पर जब कोई परेशानी का समय आता है तो उन्हीं बच्चो की पास में अनुपस्थिति उनको अखरती है।
यह मोह का परिणाम ही है। आदमी एक व्यवसाय या नौकरी में स्थायित्व ढूंढता है पर वह आजकल के समय में यह संभव नही है। कभी मंदी का दौर हो तो बड़े व्यवसाय डांवाडोल हो जाते हैं।

इनसे बचने का एक ही उपाय है कि मन में निष्काम और निर्लिप्तता का भाव रहे। जब हम कोई काम करें तो उससे अधिक आशा न करें या अवसर पड़े तो बदल दें। अगर जीवन में बहुत सारा धन कमा लिया है तो फिर व्यापार और नौकरी से स्वयं को प्ृथक कर लें क्योंकि उनसे कभी अलग होना है तो क्यों न स्वेच्छा से अलग हुआ जाये। ब्रच्चे अगर बाहर जातेे हैं तो समझ लेना चाहिये कि अब उनकी निकटता अधिक नहीं मिलगी और अपने जीवन में इस बदलाव के साथ जीना चाहिये।
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Saturday, December 13, 2008

रहीम सन्देश: भ्रमवश संपत्ति गंवाने से हाथ में कुछ नहीं रहता

संपति भरम गंवाइ के, हाथ रहत कछु नाहिं
ज्यों रहीम ससि रहत है, दिवस अकासहिं मांहि


कविवर रहीम कहते हैं कि भ्रम में आकर आदमी तमाम तरह की आदतों का शिकार हो जाता है और उसमें अपनी संपत्ति का अपव्यय करता रहता है और एक दिन ऐसा आ जाता है जब उसके पास कुछ भी शेष नहीं रह जाता। इसके साथ ही समाज में उसकी प्रतिष्ठा खत्म हो जाती है।

संतत संपति जानि कै, सबको सब कुछ देत
दीन बंधु बिन दीन की, कौ रहीम सुधि लेत


कविवर रहीम कहते हैं कि जिनके पास धन पर्याप्त मात्रा में लोग उनको सब कुछ देने को तैयार हो जाते हैं और जिसके पास कम है उसकी कोई सुधि नहीं लेता।


वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस संसार में माया का खेल विचित्र है। वह कभी स्थिर नहीं रहती। आजकल जितने धन के उद्भव के काले स्त्रोत बने हैं उतने उसके पराभव के मार्ग बने हैं। ऐसे अनेक लोग हैं जिन्होंने अपने पद, प्रतिष्ठा और परिवार के नाम पर गलत तरीके से अथाह धनार्जन किया पर उनके घर के सदस्यों ने ही गलत मार्ग अपना कर जूए, शराब, सट्टे तथा अन्य व्यसनों में तबाह कर दिया। देखने के लिये अनेक भले लोग अपने धन का अहंकार दिखते हैं पन अपने बच्चों की आदतों से उनका मन हमेशा विचलित होता है। हालांकि कुछ लोग अनाप-शनाप पैसा कमा रहे हैं और अपने बच्चों के विरुद्ध शिकायत न तो सुनते हैं और न ही कोई उनके सामने करता है।

यह कारण है कि आजकल जो कथित बड़े लोग उनके अनेक घर के रहस्य जब सामने आते हैं तो लोग हैरान रह जाते हैं। उनका अपने परिवार पर बस नहीं हैं। कई लोग तो जिनका नाम था अब इसलिये गुमनाम हो गये क्योंकि उनका धन पूरी तरह गलत कामों की वजह से तबाह हो गया। उनकी चर्चा अब इसलिये नहीं होती क्योंकि जिनके पास धन नहीं है उनकी चर्चा भला कौन करता है? इसके बावजूद भी शिक्षित और कथित ज्ञानी लोग भी वैभवशाली लोगों का चाटुकारिता करते हैं और गरीब को अनदेखा करते हैं। अमीर के दौलत से कुद पाने के लिये ही वह लोग उनके इर्दगिर्द चक्कर लगाते है। गरीब को तो वह पांव की जुती समझते हैं। इसके बावजूद हमें समझदार होना चाहिए और सबके प्रति समान व्यवहार करना चाहिए। ऐसा भी होता है कि अमीर की चाटुकारिता करते रहो पर हाथ कुछ नहीं आता। कोई अमीर किसी की बिना कारण सहायता नहीं करता। यह हमें समझना चाहिए। अगर कोई हमारी सहायता करने आ रहा है तो समझ लो उसका कोई स्वार्थ है।
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Friday, December 12, 2008

विदुर नीतिः शोक से शरीर का नाश देखकर शत्रु प्रसन्न होते हैं

1.थोड़े धन वाले कुूल भी सदाचार से संपन्न है तो भी वे अच्छे कुलों में मान लिये जाते हैं और उनको यश प्राप्त होता है।
2.मन को प्रिय लगने वाली वस्तु शोक करने से प्राप्त नहीं होती। शोक से तो केवल शरीर का नाश होता है। इसे देखकर शत्रु प्रसन्न होते हैं।
3.जैसे हंस सूखे सरोवर के आसपास मंडराते रह जाते हैं और उसके अंदर प्रविष्ट नहीं होते। वैसे ही जिसके मन में चंचलता का भाव है वह अज्ञानी इंद्रियों के का गुलाम बन कर रह जाता है और उसे अर्थ की प्रािप्त नहीं हेाती।
4.विद्या,तप,संयम और त्याग के अलावा शांति का कोई उपाय नहीं है।
5.भले की बात कहीं जाये तो भी उन्हें अच्छी नहीं लगती। उनकी योग से भी सिद्धि नहीं हो पाती। भेदभाव करने वाले आदमी की विनाश के सिवा और कोई गति नहीं है।
6.जो भेदभाव करते हैं उनके लिये धर्म का आचरण करना संभव नहीं है। उनको न तो सुख मिलता है न ही गौरव। उनको शांति वार्तालाप करना नहीं सुहाता।
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Tuesday, October 21, 2008

संत कबीर संदेशः तंबाकू के सेवन से हृदय में मलिनता उत्पन्न होती है

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि
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हुक्का तो सोहै नहीं, हरिदासन के हाथ
कहैं कबीर हुक्का गहै, ताको छोड़ो साथ

इसका आशय यह है कि परमात्मा के सच्चे भक्तों के हाथ में हुक्का शोभा नहीं देता। जो व्यक्ति हुक्का पीते हैं उनका साथ ही छोड़ देना चाहिये।
भौंडी आवै बास मुख, हिरदा होय मलीन
कहैं कबीरा राम जन, मांगि चिलम नहिं लीन


आशय यह है कि जो चिलम आदि का सेवन करते हें उनके मूंह से गंदी बास आती है और उनका हृदय भी मलिन होता है। उनकी संगत न करना चाहिये और न उनसे ऐसी व्यसनों की सामग्री मांगना चाहिये।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-चाहे कितना भी कोई अपनी भक्ति का दिखावा करे पर अगर वह तंबाकू, सिगरेट और चिलम का सेवन करता है तो उसका विश्वास नहीं करना चाहिये। अब तो लोगों के लिये भक्ति भी एक तरह का फैशन हो गया है। कहीं भी किसी जगह धार्मिक मेले में जाईये वहां तंबाकू के पाउच बिकते मिल जायेंगे। वहां लोग खरीद कर उसका सेवन करते हैं। वह भले ही कहते हों कि वह तो भगवान के भक्त है पर अपने मन को खुश करने के लिये जब उनको तंबाकू वाले व्यसन जैसे सिगरेट या पाउच की जरूरत पड़ती है तो इसका आशय यह है केवल भक्ति से उनको राहत नहीं मिलती। यह उनकी मानसिक कमजोरी का परिचायक है। जो परमात्मा की सच्ची भक्ति करते हैं उनको ऐसी चीजों की आवश्यकता नहीं होती। वह तो भक्ति से ही अपने मन को सदैव प्रसन्न रखते हैं।

श्रीगीता में कहा गया है कि गुण ही गुणों को बरतते हैंं। जो लोग तंबाकू आदि का सेवन करते हैं तो उनके मूंह से बदबू आती है। इसका आशय यह है कि वह बदबू उनके शरीर में बैठी है और मन और मस्तिष्क को प्रभावित कर रही है। ऐसे में विचारों के केंद्र बिंदू मस्तिष्क में अच्छे विचार कैसे आ सकते हैं। क्या हम कहीं किसी गंदी गली से निकलते हैं तो हमारे मूंह में क्रोध या नाराजगी के भाव नहीं आते? फिर जो मस्तिष्क उस गंदी बदबू को झेल रहा है कैसे अच्छे विचार कर सकता है। इसलिये ऐसे लोगों के साथ भी नहीं रहना चहिये क्योंकि वह किसी तरह से सहायक नहीं होते।
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Thursday, July 31, 2008

संत कबीर वाणीः जो सत्य हो उसी के अनुसार बोलें

शब्द कहै सो कीजिये, बहुतक गुरु लबार
अपने अपने लाभ को, ठौर ठौर बटपार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो शब्द सत्य के अनुसार है उसी का विचार कर कहो। अधिक बोलने वाले गुरु बहुत है जो अपने स्वार्थ के लिये दूसरों को बातें बनाकर ठगते हैं। ऐसे गुरुओं की बात पर विचार न कर अपने विवेक क अनुसार वचन बोलो।

शब्द पाय सुरति राखहि, सो पहुंचे दरबार
कहैं कबीर तहां देखिए, बैठा पुरुष हमार


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो सत्य वचनों के ज्ञान को ग्रहण कर लेता है वह परमात्मा की भक्ति पा लेता है। उसे ऐसा लगता है कि वह भगवान की दरबार में ही बैठा है।
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