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Thursday, April 16, 2009

मनुस्मृतिः दंड के ही भय के लोग कर्तव्योन्मुख होते हैं

सर्वो दण्डजितो लोके दुर्लभो हि शुचिर्नरः।
दण्डस्य हि भयात्सर्व जगद् भोगाय कल्पते।।

हिंदी में भावार्थ-इस विश्व में राज्य दंड के भय से ही लोग नियम तथा कानून मानते हैं। ऐसे व्यक्ति बहुत कम हैं जो जो स्वभाव से ही पतित्र हों वरना अधिकतर लोग तो दण्ड के भय से अपने कर्तव्य का पालन करते हुए सुख भोगते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनु महाराज के समय की यह सच्चाई आज भी नहीं बदली कि राज्य और समाज के दंड से ही अधिकतर लोग अपने कर्तव्य की तरफ आकर्षित रहते हैं। जहां समाज और राज्य के दंड का भय नहीं रहता वहां अराजकता की स्थिति बन जाती है। इस दुनियां में बहुत कम ऐसे लोग होते हैं जिनका हृदय स्वाभाविक रूप से पवित्र होता हैं। ऐसे लोग न तो दंड की सोचते हैं और न ही कर्म से विमुख होने का विचार उनके पवित्र हृदय में आते हैं। कहा भी जाता है कि मनुष्य के अंदर ही राक्षस और देवता विराजते हैं। समयानुसार वह प्रकट होते हैं। सज्जनता और शिष्टता का दिखावा करने वाले लोग जहां दंड का भय नहीं होता वहां राक्षस बन जाते हैं।
इसलिये जब दुष्ट और अक्षम लोगों से सामना हो तो उनको अपनी शक्ति का बोध कराते रहना चािहये वरना वह आपको कमजोर मानकर आप पर आक्रमण कर सकते हैं। हमारे विश्व समाज में तो कमजोर और बेसहारा पर आक्रमण करने की प्रवृत्ति आज से नहीं बरसों पुरानी है। यह नियम कोई भारत पर नहीं लागू होता बल्कि पूरे विश्व पर समान रूप से इसका प्रभाव है। कहने का तात्पर्य यह है कि एक तरफ अपना अवलोकन करना चाहिये कि कभी हमारे अंदर राक्षसत्व न उत्पन्न हो वहीं इस बात का भी ध्यान रखना चाहिये कि दूसरे के अंदर कब राक्षस्तव उत्पन्न हो और उसका प्रतिकार करने के लिये अपने पास दंड की शक्ति रखना चाहिये।
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Tuesday, October 21, 2008

संत कबीर संदेशः तंबाकू के सेवन से हृदय में मलिनता उत्पन्न होती है

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि
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हुक्का तो सोहै नहीं, हरिदासन के हाथ
कहैं कबीर हुक्का गहै, ताको छोड़ो साथ

इसका आशय यह है कि परमात्मा के सच्चे भक्तों के हाथ में हुक्का शोभा नहीं देता। जो व्यक्ति हुक्का पीते हैं उनका साथ ही छोड़ देना चाहिये।
भौंडी आवै बास मुख, हिरदा होय मलीन
कहैं कबीरा राम जन, मांगि चिलम नहिं लीन


आशय यह है कि जो चिलम आदि का सेवन करते हें उनके मूंह से गंदी बास आती है और उनका हृदय भी मलिन होता है। उनकी संगत न करना चाहिये और न उनसे ऐसी व्यसनों की सामग्री मांगना चाहिये।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-चाहे कितना भी कोई अपनी भक्ति का दिखावा करे पर अगर वह तंबाकू, सिगरेट और चिलम का सेवन करता है तो उसका विश्वास नहीं करना चाहिये। अब तो लोगों के लिये भक्ति भी एक तरह का फैशन हो गया है। कहीं भी किसी जगह धार्मिक मेले में जाईये वहां तंबाकू के पाउच बिकते मिल जायेंगे। वहां लोग खरीद कर उसका सेवन करते हैं। वह भले ही कहते हों कि वह तो भगवान के भक्त है पर अपने मन को खुश करने के लिये जब उनको तंबाकू वाले व्यसन जैसे सिगरेट या पाउच की जरूरत पड़ती है तो इसका आशय यह है केवल भक्ति से उनको राहत नहीं मिलती। यह उनकी मानसिक कमजोरी का परिचायक है। जो परमात्मा की सच्ची भक्ति करते हैं उनको ऐसी चीजों की आवश्यकता नहीं होती। वह तो भक्ति से ही अपने मन को सदैव प्रसन्न रखते हैं।

श्रीगीता में कहा गया है कि गुण ही गुणों को बरतते हैंं। जो लोग तंबाकू आदि का सेवन करते हैं तो उनके मूंह से बदबू आती है। इसका आशय यह है कि वह बदबू उनके शरीर में बैठी है और मन और मस्तिष्क को प्रभावित कर रही है। ऐसे में विचारों के केंद्र बिंदू मस्तिष्क में अच्छे विचार कैसे आ सकते हैं। क्या हम कहीं किसी गंदी गली से निकलते हैं तो हमारे मूंह में क्रोध या नाराजगी के भाव नहीं आते? फिर जो मस्तिष्क उस गंदी बदबू को झेल रहा है कैसे अच्छे विचार कर सकता है। इसलिये ऐसे लोगों के साथ भी नहीं रहना चहिये क्योंकि वह किसी तरह से सहायक नहीं होते।
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