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Friday, November 6, 2009

संत कबीर वाणीः दौलत की वजह से सभी प्यार करते हैं (kabir ke dohe-daulat aur pyar)

गुणवेता और द्रव्य को, प्रीति करै सब कोय
कबीर प्रीति सो जानिये, इनसे न्यारी होय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि गुणवेताओ-चालाक और ढोंगी लोग- और धनपतियों से तो हर कोई प्रेम करता है पर सच्चा प्रेम तो वह है जो न्यारा-स्वार्थरहित-हो।

प्रेम-प्रेम सब कोइ कहैं, प्रेम न चीन्है कोय
जा मारग साहिब मिलै, प्रेम कहावै सोय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रेम करने की बात तो सभी करते हैं पर उसके वास्तविक रूप को कोई समझ नहीं पाता। प्रेम का सच्चा मार्ग तो वही है जहां परमात्मा की भक्ति और ज्ञान प्राप्त हो सके।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-टीवी चैनलों और पत्र पत्रिकाओं में आजकल प्रेम पर बहुत कुछ दिखाया और लिखा जाता है। यह प्रेम केवल स्त्री पुरुष के निजी संबंध को ही प्रोत्साहित करता है। हालत यह हो गयी है कि अप्रत्यक्ष रूप से विवाहेत्तर या विवाह पूर्व संबंधों का समर्थन किया जाने लगा है। यह क्षणिक प्रेम एक तरह से वासनामय है मगर आजकल के अंग्रेजी संस्कृति प्रेमी और नारी स्वतंत्रता के समर्थक विद्वान इसी प्रेम में शाश्वत जीवन की तलाश कर हास्यास्पद दृश्य प्रस्तुत करते हैं। एक मजे की बात यह है कि एक तरफ सार्वजनिक स्थलों पर प्रेम प्रदर्शन करने की प्रवृति को स्वतंत्रता के नाम पर प्रेमियों की रक्षा की बात की जाती है दूसरी तरफ प्रेम को निजी मामला बताया जाता है। कुछ लोग तो कहते हैं कि सब धर्मों से प्रीति का धर्म बड़ा है। अब अगर उनसे पूछा जाये कि इसका स्वरूप क्या है तो कोई बता नहीं पायेगा। इस नश्वर शरीर का आकर्षण धीमे धीमे कम होता जाता है और उसके साथ ही दैहिक प्रेम की आंच भी धीमी हो जाती है। इसलिए कहा जाता है कि सच्चा प्रेम केवल परमात्मा से किया जा सकता है।

वैसे सच बात तो यह है कि प्रेम तो केवल परमात्मा से ही हो सकता है क्योंकि वह अनश्वर है। हमारी आत्मा भी अनश्वर है और उसका प्रेम उसी से ही संभव है। परमात्मा से प्रेम करने पर कभी भी निराशा हाथ नहीं आती जबकि दैहिक प्रेम का आकर्षण जल्दी घटने लगता है। जिस आदमी का मन भगवान की भक्ति में रम जाता है वह फिर कभी उससे विरक्त नहीं होता जबकि दैहिक प्रेम वालों में कभी न कभी विरक्ति हो जाती है और कहीं तो यह कथित प्रेम बहुत बड़ी घृणा में बदल जाता है।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Sunday, November 1, 2009

चाणक्य नीति-स्नेह करना दु:ख का मूल कारण (sneh dukh ka karan-chankya niti in hindi

यस्य स्नेहो भयं तस्य स्नेहो दुःखस्य भाजनम्।
स्नेहमूलानि दुःखानि तानि त्यक्तवा वसेत्सुखम्।।
हिंदी में भावार्थ-
जहां स्नेह हैं वही दुःख है। स्नेह ही दुःख की उत्पत्ति का कारण है। स्नेह ही दुःख का मूल है। जिसने स्नेह को त्याग दिया वही सुखी रहता है।
सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया स्वसा।
शांतिः पत्नी क्षमा पुत्रः षडेते मम बान्धवाः।।
हिंदी में भावार्थ-
इस जीवन में सत्य माता, ज्ञान पिता, धर्म भाई और दया बहिन समान है। मन की शांति पत्नी और क्षमा पुत्र समान है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान जीवन के सत्य को प्रवाहित करने वाला स्त्रोत है जिसमें आत्मा को सर्वोपरि बताया गया है। समूचे जीवों से प्रेम करना धर्म है और कमजोर और निरीह पर दया करना सबसे बड़ा पुण्य है। मगर अनेक कथित साधु संतों समाज में अपना प्रभाव बनाये रखने के लिये मनुष्य को रिश्तों में बंधे रहकर केवल उनके निर्वाह के लिये प्रेरित करते है ताकि उनकी छबि समाज सुधारक के रूप में बनी रहे।
नीति विशारद चाणक्य स्पष्ट कहते हैं कि सत्य ही माता के समान है और ज्ञान ही पिता तुल्य है। भाई के समान धर्म और बहिन के समान दया है। मन की शांति पत्नी और क्षमा पुत्र समान है। अर्थात आध्यात्मिक ज्ञान के लिये हमेशा प्रयत्नशील रहना चाहिए। अपने रिश्तों के साथ निर्वाह करना ठीक है पर उनके प्रति अधिक मोह पालना ठीक नहीं है। यह मोह न केवल आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्ति में बाधा पहुंचाता है बल्कि सांसरिक गतिविधियों में इस तरह लिप्त करता है कि उससे मन और देह में केवल विकार और अशांति ही पैदा होती है। तथाकथित विद्वानों और संतों ने ऐसे अनेक कर्मकांडों को धर्म का हिस्सा बना दिया है जो केवल आदमी के मोह को बढ़ाते हैं और उन पर धन खर्च होता है। इसी कारण आम भारतीय धन संचय में अपनी पूरी जिंदगी बर्बाद कर देता है और सिवाय दुःख के उसके हाथ कुछ नहीं आता।

हालत यह है कि आध्यात्मिक ज्ञान की बात तो सभी करते हैं पर धारण उसे नहीं करता। पंचतत्वों से बनी इस देह को नष्ट होना है और आत्मा अमर है इसलिये मृत देह के अंतिम संस्कार और श्राद्ध जैसी परंपराओं को निभाने की प्रेरणा देना उचित नहीं है। इस देह को लेकर को नाटकबाजी करना ही अज्ञान का प्रमाण है। यहां तक कहा जा सकता है कि जन्मतिथि और पुण्य तिथि मनाना ही एक तरह से देहाभिमान का परिणाम है। जब आत्मा अमर है तो पैदा कौन हुआ मरा कौन-इस पर विचार कर देखें तो पायेंगे कि हम अनेक प्रकार के भ्रमों में जी रहे हैं। इनसे मुक्त होकर जीवन व्यतीत करें तो शायद मानसिक संताप और वेदना स्वतः कम हो जाये।
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Thursday, October 22, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-बुरी आदतों वाले पर कोई भी हमला कर सकता है (buri adton se khatra-hindu sandesh)


प्रावेण सन्तो व्यसने रिपूणां यातव्यमित्येव सभादिशंति।
तत्रैव पक्षी व्यसने हि नित्यं क्षमस्तुन्नभ्युदितोऽभियायात्।
                हिंदी में भावार्थ-
अधिकतर महानतम विचारक व्यसनों से युक्त व्यक्ति पर आक्रमण करने का सुझाव देते हैं और जिसके साथी भी व्यसनी हों अर्थात उसका पूरा पक्ष ही व्यसनी हो उस पर तो हमला कर ही देना चाहिए।


नानाप्रकारैव्र्यसनेर्विमुक्तः शक्तिवेणाप्रतिमेन युक्तः। 
परं दुरन्तव्यसनोपपन्नं याग्रान्नरन्द्रो विजयाभिकांक्षी।।
                   हिंदी में भावार्थ-विभिन्न प्रकार के व्यसनों से रहित महाप्रभावशाली तीन शक्तियों से युक्त जीतने की इच्छा करने वाला राज प्रमुख व्यसनों से युक्त शत्रु पर आक्रमण की योजना बनाये।

                        वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संदेश को हम अलग तरीके से भी समझ सकते हैं। अब राजा तो रहे नहीं और लोकतात्रिक सभ्यता में हर व्यक्ति अपने घर का राजा है अतः उसे अपने परिवार और अपनी रक्षा के लिये अनेक अवसर पर रणनीति बनानी पड़ती है। ऐसे में दूसरे व्यसनी पर आक्रमण की बात सोचने की बजाय इस बात पर ध्यान करना चाहिये कि अपने अंदर व्यसन न हों ताकि कोई दूसरा हमें और परिवार को परेशान करने के लिये आक्रमण न कर सके। इस समय हमारे देश में अधिकतर लोगोंआत्मसंयम का अभाव है जो कि इन्हीं व्यसनों का परिणाम है। शराब, जुआ सट्टे जैसे व्यसनों ने चहुं ओर से घेर रखा है और इससे जुड़े व्यवसायों में खूब कमाई है। सच तो यह है कि जिन व्यवसायों में कमाई है वह सभी व्यसनों से जुड़े हैं। लोगों के अंदर मनोरंजन के नाम पर ऐसे व्यसन पेश किये जा रहे हैं जिससे समाज विकृत हो रहा है। यही कारण है कि हमारे देश को बाहर से चुनौती मिल रही है तो अंदर असामाजिक प्रकृत्ति के लोग अपना प्रभुत्व कायम कर लोगों को आतंकित किये रहते हैं। मनोरंजन के नाम पर शराब, खेल, और फिल्मों के व्यसनों ने लोगों को कायर बना दिया है और साथ में उनकी चिंतन क्षमता भी लुप्त हो गयी है। यही कारण है कि जब चार लोग की बैठक जमने पर देश के सामने आ रही चुनौतियों की चर्चा तो है पर उसके हल का कोई उपाय उनको नहीं सूझता। सभी लोग निराशाजनक बातें करते हैं।
            व्यक्तिगत रूप से देश की चिंता करने के साथ ही अपनी स्थिति पर भी विचार करना चाहिए। जितना हो सके उतना व्यसनों से बचें वरना धन, पद और बाहुबल से सुसज्ज्ति असामाजिक तत्व-जो व्यसनों के कारण स्वयं ही डरपोक होते हैं उन उनका डर क्रूरता पैदा करता है- आपको या परिवार को तंग कर सकते हैं। एक बात याद रखें अगर आप अपने चरित्र पर दृढ़ रहते हुए व्यसनों से परे हैं तो आपकी रक्षा स्वतः होगी। व्यसनी होने पर हर कोई आपको एक आसान लक्ष्य (साफ्ट टारगेट soft target ) समझने लगता है। यह बात ध्यान रखते हुए अपने आपको व्यसनों से दूर रखें तो अनेक प्रकार के खतरे स्वत: दूर हो जायेंगे।

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Friday, July 31, 2009

रहीम के दोहे-ग़लत आदतों में आदमी अपनी संपत्ति गँवा देता है (rahim ke dohe-bhram aur galat adat)

संपति भरम गंवाइ के, हाथ रहत कछु नाहिं
ज्यों रहीम ससि रहत है, दिवस अकासहिं मांहि

कविवर रहीम कहते हैं कि भ्रम में आकर आदमी तमाम तरह की आदतों का शिकार हो जाता है और उसमें अपनी संपत्ति का अपव्यय करता रहता है और एक दिन ऐसा आ जाता है जब उसके पास कुछ भी शेष नहीं रह जाता। इसके साथ ही समाज में उसकी प्रतिष्ठा खत्म हो जाती है।
संतत संपति जानि कै, सबको सब कुछ देत
दीन बंधु बिन दीन की, कौ रहीम सुधि लेत

कविवर रहीम कहते हैं कि जिनके पास धन पर्याप्त मात्रा में लोग उनको सब कुछ देने को तैयार हो जाते हैं और जिसके पास कम है उसकी कोई सुधि नहीं लेता।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस संसार में माया का खेल विचित्र है। वह कभी स्थिर नहीं रहती। आजकल जितने धन के उद्भव के काले स्त्रोत बने हैं उतने उसके पराभव के मार्ग बने हैं। ऐसे अनेक लोग हैं जिन्होंने अपने पद, प्रतिष्ठा और परिवार के नाम पर गलत तरीके से अथाह धनार्जन किया पर उनके घर के सदस्यों ने ही गलत मार्ग अपना कर जूए, शराब, सट्टे तथा अन्य व्यसनों में तबाह कर दिया। देखने के लिये अनेक भले लोग अपने धन का अहंकार दिखते हैं पन अपने बच्चों की आदतों से उनका मन हमेशा विचलित होता है। हालांकि कुछ लोग अनाप-शनाप पैसा कमा रहे हैं और अपने बच्चों के विरुद्ध शिकायत न तो सुनते हैं और न ही कोई उनके सामने करता है।

यह कारण है कि आजकल जो कथित बड़े लोग उनके अनेक घर के रहस्य जब सामने आते हैं तो लोग हैरान रह जाते हैं। उनका अपने परिवार पर बस नहीं हैं। कई लोग तो जिनका नाम था अब इसलिये गुमनाम हो गये क्योंकि उनका धन पूरी तरह गलत कामों की वजह से तबाह हो गया। उनकी चर्चा अब इसलिये नहीं होती क्योंकि जिनके पास धन नहीं है उनकी चर्चा भला कौन करता है? इसके बावजूद भी शिक्षित और कथित ज्ञानी लोग भी वैभवशाली लोगों का चाटुकारिता करते हैं और गरीब को अनदेखा करते हैं। अमीर के दौलत से कुद पाने के लिये ही वह लोग उनके इर्दगिर्द चक्कर लगाते है। गरीब को तो वह पांव की जुती समझते हैं। इसके बावजूद हमें समझदार होना चाहिए और सबके प्रति समान व्यवहार करना चाहिए। ऐसा भी होता है कि अमीर की चाटुकारिता करते रहो पर हाथ कुछ नहीं आता। कोई अमीर किसी की बिना कारण सहायता नहीं करता। यह हमें समझना चाहिए। अगर कोई हमारी सहायता करने आ रहा है तो समझ लो उसका कोई स्वार्थ है।
अतः अगर अपने पास अगर धन कम हो तो यह मान लेना चाहिए कि लोग आर्थिक सहयोग तैयार करने के लिये कम ही तैयार होंगे। साथ ही इस बात की चिंता नहीं करना चाहिए कि कोई सम्मान करेगा या नहीं। अगर धन अधिक हो तो दूसरों द्वारा सहयोग की पेशकश को अपने गुणों का प्रभाव न समझते हुए यह मान लेना चाहिए कि हमारे धन की वजह से दूसरे प्रभावित हैं।
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Wednesday, July 29, 2009

भर्तृहरि नीति शतक-प्रमाद से धन नष्ट होता है (adhyatmik sandesh in hindi)

भर्तृहरि महाराज कहते है कि
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दौर्मन्त्र्यान्नृपतिर्विनष्यति यतिः सङगात्सुतालालनात् विप्रोऽन्ध्ययनात्कुलं कुतनयाच्छीलं खलोपासनात्
ह्यीर्मद्यादनवेक्षणादपि कृषिः स्नेहः प्रवासाश्रयान्मैत्री चाप्रणयात्सृद्धिरनयात् त्यागपमादाद्धनम्


हिंदी में भावार्थ-कुमित्रता से राजा, विषयासक्ति और कामना योगी, अधिक स्नेह से पुत्र, स्वाध्याय के अभाव से विद्वान, दुष्टों की संगत से सदाचार, मद्यपान से लज्जा, रक्षा के अभाव से कृषि, परदेस में मित्रता, अनैतिक आचरण से ऐश्वर्य, कुपात्र को दान देने वह प्रमाद से धन नष्ट हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ संक्षिप्त व्याख्या-आशय यह है कि जीवन में मनुष्य जब कोई कर्म करता है तो उसका अच्छा और बुरा परिणाम यथानुसार प्राप्त होता है। कोई मनुष्य ऐसा नहीं है जो हमेशा बुरा काम करे या कोई हमेशा अच्छा काम करे। कर्म के अनुसार फल प्राप्त होता है। अच्छे कर्म से अर्थ और सम्मान की प्राप्ति होती है। ऐसे में अपनी उपलब्ध्यिों से जब आदमी में अहंकार या लापरवाही का भाव पैदा होता है तब अपनी छबि गंवाने लगता है। अतः सदैव अपने कर्म संलिप्त रहते हुए अहंकार रहित जीवन बिताना चाहिये।
अगर हमें अपने कुल, कर्म या कांति से धन और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है तो उसका उपयोग परमार्थ में करना चाहिये न कि अनैतिक आचरण कर उसकी शक्ति का प्रदर्शन करते हुए लोगों का प्रभावित करने का प्रयास करें। इससे वह जल्दी नष्ट हो जाता है।
यह मानकर चलना चहिये कि हमें मान, सम्मान तथा लोगों का विश्वास प्राप्त हो रहा है वह अच्छे कर्मों की देन है और उनमें निरंतरता बनी रहे उसके लिये कार्य करना चाहिये। अगर अपनी उपलब्धियों से बौखला कर जीवन पथ से हट गये तो फिर वह मान सम्मान और लोगों का विश्वास दूर होने लगता है।
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Friday, July 17, 2009

रहीम संदेश: स्वार्थ की वजह से हुआ प्रेम धीरे धीरे घटता जाता है (rahim ke dohe-matalab ka pyar dhir dhire kam hota hai)

वहै प्रीति नहिं रीति वह, नहीं पाछिलो हेत
घटत घटत रहिमन घटै, ज्यों कर लीन्हे रेत

स्वाभाविक रूप से जो प्रेम होता है उसकी कोई रीति नहीं होती। स्वार्थ की वजह से हुआ प्रेम तो धीरे धीरे घटते हुए समाप्त हो जाता है। जब आदमी के स्वार्थ पूरे हो जाते हैं जब उसका प्रेम ऐसे ही घटता है जैसे रेत हाथ से फिसलती है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-जीवन में कई ऐसे लोग आते हैं जिनका साथ हमें बहुत अच्छा लगता है और हम से प्रेम समझ बैठते हैं। फिर वह बिछड़ जाते हैं तो उनकी याद आती है और फिर एकदम बिसर जाते हैं। उनकी जगह दूसरे लोग ले लेत हैं। यह प्रेमी की ऐसी रीति है जो देह के साथ आती है। यह अलग बात है कि इसमेें बहकर कई लोग अपना जीवन दूसरे को सौंप कर उसे तबाह कर लेते हैं।

सच्चा प्रेम तो परमात्मा के नाम से ही हो सकता है। आजकल के फिल्मी कहानियों में जो प्रेम दिखाया जाता है वह केवल देह के आकर्षण तक ही सीमित है। फिर कई सूफी गाने भी इस तरह प्रस्तुत किये जाते हैं कि परमात्मा और प्रेमी एक जैसा प्रस्तुत हो जाये। सूफी संस्कृति की आड़ में हाड़मांस के नष्ट होने वाली देह में दिल लगाने के लिये यह संस्कृति बाजार ने बनाई है। अनेक युवक युवतियां इसमें बह जाते हैं और उनको लगता हैकि बस यही प्रेम परमात्मा का रूप है।

सच तो यह है परमात्मा को प्रेम करने वाली तो कोई रीति नहीं है। उसका ध्यान और स्मरण कर मन के विकार दूर किये जायें तभी पता लगता है कि प्रेम क्या है? यह दैहिक प्रेम तो केवल एक आकर्षण है जबकि परमात्मा के प्रति ही प्रेम सच्चा है क्योंकि हम उससे अलग हुई आत्मा है।
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Thursday, June 25, 2009

विदुर नीति-अपनों में विश्वास उत्पन्न करने वाला ही श्रेष्ट


1. जो राज्य प्रमुख मनुष्यों अपने प्रति विश्वास उत्पन्न करने का तरीका जानता है और जो किसी अपराधी के अपराध का प्रमाण मिल जाने पर उनको दंड देता है उसके पास अपार धन संपदा चली आती है। राज्य प्रमुख को कम या दंड अधिक मात्रा में दंड देने के साथ ही क्षमा करना भी आना चाहिये।
2.काम क्रोध का त्याग और सुपात्र को धन दान देने वाला राज्य प्रमुख ही विशेषज्ञ है। जो शास्त्रों का ज्ञान रखता और अपने कर्तव्य को शीघ्र पूरा करता है उस राजा को लोग प्रमाणिक मानते है।
3.जो व्यक्ति किसी कमजोर का अपमान नहीं करता, सदा सावधान रहकर अपने विरोधी और शत्रु के साथ बुद्धिमानी से व्यवहार करता है, ताकतवर के साथ संघर्ष नहीं करता तथा समय आने पर पराक्रम दिखाता है वह धीर पुरुष कहलाता है।
4.संकट आने पर जो व्यक्ति दुःखी नहीं होता बल्कि सावधानी पूर्वक अपना स्वाभाविक कर्म करता है वही महापुरुष है जो तमाम तरह की विपत्तियों को सहते हुए अपने विरोधियों और प्रतिकूल स्थितियों पर विजय पा लेता है।
5.जो कभी उद्दण्डता करते हुए कोई वेश नहीं बनाता, दूसरों के सामने डींग नहीं हांकता,क्रोध से व्याकुल होने पर भी कठोर या कटु वचन नहीं कहता वह मनुष्य सदा ही सभी को प्रिय होता है।
6.जो शांत हो चुके वैर को पुनः जागृत नहीं करता, कभी अहंकार में वचन नहीं कहता, कहीं हीनता का प्रदर्शन नहीं करता तथा किसी प्रकार की विपत्ति में पड़े होने का भाव लेकर भी कोई अनुचित काम नहीं करता तथा उत्तम साधनों से आय अर्जित करने वाले पुरुष को सर्वश्रेष्ठ कहा जाता है।
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Thursday, June 11, 2009

विदुर नीति:मौन रहने से सत्य बोलना ठीक रहता है

  1. बोलने से न बोलना अच्छा बताया गया है, किन्तु सत्य बोलना भी एक गुण है। चुप या मौन रहने से सत्य बोलना दो गुना लाभप्रद है। सत्य मीठी वाणी में बोलना तीसरा गुण है और धर्म के अनुसार बोला जाये यह उसका चौथा गुण है।
  2. मनुष्य जैसे लोगों के साथ रहता है और जिन लोगों की सेवा में रहता है और जैसी उसकी कामनाएं होतीं है वैसा ही वह हो भी जाता है।
  3. मनुष्य जिन विषयों से मन हटाता है उससे उसकी मुक्ति हो जाती है। इस प्रकार यदि सब और से निवृत हो जाये तो उसे कभी भी दुख प्राप्त नहीं होगा।
  4. जो न तो स्वयं किसी से जीता जाता है न दूसरों को जीतने के इच्छा करता है न किसी से बैर करता और न दूसरे को हानि पहुंचाता है और अपनी निंदा और प्रशंसा में भी सहज रहता है वह दुख और सुख के भाव से परे हो जाता है।

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Saturday, April 25, 2009

रहीम के सोरठा-पत्थर पानी में रहते हुए भी गीला नहीं होता

रहिमन नीर पखान, बूड़ै पै सीझै नहीं।
तैसे मूरख ज्ञान, बूझै पै सूझै नहीं।।

कविवर रहीम कहते हैं कि पत्थर पानी में डूब जाता है पर फिर भी गीला नहीं होता। यही स्थिति मूर्ख लोगों की है जो ज्ञान की खोज में रहते हैं पर उसे धारण नहीं करते और उनकी स्थिति जस की तस ही रहती है।

रहिमन बहरी बाज, गगर चढ़ै फिर क्यों तिरै।
पेट अधम के काज, फेरि आय बंधन परै।।


कविवर रहीम कहते हैं कि जिस तरह बहरा बाज आसमान में उड़ता है फिर भी उसे मुक्ति नहीं मिलती क्योंकि वह अपने पापी पेट के लिये बार बार इस धरती के बंधन में फंस जाता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- इस विश्व में ज्ञानियों का झूंड हर जगह मिलेगा जो सामान्य लोगों को ज्ञान देता फिरता है। लोग उनको सुनते हैं और वाह वाह करने के बाद उनके संदेशों का सार भूल जाते हैं। कथित ज्ञानी भी कैसे हैं? किसी को पैसे की भूख है तो किसी को राज्य की और कोई प्रतिष्ठा की चाहत रखता है। हर ज्ञानी अपनी विचाराधारा के अनुसार तय रंगों के वस्त्र पहनता है जो कि इस बात का प्रमाण है कि कहीं न कहीं उसकी सोच दायरों में बंधी है। पूरे विश्व को स्वतंत्र और मौलिक सोच का संदेश देने वाले यह कथित ज्ञानी स्वयं ही मन के ऐसे बंधनों में बंधे रहते हैं जिनसे कभी उनकी स्वयं की मुक्ति नहीं होती।

भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान ही इस बात की पुष्टि करता है कि मनुष्य का मन ही उस पर सवारी करता है और भ्रम उसे स्वयं की सवार होने का होता है। अपनी दैहिक आवश्यकताओं की पूति के लिये मनुष्य उससे अधिक प्रयास करता है। अर्थ संचय की उसकी क्षुधा उमर भर शांत नहीं होती पर इधर अंदर स्थित अध्यात्मिक शक्तियां भी अपने लिये कार्य करने के लिये प्रेरित करती हैं और वह इसके लिये इन कथित ज्ञानियों के यहां मत्था टेकता है पर जब वापस आता है तो फिर इसी दुनियां के जाल में फंस जाता है। तत्वज्ञान के बिना मनुष्य की स्थिति उस बाज की तरह होती है जो आकाश में उड़ता है पर फिर अपनी पेट की भूख के लिये इस धरती पर आता है और वह उस गीले पत्थर की तरह हो जाता है जो पानी में रहते हुए भी गीला नहीं होता।
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Sunday, March 8, 2009

भर्तृहरि शतकः प्रथ्वी पर जीवों में विविधता स्वभाव के अनुसार ही होती है

वैराग्ये संचरत्तयेको नीतौ भ्रमति चापरः
श्रृंगारे रमते कश्चिद् भुवि भेदाः परस्परम्

इस दुनियां में कोई वैरागी होकर मोक्ष प्राप्त करना चाहता तो कोई नीति शास्त्र का अध्ययन कर रहा है कोई कोई तो श्रृंगार रस का आनंद उठा रहा है। इस भूमि पर रहने वाले प्राणियों के स्वभाव अलग अलग हैं।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-पांचों उंगलियां बराबर नहीं हैं। प्रकृत्ति में जो विविधता है उसी में संसार को चलने वाली प्रक्रिया में सामंजस्य छिपा हुआ है। अगर पांचों उंगलियां बराबर होती तो शायद इंसान काम नहीं कर पाता। आज कंप्यूटर युग में जरा अपनी उंगलियों का अवलोकन करें। अगर उंगलियां बराबर होती तो क्या इसके कीबोर्ड पर काम किया जा सकता था? कतई नहीं! उंगलियां छोटी बड़ीं हैं इसलिये कीबोर्ड पर नाचते समय आपस में नहीं टकराती। हम उन्हें पंक्ति में एक साथ इसलिये खड़ा कर पाते हैं क्योंकि वह छोटी बड़ीं हैं। अगर कल्पना करें यह समान लंबाई की होती तो इन्हें एक पंक्ति में खड़ा कर काम नहीं कर सकते थे। हमारे पांवों की उंगलियां भी बराबर नहीं हैं। अगर वह बराबर होती तो हम अपनी देह के बोझ को उन पर खड़ा नहीं कर पाते। यह विविधता ही शरीर को लचीला बनाये रखते है।

इसी तरह जीवों के स्वभाव की विविधता की वजह से ही यह संसार चल रहा है। यह अंतर मनुष्यों में भी है। कुछ लोगों का स्वभाव हमें रास नहीं आता पर उस पर चिढ़+ना नहीं चाहिए। सभी लोगों के स्वभाव के साथ सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास ही जीवन में प्रसन्नता का बोध करा सकता है। यहां हर व्यक्ति अपने स्वभाव के वश होकर अपना कर्म करता है। इसे हम ऐसा भी कहते हैं कि हर व्यक्ति को उसका स्वभाव अपने वश में कर किसी कार्य करने के लिये प्रेरित करता है।
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Friday, March 6, 2009

भर्तृहरि नीति शतक:मन अगर न मिलें तो निकट व्यक्ति से भी दूरी अनुभव होती है

विरहेऽपि संगमः खलु परस्परं संगतं मनो येषाम्
हृदयमपि विघट्ठितं चित्संगी विरहं विशेषयति

हिंदी में भावार्थ-जिनके हृदय आपस में मिले हों वह विरह होने पर साथ रहने की अनुभूति करते हैं और जिनके मन न मिलते हों वह साथ भी रहें तो ऐसा लगता है कि बहुत दूर हैं।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सारी दुनियां में प्रेम का संदेश फैलाया जाता है पर सच यह है कि प्रेम वह भाव है जो स्वाभाविक रूप से होता है। प्रेम में अगर कोई दैहिक,आर्थिक या सामाजिक स्वार्थ हो तो वह प्रेम नहीं रहता। ऐसे स्वार्थ के संबंध आदमी एक दूसरे से निभाते हैं पर उनमें आपस में हार्दिक प्रेम हो यह समझना गलत है। हमारा अध्यात्म दर्शन स्पष्ट रूप से कहता है कि प्रेम दो अक्षरों का सीमित अर्थ वाला शब्द नहीं है बल्कि उसका आधार व्यापक है। जो व्यक्ति एक दूसरे के प्रति निस्वार्थ भाव रखते हैं वही प्रेम करते हैं।
वैसे आजकल प्रेम का शब्द चाहे जहां सुनाई देता है पर उसका भाव कोई जानता हो यह नहीं लगता। आजकल तो प्रेम स्त्री पुरुष के दैहिक संबंधों तक ही सीमित माना जाता है। कभी प्रेम दिवस तो कभी मित्र दिवस के नाम पर युवक युवतियों की दैहिक भावनाओं को भड़काने के लिये तमाम तरह के प्रयास उनको बाजार के उत्पादों के प्रयोक्ता बनाने के लिये किये जाते हैं पर यह क्षणिक आकर्षण कभी प्रेम नहीं होता। अनेक ऐसे प्रसंग भी सामने आते हैं जब कथित प्रेम के आकर्षण में फंसकर युवक युवती विवाह कर लेते हैं पर बाद में घर गृहस्थी के बोझ तले दोनों एक दूसरे के लिये अपरिचित होते जाते हैं। जहां हृदय के प्रेम की बात होती थी वहां जब अन्य जरूरतों की पूर्ति के लिये संघर्ष की बात आती है तो सब कुछ हवा हो जाता है। ऐसे तनाव होता है कि एक छत के नीचे रहने वाले पति पत्नी एक दूसरे के लिये दूर हो जाते हैं।
नौकरी और व्यापार में अनेक लोगों से संपर्क प्रतिदिन बनता है पर सभी मित्र या प्रेमी नहीं बन जाते। कई बार तो ऐसा होता है कि अपने परिवार के सदस्यों से अधिक अपने निकट सहकर्मियों या निकटस्थ लोगों के साथ समय व्यतीत होता है पर फिर भी वह अपने नहीं बन पाते। उनसे मानसिक दूरी बनी रहती है। इसके विपरीत परिवार के सदस्य दूर हों तो भी हृदय के निकट होते हैं।
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Sunday, March 1, 2009

भर्तृहरि शतकः कामदेव के प्रहार कौन झेल पाता है?

तावन्महत्त्वं पाण्डित्यं कुलीन्त्वं विवेकता।
यावज्ज्वलति नांगेषु पंचेषु पावकः


हिंदी में भावार्थ-विद्वता,सज्जनता,कुलीनता तथा बुद्धिमानी का ज्ञान तब तक ही मनुष्य के हृदय में रहता है जब तक कामदेव का हमला उस पर नहीं होता। उसक बाद तो सभी पवित्र भाव नष्ट हो जाते है।
संपादकीय व्याख्या-समाचार पत्र पत्रिकाओं और टीवी चैनलों में अनेक ऐसे समाचार आते हैं जिसमें कथित साधु संतों, धनपतियों,प्रतिष्ठित परिवारों और समाजसेवा में रत लोगों के यौन प्रकरणों की चर्चा होती है। उस समय हमारे मन में यह बात आती है कि ‘अमुक व्यक्ति तो बहुत प्रसिद्ध,ज्ञानी,कुलीन और धनी है भला वह कैसे ऐसे प्रकरण में लिप्त हो सकता है।’ सच बात तो यह है कि जब मनुष्य पर काम भावना का प्रहार होता है तब वह विपरीत लिंग के आकर्षण के जाल में ऐसा फंस जाता है कि वहां से उसका निकलना कठिन है।’
वैसे तो हमारा समाज भी यह बात मानता है कि आम आदमी को यहां किसी प्रकार की आजादी नहीं है पर बड़े आदमी को सभी प्रकार की छूट है। कहते हैं न कि ‘बड़े आदमियों को कौन कहता है। पर हम तो छोटे आदमी है इसलिये समाज को देखकर चलना पड़ता है।’ यही कारण है कि जो समाज के शिखर पर बैठे हैं पर इसकी परवाह नहीं करते कि उनके यौन प्रकरणों पर सामान्य लोग क्या कहेंगे? वैसे भी काम भावना समाज, नैतिकता और आदर्श पर चलने किसे देती है उस पर धन,प्रसिद्धि, और बाहूबल आदमी को वैसे ही मंदाध बना देता है। ऐसे में कामदेव का आक्रमण तो घुटने टेकने को बाध्य कर देता है।
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Thursday, February 26, 2009

भर्तृहरि संदेश:मित्र को अधर्म से बचाना चाहिए

पापान्निवारयति योजयते हिताय
गुह्मं निगूहति गुणान्प्रकटीकरोति।
आपद्गतं च न जहाति ददाति काले
सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः


हिन्दी में भावार्थ- अपने मित्र को अधर्म और पाप से बचाना, उसके हित में संलग्न रहते हुए उसके गुप्त रहस्य किसी अन्य व्यक्ति के सामने प्रकट न करना, विपत्ति काल में भी उसके साथ रहना और आवश्यकता पड़े तो उसकी तन, मन और धन से सहायता करना यही मित्रता का लक्षण है।

संक्षिप्त व्याख्या-अक्सर हम लोग कहते है कि अमुक हमारा मित्र है और यह दावा करते हैं कि समय आने पर वह हमारे काम आयेगा। आजकल यह दावा करना मिथ्या है। देखा जाये तो लोग अपने मित्रों पर इसी विश्वास के कारण संकट में आते हैं। सभी परिचित लोगों को मित्र मानने की प्रवृत्ति संकट का कारण बनती है। कई बार हम लोग अपने गुप्त रहस्य किसी को बिना जांचे-परखे मित्र मानकर बता देते हैं बाद में पता लगता है कि उसका वह रहस्य हजम नहीं हुए और सभी को बताता फिर रहा है। वर्तमान में युवा वर्ग को अपने मित्र ही अधिक भ्रम और अपराध के रास्ते पर ले जाते हैं।

आजकल सच्चे और खरे मित्र मिलना कठिन है इसलिये सोच समझकर ही लोगों को अपना मित्र मानना चाहिए। वैसे कहना तो पड़ता ही है कि‘अमुक हमारा मित्र है’ पर वह उस मित्रता की कसौटी पर वह खरा उतरता है कि नहीं यह भी देख लेना चाहिए। भले जुबान से कहते रहे पर अपने मन में किसी को मित्र मान लेने की बात बिना परखे नहीं धारण करना चाहिए।
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Monday, February 23, 2009

कबीर के दोहे:भक्ति का द्वार संकरा होता है

भक्ति दुवारा सांकरा, राई दशवें भाव
मन मैंगल होम रहा, कैसे आये जाय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि भक्ति का द्वार कि राई के दाने के दसवें भाग के बराबर संकरा होता है उसमें पागली हाथी की तरह मतवाला विशाल मन में कैसे प्रवेश कर सकता है।

भाव बिना नहिं भक्ति जग, भक्ति बिना नहीं भाव
भक्ति भाव इक रूप है, दोअ एक सुभाव


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब तक हृदय में निच्छल और निर्मल भाव नहीं है तब तक इस जगत में भक्ति का भाव नहीं बन सकता है। भक्ति के भाव तो रूप एक है पर उसके दो प्रकार के स्वभाव हैं-एक सकाम भाव दूसरा निष्काम भाव।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भक्ति और ज्ञान का स्वरूप अत्यंत सूक्ष्म है। संत और साधु लोग प्रवचन देते हुए तमाम तरह की कहानियां और संस्मरण जोड़ देते हैं तो ऐसा लगता है कि ज्ञान का कोई बृहद स्वरूप है। अक्सर ऐसे संत लोग कहते हैं कि श्रीगीता का ज्ञान गूढ और रहस्यपूर्ण है पर यह उनका भी भ्रम है। श्रीगीता का ज्ञान सरल और सहज है पर प्रश्न यह है कि उसका अध्ययन और श्रवण करने वाला किस मार्ग पर स्थित है। जो भक्त सकाम भाव में स्थित हैं उसके लिये वह राई के बराबर है और वह उसमें प्रवेश नहीं कर सकता क्योंकि उसका मन तो अपने अंदर इच्छायें और आकांक्षाओं को पालकर मदमस्त हाथी हो जाता है। उसको निष्काम भक्ति का यह द्वार दिखाई ही नहीं देगा। जिसने निष्काम भाव अपनाते हुए श्रीगीता का अध्ययन और श्रवण किया वह सहजता से समझ सकता है.
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Saturday, February 21, 2009

भर्तृहरि शतकः वैराग्य मार्ग पर चलो या पूर्ण विषयी बन जाओ

आवासः क्रियतां गंगे पापहारिणी वारिणि
स्तन,ये तरुपया वा मनोहारिणी हारिणी

हिंदी में भावार्थ- मनुष्य को अपने पापों से बचने के लिये गंगा के किनारे जाकर वैराग्यपूर्ण जीवन व्यतीत करना चाहिये या फिर सुंदर हार पहने नारी के साथ संपर्क रखते हुए गृहस्थ जीवन व्यतीत करना चाहिये।
वर्तमान संपादकीय व्याख्या-अपने जीवन में कभी भी मानसिक अंतद्वंद्व को स्थान नहीं देना चाहिए। अनेक लोगों को लगता है अगर वह विवाह नहीं करते तो सुखी रहते पर फिर भी करते हैं। विवाह करने पर धर की जिम्मेदारी आने से आदमी अनेक बार परेशान हो जाता है और तब उसे वैराग्य पूर्ण जीवन सही लगता है। दूसरी तरफ ऐसे लोग भी है जो गृहस्थ होने पर वैरागी होने का दिखावा करते हैं। जिन लोगों ने पहले वैराग्य लिया वह दूसरे रूप में पुनः विषयों की तरफ लौट आते हैं। भर्तृहरि जी का संदेश यही है कि अगर हमने विषयों को ओढ़ लिया है तो फिर उनमें मन लगाते हुए अपना काम करना चाहिये। अगर वैराग्य लिया है तो फिर विषयों से परे होना चाहिये। मध्य स्थिति में फंसे होन पर केवल कष्ट ही मिल सकता है। अगर हमारे ऊपर घर की जिम्मेदारियां हैं तो उनको निभाने के लिये उसमें मन लगाना ही चाहिये। अगर उनसे बचने का प्रयास करेंगे तो वह भी संभव नहीं है, इसलिये उसमें हृदय लगाकर जूझना चाहिये। अगर जीवन में जिम्मेदारियों से बचना है तो फिर उनके बारे में सोचने से अच्छा है कि वैराग्य पहले ही लें और गृहस्थी न बसायें पर अगर बसा ली है तो उससे भागना संभव नहीं है। कहने का तात्पर्य है कि अगर हमने विषयों को ओढ़ लिया है तो उसमें अपनी बुद्धि के अनुसार चलना चाहिये न कि उनसे बचने का प्रयास करते हुए तनाव को आमंत्रण दें। अगर उनसे बचना है तो पूरी तरह से वैराग्य लेना चाहिये
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Monday, February 16, 2009

मनुस्मृतिः क्रोध से आठ विकार उत्पन्न होते हैं

पैशुन्यं साहसं मोहं ईष्र्याऽसूयार्थ दूषणाम्
वाग्दण्डजं च पारुघ्यं क्रोधजोऽपिगणोष्टकः

हिंदी में भावार्थ- क्रोध से आठ प्रकार के दोष उत्पन्न होते हैं-चुगली या निंदा करना, दुस्साहस, नकारात्मक विचार,ईष्र्या,दूसरों में दोष देखना,पराये धन के अपहरण की प्रवृत्ति,अभद्र शब्द बोलना और दुव्र्यवहार करना।
द्वयोरप्येत्योर्मूलं यं सर्वे कवयो विदुः
तं त्यनेन ज्येल्लोभं त्ज्जावेतातुभौ गणौ
हिंदी में भावार्थ- काम तथा क्रोध से ही सारे व्यवसन होते हैं। इनमी जननी लालच है अतः सभी लोगों को अपने मन पर आने वाली लालच की भावना पर नियंत्रण करना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सच बात यह है कि इस विश्व में जितने भी प्रकार के अपराध हैं वह काम और क्रोध से उत्पन्न होते हैं। उनकी जननी लालच है। मनुष्य अपने जीवन में जितना कमाता है उतना व्यय नहीं करता पर धन और संपत्ति संग्रह की लालच उसे कही भी रुकने नहीं देती। अगर यह लालच का भाव मनुष्य में नहीं होता तो शायद कोई अपराध इस संसार में नहीं होता। लोग कहते हैं कि भुखमरी से अपराध बढ़ते हैं पर सामाजिक और अपराध विशेषज्ञ इसे नहीं मानते क्योंकि जो अपराधी पकड़े जाते हैं उनमें से कोई ही शायद भूख की वजह से अपराध करता हो। हम देश में फैले सार्वजनिक, सामाजिक और निजी क्षेत्रों में व्याप्त भ्रष्टाचार को देखें तो उस अपराध में कोई छोटा आदमी नहीं होता। लोगों के अच्छे खासे वेतन मिलते हैं पर वह फिर भी अपने से कमजोर आदमी से पैसा मांगते या उनको ठगते हुए शर्म नहीं अनुभव करते। जिन लोगों पर दया करना चाहिये उनका ही जेब काटने में उनकी रुचि होती हैं। कल्याण कामों के लिये दान या भाग में रूप में दिया उपलब्ध धन या सामान का अपहरण करने वाले भ्रष्टाचारी लोग केवल उससे अपने घर भरते हैं। समाजसेवा एक तरह से व्यापार हो गया है। दान लेने वाले कुपात्र हैं तो देने वाले भ्र्रष्ट।

हम अपने धर्म,संस्कृति और संस्कारों की दुहाई देते नहीं थकते पर लालच की प्रवृत्ति ने आदमी को लालची बना दिया है। इससे वह कामी और क्रोधी हो गया है। सामाजिक और निजी भ्रष्टाचार में आदमी अगर स्वयं लिप्त हो तो उसे नजर नहीं आता और दूसरा हो तो वह उस पर क्रोध करता है।
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Sunday, February 8, 2009

भर्तृहरि संदेश: तेज हो मनुष्य पर आयु का असर नहीं पड़ता

सिंह शिशुरपि निपतति मदमलिनकपोलभित्तिशु गजेषु
प्रकृतिरियं सत्तवतां न खलु वयस्तेजसो हेतुः


हिंदी में भावार्थ- सिंह का शावक भी मदमस्त हाथी पर हमला करता है। यह सत्य कहा गया है कि शक्तिशाली जीव का यही स्वभाव होता है। तेजस्विता के भाव का आयु से कोई संबंध नहीं होता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भारत में एक आयु के बाद सामान्य व्यक्ति को अधेड़ और वृद्ध मान लिया जाता है-धनियों और प्रतिष्ठत लोगों पर यह नियम लागू करने में लोग स्वयं ही संकोच करते हैं। इसके विपरीत हम जिस पश्चिम संस्कृति की आलोचना करते हैं वहां व्यक्ति के साथ ऐसा व्यवहार नहीं होता। यही कारण है कि वहां लोगों की औसत आयु भारत से बड़ी होती है। होता यह है कि जो लोग गरीब और सामान्य वर्ग के हैं, बड़ी आयु होने पर उनके प्रति समाज और परिवार का दृष्टिकोण हेय हो जाता है और उनके अंदर भी यह कुंठा घर कर जाती है कि हमारी तो आयु हो गयी है और अब यह जीवन ढोना है और इसका परिणाम यह होता है कि वह समयपूर्व ही जीवन में थकावट अनुभव करते हैं।

अनेक ऐसे भी लोग है जो पचास और साठ की आयु के बाद बीमारी का शिकार हो जाते है और अगर उन्हें योग साधना या ध्यान करने को कहा जाये तो वह अपनी आयु का हवाला देकर इंकार कर देते हैं। कुल मिलाकर वह नकारात्मक भाव का ऐसा शिकार हो जाते हैं जिससे उनकी मुक्ति नहीं हो पाती। पश्चिमी देशों में बड़ी आयु में भी लोग सुबह की सैर और व्यायाम नियमित रूप से करते हैं इसलिये उनका स्वास्थ्य ठीक रहता है जबकि भारत में बुजुर्ग लोग स्थाई बीमारी से शिकार हो जाते है और मान लिया जाता है कि बुढ़ापा तो होता ऐसा ही है।

सभी जानते हैं कि जितनी बीमारियां दिमागी तनाव से पैदा होती है उतनी अन्य किसी से नहीं। ऐसे में अपने अंदर बड़ी आयु का भाव यह सोचकर नहीं पालना चाहिये कि हमारी बीमारियां तो दूर नहीं हो सकतीं। इतना ही नहीं सभी बड़ी के आयु के लोगों को अपनी आयु का विचार किये बिना जीवन में कार्य करते रहना चाहिये। तेजस्वी व्यक्ति पर आयु का प्रभाव नहीं होता और न कभी वह परेशान दिखते हैं। जहां आदमी ने यह सोचा कि अब तो मैं आराम करूंगा वहीं उसका शरीर ढीला और कमजोर पड़ने लगता है और उसके चेहरे की फीकी कांति देखकर लोग उसकी उपेक्षा कर देते हैं। इससे बेहतर यही है कि नियमित रूप से व्यायाम आदि करते रहें ताकि बुढ़ापे में अपने चेहरे का तेज कम न पड़े।
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Friday, February 6, 2009

रहीम संदेश: बुराई का परिणाम अवश्य प्रकट होता है (rahim ke dohe)

रहिमन खोटी आदि की, सो परिनाम लखाय
जैसे दीपक तम भखै, कज्जल वमन कराय


कविवर रहीम कहते हैं कि बुराई होने पर उसका फ़ल अवश्य दिखाई देता है। जैसे दीपक अंधकार को दूर कर देता है, परंतु शीघ्र ही कालिमा उगलने लगता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अक्सर लोग सोचते हैं कि दूसरे से वस्तुऐं मांग कर अपना काम चलायें। ऐसे लोगों में आत्म सम्मान नहीं होता और जिनमें आत्म सम्मान नहीं है वह मनुष्य नहीं बल्कि पशु समान होता है। अक्सर ऐसे लोग हैं जो अपने काम के लिये वस्तु या धन मांगने में संकोच नहीं करते। उनके पास अपना पैसा होता है पर वह उसको बचाने के चक्कर में दूसरे से वस्तुऐं उधार मांग कर काम चलाते हैं। उद्देश्य यही रहता है कि पैसा बचे। ऐसे कंजूस लोग जिंदगी भर पैसा बचाते हैं पर अंततः वह साथ कुछ भी नहीं ले जाते। कोई आदमी कितना भी बड़ा क्यों न हो जब किसी से कोई चीज मांगता है तो वह छोटा हो जाता है और अगर छोटा हो तो उसे भिखारी समझा जाता है। सच बात तो यह है कि मांगने से कोई बड़ा आदमी नहीं बनता बल्कि दान देने से समाज में सम्मान मिलता है।
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Friday, January 30, 2009

भर्तृहरि संदेशः रुखा सूखा हो या स्वादिष्ट भोजन, अंतर क्या पड़ता है?

जीर्णाः कन्था ततः किं सितमलपटं पट्टसूत्रं ततः किं
एका भार्या ततः किं हयकरिसुगणैरावृतो वा ततः किं
भक्तं भुक्तं ततः किं कदशनमथवा वासरान्ते ततः किं
व्यक्तज्योतिर्नवांतर्मथितभवभयं वैभवं वा ततः किम्

हिंदी में भावार्थ-तन पर फटा कपड़ा पहना या चमकदार इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। घर में एक पत्नी हो या अनेक, हाथी घोड़े हों या न हों, भोजन रूखा-सूखा मिले या पकवान खायें-इन बातोंं से कोई अंतर नहीं पड़ता। सबसे बड़ा है ब्रह्मज्ञान जो मोक्ष दिलाता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव ने हमारे देश में भौतिकवाद को प्रोत्साहन दिया है और अब तो पढ़े लिखे हों या नहीं सभी सुख सुविधाओं को जाल में फंसते जा रहे हैं। भारतीय अध्यात्म ज्ञान के बारे में जानते सभी हैं पर उसे धारण करना लोगों को अब पिछड़ापन दिखाई देता है। नतीजा यह है कि समाज में आपसी रिश्ते एक औपचारिकता बनकर रहे गये हैं। अमीर गरीब की के बीच में अगर भौतिक रूप से दूरी होती तो कोई बात नहीं पर यहां तो मानसिक रूप से सभी एक दूसरे से परे हो जा रहे हैं। जिसके पास सुख साधन हैं वह अहंकार में झूलकर गरीब रिश्तेदार को हेय दृष्टि से देखता है तो फिर गरीब भी अब किसी अमीर पर संकट देखकर उसके प्रति सहानुभूति नहीं दिखाता। हम जिस कथित संस्कृति और संस्कार की दुहाई देते नहीं अघाते वह केवल नारे बनकर रहे गये हैं और धरातल पर उनका अस्तित्व नहीं रह गया है।

जिसके पास धन है वह इस बात से संतुष्ट नहीं होता कि लोग उसका सम्मान इसकी वजह से करते हैं बल्कि वह उसका समाज में प्रदर्शन करता है। धनी लोग अपने इसी प्रदर्शन से समाज में जिस वैमनस्य की धारा प्रवाहित करते हैं उसके परिणाम स्वरूप सभी समाज और समूह नाम भर के रहे गये हैं और उसके सदस्यों की एकता केवल दिखावा बनकर रह गयी है।

जिस तत्वज्ञान की वजह से हमें विश्व में अध्यात्म गुरु माना जाता है उसे स्वयं ही विस्मृत कर हम भारी भूल कर रहे हैं। शरीर पर कपड़े कितने चमकदार हों पर अगर हमारी वाणी में ओज और चेहरे पर तेज नहीं हो तो उसका कोई प्रभाव नहीं होता। काम चलने को तो दो रोटी से भी चल जाये पर जीभ का स्वाद ऐसा है कि अभक्ष्य और अपच भोजन को ग्रहण कर अपने शरीर में बीमारियों को आमंत्रित करना होता है। सोचने वाली बात यह है कि अपना पेट तो पशु भी भर लेते हैं फिर अगर हम ऐसा करते हैं तो कौनासा तीर मार लेते हैंं। मनुष्य जीवन में भक्ति और ज्ञान प्राप्त करने की सुविधा मिलती है पर उसका उपयोग नहीं कर हम उसे ऐसे ही नष्ट कर डालते हैं। ऐसे में वह ज्ञानी धन्य है जो दाल रोटी खाकर पेट भरते हुए भगवान भजन और ज्ञान प्राप्त करने के लिये समय निकालते हैं।
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Wednesday, January 28, 2009

भर्तृशतकः विषय हमें छोड़े इससे पहले उनको छोड़ दो

अवश्यं यातारिश्चतरमुषित्वाऽपि विषया वियोगे को भेदस्त्यजति न जनो यत्स्वयममून्।
व्रजन्तः स्वातंत्र्यादतुलपरितापाय मनसः स्वयं त्यक्ता ह्येते शमसुखमनन्तं विदधति।


हिन्दी में भावार्थ-अपने जीवन में हम कितना भी विषय को भोगें पर एक दिन वह छोड़ देते हैं। यह विचार करते हुए हम उनसे स्वयं ही अलग क्यों न हो जायें? मनुष्य जब विषयों को निरंतर भोगता है और जब उनके अलग होने पर बहुत मानसिक कष्ट झेलता है पर जब वह स्वयं त्याग करता है तो उससे सुख की अनुभुति होती है और उनके अलग होने की पीड़ा का उसे अनुभव नहीं होता।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस चराचर जगत में सभी वस्तुऐं और विषय नष्ट प्रायः हैं। कभी न कभी उनसे साथ छूटता है। यह जीवन धारा की तरह बहता जाता है और कहीं एक ठिकाना पकड़ कर बैठना संभव नहंी है पर इंसान अपने सुखों के पल को पकड़े रखना चाहता है और इसी प्रयास में वह विषयों के फेरे में पड़ा रहता है। इंसान के मन में सुख भोगने की इच्छा उसे अज्ञान क अंधेरे में डालती है और जिससे कई ऐसे विषयों, वस्तुओं और व्यक्तियों में मोह डाल लेता है जिनसे उसका बिछड़ना तय है। परिवार,मित्र,रिश्तेदार और व्यवसाय कभी न कभी साथ छोड़ते हैं और उस समय आदमी के मन में भारी संताप उत्पन्न होता है। यह जरूरी नहीं है कि जीवन के नष्ट होने पर ही उनसे बिछोह होता है बल्कि जीवन काल में भी ऐसा अवसर आ जाता है। बच्चों में आदमी का मोह होता है पर जब अपनी नौकरी और व्यापार के लिये मां बाप का साथ छोड़ जाते हैं। वह उच्च स्थान पर स्थापित होते है तो मां बाप समाज में अपना सम्मान समझते हैं पर जब कोई परेशानी का समय आता है तो उन्हीं बच्चो की पास में अनुपस्थिति उनको अखरती है।
यह मोह का परिणाम ही है। आदमी एक व्यवसाय या नौकरी में स्थायित्व ढूंढता है पर वह आजकल के समय में यह संभव नही है। कभी मंदी का दौर हो तो बड़े व्यवसाय डांवाडोल हो जाते हैं।

इनसे बचने का एक ही उपाय है कि मन में निष्काम और निर्लिप्तता का भाव रहे। जब हम कोई काम करें तो उससे अधिक आशा न करें या अवसर पड़े तो बदल दें। अगर जीवन में बहुत सारा धन कमा लिया है तो फिर व्यापार और नौकरी से स्वयं को प्ृथक कर लें क्योंकि उनसे कभी अलग होना है तो क्यों न स्वेच्छा से अलग हुआ जाये। ब्रच्चे अगर बाहर जातेे हैं तो समझ लेना चाहिये कि अब उनकी निकटता अधिक नहीं मिलगी और अपने जीवन में इस बदलाव के साथ जीना चाहिये।
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