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Friday, May 21, 2010

संत कबीर दास के दोहे-प्रेम के घर तक पहुंचना आसान नहीं (prem ka ghar-sant kabir vani)

प्रीति बहुत संसार में, नाना विधि की सोय
उत्तम प्रीति सो जानिए, सतगुरू से जो होय
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में प्रेम करने वाले बहुत हैं और प्रेम करने के अनेक तरीके  और विधियां भीं हैं पर सच्चा प्रेम तो वही है जो परमात्मा से किया जाये।
जब लग मरने से डरैं, तब लगि प्रेमी नाहिं
बड़ी दूर है प्रेम घर, समझ लेहू मग माहिं
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब तक मृत्यु का भय है तब तक प्रेम हो नहीं सकता हैं प्रेम का घर तो बहुत दूर है और उसे पाना आसान नहीं है।
वर्तमान  सन्दर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे जन जीवन में फिल्मों का प्रभाव अधिक हो गया है जिसमें प्रेम का आशय केवल स्त्री पुरुष के आपस संबंध तक ही सीमित हैं। सच तो यह है कि अब कोई पिता अपनी बेटी से और भाई अपनी बहिन से यह कहने में भी झिझकता है कि ‘मैं तुमसे प्रेम करता हूं’ क्योंकि फिल्मी में नायक-नायिका के प्रेम प्रसंग लोगों के मस्तिष्क में इस तरह छाये हुए हैं कि उससे आगे कोई सोच ही नहीं पाता। किसी से कहा जाये कि मैं तुमसे प्रेम करता हूं तो उसके दिमाग में यह आता है कि शायद यह फिल्मी डायलाग बोल रहा हैं। वैसे इस संसार में प्रेम को तमाम तरह की विधियां हैं पर सच्चा प्रेम वह है जो भगवान भक्ति और स्मरण के रूप में किया जाये। प्रेम करो-ऐसा संदेश देने वाले अनेक लोग मिल जाते हैं पर किया कैसे किया जाये कोई नहीं बता सकता। प्रेम करने की नहीं बल्कि हृदय में धारण किया जाने वाला भाव है। उसे धारण तभी किया जा सकता है जब मन में निर्मलता, ज्ञान और पवित्रता हो। स्वार्थ पूर्ति की अपेक्षा में किया जाने वाला प्रेम नहीं होता यह बात एकदम स्पष्ट है।
अगर किसी आदमी के भाव में निच्छलता नहीं है तो वह प्रेम कभी कर ही नहीं सकता। हम प्रतिदिन व्यवहार में सैंकड़ों लोगों से मिलते हैं। इनमें से कई अपने व्यवहार से खुश कर देते हैं और स्वाभाविक रूप उनके प्रति प्र्रेम भाव आता है पर अगर उनमें से अगर किसी ने गलत व्यवहार कर दिया तो उस पर गुस्सा आता है। इससे जाहिर होता है कि हम उससे प्रेम नहीं करते। प्रेम का भाव स्थाई है जिससे किया जाता है उसके प्रति फिर कभी मन में दुर्भाव नहीं आना चाहिए।
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संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक भारतदीप
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Wednesday, May 19, 2010

भर्तृहरि नीति शतक-बदलाव दुनिया का स्वाभाविक नियम (badlav ka niyam-hindu dharma sandesh)

महाराज भर्तृहरि अपने जीवन के अनुभवों के आधार पर कहते हैं 
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परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते
स जातो येन जातेन याति वंशः समुन्नतिम्

हिंदी में भावार्थ-परिवर्तन होते रहना संसार का नियम। जो पैदा हुआ है उसकी मृत्यु होना निश्चित है। जन्म लेना उसका ही सार्थक है जो अपने कुल की प्रतिष्ठा में वृद्धि करता है अर्थात समस्त समाज के लिये ऐसे काम करता है जिससे सभी का हित होता है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अगर आदमी को किसी से भय लगता है तो वह अपने आसपास परिवर्तन आने के  से। उसे लगता है कि कोई उसकी जगह लेगा और उसका असितत्व मिट जाएगा।  कहीं भाषा तो कहीं धर्म और कहीं क्षेत्र के विवाद आदमी के हृदय में व्याप्त इसी भय की भावना का दोहन करने की दृष्टि से उन समूहों  के प्रमुख  उपयोग करते हैं। कई लोगों के हृदय में ऐसे भाव आते है जैसे- अगर पास का मकान बिक गया तो लगता है कि पता नहीं कौन लोग वहां रहने आयेंगे और हमसे संबंध अच्छे रखेंगे कि नहीं। उसी तरह कई लोग स्थान परिवर्तन करते हुए भय से ग्रस्त होते हैं कि पता नहीं कि वहां किस तरह के लोग मिलेंगे। जाति के आधार पर किसी दूसरे जाति वाले का भय पैदा किया जाता है कि अमुक जाति का व्यक्ति अगर यहां आ गया तो हमारे लिए विपत्ति खड़ी कर सकता है। अपने क्षेत्र में दूसरे क्षेत्र से आये व्यक्ति का भय पैदा किया जाता है कि अगर वह यहाँ जम गया तो हमारा अस्तित्व खत्म कर देगा। कहने का अभिप्राय यह है कि बदलाव इस दुनिया का स्वाभाविक नियम है। कुछ  बुद्धिजीवी समाज में बदलाव लाने के लिए प्रयत्नशील दीखते हैं। कोई जातिपति मिटा रहा है तो कोई गरीबी से लड़ रहा है कोई अन्याय के विरुद्ध अभियान चला रहा है, यह सब दिखावा है। प्रकृति समय के अनुसार स्वत: बदलाव लाती है और मनुष्य के बूते कुछ नहीं है सिवाय दिखावा करने के।
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संकलक,लेखक  एवं संपादक-दीपक भारतदीप
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Wednesday, May 12, 2010

संत कबीरदास के दोहे-मित्रता से भक्ति और सत्संग में बाधा आती है (bhakti aur satsang-kabir das ji ke dohe)

दुनिया सेती दोसती, होय भजन के भंग।
एका एकी राम सों, कै साधुन के संग।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि दुनिया के लोगों के साथ मित्रता बढ़ाने से भगवान की भक्ति में  बाधा आती है। एकांत में बैठकर भगवान राम का स्मरण करना चाहिये या साधुओं की संगत करना चाहिए तभी भक्ति प्राप्त हो सकती है।
ऊजल पहिनै कापड़ा, पान सुपारी खाय।
कबीर गुरु की भक्ति बिन, बांधा जमपुर जाय।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि लोग साफ-सुथरे कपड़े पहन कर पान और सुपारी खाते हुए जीवन व्यतीत करते हैं। गुरु की भक्ति के बिना उनका जीवन निरर्थक व्यतीत करते हुए मृत्यु को प्राप्त होते हैं
वर्तमान संदर्भ में सम्पादकीय  व्याख्या-भक्ति लोग अब जोर से शोर मचाते हुए कर रहे हैं। मंदिरों और प्रार्थना घरों में फिल्मी गानों की तर्ज पर भजन सुनकर लोग ऐसे नृत्य करते हैं मानो वह भगवान की भक्ति कर रहे हैं। समूह बनाकर दूर शहरों में मंदिरों में स्थित प्रतिमाओं के दर्शन करने जाते हैं। जबकि इससे स्वयं और दूसरों को दिखाने की भक्ति तो हो जाती है, पर मन में संतोष नहीं होता। मनुष्य भक्ति करता है ताकि उसे मन की शांति प्राप्त हो जाये पर इस तरह भीड़भाड़ में शोर मचाते हुए भगवान का स्मरण करना व्यर्थ होता है क्योंकि हमारा ध्यान एक तरफ नहीं लगा रहता। सच तो यह है कि भक्ति और साधना एकांत में होती है। जितनी ध्यान में एकाग्रता होगी उतनी ही विचारों में स्वच्छता और पवित्रता आयेगी। अगर हम यह सोचेंगे कि कोई हमारे साथ इस भक्ति में सहचर बने तो यह संभव नहीं है। अगर कोई व्यक्ति साथ होगा या हमारा ध्यान कहीं और लगेगा तो भक्ति भाव में एकाग्रता नहीं आ सकती। अगर हम चाहते हैं कि भगवान की भक्ति करते हुए मन को शांति मिले तो एकांत में साधना का प्रयास करना चाहिए।
कहने का अभिप्राय यह है कि भक्ति और सत्संग का मानसिक लाभ तभी मिल सकता है जब उसे एकांत में किया जाये। अगर शोर शराबे के साथ भीड़ में भक्ति या भजन गायेंगे तो फिर न केवल अपना ध्यान भंग होगा बल्कि दूसरे के कानों में भी अनावश्यक कटु स्वर का प्रसारण करेंगे। 
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संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Monday, May 10, 2010

रहीम संदेश-सुख दुःख तो चौसर की गोट की तरह हैं (rahim ke dohe-sukh dukh)

जब लगि जीवन जगत में, सुख दुख मिलन अगोट
रहिमन फूटे ज्यों, परत दुहुंन सिर चोट
कविवर रहीम कहते हैं कि इस जगत में जीवन है तब तक सुख और दुख और मिलते रहेंगे। यह ऐसे ही जैसे चौसर  की गोट को गोट मारने से दोनो के सिर पर चोट लगती है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस संसार में दुःख और सुख दोनों ही रहते हैं। जिस तरह किसी भी खेल में दो खिलाड़ी होते हैं तभी खेल हो पाता है उसी तरह ही जीवन की अनुभूति भी तभी हो पाती है जब दुख और सुख आते हैं। सूरज डूबता है तभी आकाश में समस्त तारे और चंद्रमा दिखाई पड़ता ह। अगर यह प्रकृति द्वारा निर्मित चक्र घूमे नहीं तो हमें दिल औ रात का पता ही न चले-ऐसे मे क्या यह एकरसता हमें तकलीफ नहीं देगी?
गर्मी के दिनों में भी जब हम कूलर में बैठे रहते हैं तो घबड़ाहट होने लगती है और उस समय भी थोड़ी घूप का सेवन  केवल हमें राहत देता है। गर्मी में धूप कितनी कठोर और दुखःदायी लगती है पर कूलर में भी बहुत देर तक बैठना दुखदायी हो जाता है। इस तरह यह दुख सुख का चक्र है। यह देखा जाये तो यह वास्तव में भ्रम भी है। दुख और सुख मन के भाव हैं। इसलिये अगर हमारे साथ जो परेशानियां हैं उनको सहज भाव से लें तो हमें दुख की अनुभूति नहीं होगी। अगर हम इस चक्र को लेकर प्रसन्न या दुखी होंगे तो उससे मस्तिष्क में तनाव उत्पन्न होता है जो कि वास्तव में कई रोगों का जनक है और उसका इलाज किसी के पास नहीं है। कहने का अभिप्राय यह है कि दुःख सुख तो मनस्थिति के अनुसार अनुभव होते हैं, पर हम सृष्टि के इस सत्य को नहीं समझ पाते और सुख मिलने पर उछलने लगते हैं और दुःख होने पर तनाव से घिर जाते हैं।
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संकलक, लेखक तथा संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर
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Saturday, May 8, 2010

संत कबीर के दोहे-अपनी मति नहीं तो बड़े होने से क्या लाभ (bade hone se kya labh-hindu dharma sandesh)

हाथी चढि के जो फिरै, ऊपर चंवर ढुराय
लोग कहैं सुख भोगवे, सीधे दोजख जाय
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहत हैं कि तो हाथी पर चढ़कर अपने ऊपर चंवर डुलवाते हैं और लोग समझते हैं कि वह सुख भोग रहे तो यह उनका भ्रम है वह तो अपने अभिमान के कारण सीधे नरक में जाते हैं।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जोरे बड़ मति नांहि
जैसे फूल उजाड़ को, मिथ्या हो झड़ जांहि
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि आदमी धन, पद और सम्मान पाकर बड़ा हुआ तो भी क्या अगर उसके पास अपनी मति नहीं है। वह ऐसे ही है जैसे बियावन उजड़े जंगल में फूल खिल कर बिना किसी के काम आये मुरझा जाता है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-समय ने ऐसी करवट ली है कि इस समय धर्म और जनकल्याण के नाम पर भी व्यवसाय हो गया है। इस मायावी दुनियां में यह पता ही नहीं लगता कि सत्य और माया है क्या? जिसे देखो भौतिकता की तरफ भाग रहा है। क्या साधु और क्या भक्त सब दिखावे की भक्ति में लगे हैं। राजा तो क्या संत भी अपने ऊपर चंवर डुलवाते हैं। उनको देखकर लोग वाह-वाह करते हैं। सोचते हैं हां, राजा और संत को इस तरह रहना चाहिये। सत्य तो यह है कि इस तरह तो वह भी लोग भी भ्रम में हो जाते हैं और उनमें अहंकार आ जाता है और दिखावे के लिये सभी धर्म करते हैं और फिर अपनी मायावी दुनियां में अपना रंग भी दिखाते हैं। ऐसे लोग पुण्य नहीं पाप में लिप्त है और उन्हें भगवान भक्ति से मिलने वाला सुख नहीं मिलता और वह अपने किये का दंड भोगते हैं।
यह शाश्वत सत्य है कि भक्ति का आनंद त्याग में है और मोह अनेक पापों को जन्म देता है। सच्ची भक्ति तो एकांत में होती है न कि ढोल नगाड़े बजाकर उसका प्रचार किया जाता है। हम जिन्हें बड़ा व्यक्ति या भक्त कहते हैं उनके पास अपना ज्ञान और बुद्धि कैसी है यह नहीं देखते। बड़ा आदमी वही है जो अपनी संपत्ति से वास्तव में छोटे लोगों का भला करता है न कि उसका दिखावा। आपने देखा होगा कि कई बड़े लोग अनेक कार्यक्रम गरीबों की भलाई के लिये करते हैं और फिर उसकी आय किन्हीं कल्याण संस्थाओं को देते हैं। यह सिर्फ नाटकबाजी है। वह लोग अपने को बड़ा आदमी सबित करने के लिये ही ऐसा करते हैं उनका और कोई इसके पीछे जनकल्याण करने का भाव नहीं होता।
कभी कभी तो लगता है कि जनकल्याण का नारा देने वाले लोग बड़े पद पर प्रतिष्ठत हो गये हैं पर लगता नहीं कि उनके पास अपनी मति है क्योंकि वह दूसरों की राय लेकर काम करने आदी हो गये हैं। ऐसे लोगों के लिये कल्याण तो बस दिखावा है वह तो उसके नाम पर सुख तथा एश्वर्य प्राप्त करने में ही अपने को धन्य समझते हैं।
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Wednesday, April 28, 2010

रहीम के दोहे-कमाने के लिये दूसरे के घर में सिर झुकाना बुरा लगता है (kamane ke vaste desh se bahar jana-rahim ke dohe)

भला भयो घर से छुट्यो, हंस्यो सीस परिखेत
काके काके नवत हम, अपन पेट के हेत
कविवर रहीम कहते हैं कि घर से छूटकर दूसरी जगह पर कमाना बहुत अच्छा लगता है पर इसके लिये वहां पर दूसरों के आगे सिर नवाना पड़ता है और हमारे ऊपर बैठा सबका रक्षक परमात्मा हंसता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सच तो यह है कि रोटी की बाध्यता के कारण आदमी को अपने गांव, शहर, प्रदेश या देश छोड़ना पड़ता है वरना कौन बाहर जाना चाहता है। अलबत्ता अब प्रवृत्ति बदल गयी है कि भविष्य के विकास के नाम पर लोग बाहर जाने के सपने देखते हैं। भौतिक उपलब्धता को ही विकास का पर्याय मान लिया गया है। दूसरा यह भी है कि हमारे देश की शिक्षा पद्धति अब तो ऐसी हो गयी है कि आदमी नौकरी ही कर सकता है और वह अपने देश में उपलब्ध नहीं है। इसलिये विश्व में जहां की धनी स्वामी है उनकी तरफ हमारे देश के शिक्षित तकनीकी विशेषज्ञ आकर्षित रहते हैं। वहां पहुंचने पर ही उनको इस बात की सच्चाई पता लगती है कि सब कुछ अपने देश जैसा नहीं है। देखने और सुनने में आता है कि जो लोग यूरोप,अमेरिका, ब्रिटेन तथा आस्ट्रेलिया वगैरह गये हैं वह तो फिर भी ठीक हैं पर जिनको मध्य एशिया के देशों में रहना पड़ रहा है वह इतने प्रसन्न नहीं है।
सबसे बड़ी समस्या धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों को आती है। विदेशों में चाहे जितना आकर्षण हो पर वहां की अध्यात्मिक स्थिति यहां से भिन्न है। अनेक देशों में तो भारतीय धर्म की पूजा पद्धति ही स्वीकार नहीं की जाती। ऐसे में वहां के लोग धन तो कमाते हैं पर उनका मन हमेशा ही अपने देश के खुलेपन को याद करता है। इसलिये जिनकी प्रवृत्ति अध्यात्मिक है उनको अपने देश में अगर सूखी रोटी भी मिलती है तो उनको विदेश का मुंह नहीं ताकना चहिये।
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Tuesday, January 12, 2010

भर्तृहरि शतक-अपना लक्ष्य बीच में नहीं छोड़ें (hindu dharm sandesh-apna lakshya

 रत्नैर्महाहैंस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरेभीमविषेण भीतिम्।

सुधा विना न प्रययुर्विरामं न निश्चिततार्थाद्विरमन्ति धीराः।।

हिन्दी में भावार्थ-
समुद्र मंथन करने से देवता लोग अनमोल रत्न पाकर भी प्रसन्न नहीं हुए। भयंकर विष भी निकला पर उनको उससे भय नहीं हुअ और न ही वह विचलित हुए। जब तक अमृत नहीं मिला तब तक वह समुद्र मंथन के कार्य पर डटे रहे। धीर, गंभीर और विद्वान पुरुष जब तक अपना लक्ष्य नहीं प्राप्त हो तब अपना कार्य बीच में नहीं छोड़ते
।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-वैसे तो जीवन में अपना लक्ष्य तक करना बहुत कठिन है क्योंकि लोग अपने विवेक से कुछ नया करने की बजाय दूसरे की उपलब्धियों को देखकर ही अपना काम प्रारंभ करते हैं। अगर तय कर लिया तो फिर उस पर निरंतर चलना कठिन है।  होता यह है कि दूसरे की उपलब्धि देखकर वैसे बनने की तो कोई भी ठान लेता है पर उसने अपने लक्ष्य पाने में क्या पापड़ बेले यह किसी को नहीं दिखाई देता।  उसने लक्ष्य प्राप्ति के लिये कितना परिश्रम करते हुए अपमान और तिरस्कार सहा होगा यह वही जानते है।  जिन्होंने  बड़ी उपलब्धि प्राप्त की है उसके पीछे उनका धीरज और एकाग्रता बहुत बड़ा योगदान होता है।

इसके अलावा एक बात यह भी है कि बहुत कम लोगों में धीरज होता है। आज कल संक्षिप्त मार्ग से उपलब्धि प्राप्त करने की परंपरा चल पड़ी है। अगर किसी युवक को धीरज या शांति से काम करने का उपदेश दें तो वह यही कहते हैं कि‘आजकल तो फटाफट का जमाना है।’

वह लगे रहते हैं फटाफट उपलब्धि प्राप्त करने में  पर वह कभी लक्ष्य प्राप्त नहीं कर पाते।  अनेक युवक इसी तरह अपराध मार्ग पर चले जाते हैं।  उसके परिणाम बुरे होते हैं।

जिनको अपना जीवन सात्विक ढंग से शांतिपूर्वक बिताना है उनको समुद्र मंथन के अध्यात्मिक धार्मिक उदाहरण से प्रेरणा लेना चाहिये।


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Tuesday, December 22, 2009

विदुर नीति-अधिक धन होने पर भी अनुशासन रखना जरूरी (dhan aur anushasan-hindu dharam sandesh)

विदुर नीति में कहा गया है कि
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धर्मार्थोश्यः परित्यज्य स्यादिन्द्रियवशानगुः।
श्रीप्राणधनदारेभ्यः क्षिप्र स परिहीयते।।

           
हिन्दी में भावार्थ- जो मनुष्य धर्म और अर्थ इंद्रियों के वश में हो जाता है वह शीघ्र ही अपने ऐश्वर्य, प्राण, धन, स्त्री को अपने हाथ से गंवा बैठता है।
अर्थानामीश्वरो यः स्यादिन्द्रियाणमीनश्वरः।
इन्द्रियाणामनैश्वर्यर्दिश्वर्याद भ्रश्यते हि सः।।

     हिन्दी में भावार्थ-अधिक धन का स्वामी होने भी इंद्रियों पर अधिकार करने की बजाय उसके वश में हो जाने वाला भी मनुष्य ऐश्वर्य से भ्रष्ट हो जाता है।
     वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अनेक लोगों को यह लगता है कि अगर अधिक धन आ गया तो जैसे सारा संसार जीत लिया। इस भ्रम में अनेक लोग धन के कारण अनुशासहीनता पूर्वक जीवन व्यतीत करने लगते हैं जिसका परिणाम यह होता है कि शीघ्र ही न केवल अपना वैभव गंवाते हैं बल्कि कहीं कहीं उनको शारीरिक हानि भी झेलनी पड़ती हैं। जीवन में दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये धन का होना जरूरी है। अधिक धन है तो भी समाज में सम्मान प्राप्त होता है पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि अनुशासनहीनता बरती जाये। ऐसे ढेर सारे उदाहरण है जिसमें अनेक धनपतियों की औलादें मदांध होकर ऐसे अपराधिक कार्य इस आशय से करती हैं कि उनके पालक धन से कानून खरीद लेंगे। ऐसा होता भी है पर उसकी एक सीमा होती है जहां उसका अतिक्रमण होता है वहां फिर सींखचों के अंदर भी जाना पड़ता है। इस समय ऐसा दौर भी है जिसमें धनपति स्वयं और उनकी औलादें समाज में अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिये अनुशासन हीनता दिखाते हैं। धन उनकी आंखों बंद कर देता है और उनको यह ज्ञान नहीं रहता कि आजकल प्रचार माध्यम सशक्त हो गये हैं जिनकी वजह से हर समाचार बहुत जल्दी ही लोगों तक पहुंचता है। भले ही यह प्रचार माध्यम भी धनपतियों के हैं पर उनको अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिये सनसनीखेज खबरों की आवश्यकता होती है और ऐसे में किसी धनी, प्रतिष्ठित या बाहुबली द्वारा किसी प्रकार के अपराध की जानकारी मिलने पर उसे जोरदार ढंग से प्रसारित भी करते हैं।
कहने का तात्पर्य यह है कि अब वह समय चला गया जब धन और वैभव का प्रदर्शन करने के लिये अनुशासनहीनता बरतना आवश्यक लगता था।
      आदमी के पास चाहे कितना भी धन हो उसे जीवन में अनुशासन अवश्य रखना चाहिये। याद रहे धन की असीमित शक्ति है पर देह की सीमायें हैं और किसी प्रकार की अनुशासनहीनता का दुष्परिणाम उसे ही भोगना पड़ता है। संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Sunday, December 13, 2009

संत कबीर वाणी-निंदक तो नकटा होता है (nindak bura hota hai-sant kabir vani)

निन्दक ते कुत्ता भला, हट कर मांडे शर
कुत्ते ते क्रोधी बुरा, गुरू दिलावै गार।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी का कहना है कि निन्दक से कुत्ता भला है जो दूर होकर भौंकता है। इतना ही नहीं कुत्ते से बुरा वह क्रोधी व्यक्ति है जो अपने गुरु को अपने आचरण के कारण गाली पड़वाता है।
निन्दक तो है नाक बिन, सोहै नकटो मांहि।
साधूजन गुरुभक्त जो, तिनमें सोहै नांहि।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी के मतानुसार निन्दक तो बिना नाक वाला है। वह नकटों में ही शोभा पता है। जो साधु प्रवृत्ति के लोग हैं वह नकटों में नहीं शोभा पा सकता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य की यह स्वाभाविक प्रवृत्ति है कि वह दूसरे की निंदा कर अपने को श्रेष्ठ साबित करता है। यह इतनी स्वाभाविक है कि इसका आभास थोड़ा बहुत अध्यात्मिक ज्ञान रखने को भी घेर लेती है। किसी दूसरे के दुर्गुण का बखान या पीड़ा का मजाक उड़ाना अत्यंत निकृष्ट कार्य है पर इससे कौन बच पाता है। स्थिति यह है कि आजकल प्रचार माध्यमों में दूसरे के दोषों या पीड़ाओ का बखान एक व्यवसायिक प्रवृत्ति बन गयी है। अपने दोष कोई नहीं देखता। दूसरे के व्यक्तित्व का नकारात्मक अध्ययन कर लोग बहुत प्रसन्न होते हैं जबकि आत्ममंथन कर अपने दोष देखने का काम किसी को न करना आता न ही करना चाहते हैं। कहना चाहिये कि हम एक तरह से नकटे समुदाय के सदस्य हैं।
अक्सर लोग कुत्ते को लेकर तमाम तरह की टिप्पणियां करते हैं पर उसका यह गुण है कि वह दूर होकर भौंकता है पर काटता नहीं जबकि इंसान की स्थिति तो उससे भी बदतर है कि वह न केवल पास रहकर भी दूसरे के सामने निंदा करता है और जरूरत समझे तो एक ही थाली में खाकर विश्वासघात भी करता है। सच बात तो यह है कि दूसरे की निंदा करना ही एक पाप है। यह अलग बात है कि इसका ज्ञान तो सभी देते हैं पर इस राह पर बड़े बड़े संत भी नहीं चल पाते। जिसे मनुष्य जीवन का पूरा आनंद प्राप्त करना है वह अगर परनिंदा छोड़ दे तो इस धरती पर ही स्वर्ग की अनुभूति अनुभव करता है।
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Tuesday, November 10, 2009

संत कबीर वाणी-आशायें नहीं मरी तो योग साधना से क्या लाभ (yogsadhna aur ashaen-sant kabir das)

आसन मारे कह भयो, मरी न मन की आस।
तेली करे बैल, ज्यों, घर ही कोस पचास।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि आसन लगाकर ध्यान आदि करने से क्या लाभ यदि मन की आशायें नहीं मरी। यह तो ऐसे ही हुआ जैसे कि तेली का बैल अपने घर में पचास कोस की परिक्रमा कर लेता है।
सब आसन आसा तनै, निबरन कोई नांहि।
निवृत्ति को जानै नहीं, प्रवृत्ति प्रपंचहि मांहि।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब आसन करने से भी आशायें निवृत नहीं होती तो उसका लाभ सीमित है। मन की निवृत्ति का जाने और प्रपंचों से मुक्ति के बिना सभी आसन व्यर्थ हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-योग साधना केवल योगासन और प्राणायम करना ही नहीं है। उसके साथ धारणा और ध्यान का भी बहुत महत्व है। योगासन के साथ अगर तत्व ज्ञान जानने का प्रयास नहीं किया जाता तो सब व्यर्थ है। वैसे आजकल योग साधना को केवल स्वास्थ्य तक ही सीमित रखकर प्रचारित किया जा रहा है जिसमें कुछ लोगों का व्यवसायिक उद्देश्य है। अगर आदमी केवल अपने जीवन में स्वस्थ होकर फिर योग भूल जाये या न करे तो भी लाभ नहीं है। फिर आदमी अगर अपने समाज के लिये किसी मतलब का नहीं तो उसका भी क्या लाभ?
वैसे हर योग साधक को श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन करना चाहिये। उसमें जो तत्व ज्ञान है वही इस संसार को समझने के लिये पर्याप्त है। स्वस्थ समाज तो तब भी था जब भोग विलास के साधन नहीं थे पर समाज के लिये काम करने वाले लोग कितने रहे। योगासन और प्राणायम से देह और मन के विकास तो निकलते हैं पर इस शुद्धता का भाव हमेशा स्थाई बना रहे इसके लिये तत्व ज्ञान का होना जरूरी है। इसलिये भारतीय धर्म ग्रंथों में स्वर्ग से प्रीति रखने वाले वाक्यों को छोड़कर अन्य अच्छी बातों को ग्रहण करते हुए उन पर आपस चर्चा करना भी अच्छा है।
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Friday, November 6, 2009

संत कबीर वाणीः दौलत की वजह से सभी प्यार करते हैं (kabir ke dohe-daulat aur pyar)

गुणवेता और द्रव्य को, प्रीति करै सब कोय
कबीर प्रीति सो जानिये, इनसे न्यारी होय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि गुणवेताओ-चालाक और ढोंगी लोग- और धनपतियों से तो हर कोई प्रेम करता है पर सच्चा प्रेम तो वह है जो न्यारा-स्वार्थरहित-हो।

प्रेम-प्रेम सब कोइ कहैं, प्रेम न चीन्है कोय
जा मारग साहिब मिलै, प्रेम कहावै सोय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रेम करने की बात तो सभी करते हैं पर उसके वास्तविक रूप को कोई समझ नहीं पाता। प्रेम का सच्चा मार्ग तो वही है जहां परमात्मा की भक्ति और ज्ञान प्राप्त हो सके।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-टीवी चैनलों और पत्र पत्रिकाओं में आजकल प्रेम पर बहुत कुछ दिखाया और लिखा जाता है। यह प्रेम केवल स्त्री पुरुष के निजी संबंध को ही प्रोत्साहित करता है। हालत यह हो गयी है कि अप्रत्यक्ष रूप से विवाहेत्तर या विवाह पूर्व संबंधों का समर्थन किया जाने लगा है। यह क्षणिक प्रेम एक तरह से वासनामय है मगर आजकल के अंग्रेजी संस्कृति प्रेमी और नारी स्वतंत्रता के समर्थक विद्वान इसी प्रेम में शाश्वत जीवन की तलाश कर हास्यास्पद दृश्य प्रस्तुत करते हैं। एक मजे की बात यह है कि एक तरफ सार्वजनिक स्थलों पर प्रेम प्रदर्शन करने की प्रवृति को स्वतंत्रता के नाम पर प्रेमियों की रक्षा की बात की जाती है दूसरी तरफ प्रेम को निजी मामला बताया जाता है। कुछ लोग तो कहते हैं कि सब धर्मों से प्रीति का धर्म बड़ा है। अब अगर उनसे पूछा जाये कि इसका स्वरूप क्या है तो कोई बता नहीं पायेगा। इस नश्वर शरीर का आकर्षण धीमे धीमे कम होता जाता है और उसके साथ ही दैहिक प्रेम की आंच भी धीमी हो जाती है। इसलिए कहा जाता है कि सच्चा प्रेम केवल परमात्मा से किया जा सकता है।

वैसे सच बात तो यह है कि प्रेम तो केवल परमात्मा से ही हो सकता है क्योंकि वह अनश्वर है। हमारी आत्मा भी अनश्वर है और उसका प्रेम उसी से ही संभव है। परमात्मा से प्रेम करने पर कभी भी निराशा हाथ नहीं आती जबकि दैहिक प्रेम का आकर्षण जल्दी घटने लगता है। जिस आदमी का मन भगवान की भक्ति में रम जाता है वह फिर कभी उससे विरक्त नहीं होता जबकि दैहिक प्रेम वालों में कभी न कभी विरक्ति हो जाती है और कहीं तो यह कथित प्रेम बहुत बड़ी घृणा में बदल जाता है।
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Sunday, November 1, 2009

चाणक्य नीति-स्नेह करना दु:ख का मूल कारण (sneh dukh ka karan-chankya niti in hindi

यस्य स्नेहो भयं तस्य स्नेहो दुःखस्य भाजनम्।
स्नेहमूलानि दुःखानि तानि त्यक्तवा वसेत्सुखम्।।
हिंदी में भावार्थ-
जहां स्नेह हैं वही दुःख है। स्नेह ही दुःख की उत्पत्ति का कारण है। स्नेह ही दुःख का मूल है। जिसने स्नेह को त्याग दिया वही सुखी रहता है।
सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया स्वसा।
शांतिः पत्नी क्षमा पुत्रः षडेते मम बान्धवाः।।
हिंदी में भावार्थ-
इस जीवन में सत्य माता, ज्ञान पिता, धर्म भाई और दया बहिन समान है। मन की शांति पत्नी और क्षमा पुत्र समान है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान जीवन के सत्य को प्रवाहित करने वाला स्त्रोत है जिसमें आत्मा को सर्वोपरि बताया गया है। समूचे जीवों से प्रेम करना धर्म है और कमजोर और निरीह पर दया करना सबसे बड़ा पुण्य है। मगर अनेक कथित साधु संतों समाज में अपना प्रभाव बनाये रखने के लिये मनुष्य को रिश्तों में बंधे रहकर केवल उनके निर्वाह के लिये प्रेरित करते है ताकि उनकी छबि समाज सुधारक के रूप में बनी रहे।
नीति विशारद चाणक्य स्पष्ट कहते हैं कि सत्य ही माता के समान है और ज्ञान ही पिता तुल्य है। भाई के समान धर्म और बहिन के समान दया है। मन की शांति पत्नी और क्षमा पुत्र समान है। अर्थात आध्यात्मिक ज्ञान के लिये हमेशा प्रयत्नशील रहना चाहिए। अपने रिश्तों के साथ निर्वाह करना ठीक है पर उनके प्रति अधिक मोह पालना ठीक नहीं है। यह मोह न केवल आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्ति में बाधा पहुंचाता है बल्कि सांसरिक गतिविधियों में इस तरह लिप्त करता है कि उससे मन और देह में केवल विकार और अशांति ही पैदा होती है। तथाकथित विद्वानों और संतों ने ऐसे अनेक कर्मकांडों को धर्म का हिस्सा बना दिया है जो केवल आदमी के मोह को बढ़ाते हैं और उन पर धन खर्च होता है। इसी कारण आम भारतीय धन संचय में अपनी पूरी जिंदगी बर्बाद कर देता है और सिवाय दुःख के उसके हाथ कुछ नहीं आता।

हालत यह है कि आध्यात्मिक ज्ञान की बात तो सभी करते हैं पर धारण उसे नहीं करता। पंचतत्वों से बनी इस देह को नष्ट होना है और आत्मा अमर है इसलिये मृत देह के अंतिम संस्कार और श्राद्ध जैसी परंपराओं को निभाने की प्रेरणा देना उचित नहीं है। इस देह को लेकर को नाटकबाजी करना ही अज्ञान का प्रमाण है। यहां तक कहा जा सकता है कि जन्मतिथि और पुण्य तिथि मनाना ही एक तरह से देहाभिमान का परिणाम है। जब आत्मा अमर है तो पैदा कौन हुआ मरा कौन-इस पर विचार कर देखें तो पायेंगे कि हम अनेक प्रकार के भ्रमों में जी रहे हैं। इनसे मुक्त होकर जीवन व्यतीत करें तो शायद मानसिक संताप और वेदना स्वतः कम हो जाये।
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Saturday, October 31, 2009

चाणक्य नीति-धीरज हो तो गरीबी की परवाह नहीं रहती (chankya niti-dhiraj aur garibi)

अधमा धनमिच्छन्ति मानं च मध्यमाः।
उत्तमा मानमिच्छन्ति मानो हि महतां धनम्।।
हिंदी में भावार्थ-
अधम प्रकृत्ति का मनुष्य केवल धन की कामना करता है जबकि मध्यम प्रकृत्ति के धन के साथ मान की तथा उत्तम पुरुष केवल मान की कामना करते हैं।
दरिद्रता श्रीरतया विराजते कुवस्त्रता शुभ्रतया विराजते।
कदन्नता चोष्णतया विराजते कुरूपता शीतया विराजते।।
हिंदी में भावार्थ-
अगर मनुष्य में धीरज हो तो गरीबी की पीड़ा नहीं होती। घटिया वस्त्र धोया जाये तो वह भी पहनने योग्य हो जाता है। बुरा अन्न भी गरम होने पर स्वादिष्ट लगता है। शील स्वभाव हो तो कुरूप व्यक्ति भी सुंदर लगता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस विश्व में धन की बहुत महिमा दिखती है पर उसकी भी एक सीमा है। जिन लोगों के अपने चरित्र और व्यवहार में कमी है और उनको इसका आभास स्वयं ही होता है वही धन के पीछे भागते हैं क्योंकि उनको पता होता है कि वह स्वयं किसी के सहायक नहीं है इसलिये विपत्ति होने पर उनका भी कोई भी अन्य व्यक्ति धन के बिना सहायक नहीं होगा। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने ऊपर यकीन तो करते हैं पर फिर भी धन को शक्ति का एक बहुत बड़ा साधन मानते हैं। उत्तम और शक्तिशाली प्रकृत्ति के लोग जिन्हें अपने चरित्र और व्यवहार में विश्वास होता है वह कभी धन की परवाह नहीं करते।
धन होना न होना परिस्थितियों पर निर्भर होता है। यह लक्ष्मी तो चंचला है। जिनको तत्व ज्ञान है वह इसकी माया को जानते हैं। आज दूसरी जगह है तो कल हमारे पास भी आयेगी-यह सोचकर जो व्यक्ति धीरज धारण करते हैं उनके लिये धनाभाव कभी संकट का विषय नहीं रहता। जिस तरह पुराना और घटिया वस्त्र धोने के बाद भी स्वच्छ लगता है वैसे ही जिनका आचरण और व्यवहार शुद्ध है वह निर्धन होने पर भी सम्मान पाते हैं। पेट में भूख होने पर गरम खाना हमेशा ही स्वादिष्ट लगता है भले ही वह मनपसंद न हो। इसलिये मन और विचार की शीतलता होना आवश्यक है तभी समाज में सम्मान प्राप्त हो सकता है क्योंकि भले ही समाज अंधा होकर भौतिक उपलब्धियों की तरफ भाग रहा है पर अंततः उसे अपने लिये बुद्धिमानों, विद्वानों और चारित्रिक रूप से दृढ़ व्यक्तियों की सहायता आवश्यक लगती है। यह विचार करते हुए जो लोग धनाभाव होने के बावजूद अपने चरित्र, विचार और व्यवहार में कलुषिता नहीं आने देते वही उत्तम पुरुष हैं।
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मनु स्मृतिः धर्मोपदेशक का नाटक करना एक तरह से ठगी है (manu smruti)

धर्मघ्वजी सदा लुब्धश्छाùि लोकदम्भका।
बैडालवृत्तिका ज्ञेयो हिंस्त्रः सर्वाभिसंधकः।।

लोगों में अपना प्रभाव जमाने के लिये स्वयं आचरण न करते हुए केवल धर्म की ध्वजा पताका फहराने का नाटक करना, दूसरे का धन को छीनने की इच्छा करना, हिंसक स्वभाव होना तथा दूसरों भड़काकर झगड़ा कराना बैडाल वृत्ति का परिचायक है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय- पूरी दुनियां में अनेक धर्मों के ध्वजवाहक दिखने को मिल जायेंगे पर उनके धर्मों के आड़ में ही हिंसा की प्रवृत्ति बढ़ रही है। इससे प्रमाणित होता है कि पूरी दुनियां में बैडाल प्रवृत्ति के कथित ज्ञानियों की संख्या बढ़ रही है। मनु स्मृति के अनुसार धर्म के नाम पर ठगी करना भी बैडाल या ठगी की प्रवृत्ति है।
यत्र तत्र सर्वत्र पूरी दुनियां में कथित ज्ञानी विद्वान अपने श्रीमुख से सामान्य लोगों को धर्मोपदेश देते घूम रहे हैं। कहते हैं कि ‘हिंसा मत करो’, परोपकार करो, सादगी से रहो, और ‘सबसे प्रेम करो’। एक तरह से उन लोगों ने नारों को ही उपदेश बना लिया है। अपने नारों को मजबूत करने के लिये वह कुछ मनोरंजक कहानियां सुनाने लगते हैं। कुछ धर्मोपदेश अपने धर्मग्रंथों में वर्णित चमत्कारी घटनाओं का प्रचार कर लोगों को कर्मविमुख करते हैं। उनका बस यही कहना होता है कि ‘बस हाथ उठाकर आसमान में स्थित भगवान से अपने लिये सुख मांगते रहो।’
यह धर्मोदेशक इस तरह अपने लिये भोगविलास की सामग्रियां जुटाते हैं। उनकी वृति केवल भक्त के धन को अपनी जेब में खीचने की होती है। इतना ही नहीं समय पड़ जाये तो यह अपने समुदाय के हिंसक लोगों को प्रश्रय देते हैं। उससे भी बात न बने तो आम लोगों को हिंसा के लिये प्रेरित करते हैं। ऐसे लोगों को पहचान करते हुए उनकी उपेक्षा करना चाहिये।
वैसे हम कहते हैं कि जमाना अब खराब हुआ है पर मनुमहाराज का यह संदेश देखें तो धर्म की ध्वजपताका फहराने वाले ढोंगी उस समय भी थे इसलिये ही तो उन्होंने उनकी चर्चा की ताकि लोग उनसे दूर रहें।
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Friday, October 30, 2009

मनुस्मुति-घर में किसी प्रकार का अभाव न होने दें (ghar ki nari ka samman-manu smriti)


शोचन्ति जामयो यत्र विनशत्याशु तत्कुलम्।
न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा।।
                 हिंदी में भावार्थ-
उस परिवार का शीघ्र नाश हो जाता है जिसकी स्त्रियां दुःख या अभाव के फलस्वरूप परेशान रहती हैं। जहां स्त्रियां इस दुःख से परे होती हैं वह हमेशा घर परिवार उत्थान की तरफ अग्रसर रहते हैं।

तत्समदेताः सदा पूज्याः भूषणच्छादानाशनैः।
भूतिकामैर्नरर्नितयं सत्कारेषूस्वेषु च ।।
               हिंदी में भावार्थ-अपने परिवार की तरक्की चाहने चाले को अपने घर में होने वाले उत्सवों के अवसर पर अपनी स्त्रियों का आदर सत्कार करना चाहिए और उन्हें सदा स्वादिष्ट उत्तम भोजन तथा वस्त्राभूषण आदि देकर उनकी पूजा करनी चाहिए।

                वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-मनु महाराज के संदेशों से यह स्पष्ट है कि मनुष्य जीवन स्त्री और पुरुष के समन्वय के बिना सहजता ने नहीं चल सकता। यही कारण है कि हमारे समाज में पवित्र अवसरों पर पत्नी के साथ ही पूजा आदि करने की परंपरा है। पति पत्नी साथ साथ मंदिर जाते हैं। धार्मिक अनुष्ठानों में पति पत्नी साथ साथ ही बैठकर उनको पूर्ण करते हैं। दरअसल इन परंपराओं के द्वारा ही यह प्रकट होता है कि सामान्य दिनचर्या में भले ही पुरुष की प्रधानता दिखती हो पर धार्मिक और अध्यात्मिक रूप से स्त्री का महत्व भी उतना ही जितना गृहकार्य में वह अपने हाथ से काम कर साबित करती है।
इसके अलावा मनु महाराज यह भी मानते हैं कि पुरुष का यह दायित्व है कि वह अपने घर की समस्त स्त्रियों को-माता, पत्नी, बहिन तथा बेटी- कभी किसी प्रकार का अभाव न होने दे। जो लोग अपना धन अय्याशी और व्यसनों में बर्बाद कर अपने घर की स्त्री के अधिकार का हनन करते हैं-वह पशु के समान हैं। अपनी स्त्रियों के साथ मारपीट या अपमानजनक व्यवहार करने वाले पुरुषों को अपने घर के नष्ट होने की स्थिति में कोई सहारा नहीं देता। उनका घर इसी कारण जल्दी नष्ट हो जाता है। इसलिये जितना हो सके अपने घर की स्त्री का सम्मान करने के साथ ही उसको किसी प्रकार का अभाव नहीं देना चाहिए।

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Monday, October 26, 2009

चाणक्य नीति-दुष्ट और कांटों से दूरी बनायें (chankya niti-dusht aur kante)

खलानां कपटकानां च द्विवेधैव प्रतिक्रिया।
उपानंमुखभंगो वा दूरतो वा विसर्जनम्।।
हिंदी में भावार्थ-
दुष्टों और कांटों को दूर करने के दो ही उपाय है या तो जूतों से उनका मुंह कुचल दिया जाये अथवा उन्हें दूर से ही त्याग दे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सच बात तो यह है कि जिन लोगों की प्रवृत्ति दुष्ट है उनको दूर से त्याग देना चाहिए। आजकल के समय तो दुष्ट लोगों को न केवल समाज का उच्च वर्ग ही समर्थन देता है बल्कि सामान्य लोग भी उससे लड़ने में डरते हैं। फिर आजकल नियम भी ऐसे है कि हिंसा करना परेशानी का कारण हो सकता है। इसलिये अच्छा यही है कि दुष्टों को दूर से ही नमस्कार कर चलते बने। उनके साथ आत्मीय संबंध बनाकर अपनी सुरक्षा का विचार करना निहायत बेवकूफाना है।

महाकवि तुलसीदास ने रामचरित मानस को पूर्ण करने के लिये दुष्टों से भी प्रार्थना की थी। उनसे सबक यही निकलता है कि जहां तक हो सके दुष्ट लोगों से अपनी दूरी बना लें। जहां तक उनको जूते मारने वाली बात है तो आजकल अर्थ के सारे स्त्रोत दुष्टों के घर भी वैसे हैं जैसे सज्जनों के पास। यह जूता मारना दंडनीति का परिचायक है जिसका उपयेाग अपने से कमजोर व्यक्ति पर किया जाता है। चूंकि आजकल दुष्ट न केवल धनार्जन बड़ी मात्रा में कर लेते हैं बल्कि समाज भी उनको सम्मान देता है इसलिये उनसे दूर रहना भी अपनी सुरक्षा का सबसे बढ़िया उपाय है। वैसे देखा जाये तो आजकल दुष्ट ही दुष्ट से लड़कर नष्ट भी हो जाते हैं। इस पूरे विश्व की हालत ऐसी है कि सज्जन के पास इसके अलावा कोई उपाय नहीं है कि वह दुष्टों से दूर रहकर अहंकार वश होने वाले उनके संघर्षों को देखे।
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Saturday, October 24, 2009

भर्तृहरि शतक-क्षमा हो तो कवच और क्रोध हो तो शत्रु की क्या आवश्यकता (kshama aur krodh-hindu adhyatmik sandesh)

क्षान्तिश्चत्कवचेन किं किमनिरभिः क्रोधीऽस्ति चेद्दिहिनां ज्ञातिश्चयेदनलेन किं यदि सहृदद्दिव्यौषधं किं फलम्।
किं सर्पैयीदे दुर्जनाः किमु धनैर्विद्याऽनवद्या चदि व्रीडा चेत्किमुभूषणै सुकविता यद्यपि राज्येन किम्।।
हिंदी में भावार्थ-
यदि क्षमा हो तो किसी कवच की आवश्यकता नहीं है। यदि मन में क्रोध है तो फिर किसी शत्रु की क्या आवश्यकता? यदि मंत्र है तो औषधियो की आवश्यकता नहीं है। यदि अपने दुष्ट की संगत कर ली तो सांप की क्या कर लेगा? विद्या है तो धन की मदद की आवश्यकता नहीं। यदि लज्जा है तो अन्य आभूषण की आवश्यकता नहीं है।
वर्तमान में संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- ध्यान दें तो भर्तृहरि महाराज ने पूरा जीवन सहजता से व्यतीत करने वाला दर्शन प्रस्तुत किया है। अगर आदमी विनम्र हो और दूसरे के अपराधों को क्षमा करे तो उसे कहीं से खतरा नहीं रहता। जैसा कि हम देख रहे हैं कि आजकल अस्त्र शस्त्र रखने का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। इसका कारण यह है कि लोगों का विश्वास अपने ऊपर से उठ गया है। अपने छोटे छोटे विवादों के बड़े हमले में परिवर्तित होने का भय उनको रहता है इसलिये ही लोग हथियार रखते हैं। उनको यह भी विश्वास है कि वह किसी को क्षमा नहीं करते इसलिये उनके क्रोध या हिंसा का शिकार कभी भी उन पर हमला कर सकता है। जिन लोगों में क्षमा का भाव है वह किसी प्रकार की आशंका से रहित होकर जीवन व्यतीत करते हैं। क्षमा का भाव होता है तो क्रोध का भाव स्वतः ही दूर रहता है। ऐसे में अन्य कोई शत्रु नहीं होता जिससे आशंकित होकर हम अपनी सुरक्षा करें।

उसी तरह अपनी संगत का भी ध्यान रखना चाहिये। जिनकी सामाजिक छबि खराब है उनसे दूर रहें इसी में अपना हित समझें। वैसे आजकल तो हो यह रहा है कि लोग दादा और गुंडा टाईप के लोगों से मित्रता करने में अपनी इज्जत समझते हैं मगर सच तो यह है कि ऐसे लोग उसी व्यक्ति को तकलीफ देते हैं जो उनको जानता है। इसके अलावा अपने दोस्तों से रुतवे के बदल अच्छी खासी कीमत भी वसूल करते हैं भले ही उनका कोई काम नहीं करते हों पर भविष्य में सहयोग का विश्वास दिलाते हैं। देखा यह गया है कि दुष्ट लोगों की संगत हमेशा ही दुःखदायी होती है।
अपनी देह को स्वस्थ रखने के लिये प्रतिदिन योग साधना के साथ अगर मंत्र जाप करें तो फिर आप औषधियों के नाम जानने का भी प्रयास न करें। राह चलते हुए फाईव स्टार टाईप के अस्पताल देखकर भी आपको यह ख्याल नहीं आयेगा कि कभी आपको वहां आना है।
जहां तक हो सके अच्छी बातों का अध्ययन और श्रवण करें ताकि समय पड़ने पर आप अपनी रक्षा कर सकें। याद रखिये जीवन में रक्षा के लिये ज्ञान सेनापति का काम करता है। अगर आपके पास धन अल्प मात्रा में है और ज्ञान अधिक मात्रा में तो निश्चिंत रहिये।
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Friday, October 23, 2009

संत कबीर वाणी-धर्म का मर्म कौन जानता है (kabir das ke dohe in hindi)

कहै हिन्दु मोहि राम पिआरा, तुरक कहे रहिमाना।
आपस में दोऊ लरि-लरि मुए, मरम न कोऊ जाना।।
संत शिरोमणि कबीरदास अपने समय के धार्मिक विवादों की तरफ इशारा करते हुए कहते हैं कि एक तरफ भारतीय हैं जो कहते हैं कि हमें राम प्यारा है दूसरी तरफ तुर्क हैं जो कहते हैं कि हम तो रहीम के बंदे हैं। दोनों आपस में लड़कर एक दूसरे को तबाह कर देते हैं पर धर्म का मर्म नहीं जानते।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जैसा कि इतिहास गवाह है कि भारत पर विदेशी हमले हुए। शुरुआती दौर में हमलावर केवल धन के लिये आये पर बाद में उनको लगा कि यह देश सोने का अंडा देने वाली मुर्गी है तो यहीं अपना स्थाई निवास बना लिया। उनका उद्देश्य यहां शासन करना था पर इसमें भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान शक्ति उनके लिये बाधा थी। वह आसानी शासन करते पर भारत में ऐसे लोगों की तादाद अधिक थी जो किसी के राजा होने की परवाह नहीं करते थे। उनके लिये भगवान के बाद राजा का नंबर आता था जबकि विदेशी शासक चाहते थे कि भगवान से पहले उनकी प्रतिष्ठा बने। इसलिये उन्होंने अपने साथ कथित रूप से धार्मिक संत भी रखे। इसके अलावा शासन के कार्यक्षेत्र का विस्तार किया जिससे कि यहां के लोगों के जनजीवन में राज्य का दखल अधिक हो। कुछ लोग कहते हैं कि विदेशी लोगों ने इस देश को सभ्य बनाया है-यह दावा हास्यास्पद है। दरअसल विदेशी लोगों ने राज्य का समाज के कार्यक्षेत्र में दखल बढ़ाया ही है। यही कारण है कि अनेक ऐसे क्षेत्र जहां राज्य का काम नहीं है वहां भी उसका विस्तार इस तरह हो गया जिससे समाज कमजोर हो गये हैं। फिर फूट डालो राज्य करो की तर्ज पर विदेशी शासक यहां जमे रहे और उन्हें अपने धर्म से इस देश की अध्यात्मिक विचाराधारा का कमतर साबित करने का प्रयास किया। इसलिये झगड़े बढ़े और आज तक उनको देखा जा सकता है। तुर्क यानि मध्य एशिया के देशों के लोग अपने रहीम (कविवर रहीम नहीं) को मानते जबकि भारत में तो भगवान राम की महिमा गायी जाती रही है। इस तरह झगड़े शुरु हुए जो अभी तक जारी हैं जिससे देश का आर्थिक, सामाजिक, तथा वैचारिक विकास अवरुद्ध हो गया है।
मुख्य बात है धर्म का मर्म। भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथ किसी धर्म की संज्ञावाचक पहचान नहीं देते बल्कि कर्म की शुद्धता ही धर्म की पहचान मानी जाती है। इसके विपरीत बाहर से आयी विचाराधारायें न केवल नाम से पहचाने जाते हैं बल्कि उनके इष्ट की पूजा के तरीके और स्वयं के पहनावे को लेकर भी अनेक प्रतिबंध हैं। भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान शुद्ध निष्काम कर्म और हृदय से की गयी भक्ति को ही धर्म का रूप मानता है जबकि बाहर से आयातित विचार तो आदमी के जन्म और मरण में भी रीतियां सिखाते हैं। भारतीय अध्यात्मिक गं्रथों में धर्म का अर्थ भले ही छोटा है पर उसका दायरा व्यापक है। सबसे बड़ी बात यह है कि अहिंसा धर्म की प्रधानता है जबकि विदेशी हमलावर यहां लूटने आये तो उनके लिये हिंसा करने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। इस तरह के हमलों ने ही यहां के निवासियों को शायद इतना विचलित कर दिया कि उन्हें अपने नाम और पहचार के साथ हिन्दू धर्म जोड़कर संगठित होने का विचार किया। इसे हम यूं भी कह सकते हैं कि अंततः यह एक राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति का एक अच्छा प्रयास रहा होगा जिसकी बाध्यता रही होगी।

बहरहाल जो बीत गया उसे भुलाना चाहिये था पर आज भी कुछ लोग ऐसे हैं जो इस प्रकार के विवाद का जारी रखना चाहते हैं। जब हमारे लिये धर्म का सूक्ष्म अर्थ होते हुए भी उसका दायरा बड़ा है तो हमें किसी भी विचाराधारा या धर्म पर आक्षेप न करते हुए अपने भारतीय होने की अनुभूति के साथ जीना चाहिये। हम अगर इतिहास गर्व या कुंठा के साथ जीना चाहेंगे तो सिवाय संताप के कुछ नहीं मिलना है। इस देश में विभिन्न देशों से लोग आये पर अब यहीं के होेकर रह गये। अब हमें नये सिरे से सोचना चाहिए पर समस्या यह है कि समाज में संघर्ष पैदा कर कुछ लोग अपने हित साध रहे हैं। वह धर्म पर बहसें और विवाद खड़े करते हैं पर जानते ही नहीं कि उसका आशय क्या है? सच तो यह है कि भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान ही सत्य की अनुभूति कराता है जहां तक धर्म का सवाल है तो उसके नाम पर ढेर सारे भ्रम हैं और इतिहासकार क्या कहते हैं यह अलग बात है पर हमारा विचार तो यह है कि कोई धार्मिक विचाराधारा केवल राजनीतिक संबल पाने के लिये प्रतिपादित की गयी हैं और उनका उद्देश्य प्रेम या अमन लाना नहीं है जैसा कि कुछ शायर यह कवि कहते हैं। बेहतर यही है कि हम अपना मार्ग भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों में ही ढूंढें। उससे भी बड़ी बात यह है कि हम दूसरों को हानि पहुंचाने वाले विचारों से परे होकर सभी के सुख पर विचार करें। यह प्रेम कोई सिखाने या समझाने का विषय नहीं है। मनुष्य में यह गुण स्वाभाविक रूप से रहता है।
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Thursday, October 22, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-बुरी आदतों वाले पर कोई भी हमला कर सकता है (buri adton se khatra-hindu sandesh)


प्रावेण सन्तो व्यसने रिपूणां यातव्यमित्येव सभादिशंति।
तत्रैव पक्षी व्यसने हि नित्यं क्षमस्तुन्नभ्युदितोऽभियायात्।
                हिंदी में भावार्थ-
अधिकतर महानतम विचारक व्यसनों से युक्त व्यक्ति पर आक्रमण करने का सुझाव देते हैं और जिसके साथी भी व्यसनी हों अर्थात उसका पूरा पक्ष ही व्यसनी हो उस पर तो हमला कर ही देना चाहिए।


नानाप्रकारैव्र्यसनेर्विमुक्तः शक्तिवेणाप्रतिमेन युक्तः। 
परं दुरन्तव्यसनोपपन्नं याग्रान्नरन्द्रो विजयाभिकांक्षी।।
                   हिंदी में भावार्थ-विभिन्न प्रकार के व्यसनों से रहित महाप्रभावशाली तीन शक्तियों से युक्त जीतने की इच्छा करने वाला राज प्रमुख व्यसनों से युक्त शत्रु पर आक्रमण की योजना बनाये।

                        वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संदेश को हम अलग तरीके से भी समझ सकते हैं। अब राजा तो रहे नहीं और लोकतात्रिक सभ्यता में हर व्यक्ति अपने घर का राजा है अतः उसे अपने परिवार और अपनी रक्षा के लिये अनेक अवसर पर रणनीति बनानी पड़ती है। ऐसे में दूसरे व्यसनी पर आक्रमण की बात सोचने की बजाय इस बात पर ध्यान करना चाहिये कि अपने अंदर व्यसन न हों ताकि कोई दूसरा हमें और परिवार को परेशान करने के लिये आक्रमण न कर सके। इस समय हमारे देश में अधिकतर लोगोंआत्मसंयम का अभाव है जो कि इन्हीं व्यसनों का परिणाम है। शराब, जुआ सट्टे जैसे व्यसनों ने चहुं ओर से घेर रखा है और इससे जुड़े व्यवसायों में खूब कमाई है। सच तो यह है कि जिन व्यवसायों में कमाई है वह सभी व्यसनों से जुड़े हैं। लोगों के अंदर मनोरंजन के नाम पर ऐसे व्यसन पेश किये जा रहे हैं जिससे समाज विकृत हो रहा है। यही कारण है कि हमारे देश को बाहर से चुनौती मिल रही है तो अंदर असामाजिक प्रकृत्ति के लोग अपना प्रभुत्व कायम कर लोगों को आतंकित किये रहते हैं। मनोरंजन के नाम पर शराब, खेल, और फिल्मों के व्यसनों ने लोगों को कायर बना दिया है और साथ में उनकी चिंतन क्षमता भी लुप्त हो गयी है। यही कारण है कि जब चार लोग की बैठक जमने पर देश के सामने आ रही चुनौतियों की चर्चा तो है पर उसके हल का कोई उपाय उनको नहीं सूझता। सभी लोग निराशाजनक बातें करते हैं।
            व्यक्तिगत रूप से देश की चिंता करने के साथ ही अपनी स्थिति पर भी विचार करना चाहिए। जितना हो सके उतना व्यसनों से बचें वरना धन, पद और बाहुबल से सुसज्ज्ति असामाजिक तत्व-जो व्यसनों के कारण स्वयं ही डरपोक होते हैं उन उनका डर क्रूरता पैदा करता है- आपको या परिवार को तंग कर सकते हैं। एक बात याद रखें अगर आप अपने चरित्र पर दृढ़ रहते हुए व्यसनों से परे हैं तो आपकी रक्षा स्वतः होगी। व्यसनी होने पर हर कोई आपको एक आसान लक्ष्य (साफ्ट टारगेट soft target ) समझने लगता है। यह बात ध्यान रखते हुए अपने आपको व्यसनों से दूर रखें तो अनेक प्रकार के खतरे स्वत: दूर हो जायेंगे।

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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Wednesday, October 21, 2009

संत कबीर वाणी-चतुराई सीखने से भी क्या लाभ? (sant kabir vani in hindi)


चतुराई क्या कीजिये, जो नहिं शब्द समाय
कोटिक गुन सूवा पढै, अंत बिलाई खाय


संत शिरोमणि कबीर दासजी कहते हैं कि उस चतुरता से क्या लाभ? जब सतगुरु के ज्ञान-उपदेश के निर्णय और शब्द भी हृदय में नहीं समाते और उस प्रवचन का भी फिर क्या लाभ हुआ। जैसे करोड़ों गुणों की बातें तोता सीखता-पढता है, परंतु अवसर आने पर उसे बिल्ली खा जाती है। इसी प्रकार सदगुरु के शब्द वुनते हुए भी अज्ञानी जन यूँ ही मर जाते हैं।
पाँव पुजावेँ बैठि के, भखै मांस मद दोय
तिनकी दीच्छा मुक्ति नहिं, कोटि नरक फल होय

संत शिरोमणि कबीर दासजी कहते हैं कि जो साधू-संत खाली बैठकर अपने पाँव पुजवाते हैं और मांस-मदिरा दोनों का सेवन करते हैं उनकी दीक्षा से कभी किसी की मुक्ति नहीं हो सकती, उल्टे करोड़ों नरकों का भीषण कष्टप्रद फल भोगना पड़ता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आज की वर्तमान शिक्षा पद्धति को देखें तो संत कबीरदास जी बात आज भी प्रासंगिक दिखाई देती है। देखिये कितनी सारी उपाधियां लोग प्राप्त करते हैं। उनके नाम के आगे उनकी उपाधियों की चमक तभी लगती है जब वह किसी बड़े पद पर पहुंचे अन्यथा तो आदमीं कहीं का नहीं रहता बल्कि बेरोजगार होकर घूमता है और परिश्रम का काम वह कर नहीं सकता। इसके अलावा जो लोग शिखर पर पहुंच रहे हैं वह भी तो कर तो नौकरी ही रहे हैं जिसे एक प्रकार की गुलामी कहा जा सकता है। सच तो यह है कि स्वतंत्र सोच अब हमारे देश में मिलना दूभर हो गया है और ऐसा लगता है कि लोग अपने ऊपर थोपे गये विचारों को ही आगे बढ़ाते हैं। आदमी पढ़ लिखकर कितना भी बढ़ा हो जाये बनता उसे शक्तिशाली वर्ग अपना गुलाम बना लेता है।
हमारे देश का अध्यात्मिक ज्ञान आकर्षक है और उसका ज्ञान अब सामान्य छात्र को नहीं दिया जाता है जिस कारण उन गुरुओं की बन आती है जो उसको पढ़ते हैं और फिर लोगों को सुनाकर उसका लाभ उठाते हैं। उनके पास ऐसा कोई ज्ञान नहीं है जिसे सामान्य लोग नहीं जानते पर चूंकि वह दिनचर्या का भाग नहीं है इसलिये कभी कभार सुनने पर उनको जो आनंद मिलता है उसका ही अनेक गुरु लाभ उठाते हैं। वह अपनी सेवा अपने भक्तों से कराते हैं या किसी भले काम के नाम पर चंदा लेकर अपना धंधा चलाते हैं। ऐसे लोगों की आजकल संख्या बहुत अधिक है।
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लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,ग्वालियर
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