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Tuesday, November 3, 2009

विदुर नीति-तीन दोष मनुष्य का नाश कर देते हैं (teen dosh manushya ke shatru)

द्वाविमौ पुरुषौ राजन् स्वर्गस्योपरि तिष्ठतः।
प्रभुश्चक्षमया युक्तो दरिद्रश्च प्रदानवान्।।
हिंदी में भावार्थ-
शक्तिशाली होने पर भी क्षमा करने तथा दरिद्र होने पर भी दान करने वाला मनुष्य स्वर्ग से भी ऊपर स्थान पाता है।

हरणं च परम्वानां परदाराभिमर्शनम्।
सुहृदश्चय परित्यागस्त्रयो दोषाः क्षमावहा।।
हिंदी में भावार्थ-
दूसरे के धन को हरना, परायी स्त्री से संपर्क रखना तथा सहृदय मित्र का त्याग-यह तीन दोष आदमी का नाश कर देते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आजकल सबसे बड़ी समस्या यह है कि आदमी अपने गुण दोषों पर ध्यान नहीं देता। दूसरे के हक मारने से लोग तब रुकें जब उनके पास इतनी चिंतन क्षमता हो कि वह अच्छाई बुराई का निर्णय कर सकें। सभी को अपने स्वार्थ का भान है दूसरे के अधिकार पर कौन ध्यान देता है? हमने कई बार सुना होगा कि किसी ने अनुसंधान से कोई अविष्कार किया तो किसी दूसरे ने अपने नाम से उसे प्रचारित किया। उसी तरह अनेक लोग दूसरों की मौलिक रचनायें अपने नाम से छापकर गर्व महसूस करते हैं। कई लोग दूसरे के परिश्रम के रूप में देय मूल्य से मूंह फेरे जाते हैं या फिर कम देते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि दूसरे का अधिकार मारने में कोई नहीं झिझकता। यह कोई नहीं समझता कि इसका परिणाम कहीं न कहीं भोगना पड़ता है।
मनुष्य की शक्ति की पहचान उसकी सहनशीलता में है न कि हिंसा का प्रदर्शन करने में। जिसमें शारीरिक शक्ति और मानसिक दृढ़ता की कमी होती है वह बहुत जल्द हिंसक हो उठते हैं। जिन लोगों के पास शक्ति और धीरज है वह क्षमा करने में अधिक विश्वास करते हैं। उसी तरह आजकल धनलोलुपों का हाल है। सभी धन के पीछे अंधे होकर भाग रहे हैं। दिखाने के लिये वह धन का दान भले ही करते हों पर उनके लिये पुण्य कमाना दुर्लभ है क्योंकि उनका धन उचित मार्गों से नहीं अर्जित किया गया। सच तो यह है कि जो मिलबांटकर खाते हैं उनको ही पुण्य मिलता है। जो दरिद्र है वह जब दान करता है तो उसका स्थान स्वर्ग से भी ऊंचा हो जाता है।
संकलक एवं  व्याख्याकार-दीपक भारतदीप 
http://rajlekh.blogspot.com
 
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप, Gwlior
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Monday, October 26, 2009

चाणक्य नीति-दुष्ट और कांटों से दूरी बनायें (chankya niti-dusht aur kante)

खलानां कपटकानां च द्विवेधैव प्रतिक्रिया।
उपानंमुखभंगो वा दूरतो वा विसर्जनम्।।
हिंदी में भावार्थ-
दुष्टों और कांटों को दूर करने के दो ही उपाय है या तो जूतों से उनका मुंह कुचल दिया जाये अथवा उन्हें दूर से ही त्याग दे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सच बात तो यह है कि जिन लोगों की प्रवृत्ति दुष्ट है उनको दूर से त्याग देना चाहिए। आजकल के समय तो दुष्ट लोगों को न केवल समाज का उच्च वर्ग ही समर्थन देता है बल्कि सामान्य लोग भी उससे लड़ने में डरते हैं। फिर आजकल नियम भी ऐसे है कि हिंसा करना परेशानी का कारण हो सकता है। इसलिये अच्छा यही है कि दुष्टों को दूर से ही नमस्कार कर चलते बने। उनके साथ आत्मीय संबंध बनाकर अपनी सुरक्षा का विचार करना निहायत बेवकूफाना है।

महाकवि तुलसीदास ने रामचरित मानस को पूर्ण करने के लिये दुष्टों से भी प्रार्थना की थी। उनसे सबक यही निकलता है कि जहां तक हो सके दुष्ट लोगों से अपनी दूरी बना लें। जहां तक उनको जूते मारने वाली बात है तो आजकल अर्थ के सारे स्त्रोत दुष्टों के घर भी वैसे हैं जैसे सज्जनों के पास। यह जूता मारना दंडनीति का परिचायक है जिसका उपयेाग अपने से कमजोर व्यक्ति पर किया जाता है। चूंकि आजकल दुष्ट न केवल धनार्जन बड़ी मात्रा में कर लेते हैं बल्कि समाज भी उनको सम्मान देता है इसलिये उनसे दूर रहना भी अपनी सुरक्षा का सबसे बढ़िया उपाय है। वैसे देखा जाये तो आजकल दुष्ट ही दुष्ट से लड़कर नष्ट भी हो जाते हैं। इस पूरे विश्व की हालत ऐसी है कि सज्जन के पास इसके अलावा कोई उपाय नहीं है कि वह दुष्टों से दूर रहकर अहंकार वश होने वाले उनके संघर्षों को देखे।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Friday, October 2, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-शत्रुओं और विरोधियों के दो प्रकार (two type of friend and animy-kautilya

सहज कार्यजश्वव द्विविधः शत्रु सच्यते।
सहज स्वकुलोत्पन्न कार्यजः स्मृतः।
हिंदी में भावार्थ-
शत्रु दो प्रकार के होते हैं-एक तो जो स्वाभाविक रूप से बनते हैं दूसरे वह जो कार्य से बनते हैं। स्वाभाविक शत्रु कुल में उत्पन्न होता है तो दूसरा अपने कार्य के कारण बन जाता है।
उच्छेदापचयो काले पीडनं कर्षणन्तथा।
इति विधाविदः प्राहु, शत्रौ वृतं चतुविंघम्।।
हिंदी में भावार्थ-
उच्छेद, अपचय, समय पर पीड़ा देना और कर्षण यह चार प्रकार की स्थिति विद्वान बताते हैं।
वर्तमान संबंध में संपादकीय-ऐसा कोई जीव इस प्रथ्वी पर नहीं है जिसका कोई शत्रु न हो। बड़े बड़े महापुरुष इस प्रकृत्ति के नियम का उल्लंघन नहीं कर पाये। शत्रु दो प्रकार के बनते हैं। एक तो जो स्वाभाविक रूप होते ही हैं दूसरे हमारे कार्य से बनते हैं। स्वाभाविक रूप शत्रु या विरोधी परिवार, समाज तथा कुल की वजह से बनते हैं। जैसे बिल्ली चूहे की तो कुत्ता बिल्ली का दुश्मन होता है। उसी तरह इंसानों में भी कुछ रिश्ते आपस में प्रतिस्पर्धा पैदा करते हैं। जहां कुल बड़ा होता है वहां आपस में लोग एक दूसरे के विरोधी या दुश्मन पैदा होते हैं। आपने देखा होगा कि किसी आदमी को तब हानि नहीं पहुंचाई जा सकती जब उसका अपना कोई शत्रु न हो। बड़े शत्रु को हराने के लिये छोटे शत्रु से समझौता करना चाहिये यह इसलिये कहा गया है कि क्योंकि दो शत्रुओं से एक साथ लड़ना संभव नहीं होता।

हम यहां शत्रु के साथ विरोधी की भी चर्चा करें तो बात आसानी से समझी जा सकती है। हम जब कोई अपना कार्य करते हैं तो वही कार्य करने वाला अन्य व्यक्ति स्वाभाविक रूप से हमें शत्रु भाव से देखता है। वह इस बात से आशंकित रहता है कि कहीं उसका प्रतिस्पर्धी उससे आगे न निकल जाये। तब वह इस बात का प्रयास भी करता है कि आपको नाकाम किया जाये, आपकी मजाक उड़ायी जाये और तमाम तरह का दुष्प्रचार कर आपका मनोबल गिराया जाये। वह आपके ही छोटे शत्रु या विरोधी को अपना मित्र बना लेता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि इस दैहिक जीवन में शत्रु या विरोधी से मुक्त रहना संभव नहीं है। अतः शत्रु और विरोधी की गतिविधियों को नजर रखें। वह आपकी उपेक्षा करने के साथ ही आपके कार्यसिद्धि के साधनों को हानि पहुंचा सकते हैं। शत्रु या विरोधी की प्रकृत्ति को समझें तो हमेशा सतर्क रहकर उसका मुकाबला कर सकते हैं। याद रहे आपके शत्रु या विरोधी कभी भी आपकी सफलता को न तो स्वीकार कर सकते हैं न ही पचा सकते हैं।
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