समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढ़ें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका


हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर
Showing posts with label अघ्यात्म. Show all posts
Showing posts with label अघ्यात्म. Show all posts

Friday, February 26, 2010

श्रीगुरुग्रंथ साहिब-कीर्तन से कुमति दूर होती है (kirtan-shri guru granth sahib)

‘उदम करहि अनेक हरि नाम न गवाही।
भरमहि जोनि असंख पर जन्महि आवही।’
हिन्दी में भावार्थ-
श्री गुरुग्रंथ साहिब के अनुसार कोई मनुष्य चाहे कितना भी उद्यम करे पर अगर परमात्मा के नाम का स्मरण नहीं करता तो उसे मुक्ति नहीं मिल सकती और वह भटकता रहता है।
‘जो जो कथै सुने हरि कीरतन ता की दुरमति नासु।
सगल मनोरथ पावै नानक पूरन हौवे आसु।।’
हिन्दी में भावार्थ-
श्रीगुरुग्रंथ साहिब के अनुसार जो मनुष्य कीर्तन गाते और सुनते हैं उनकी कुमति नष्ट होती है तथा सभी प्रकार की मनोकामनायें पूरी होती हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-श्री गुरुग्रंथ साहिब का हमारे देश में बहुत अध्यात्मिक महत्व है। यह किसी धर्म विशेष की पुस्तक नहीं है क्योंकि इसमें मनुष्य को सहजता सिखाने वाले संदेश मौजूद हैं और इसे पढ़कर सभी लोग सीख सकते हैं। आज के समय में अनेक बुद्धिमान लोगों को सत्संग और कीर्तन एक ढोंग लगते हैं तो कुछ लोग इनको मनोरंजन का साधन मानते है। कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि जब आज आधुनिक मनोरंजन के साधन उपलब्ध हैं तो फिर क्यों इस पुराने प्रकार के चक्कर में पड़ा जाये।
यह अज्ञान से उपजा भ्रम हैं। सत्संग और कीर्तन में शामिल होने का मतलब है कि कुछ देर अपने ध्यान को इस संसार से हटकार निष्काम प्रवृत्तियों की तरफ लगाना। जबकि आधुनिक मनोरंजन प्रसारणों में इसी संसार की वह बातें होती हैं जिनके साथ हम पूरा दिन जुड़े रहते हैं। मूर्ति पूजा की अनेक आलोचक भले ही खिल्ली उड़ाते हैं पर उनको इस बात का पता नहीं कि यह ध्यान को इस संसार से हटकार उसमें शुद्धता लाने का यह एक महत्वपूर्ण साधन है। जिस तरह कोई गाड़ी हम धुलवाने के लिये गैरेज भेजते हैं उसी तरह अपने मन और बुद्धि को कामनाओं से हटाकर पूजा, कीर्तन और सत्संग में शामिल होकर एक तरह से अपने मन और बुद्धि को निष्काम गैरेज में शुद्ध किया जाता है।
गुरुनानक जी ने इस देश में फैले अंधविश्वास को दूर करने का संदेश दिया था। अगर उनके बताये मार्ग पर चला जाये तो हमारा देश स्वर्ग बन सकता है। कामनाओं की पूर्ति के लिये हम सदैव लगे रहते हैं पर इससे केवल हमारे पास भौतिक वैभव की प्रचुरता हो सकती है पर मन को शांति नहीं मिल सकती। अतः यह जरूरी है कि ध्यान, योग तथा भक्ति कर अपने अंदर शुद्धता लायी जाये।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

Friday, December 18, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-सत्पुरुषों से मित्रता कभी व्यर्थ नहीं जाती (bhale logon ki dosti-hindu dharam sandesh)

 आदौ तन्त्र्यो बृहन्मध्या विस्तारिण्यः पदे पदे।

यामिन्यो न निवर्तन्ते सतां मैत्र्यः सरित्समाः।।

हिन्दी में भावार्थ-
मुख से सू़क्ष्म, मध्य में विस्तृत फिर आगे विस्तार से निरंतर बहने वाली नदी के समान ही सत्पुरुषों की मित्रता कभी व्यर्थ नहीं जाती।

औरसं कृतसम्बद्ध तथा वंशक्रमागतं।

रक्षितं व्यसनेभ्यभ्व मित्रं ज्ञेयं चतुर्विधं।।

हिन्दी में भावार्थ-
मनुष्य के जीवन में चार प्रकार के सहोदर, संबंधी, परंपरा तथा व्यसनों से रक्षित मित्र होते हैं।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मित्रों के चार प्रकार होते हैं जिनमें एक तो वह बंधु होते हैं जिनसे रक्त संबंध होता है। दूसरे वह जो रिश्ते में होते हैं। तीसरे वह होते हैं जो पारंपरिक पारिवारिक  संबंधों के कारण बनते हैं। चौथे वह जो एक ही जैसे व्यसनों के कारण बनते हैं।  दरअसल मित्रता के अर्थ व्यापक हैं और इसके आगे सारे संबंध व्यर्थ हो जाते हैं। यही कारण है कि रिश्तों के खटास हो जाती है पर मित्रता अक्षुण्ण रहती है क्योंकि उसमें कोई स्वार्थ नहीं होता।

महत्वपूर्ण बात यह है कि सज्जन पुरुषों में कभी प्रत्यक्ष तात्कालिक स्वार्थ पूरा होता नहीं दिखता पर समय पड़ने पर वही सबसे अधिक काम आते हैं।  इसके विपरीत जिनसे व्यसनों के कारण संबंध हैं वह तभी तक चलते हैं जब तक वह मनुष्य में बने रहते हैं।  कार्यस्थलों पर साथ चाय या शराब पीने को लेकर अनेक मित्र समूह बन जाते हैं पर जैसे ही कार्यस्थल बदलता है या व्यसन छूटता है वैसे ही वह मित्रता भी छूट जाती है। आजकल समस्या यही है कि लोग ऐसी सतही मित्रता में ही सत्य ढूंढते हैं और सत्पुरुषों से मित्रता करना उनको एक फालतू विषय लगता है जबकि वही ऐसे होते हैं जो बिना किसी स्वार्थ के समय पर संकट निवारण का कार्य करते हैं।

 
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

-------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

Monday, October 26, 2009

चाणक्य नीति-दुष्ट और कांटों से दूरी बनायें (chankya niti-dusht aur kante)

खलानां कपटकानां च द्विवेधैव प्रतिक्रिया।
उपानंमुखभंगो वा दूरतो वा विसर्जनम्।।
हिंदी में भावार्थ-
दुष्टों और कांटों को दूर करने के दो ही उपाय है या तो जूतों से उनका मुंह कुचल दिया जाये अथवा उन्हें दूर से ही त्याग दे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सच बात तो यह है कि जिन लोगों की प्रवृत्ति दुष्ट है उनको दूर से त्याग देना चाहिए। आजकल के समय तो दुष्ट लोगों को न केवल समाज का उच्च वर्ग ही समर्थन देता है बल्कि सामान्य लोग भी उससे लड़ने में डरते हैं। फिर आजकल नियम भी ऐसे है कि हिंसा करना परेशानी का कारण हो सकता है। इसलिये अच्छा यही है कि दुष्टों को दूर से ही नमस्कार कर चलते बने। उनके साथ आत्मीय संबंध बनाकर अपनी सुरक्षा का विचार करना निहायत बेवकूफाना है।

महाकवि तुलसीदास ने रामचरित मानस को पूर्ण करने के लिये दुष्टों से भी प्रार्थना की थी। उनसे सबक यही निकलता है कि जहां तक हो सके दुष्ट लोगों से अपनी दूरी बना लें। जहां तक उनको जूते मारने वाली बात है तो आजकल अर्थ के सारे स्त्रोत दुष्टों के घर भी वैसे हैं जैसे सज्जनों के पास। यह जूता मारना दंडनीति का परिचायक है जिसका उपयेाग अपने से कमजोर व्यक्ति पर किया जाता है। चूंकि आजकल दुष्ट न केवल धनार्जन बड़ी मात्रा में कर लेते हैं बल्कि समाज भी उनको सम्मान देता है इसलिये उनसे दूर रहना भी अपनी सुरक्षा का सबसे बढ़िया उपाय है। वैसे देखा जाये तो आजकल दुष्ट ही दुष्ट से लड़कर नष्ट भी हो जाते हैं। इस पूरे विश्व की हालत ऐसी है कि सज्जन के पास इसके अलावा कोई उपाय नहीं है कि वह दुष्टों से दूर रहकर अहंकार वश होने वाले उनके संघर्षों को देखे।
-------------------------
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://rajlekh.blogspot.com
-----------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

विशिष्ट पत्रिकायें