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Tuesday, March 2, 2010

चाणक्य नीति-संपत्ति संग्रह से तृप्ति कभी नहीं मिल पाती (money and life-chankya niti)

किं तया क्रियते लक्ष्म्या या वधूरिव केवला।
या तु वेश्येव सा मान्या पथिकैरपि भुज्यते।।
हिन्दी में भावार्थ-
उस संपत्ति से क्या लाभ जो केवल घर की अपने ही उपयोग में आती हो। जिसका पथिक तथा अन्य लोग उपयोग करें वही संपत्ति श्रेष्ठ है।
धनेषु जीवतिव्येषु स्त्रीषु चाहारकर्मसु।
अतृप्तः प्राणिनः सर्वे याता यास्यन्ति यान्ति च।।
हिन्दी में भावार्थ-
धन और भोजन के सेवन तथा स्त्री के विषयों में लिप्त रहकर भी अनेक मनुष्य अतृप्त रह गए, रह जाते हैं और रह जायेंगे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य के लोभ की सीमा अनंत है। वह जितना ही धन संपदा के पीछे जाता है उतना ही वह एक तरह से दूर हो जाती हैं। किसी को सौ रुपया मिला तो वह हजार चाहता है, हजार मिला तो लाख चाहता है और लाख मिलने पर करोड़ की कामना करता है। कहने का तात्पर्य यह है कि दौलत की यह दौड़ कभी समाप्त नहीं होती। आदमी का मन मरते दम तक अतृप्त रहता है। जितनी ही वह संपत्ति प्राप्त करता है उससे ज्यादा पाने की भावना उसके मन में जाग्रत होने लगती है।
आखिर अधिकतर लोग संपत्ति का कितना उपयोग कर पाते हैं। सच तो यह है कि अनेक लोग जीवन में जितना कमाते हैं उतना उपभोग नहीं कर पाते। उनके बाद उसका उपयोग उनके परिजन करते हैं। बहुत कम लोग हैं जो सार्वजनिक हित के लिये दान आदि कर समाज हित का काम करते हैं। ऐसे ही लोग सम्मान पाते हैं। जिन लोगों की अकूल संपत्ति केवल अपने उपयेाग के लिये है तो उसका महत्व ही क्या है? संपत्ति तो वह अच्छी है जिसे समाज के अन्य लोग भी उपयोग कर सके। जब समाज किसी की संपत्ति का उपयेाग करता है तो उसको याद भी करता है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Sunday, February 28, 2010

भर्तृहरि शतक-इंसान के मन में भय तो बना ही रहता है (hindu dharma sandesh-insan aur bhay(

भर्तृहरि महाराज के अनुसार
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भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद् भयं माने दैन्यभयं बले रिपुभयं रूपे जरायाः भयम्।।
शास्त्रे वादिभयं गुणे खलभयं काये कृतान्नताद् भयं सर्व वस्तु भ्वान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
इस संसार में हर मनुष्य को भय लगा ही रहता है। सांसरिक पर्दार्थों का उपभोग से रोग का भय, ऊंचे कुल में जन्म लेने पर निम्न कोटि के कर्म में फंसने का भय, अधिक धन से राज्य का भय, एकदम शांत रहने से दीनता का भय, शक्तिशाली होने पर शत्रु का भय, सौंदर्य के साथ बुढ़ापे का भय, विद्वान होने पर वाद विवाद में पराजय का भय, विनम्रता दिखाने पर दुष्टों द्वारा निंदा करने का भय और शरीर होने पर यमराज का भय रहता है
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जब मन में कामनायें होती हैं तो उनकी पूर्ति के लिये मन में अनेक प्रकार के विचार भी आते है, जिनसे प्रेरित होकर हम अपने कर्म को संपन्न करने लगते हैं। अगर सफलता मिल गयी तो ठीक नहीं तो निराशा हाथ लगती है। अपने कर्म के दौरान भी असफलता का भय सताता रहता है। दरअसल यह भय अहंता और ममता के भाव से ही उपजता है। इससे जो तनाव पैदा होता है वह पूरे शरीर को ही लील जाता है। इससे बचने का उपाय यही है कि कर्तापन के अहंकार से मुक्त होकर दृष्टा की तरह जीवन व्यतीत करें। यह मेरा है, वह मेरा है जैसे भाव मन में लाने पर उन वस्तुओं और व्यक्तियों से बिछोह का भय भी सताने लगता है जिनको हम अपना समझते हैं। इस नश्वर संसार में कोई भी वस्तु स्थिर नहीं है और यहां तक कि एक दिन हमारा आत्मा इस देह का त्याग कर चल देता है। यही आत्मा हम हैं, यह समझ कर चलना चाहिये। हम जीवन जीने नहीं देखने आये हैं यह भाव मनुष्य के अंदर दृष्टा भाव लाता है। अपने नियमित कर्म करने तो चाहिये पर उनके संपन्न होने पर ‘मैंने यह किया’, ‘मैंने वह किया’ जैसे कर्तापन के अहंकार के भाव को स्थान नहीं देना चाहिये।
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Tuesday, February 16, 2010

पतंजलि योग दर्शन-वैचारिक योग से दृढ़ व्यक्तित्व की प्राप्ति

अहिंसासत्यास्तेब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः।
हिन्दी में भावार्थ-अहिंसा, सत्य, अस्तेय,ब्रह्चर्यऔर अपरिग्रह-यह पांच यम हैं।
शौचसंतोषतपः स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः।।
हिन्दी में भावार्थ-शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वर की आराधना-यह पांच नियम हैं।
वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम्।
हिन्दी में भावार्थ-जब वितर्क यम और नियम के पालन में बाधा पहुंचाने लगे तो उसके विपरीत विचार का चिंतन करना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-शारीरिक योगासन के साथ वैचारिक योग का भी महत्व है क्योंकि जीवन में मनुष्य के कर्म ही उसके फल का आधार होते हैं  जिनके करने की शुरूआत मस्तिष्क में उत्पन्न विचार से ही होती है।  अहिंसा न करना, सत्य मार्ग पर स्थित रहना, दूसरे के स्वामित्व की वस्तु का अपहरण न करना (जिसे चोरी भी कहा जाता है), काम में अधिक अनुरक्त न रहना तथा भौतिक साधनों के संचय में अधिक रुचि न रखना एक तरह से वैचारिक योगासन है।  इनमें स्थित व्यक्ति दृढ़ व्यक्तित्व का स्वामी बन जाता है। इन प्रवृत्तियों को यम कहा जाता है और इनमें स्थित होने पर मनुष्य सिद्ध हो जाता है।
यही स्थिति नियमों की है।  प्रातःकाल शौच आदि से निवृत होने पर अपने अंदर जब स्वच्छता का अनुभव हो तभी यह मानना चाहिये कि हम स्वस्थ हैं।  इसके अलावा सांसरिक वस्तुओं को लेकर संतोष का भाव रखते हुए तप एवं स्वाध्याय में लीन रहकर ईश्वर की भक्ति करने से अपने अंदर एक महान आनंद की अनुभूति होती है।
अनेक बार जीवन में ऐसे अवसर आते हैं जब हम डांवाडोल होते हैं। ऐसे में विपरीत विचार का चिंतन करना चाहिये। जब हमें क्रोध आये तब शांति का और जब निराशा उत्पन्न हो तब आशा पर विचार करना चाहिये। जब लोभ की प्रवृत्ति जागे तक त्याग का सोचें।  जब किसी की निंदा का मन हो तो किसी की प्रशंसा पर विचार करें।  इस तरह सकारात्मक प्रवृत्ति का निर्माण करें ताकि जीवन पथ पर अधिक से अधिक आनंद की प्राप्ति हो। यह वैचारिक या साधना मनुष्य को उत्कृष्ट श्रेणी का बनाती है।

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Saturday, January 30, 2010

भर्तृहरि शतक-हिमालय से मलय पर्वत अधिक श्रेष्ठ (himalya and malay parvat-bhartrihari shatak)

किं तेन हेमगिरिणा रजताद्रिणा वा यत्राश्रिताश्च तरवस्तरवस्त एव।
मन्यामहे मलयमेव यदाश्रयेण कंकोलनिम्बकुटजा अपि चंन्दनाः स्युः।।
हिन्दी में भावार्थ-
चांदी के रंग के उस हिमालय की संगत से भी क्या लाभ होता है, जहां के वृक्ष केवल वृक्ष ही रह गये। हम तो उस मलयाचल पर्वत को ही धन्य मानते हैं जहां निवास करने वाले कंकोल, नीम और कुटज आदि के वृक्ष भी चंदनमय हो गये।
पातितोऽपि कराघातैरुत्पतत्येव कन्दुकः।
प्रायेण साधुवृत्तीनामस्थायिन्यो विपत्तयः।
हिन्दी में भावार्थ-
जमीन पर गेंद पटकी जाये तो फिर भी वापस आ जाती है। उसी प्रकार साधु भी अपने सद्गुणों की सहायता से अपनी विपत्तियों का निवारण कर लेते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भर्तृहरि महाराज यहां संगति के प्रभाव की चर्चा कर रहे हैं। मनुष्यों में वही श्रेष्ठ है जिसके सद्गुणों से दूसरे भी सुधरते हैं। सभी मनुष्यों के संपर्क एक दूसरे से होते हैं और व्यवसाय, नौकरी या पर्यटन में दौरान अनेक व्यक्ति मिलते और बिछड़ते हैं। जब तक साथ चलने का लक्ष्य रहता है आपस में बेहतर संबंध स्थापित होते हैं। सभी अपना काम मिलकर करते हैं पर एक दूसरे के अंदर ऐसा प्रभाव नहीं डाल पाते कि आपसी गुणों का स्वाभाविक रूप से विनिमय हो जाये। हिमालय पर्वत पर अनेक प्रकार के महत्वपूर्ण वृक्षों को वास होता है पर वह चंदन नहीं हो जाते जबकि मलय पर्वत पर चाहे जो भी पेड़ हो उसमें चंदन की सुगंध आ जाती है। मनुष्यों में जो श्रेष्ठ होते हैं वह न केवल अपने से बड़े बल्कि अपने से छोटे लोगों को भी अपने गुणों से ऐसा प्रभावित करते हैं कि वह उनमें भी आ जाते हैं।
इसी कारण अपने गुणों को पहचान कर उनमें श्रीवृद्धि करना चाहिये। इससे अनेक लाभों में यह भी है कि उनके सहारे ही हम जीवन पथ पर विपत्तियों से लड़ते हुए आगे बढ़ते हैं। जिस तरह गेंद जमीन पर पटक दिये जाने पर फिर वापस आती है वैसे ही साधु भी अपने गुणों के सहारे संकट काट लेते हैं। इससे प्रेरणा लेते हुए अपने अंदर साधुत्व का भाव लाना चाहिये। मनुष्य वही श्रेष्ठ है जो अपने सत्गुणों से दूसरे का मन तो प्रसन्न करता ही उसे अपने अंदर ऐसे गुण लाने की प्रेरणा भी देता है।
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Tuesday, January 26, 2010

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-कार्य के संयोग का लाभ उठायें (chance of work-hindu dharma sandesh)

न कार्यकालं मतिमानतिक्रामेत्कदाचन।
कथञ्चिदेव भवित कार्ये योगःसुदुल्र्लभः।।
हिन्दी में भावार्थ-
बुद्धिमान को चाहिए कि वह कार्य का समय सामने आने पर उसे व्यर्थ न जाने दे क्योंकि कार्य में मन लगाना अत्यंत कठिन होता है। फिर संयोग सदैव सामने नहीं आते।
सतां मार्गेण मतिमान् को कम्र्म समाचरेत्।
काले समाचरन्साधु रसवत्लमश्नुते।।
हिन्दी में भावार्थ-
बुद्धिमान सत्पुरुषों के मार्ग का अनुसरण करते हुए निश्चित समय पर कार्य आरंभ करें। जो मनुष्य समय पर कार्य करता है उसे रसयुक्त फल की प्राप्ति अवश्य होती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आलस्य मनुष्य का स्वाभाविक दुर्गुण है। अनेक लोग इसलिये ही सफलता से वंचित रहते हैं क्योंकि वह अपना काम समय पर प्रारंभ नहीं करते। अनेक बार मन में आता है कि ‘थोड़ी देर बाद यह काम करूंगा, ‘कल करूंगा’, या फिर ‘यह काम तो बाद में भी हो सकता है’-यह प्रवृत्ति ठीक नहीं है। जीवन में आगे बढ़ने के अवसर हमेशा ही उपलब्ध नहीं होते। जब कोई उन्नति का विशेष अवसर सामने आये तो लपक लेना चाहिये। अगर हम सफल और उन्नत पुरुषों के जीवन को देखें तो वह भी हमारी तरह ही होते हैं पर वह शिखर पर इसलिये पहुंचते हैं क्योंकि उन्होंने समय आने पर उसका उपयोग किया होता हे। जब भी कोई काम प्रारंभ करने का अवसर सामने उपस्थित हो तो तुरंत शुरू करना चाहिये।
कबीरदास जी भी कह गये हैं कि ‘काल करे सो आज कर, आज करे सो अब, पल में प्रलय हो जायेगी बहुरि करेगा कब’। यह समय किसी का दास नहीं होता अतः उसका सम्मान करते हुए अपना काम का अवसर आने पर उसे प्रारंभ कर देना चाहिए।

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Sunday, January 24, 2010

विदुर नीति-पांच गुण होने पर आदमी विचलित नहीं होता (panch gun aur insan-vidur niti)

आत्मज्ञानं समारम्भस्तितिषा धर्मनित्यता।
यमर्थान्नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते।।
हिन्दी में भावार्थ-
मनुष्य को पांच गुण-अपने बारे में ज्ञान, उद्योग, सहनशीलता, दृढ़ता और धर्म में स्थिरता- पुरुषार्थ से विचलित नहीं कर सकते और वही ज्ञान या पंडित कहलाता है।
निषेवते प्रशस्तानि निन्दितानि न सेवते।
अनास्तिकः श्रद्धान एतत पण्डितलक्षणम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
जो मनुष्य सत्कर्म करते हुए बुरे कर्मों से दूर रहने के साथ परमात्मा में आस्था और श्रद्धा रखता उसे ही ज्ञानी या पण्डित कहना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अपने जीवन में कोई भी काम प्रारंभ करने से पहले अपनी स्वयं की स्थिति, सामथ्र्य तथा सहायको का विचार करना चाहिये। जब स्थिति अनुकूल लगे तो अपने कार्य को संपन्न करने के लिये पुरुषार्थ करना ही श्रेयस्कर है और उसमें विलंब करना भी दुःखदायी होता है। इसके साथ ही इस बात का भी ध्यान रखना चाहिये कि कभी अपने हाथ से धर्म की हानि न हो। जो व्यक्ति योजनाबद्ध ढंग से कार्य करते हैं उनकी सफलता निश्चित है और वही समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं। अपनी क्षमता से अधिक तथा कल्पनातीत वस्तुओं को पाने का मोह आदमी को अपने जीवन में कष्ट के अलावा कुछ नहीं देता।

एक बात निश्चित है कि बुरे काम का बुरा परिणाम सामने आता ही है। इतना ही नहीं कुसंग करने का धीरे धीरे स्वयं पर भी प्रभाव पड़ने लगता है जिससे आदमी धार्मिक कार्यक्रमों से विरक्त होकर व्यसनों की तरफ आकर्षित होने लगता है। अतः जीवन में हमेशा अपनी स्थिति, क्षमता, सहायक के बारे में विचार करते हुए धर्म में स्थित रहना चाहिये। तभी जीवन सफल और शांतिपूर्ण रह सकता है।
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Saturday, January 23, 2010

संत कबीर वाणी-राम का नाम छोड़ने पर नर्क में वास होता है (ram ka nam-sant kabir vani)

मुख से नाम रटा करैं, निस दिन साधुन संग।
कहु धौं कौन कुफेर तें, नाहीं लागत रंग।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि लोग दिन रात भगवान के नाम का जाप करते हैं, साधुओं के पास जाते हैं ऐसे में किसे दोष दें कि उनके जीवन में रंग नहीं चढ़ता।
राम नाम को छाड़ि कर, करे और की आस।
कहैं कबीर ता नर को, होय नरक में वास।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं जो मनुष्य राम नाम का स्मरण छोड़कर विषय वासना में रत हो जाते हैं उनको नरक में जाकर निवास करना पड़ता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अगर हम अपने देश की वर्तमान दशा को देखें तो दुःख होने के साथ कभी कभी हंसी भी आती है।  शायद ही दुनियां में कोई ऐसा देश हो जहां भगवान नाम का स्मरण इतना होता हो पर जितना सामाजिक तथा आर्थिक भ्रष्टाचार है वह भी कहीं नहीं होगा।  लोग एक दूसरे को दिखाने के लिये भगवान का नाम लेने  साथ ही सत्संगों में जाकर साधुओं के प्रवचन सुनते हैं पर घर आकर सभी का व्यवहार मायावी हो जाता है। बड़े शहरों में नित प्रतिदिन धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन होने पर वहां लोगों के झुंड के झुंड शामिल होते हैं। कोई प्रवचन सुनता है तो कोई सुनते हुए दूसरे को भी सुनाता है।  कहने का तात्पर्य यह है कि भगवान की भक्ति लोग केवल दिखावे के लिये करते हैं और उनका लक्ष्य केवल स्वयं को धार्मिक या अध्यात्मिक व्यक्तित्व का स्वामी होने का दिखावा करना होता है।
वैसे हम लोग विषयों के पीछे भागते हैं जबकि सच तो यह है कि वह हमें कभी छोड़ते ही नहीं अलबत्ता हम उनकी सोच को अपने दिमाग में इस तरह बसा लेते हैं कि भगवान का नाम स्मरण करने का विचार ही नहीं आता।  अगर आता भी है तो खाली जुबान से लेते हैं पर उसका स्पंदन हृदय में नहीं पहुंचता क्योंकि बीच रास्ते में विषयों की सोच रूपी पहाड़ उनका मार्ग अवरुद्ध करता है। यही कारण है कि भगवान भक्ति अधिक होने के बावजूद इस देश में नैतिक आचरण गिरता जा रहा है।  बहुत कम लोग ऐसे रह गये हैं जिनमें मानवीय संवेदनायें और सद्भावना बची है।
इस दिखावे का ही परिणाम है कि मायावी समृद्धि की तरफ बढ़ रहे देश में अहंकार, संवेदनहीनता तथा भ्रष्टाचार के कारण नारकीय स्थिति की अनुभूति होती है।
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Saturday, January 16, 2010

विदुर नीति-कोमल व्यवहार तीर्थ करने समान (komal vyavhar aur teerth-hindi sandesh)

सर्वतोर्थेषु वा स्नानं स्र्वभूतेषु चार्जवम्।
उभे त्वेते समेस्यातामार्जवं वा विशिष्यते।।
हिन्दी में भावार्थ-
अनेक जगह तीर्थों पर स्नान करना तथा प्राणियों के साथ कोमलता का व्यवहार करना एक समान है। कोमलता के व्यवहार का तीर्थों से अधिक महत्व है।
यावत् कीर्तिर्ममनुष्य पुण्या लोके प्रगीयते।
तावत् स पुरुषव्याघ्र स्वर्गलोके महीयते।।
हिन्दी में भावार्थ-
इस धरती पर किसी भी मनुष्य की जब तक पवित्र प्रतिष्ठा या कीर्ति रहती है तभी तक वह स्वर्ग में निवास करता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे धर्म में तीर्थों का विशेष महत्व है। पर्यटन, अध्यात्मिक तथा वैचारिक शुद्धता के लिये तीर्थों पर जाना अच्छी बात है। इतना अवश्य ध्यान रखें कि सामान्य स्थिति में अपने आसपास रहने वाले लोगों के साथ कोमलता का व्यवहार करें जो कि तीर्थों की तरह फल देने वाला होता है। साथ ही यह भी प्रयास करें कि अपने हृदय में हमेशा दूसरों के लिये कोमल भाव रहे। हर व्यक्ति के लिये मंगल कामना करें न कि दिखावे के लिये कोमलता दिखायें। यह ढोंग होगा और इससे न तो दूसरे के हृदय को शांति नहीं मिलेगी और न ही अपना भला होगा। बाहरी कोमलता अंदर की कटुता को खत्म नहीं करती और कहीं न कहीं वह चेहरे पर प्रकट हो जाती है। कोमल व्यवहार से अभिप्राय यही है कि वह हृदय से उत्पन्न होना चाहिए।
अक्सर हमारे देश में स्वर्ग पाने और दिलाने की आड़ में धार्मिक खेल चलता है। इसके लिये लोग धन खर्च करते हैं और ढोंगी उनसे अपना आर्थिक सम्राज्य स्थापित करते हैं। अनेक लोग तो यह धन दूसरों से ठगकर या शोषण कर एकत्रित करते हैं और उनकी अपकीर्ति चारों तरफ फैल रही होती है। सच बात तो यह है कि जिसकी कीर्ति इस संसार में नहीं है उसे स्वर्ग कभी नहीं मिल सकता और जिसने अपने व्यवहार से यहां कीर्ति प्राप्त की तो उसका हृदय वैसे ही शुद्ध हो जाता है और वह यहां तो धरती पर ही स्वर्ग प्राप्त करता ही है आकाश में उसके लिये तब तक जगह बनी रहती है जब तक उसकी कीर्ति इस धरती पर बनी रहती है। अतः जहां तक हो सके हृदय में कोमलता का भाव धारण कर सभी से मधुर व्यवहार करें।
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Tuesday, January 12, 2010

भर्तृहरि शतक-अपना लक्ष्य बीच में नहीं छोड़ें (hindu dharm sandesh-apna lakshya

 रत्नैर्महाहैंस्तुतुषुर्न देवा न भेजिरेभीमविषेण भीतिम्।

सुधा विना न प्रययुर्विरामं न निश्चिततार्थाद्विरमन्ति धीराः।।

हिन्दी में भावार्थ-
समुद्र मंथन करने से देवता लोग अनमोल रत्न पाकर भी प्रसन्न नहीं हुए। भयंकर विष भी निकला पर उनको उससे भय नहीं हुअ और न ही वह विचलित हुए। जब तक अमृत नहीं मिला तब तक वह समुद्र मंथन के कार्य पर डटे रहे। धीर, गंभीर और विद्वान पुरुष जब तक अपना लक्ष्य नहीं प्राप्त हो तब अपना कार्य बीच में नहीं छोड़ते

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-वैसे तो जीवन में अपना लक्ष्य तक करना बहुत कठिन है क्योंकि लोग अपने विवेक से कुछ नया करने की बजाय दूसरे की उपलब्धियों को देखकर ही अपना काम प्रारंभ करते हैं। अगर तय कर लिया तो फिर उस पर निरंतर चलना कठिन है।  होता यह है कि दूसरे की उपलब्धि देखकर वैसे बनने की तो कोई भी ठान लेता है पर उसने अपने लक्ष्य पाने में क्या पापड़ बेले यह किसी को नहीं दिखाई देता।  उसने लक्ष्य प्राप्ति के लिये कितना परिश्रम करते हुए अपमान और तिरस्कार सहा होगा यह वही जानते है।  जिन्होंने  बड़ी उपलब्धि प्राप्त की है उसके पीछे उनका धीरज और एकाग्रता बहुत बड़ा योगदान होता है।

इसके अलावा एक बात यह भी है कि बहुत कम लोगों में धीरज होता है। आज कल संक्षिप्त मार्ग से उपलब्धि प्राप्त करने की परंपरा चल पड़ी है। अगर किसी युवक को धीरज या शांति से काम करने का उपदेश दें तो वह यही कहते हैं कि‘आजकल तो फटाफट का जमाना है।’

वह लगे रहते हैं फटाफट उपलब्धि प्राप्त करने में  पर वह कभी लक्ष्य प्राप्त नहीं कर पाते।  अनेक युवक इसी तरह अपराध मार्ग पर चले जाते हैं।  उसके परिणाम बुरे होते हैं।

जिनको अपना जीवन सात्विक ढंग से शांतिपूर्वक बिताना है उनको समुद्र मंथन के अध्यात्मिक धार्मिक उदाहरण से प्रेरणा लेना चाहिये।


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Sunday, January 10, 2010

विदुर नीति-शक्तिहीन होने पर क्रोध न करें (shakti aur krodh-hindi dharam sandesh)

द्वावेव न विराजेते विपरीतेन कर्मणा।
गृहस्थश्चय निरारम्भः कार्यवांश्चैव भिक्षुकः।।
हिन्दी में भावार्थ-
नीति विशारद विदुर जी के अनुसार अकर्मयण्य गृहस्थ और तथा सांसरिक बातों में लगा भिक्षुक सन्यासी अपने लिये निश्चित कर्म के विपरीत आचरण करने के कारण शोभा नहीं पाते।

द्वाविमौ कपटीकौ तीक्ष्णी शरीरपरिशोषिणी।
पश्चाधनः कामयते यश्च कुप्यत्यनीश्वरः।।
हिन्दी में भावार्थ-
नीति विशारद विदुर जी के अनुसार जो गरीब होकर भी कीमती वस्तु की कामना करता है और शक्तिहीन होने पर भी क्रोध करता है वह अपने शरीर को सुखाने के लिये काम करते हैं।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हर आदमी को अपनी स्थिति के अनुसार ही कदम बढ़ाना ही चाहिये। इसके अलावा अपने नियत कर्म से पृथक होकर अन्य गतिविधि में बिना उद्देश्य ही सक्रिय न हों क्योंकि हर चीज हरेक को शोभा नहीं देती। केवल उन्हीं वस्तुओं के संग्रह की चिंता करना चाहिये जो कि अपने परिवार के लिये आवश्यक हों पर इस बात का ध्यान रखें कि उसके लिये हमारे उसकी प्राप्ति के लिये पास आय का पर्याप्त साधन भी होना चाहिये। आजकल लोग पैसा न होने पर कर्जा लेते हैं और फिर उसे न चुकाने पर चिंता करते हुए अपने शरीर को सुखा डालते हैं। जहां तक मन की बात है तो किसी भी नयी चीज को देखकर उसे पाने के लिये मचलता है तब अपनी बुद्धि इसके लिये काम नहीं करती कि उसकी पूर्ति कैसे होगी?
इसके अलावा कहीं भी किसी भी समय क्रोध करने से बचना चाहिये। खासतौर से वहां जहां अपने से अधिक पदारूढ़, धनवान तथा बाहुबली लोग हों। यह कायरता का नहीं बल्कि सतर्कता बरतने का लक्षण है। मूर्खों को ज्ञान देने, नवधनाढ्य को दान के लिये कहने, पदारूढ़ को विनम्रता के लिये समझाने और बाहुबली को दया के लिये प्रेरित करने के लिये प्रयास में अपना समय व्यर्थ ही करना है। कहीं आपने क्रोध किया तो बहुत जल्दी अपनी शक्तिहीनता का पता भी लग जायेगा। कहने का अभिप्राय यह है कि हमेशा सोच समझकर कदम आगे बढ़ाना चाहिये, ताकि बाद में उसके लिये पछताना न पड़े।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Saturday, January 9, 2010

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-असफलता के तनाव से उपेक्षासन कर छुटकारा पायें (upekshasan-hindi sandesh)

रिपूं वातस्य बलिनः संप्राप्याविश्कृतं फलम्।
उपेक्ष्यतनिमत्रयानमुयेक्षायानमुच्यते।।
हिन्दी में भावार्थ-
जब शक्तिशाली राजा किसी अन्य राज्य पर आक्रमण करे और सफलता न मिले तो उसकी उपेक्षा कर देना चाहिये।
निवातकवचान् हित्वा हिरण्यपुरवासिनः।
उपेक्षयानमास्याय निजधान धनजयः।।
हिन्दी में भावार्थ-
महाभारत काल में अर्जुन ने हिरण्यपुर वासी जनों को छोड़कर उनकी उपेक्षा करते हुए निवातकवचों का सहंार किया था।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन में कभी भी असफलता से घबड़ाने की बजाय उसकी उपेक्षा करते हुए अपने नये लक्ष्य की तरफ बढ़ना चाहिये। यह उपेक्षासन हमें तनाव से मुक्ति दिलाता है। सभी मनुष्य अपनी बुद्धि और विवेक से जीवन में विकास पथ पर अग्रसर होते हैं पर कहीं सफलता तो कहीं असफलता मिलती है। समझदार मनुष्य अपनी असफलताओं से विचलित हुए बिना उपेक्षासन करते हुए अपनी राह पर दूसरे लक्ष्य की तरफ आगे बढ़ जाते हैं। इसके विपरीत जो असफलताओं की सोचकर बैठे रहते हैं वह जीवन में कभी खुश नहीं रह पाते। वैसे हमें अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिये योजनापूर्वक काम करना चाहिये पर यह दुनियां हमेशा हमारे अनुसार नहीं चलती। इसलिये हमारी योजना का जो भाग दूसरे पर निर्भर है उसके बारे में कोई बात निश्चितता से नहीं कही जा सकती है। अनुमान सही न होने या गलत निकलने पर जब दूसरे के योगदान का विषय गड़बड़ाता है तब हमारा अभियान अनेक बार शिथिल पड़ जाता है। इससे घबड़ाना नहीं चाहिये। मनुष्य का धर्म है कि वह हमेशा कर्म करता रहे। सफलता का आनंद तो वह उठाता ही है पर अगर असफलता मिले तो उपेक्षासन कर उसके तनाव से मुक्ति भी पा सकता है। समय का फेर होता है कभी कभी असफलता भी प्रेरणा कर कारण बनती है-इतिहास में ऐसे अनेक प्रमाण मौजूद हैं।
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Friday, January 8, 2010

मनु स्मृति-अपने हृदय को देवता समझें (dil hi bhagvan hai-hindu dharma sandesh)

द्यौर्भूमिरापो हृदयं चंद्रर्काग्नि यमानिलाः।
रात्रिः सन्ध्ये च धर्मख्च वृत्तजाः सर्वदेहिनाम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
मनु महाराज के अनुसार आकाश, पृथ्वी, पानी, हृदय, चंद्र, सूर्य, अग्नि, यम, वायु, रात संध्या और धर्म सभी प्राणियों के सत् असत् कर्मों को देखते हैं। इनको देवता ही समझना चाहिये।
साक्ष्येऽनृतं वदन्याशैर्बध्यते वारुणैर्भृशम्।
विवशः शमाजातीस्तरस्मात्साक्ष्यं वदेदृतम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
झूठी गवाही देने वाले मनुष्य, वरुण देवता के पाशों से बंधकर सैंकड़ों वर्षों तक जलोदर बीमारियों से ग्रसित जीवन गुजारता है। अतः हमेशा किसी के पक्ष में सच्ची गवाही ही देना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-क्या हम सोचते हैं कि हम कोई भी काम कर रहे हैं तो दूसरा कोई उसे नहीं देख रहा? ऐसी गलती कभी न पालें। इस धरा पर ऐसे कई जीव विचरण कर रहे हैं जिनको हम नहीं देख पाते पर वह हमें देख रहे हैं। दूसरों की छोड़िये अपने अंदर के हृदय को ही कहां देख पाते हैं। यह हृदय भी देवता है पर उसे कहां समझ पाते हैं? वह लालायित रहता है धर्म और परोपकार का कार्य करने के लिये पर मनुष्य मन तो हमेशा अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर विचरण करता है। एक नहीं अनेक बार झूठ बोलते हैं। दूसरों की निंदा करने के लिये प्रवृत्त होने पर उसके लिये ऐसे किस्से गढ़ते हैं कि जो हम स्वयं जानते हैं कि वह सरासर झूठ है। मगर बोलते हैं यह मानते हुए कि कोई देख नहीं रहा है।

ऐसे भ्रम पालकर हम स्वयं को धोखा देते हैं। इस चंद्रमा, सूर्य नारायण, प्रथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश के साथ हमारा हृदय देवता सब देख रहा है। समय आने पर यह देवता दंड भी देते हैं। अतः कोई भी अच्छा काम करते हुए इस बात की चिंता नहीं करना चाहिये कि कोई उसे देख नहीं रहा तो क्या सुफल मिलेगा तो बुरा कर्म करते हुए इस बात से लापरवाह भी न हों कि कौन देख रहा है जो सजा मिलेगी?
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Wednesday, January 6, 2010

संत कबीर के दोहे-सम्मान की चाहत बनती दुःख कारण (sant kabir ke dohe-samman ki chahat buri)

मान बड़ाई ऊरमी, ये जग का व्यवहार।
दीन गरीबी बन्दगी, सतगुरु का उपकार।।

संत शिरोमणि कबीरदास का कहना है कि जिस तरह दुनियां का व्यवहार है उससे देखकर तो यही आभास होता है कि मान और बड़ाई दुःख का कारण है। सतगुरु की शरण लेकर उनकी कृपा से जो गरीब असहाय की सहायता करता है, वही सुखी है।
मान बड़ाई देखि कर, भक्ति करै संसार।
जब देखैं कछु हीनता, अवगुन धरै गंवार।
संत कबीरदास जी कहते हैं कि दूसरों की देखादेखी कुछ लोग सम्मान पाने के लिये परमात्मा की भक्ति करने लगते हैं पर जब वह नहीं मिलता वह मूर्खों की तरह इस संसार में ही दोष निकालने लगते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भक्त और ज्ञानी की पहचान यह है कि वह कभी अपनी भक्ति और ज्ञान शक्ति का बखान नहीं करते बल्कि निर्लिप्त भाव से समाज सेवा करते हुए अपना जीवन यापन करते हैं। अपनी सच्ची भक्ति और ज्ञान के कारण कुछ लोग महापुरुषों की श्रेणी में आ जाते हैं उनको देखकर अन्य लोग भी यही प्रयास करते हैं कि उनकी पूजा हो। यह केवल अज्ञान का प्रमाण है अलबत्ता अपने देश में धार्मिक प्रवचन एक व्यवसाय के रूप में चलता रहा है। इस कारण तोते की तरह किताबों को रटकर लोगों को सुनाते हुए खूब कमाते हैं। उनको देखकर कुछ लोग यह सोचते हुए भक्ति का दिखावा करते हैं कि शायद उनको भी ऐसा ही स्वरूप प्राप्त हो। अनेक लोग संतों की सेवा में इसलिये जाते हैं कि हो सकता है कि इससे उनको किसी दिन उनकी गद्दी प्राप्त हो जाये। ऐसे में भक्ति और ज्ञान तो एक अलग विषय हो जाता है और वह मठाधीशी के चक्कर में राजनीति करने लगते हैं। किताबों को रटने की वजह से उनको शब्द ज्ञान याद तो रहता है ऐसे में वह थोड़ा बहुत प्रवचन भी कर लेते हैं पर उनकी भक्ति और ज्ञान प्रमाणिक नहीं है। वैसे भी अपने पौराणिक ग्रंथों का अध्ययन हर आदमी इतना तो कर ही लेता है कि उसे सारी कथायें याद रहती हैं। नहीं भी अध्ययन करे तो इधर उधर सुनकर उसे बहुत सारी कथायें याद आ ही जाती हैं। । किसी आदमी ने वह भी नहीं किया हो तो अपने अध्यात्मिक दर्शन के कुछ सूक्ष्म सत्य-निष्काम कर्म करो, परोपकार करो, दया करो और माता पिता की सेवा करे जैसे जुमले- सुनाते हुए श्रोताओं और दर्शकों की कल्पित कहानियों से मनोरंजन करता है। उनको सम्मानित होते देख अन्य लोग भक्ति में जुट जाते हैं यह अलग बात है कि कामना सहित यह भक्ति किसी को भौतिक फल दिलाती है किसी को नहीं।
फिर भक्ति हो या ज्ञानार्जन अगर कामना सहित किया जाये और सफलता न मिले तो आदमी संसार में दोष ढूंढने लगता है। यह केवल भक्ति या ज्ञान के विषय में नहीं है बल्कि साहित्य और कला के विषयों में भी यही होता है। आदमी आत्ममुग्ध होकर अपना काम शुरु करता है पर जब उसे सफलता नहीं मिलती तो वह निराश हो जाता है। निष्कर्ष यह है कि सम्मान पाने का मोह आदमी के लिये दुःख का कारण बनता है। एक बात याद रखें सम्मान पाने की चाह पूरी नहीं हुई तो दुःख तो होगा और अगर पूरी भी हो गयी तो अपमान भी हो सकता है। जहां सुख है वहां दुःख भी है। जहां आशा है वहां निराशा भी है। जहां सम्मान है वहां अपमान भी है। अगर सम्मान मिल गया तो चार लोग आपके दोष निकालकर अपमान भी कर सकते हैं।
इसलिये अच्छा यही है कि अपने कर्म निष्काम भाव से करें। इस संसार में निर्विवाद सम्मान पाने का बस एक ही तरीका है कि आप गरीब को धन और अशिक्षित को शिक्षा प्रदान करें। प्रयोजन रहित दया करें। ऐसे काम बहुत कम लोग करते हैं। जो सभी कर रहे हैं उसे आप भी करें तो कैसा सम्मान होगा? सम्मान तो उसी में ही संभव है जो दूसरे लोग न करते हों।
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Monday, January 4, 2010

रहीम के दोहे-चिंता तो जीव को ही लील जाती है (rahim ke dohe-chinta aur chita)

रहिमन कठिन चितान ते विंतर करे चित चेत।
चिता दहति निर्जीव को, चिंता जीव समेत।।
कविवर रहीम कहते हैं कि कठिन चिंताओं का चिंतन करने की अपेक्षा चित पर ध्यान करें क्योंकि चिता तो प्राणहीन शव को दग्ध करती है पर चिंता तो जीवित मनुष्य को ही लील जाती है।
रहिमन कबहुं बड़ने के, नाहिं गर्व को लेस।
भारत धरैं संसार को, तऊ कहावत सेस।।
कविवर रहीम कहते हैं कि महान पुरुषों को कभी अपने बड़प्पन का अहंकार नहीं होता। इतनी भरी धरती को धारण करने वाले भगवान कहलाते तो शेष ही हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अपने ध्यान पर नियंत्रण करना जरूरी है। इसी ध्यान के द्वारा ही हम अपने मन, बुद्धि तथा अहंकार पर दृष्टि रख सकते हैं। निरर्थक चिंतायें पालने से शरीर जलने लगता है। इस संसार का जीवन कोई हमारी करनी से नहीं चल रहा है बल्कि उसका शाश्वत नियम ही बहना है। हम अपनी देह और उससे जुड़े लोगो की चिंता करते हुए यह सोचते हैं कि हम उनके कर्ता हैं। यह भ्रममात्र है। जो घटनायें घट रही हैं उनको तो घटना ही है हम तो केवल भौतिक तत्व होने के कारण उससे जुड़े होते हैं।
यह कर्तापन का अहंकार न केवल अपने लिये दुःखदायी है बल्कि समाज में छवि को भी खराब करता है। कहा जाता है ‘थोथा चना बाजे घना’ और समाज में ऐसे तत्वों का बोलबाला है जो कथित रूप से अपनी भौतिक उपलब्धियों के कारण इतराते बहुत हैं। तब जिनके पास भौतिक साधनों का अभाव है वह लोग अपने अंदर मानसिक कुंठायें पाल लेते हैं। अनेक लोग तो इस चिंता में अपना शरीर जला देते हैं कि हम अमुक व्यक्ति जैसा ही सामाजिक स्तर प्राप्त करें। उधर अहंकार में डूबे भौतिकता से संपन्न लोग भी शारीरिक श्रम करने वालों को हेय समझते हैं। उनकी इसी प्रवृत्ति के कारण छोटे लोगों में जो विद्रोह पैदा होता है उसका अनुमान नहीं करते। यही विद्रोह कहीं अपराध में तो कहीं हिंसा में प्रकट होता है।
अतः जीवन सहज भाव से जीने और समाज में समरसता का भाव बनाये रखने के लिये यह आवश्यक है कि चिंता और अहंकार के भाव से मुक्त रहा जाये।
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Sunday, January 3, 2010

संत कबीर के दोहे-ज्ञानी और भक्त अपनी आलोचना से विचलित नहीं होते (gyani aur bhakt-sant kabir ke dohe)

जिनके नाम निशान हैं, तिन अटकावै कौन।
पुरुष खजाना पाइया, मिटि गया गौन।।
जिनके मन में भगवान के प्रति भक्ति और ज्ञान है उनको भला कौन अटका सकता है। उस तत्व ज्ञान को पाकर तो मनुष्य जीवन मृत्यु के भाव से मुक्त हो जाता है।
ऐसे साच मानई, तिलकी देखो जोस
जारि जारि कोयला करै, जमता देखो सोय।।
यदि किसी बात को सच नहीं मानते तो तिल के काष्ट को जाकर देखो। उसे जलाकर राख कर दिया जाता है पर वह फिर अंकुरित होकर प्रकट होता है। जो तत्व ज्ञान है वह हर परीक्षा की कसौटी पर खरा उतरता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-ज्ञानी और भक्त किसी की परवाह नहीं करते। यह अलग बात है कि वह इसे प्रकट नहीं करते और संसार के कार्यों में लिप्तता प्रदर्शित करते हैं। ज्ञानी और भक्त की पहचान यह है कि वह तमाम तरह की आलोचना और निंदा को झेलते हुए भी अपने पथ से विचलित नहीं होते। इस संसार में मनुष्य का तो स्वभाव है कि वह अल्प ज्ञान क आधार पर ही सम्मान पाना चाहता है और वह इसके लिये दूसरे की निंदा भी करने को तैयार हो जाता है। जिनके पास ज्ञान और भक्ति का भंडार है वह कभी छोटी मोटी बातों से विचलित नहीं होते। उनकी पहचान यह है कि अगर उनका निंदक भी उनके सामने आ जाये तो उसे अपमानित नहीं करते। क्षमा उनका स्वाभाविक गुण होता है।
इसके विपरीत जिन्होंने ज्ञान की किताबें रट ली है उनकी भक्ति का प्रयोजन केवल अन्य लोगों पर अपना प्रभाव जमाना होता है। वह उस ज्ञान का अक्सर बखान करते हैं पर उनके आचार विचार में वह धारण किया हुआ प्रकट नहीं होता। ऐसे लोग थोड़ी सी आलोचना पर भी उत्तेजित हो जाते हैं। अगर सच्चे और ढोंगेी ज्ञानी का पहचान करनी हो तो इस बात को देखें कि कौन अपनी बात पर अमल करता है और कौन केवल मौखिक बात कहकर उसे भूल जाता है।
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Friday, January 1, 2010

भर्तृहरि शतक-धनहीन होने पर भी विद्वान रत्न के समान (garib vidvan bhee ratna saman-hindu dharma sandesh)

शास्त्रोपस्कृतशब्द सुंदरगिरः शिष्यप्रदेयाऽऽगमा विख्याताः कवयो वसन्ति विषये यस्य प्रभर्निर्धनाः।
तज्जाड्यं वसुधाधिपस्य कवयस्त्वर्थ विनाऽपीश्वराः कुत्स्या स्युः कुपरीक्षका हि मणयो यैरर्घतः पातिताः।।
हिन्दी में भावार्थ-
ग्रंथों का अध्ययन से उसमें वर्णित शब्दों के ज्ञान को धारण कर सुंदर वाणी बोलने के साथ ही शिष्यों को उनका उपदेश करने वाले विद्वान तथा काव्य की मधुर धारा प्रवाहित करने वाले कवि जिस राज्य में निर्धन होते हैं, उसका राजा या राज्य प्रमुख अयोग्य कहा जाता है। विद्वान धनहीन होने पर भी रत्न के समान है और उसका सम्मान सभी जगह होता है और जो ऐसे रत्नों का अपमान करता है वह निंदा योग्य है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हम इस संदेश को आज की नई सभ्यता में देखें तो यह दायित्व पूरे समाज का है कि वह लोगों को तत्व ज्ञान तथा सत्य का उपदेश देने वाले विद्वानो के साथ ही कवियों और लेखकों को भी संरक्षण दे। राज्य प्रमुख का तो यह उच्चतर दायित्व है पर आजकल जिस तरह पूंजीवाद ने व्यापक आधार बनाया है तो उसके शिखर पुरुषों को भी इस तरह ध्यान देना चाहिए। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक शिखरों पर बैठे माननीय लोगों की उपेक्षा का ही यह परिणाम है कि आजकल समाज में कोई अपने बच्चे को अध्यात्मिक ज्ञान न तो देना चाहता है न ही किसी से प्राप्त करने के लिये प्रेरित करता है। यही हाल साहित्य का है। इस देश में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो अपने लड़के या लड़की का किसी भी भाषा का लेखक होना पसंद करे-सिवाय अंग्रेजी के। इसका कारण यही है कि हमारे उच्च शिखर पुरुषों ने यह मान लिया है कि समाज को वैचारिक, साहित्यक तथा अध्यात्मिक मार्ग पर आगे ले जाने वाले विद्वानों, कवियों और लेखकों को संरक्षण देने की आवश्यकता नहीं है। उनकी उपेक्षा का ही यह परिणाम है कि समाज में हर कोई अपने बच्चे को चिकित्सक, अभियंता, उच्च श्रेणी का अध्यापक तथा प्रशासनिक अधिकारी बनाना चाहता है जो अधिक से अधिक धन का स्वयं दोहन कर सके क्योंकि विद्वानों या लेखकों को आश्रय देने वाला कोई नहीं है।
इसी कारण हमारे समाज में एक ‘खिचड़ी संस्कृति’ बन गयी है। आपने देखा होगा कि आजकल अनेक लोग यह शिकायत करते हैं कि ‘बुढ़ापे में बच्चे उनकी देखभाल नहीं करते।’ उनसे पूछिये कि ‘क्या आप इसके लिये जिम्मेदार नहीं हैं क्योंकि आपने ही ऐसे संस्कार नहीं दिये।’
हमारे शिखर पुरुष कानून के द्वारा समाज को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहे हैं। यह एक बेकार का प्रयास है। एक तरफ आप पूरी तरह पाश्चात्य सभ्यता का अनुकरण न केवल स्वयं कर रहे बल्कि अपने बच्चों को भी उस पर चलते देखना चाहते हैं। फिर उनसे देशी व्यवहार की आशा करना कहां तक उचित है?
देश की सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक प्रक्रिया में विद्वानों की निष्क्रियता समाज के लिये घातक होती है, इसलिये जितना हो सके सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक शिखर बैठे लोग उनको संरक्षण दें या फिर समाज के बिगड़ने का रोना बंद कर दें।
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Thursday, December 31, 2009

भर्तृहरि शतक-सच्चे तेजस्वी लोग दूसरों से ईर्ष्या नहीं करते (hindi dharama sandesh-tejsavi log aur eershaya)

सन्त्यन्येऽपि बृहस्पतिप्रभृतयः सम्भाविताः पञ्चषास्तान्प्रत्येष विशेष विक्रमरुची राहुनं वैरायते।

द्वावेव ग्रसते दिवाकर निशा प्राणेश्वरी भास्वरौ भ्रातः! पर्यणि पश्च दानवपतिः शीर्षवशेषाकृतिः।।

हिन्दी में भावार्थ-
आसमान में विचरने वाले बृहस्पति सहित पांच छह तेजवान ग्रह है लेकिन अपने पराक्रम में रुचि रखने वाला राहु उनसे ईष्र्या या बैर नहीं रखता। वह पूर्णिमा तथा अमास्या के दिन सूर्य और चंद्रमा को ग्रसित करता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-किसी भी व्यक्ति के गुण, ज्ञान और शक्ति की पहचान उसके लक्ष्य से होती है।  जिन लोगों को अपना  ज्ञान अल्प होते हुए सम्मान पाने का मोह होता है वह पूर्णता प्राप्त किये बिना ही अपना अभियान प्रारंभ करते हैं।  कहीं सम्मान तो कहीं धन पाने का मोह होने के कारण उनकी रुचि अपने ज्ञान, शक्ति या गुण से दूसरे को लाभ देने की बजाय अपना हित साधना होता है।  अल्पज्ञानी, धैर्य से रहित तथा मोह में लिप्त ऐसे लोग समय पड़ने पर आत्मप्रंवचना से भी बाज नहीं आते। उनका लक्ष्य किसी तरह दूसरे आदमी को प्रभावित कर उसे अपने चक्कर में फांसना होता है।

आजकल तो मायावी नायकों को ही असली नायक की तरह प्रचारित किया जाता है। ऐसे लोगों को देवता बनाकर प्रस्तुत किया जाता है जिन्होंने समाज में किसी का कल्याण करने की बजाय अपने लिये संपत्ति ही जुटाई है।  लोग भ्रमित हो जाते हैं कि क्या वाकई उनमें ऐसी कोई असाधारण बात है जो उनमें नहीं है।

इस संसार में माया को पाने का मोह रखने वाले दूसरे के भ्रम से ही कमाते हैं इसलिये अपने अंदर ज्ञान का होना जरूरी है ताकि उनकी चालों से विचलित न हों। जो वास्तव में तत्वज्ञानी, शक्तिशाली और गुणी हैं वह प्रदर्शन करने के लिये नहीं निकलते क्योंकि उनके पास ज्ञान, शक्ति और गुण संग्रह से ही अवसर नहीं मिलता। वह स्वयं बाहर निकल शिष्य ढूंढकर गुरु की पदवी से सुशोभित होने का मोह नहीं पालते। अक्सर लोग यह सवाल कहते हैं कि ‘आजकल अच्छे गुरु मिलते ही कहां है? अगर हैं तो हम उसे कैसे ढूंढें।’

उनहें भर्तृहरि महाराज के संदेश से प्रेरणा लेना चाहिए। उन्हें ऐसे व्यक्ति की तलाश करना चाहिये जो दूसरों की उपलब्धि से द्वेष न करते हुए अपने ही सृजन कार्य में लिप्त रहता हो। सम्मान और धन पाने के लिये लालच का मोह उसकी आंखों में दृष्टिगोचर नहीं होता।  वह गुरु बनने के लिये प्रचार नहीं करता।  उसका लक्ष्य तो केवल अपना जीवन मस्ती में जीने के साथ ही ज्ञान, शक्ति और गुण प्राप्त करने के लिये नियमित अभ्यास तथा परीक्षण करना होता है।

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Wednesday, December 30, 2009

मनुस्मृति-धन और काम में आसक्ति से परे हो, वही सच्चा धार्मिक उपदेशक (sachcha sant-manu smriti in hindi)

अर्थकामेष्वसक्तनां धर्मज्ञानं विधीयते।
धर्म जिज्ञासमानाना प्रमाणं परमं श्रुतिः।।
हिन्दी में भावार्थ-
महाराज मनु के अनुसार धर्म का उपदेश और प्रचार का काम केवल उन्हीं लोगों को करना चाहिए जो काम और अर्थ के विषय में आसक्त नहीं है। जिनकी काम और अर्थ में आसक्ति है उनकी धर्म में अधिक रुचि नहीं रहती। इसके अलावा उनको धर्म के उपदेश स्वयं ही समझ में नहीं आता इसलिये उनके वचन प्रमाणिक नहीं होते।
श्रुतिद्वेघं तु यत्र स्यात्तत्र धर्मवुभोस्मृतौ।
उभावपि हि तौ धर्मो सम्यगुक्तौ मनाीषिभिः।।
हिन्दी में भावार्थ-
वेदों में जहां किसी विषय पर आपस में विरोधी संदेश हों वहां पर संभव है कि संदर्भ के कारण अलग अलग अर्थ दिखते हैं पर ज्ञानी लोग इस बात समझते हैं और उनसे इस विषय में परामर्श करना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनु महाराज का स्पष्ट मानना है कि जो धर्मोपदेश या प्रवचन आदि करते हैं उनको काम और अर्थ में रुचि नहीं दिखाना चाहिये। आजकल ऐसी संत परंपरा प्रचलन में आई है कि जिसमें मठाधीश स्वयं ही धन की उगाही कर कथित रूप से धर्मार्थ काम कर रहे हैं। सच बात तो यह है कि एक संत को चाहिये कि वह जीवन रहस्यों से संबंधित विषयों पर ही अपनी बात अपने श्रोताओं के सामने रखे न कि उनकी सांसरिक समस्याओं को हल करे। बीमारी, गरीबी तथा अन्य घरेलू संकट आदमी के भौतिक परेशानी है और अगर उसका मन और शरीर स्वस्थ हो वह उनका सामना स्वयं ही कर सकता है। इसके लिये यह जरूरी है कि वह योग साधना तथा ध्यान से अपने मन, शरीर और विचारों के विकार निकाले तथा तत्व ज्ञान को धारण करे। वह वही खाये जो पचा सके और इसके लिये उसे किसी सलाह की आवश्यकता नही पड़े अगर वह प्रतिदिन योग आसन कर उसका निरीक्षण करे।
कहने की आवश्यकता है कि व्यक्ति निर्माण सांसरिक विषयों पर चर्चा कर नहीं किया जा सकता है बल्कि उसके लिये अध्यात्मिक ज्ञान आवश्यक है। इसके विपरीत अनेक कथित गुरु प्राचीन ग्रंथों की कथायें पर लोगों का मनोरंजन करते हैं पर दावा यह कि वह तो धर्म का काम रहे हैं। वह धन संचय के लिये अपने भक्तों के सामने झोली फैलाते हैं और दिखाने के लिये गरीबों की सेवा करने के साथ ही बीमारों के इलाव की व्यवस्था करते हैं। यह ढोंग है। कई संत तो ऐसे भी हैं जो यह दावा करते हैं कि वह तो जमीन पर सोते हैं भले ही उनके आश्रम पंचसितारा सुविधाओं से सुसज्जित है। अब यह कौन देख पाता है कि उनका अंदर रहन सहन कैसा है? इतना ही नहीं कुछ संत यह चाणक्य महाराज का यह कथन दोहराते हैं कि ‘धर्म निर्वाह के लिये धन का होना आवश्यक है’। दरअसल चाणक्य महाराज ने यह बात सामान्य गृहस्थ को सन्यासी जीवन से विरक्त करने के लिये लिखी है न कि कथित सन्यासियों के धन संग्रह की प्रवृत्ति जगाने के लिये ऐसा कहा है।
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Tuesday, December 29, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-निंदा से परे मनुष्य देहधारी देवता ही समझें (ninda se pare insan hote devta-hindu dharmik sandesh)

कौटिल्य महाराज ने अपने अर्थशास्र में कहा  है कि
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ये प्रियाणि प्रभाषन्ते प्रयच्छन्ति च सत्कृतिम्।
श्रीमन्तोऽनिद्य चरिता देवास्ते नरविग्रहाः।।

     हिन्दी में भावार्थ-जो मनुष्य सदैव प्रिय और मधुर वाणी बोलने के साथ ही सत्पुरुषों की निंदा से रहित होते हैं उनको शरीरधारी देवता ही समझना चाहिये।
स्वभावेन हरेन्मित्रं सद्भावेन व बान्धवान्।
स्त्रीभृत्यान् प्रेमदानाभ्यां दाक्षिण्येनेतरं जनम्।।
     हिन्दी में भावार्थ-स्वभाव से मित्र, सद्भाव स बंधुजन, प्रेमदान से स्त्री और भृत्यों को चतुराई से वश में करें।
     वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कौटिल्य का अर्थशास्त्र न केवल अध्यात्मिक ज्ञान बल्कि जीवन जीने की कला का रूप भी हमारे सामने प्रस्तुत करता है। अगर हम गौर करें तो देखेंगे कि हम अपने शत्रु और मित्र स्वयं ही बनाते हैं। अपने लिये सुख और कष्ट का प्रबंध हमारे व्यवहार से ही होता है। अक्सर हम लोग ऐसे व्यक्ति की निंदा करते हैं जो हमारे सामने मौजूद नहीं रहता। यह प्रवृत्ति बहुत आत्मघाती होती है क्योंकि हम स्वयं भी इस बात से आशंकित रहते हैं कि हमारे पीछे कोई निंदा न करे। एक बात पर ध्यान दें कि कुछ ऐसे लोग हमारे आसपास जरूर विचरण करते हैं जो दूसरे की निंदा आदि में नहीं लगे रहते उनकी छवि हमेशा ही अच्छी रहती है। महिलाओं में परनिंदा की प्रवृत्ति अधिक देखी जाती है पर जो महिलाऐं इससे दूर रहती हैं अन्य महिलायें स्वयं उनको देखकर अचंभित रहती हैं-वह स्वयं ही कहती हैं कि अमुक स्त्री बहुत शालीन है और किसी की निंदा वगैरह जैसे कार्य में लिप्त नहीं होती।
      दूसरे की बुराई कर अपनी श्रेष्ठता का प्रचार मानवीय मन की स्वभाविक बुराई है और जो इससे परे रहता है उसे तो शरीरधारी देवता शायद इसलिये ही समझा जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि जिन लोगों को अपनी छवि बनाने का मोह हो वह परनिंदा करना छोड़ दें तो उनकेा अपना लक्ष्य पाने में अत्यंत सहजता और सरलता अनुभव होगी। संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Monday, December 28, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-कपटी से मित्रता में धर्म की हानि होती है (kautilya sandesh-kapti se dosto se dharm kee hani)

 मित्रं विचार्य बहुशो ज्ञातदोषं परित्येजेत्।

त्यंजन्नभूतेदोषं हि धर्मार्थावुपहन्ति हिं।।

हिन्दी में भावार्थ-
नीति विशारद कौटिल्य के अनुसार अपने मित्रों के बारे में विचार करना चाहिए। अगर उनमें छल कपट या अन्य दोष दिखाई दे तो उसे त्याग दें।  ऐसा न करने पर न केवल धर्म की हानि होती है बल्कि जीवन में कष्ट भी उठाना पड़ता है।

सा बन्धुर्योऽनुबंघाति हितऽर्ये वा हितादरः।

अनुरक्तं विरक्त वा तन्मिंत्रमुपकारि यत्।।

हिन्दी में भावार्थ-
वही बंधु है जो हमारे उद्देश्य की पूर्ति में सहायक होने के साथ आदर करने वाला हो। अनुरक्त हो या विरक्त पर उपकार आवश्यक करे वही सच्चा बंधु है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-समय के साथ समाज में खुलापन आ रहा है और मित्र संग्रह में लोगों की लापरवाही का नतीजा यह है कि सभी जगह खुद के साथ धोखे की शिकायत करते हुए मिलते हैं।  इतना ही नहीं युवा पीढ़ी तो हर मिलने और बातचीत करने वाले को अपना मित्र समझ लेती है। मित्र के गुणों की पहचान कोई नहीं करता।

मित्र का सबसे बड़ा गुण है कि वह हर समय सहयोग के लिये तत्पर दिखता  हो। इसके अलावा वह अन्य लोगों के सामने अपमानित न करे और साथ ही समान विचारधारा वाला हो। स्वभाव के विपरीत होने पर या विचारों की भिन्नता वाले से अधिक समय तक मित्रता नहीं चलती अगर चलती है तो धर्म की हानि उठानी पड़ सकती है।   इसके अलावा मित्र वह है जो कहीं अपने मित्र की गुप्त बातों को कहीं उजागर न करता हो।  इतना ही नहीं मित्र का अन्य मित्रों का समूह और कुल भी अनुकूल होना चाहिये।   अगर वह केवल दिखावे की मित्रता करता है तो आपके वह रहस्य जो दूसरों के जानने योग्य नहीं है सभी को पता चल जाते हैं।  दूसरी बात यह है कि मित्र जब हमारे साथ होता है तब हमारा लगता है पर जब दूसरी जगह होता है तो दूसरों का होता है-यह विचार भी करना चाहिये।

कुछ लोग केवल स्वार्थ की वजह से मित्रता करते हैं-वैसे आजकल अधिकतर संख्या ऐसे ही लोगों की है-इस विचार करना चाहिऐ। एकांत में  हमेशा अपने मित्र समूह पर चिंतन करते हुए जिनमें दोष दिखता है या जिनकी मित्रता सतही प्रतीत होती है उनका त्याग कर देना चाहिये।
इसके अलावा निकट रहने पर मित्र के प्रति अपने भाव का अवलोकन भी उससे कुछ समय दूर रहकर करना चाहिये। निकट रहने पर उसके प्रति मोह रहता है इसलिये यह पता नहीं लगता कि उसकी नीयत क्या है? दूर रहने पर उससे मोह कम हो जाता है तब यह पता लगता है कि उसके प्रति हमारे मन में क्या है? इतना ही न अपने बच्चों के मित्रों और मिलने जुलने वालों पर भी दृष्टिपात करना चाहिये। आजकल काम की व्यस्तताओं की वजह  से माता पिता को अपने बच्चों की देखभाल का पूरी तरह अवसर नहीं मिल पाता इसलिये उनको बरगलाने की घटनायें बढ़ रही है।  ऐसा उन्हीं माता पिता के साथ होता है जो अपने बच्चों के मित्रों की यह सोचकर उपेक्षा कर देते हैं कि ‘वह क्या कर लेगा?’
कहने का तात्पर्य यह है कि अपने घर के सदस्यों के मित्रों पर दृष्टिपात करना चाहिये। अगर अपने मित्र दोषपूर्ण लगें तो उनसे दूरी बनायें और घर के सदस्यों के हों तो उन्हें इसके लिये प्रेरित करें।  मित्र के गलत होने पर धर्म की हानि अवश्य होती है।


संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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