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Monday, March 15, 2010

संत कबीर वाणी-शीतल गंगा जल पर्वत को फोड़ देता है (sant kabir vani-Ganga jal ki shitlata)

कुटिल बचन नहिं बोलिये, शीतल बैन ले चीन्हि
गंगा जल शीतल भया, परबत फोड़ा तीन्हि।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कुटिल वचन न बोलते हुए मधुर शब्दों का चयन करना चाहिये। जिस तरह गंगा जल शीतल होकर पहाड़ भेद देता है वैसे ही शीतल वचन मनुष्य की शक्ति होते हैं जो उसे सफल बनाते हैं।
बोलै बोल विचारि के, बैठे ठौर संभारि।
कहैं कबीर ता दास को, कबहुं न आवै हारि।
संत कबीरदास जी का कहना है कि हमेशा विचार कर अपनी बात रखना चाहिये। जो विनम्रता पूर्वक बोलता है वह कभी पराजित नहीं होता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अपनी शक्ति और प्रभाव दिखाने के लिये कड़े शब्द बोलने से कोई लाभ नहीं होता। संभव है कि कटु वचन सुनने पर कोई व्यक्ति तत्काल उसका उत्तर न दे पर वह बोलने वाले के प्रति मन में वह विद्वेष तो पाल लेता है। दूसरी बात यह भी है कि हमेशा सोच विचार कर कहीं अपनी बात रखना ही अच्छा है क्योंकि बिना विचारे कही गयी बात का दुष्परिणाम भी भोगना पड़ता है।
मन हमेशा स्वच्छ रखकर दूसरों से व्यवहार करने से ही सारे काम सिद्ध होते हैं। अगर किसी व्यक्ति से काम निकालना है और उसके साथ हम चालाकी करते हैं तो वह समझ जाता है। कुटिल लोग अपने आपको कितना भी चालाक समझें पर उनकी पोल छिपी नहीं रहती। एक बात ध्यान रखें जब आपके मन में किसी के प्रति कुटिलता का भाव आता है तो दूसरा भी उससे बच नहीं सकता। ऐसे में व्यवहार कलुषित हो जाता है। अपने मन में इसलिये स्वच्छता और निर्मलता का भाव रखते हुए अपने मुंह से निकलने वाली को कोमल बनाना चाहिये।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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Tuesday, March 2, 2010

चाणक्य नीति-संपत्ति संग्रह से तृप्ति कभी नहीं मिल पाती (money and life-chankya niti)

किं तया क्रियते लक्ष्म्या या वधूरिव केवला।
या तु वेश्येव सा मान्या पथिकैरपि भुज्यते।।
हिन्दी में भावार्थ-
उस संपत्ति से क्या लाभ जो केवल घर की अपने ही उपयोग में आती हो। जिसका पथिक तथा अन्य लोग उपयोग करें वही संपत्ति श्रेष्ठ है।
धनेषु जीवतिव्येषु स्त्रीषु चाहारकर्मसु।
अतृप्तः प्राणिनः सर्वे याता यास्यन्ति यान्ति च।।
हिन्दी में भावार्थ-
धन और भोजन के सेवन तथा स्त्री के विषयों में लिप्त रहकर भी अनेक मनुष्य अतृप्त रह गए, रह जाते हैं और रह जायेंगे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य के लोभ की सीमा अनंत है। वह जितना ही धन संपदा के पीछे जाता है उतना ही वह एक तरह से दूर हो जाती हैं। किसी को सौ रुपया मिला तो वह हजार चाहता है, हजार मिला तो लाख चाहता है और लाख मिलने पर करोड़ की कामना करता है। कहने का तात्पर्य यह है कि दौलत की यह दौड़ कभी समाप्त नहीं होती। आदमी का मन मरते दम तक अतृप्त रहता है। जितनी ही वह संपत्ति प्राप्त करता है उससे ज्यादा पाने की भावना उसके मन में जाग्रत होने लगती है।
आखिर अधिकतर लोग संपत्ति का कितना उपयोग कर पाते हैं। सच तो यह है कि अनेक लोग जीवन में जितना कमाते हैं उतना उपभोग नहीं कर पाते। उनके बाद उसका उपयोग उनके परिजन करते हैं। बहुत कम लोग हैं जो सार्वजनिक हित के लिये दान आदि कर समाज हित का काम करते हैं। ऐसे ही लोग सम्मान पाते हैं। जिन लोगों की अकूल संपत्ति केवल अपने उपयेाग के लिये है तो उसका महत्व ही क्या है? संपत्ति तो वह अच्छी है जिसे समाज के अन्य लोग भी उपयोग कर सके। जब समाज किसी की संपत्ति का उपयेाग करता है तो उसको याद भी करता है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Sunday, January 31, 2010

विदुर नीति-अजितेंद्रिय पुरुष का शास्त्र ज्ञान व्यर्थ (shasra gyan-vidur niti in hindi)

नष्टं समुद्रे पतितं नष्टं वाक्यमश्रृ्ण्वति।
अनात्मनि श्रुतं नष्टं नष्टं हुतमनग्रिकम्।
हिन्दी में भावार्थ-
जैसे समुद्र में गिरी हुई वस्तु नष्ट हो जाती है उसी तरह दूसरे की अनुसनी करने वाले को कही गयी उचित बात भी व्यर्थ हो जाती है। जिस मनुष्य ने अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं कर दिखाया उसका शास्त्र ज्ञान भी उसी तरह व्यर्थ है जैसे राख में किया गया हवन।
अकीर्ति विनयो हन्ति हन्त्यनर्थ पराक्रमः।
हन्ति नित्यं क्षमा क्रोधमाचारो जन्तयलक्षणाम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
जो मनुष्य अपने अंदर विनय भाव धारण करता है उसके अपयश का स्वयमेव ही नाश हो जाता है। पराक्रम से अनर्थ तथा क्षमा से क्रोध का नाश होता है। सदाचार से कुलक्षण से बचा जा सकता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अपने अंदर ज्ञान का संचय करना अच्छी बात है पर उसकी अभिव्यक्ति हमेशा योग्य एवं जिज्ञासु व्यक्ति के सामने करना चाहिये। इस मायावी संसार में लोग भ्रम में जीना पसंद करते हैं और बहुत कम लोग ऐसे हैं जो हृदय में भक्ति भाव धारण कर तत्व ज्ञान को समझना चाहते हैं। इस बारे में श्रीमद्भागवत में कुछ रोचक संदेश भी हैं।
एक में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि ‘मेरा यह ज्ञान केवल मेरे उन भक्तों को दिया जाना चाहिये जो हृदय से मुझे पूजते हैं।’
दूसरे में वह कहते हैं कि ‘हजारों में कोई एक मुझे भजता है और उनमें भी हजारों में कोई हृदय से पूजने वाला कोई एक मुझे पाता है।
कहने का अभिप्राय यह है कि सामान्य मनुष्य समुदाय में ज्ञानी पुरुष कम होते हैं। ऐसे में उनकी बातें अनेक लोग असामान्य या अयथार्थ समझने लगते हैं तो कई लोगों को अव्यवाहारिक लगने लगती हैं।
हमारे देश में अनेक संत और महात्मा धन संचय और भवन निर्माण में रत हैं और इसके लिये बड़ी मासूमियत से तर्क देते हैं कि ‘आजकल पैसे के बिना धर्म का काम भी कहां चल पाता है।’
दरअसल धर्म प्रचार जैसी कोई प्रक्रिया ही नहीं होती। अगर भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान की बात करें तो उसमें भक्ति, सत्संग तथा ज्ञान चर्चा नितांत निजी बताई गयी है और इस तरह के सामूहिक प्रयासों से किसी प्रकार का लाभ नहीं होता जैसा कि दावा कथित धार्मिक व्यवसायिक लोग करते हैं। सच तो यह है कि उन लोगों का स्वयं का ही ज्ञान व्यर्थ है जिन्होंने अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त नहीं की और अर्थोपार्जन को उचित ठहराते हैं।


संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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