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Friday, May 27, 2011

चाणक्य नीति से संदेश-दुष्ट मनुष्य के सभी अंगों में विष रहता है (chanakya neeti se sandesh-dushta manushya ke sabhi angon mein vish)

          समुद्र मंथन के समय जब इस संसार में अमृत प्रकट हुआ तभी विष भी उत्पन्न हुआ। देवताओं ने अमृत का सेवन किया तो विष को भगवान शंकर ने पी लिया जिससे उनका कंठ नीला हो गया और वह नीलकंठ है। विष या अमृत केवल पेय द्रव्य नहीं है बल्कि उसका अभौतिक रूप भी है। जिस तरह सर्प, मक्खी तथा बिच्छू में रस के रूप में विद्यमान रहता है वैसे ही मनुष्य के भाव में उसकी उपस्थिति देखी जाती है। विषैले स्वभाव वाले लोग दूसरों को कष्ट देकर खुश होते हैं। उनके मन में ही दूसरे के प्रति घृणा, द्वेष और ईर्ष्या के भाव हमेशा ही रहते हैं।
          इस विषय पर नीति विशारद महाराज चाणक्य कहते हैं कि
            तक्षकस्य विषं दन्ते मक्षिकायास्तु मस्तके।
            वृश्चिकस्य विषं पुच्छे सर्वांग दुर्जने विषम्।।
         '‘सर्प के दांत, मक्खी के मस्तक और बिच्छू की पूंछ में विष होता है किन्तु दुर्जन व्यक्ति के अंग अंग में विष होता है।
           दरअसल हम लोग हमेशा ही बुद्धि और विवेक से अपने मस्तिष्क को सक्रिय नहीं रखते इसलिये दुर्जन और सज्जन व्यक्ति की पहचान नहीं करते। उस पर भी जब यह आभास हो जाये कि अमुक व्यक्ति हमारे प्रति विषैला भाव रखता है तो उससे दूरी नहीं बनाते यह सोचकर हमें क्या करना? यह सोच गलत है। अगर हम अपने प्रति विषैला भाव रखने वाले व्यक्ति के साथ निरंतर संपर्क रखेंगे तो अंततः उसका दुष्प्रभाव स्वयं पर कभी न कभी पड़ेगा यह विचार कर उससे दूर हो जाना चाहिए। इतना ही नहीं अगर हमें लगे कि कोई व्यक्ति सभी लोगों के प्रति बुरा भाव रखते हुए हमारे साथ सद्व्यवहार करते हुए मधुर वचन बोल रहा है तो यह मान लेना चाहिए कि वह केवल दिखावा कर रहा है। जिस व्यक्ति के मन में विषैला भाव है वह सदैव सभी के प्रति समय आने पर दृष्टता का प्रदर्शन करता है इसलिये उसे सतर्क रहना चाहिए।
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com
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Wednesday, March 23, 2011

व्यसनों में लिप्त होने की इच्छा पतन का कारण-हिन्दी धार्मिक चिंत्तन (vyasan ki iccha patan ka karan-hindi dharmik chittan)

हमारे देश में बढ़ते आर्थिक विकास के साथ ही व्यसनों की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। कितनी हैरानी की बात है कि हम दावा करते हैं कि देश में शिक्षा का विकास हुआ है पर यह नहीं दिखाई देता कि लोगों की की ज्ञान तथा चिंतन क्षमता का भी बुरी तरह ह्रास  हुआ है। सिगरेट के पैकेट पर लिखा रहता है कि ‘सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है’, लोग इसे पहले तो पढ़ते नहीं और पढ़ते हैं तो उसे धूंऐं की तरह अपने दिमाग से उड़ा देते हैं। शराब की बोतल पर लिखा मिलता है कि ‘शराब पीना स्वास्थ्य के लिये खतरनाक है’, पर दिन प्रतिदिन उसका सेवन बढ़ता जा रहा है। शादी जैसे सामाजिक कार्यक्रमों के साथ ही त्यौहार के अवसर पर शराब का व्यसन अब फैशन बन गया है। कहां तो पहले यह स्थिति थी कि लोग शराब पीने वाले से ही नहीं बल्कि सिनेमा देखने वाले लड़के के साथ अपनी बेटी का ब्याह करना पसंद नहीं करते थे और कहां अब यह स्थिति अब पूरा समाज ही इसे फैशन मानकर मद में लिप्त हो रहा है।
इस विषय पर कौटिल्य महाराज कहते हैं कि
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स्निग्धदीपशिखालोकविलेभितक्लिोचनः।
मृत्युमृच्छत्य सन्देहात् पतंगः सहसा पतन्।।
"दीपक की स्निग्ध शिखा के दर्शन से जिस पतंगे के नेत्र ललचा जाते हैं और वह उसमें जलकर जान देता है। यह रूप का विषय है इसमें संदेह नहीं है।"
गन्धलुब्धो मधुकरो दानासवपिपासया।
अभ्येत्य सुखसंजवारां गजकर्णझनज्झनाम्
"गंध की वजह से लोभी हो चुका मद रूपी आसव पीने की इच्छा करने वाला भंवरा सुख का अनुभव कराने वाली झनझन ध्वनि हाथी के कान के समीप जाकर मरने के लिये ही करता है।"

हैरानी इस बात की है कि हमारे देश में समाज पर नैतिक तथा धार्मिक रूप से नियंत्रण करने वाले शिखर पुरुष स्वयं ही ऐसे कामों में लिप्त हो जाते हैं जो पारंपरिक रूप से वर्जित हैं। उनकी देखा देखी छोटे लोग भी उसका अनुसरण करते हैं। शराब, जुआ, परस्त्रीमगन तथा सट्टे की प्रवृत्ति के दुष्परिणाम होते हैं पर देश में जिन लोगों को धन पचाने की शक्ति नहीं है वह व्यसनों की तरफ चले जाते हैं। धन का मजा व्यसन से जुड़ने पर ही होता है-ऐसा उनका मानना है। यही कारण है कि धन चूक जाने पर ऐसे व्यसनी अपरहण तथा हत्या जैसे कुत्सित कार्य में लिप्त हो जाते हैं। जिनको अवसर नहीं मिलता वह आत्महत्या कर लेते है। कहने को हम लोग रौशनी में पतंगे के जल मरने या मौत आने पर गीदड़ के शहर में घुसने की बातें करते हैं पर सच यह है कि यह इंसानों को समझाने के लिये ही कही गयी हैं।
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लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
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Thursday, September 2, 2010

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-आलस्य छोड़कर नियत समय पर काम प्रारंभ करना श्रेयस्कर

न कार्यकालं मतिमानतिक्रामेत्कदायन।
कथञ्चिदेव भवति कार्ये योगः सुदृर्ल्लभः।।
हिन्दी में भावार्थ-
ज्ञानी और बुद्धिमान मनुष्य को चाहिये कि अपने कार्य को निश्चित समय पर पूरा करे और इसमें किसी प्रकार की कोताही न बरते। कारण यह कि किसी भी कार्य में मन लगाना दुर्लभ है। फिर जीवन में संयोग बार बार नहीं आते।
सतां मार्गेण मतिमान् काले कर्म्म समाचरेत्।
काले समाचरन्साधु रसवत्फल्मश्नुते।।
हिन्दी में भावार्थ-
ज्ञानी और बुद्धिमान मनुष्य को सत्य मार्ग पर स्थिर होकर समय आने अपना कार्य निश्चित रूप से आरंभ करना चाहिऐ। समय पर कार्य करने पर सारे फल प्रकट होते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य स्वभाव में आलस्य का भाव स्वाभाविक रूप से रहता है। संत कबीर दास जी ने कहा भी है कि ‘काल करे सो आज कर, आज करे सो अब, पल में प्रलय हो जायेगी बहुरि करेगा कब।’ हर मनुष्य सोचता है कि अपना काम तो वह कभी भी कर सकता है पर ऐसा सोचते हुए उसका समय निकलता जाता है। चतुर मनुष्य इस बात को जानते हैं इसलिये ही वह विकास के पथ पर चलते हैं। अक्सर लोग अपनी असफलता और निराशा को लेकर भाग्य को कोसते हैं जबकि वास्तविकता यह है कि विकास का समय हर आदमी के पास आता है और जो अपने ज्ञान और विवेक से उसका लाभ उठाते हैं उनकी पीढ़ियों का भी भविष्य सुधर जाता है। संसार में सफल और प्रभावशाली व्यक्त्तिव का स्वामी, उद्योगपति, तथा प्रतिष्ठाप्राप्त लोगों की संख्या आम लोगों से कम होती है इसका कारण यह है कि सभी लोग समय का महत्व नहीं समझते और आलस्य के भाव से ग्रसित रहते हैं।
जीवन में निरंतर सक्रिय रहने से मनुष्य के चेहरे और मन में स्फूर्ति बनी रहती है और बड़ी आयु होने पर भी उसका अहसास नहीं होता। आलस्य मनुष्य का एक बड़ा शत्रु माना जाता है इसलिये उससे मुक्ति पाना ही श्रेयस्कर है। कोई काम सामने आने पर उसको तुरंत प्रारंभ कर देना चाहिये यही जीवन में सफलता का मूलमंत्र है। 
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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
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Wednesday, May 19, 2010

भर्तृहरि नीति शतक-बदलाव दुनिया का स्वाभाविक नियम (badlav ka niyam-hindu dharma sandesh)

महाराज भर्तृहरि अपने जीवन के अनुभवों के आधार पर कहते हैं 
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परिवर्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते
स जातो येन जातेन याति वंशः समुन्नतिम्

हिंदी में भावार्थ-परिवर्तन होते रहना संसार का नियम। जो पैदा हुआ है उसकी मृत्यु होना निश्चित है। जन्म लेना उसका ही सार्थक है जो अपने कुल की प्रतिष्ठा में वृद्धि करता है अर्थात समस्त समाज के लिये ऐसे काम करता है जिससे सभी का हित होता है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अगर आदमी को किसी से भय लगता है तो वह अपने आसपास परिवर्तन आने के  से। उसे लगता है कि कोई उसकी जगह लेगा और उसका असितत्व मिट जाएगा।  कहीं भाषा तो कहीं धर्म और कहीं क्षेत्र के विवाद आदमी के हृदय में व्याप्त इसी भय की भावना का दोहन करने की दृष्टि से उन समूहों  के प्रमुख  उपयोग करते हैं। कई लोगों के हृदय में ऐसे भाव आते है जैसे- अगर पास का मकान बिक गया तो लगता है कि पता नहीं कौन लोग वहां रहने आयेंगे और हमसे संबंध अच्छे रखेंगे कि नहीं। उसी तरह कई लोग स्थान परिवर्तन करते हुए भय से ग्रस्त होते हैं कि पता नहीं कि वहां किस तरह के लोग मिलेंगे। जाति के आधार पर किसी दूसरे जाति वाले का भय पैदा किया जाता है कि अमुक जाति का व्यक्ति अगर यहां आ गया तो हमारे लिए विपत्ति खड़ी कर सकता है। अपने क्षेत्र में दूसरे क्षेत्र से आये व्यक्ति का भय पैदा किया जाता है कि अगर वह यहाँ जम गया तो हमारा अस्तित्व खत्म कर देगा। कहने का अभिप्राय यह है कि बदलाव इस दुनिया का स्वाभाविक नियम है। कुछ  बुद्धिजीवी समाज में बदलाव लाने के लिए प्रयत्नशील दीखते हैं। कोई जातिपति मिटा रहा है तो कोई गरीबी से लड़ रहा है कोई अन्याय के विरुद्ध अभियान चला रहा है, यह सब दिखावा है। प्रकृति समय के अनुसार स्वत: बदलाव लाती है और मनुष्य के बूते कुछ नहीं है सिवाय दिखावा करने के।
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संकलक,लेखक  एवं संपादक-दीपक भारतदीप
http://zeedipak.blogspot.com

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Tuesday, May 11, 2010

संत कबीरदास के दोहे-स्वयं ठग जायें, पर दूसरे को न ठगे(sant kabir das ke dohe-khud kisi ko na thagen)

कबीर आप ठगाइये, और न ठगिये कोय
आप ठगै सुख, ऊपजै और ठगे दुख होय
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अगर आपको कोई ठग जाता है तो कोई बात नहीं है, पर आप स्वयं किसी को ठगने का प्रयास मत करो। हम ठग जायें तो एक तरह से इस बात का तो सुख होता है कि हमने स्वयं कोई अपराध नहीं किया पर अगर हम किसी दूसरे को ठगते हैं तो मन में अपने पकड़े जाने का भय होता है और कभी न कभी तो उसका दंड भी भोगना पड़ता है।
जो तोको काटा बुवै, ताहि बुवै तू फूल
तोहि फूल को फूल है, वाको है तिरशूल
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं जो अगर कोई व्यक्ति तुम्हारे लिए कांटे बोता है, तुंम उसके लिए फूल बोओ। तुम्हारे तो फूल हमेशा ही फूल होंगे परंतु उसके लिये कांटे तिरशूल की तरह उसको लगेंगे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-ऐसा लगता है कि दूसरों को ठगने वाले लोग सुखी हैं, पर यह वास्तविकता नहीं है। जिन लोगों ने दूसरों के प्रति अपराध कर संपत्ति बनाई है उनको भी कहीं न कहीं मन में भय रहता है और कभी न कभी उनको दंड भोगना ही पड़ता है। यह दंड किसी भी प्रकार का हो सकता है। उनकी संतानें अयोग्य होतीं हैं या उनके घर मे बीमारियों का वास रहता है। पकड़े जाने पर सामाजिक रूप से भी वह अपमानित होते हैं। इसलिये स्वयं हमें किसी को ठगने का प्रयास नहीं करना चाहिए। हां, कभी स्वयं ठगे जाते हैं तब धन या वस्तु खोने का क्षणिक दुःख होता है पर समय के साथ उसे भूल जाते हैं पर अगर किसी और को हम ठगते हैं तो वह अपराध हमारे हृदय में शूल की तरह चुभा रहता है और इससे जीवन में हम सदैव विचलित रहते है।
जब हमारे पास धन संपदा का अभाव होता है तब अनेक विचलित होकर यह विचार करते हैं कि दूसरे अमीरों की तरह ठगी का व्यापार प्रारंभ कर दें। ऐसा कर नहीं पाते पर मन को व्यर्थ संताप देकर हम पाते भी कुछ नहीं है। सच बात तो यह है कि यहां गरीब सुखी नहीं है तो अमीर भी कोई आराम से रह नहीं पाते। पैसे से सुख मिलने का विचार केवल एक दृष्टिभ्रम है। आजकल तो ऐसी अनेक घटनायें हो रही हैं जिनमें बड़े बड़े भ्रष्टाचारी जेल की सींखचों के अंदर पहुंच जाते हैं। उनकी लूट की रकम की इतनी होती है कि सामान्य चोर भी शरमा जाये। कहने का अभिप्राय यह है कि लोगों के साथ ठगी करने से वाले कभी न कभी कहीं न कहीं दंड भोगते हैं। अतः भले ही कोई हमें ठग ले पर दूसरे को ठगने का प्रयास हमें नहीं करना चाहिए।

संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://anant-shabd.blogspot.com
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Friday, April 30, 2010

कबीरदास जी के दोहे-मनुष्य की खोपड़ी उल्टा काम करती है (mind of men-kabir sandesh)

कबीरा औंधी खोपड़ी, कबहूं धापै नाहिं
तीन लोक की सम्पदा, कब आवै घर माहिं
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य की खोपड़ी उल्टी होती है क्योंकि वह कभी भी धन प्राप्ति से थकता नहीं है। वह अपना पूरा जीवन इस आशा में नष्ट कर देता है कि तीनों लोकों की संपदा उसके घर कब आयेगी।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस दुनिया में मनुष्य ही एक ऐसा जीवन जिसके पास बुद्धि में विवेक है इसलिये वह कुछ नया निर्माण कर सकता है। अपनी बुद्धि की वह से ही वह अच्छे और बुरे का निर्णय कर सकता है। सच तो यह कि परमात्मा ने उसे इस संसार पर राज्य करने के लिए ही बुद्धि दी है पर लालच और लोभ के वश में आदमी अपनी बुद्धि गुलाम रख देता है। वह कभी भी धन प्राप्ति के कार्य से थकता नहीं है। अगर हजार रुपये होता है तो दस हजार, दस हजार से लाख और लाख से दस लाख की चाहत करते हुए उसकी लालच का क्रम बढ़ जाता है। कई बार तो ऐसे लोग भी देखने में आ जाते है जिनके पेट में दर्द अपने खाने से नहीं दूसरे को खाते देखने से उठ खड़ा होता है।
अनेक धनी लोग जिनको चिकित्सकों ने मधुमेह की वजह से खाने पर नियंत्रण रखने को कहा होता है वह गरीबों को खाता देख दुःखी होकर कहते भी हैं‘देखो गरीब होकर खा कैसे रहा है’। इतना ही नहीं कई जगह ऐसे अमीर हैं पर निर्धन लोगों की झग्गियों को उजाड़ कर वहां अपने महल खड़े करना चाहते हैं। आदमी एक तरह से विकास का गुलाम बन गया है। भक्ति भाव से पर आदमी बस माया के चक्कर लगाता है और वह परे होती चली जाती है। सौ रुपया पाया तो हजार का मोह आया, हजार से दस हजार, दस हजार से लाख और लाख से दस लाख के बढ़ते क्रम में आदमी चलता जाता है और कहता जाता है कि अभी मेरे पास कुछ नहीं है दूसरे के पास अधिक है। मतलब वह माया की सीढियां चढ़ता जाता है और वह दूर होती जाती है। इस तरह आदमी अपना पूरा जीवन नष्ट कर देता है।
आजकल तो जिसे देखो उस पर विकास का भूत चढ़ा हुआ है। कहते हैं कि इस देश में शिक्षा की कमी है पर जिन्होने शिक्षा प्राप्त की है तो इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि उन्होंने ज्ञान भी प्राप्त कर लिया है। इसलिये शिक्षित आदमी तो और भी माया के चक्कर में पड़ जाता है और उसे तो बस विकास की पड़ी होती है पर उसका स्वरूप उसे भी पता नहीं होता। लोगों ने केवल भौतिक उपलब्धियों को ही सबकुछ मान लिया है और अध्यात्म से दूर हो गये हैं उसी का परिणाम है कि सामाजिक वैमनस्य तथा मानसिक तनाव बढ़ रहा है।
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Saturday, January 23, 2010

संत कबीर वाणी-राम का नाम छोड़ने पर नर्क में वास होता है (ram ka nam-sant kabir vani)

मुख से नाम रटा करैं, निस दिन साधुन संग।
कहु धौं कौन कुफेर तें, नाहीं लागत रंग।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि लोग दिन रात भगवान के नाम का जाप करते हैं, साधुओं के पास जाते हैं ऐसे में किसे दोष दें कि उनके जीवन में रंग नहीं चढ़ता।
राम नाम को छाड़ि कर, करे और की आस।
कहैं कबीर ता नर को, होय नरक में वास।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं जो मनुष्य राम नाम का स्मरण छोड़कर विषय वासना में रत हो जाते हैं उनको नरक में जाकर निवास करना पड़ता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अगर हम अपने देश की वर्तमान दशा को देखें तो दुःख होने के साथ कभी कभी हंसी भी आती है।  शायद ही दुनियां में कोई ऐसा देश हो जहां भगवान नाम का स्मरण इतना होता हो पर जितना सामाजिक तथा आर्थिक भ्रष्टाचार है वह भी कहीं नहीं होगा।  लोग एक दूसरे को दिखाने के लिये भगवान का नाम लेने  साथ ही सत्संगों में जाकर साधुओं के प्रवचन सुनते हैं पर घर आकर सभी का व्यवहार मायावी हो जाता है। बड़े शहरों में नित प्रतिदिन धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन होने पर वहां लोगों के झुंड के झुंड शामिल होते हैं। कोई प्रवचन सुनता है तो कोई सुनते हुए दूसरे को भी सुनाता है।  कहने का तात्पर्य यह है कि भगवान की भक्ति लोग केवल दिखावे के लिये करते हैं और उनका लक्ष्य केवल स्वयं को धार्मिक या अध्यात्मिक व्यक्तित्व का स्वामी होने का दिखावा करना होता है।
वैसे हम लोग विषयों के पीछे भागते हैं जबकि सच तो यह है कि वह हमें कभी छोड़ते ही नहीं अलबत्ता हम उनकी सोच को अपने दिमाग में इस तरह बसा लेते हैं कि भगवान का नाम स्मरण करने का विचार ही नहीं आता।  अगर आता भी है तो खाली जुबान से लेते हैं पर उसका स्पंदन हृदय में नहीं पहुंचता क्योंकि बीच रास्ते में विषयों की सोच रूपी पहाड़ उनका मार्ग अवरुद्ध करता है। यही कारण है कि भगवान भक्ति अधिक होने के बावजूद इस देश में नैतिक आचरण गिरता जा रहा है।  बहुत कम लोग ऐसे रह गये हैं जिनमें मानवीय संवेदनायें और सद्भावना बची है।
इस दिखावे का ही परिणाम है कि मायावी समृद्धि की तरफ बढ़ रहे देश में अहंकार, संवेदनहीनता तथा भ्रष्टाचार के कारण नारकीय स्थिति की अनुभूति होती है।
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Saturday, November 14, 2009

भर्तृहरि शतक-पृथ्वी केवल पानी के चारों और घिरा मिट्टी का गोला (pruthvi mitti ka gola-bhartrihari shatak)

मृतिपण्डो जलरेखया वलचितः सर्वोऽप्ययं न नन्वणुः स्वांशीकृत्य स एवं संगरशतै राज्ञां गणैर्भुज्यते।
ते दद्युर्ददतोऽथवा किमपरं क्षंुद्रदरिद्रं भृशं धिग्धिक्तान्युरुषाधमान्धनकणान् वांछन्ति तेभ्योऽपि ये।।
हिन्दी में भावार्थ-
यह पृथ्वी पानी से चारों तरफ घिरा मिट्टी का एक गोलामात्र है। इस पर अनेक लोगों ने राजा बनकर शासन किया। यह राजा लोग किसी को कुछ नहीं देते। फिर भी राजाओं का मुख ताकते हुए कुछ लोग पाने की उम्मीद में रहते हैं। ऐसे लोगों को धिक्कार है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-राजशाही समाप्त हो गयी पर लोगों के मुख ताकने की आदत नहीं गयी। फिर लोकतंत्र में तो केवल प्रत्यक्ष ही नहीं अप्रत्यक्ष रूप से राज्य करने वाले भी सक्रिय रहते हैं। ऐसे लोग अपने बाहुबल, धन बल तथा बुद्धिबल-चालाकी और बेईमानी-से प्रत्यक्ष रूप से शासन करने वालों पर नियंत्रण रखते हैं। इसका प्रमाण यह है कि अमेरिका की एक पत्रिका दुनियां के शक्तिशाली लोगों की सूची जारी करती है। उसमें कुख्यात लोगों के नाम भी शामिल होते हैं । इस शक्तिशाली शब्द का लोग सही अर्थ नहीं जानते। दरअसल केवल राजकाज और समाज पर नियंत्रण करने वाले व्यक्ति को ही शक्तिशाली माना जाता है। कभी कभी तो यह लगता है कि इस तरह पर्दे के पीछे यही शक्तिशाली विश्व भर के राजाओं में हैं। अनेक देशों की सरकारें उनके आगे पानी भरती नजर आती हैं। उस सूची से यह तो जाहिर हो जाता है कि कहीं न कहीं इन कुख्यात लोगों की पहुंच दूर तक है। यही अपराधी फिल्म, राजनीति, व्यापार, उद्योग में भी धन लगाकर वहां सक्रिय कुछ लोगों को अपना मातहत बना लेेते हैं। यही मातहत जनता को सामने तो राजा दिखते है पर उनकी डोर उनके पीछे खड़े इन कथित शक्तिशाली लोगों के हाथ में होती है जिनको जनता केवल कुख्यात रूप में पहचानती है। इसी अज्ञान के कारण वह उन्हीं मातहतों की तरफ मूंह ताकती रहती है कि वह शायद उसका भला करें। इसके अलावा इन शक्तिशाली तत्वों के मातहतों के आसपास अनेक कलाकार, लेखक, विद्वान तथा सामान्य लोग चक्कर लगाते हैं कि शायद वह उनके आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करें। यह उनका केवल एक भ्रम है। शक्तिशाली तथा राजशाही वाले लोेग किसी का भला नहीं करते। उनका न तो देशभक्ति से लगाव होता है न समाज सेवा से और न ही भगवान भक्ति से! उनका उद्देश्य केवल अपनी आर्थिक, सामाजिक तथा व्यक्ति सत्ता बनाये रखना ही होता है। अतः अपने हित के लिये उनका मुख ताकना केवल मूर्खता है।
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Thursday, October 15, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-मित्र की भी होती हैं तीन श्रेणियां (kautilya ka arthshastra in hindi)

मित्राणामन्तरं विद्याण्मध्यज्यायः कनीयसाम्।
मध्यज्यायः कनीयांसि कर्मणि च पृथकपृथक्।।
हिंदी में भावार्थ-
मित्रों की उच्च, मध्य और निम्न कोटि की पहचान करते हुए उनके पृथक पृथक कार्यों का अध्ययन करें।
प्रकाशपक्षग्रहणं न कुर्यात्सुहृदां स्वयम्।
अन्योन्यमत्सजंवषां स्वयमेवाशु धारयेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
किसी वाद विवाद में अपने सहृदय और मित्रों का प्रत्यक्ष रूप से पक्ष न लेते हुए उनको गुप्त रूप से सहायता करें।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मित्र बनाने में कभी जल्दी नहीं करना चाहिये। मित्रों भी आम इंसान की तरह तीन श्रेणियां होती हैं-उच्च, मध्यम और निम्न। जिस तरह उच्च मनुष्यों की इस संसार में कमी दिखती है वैसे ही मित्रों कभी है। रोज रोज मिलने वाला हर आदमी मित्र नहीं हो जाता। सच तो यह है कि उस आदमी को बहुत कम धोखा मिलता है जो दोस्त कम बनाता है। वैसे इस समय इंटरनेट का जमाना है और इसलिये अधिक सतर्कता बरतना चाहिये। अभी हाल ही में ऐसे अनेक मामले सामने आये हैं जिसमें इंटरनेट पर लड़कों ने दोस्ती कर अनेक लड़कियों का जीवन बर्बाद कर दिया। इंटरनेट पर किसी का भी फोटो कोई भी लगा सकता है। अपनी आयु कम बता सकता है। अपने व्यवसाय को छिपा सकता है। कहने का तात्पर्य है कि जब सामान्य रूप से निभाने वाला मित्र बड़ी कठिनता से मिलता है तो इंटरनेट पर कहां से मिल जायेगा? इंटरनेट पर सक्रिय लोग कोई आसमानी नहीं है बल्कि इसी समाज से हैं। अतः मित्रों की पहचान कर ही आगे बढ़ना चाहिये।
इसके अलावा वाद विवाद के समय मित्र या सहृदय का सीधे पक्ष लेने की बजाय रणनीति से काम लेते हुए गुप्त रूप से उसकी सहायता करना चाहिये ताकि उसके विरोधी या शत्रु से आप गुप्त रहकर निरंतर उसकी रक्षा कर सकें। इसलिये अपने सहृदय और मित्र की सहायता के लिये उसके विरोधी या शत्रु के सामने किसी ऐसे व्यक्ति को प्रस्तुत करना चाहिये जो आपका सहायक हो और विरोधी या शत्रु उसकी पहचान न कर सके।
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Saturday, October 3, 2009

विदुर नीति-विनय भाव से अपयश नष्ट होता है (vinay se apyash nasht hota hai-vidur niti)

नष्टं समुद्रे पतितं नष्टे वाक्यमश्रृण्वति।
अनात्मनि श्रुतं नष्टं नष्टं हुतमनगिनकम्।।
हिंदी में भावार्थ-
जिस तरह समुद्र में गिरी वस्तु नष्ट हो जाती है उसी तरह किसी की न सुनने वाले मनुष्य से कही हुई बात नष्ट हो जाती है। जितेन्द्रिय पुरुष का शास्त्र ज्ञान और राख में किया हवन भी नष्ट हो जाता है।
अकीर्ति विनयो हन्ति हन्त्यनर्थ पराक्रमः।
हन्ति नित्यं क्षमा क्रोधमाचारी हन्त्यलक्षणम्।।
हिंदी में भावार्थ-
विनय भाव ये अपयश का नाश होता है, पराक्रम के द्वारा अनर्थ दूर किया जा सकता है। क्षमा ही सदा क्रोध का नाश करती है और सदाचार का भाव अपने अंदर कुलक्षणों को समाप्त करता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में ऐसे अनेक मनुष्य है जिनमें अहंकार की भावना बहुत होती है और ऐसे लोगों का समझाना न केवल कठिन काम है बल्कि एक तरह से अपना समय व्यर्थ करना है। आजकल तो ऐसे अनेक लोग दिखाई देते हैं जो किताबी ज्ञान प्राप्त करने के बाद विविध विषयों पर इस तरह बहस करते हैं कि जैसे कि उन जैसा कोई विद्वान इस संसार में नहीं है। वैसे भी कहा जाता है कि बुद्धिजीवियों की बहस के निष्कर्ष नहीं निकलते। उसी तरह भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान ग्रंथ पढ़ कर उसे रटने वाले अनेक विद्वान भी हैं जिनको शब्द और अर्थ सभी याद है पर ज्ञान धारण भी किया जाता है वह नहीं जानते। इसलिये कहीं सत्संग चर्चा करिये तो हर कोई अपने ज्ञान बघारेगा। कहने का तात्पर्य यह है कि आजकल कोई किसी की सुनता नहीं है इसलिये किसी से ज्ञान या सत्संग चर्चा करने की बजाय अकेले में बैठकर चिंतन या ध्यान करना ही श्रेयस्कर है।
अगर अपना कहीं अपयश फैल रहा हो तो विनम्रता पूर्वक अपनी बात रखना चाहिये। जो लोग जीवन में हमेशा ही दूसरों के साथ विनम्रता के साथ व्यवहार और वार्तालाप करते हैं उनका कभी भी अपयश नहीं फैलता। उसी तरह अगर अपने ऊपर आने वाले संकट का पराक्रम से ही किया जा सकता है। क्रोध और निराशा से कार्य करने वालों को न सफलता मिलती है न यश-यह बात ध्यान रखना चाहिये।
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Wednesday, September 30, 2009

चाणक्य नीति-डसें नहीं फन तो फैलायें (chankya niti-fun)

निर्विषेणाऽपि सर्पेण कत्र्तव्या महती फणा।
विषमस्तु न चाष्यस्तु घटाटोपो भयंकरः।।
हिंदी में भावार्थ-
भले ही अपने पास विष न हो पर विषहीन सर्प को फिर भी फन फैलाने का आडंबर करना चाहिये। उसके बचाव के लिये यह जरूरी होता है।
प्रातद्र्यूतप्रसंगेन मध्याह्ये स्त्रीप्रसंगतः।
रात्रौ चैर्यप्रसंगेन कालो गच्छत्यधीमातम्।।
हिंदी में भावार्थ-
मूर्ख लोगों का समय प्रातःकाल जुआ, दोपहर प्रेम प्रसंग और रात्रि चोरी करने में व्यतीत होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य को अपने हृदय में दूसरों के प्रति स्वच्छता, स्नेह और दया का भाव रखना चाहिये। जहां तक हो सके दूसरे का भला करें पर यह भी आवश्यक है कि अपनी रक्षा के लिये सतर्कता बरतें। इस संसार में मनुष्य में ही देवता और राक्षस बैठा है। पता नहीं कब किस मनुष्य में राक्षसत्व का भाव पैदा हो इसलिये सभी लोगों से सतर्कता आवश्यक है। वैसे कुछ लोगों में तो हमेशा ही दुष्टता का भाव भरा होता है। ऐसे लोग जिसे कमजोर या असहाय समझते हैं उससे परेशान करने लगते हैं। हालांकि उनके द्वारा संकट पैदा करने पर लोगों पर प्रतिकार भी कर सकते हैं पर वह हमला ही न करें इसलिये अपनी शक्ति का प्रदर्शन समय आने पर करना पहले ही चाहिए। इस प्रदर्शन से दुष्ट हम पर हमला करने का दुस्साहस ही न करे। स्वयं किसी को हानि पहुंचाने का विचार करना भी दुष्टता है पर बाह्य विरोधी से निपटने के लिये अपने पास शक्ति का संचय अवश्य करते रहना चाहिये। इतना ही नहीं कोई अन्य आक्रमण न करे ताकि शक्ति का व्यर्थ उपयोग करने से बचें इस उद्देश्य से समय समय पर उसका प्रदर्शन भी करना चाहिये। जरूरत पड़े तो गुस्सा भी दिखाना चाहिए ताकि दुष्ट लोग सहमें रहें। इस बात का ध्यान रहे कि हमारे व्यवहार या गुस्से से किसी सज्जन का दिल न दुखे।
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Saturday, August 22, 2009

श्री गुरु ग्रंथ साहिबः दूसरे का रक्त चूसने वाले का हृदय कभी शुद्ध नहीं होता (shri guru granth sahib in hindi)

खावहि खरचाहि रलि मिलि भाई।
तोटि न आवै वधदो जाई।।
हिंदी में भावार्थ-
गुरु ग्रंथ साहिब की पवित्र वाणी के अनुसार आपस में मिलजुलकर खाना और खर्च करना चाहिये तो कोई कभी अभाव नहीं आता बल्कि धन में बढ़ोतरी होती है।
‘जो रतु पीवहि माणसा तिन किउ निरमलु चीतु।‘
हिंदी में भावार्थ-
गुरु ग्रंथ साहिब की पवित्र वाणी के अनुसार जो मनुष्य दूसरे का खून चूसता है उसका हृदय कभी पवित्र नहीं हो सकता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-भगवान श्री गुरुनानक जी ने भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान को एक नयी पहचान दी। उन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त अंधविश्वासों और कुरीतियों का हमेशा विरोध किया। सच बात तो यह है कि मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण की जो भयानक हमारे समाज में व्याप्त है उसी कारण ही देश के सदियों तक गुलामी झेलनी पड़ी। कहने को तो देश आजाद हो गया है पर मानसिक गुलामी अभी भी जारी है। इसका कारण यह है कि अहंकार और धन का लोभ हमारे देश के लोगों में इस कद्र है कि सभी एक दूसरे से आगे निकलना चाहते हैं। उद्देश्य यही है कि किसी तरह एक दूसरे को नीचा दिखाया जाये। सहकारिता की भावना का सर्वथा अभाव है। संयुक्त परिवार की प्रवृत्ति लुप्त हो जाने से अधिकतर लोगों का जीवन एकाकी हो गया है। मिलजुलकर रहने का नारा सभी देते हैं पर रहना कोई नहीं चाहता क्योंकि परिवार, समाज और समूह का नेता बनने की ख्वाहिश ऐसा करने नहीं देती। नतीजा यह है कि समाज में वैमनस्य बढ़ रहा है और अमीर गरीब के बीच बढ़ती खायी खतरनाक रूप लेती जा रही है।
शारीरिक श्रम करने वालों को एक पशु की तरह देखने वाला आज का सभ्य समाज नहीं जानता कि गरीबों और मजदूरों की वजह से उनका अस्तित्व बना हुआ है। कितनी विचित्र बात है कि रेहड़ी वाले से पांच रुपये का सामान खरीदने पर भी लोग उससे मोलभाव करते हैं जबकि बड़ी दुकान पर जाकर उनकी आवाज बंद हो जाती है जबकि वहां उससे अधिक पैसे देने पड़ते हैं।
अपने बैंक खातों में रोकड़ शेष बढ़ाने की होड़ ने आदमी को धर्म कर्म और दान पुण्य से दूर कर दिया है। पेट तो दो रोटी खाता है पर धन का भंडार भरने की भूख सभी की बढ़ी हुई है। अमीरों की देखादेखी मध्यम और गरीब लोग भी अमीर बनने का संक्षिप्त मार्ग ढूंढते हैं जो कि अंततः उनको अपराध की तरफ ले जाता है। इसके लिये जिम्मेदारी अमीर वर्ग ही है जो दिखावे के लिये धर्म कर्म बहुत करता है पर जहां गरीब और मजदूर के साथ न्याय करने की बात आ जाये तो उसे बस अपना व्यापारिक धर्म ही याद रह जाता है।
अगर समाज में शांति, एकता और सहृदयता की भावना का पुनर्निमाण करना है तो उसके लिये आवश्यक है कि गरीबों और मजदूरों के कल्याण का विचार किया जाये। वह हमारे देश और समाज का एक अभिन्न अंग हैं यह कभी नहीं भूलना चाहिये।
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Sunday, May 17, 2009

संत कबीर वाणी: राम के सच्चे भक्त होते हैं सुख दु:ख से परे

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि
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हैवर गैवर सघन धन, छन्नपती की नारि
तास पटेतर ना तुलै, हरिजन की पनिहारि

भगवान की भक्ति करने वाली गरीब नारी की बराबरी महलों में रहने वाली रानी भी नहीं कर सकती भले ही उसके राजा पति के पास हाथियों और घोड़ो का झुंड और बहुत सारी धन संपदा है।

दुखिया भूखा दुख कीं, सुखिया सुख कौं झूरि
सदा अजंदी राम के, जिनि सुख-दुख गेल्हे दूरि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि भूख के कष्ट के कारण दुखी आदमी मर रहा है तो ढेर सारे सुख के कारण सुखी भी कष्ट उठा रहा है किंतु राम के भक्त तो हर हाल में में मजे से रहते हैं क्योंकि वह दुःख सुख के भाव से परे हो गये हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-दुनियां में तीन तरह के लोग होते हैं-दुःखी,सुखी और भक्त। अभाव और निराशा के कारण दुःखी आदमी हमेशा परेशान रहता है तो सुखी आदमी अपने सुख से उकता जाता है और वह हर ‘मन मांगे मोर’ की धारा में बहता रहता है। विश्व के संपन्न राष्ट्रों के देश भारत के अध्यात्मिक ज्ञान की तरफ आकर्षित होते हैं तो भारत के लोग उनकी भौतिक संपन्नता प्रभावित होते हैं। पश्चिम में तनाव है तो पूर्व वाले भी सुखी नहीं। कहने का तात्पर्य यह है कि लोग इस मायावी संसार में केवल दैहिक सुख सुविधाओं के पीछे भागते हैं। जिसके भौतिक साधन नहीं है वह कर्ज वगैरह लेता है और फिर उसे चुकाते हुए तकलीफ उठाता है और अगर वह चीजें नहीं खरीदे तो परिवार के लोग उसका जीना हराम किये देता है। सुख सुविधा का सामान खरीद लिया तो फिर दैहिक श्रम से स्त्री पुरुष विरक्त हो जाते हैं और इस कारण स्वास्थ बिगड़ने लगता है।

जिन लोगों ने अध्यात्म ज्ञान प्राप्त कर लिया है वह जीवन को दृष्टा की तरह जीते हैं और भौतिकता के प्रति उनका आकर्षण केवल उतना ही रहता है जिससे देह का पालन पोषण सामान्य ढंग से हो सके। वह भौतिकता की चकाचैंध मेंे आकर अपना हृदय मलिन नहीं करते और किसी चीज के अभाव में उसकी चिंता नहीं करते। ऐसे ही लोग वास्तविक राजा है। जीवन का सबसे बड़ा सुख मन की शांति हैं और किसी चीज का अभाव खलता है तो इसका आशय यह है कि हमारे मन में लालच का भाव है और कहीं अपने आलीशान महल में भी बैचेनी होती है तो यह समझ लेना चाहिये कि हमारे अंदर ही खालीपन है। दुःख और सुख से परे आदमी तभी हो सकता है जब वह निष्काम भक्ति करे।
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Monday, April 13, 2009

चाणक्य नीतिः विद्या के लिये सुख का त्याग जरूरी

सुखार्थी वा त्यजेविद्वधां विद्याथी वा त्यजेत् सुखम्
सुखार्थिनः कुतो विद्वा विद्यार्थिनः कुतो सुखम्।।

हिंदी में भावार्थ-नीति विशारद चाणक्य का कहना है कि सुख की कामना हो तो विद्या की इच्छा त्याग दें और यदि विद्या प्राप्त करने का उद्देश्य हो तो सुख की कामना त्याग दें। सुख की चाहत करने वालों को विद्या और विद्या प्राप्त की चाहता करने वाले का सुख का विचार नहीं करना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-पहले गुरुकुलों में शिक्षा दी जाती थी जहां शिष्य को हर तरह के विषय का ज्ञान प्रदान किया जाता था । जब गुरुकुल से शिष्य निकलता था तो वह हर विधा में पारंगत होता था। राजा महाराजा तक के बच्चे वहां गुरु और आश्रम की सेवा में ऐसे काम करते थे जिनको मजदूर करते हैं। इस तरह अधिक शिक्षि होने पर भी उनमें छोटे काम के प्रति उपेक्षा का भाव नहीं होता था।
आधुनिक शिक्षा में छात्रों को अपने ही छात्रावास में अनेक प्रकार की सुविधा दिलाने के विज्ञापन देखने पर यह आभास होता है कि विद्यालयों और महाविद्यालयों में विद्या कम सुविधायें अधिक देने पर विचार होता है। फिर अपने घर पर ही शिक्षा प्राप्त करने की प्रवृत्ति ने छात्रों के ज्ञान को सीमित कर दिया है। वह विद्यालयों और महाविद्यालयों में अपने विषय से संबद्ध शिक्षा प्राप्त तो कर लेते हैं पर जीवन के रहस्य, चरित्र और नैतिकता के सिद्धांतों को उनको ज्ञान नहीं रहता।

शिक्षित तो हमारे समाज में बहुत हैं पर विद्याधर और ज्ञानी कितने हैं यह हम देख ही रहे हैं। सारे सुख और सुविधायें होते हुए अक्षर ज्ञान तो प्राप्त किया जा सकता है पर अक्षर विद्या बहुत बृहद है उसे समझने के लिये यह जरूरी है कि सुखों का त्याग किया जाये। विद्या से आशय अपने विषय के साथ ही अध्यात्मिक ज्ञान होने से भी है जो आजकल बहुत कम लोगों के पास है। इसका कारण यह है कि छात्रों को शिक्षा के दौरान ही विलासित की वस्तुओं के उपभोग की आदत पड़ जाती है।
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Wednesday, April 1, 2009

भर्तृहरि शतकः जमीन का छोटा टुकड़ा पाकर मूर्ख लोग ही गरियाते हैं

अभुक्तायां यस्यां क्षणमपि न यातं नुपशर्तर्भुवस्तस्या लाभे क इव बहुमानः क्षितिभुजाम्।
तदंशस्याष्यंशे तदवयलेशेऽपि पतयो विषादे कत्र्तव्ये विदधति जडाः प्रत्युत मुदम्।।


हिंदी में भावार्थ-इस प्रथ्वी को अनेक राजाओं ने भोगा पर फिर भी इसे पाने वाले नये राजा अभिमान करते रहे। इसके छोटे से छोटे अंश को पाकर भी मूर्ख लोग अपनी अकड़ दिखाने लगते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-वैसे खाने पीने का विषय हो तो लोग झूठा खाने को तैयार नहीं होते। ऐसा करना वह अपनी शान के खिलाफ मानते हैं मगर यह प्रथ्वी जो सदियों से अपनी धुरी पर घूम रही है और इसे अनेक राजा भोग चुके हैं पर इसका एक अंश मिल जाने पर भी उसका नया मालिक इतराने लगता है। तब उसे यह विचार नहीं आता कि यह प्रथ्वी पहले किसी अन्य के स्वामित्व में थी और अब यह उसे झूठन के रूपें मिली है फिर इस पर इतराना नहीं चाहिये। भले ही जमीन के अंश पर नयी इमारत बने पर वह है तो किसी की झूठन ही न! क्या लोग दूसरे की झूठन किसी नयी थाली में मिलने पर स्वीकार करते हैं? कतई नहीं! इसलिये ज्ञानी लोग नया मकान या भूखंड मिलने पर अपने स्वामित्व का अहंकार नहीं पालते पर मूर्ख लोग ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे कि वह जमीन का वह टुकड़ा आसमान से उतार कर स्वयं लाये हैं।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि अहंकार मनुष्य को अज्ञानी बना देता है और वह अपनी भौतिक उपलब्धियों पर ऐसे इतराता है जैसे उसने पर ससंार ही स्वयं बनाया हो। इसके विपरीत ज्ञानी मनुष्य इस बात को जानते हैं कि आज जो उसके पास है वह पहले किसी अन्य के पास था और उसके बाद किसी अन्य के पास होगा।
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Saturday, December 6, 2008

कौटिल्य का अर्थशास्त्र: धर्म रहित व्यक्ति से कभी संधि न करें

1. दूर्भिक्ष और आपत्तिग्रस्त स्वयं ही नष्ट होता है और सेना का व्यसन को प्राप्त हुआ राज प्रमुख युद्ध की शक्ति नहीं रखता।
2. विदेश में स्थित राज प्रमुख छोटे शत्रु से भी परास्त हो जाता है। थोड़े जल में स्थित ग्राह हाथी को खींचकर चला जाता है।
3. बहुत शत्रुओं से भयभीत हुआ राजा गिद्धों के मध्य में कबूतर के समान जिस मार्ग में गमन करता है, उसी में वह शीघ्र नष्ट हो जाता है।
4.सत्य धर्म से रहित व्यक्ति के साथ कभी संधि न करें। दुष्ट व्यक्ति संधि करने पर भी अपनी प्रवृति के कारण हमला करता ही है।
5.डरपोक युद्ध के त्याग से स्वयं ही नष्ट होता है। वीर पुरुष भी कायर पुरुषों के साथ हौं तो संग्राम में वह भी उनके समान हो जाता है।अत: वीर पुरुषों को कायरों की संगत नहीं करना चाहिऐ।
6.धर्मात्मा राजप्रमुख पर आपत्ति आने पर सभी उसके लिए युद्ध करते हैं। जिसे प्रजा प्यार करती है वह राजप्रमुख बहुत मुश्किल से परास्त होता है।
7.संधि कर भी बुद्धिमान किसी का विश्वास न करे। 'मैं वैर नहीं करूंगा' यह कहकर भी इंद्र ने वृत्रासुर को मार डाला।
8.समय आने पर पराक्रम प्रकट करने वाले तथा नम्र होने वाले बलवान पुरुष की संपत्ति कभी नहीं जाती। जैसे ढलान के ओर बहने वाली नदियां कभी नीचे जाना नहीं छोडती।

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Saturday, September 6, 2008

संत कबीर वाणीः उस पत्थर को क्या पूजना जो उत्तर नहीं देता

पाहन करी पूतरी, करि पूजै करतार
याहि भरोसै मति रहो, बूड़ों काली धार

संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि पत्थर का पुतला बनाकर आदमी उसे पूजने लगता है। उसे अपने इस आडम्बर के सहारे नहीं रहना चाहिए कि वह उसकी सहायता से उस पार पहुंच जायेगा। अगर कहीं उसके भरोसे रहे तो बीच धार में डूब जाओगे।

पाहन को क्या पूजिये, जो नहिं देय जवाब
अंधा नर आशा मुखी, यौ ही खौवे आब


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि उस पत्थर का पूजने से क्या लाभ जो उत्तर नहीं देता। ज्ञान रहित उसे पूजकर जीवन में प्रसन्नता चाहते हैं पर यह व्यर्थ है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मूर्तियां को पूजना बुरा नहीं है पर जिस तरह उसकी पूजा कर यह सामान्य लोग मान लेते हैं कि वह बहुत बड़े भक्त हो गये तो यह उनकी अज्ञानता है। ऐसा लगता है कि मूर्ति पूजा संभवतः इसलिये शुरू की गयी कि सामान्य आदमी के लिये एकदम निराकार और निर्गुण की उपासना संभव नहीं है और वह इन मूर्तियों के रूप को अपने ध्यान में रखकर भक्ति करते हुए निरंकार को अपने मन में धारण करे। हुआ उसके विपरीत! लोग मूर्तियों को पूजकर अपने आपको भक्त समझने लगते है। यह उनकी अज्ञानता और अविवेक का प्रतीक है। जब तक हृदय से निरंकार और निर्गुण की उपासना नहीं की जायेगी तब तक अपने अंदर स्थापित विकार बाहर नहीं निकल सकते।
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