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Friday, November 6, 2009

संत कबीर वाणीः दौलत की वजह से सभी प्यार करते हैं (kabir ke dohe-daulat aur pyar)

गुणवेता और द्रव्य को, प्रीति करै सब कोय
कबीर प्रीति सो जानिये, इनसे न्यारी होय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि गुणवेताओ-चालाक और ढोंगी लोग- और धनपतियों से तो हर कोई प्रेम करता है पर सच्चा प्रेम तो वह है जो न्यारा-स्वार्थरहित-हो।

प्रेम-प्रेम सब कोइ कहैं, प्रेम न चीन्है कोय
जा मारग साहिब मिलै, प्रेम कहावै सोय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रेम करने की बात तो सभी करते हैं पर उसके वास्तविक रूप को कोई समझ नहीं पाता। प्रेम का सच्चा मार्ग तो वही है जहां परमात्मा की भक्ति और ज्ञान प्राप्त हो सके।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-टीवी चैनलों और पत्र पत्रिकाओं में आजकल प्रेम पर बहुत कुछ दिखाया और लिखा जाता है। यह प्रेम केवल स्त्री पुरुष के निजी संबंध को ही प्रोत्साहित करता है। हालत यह हो गयी है कि अप्रत्यक्ष रूप से विवाहेत्तर या विवाह पूर्व संबंधों का समर्थन किया जाने लगा है। यह क्षणिक प्रेम एक तरह से वासनामय है मगर आजकल के अंग्रेजी संस्कृति प्रेमी और नारी स्वतंत्रता के समर्थक विद्वान इसी प्रेम में शाश्वत जीवन की तलाश कर हास्यास्पद दृश्य प्रस्तुत करते हैं। एक मजे की बात यह है कि एक तरफ सार्वजनिक स्थलों पर प्रेम प्रदर्शन करने की प्रवृति को स्वतंत्रता के नाम पर प्रेमियों की रक्षा की बात की जाती है दूसरी तरफ प्रेम को निजी मामला बताया जाता है। कुछ लोग तो कहते हैं कि सब धर्मों से प्रीति का धर्म बड़ा है। अब अगर उनसे पूछा जाये कि इसका स्वरूप क्या है तो कोई बता नहीं पायेगा। इस नश्वर शरीर का आकर्षण धीमे धीमे कम होता जाता है और उसके साथ ही दैहिक प्रेम की आंच भी धीमी हो जाती है। इसलिए कहा जाता है कि सच्चा प्रेम केवल परमात्मा से किया जा सकता है।

वैसे सच बात तो यह है कि प्रेम तो केवल परमात्मा से ही हो सकता है क्योंकि वह अनश्वर है। हमारी आत्मा भी अनश्वर है और उसका प्रेम उसी से ही संभव है। परमात्मा से प्रेम करने पर कभी भी निराशा हाथ नहीं आती जबकि दैहिक प्रेम का आकर्षण जल्दी घटने लगता है। जिस आदमी का मन भगवान की भक्ति में रम जाता है वह फिर कभी उससे विरक्त नहीं होता जबकि दैहिक प्रेम वालों में कभी न कभी विरक्ति हो जाती है और कहीं तो यह कथित प्रेम बहुत बड़ी घृणा में बदल जाता है।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://rajlekh.blogspot.com

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Saturday, October 31, 2009

मनु स्मृतिः धर्मोपदेशक का नाटक करना एक तरह से ठगी है (manu smruti)

धर्मघ्वजी सदा लुब्धश्छाùि लोकदम्भका।
बैडालवृत्तिका ज्ञेयो हिंस्त्रः सर्वाभिसंधकः।।

लोगों में अपना प्रभाव जमाने के लिये स्वयं आचरण न करते हुए केवल धर्म की ध्वजा पताका फहराने का नाटक करना, दूसरे का धन को छीनने की इच्छा करना, हिंसक स्वभाव होना तथा दूसरों भड़काकर झगड़ा कराना बैडाल वृत्ति का परिचायक है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय- पूरी दुनियां में अनेक धर्मों के ध्वजवाहक दिखने को मिल जायेंगे पर उनके धर्मों के आड़ में ही हिंसा की प्रवृत्ति बढ़ रही है। इससे प्रमाणित होता है कि पूरी दुनियां में बैडाल प्रवृत्ति के कथित ज्ञानियों की संख्या बढ़ रही है। मनु स्मृति के अनुसार धर्म के नाम पर ठगी करना भी बैडाल या ठगी की प्रवृत्ति है।
यत्र तत्र सर्वत्र पूरी दुनियां में कथित ज्ञानी विद्वान अपने श्रीमुख से सामान्य लोगों को धर्मोपदेश देते घूम रहे हैं। कहते हैं कि ‘हिंसा मत करो’, परोपकार करो, सादगी से रहो, और ‘सबसे प्रेम करो’। एक तरह से उन लोगों ने नारों को ही उपदेश बना लिया है। अपने नारों को मजबूत करने के लिये वह कुछ मनोरंजक कहानियां सुनाने लगते हैं। कुछ धर्मोपदेश अपने धर्मग्रंथों में वर्णित चमत्कारी घटनाओं का प्रचार कर लोगों को कर्मविमुख करते हैं। उनका बस यही कहना होता है कि ‘बस हाथ उठाकर आसमान में स्थित भगवान से अपने लिये सुख मांगते रहो।’
यह धर्मोदेशक इस तरह अपने लिये भोगविलास की सामग्रियां जुटाते हैं। उनकी वृति केवल भक्त के धन को अपनी जेब में खीचने की होती है। इतना ही नहीं समय पड़ जाये तो यह अपने समुदाय के हिंसक लोगों को प्रश्रय देते हैं। उससे भी बात न बने तो आम लोगों को हिंसा के लिये प्रेरित करते हैं। ऐसे लोगों को पहचान करते हुए उनकी उपेक्षा करना चाहिये।
वैसे हम कहते हैं कि जमाना अब खराब हुआ है पर मनुमहाराज का यह संदेश देखें तो धर्म की ध्वजपताका फहराने वाले ढोंगी उस समय भी थे इसलिये ही तो उन्होंने उनकी चर्चा की ताकि लोग उनसे दूर रहें।
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dharm, hindi sahitya, hindu, manu, manu smruti, अध्यात्म, धर्म, संदेश, हिंदी साहित्य, हिंदू

Monday, August 10, 2009

संत कबीर के दोहे-भक्त नारी की बराबरी रानी भी नहीं कर सकती (kabir ke dohe-bhakt nari aur rani)

दुखिया भूखा दुख कीं, सुखिया सुख कौं झूरि
सदा अजंदी राम के, जिनि सुख-दुख गेल्हे दूरि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि भूख के कष्ट के कारण दुखी आदमी मर रहा है तो ढेर सारे सुख के कारण सुखी भी कष्ट उठा रहा है किंतु राम के भक्त तो हर हाल में में मजे से रहते हैं क्योंकि वह दुःख सुख के भाव से परे हो गये हैं।

हैवर गैवर सघन धन, छन्नपती की नारि
तास पटेतर ना तुलै, हरिजन की पनिहारि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि भगवान की भक्ति करने वाली गरीब नारी की बराबरी महलों में रहने वाली रानी भी नहीं कर सकती भले ही उसके राजा पति के पास हाथियों और घोड़ो का झुंड और बहुत सारी धन संपदा है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-दुनियां में तीन तरह के लोग होते हैं-दुःखी,सुखी और भक्त। अभाव और निराशा के कारण दुःखी आदमी हमेशा परेशान रहता है तो सुखी आदमी अपने सुख से उकता जाता है और वह हर ‘मन मांगे मोर’ की धारा में बहता रहता है। विश्व के संपन्न राष्ट्रों के देश भारत के अध्यात्मिक ज्ञान की तरफ आकर्षित होते हैं तो भारत के लोग उनकी भौतिक संपन्नता प्रभावित होते हैं। पश्चिम में तनाव है तो पूर्व वाले भी सुखी नहीं। कहने का तात्पर्य यह है कि लोेग इस मायावी संसार में केवल दैहिक सुख सुविधाओं के पीछे भागते हैं। जिसके भौतिक साधन नहीं है वह कर्ज वगैरह लेता है और फिर उसे चुकाते हुए तकलीफ उठाता है और अगर वह चीजें नहीं खरीदे तो परिवार के लोग उसका जीना हराम किये देता है। सुख सुविधा का सामान खरीद लिया तो फिर दैहिक श्रम से स्त्री पुरुष विरक्त हो जाते हैं और इस कारण स्वास्थ बिगड़ने लगता है।

जिन लोगों ने अध्यात्म ज्ञान प्राप्त कर लिया है वह जीवन को दृष्टा की तरह जीते हैं और भौतिकता के प्रति उनका आकर्षण केवल उतना ही रहता है जिससे देह का पालन पोषण सामान्य ढंग से हो सके। वह भौतिकता की चकाचैंध मेंे आकर अपना हृदय मलिन नहीं करते और किसी चीज के अभाव में उसकी चिंता नहीं करते। ऐसे ही लोग वास्तविक राजा है। जीवन का सबसे बड़ा सुख मन की शांति हैं और किसी चीज का अभाव खलता है तो इसका आशय यह है कि हमारे मन में लालच का भाव है और कहीं अपने आलीशान महल में भी बैचेनी होती है तो यह समझ लेना चाहिये कि हमारे अंदर ही खालीपन है। दुःख और सुख से परे आदमी तभी हो सकता है जब वह निष्काम भक्ति करे।
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Monday, July 27, 2009

मनु स्मृति-किसी जीव की हत्या से मांस प्राप्त किया जा सकता है, स्वर्ग नहीं (manu smruti in hindi)

नाऽकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्यद्यते क्वचित्।
न च प्राणिवधः स्वग्र्यस्तस्मान्मांसं विवर्जयेत्।।

हिंदी में भावार्थ-किसी भी जीव की हत्या कर ही मांस प्राप्त किया जाता है लेकिन उससे स्वर्ग नहीं मिल सकता इसलिये सुख तथा स्वर्ग को प्राप्त करने की इच्छा करने वालो को मांस के उपभोग का त्याग कर देना चाहिये।
यद्ध्यायति यत्कुरुते धृतिं बध्नाति यत्र च।
तद्वाघ्नोत्ययत्नेन यो हिनस्तिन किंचन।।

हिंदी में भावार्थ-जो मनुष्य किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं करता, वह जिस विषय पर एकाग्रता के साथ विचार और कर्म करता है वह अपना लक्ष्य शीघ्र और बिना विशेष प्रयत्न के प्राप्त कर लेता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में मनुष्य के चलने के दो ही मार्ग हैं-एक सत्य और परमार्थ और दूसरा असत्य और हिंसा। यदि मनुष्य का मन लोभ, लालच और अहंकार से ग्रस्त हो गया तो वह नकारात्मक मार्ग पर चलेगा और उसमें सहृदयता का भाव है तो वह सकारात्मक मार्ग पर चलता है। श्रीगीता के संदेशों का सार यह है कि जैसा मनुष्य अन्न जल ग्रहण करता है तो वैसा ही उसका स्वभाव हो जाता है तब वह उसी के अनुसार ही कर्म करता हुआ फल भोगता है।
वैसे पश्चिम के वैज्ञानिक भी अपने अनुसंधान से यह बात प्रमाणित कर चुके हैं कि शाकाहारी भोजन और मांसाहारी भोजन करने वालों के स्वभाव में अंतर होता है। वह यह भी प्रमाणित कर चुके हैं कि शाकाहारी भोजन करने वालों के विचार और चिंतन में सकारात्मक पक्ष अधिक रहता है जबकि मांसाहारी लोगों का स्वभाव इसके विपरीत होता है। अतः जितना संभव हो सके भोजन में मांसाहार से परहेज करना चाहिये।
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Friday, July 17, 2009

रहीम संदेश: स्वार्थ की वजह से हुआ प्रेम धीरे धीरे घटता जाता है (rahim ke dohe-matalab ka pyar dhir dhire kam hota hai)

वहै प्रीति नहिं रीति वह, नहीं पाछिलो हेत
घटत घटत रहिमन घटै, ज्यों कर लीन्हे रेत

स्वाभाविक रूप से जो प्रेम होता है उसकी कोई रीति नहीं होती। स्वार्थ की वजह से हुआ प्रेम तो धीरे धीरे घटते हुए समाप्त हो जाता है। जब आदमी के स्वार्थ पूरे हो जाते हैं जब उसका प्रेम ऐसे ही घटता है जैसे रेत हाथ से फिसलती है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-जीवन में कई ऐसे लोग आते हैं जिनका साथ हमें बहुत अच्छा लगता है और हम से प्रेम समझ बैठते हैं। फिर वह बिछड़ जाते हैं तो उनकी याद आती है और फिर एकदम बिसर जाते हैं। उनकी जगह दूसरे लोग ले लेत हैं। यह प्रेमी की ऐसी रीति है जो देह के साथ आती है। यह अलग बात है कि इसमेें बहकर कई लोग अपना जीवन दूसरे को सौंप कर उसे तबाह कर लेते हैं।

सच्चा प्रेम तो परमात्मा के नाम से ही हो सकता है। आजकल के फिल्मी कहानियों में जो प्रेम दिखाया जाता है वह केवल देह के आकर्षण तक ही सीमित है। फिर कई सूफी गाने भी इस तरह प्रस्तुत किये जाते हैं कि परमात्मा और प्रेमी एक जैसा प्रस्तुत हो जाये। सूफी संस्कृति की आड़ में हाड़मांस के नष्ट होने वाली देह में दिल लगाने के लिये यह संस्कृति बाजार ने बनाई है। अनेक युवक युवतियां इसमें बह जाते हैं और उनको लगता हैकि बस यही प्रेम परमात्मा का रूप है।

सच तो यह है परमात्मा को प्रेम करने वाली तो कोई रीति नहीं है। उसका ध्यान और स्मरण कर मन के विकार दूर किये जायें तभी पता लगता है कि प्रेम क्या है? यह दैहिक प्रेम तो केवल एक आकर्षण है जबकि परमात्मा के प्रति ही प्रेम सच्चा है क्योंकि हम उससे अलग हुई आत्मा है।
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Thursday, June 25, 2009

विदुर नीति-अपनों में विश्वास उत्पन्न करने वाला ही श्रेष्ट


1. जो राज्य प्रमुख मनुष्यों अपने प्रति विश्वास उत्पन्न करने का तरीका जानता है और जो किसी अपराधी के अपराध का प्रमाण मिल जाने पर उनको दंड देता है उसके पास अपार धन संपदा चली आती है। राज्य प्रमुख को कम या दंड अधिक मात्रा में दंड देने के साथ ही क्षमा करना भी आना चाहिये।
2.काम क्रोध का त्याग और सुपात्र को धन दान देने वाला राज्य प्रमुख ही विशेषज्ञ है। जो शास्त्रों का ज्ञान रखता और अपने कर्तव्य को शीघ्र पूरा करता है उस राजा को लोग प्रमाणिक मानते है।
3.जो व्यक्ति किसी कमजोर का अपमान नहीं करता, सदा सावधान रहकर अपने विरोधी और शत्रु के साथ बुद्धिमानी से व्यवहार करता है, ताकतवर के साथ संघर्ष नहीं करता तथा समय आने पर पराक्रम दिखाता है वह धीर पुरुष कहलाता है।
4.संकट आने पर जो व्यक्ति दुःखी नहीं होता बल्कि सावधानी पूर्वक अपना स्वाभाविक कर्म करता है वही महापुरुष है जो तमाम तरह की विपत्तियों को सहते हुए अपने विरोधियों और प्रतिकूल स्थितियों पर विजय पा लेता है।
5.जो कभी उद्दण्डता करते हुए कोई वेश नहीं बनाता, दूसरों के सामने डींग नहीं हांकता,क्रोध से व्याकुल होने पर भी कठोर या कटु वचन नहीं कहता वह मनुष्य सदा ही सभी को प्रिय होता है।
6.जो शांत हो चुके वैर को पुनः जागृत नहीं करता, कभी अहंकार में वचन नहीं कहता, कहीं हीनता का प्रदर्शन नहीं करता तथा किसी प्रकार की विपत्ति में पड़े होने का भाव लेकर भी कोई अनुचित काम नहीं करता तथा उत्तम साधनों से आय अर्जित करने वाले पुरुष को सर्वश्रेष्ठ कहा जाता है।
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Monday, June 15, 2009

चाणक्य नीति-संतोष सबसे बड़ा धन है

संतोषस्त्रिशु कत्र्तव्यः स्वदारे भोजने धने।
त्रिषु चैव न कत्र्तव्योऽध्ययने तपदानयोः।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुष्य को अपनी पत्नी, भोजन और धन से ही संतोष करना चाहिये पर ज्ञानार्जन, भक्ति और दान देने के मामले में हमेशा असंतोषी रहे यही उसके लिये अच्छा है।

संतोषाऽमृत-तुप्तानां यत्सुखं शान्तचेतसाम्।
न च तद् धनलूब्धानामितश्चयेतश्च धावताम्।।
हिंदी में भावार्थ-
जो मनुष्य संतोष रुपी अमृत से तुप्त है उसका ही हृदय शांत रह सकता है। इसके विपरीत जो मनुष्य असंतोष को प्राप्त होता है उसे जीवन भर भटकना ही पड़ता है उसे कभी भी शांति नहीं मिल सकती।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-नीति विशारद चाणक्य के संदेशों के ठीक विपरीत हमारा देश चल रहा है। जिन लोगों के पास धन है उनके पास भी संतोष नहीं है और जिनके पास नहीं है उनसे तो आशा करना ही व्यर्थ है। अपनी पत्नी और घर के भोजन से धनी लोगों को संतोष नहीं है। जीभ का स्वाद बदलने के लिये ऐसी वस्तुओं का सेवन बढ़ता जा रहा है जो स्वास्थ्य के लिये हितकर नहीं है। कहा जाता है कि खाने पीने की वस्तुओं को स्वच्छता होना चाहिये पर होटलों और बाजार की वस्तुओं में कितनी स्वच्छता है यह हम देख सकते हैं। किसी रात एक साफ रुमाल घर में रख दीजिये और सुबह देखिये तो उस पर धूल जमा है तब बाजार में कई दिनों से रखी चीजों में स्वच्छता की अपेक्षा कैसे रखी जा सकती है। घर में गृहिणी सफाई से भोजन बनाती है पर क्या वैसी अपेक्षा होटलों के भोजन में की जा सकती है। ढेर सारे ट्रक, ट्रेक्टर,बसेें, मोटर साइकिलें तथा अन्य वाहन सड़कों से गुजरते हुए तमाम तरह की धूल और धूंआ उड़ाते हुए जाते हैं उनसे सड़कों पर स्थित दुकानों,चायखानों और होटलों में रखी वस्तुओं के विषाक्त होने की आशंका हमेशा बनी रहती है। ऐसे में बाजारों में खाने वाले लोगों के साथ अस्पतालों में मरीजों की संख्या भी बढ़ रही है तो आश्चर्य की बात क्या है?
इसके विपरीत लोगों की आध्यात्मिक ज्ञान और भक्ति के भाव के प्रति कमी भी आ रही है। लोगों को ऐसा लगता है कि यह तो पुरातनपंथी विचार है। असंतोष को बाजार उकसा रहा है क्योंकि वहां उसे अपने उत्पाद बेचने हैं। प्रचार के द्वारा बैचेनी और असंतोष फैलाने वाले तत्वों की पहचान करना जरूरी है और यह तभी संभव है कि जब अपने पास आध्यात्मि ज्ञान हो।
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Thursday, June 11, 2009

विदुर नीति:मौन रहने से सत्य बोलना ठीक रहता है

  1. बोलने से न बोलना अच्छा बताया गया है, किन्तु सत्य बोलना भी एक गुण है। चुप या मौन रहने से सत्य बोलना दो गुना लाभप्रद है। सत्य मीठी वाणी में बोलना तीसरा गुण है और धर्म के अनुसार बोला जाये यह उसका चौथा गुण है।
  2. मनुष्य जैसे लोगों के साथ रहता है और जिन लोगों की सेवा में रहता है और जैसी उसकी कामनाएं होतीं है वैसा ही वह हो भी जाता है।
  3. मनुष्य जिन विषयों से मन हटाता है उससे उसकी मुक्ति हो जाती है। इस प्रकार यदि सब और से निवृत हो जाये तो उसे कभी भी दुख प्राप्त नहीं होगा।
  4. जो न तो स्वयं किसी से जीता जाता है न दूसरों को जीतने के इच्छा करता है न किसी से बैर करता और न दूसरे को हानि पहुंचाता है और अपनी निंदा और प्रशंसा में भी सहज रहता है वह दुख और सुख के भाव से परे हो जाता है।

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Thursday, May 14, 2009

भर्तृहरि शतकः दुर्जन को बताया रहस्य उजागर हो जाता है

जले तैलं खले गुह्यं पात्रे दानं मनागपि।
प्राज्ञे शास्त्रं स्वयं याति विस्तरं वस्तुशक्तितः।।
हिंदी में भावार्थ-
जल में मिलाया गया तेल, दुर्जन को बताया गया गुप्त रहस्य, सुपात्र को दिया गया धन का दान और बुद्धिमान को प्रदाय किया ज्ञान स्वतः वृद्धि को प्राप्त होते हैं।
धर्माऽऽख्याने श्मशाने च रोगिणां या मतिर्भवेत्।
सा सर्वदैव तिष्ठेयेत् को न मुच्येत बंधानात्।।
हिंदी में भावार्थ-
किसी भी धर्म स्थान पर जब कोई व्यक्ति सत्संग का लाभ उठाता है, श्मशान में किसी के शव दाहसंस्कार होते देखता है या किसी रोगी को अपनी पीड़ा से छटपटाता हुआ देखता है तो इस भौतिक दुनियां को निरर्थक मानने लगता है परंतु जैसे ही वहां से हट जाता है वैसे ही उसकी बुद्धि फिर इसी संसार के भौतिक स्वरूप की तरफ आकर्षित होती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-व्यक्ति को अपने राज किसी अन्य से नहीं कहना चाहिये। अगर कोई व्यक्ति हमारे सामने अच्छा बर्ताव करता है पर अगर उसके मन में हमारे प्रति कपट,ईष्र्या या द्वेष का भाव है तो वह उसे जाकर सभी को बता देगा जिससे अधिक कष्ट प्राप्त होता है। उसी तरह अपने घन का दान किसी अगर अच्छे और गुणी को दिया जाये तो वह उसका सदुपयोग कर उसमें वृद्धि करेगा।
ऐसा अनेक बार जीवन में हमारे सामने अवसर आता है जब कहीं किसी सत्संग में जाते हैं या कहीं श्मशान में किसी प्रियजन और मित्र के दाह संस्कार को देखते हैं या कहीं कोई रोगी तड़तपा हुआ दिखता है तब हमें यह सारा संसार मिथ्या नजर आता है पर अगर उस स्थान से हटते हैं तो फिर सब भूल जाते है। दुनियां के इस भौतिक स्वरूप की महिमा कुछ ऐसी है कि जो इसे बाह्य आंखों से देखता है उसे प्रभावित करता है पर जो ज्ञानी हैं वह इसे जानते हैं और हमेशा ही सुख दुःख, प्रसन्नता शोक और लाभ हानि में समबुद्धिरूप से स्थित रहकर जीवन व्यतीत करते हैं।
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Thursday, May 7, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-समय के अनुसार कछुए और सांप के अनुसार व्यवहार करें

कौमे संकोचभास्य प्रहारमपि मर्धयेत्।
काले प्रापते तु मतिमानुत्तिश्ठेत्क्रूरसर्पवत्।।
हिंदी में भावार्थ-
अपने समय के अनुसार जीवन में रणनीति बनाते हुए कछुए के समान अंग समेटकर शत्रु का प्रहार भी सहन करें तो और उचित अवसर देखकर सांप के समान प्रहार भी करें।
मतप्रमतवत् स्थित्वा ग्रसदुत्पलुत्य पण्डितः।
अपरिभश्यमानं हि क्रमप्राप्ते मृगेन्द्रवत्।।
हिंदी में भावार्थ-
बुद्धिमान व्यक्ति को मत्त और प्रमत्त के समान दिखावे में स्थित होकर शत्रु पर ऐसे ही प्रहार करते हैं जैसे सिंह करता है। उसका वार कभी खाली नहीं जाता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन में कई बार ऐसा अवसर आता है जब हमें दूसरे के शब्दिक और शारीरिक आक्रमण को झेलना पड़ता है। उस समय हमें अपनी स्थितियों और शक्ति का अवलोकन करते हुए इस बात को भी देखना चाहिये कि हमारे सहयोगी कौन है? अगर समय हमारे अनुकूल न हो तो अपनी सहनशक्ति को बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि उस समय क्रोध या निराशा में उठाया गया कदम आत्मघाती होता है।
इसके विपरीत जब हमारा समय अनुकूल हो और लगता हो कि हमारे मित्र और सहयोगी साथ देने के लिये तैयार हैं और शत्रु या विरोधी को दबाया जा सकता है तब उस पर शाब्दिक या शारीरिक आक्रमण किया जा सकता है। वैसे आजकल के सभ्य युग में शारीरिक कम शाब्दिक संघर्ष अधिक होते हैं। चाहे किस प्रकार का भी आक्रमण हो उसकी तैयारी विवेक से करना चाहिये। कहीं कहीं हम पर शाब्दिक आक्रमण भी होता है और अगर लगता है कि वहंा प्रत्युत्तर देने का उचित समय नहीं है तो मौन रहना ही बेहतर है परंतु यदि लगता है कि उससे सामने वाले को अनावश्यक लाभ मिल रहा है तो स्थिति देखकर उस पर पलटवार करना बुरा नहीं है।
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Wednesday, May 6, 2009

भर्तृहरि शतकः दुष्ट से दया और मित्र से धन की याचना नहीं करना चाहिए

असन्तो नाम्यथ्र्याः सुहृदपि न याच्यः कृशधनः प्रियान्याच्या वृत्तिर्मलिनमुसुभंगेऽप्यसुकरं।
चिपद्युच्चैः स्थेयं पदमनृविधेयं च महतां सत्तां केनाद्दिष्टं विषमममसिधाराव्रतमिदम्?
हिंदी में भावार्थ-
दृष्ट लोगों से दया के लिये प्रार्थना और अमीर मित्रों से याचना न कर केवल सत्य आचरण से ही जीवन पथ पर आगे बढ़ना चाहिये-ऐसे विचार का प्रतिपादन सज्जन लोगों के लिये किसने किया? मृत्यु के समक्ष भी उच्च विचारों की रक्षा की जाती है और महापुरुषों के मार्ग का ही अनुसरण करना पड़ता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन के अनेक नियम हैं जिनमें यह भी है कि जो व्यक्ति दुष्ट प्रवृत्ति का है उससे दया की याचना करने का कोई अर्थ नहीं है। उससे अपनी दुष्टता का प्रदर्शन करना ही है। दया दिखाने पर हो सकता है वह कुछ देर अपने दुष्कर्म से रुक जाये पर फिर उसे उसी मार्ग पर जाना है। अतः दुष्ट प्रकृति के लोगों का प्रतिकार करने का सामर्थ्य हमेशा अपने पास रखना चाहिये या फिर उस स्थान से ही चले जाना चाहिये जहां वह निवास करते है।
उसी तरह अपने धनी मित्र से किसी प्रकार की याचना कर अपने संबंध बिगाड़ने की आशंकायें पैदा करना व्यर्थ है। धन एक माया का रूप है और वह सभी को भ्रम, लालच और लोभ की प्रवृत्तियों के कारण अपने बंधन में जकड़े रहती है। अतः अपने धन बंधु-बांधवों और मित्रों से यह आशा करना व्यर्थ है कि वह याचना करने पर आर्थिक सहायता देंगे। जहां तक आर्थिक सहायता का प्रश्न है तो जिसके मन में यह उदार भाव होता है वह बिना मंागे ही करता है और जिसका हृदय संकीर्ण मानसिकता वाला है उससे कितना भी आग्रह करें वह आर्थिक सहायता नहीं करेगा।
जीवन में अपने आत्म सम्मान की रक्षा के लिये जरूरी है कि उसके कुछ नियमों को समझाया जाये। महापुरुष द्वारा ने अपने अनुभवों से जो सत्य का मार्ग दिखाया है उस पर चलकर ही सामान्य मनुष्य जीवन में स्वस्थ और प्रसन्न रह सकता है। उससे पृथक चलना अपने आपको ही शारीरिक और मानसिक कष्ट देना है।
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Tuesday, April 28, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-अपमान की क्रोधाग्नि में जल रही सेना युद्ध योग्य नहीं होती

अमानितं हिं युध्येत कृतमानार्थसंग्रहम्।
न विमानितम्तर्थ प्रदीप्तक्रोपावकम्।।
हिंदी में भावार्थ-
जिस सेना का अपमान हुआ हो वह सम्मान पाने के लिये युद्ध कर सकती है पर जो अपमान की क्रोधाग्नि में जल रही हो वह युद्ध के योग्य नहीं होती।
परिश्रान्तं हि युध्येत विश्रान्तं सुविधानतः।
दुरार्यार्तहतप्राणं न शस्त्रग्रहणमम्।।
हिंदी में भावार्थ-
बाध्यता हो तो थक गया आदमी भी युद्ध कर सकता है पर विश्राम करने के बाद उसकी क्षमता बढ़ जाती है और वह विधिपूर्वक युद्ध कर सकता है। बहुत लंबी दूरी तय कर आया व्यक्ति तो शस्त्र भी नहीं ग्रहण कर सकता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कौटिल्य का अर्थशास्त्र केवल भूमिपति राजाओं के लिये नहीं लिखा गया बल्कि घर परिवारों और व्यवसायों के राजाओं के लिये भी उसमें सीखने लायक है क्योंकि जहां तक आचरण, व्यवहार और नैतिकता की बात है तो हर प्रकार के स्वामी को आदर्श प्रस्तुत करना चाहिये। यहां राजाओं के लिये जहां यह संदेश है कि वह अपने सैनिकों की मनोदशा को समझें वही स्वामित्व धारण करने वाले सामान्य लोगों को भी यही समझाया जा रहा है कि वह अपने शासितों के प्रति सहानुभूति दिखायें।
कोई अनुचर अपना सम्मान बचाने के लिये स्वामी के कार्य को संपन्न करने का प्रयास कर सकता है अगर वह अपमान के कारण क्रोध में जल रहा है तो यह किसी भी कार्य को सही ढंग से संपन्न नहीं कर सकता। अगर अधिकारी ने अपने अधीनस्थ का अपमान उसे नकारा बताकर किया है तो फिर उसे यह आशा नहीं करना चाहिये कि वह ठीक ढंग से अंजाम देगा। अगर फिर भी उसे कार्य करने के बाध्य किया गया तो वह उसे उल्टा पुल्टा कर सकता है। उसी तरह अगर अधीनस्थ को विश्राम देकर काम करने दें तो वह बेहतर ढंग से उस कार्य को कर सकता है। कार्य पर तत्काल उपस्थित हुए अधीनस्थ को पहले सांस लेने दें फिर उसे काम सौंपे। वैसे देखा जाये तो यह कुशल प्रबंधन का एक तरीका है।
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Saturday, April 25, 2009

रहीम के सोरठा-पत्थर पानी में रहते हुए भी गीला नहीं होता

रहिमन नीर पखान, बूड़ै पै सीझै नहीं।
तैसे मूरख ज्ञान, बूझै पै सूझै नहीं।।

कविवर रहीम कहते हैं कि पत्थर पानी में डूब जाता है पर फिर भी गीला नहीं होता। यही स्थिति मूर्ख लोगों की है जो ज्ञान की खोज में रहते हैं पर उसे धारण नहीं करते और उनकी स्थिति जस की तस ही रहती है।

रहिमन बहरी बाज, गगर चढ़ै फिर क्यों तिरै।
पेट अधम के काज, फेरि आय बंधन परै।।


कविवर रहीम कहते हैं कि जिस तरह बहरा बाज आसमान में उड़ता है फिर भी उसे मुक्ति नहीं मिलती क्योंकि वह अपने पापी पेट के लिये बार बार इस धरती के बंधन में फंस जाता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- इस विश्व में ज्ञानियों का झूंड हर जगह मिलेगा जो सामान्य लोगों को ज्ञान देता फिरता है। लोग उनको सुनते हैं और वाह वाह करने के बाद उनके संदेशों का सार भूल जाते हैं। कथित ज्ञानी भी कैसे हैं? किसी को पैसे की भूख है तो किसी को राज्य की और कोई प्रतिष्ठा की चाहत रखता है। हर ज्ञानी अपनी विचाराधारा के अनुसार तय रंगों के वस्त्र पहनता है जो कि इस बात का प्रमाण है कि कहीं न कहीं उसकी सोच दायरों में बंधी है। पूरे विश्व को स्वतंत्र और मौलिक सोच का संदेश देने वाले यह कथित ज्ञानी स्वयं ही मन के ऐसे बंधनों में बंधे रहते हैं जिनसे कभी उनकी स्वयं की मुक्ति नहीं होती।

भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान ही इस बात की पुष्टि करता है कि मनुष्य का मन ही उस पर सवारी करता है और भ्रम उसे स्वयं की सवार होने का होता है। अपनी दैहिक आवश्यकताओं की पूति के लिये मनुष्य उससे अधिक प्रयास करता है। अर्थ संचय की उसकी क्षुधा उमर भर शांत नहीं होती पर इधर अंदर स्थित अध्यात्मिक शक्तियां भी अपने लिये कार्य करने के लिये प्रेरित करती हैं और वह इसके लिये इन कथित ज्ञानियों के यहां मत्था टेकता है पर जब वापस आता है तो फिर इसी दुनियां के जाल में फंस जाता है। तत्वज्ञान के बिना मनुष्य की स्थिति उस बाज की तरह होती है जो आकाश में उड़ता है पर फिर अपनी पेट की भूख के लिये इस धरती पर आता है और वह उस गीले पत्थर की तरह हो जाता है जो पानी में रहते हुए भी गीला नहीं होता।
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Friday, April 24, 2009

मनुस्मृतिः इंद्रियों पर नियंत्रण करना आसान काम नहीं

न तथैंतानि शक्यन्ते सन्नियंतुमसेवया।
विषयेषु प्रजुष्टानि यथा ज्ञानेन नित्यशः

हिन्दी में भावार्थ-जब तक इंद्रियों और विषयों के बारे में जानकारी नहीं है तब तब उन पर निंयत्रण नहीं किया जा सका। इंद्रियों पर नियंत्रण करना कोई आसान काम नहीं है। इसके लिये यह आवश्यक है कि विषयों की हानियों और दोषों पर विचार किया जाये
वशे कृत्वेन्दिियग्रामं संयम्य च मनस्तथा।
सर्वान्संसाधयेर्थानिक्षण्वन् योगतस्तनुम्।।

हिंदी में भावार्थ-मनुष्य के लिये यही श्रेयस्कर है कि वह अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखे जिससे धर्म,अर्थ,काम तथा मोक्ष चारों प्रकार का लक्ष्य प्राप्त किया जा सके।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इंद्रियों पर नियंत्रण और विषयों से परे रहने का संदेश देना आसान है पर स्वयं उस पर नियंत्रण करना कोई आसान काम नहीं है। आप चाहें तो पूरे देश में ऐसे धार्मिक मठाधीशों को देख सकते हैं जो श्रीगीता का ज्ञान देते हुए निष्काम भाव से कर्म करने का संदेश देते हैं पर वही अपने प्रवचन कार्यक्रमों के लिये धार्मिक लोगों से सौदेबाजी करते हैं। लोगों को सादगी का उपदेश देने वाले ऐसे धर्म विशेषज्ञ अपने फाइव स्टार आश्रमों से बाहर निकलते हैं तो वहां भी ऐसी ही सुविधायें मांगते हैं। देह को नष्ट और आत्मा को अमर बताने वाले ऐसे लोग स्वयं ही नहीं जानते कि इंद्रियों पर नियंत्रण करते हुए विषयों से परे कैसे रहा जाता है। उनके लिये धार्मिक संदेश नारों की तरह होते हैं जिसे वह लगाये जाते हैं।
दरअसल ऐसे लोगों से शास्त्रों से अपने स्वार्थ के अनुसार संदेश रट लिये हैं पर वह इंद्रियों और विषयों के मूलतत्वों को नहीं जानते। इंद्रियों पर नियंत्रण तभी किया जा सकता है जब विषयों से परे रहा जाये। यह तभी संभव है जब उसके दोषों को समझा जाये। वरना तो दूसरा कहता जाये और हम सुनते जायें। ढाक के तीन पात। सत्संग सुनने के बाद घूम फिरकर इस साँसससिक दुनियां में आकर फिर अज्ञानी होकर जीवन व्यतीत करें तो उससे क्या लाभ?
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Thursday, April 23, 2009

चाणक्य नीतिः मनुष्य सत्य के पथ पर है तो पवित्र स्थान पर जाकर स्नान की आवश्यकता नहीं

लोभश्चेदगुणेन किं पिंशुनता यद्यस्ति किं पासकैः सत्यं चेतपसा च किं शुचि मनो यद्यस्ति तीर्थेन किम्।
सौजन्यं यदि किं गुणैः सुमहिमा यस्ति किं मण्डनैः सद्विद्या यदि किं धनैरपयशो यस्ति किं मृत्युना।।


हिंदी में भावार्थ-मनुष्य में यदि लोभ का भाव है तो फिर किसी दूसरे दोष की उसे आवश्यकता नहीं है। यदि उसके स्वभाव ही निंदा और चुगली करने का है तो उसे कोई अन्य पाप कर्म करने की आवश्यकता नहीं है। अगर व्यक्ति सत्य के पथ पर है तो उसे किसी तप की आवश्यकता नहीं है। इसी तरह यदि मन ही पवित्र है तो उसे किसी पवित्र स्थान पर जाकर स्नान करने की आवश्यकता नहीं है। हृदय में सद्भावना है तो फिर कोई दूसरा गुण क्या कर लेगा? संसार में अपने कर्मो से यश फैल रहा है तो फिर आभूषणों या सुंदर वस्त्रों को धारण करने से क्या लाभ? विद्या है तो धनहीन होना महत्वपूर्ण नहीं है। अगर अपयश फैल गया है तो फिर मृत्यु से भी मुक्ति नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में आकर अपने दैहिक निर्वहन के लिये भौतिक पदार्थों की आवश्यकता होती है पर उसके लिये अपनी आत्मा को भुलाकर उनमें लिप्त होने से कोई लाभ नहीं है। इस संसार के सभी भौतिक पदार्थ नष्ट प्रायः है पर मनुष्य द्वारा अपने सतकर्मों से अर्जित यश ही उसके बाद चलता रहता है। दुर्गुण तो स्वाभाविक रूप से आते हैं पर गुणों को बनाये रखने के लिये प्रयास करना पड़ता है। उसी तरह अपकीर्ति तो स्वतः ही फैलती है पर कीर्ति फैलाने के लिये प्रयास करना पड़ता है। आशय यह है कि अगर हम अपने ऊपर मानसिक रूप से नियंत्रण नहीं करेंगे तो हमारे कदम स्वतः ही भटकाव की राह पर चल पड़ेंगे।
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Saturday, April 18, 2009

चाणक्य नीतिः नदी किनारे स्थित वृक्ष शीघ्र नष्ट हो जाते हैं (chankya niti)

नदी तीरे च ये वृक्षाः परगृहेषु कामिनी।
मन्त्रिहीनश्चय राजानः शीघ्रं नश्चाननसंशयम्

हिंदी में भावार्थ-नदी के किनारे वृक्ष, दूसरे के घर रहने वाली स्त्री, मंत्री के बिना राजा शीघ्र नष्ट हो जाते हैं।
निर्धनं पुरुषं वेश्या प्रजा भग्नं नृपं त्यजेत्।
खग चीतफल वृक्षं भुक्त्वा चाऽभ्यागता गृहम्।।

हिंदी में भावार्थ-निर्धन पुरुष को वैश्या, पराजित और शक्तिहीन राजा को प्रजा, फलहीन वृक्ष को पक्षी जिस तरह त्याग देते हैं उसी तरह भोजन करने के बाद अतिथि को गृहस्थ का त्याग कर देना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अपने जीवन के लक्ष्य और कार्य पर स्वयं ही निर्भर रहना चाहिये। यह सही है कि अपने अनेक कार्यों के लिये दूसरों की सहायता की आवश्यकता होती है पर उस समय इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि अपनी निर्भरता किसी एक व्यक्ति की बजाय अनेक पर हो ताकि एक अगर सहायता न तो दूसरा कर दे। अपने कार्य तथा उद्देश्य की पूर्ति के सदैव स्वयं ही विचार करते हुए सक्रिय रहना चाहिये। दूसरों निर्भर रहने से जीवन में असफलता की आशंका बलवती होती है।

परिवार समाज और राष्ट्र के मुखिया को सदैव अपनी शक्ति और अर्थ का संचय करते रहना चाहिये। जहां उसकी शक्ति में शिथिलता आने के साथ ही धनाभाव घेर लेता है वहां उसके अंतर्गत सक्रिय अन्य लोग ही नहीं वरन् स्वजन ही उसका त्याग कर देते हैं। अपनी शक्ति और संपन्नता बनाये रखने के लिये अपने गुणों और दुर्गुणों पर निरंतर दृष्टिपात करते हुए आत्म मंथन करते हुए नये प्रयोग करते रहने से शक्ति अर्जित होती है और साथ में अपने प्रति लोगों में नवीनता का भाव बनाये रखा जा सकता है। वैसे आयु अनुसार शक्ति और समयानुसार धन का हृास होता है पर गुणवान और ज्ञानी लोग अपने अभ्यास से इसका आभास किसी को नहीं होने देते जिससे उनकी शक्ति यथावत रहती है।
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Wednesday, April 15, 2009

चाणक्य नीतिः मनुष्य अपने कर्म के लिये अकेला ही उत्तरदायी होता है

जन्ममृत्यु हि यात्येको भुनक्त्येकः शुभाऽशुभम्।
नरकेषु पतत्येक एको याति परां गतिम्।।

हिंदी में भावार्थ-मनुष्य अकेला ही जन्म लेकर मुत्यु को प्राप्त होता है। अपने हाथ से ही अकेले शुभ अशुभ कर्म करता है और अपने पाप पुण्य का फल अकेले ही भोगता और मोक्ष प्राप्त करता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-जन्म के साथ ही मनुष्य के अनेक प्रकार के संबंध स्थापित होते हैं और मृत्यु के साथ ही बिखर जाते हैं। मनुष्य जन्म से स्थापित इन्हीं संबंधों को सत्य मानकर उनके इर्दगिर्द घूमते हुए परमात्मा की भक्ति से जीवन भर विरक्त रहता है। वह अपने लिये जीवन का सुख केवल इन्हीं संबंधों में ढूंढता है जो कभी नहीं मिलता। कहीं दायित्व तो कहीं अधिकार के नाम पर मनुष्य जीवन भर इन संबंधों में लिप्त रहता है पर उसे मिलता कुछ नहीं है कभी तो उसके लिये यह संबंध तनाव का कारण भी बनते हैं।
अपने परिवार के आहार विहार के लिये मनुष्य हर तरह के कर्म करता है। कहीं शिष्टाचार तो कहीं भ्रष्टाचार करने के लिये तत्पर मनुष्य यह नहीं जानता कि उसके फल और कुफल के लिये वह स्वयं जिम्मेदार होगा। महर्षि बाल्मीकि का चरित्र सभी जानते हैं। वह एक दस्यु के रूप में अपने परिवार वालों के लिये कमाई करते थे। एक बार जब उन्होंने कुछ साधुओं को पकड़ लिया और उन्होंने उनसे कहा कि ‘अपने परिवार के सदस्यों से पहले पूछकर आओ कि क्या तुम्हारे कुफल में वह भागीदार बनेंगे।
महर्षि बाल्मीकि ने जब अपने परिवार के सदस्यों से उक्त प्रश्न किया तो सभी ने उनको ‘ना’ में उत्तर दिया। वहां से उनको ऐसा ज्ञान प्राप्त हुआ कि उन्होंने रामायण जैसा महाग्रंथ रच डाला और उनका नाम आज भी जाना जाता है। यह कथा इस बात का प्रमाण है कि मनुष्य अपने कर्म के लिये स्वयं ही जिम्मेदार होता है।
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Tuesday, April 14, 2009

मनुस्मृतिः अंगदोष से पुकारने और अपशब्द कहने पर दंड मिलना चाहिए

काणं वाप्यथवा खंजमन्यं वाणि तथाविधम्।
तथ्येनापि ब्रुपन्दाप्यो दण्डं कार्षापणा वरम्।।

हिंदी में भावार्थ-मनु महाराज के अनुसार किसी विकलांग व्यक्ति को उसके अंगदोष से पुकारने वाले को-काना या लंगड़ा कहकर बुलाने वाला- दंडित किया जाना चाहिये।
मातरं पितरं जायां भ्रातरं तनयं गुरुम्।
आक्षारयच्छत दाप्यः पन्थानं चाददद्गुरोः।।

हिंदी में भावार्थ-मनु महाराज के अनुसार जो व्यक्ति माता पिता, पत्नी, और भाई को अपशब्द कहता है तथा अपने गुरु के आने पर उसे सम्मान नहीं देता उसे भी दंडित किया जाना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे समाज में जन्मजात अंगदोष वाले व्यक्ति को घृणित दृष्टि से देखने की बहुत बुरी भावना है। मनु महाराज इसका विरोध करते हैं। होता यह है कि अंगदोष वाले व्यक्ति कहीं बैठते हैं और किसी की बात का प्रतिकार करते हैं तो सामने वाला व्यक्ति हाल ही उसे अंगदोष से पुकारने लगता है। यह पापकर्म और अपराध है। देखा तो यह गया है कि इस तरह अंगदोष वाले लोग समाज से हमेशा अपमानित होने के कारण हीनभावना से भर जाते हैं। कहने को तो हमारा देश संस्कारवान लोगों से संपन्न कहा जाता है पर गांव हो या शहर अंगदोष वाले व्यक्तियों से कई बार बदतमीजी की जाती है। ऐसे लोगों की निंदा करने के साथ मनुमहाराज के अनुसार उनको आर्थिक दंड भी देना चाहिये।
वर्तमान विश्व समाज का एक वर्ग अपशब्दों के प्रयोग में अपने को सभ्य समझने लगा है। अभी हाल ही में प्रचार माध्यमों में आए एक विश्लेषण के अनुसार आजकल के युवक युवतियां वार्तालाप में अपशब्द बोलना फैशन की तरह अपनान लगे हैं। तय बात है कि वह कोई अपने से ताकतवर या समकक्ष व्यक्ति के प्रति ऐसा अपराध करने का साहस नहीं कर सकते और उनकी अभद्रता का शिकार उनसे छोटे वर्ग और सज्जन प्रकृति के लोग होते हैं। ऐसे लोगों की भी निंदा करने के साथ मनु महाराज के अनुसार दंड की व्यवस्था करना चाहिये।
वैसे यहां इस बात का उल्लेख करना आवश्यक है कि अधिकतर देशों में अंगदोष का उल्लेख कर बुलाना या अपशब्दों का प्रयोग करना कानूनी अपराध है। यह अलग बात है कि पीड़ित लोग झमेले में फंसने की बजाय खामोश रहना पसंद करते हैं पर उनके मन की पीड़ा से निकली हाय अपराधी को कभी न कभी लगती ही है।
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Monday, April 13, 2009

चाणक्य नीतिः विद्या के लिये सुख का त्याग जरूरी

सुखार्थी वा त्यजेविद्वधां विद्याथी वा त्यजेत् सुखम्
सुखार्थिनः कुतो विद्वा विद्यार्थिनः कुतो सुखम्।।

हिंदी में भावार्थ-नीति विशारद चाणक्य का कहना है कि सुख की कामना हो तो विद्या की इच्छा त्याग दें और यदि विद्या प्राप्त करने का उद्देश्य हो तो सुख की कामना त्याग दें। सुख की चाहत करने वालों को विद्या और विद्या प्राप्त की चाहता करने वाले का सुख का विचार नहीं करना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-पहले गुरुकुलों में शिक्षा दी जाती थी जहां शिष्य को हर तरह के विषय का ज्ञान प्रदान किया जाता था । जब गुरुकुल से शिष्य निकलता था तो वह हर विधा में पारंगत होता था। राजा महाराजा तक के बच्चे वहां गुरु और आश्रम की सेवा में ऐसे काम करते थे जिनको मजदूर करते हैं। इस तरह अधिक शिक्षि होने पर भी उनमें छोटे काम के प्रति उपेक्षा का भाव नहीं होता था।
आधुनिक शिक्षा में छात्रों को अपने ही छात्रावास में अनेक प्रकार की सुविधा दिलाने के विज्ञापन देखने पर यह आभास होता है कि विद्यालयों और महाविद्यालयों में विद्या कम सुविधायें अधिक देने पर विचार होता है। फिर अपने घर पर ही शिक्षा प्राप्त करने की प्रवृत्ति ने छात्रों के ज्ञान को सीमित कर दिया है। वह विद्यालयों और महाविद्यालयों में अपने विषय से संबद्ध शिक्षा प्राप्त तो कर लेते हैं पर जीवन के रहस्य, चरित्र और नैतिकता के सिद्धांतों को उनको ज्ञान नहीं रहता।

शिक्षित तो हमारे समाज में बहुत हैं पर विद्याधर और ज्ञानी कितने हैं यह हम देख ही रहे हैं। सारे सुख और सुविधायें होते हुए अक्षर ज्ञान तो प्राप्त किया जा सकता है पर अक्षर विद्या बहुत बृहद है उसे समझने के लिये यह जरूरी है कि सुखों का त्याग किया जाये। विद्या से आशय अपने विषय के साथ ही अध्यात्मिक ज्ञान होने से भी है जो आजकल बहुत कम लोगों के पास है। इसका कारण यह है कि छात्रों को शिक्षा के दौरान ही विलासित की वस्तुओं के उपभोग की आदत पड़ जाती है।
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Saturday, April 11, 2009

चाणक्य नीतिः खाने पीने के विषय में कतई संकोच न करें

धन-धान्यप्रयोगेषु विद्य-संग्रहणेषु च।
आहारे व्यवहारे च त्यक्तलज्जः सुखी भवेत्।

हिंदी में भावार्थ-धन धान्य के व्यवहार, ज्ञान विद्या के संग्रह और खाने पीने में जो व्यक्ति संकोच या लज्जा नहीं करते वही जीवन में सुखी रहते हैं।

अर्थनाशं मनस्तापं गृहे दुश्चरितानि च।
वंचनं चाऽपमानं च मतिमान्न प्रकाशयेत्।।

हिंदी में भावार्थ-अपने धन का नाश, मन का दुःख, स्त्री की चरित्रहीनता और किसी अन्य व्यक्ति द्वारा वचनों के द्वारा कष्ट देने की बात सभी के सामने प्रकाशित नहीं करना चाहियै
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कुछ बातों सभी से कहना चाहिये और कुछ नहीं। अक्सर हम व्यग्र होने पर ऐसी बातें लोगों से कह जाते हैं जो नहीं कहना चाहिये। कभी व्यग्रता इतनी बढ़ जाती है कि कह ही नहीं पाते। नीति विशारद चाणक्य के अनुसार जिस बात से अपना अपमान होता हो या अपमान हो चुका हो वह बात किसी को नहीं बताना चाहिये। खासतौर से जब हमारे धन का नाश हमारी गलती से हो गया हो।
इसके अलावा कुछ बातें छिपानी भी नहीं चाहिये। अगर हमारे पास धन या खाद्यान्न नहीं है तो स्पष्टतः उस आदमी को बता देना चाहिये जिससे हमें मदद अपेक्षित है। किसी से कोई बात सीखने के लिये उसके सामने अपने अज्ञान को छिपाना ठीक नहीं है। अगर पेट में भूख हो कहीं अपने खाने का जुगाड़ नहीं हो पाता और कोई अन्य हमें भोजन का आग्रह करता है तो उसे अस्वीकार करना मूर्खता का काम है। कहने का तात्पर्य है कि जहां सम्मान की बात है तो ऐसी बात लोगों को नहीं बताना चाहिये जिससे हमारे अपमान का विस्तार हो साथ ही अपनी दैहिक और मानसिक आवश्यकताओं को दूसरों से छिपाना भी नहीं चाहिये।
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