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Friday, July 24, 2009

विदुर नीति- भविष्य के लिए घातक विकास से दूर रहें (vidur niti-bhavishya aur vikas)

न वृद्धिबंहु मन्तव्या या वृद्धि क्षयमावहेत्।
क्षयोऽपि बहु मन्तव्यो यः क्षयो वृद्धिमावहेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
जो विकास या वृद्धि अपने लिये भविष्य में घातक होने होने की आशंका हो उससे अधिक महत्व नहीं देना चाहिये। साथ ही अगर ऐसा पतन या कमी हो रही हो जिससे हमारा अभ्युदय होने की संभावना है तो उसका स्वागत करना चाहिये।
द्वेषो न साधुर्भवति न मेधावी न पण्डित।
प्रिये शुभानि कार्याणि द्वेष्ये पापानि चैव ह।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुष्य के हृदय में अगर किसी के प्रति द्वेष भाव का निर्माण होता है तो-भले ही वह साधु या विद्वान हो-उसमें दोष ही दोष दिखाई देते हैं। उसी तरह अगर किसी के प्रति स्नेह या प्रेम पैदा हो तो-चाहे भले ही वह दुष्ट और पापी हो- उसमें गुण ही गुण दिखाई देते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-एक दृष्टा की तरह अगर हम अपने भौतिक स्वरूप देह का अवलोकन करें तो पायेंगे कि सारी दुनियां के प्राणी एक समान हैं पर कुछ लोग ऐसे हैं जिनके प्रति हमारे मन में प्यार या स्नेह होता है उनके दोषों पर हमारा ध्यान नहीं जाता। उसी तरह जिनके प्रति द्वेष या नाराजी है उनमें कोई गुण हमें दिखाई नहीं देता-कभी कभी ऐसा होता है कि उनका कोई गुण हमारे दिमाग में आता भी है तो उसे अपने चिंतन से जबरन दूर हटाने का प्रयास करते हैं। कहने का तात्पर्य है कि हमारा मन और मस्तिष्क हमारी पूरी देह पर नियंत्रण किये रहता है। इसका आभास तभी हो सकता है जब योग साधना और ध्यान के द्वारा हम अपने अंदर बैठे दृष्टा के दृष्टिकोण को आत्मसात करें।
नीति विशारद विदुर यह भी कहते हैं कि हमें अपने आसपास हो रहे भौतिक तत्वों में विकास या वृद्धि बहुत अच्छी लगती है पर उनमें से कुछ ऐसे भी हो सकते हैं जो भविष्य में हमारे लिये घातक हों उसी तरह उनमें पतन या कमी ऐसी भी हा सकती है जो अच्छा परिणाम देने वाली हो। अतः अपने अंदर समबुद्धिरूप से विचार करने की शक्ति विकसित करना चाहिये।
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Thursday, May 14, 2009

भर्तृहरि शतकः दुर्जन को बताया रहस्य उजागर हो जाता है

जले तैलं खले गुह्यं पात्रे दानं मनागपि।
प्राज्ञे शास्त्रं स्वयं याति विस्तरं वस्तुशक्तितः।।
हिंदी में भावार्थ-
जल में मिलाया गया तेल, दुर्जन को बताया गया गुप्त रहस्य, सुपात्र को दिया गया धन का दान और बुद्धिमान को प्रदाय किया ज्ञान स्वतः वृद्धि को प्राप्त होते हैं।
धर्माऽऽख्याने श्मशाने च रोगिणां या मतिर्भवेत्।
सा सर्वदैव तिष्ठेयेत् को न मुच्येत बंधानात्।।
हिंदी में भावार्थ-
किसी भी धर्म स्थान पर जब कोई व्यक्ति सत्संग का लाभ उठाता है, श्मशान में किसी के शव दाहसंस्कार होते देखता है या किसी रोगी को अपनी पीड़ा से छटपटाता हुआ देखता है तो इस भौतिक दुनियां को निरर्थक मानने लगता है परंतु जैसे ही वहां से हट जाता है वैसे ही उसकी बुद्धि फिर इसी संसार के भौतिक स्वरूप की तरफ आकर्षित होती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-व्यक्ति को अपने राज किसी अन्य से नहीं कहना चाहिये। अगर कोई व्यक्ति हमारे सामने अच्छा बर्ताव करता है पर अगर उसके मन में हमारे प्रति कपट,ईष्र्या या द्वेष का भाव है तो वह उसे जाकर सभी को बता देगा जिससे अधिक कष्ट प्राप्त होता है। उसी तरह अपने घन का दान किसी अगर अच्छे और गुणी को दिया जाये तो वह उसका सदुपयोग कर उसमें वृद्धि करेगा।
ऐसा अनेक बार जीवन में हमारे सामने अवसर आता है जब कहीं किसी सत्संग में जाते हैं या कहीं श्मशान में किसी प्रियजन और मित्र के दाह संस्कार को देखते हैं या कहीं कोई रोगी तड़तपा हुआ दिखता है तब हमें यह सारा संसार मिथ्या नजर आता है पर अगर उस स्थान से हटते हैं तो फिर सब भूल जाते है। दुनियां के इस भौतिक स्वरूप की महिमा कुछ ऐसी है कि जो इसे बाह्य आंखों से देखता है उसे प्रभावित करता है पर जो ज्ञानी हैं वह इसे जानते हैं और हमेशा ही सुख दुःख, प्रसन्नता शोक और लाभ हानि में समबुद्धिरूप से स्थित रहकर जीवन व्यतीत करते हैं।
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