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Friday, July 1, 2011

अध्ययन करने से पहले और बाद में आंखों से पानी को स्पर्श करना उपयोगी-हिन्दी चिंत्तन लेख (study, word and water-hindi chinttan lekh)

          वायु तथा जल को न केवल जीवन का आधार माना गया है कि बल्कि उनको ओषधि भी कहा जाता है। जिस तरह प्रातः प्राणायाम से शुद्ध वायु के प्रवेश से शरीर और मन के आंतरिक विकार बाहर निकलते हैं उसी तरह नहाने के दौरान जल के उपयोग से बाहरी अंगों पर शुद्धता आती है। आधुनिक विज्ञान जल की उपयोगिता को लेकर अनेक अनुंसधान कर चुका है। हालांकि हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों में भी इस विषय पर अनेक बातें कही गयी है।
          मनु स्मृति में कहा गया है कि
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            कृत्वा मूत्रं पूरीपं वा खान्याचान्त उपस्पृशेत्।
            वेदमध्येध्माणश्च अन्नमश्नंश्च सर्वदा
       "मल मूत्र करने के बाद व्यक्ति को सदैव हाथ धोकर आचमन करने के साथ ही पानी का स्पर्श आंखों पर करना चाहिए। सदैव वेद पढ़ने तथा भोजन करने से पहले भी हाथ धोकर आचमन करना चाहिए।"
                आजकल कंप्यूटर का उपयोग बढ़ता जा रहा है पर उससे होने वाली हानियों से रोकने और बचने के उपाय बहुत कम  लोग जानते हैं। कुछ स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि कंप्यूटर का उपयोग करने वालों को बीस मिनट से अधिक उस पर काम करने के बाद दो मिनट आंखें बंद रखना चाहिए। इसके अलावा कंप्यूटर से उठकर बाहर आसमान में ताकना चाहिए ताकि आंखों के उन सूक्ष्म तंतुओं का विस्तार होता है जो काम के दौरान सिकुड़ जाते है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कही गयी है कि कंप्यूटर पर काम करने वालों को अपनी आंखों में पानी की छींटें मारते रहना चाहिए। कंप्यूटर पर काम करते हुए आंखों में जल सूखने लगता है और आंखों में छींटे मारने से वहां ताजगी आती है। मनृस्मृति में भी कहा गया है कि वेद आदि का अध्ययन करने से पहले और बाद दोनों ही समय आंखों में जल का प्रवेश कराना चाहिए। यही बात हम कंप्यूटर पर काम करते समय भी लागू कर सकते हैं। ऐसे प्रयासों से बहुत सीमा तक कंप्यूटर से होने वाली हानियों से बचा जा सकता है।
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',ग्वालियर
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com
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Saturday, March 19, 2011

क्रोध और निराशा आने पर ओम शब्द का जाप करें-हिन्दी चिन्त्तन लेख (krodh aur nirasha mein om shabd ka jaap karen-hindi chinttan aalekh)

क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। क्रोध की उत्पति अहंकार से होती है जो कि अज्ञानियों में कूटकुटकर भरा होता है। जीवन से लेकर मृत्यु तक के सफर को तत्वज्ञान की दृष्टि से देखने वाले जानते हैं कि यहां कुछ भी अच्छा या बुरा नहीं है। यह संसार त्रिगुणमयी माया से संचालित है और हर जीव अपने गुणों के वशीभूत होकर व्यवहार करता है। जिन लोगों का रहन सहन गलत स्थान और वातावरण में है उनसे सद्व्यवहार करने की आशा करना ही मूर्खता है। जिनके पास अध्यात्मिक ज्ञान नहीं है वह इस संसार को अपनी शक्ति से संचालित होने का भ्रम पालकर अपने कर्म का परिणाम सम्मान और दान के रूप में चाहते हैं। ऐसा न होने पर वह क्रोध का शिकार होकर हिंसा करते हैं और फिर अंततः उसका दुष्परिणाम भी उनके सामने आता है तब वह उन पलों को कोसते हैं जब उनको क्रोध आया था। आजकल की युवा पीढ़ी व्यसनों के साथ ही जुआ और सट्टे जैसे अपराधों के साथ जुड़ रही है। फिल्म और टीवी धारावाहिकों में मेकअप से सजे कृत्रिम सौंदर्य से उनकी बृद्धि दिग्भ्रमित हो जाती है और उनके अंदर यौन अपराध की वृत्तियां पनपती हैं। सब तरफ से निराश होने पर उनके अंदर क्रोध पैदा होता है और अंततः वह हिंसक मार्ग पर चल पड़ते हैं।
इस विषय पर मनुमहाराज कहते हैं कि
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परस्यं दण्डं नोद्यच्छेत्क्रुद्धोनैनं।
अन्यत्र पुत्राच्छिष्याद्वा शिष्टयर्थ ताडयेत्तु तौ।।
"कभी क्रोध भी आये तब भी किसी अन्य मनुष्य को मारने के लिये डंडा नहीं उठाना चाहिये। मनुष्य केवल अपने पुत्र या शिष्य को ही पीटने का हक रखता है।"
ताडयित्त्वा तृपोनापि संरम्भान्मतिपूर्वकम्।
एकविंशतिमाजातोः पापयेनिषु जायसे।।
"अपनी जाग्रतावस्था में जो व्यक्ति अपने गुरु या आचार्य को तिनका भी मारता है तो वह इक्कीस बार पाप योनियों में जन्म लेता है।"
जिन लोगों ने क्रोधवश हिंसा की है और उसका परिणाम भोगा है, उनसे अगर अपने अपराध की चर्चा की जाये तो वह इस बात को मानते हैं कि उन्होंने आवेश में आकर ऐसा अपराध किया जिससे वह बच सकते थे। इसका सीधा मतलब यह है कि उनसे हुआ अपराध हालातों से नहीं बल्कि उनके स्वयं के अपने आवेश की वजह से हुआ था। अनेक जगह तो ऐसे झगड़े होते हैं जिनमें विषय इतना गौण होता है कि देखने और सुनने वाले हंसते हैं। क्रोध का शिकार होने वाले पीड़ित हों या अपराधी अपनी जान ऐसे विषय पर गंवाते हैं जिससे टाला जा सकता था। अंतः जब अपने अंदर क्रोध आये तो उस पर नियंत्रण करना चाहिए। इसका सीधा उपाय यह है कि जब हमें लगे कि निराशा और क्रोध हमारे अंदर आ रहा है तब ओम शब्द का जाप करें। अगर कोई दूसरा मंत्र जपते हैं तो उसका जाप आरंभ करें।
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लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
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Saturday, March 27, 2010

मनुस्मृति-सामान्य मनुष्य के लिये मदिरा का सेवन वर्जित (wine not for man-manu smriti)

सुरा वै मनमन्नानां पाप्मा च मलमुच्यते।
तस्माद् ब्राह्मणराजन्यौ वैश्यश्च न सुरां पिबेत्।
हिन्दी में भावार्थ-
सभी अन्नों के मल को सुरा कहा गया है मल का ही दूसरा नाम पाप है। अतः विद्वान, शक्तिशाली तथा व्यवसायियों को कभी सुरापान नहीं करना चाहिये।
यक्षरक्षः पिशाचान्नं मद्यं मांसं सुरासवम्।
तद् ब्राह्मणेन नात्तव्यं देवानामश्नता हवि।।
हिन्दी में भावार्थ-
मदिरा, मांस सुरा, आसव यक्षांे, राक्षसों व पिशाचों द्वारा सेवन किये जाने वाले पदार्थ हैं। अतः देवताओं की पूजा करने वाले इनका सेवन न करें।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कहने को तो हमारे देश में धार्मिक प्रवृत्ति वाले लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है पर दूसरा तथ्य यह भी है कि शराब, मांस और जुआ जैसी प्रवृत्तियों के पोषक भी उतनी ही संख्या में बढ़ रहे हैं। बात तो लोग संस्कारों और संस्कृति की करते हैं पर आधुनिकता के नाम राक्षसी और पैशाचिक प्रवृत्तियों के संवाहक बनते जा रहे हैं। मुंह में देवताओं का नाम और व्यवहार में पिशाचों का काम करते हुए लोग जरा भी संकोच नहीं करते।
आपने देखा होगा कि हमारे टीवी चैनल और समाचार पत्र पत्रिकायें अपने देश भारत की वैदिक विवाह परंपरा की प्रशंसा करते हुए नहीं अघाते। कहीं कोई विदेशी इस परंपरा का निर्वाह करता है तो समाचार प्रकाशित होते हैं। सच तो यह है कि हमारी कथित संस्कृति और संस्कार कुछ कर्मकांडों तक ही सिमट गये हैं। अपनी संस्कृति और संस्कारों की प्रशंसा करने वाले यह कहते हुए नहीं अघाते कि हमारे देश में ‘तैंतीस करोड़ देवता रहते हैं’। मगर इन्हीं कर्मकांडों के निर्वाह के समय शराब और मांस का सेवन आधुनिकता का प्रमाण बन गया है। विवाह हों या कोई अन्य सामूहिक कार्यक्रम उसमें शराब का सेवन करने को समाज ने मान्यता दी है यह जाने बिना कि इसका सेवन यक्ष, राक्षस तथा पिशाच करते हैं। मांस खाने की प्रवृत्ति भी बढ़ती जा रही है। हम यहां मांस या शराब का सेवन करने वालों पर कोई आक्षेप नहंी करना चाहते बल्कि समाज की सोच पर ही प्रश्न उठा रहे हैं।
विवाह एक धार्मिक संस्कार है जिसका पालन करते हुए लोग फूले नहीं समाते। अभी हाल ही में बिना विवाह ही युवक युवतियों के साथ रहने को कानूनी मान्यता मिलने पर अनेक संस्कार और संस्कृति के ठेकेदारों ने बहुत शोर मचाया था पर इसी पवित्र विवाह संस्कार के समय शराब के सेवन पर सभी चुप क्यों हो जाते है? इसके विरुद्ध कोई प्रचार क्यों नहीं करते? यह सोच का विषय है। इतना ही नहीं हमारे देश में कुछ जगह तो मंदिरों में शराब भी प्रसाद के रूप मेंचढ़ाने की परंपरा प्रचलन में आई है। ताज्जुब इस बात का है कि इस पर किसी भी धार्मिक प्रवृत्ति को आपत्ति करते हुए नहीं देखा। देश में शराब को जिस तरह एक सामान्य आदत के रूप में मान्यता मिली है वह चिंता की बात है और समाज को इस बात पर विचार करना चाहिये कि यह सामान्य मनुष्य द्वारा उपभोग में लाया जाने वाला पदार्थ नहीं है।


संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Sunday, November 29, 2009

मनुस्मृति-धैर्य न रखने से जीवन पतित हो जाता है (dhiraj aur jivan-manu smriti)

कुमिकीटवधोहत्या मद्यानुगतभोजनम्।
फलेन्धनकुसुमस्तयमधैर्य च मलावहम्।।
हिंदी में भावार्थ-
कोई भी मनुष्य कीड़े मकोड़ों तथा पक्षियों की हत्या कर , मदिरा के साथ मांस का भक्षण कर, ईंधन व फूलों को चुराकर तथा जीवन में धैर्य न रखकर पतित हो जाता है।
ब्राह्म्णस्य रुजकृत्वा घ्रातिरघ्रेयमद्ययोः।
जैह्मयं च मैथुनं पुंसिजातिभ्रंशकरं स्मृतम।।
हिंदी में भावार्थ-
डंडे से पीटकर किसी पीड़ा देना, मदिरादि दुर्गंधित पदार्थों को सूंघना, कुटिलता करना तथा पुरुष से मैथुन करना जैसे पाप मनुष्य जाति के लिये भयंकर हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनु स्मृति का अध्ययन करने से ऐसा लगता है कि उनके युग में जिन कृत्यों और चीजों को पाप कहा जाता था वह अब आधुनिक सभ्यता का प्रतीक बन गये हैं। मदिरा के साथ मांस के सेवन की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। इतना ही नहीं समलैंगिकता के नाम पर आज की नयी पीढ़ी को इस तरह गुमराह किया जा रहा है जैसे कि यह कोई नया फैशन हो। देहाभिमान मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है और यही उसे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति की वजह से दिमागी रूप से बंधक बना देती है। स्वतंत्रता के नाम पर वह एक उपभोक्ता बनकर रह जाता है। मगर उसका सबसे बड़ा भयंकर रूप आजकल समलैंगिकता के लिये आजादी के अभियान के रूप में दिख रहा है जैसे कि यह कोई एसा काम हो जो महान आनंद देने वाला है। सभी जानते हैं कि दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति की एक सीमा है। एक समय के बाद भौतिकता से आदमी का मन ऊबने लगता है और ऐसे में उसे अध्यात्मिक शांति की आवश्यकता होती है पर उसे कोई समझ नहीं पाता। यही कारण है कि समाज में लोगों का मानसिक संताप बढ़ रहा है और उसके कारण अनेक प्रकार की नयी बीमारियां जन्म ले रही हैं।
हमारे यहां शादी को एक संस्कार कहा जाता है। इसमें दिये जाने वाले भोजों के अवसर पर मदिरा और मांस का सेवन करने की किसी परंपरा की चर्चा हमारे इतिहास में नहीं है पर आज उसे एक फैशन मानकर अपनाया जा रहा है। जहां हमारी संस्कृति की बात आती है तो हम अपने परिवारिक परंपराओं और संस्कारों का उदाहरण देते हैं पर यह केवल उपरी आवरण है जो दुनियां को दिखा रहे हैं पर सच यह है कि आधुनिकता के नाम पर कालिख उन पर हमने स्वयं ही पोती है।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Thursday, November 5, 2009

मनु स्मृति-लालची और बुद्धिहीन स्वामी सजा नहीं दे पाता

सोऽसहायेन मूढेन लुब्धेनाकृतबुद्धिना।
न शक्तो न्यायतो नेतुं सक्तेन विषयेनणु च।।
हिंदी में भावार्थ-
जिस राजा के सहायक न हों या फिर मूर्ख, लालची, बुद्धिहीन हों एवं स्वयं भी जो विषय और कामनाओं में लीन रहता हो ऐसे राजा को दंड का उपयोग उचित ढंग से प्रयोग करना नहीं आता।
स्वराष्ट्रे न्यायवृत् स्याद् भृशदण्डश्च शत्रुषु।
सहृत् स्वजिह्मः स्निगधेषु ब्राह्मणेषु क्षमान्वितः।।
हिंदी में भावार्थ-
राजा को चाहिए कि वह प्रजा के शत्रुओं को उग्र दंड दे। से प्रजा के मित्रों से सौहार्दपूर्ण तथा राज्य के विद्वानों से उदारता के साथ ही क्षमा का व्यवहार करे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-किसी राज्य का राजा हो या समाज तथा परिवार का मुखिया उसे अपने संरक्षितों के शत्रुओं से किसी प्रकार की उदारता न बरतते हुए उनको कड़ा दंड दे या कार्रवाई करे। जहां मुखिया या स्वामी का कोई सहायक न हो और वही शराब जैसे व्यसनों में डूबा रहे उसके समूह का सर्वनाश हो जाता है। विषय और कामनाओं का चिंतन करने वाले मनुष्य की बौद्धिक क्षमता समाप्त हो जाती है। ऐसे में उसके आसपास कामी, क्रोधी, लोभी तथा अहंकारी लोगों का मित्र समूह एकत्रित होकर उसे उल्टी सीधी सलाहें देता है जिससे स्वामी के साथ उसके कुल, राज्य और समाज का भी नाश होता है।
इसलिये जिन लोगों को परमात्मा की कृपा से कहीं स्वामित्व का अधिकार प्राप्त होता है वह अपने सरंक्षित तथा शरणागत जीवों के शत्रुओं के विरुद्ध कठोर दंड का उपयोग करें तथा जो मित्र हों उनके साथ सौहार्द का व्यवहार करते हुए अपने समूह का हित सोचें। इसके साथ ही ऐसे विद्वानों का हमेशा सम्मान करें तो संकट पड़ने पर अपने बौद्धिक कौशल से उसे तथा उसके समूह को उबार सकें। समाज के शीर्षस्थ वर्ग का यह दायित्व है कि वह छोटे वर्ग की रक्षा करे।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://rajlekh.blogspot.com

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Saturday, October 31, 2009

मनु स्मृतिः धर्मोपदेशक का नाटक करना एक तरह से ठगी है (manu smruti)

धर्मघ्वजी सदा लुब्धश्छाùि लोकदम्भका।
बैडालवृत्तिका ज्ञेयो हिंस्त्रः सर्वाभिसंधकः।।

लोगों में अपना प्रभाव जमाने के लिये स्वयं आचरण न करते हुए केवल धर्म की ध्वजा पताका फहराने का नाटक करना, दूसरे का धन को छीनने की इच्छा करना, हिंसक स्वभाव होना तथा दूसरों भड़काकर झगड़ा कराना बैडाल वृत्ति का परिचायक है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय- पूरी दुनियां में अनेक धर्मों के ध्वजवाहक दिखने को मिल जायेंगे पर उनके धर्मों के आड़ में ही हिंसा की प्रवृत्ति बढ़ रही है। इससे प्रमाणित होता है कि पूरी दुनियां में बैडाल प्रवृत्ति के कथित ज्ञानियों की संख्या बढ़ रही है। मनु स्मृति के अनुसार धर्म के नाम पर ठगी करना भी बैडाल या ठगी की प्रवृत्ति है।
यत्र तत्र सर्वत्र पूरी दुनियां में कथित ज्ञानी विद्वान अपने श्रीमुख से सामान्य लोगों को धर्मोपदेश देते घूम रहे हैं। कहते हैं कि ‘हिंसा मत करो’, परोपकार करो, सादगी से रहो, और ‘सबसे प्रेम करो’। एक तरह से उन लोगों ने नारों को ही उपदेश बना लिया है। अपने नारों को मजबूत करने के लिये वह कुछ मनोरंजक कहानियां सुनाने लगते हैं। कुछ धर्मोपदेश अपने धर्मग्रंथों में वर्णित चमत्कारी घटनाओं का प्रचार कर लोगों को कर्मविमुख करते हैं। उनका बस यही कहना होता है कि ‘बस हाथ उठाकर आसमान में स्थित भगवान से अपने लिये सुख मांगते रहो।’
यह धर्मोदेशक इस तरह अपने लिये भोगविलास की सामग्रियां जुटाते हैं। उनकी वृति केवल भक्त के धन को अपनी जेब में खीचने की होती है। इतना ही नहीं समय पड़ जाये तो यह अपने समुदाय के हिंसक लोगों को प्रश्रय देते हैं। उससे भी बात न बने तो आम लोगों को हिंसा के लिये प्रेरित करते हैं। ऐसे लोगों को पहचान करते हुए उनकी उपेक्षा करना चाहिये।
वैसे हम कहते हैं कि जमाना अब खराब हुआ है पर मनुमहाराज का यह संदेश देखें तो धर्म की ध्वजपताका फहराने वाले ढोंगी उस समय भी थे इसलिये ही तो उन्होंने उनकी चर्चा की ताकि लोग उनसे दूर रहें।
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Tuesday, September 8, 2009

मनुस्मृति-दीमक की तरह धीरे धीरे लक्ष्य की तरफ बढ़ें (manu smriti-slogly ahead in the life)

धर्म शनै संचनुयाद्वल्मीकमिव पुत्तिकाः।
परलोक सहायार्थ सर्वभुतान्यपीडयन्ः।।
हिंदी में भावार्थ-
जिस तरह दीमक अपने निवास के निर्माण के लिये धीरे धीरे बंाबी बनाती है उसी तरह परलोक में अपना जीवन सुधार हेतु किसी अन्य जीव को कष्ट पहुंचाये बिना पुण्य कर्मों का संग्रह करना चाहिये।
दृढ़कारी भृदुदन्तिः क्रूराचारैरसंवसन्।
अहिंस्त्रों दमदानाभ्यां ज्येत्स्वर्ग तथावतः।।
हिंदी में भावार्थ-
दृढ़ निश्चय, स्वभाव से दयालु तथा आत्मसंयम रखने व्यक्ति ही स्वर्ग का अधिकारी बनता है अर्थात इस लोक में उसकी कीर्ति मरने के बाद भी बनी रहती है और वह स्वर्ग का अधिकारी भी बनता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अपने जीवन में सफलता बहुत जल्दी पाने की उतावली सभी को होती है। आज के कंप्यूटर युग में हर कोई आगे बढ़ने के लिए संक्षिप्त मार्ग अपनाना चाहता है। चाहे जीवन में कामयाबी हो या स्वर्ग पाने का मोह हर आदमी यही सोचता है कि वह ऐसा काम करे जिससे आसानी से उसको लक्ष्य प्राप्त हो जाये।
दीमक अपने रहने के लिये बहुत धीरे धीरे घर बनाती है। उसी तरह सामान्य मनुष्य को जीवन में सफलता पाने के लिये संघर्ष करना पड़ता है। हमारे यहां खरगोश और कछुए की कहानी भी सुनाई जाती है। उसने यह जानते हुए भी खरगोश की चुनौती स्वीकार की कि वह तेज दौड़ता है। उसका विचार सही निकला खरगोश को अति आत्मविश्वास ले डूबा। जिसे पैतृक रूप से पैसा, पद और प्रतिष्ठा विरासत में नहीं मिली उसे तो इस बात का विचार भी नहीं करना चाहिये कि सभी कुछ जल्दी मिल जाये। एक आम व्यक्ति के रूप में हमेशा धीरे धीरे ही अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ते हुए जाने की सोचना ही अच्छा है। अगर सफलता के लिये उतावलापन दिखायेंगे तो नाकामी मिलेगी या फिर दूसरों के दबाव में गलत मार्ग का अनुसरण करना पड़ेगा।
यह धैर्य केवल जीवन में सफलता के लिये ही नहीं वरन् परलोक में अपना स्तर सुधारने के लिये भी आवश्यक है। याद रखिये दृढ़ निश्चय, अहिंसा और दया ही वह मार्ग है जिससे न केवल जीवन में सफलता मिलती है बल्कि उससे देह विसर्जन के बाद भी कीर्ति बनी रहती है। जिसने यहां लोगों के हृदय जीत लिये समझो स्वर्ग जीत लिया।
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Wednesday, July 1, 2009

मनु स्मृति-खीर, रबड़ी और मालपुआ स्वास्थ्य के लिए हानिकारक

आरण्यानां च सर्वेषां मृगानणां माहिषां बिना।
स्त्रीक्षीरं चैव वन्र्यानि सर्वशक्तुनि चैव हि।।
हिंदी में भावार्थ-
भैंस के अतिरिक्त सभी वनैले पशुओं तथा स्त्री का दूध पीने योग्य नहीं होता। सभी सड़े गले या बहुत खट्टे पदार्थ खाने योग्य नहीं होते। इस सभी के सेवन से बचना चाहिये।

वृथाकृसरसंयावं पायसायूपमेव च।
अनुपाकृतमासानि देवान्नानि हर्वषि च।।
हिंदी में भावार्थ
-तिल, चावल की दूध में बनी खीर,दूध की रबड़ी,मालपुआ आदि स्वास्थ्य के हानिकाकाकर हैं अतः उनके सेवन से बचना चाहिये।
दधिभक्ष्यं च शुक्तेषु सर्वे च दधिसम्भवम्।
यानि चैवाभियूशयन्ते पुष्पमूलफलैः शुभैः।।
हिंदी में भावार्थ-
शुक्तों में दही तथा उससे बनने वाले पदार्थ-मट्ठा तथा छाछ आदि-तथा शुभ नशा न करने वाले फूल, जड़ तथा फल से निर्मित पदार्थ-अचार,चटनी तथा मुरब्बा आदि-भक्षण करने योग्य है।
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Sunday, June 28, 2009

मनुस्मृति-बिना प्रयोजन कौतुहल नहीं करें

न नृत्येन्नैव गायेन वादित्राणि वादयेत्।
नास्फीट च क्ष्वेडेन्न च रक्तो विरोधयेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुमहाराज कहते हैं कि नाचना गाना, वाद्य यंत्र बजाना ताल ठोंकना, दांत पीसकर बोलना ठीक नहीं और भावावेश में आकर गधे जैसा शब्द नहीं बोलना चाहिये।

न कुर्वीत वृथा चेष्टां न वार्य´्जलिना पिबेत्।
नौत्संगे भक्षयेद् भक्ष्यानां जातु स्यात्कुतूहली।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुमहाराज कहते हैं कि जिस कार्य को करने से अच्छा फल नहीं मिलता हो उसे करने का प्रयास व्यर्थ है। अंजली में भरकर पानी और गोद में रखकर भोजन करना ठीक नहीं नहीं है। बिना प्रयोजन का कौतूहल नहीं करना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जब आदमी तनाव रहित होता है तब वह कई ऐसे काम करता है जो उसकी देह और मन के लिये हितकर नहीं होते। लोग अपने उठने-बैठने, खाने-पीने, सोने-चलने और बोलने-हंसने पर ध्यान नहीं देते जबकि मनुमहाराज हमेशा सतर्क रहने का संदेश देते हैं। अक्सर लोग अपनी अंजली से पानी पीते हैं और बातचीत करते हुए खाना गोद में रख लेते हैं-यह गलत है।
जब से फिल्मों का अविष्कार हुआ है लोगों का न केवल काल्पनिक कुतूहल की तरफ रुझान बढ़ा है बल्कि वह उन पर चर्चा ऐसे करते हैं जैसे कि कोई सत्य घटना हो। फिल्मों की वजह से संगीत के नाम पर शोर के प्रति लोग आकर्षित होते हैं।
मनुमहाराज इनसे बचने का जो संदेश देते है उनके अनुसार नाचना, गाना, वाद्य यंत्र बजाना तथा गधे की आवाज जैसे शब्द बोलना अच्छा नहीं है। फिल्में देखना बुरा नहीं है पर उनकी कहानियों, अभिनेताओं, अभिनेत्रियों को देखकर कौतूहल का भाव पालन व्यर्थ है इससे आदमी का दिमाग जीवन की सच्चाईयों को सहने योग्य नहीं रह जाता।

नाचने गाने और वाद्य यंत्र बजाना या बजाते हुए सुनना अच्छा लगता है पर जब उनसे पृथक होते हैं तो उनका अभाव तनाव पैदा करता है। इसके अलावा अगर इस तरह का मनोरंजन जब व्यसन बन जाता है तब जीवन में अन्य आवश्यक कार्यों की तरफ आदमी का ध्यान नहीं जाता। लोग बातचीत में अक्सर अपना प्रभाव जमाने के लिये किसी अन्य का मजाक उड़ाते हुए बुरे स्वर में उसकी नकल करते हैं जो कि स्वयं उनकी छबि के लिये ठीक नहीं होता। कहने का तात्पर्य यह है कि उठने-बैठने और चलने फिरने के मामले में हमेशा स्वयं पर नियंत्रण करना चाहिए।
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Friday, May 8, 2009

मनुस्मृति: दूसरों के स्नानगृहों में नहाना नहीं चाहिए

परकीयनियानुषु न स्नायाद्धि कदाचन।
नियानकत्र्तुः स्नात्वा तु दुष्कृतांशेन लिप्यते।।
हिंदी में भावार्थ-
अन्य व्यक्तियों द्वारा बनवाये गये स्नान के लिये बनाये गये स्थानों-स्नानगृहों,सरोवरों और कुऐं आदि-पर नहाना नहीं चाहिए। वह स्नानगृह अगर पापों के धन से बनाये गये हैं तो उसमें नहाने वाला भी उसका भागी बनता है।
यानाश्य्यासनान्यस्य, कूपोद्यान ग्रह्यणि च।
अदत्तान्युपयु´्जानः एनसः स्वात्तुरीभाक्।।
हिंदी में भावार्थ-
वाहन, शैय्या, आसन, कुआं, उद्यान और भवन आदि का उपभोग कुछ दान कर ही करना लाभदायक होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आजकल की व्यस्त एवं दीर्घसूत्रीय जिंदगी में यह देखना कठिन काम है कि हम कहीं बाहर जाकर रुक रहे हैं तो वहां का स्थान किस प्रकार के धन से बनाया गया है। वैसे भी आजकल बिना काले धन के यह कैसे संभव है कि समाज का भौतिक विकास इतनी तीव्र गति से हो। ऐसे में भ्रष्ट और अनैतिक रूप से कमाये गये धन से बने आवास और स्नानगृहों में रहने और नहाने का प्रतिबंध स्वीकार करना संभव नहीं लगता। बड़े बड़े शहरों में बड़े और आलीशान होटल बन गये हैं जिनमें स्वीमिंग पूल भी होते हैं। अब यह कैसे कहा जा सकता है कि वह भ्रष्ट या अनैतिक धन से बने हैं या सात्विक धन से। वैसे तो आजकल धर्नाजन के कई ऐसे óात पवित्र माने जाते हैं जिनको पहले अपवित्र माना जाता था। अतः इस बारे में अपने विवेक से विचार करना चाहिये।

मगर सच तो यह है कि जिस प्रकार हम अपने जीवन में जिस प्रकार के व्यक्ति या वस्तु के संपर्क में आते हैं उसके पाप पुण्य का प्रभाव हम पर होता है। कहा जाता है कि ‘जैसे खायें अन्न वैसा हो मन’। इसका आशय यह तो है ही कि जिस प्रकार की वस्तु का हम उपभोग करेंगे वैसे ही प्रभाव हमारी देह के साथ ही हमारे मन और विचारों पर होगा। साथ ही यह भी कि उसके आने का सात्विक मार्ग है या असात्विक इस बात का प्रभाव भी उसके उपभोग करने वाले पर होता है। तात्पर्य यह है कि अगर हमें लगता है कि कोई व्यक्ति या वस्तु-जिसके बारे में यह यकीन हो कि वह असात्विक प्रकृत्ति की है तो उससे अपने आपको दूर रखना चाहिये। यह ठीक है कि आजकल की भागम भाग जिंदगी में यह कहना कठिन है कि किसका धन एक नंबर का है या दो नंबर का पर थोड़ा विवेक का इस्तेमाल करें तो सभी समझ में आ जाता है। दूसरा सच यह भी कि हम किसी बड़े शहर में जाकर अपने लिये सस्ता और अच्छा स्थान रहने के लिये ढूंढते हैं पर तब यह देखने का न तो समय होता है न जरूरत कि वह किस प्रकार के धन से बना है। हालांकि अनजान रहने पर किसी वस्तु का उपभोग करने पर उसके पाप का भागी नहीं बनते यह भी हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है।
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Monday, May 4, 2009

मनु स्मृतिः ज्ञान होने पर युवक का भी सम्मान होता है

न हायनैर्न पालितैर्न वित्तेन न बंधुभिः ।
ऋषयश्चक्रिरे धर्मयोऽनुचारः स नो महान्।।
हिंदी में भावार्थ-
आयु,सफेद बाल, धन तथा अच्छे कुल होने से ज्ञान और आचरण का अधिक महत्व है। धर्म के अनुसार चलने वाले को ही समाज में सम्मान प्राप्त होता है।
न तेन वृद्धो भवति वेनास्य पलितं शिरः।
यो वै युवाऽप्यधीयानस्तं देवाःस्थविरं विदुः।।
हिंदी में भावार्थ-
व्यक्ति के बाल सफेद होने से वह सम्मानीय नहीं हो जाता जबकि ज्ञान प्राप्त कर लेने के बाद युवा व्यक्ति भी समाज के सभी वर्गो में सम्मान पाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भौतिक पदार्थों और कथित रूप से समाज की परंपराओं का ज्ञान रखने वाले लोग केवल इस आधार पर सम्मान पाना चाहते हैं कि उनके बारे में वह सबसे अधिक जानते हैं। अनेक लोग आयु में बड़े, अधिक धन और अच्छे कुछ का होने के कारण सम्मान पाने का मोह पाल लेते हैं। दिखाने के लिये लोग उनका सम्मान करते भी हैं पर अध्यात्मिक ज्ञान और उसके अनुरूप आचरण न होने के कारण हृदय से उनका सम्मान कोई नहीं करता।
तात्पर्य यह है कि अगर समाज में लोगों के हृदय में अपने सम्मान का भाव स्थापित करना है तो अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के साथ उसके अनुरूप आचरण करना आवश्यक है। वैसे तो परिवार में बड़ा, समाज में धनी और अनपढ़ों में शिक्षित होने से अनेक लोगों को लोग दिखावे के लिये मान देते हैं। सामने कोई नहीं कहता कि ‘आप में न तो अध्यात्मिक ज्ञान है न आचरण’, पर मन में सभी की सोच यही होती है। जो ज्ञान रटकर दूसरों को प्रभावित करते हैं वह भी फूलते हैं पर उनका आचरण उसके अनुरूप नहीं होता और लोग पीठ पीछे उनकी निंदा करते हैं या मजाक उड़ाते हैं। सम्मान तो वह है कि पीठ पीछे भी समाज के सभी वर्ग के लोग प्रशंसा करें। यह तभी संभव है जब अपने प्राचीन अध्यात्मिक ज्ञान होने के साथ उसके अनुरूप आचरण भी हो।
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Friday, April 24, 2009

मनुस्मृतिः इंद्रियों पर नियंत्रण करना आसान काम नहीं

न तथैंतानि शक्यन्ते सन्नियंतुमसेवया।
विषयेषु प्रजुष्टानि यथा ज्ञानेन नित्यशः

हिन्दी में भावार्थ-जब तक इंद्रियों और विषयों के बारे में जानकारी नहीं है तब तब उन पर निंयत्रण नहीं किया जा सका। इंद्रियों पर नियंत्रण करना कोई आसान काम नहीं है। इसके लिये यह आवश्यक है कि विषयों की हानियों और दोषों पर विचार किया जाये
वशे कृत्वेन्दिियग्रामं संयम्य च मनस्तथा।
सर्वान्संसाधयेर्थानिक्षण्वन् योगतस्तनुम्।।

हिंदी में भावार्थ-मनुष्य के लिये यही श्रेयस्कर है कि वह अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखे जिससे धर्म,अर्थ,काम तथा मोक्ष चारों प्रकार का लक्ष्य प्राप्त किया जा सके।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इंद्रियों पर नियंत्रण और विषयों से परे रहने का संदेश देना आसान है पर स्वयं उस पर नियंत्रण करना कोई आसान काम नहीं है। आप चाहें तो पूरे देश में ऐसे धार्मिक मठाधीशों को देख सकते हैं जो श्रीगीता का ज्ञान देते हुए निष्काम भाव से कर्म करने का संदेश देते हैं पर वही अपने प्रवचन कार्यक्रमों के लिये धार्मिक लोगों से सौदेबाजी करते हैं। लोगों को सादगी का उपदेश देने वाले ऐसे धर्म विशेषज्ञ अपने फाइव स्टार आश्रमों से बाहर निकलते हैं तो वहां भी ऐसी ही सुविधायें मांगते हैं। देह को नष्ट और आत्मा को अमर बताने वाले ऐसे लोग स्वयं ही नहीं जानते कि इंद्रियों पर नियंत्रण करते हुए विषयों से परे कैसे रहा जाता है। उनके लिये धार्मिक संदेश नारों की तरह होते हैं जिसे वह लगाये जाते हैं।
दरअसल ऐसे लोगों से शास्त्रों से अपने स्वार्थ के अनुसार संदेश रट लिये हैं पर वह इंद्रियों और विषयों के मूलतत्वों को नहीं जानते। इंद्रियों पर नियंत्रण तभी किया जा सकता है जब विषयों से परे रहा जाये। यह तभी संभव है जब उसके दोषों को समझा जाये। वरना तो दूसरा कहता जाये और हम सुनते जायें। ढाक के तीन पात। सत्संग सुनने के बाद घूम फिरकर इस साँसससिक दुनियां में आकर फिर अज्ञानी होकर जीवन व्यतीत करें तो उससे क्या लाभ?
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Wednesday, April 22, 2009

मनुस्मृतिः गुरु शिष्य के बीच से बिल्ली निकल जाये तो विद्याध्ययन नहीं करना चाहिये

द्वावेव वर्णयेन्नित्यमनध्यायो प्रयत्नतः।
स्वाध्यायभूमिंचाशुद्धामात्मानं चाशुचिंतद्विजः।।
हिंदी में भावार्थ-
जो स्थान पवित्र और शुद्ध नहीं है वहां अध्ययन नहीं करना चाहिये। उसी तरह स्वयं शुद्ध हुए बिना भी व्यक्ति को अध्ययन नहंी करना चाहिये। शुद्ध और पवित्र स्थान पर स्वयं शुद्ध भाव से संपन्न व्यक्ति ही विद्या सही तरह से प्राप्त कर सकता है।
पशुमण्डुकमर्जारश्वसर्पनकुलाखुभिः।
अंतरागमने विद्यादनाध्यायमहर्निशमम्।।
हिंदी में भावार्थ-
चूहा, बिल्ली,श्वान,गाय,मेढक,नेवला और सांप अगर गुरु और शिष्य के बीच उस समय निकल जायें जब विद्याध्ययन चल रहा हो तो उसे उस दिन बंद कर देना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे देश में विद्यालयों की जो दशा है उसे सभी जानते है। देश में बहुत कम विद्यालय ऐसे होंगे जो अपने यहां साफ सफाई का का ध्यान रखते होंगे। सरकारी क्षेत्र के हों या निजी क्षेत्र के विद्यालय उनके साफ सफाई का ख्याल बहुत ही कम रखा जाता है। आज की वर्तमान पीढ़ी पर उसकी शिक्षा को लेकर तमाम तरह के कटाक्ष किये जाते हैं पर इस बात पर कितने लोग ध्यान दे रहे हैं कि उनको शिक्षा दिये जाने वाले स्थान कितने साफ सुथरे हैं। गांवों मेें चले जाईये तो विद्यालयों के नाम बड़े आकर्षक होते हैं पर उनके जर्जर भवनों की हालत और वहां व्याप्त गंदगी को देखें तो अपनी व्यवस्था को कोसना पड़ता है पर उसकी जिम्मेदारी लेने वाले लोग भी हमारे बीच में से ही होते है। वह नन्हें नन्हें मासूम बालक बालिकायें शिक्षा प्राप्त करते हैं पर पास ही व्याप्त गंदगी का उन पर क्या मानसिक दुष्प्रभाव पड़ता है इस पर कोई विचार नहीं करता।
निजी क्षेत्र के विद्यालय भी कम अव्यवस्था वाले नहीं है। उनके विद्यालयों के नाम भले ही आकर्षक हों पर उनका लक्ष्य केवल पैसा कमाना होता है। यह मानसिक अपवित्रता किस तरह बालक बालिकाओं को शिक्षित कर पायेगी यह भी विचार का विषय है? वह किताबों का अध्ययन कर अक्षरज्ञान तो प्राप्त कर लेते हैं पर नैतिक ज्ञान-जो कि पढ़ाने से अधिक शिक्षकों तथा प्रबंधकों के आचरण से आता है-उनमें नहीं स्थापित हो पाता। यही बालक-बालिकायें जब समाज और राष्ट्र के उच्च पद पर पहुंचते हैं तो फिर उनका लक्ष्य भी केवल धनार्जन करना ही रह जाता है।
अगर देश के विद्यालयों और महाविद्यालयों में ही पवित्रता और साफ सफाई की व्यवस्था रखी जाये तो शायद अपने देश को उस नैतिक संकट से मुक्त किया जा सकता है जिसके लिये विश्व भर में बदनामी हो रही है। देशभक्ति और समाज सेवा के गीत सुनाने से व्यक्ति कर्तव्यनिष्ठ नहीं हो जाता बल्कि बचपन से उसे अपने आचरण और व्यवहार से सिखाना पड़ता है। यह नैतिक दायित्व माता पिता के साथ ही गुरुजन और शिक्षा प्रबंधकों का है जिसे पूरा करना आवश्यक है।
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Monday, February 16, 2009

मनुस्मृतिः क्रोध से आठ विकार उत्पन्न होते हैं

पैशुन्यं साहसं मोहं ईष्र्याऽसूयार्थ दूषणाम्
वाग्दण्डजं च पारुघ्यं क्रोधजोऽपिगणोष्टकः

हिंदी में भावार्थ- क्रोध से आठ प्रकार के दोष उत्पन्न होते हैं-चुगली या निंदा करना, दुस्साहस, नकारात्मक विचार,ईष्र्या,दूसरों में दोष देखना,पराये धन के अपहरण की प्रवृत्ति,अभद्र शब्द बोलना और दुव्र्यवहार करना।
द्वयोरप्येत्योर्मूलं यं सर्वे कवयो विदुः
तं त्यनेन ज्येल्लोभं त्ज्जावेतातुभौ गणौ
हिंदी में भावार्थ- काम तथा क्रोध से ही सारे व्यवसन होते हैं। इनमी जननी लालच है अतः सभी लोगों को अपने मन पर आने वाली लालच की भावना पर नियंत्रण करना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सच बात यह है कि इस विश्व में जितने भी प्रकार के अपराध हैं वह काम और क्रोध से उत्पन्न होते हैं। उनकी जननी लालच है। मनुष्य अपने जीवन में जितना कमाता है उतना व्यय नहीं करता पर धन और संपत्ति संग्रह की लालच उसे कही भी रुकने नहीं देती। अगर यह लालच का भाव मनुष्य में नहीं होता तो शायद कोई अपराध इस संसार में नहीं होता। लोग कहते हैं कि भुखमरी से अपराध बढ़ते हैं पर सामाजिक और अपराध विशेषज्ञ इसे नहीं मानते क्योंकि जो अपराधी पकड़े जाते हैं उनमें से कोई ही शायद भूख की वजह से अपराध करता हो। हम देश में फैले सार्वजनिक, सामाजिक और निजी क्षेत्रों में व्याप्त भ्रष्टाचार को देखें तो उस अपराध में कोई छोटा आदमी नहीं होता। लोगों के अच्छे खासे वेतन मिलते हैं पर वह फिर भी अपने से कमजोर आदमी से पैसा मांगते या उनको ठगते हुए शर्म नहीं अनुभव करते। जिन लोगों पर दया करना चाहिये उनका ही जेब काटने में उनकी रुचि होती हैं। कल्याण कामों के लिये दान या भाग में रूप में दिया उपलब्ध धन या सामान का अपहरण करने वाले भ्रष्टाचारी लोग केवल उससे अपने घर भरते हैं। समाजसेवा एक तरह से व्यापार हो गया है। दान लेने वाले कुपात्र हैं तो देने वाले भ्र्रष्ट।

हम अपने धर्म,संस्कृति और संस्कारों की दुहाई देते नहीं थकते पर लालच की प्रवृत्ति ने आदमी को लालची बना दिया है। इससे वह कामी और क्रोधी हो गया है। सामाजिक और निजी भ्रष्टाचार में आदमी अगर स्वयं लिप्त हो तो उसे नजर नहीं आता और दूसरा हो तो वह उस पर क्रोध करता है।
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Saturday, January 24, 2009

मनुस्मृति:राज्य दंड सचेत हो तभी जनता सुखी रहती है

  1. देश, काल, विद्या एवं अन्यास में लिप्त अपराधियों की शक्ति को देखते हुए राज्य को उन्हें उचित दण्ड देना चाहिए।
  2. सच तो यह है कि राज्य का दण्ड ही राष्ट्र में अनुशासन बनाए रखने में सहायक तथा सभी वर्गों के धर्म-पालन कि सुविधाओं की व्यवस्था करने वाला मध्यस्थ होता है।
  3. सारी प्रजा के रक्षा और उस पर शासन दण्ड ही करता है, सबके निद्रा में चले जाने पर दण्ड ही जाग्रत रहता है।
  4. भली-भांति विचार कर दिए गए दण्ड के उपयोग से प्रजा प्रसन्न होती है। इसके विपरीत बिना विचार कर दिए गए अनुचित दण्ड से राज्य की प्रतिष्ठा तथा यश का नाश हो जाता है।
  5. यदि अपराधियों को सजा देने में राज्य सदैव सावधानी से काम नहीं लेता, तो शक्तिशाली व्यक्ति कमजोर लोंगों को उसी प्रकार नष्ट कर देते हैं, जैसे बड़ी मछ्ली छोटी मछ्ली को खा जाती है।
  6. संसार के सभी स्थावर-जंगम जीव राजा के दण्ड के भय से अपने-अपने कर्तव्य का पालने करते और अपने-अपने भोग को भोगने में समर्थ होते हैं ।

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Thursday, December 25, 2008

मनुस्मृतिः अगहन, फाल्गुन और चैत्र मास युद्ध और निजी अभियान के लिये उपयुक्त

1.जो चतुर राज्य प्रमुख किसी कार्य या उद्देश्य के अच्छे और बुरे परिणामों का अनुमान कर उचित मार्ग का अनुसरण करते हुए अपने दोषों को त्याग देने के साथ अपनी पिछली असफलताओं से सबक लेता है
वह कभी शत्रु से पराजित नहीं होता।

2.जो राज्य प्रमुख विरोधी राष्ट्र पर आक्रमण करने की कामना करता है उसे अपने शत्रु राज्य के नगरों में प्रवेश कर उनके विधान के अनुसार धीरज के साथ धीरे-धीरे आगे बढ़ना चाहिये।

3. अगहन (नवंबर-दिसंबर), फाल्गुन (फरवरी-मार्च), चैत्र (मार्च अप्रैल) में से जिस माह अपनी सेना के युद्ध करने की शक्ति बढ़ी हो राज्य प्रमुख को मुहूर्त निकाल कर युद्ध कर अपने शत्रु राजा के विरुद्ध युद्ध का अभियान प्रारंभ करना चाहिये। अगर शत्रु राज्य द्वारा अनावश्यक छेड़खानी की जा रही हो या स्वयं का हृदय ही युद्ध के लिये तैयार हो तो फिर राज्य प्रमुख को ऐसे ही लड़ाई शुरु कर देना चहिये।
4.वही राज्य प्रमुख कुशल माना जाता है जिससे मित्र, विरोधी तथा उदासीन राज्य (दिखाने के लिये उपेक्षा करने वाला) उसे दबा न सके।

5.राज्य प्रमुख को अपने ऐसे सहयोगी से सावधान रहना चाहिये जो गुप्त रूप से अपने विरोधी का हित साधना में लगा रहता है। ऐसे सेवक या अधिकारी से भी सतर्क रहना चाहिये जिसे एक बार राज्य प्रमुख अपनी सेवा से प्ृथक कर चुकने के बाद फिर उसे वापस लाया हो क्योंकि वह गुप्त रूप से विरोधी होकर अनेक प्रकार के संकट खड़ कर सकता है।

6.राज्य प्रमुख को अपने चारों और सेनापतियों और सेनानायकों को तैनात रखे। उसे जिस दिशा में सबसे अधिक भय लगे उसे पूर्व दिशा माने।

संपादकीय आशय- यहां वर्तमान संदर्भ में राजा की जगह राज्य प्रमुख लिया गया है। इसके अलावा यह नियम या विचार केवल युद्ध के लिये ही लागू नहीं होते बल्कि सामान्य आदमी को अपने व्यक्गित अभियान, धार्मिक यात्रायें तथा अन्य विशेष प्रकार के कार्यों के समय भी इनका ध्यान रखना चाहिये। यही कारण है कि हमारे देश में नवंबर,फरवरी, मार्च और अप्रैल में धार्मिक तथा अन्य सामाजिक गतिविधियां बढ़ जाती है।
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Thursday, October 2, 2008

मनुस्मृति: इच्छाएं तो अग्नि की तरह बढ़ती हैं

न जातु कामा कामानामुपभोगेन शाम्यति
हविपा कृष्णावत्र्मेव भूव एवाभिवर्धते

जिस प्रकार अग्नि में घी डालने से वह और अधिक जल उठती है उसी प्रकार आदमी सतत इच्छाओं की पूर्ति जैसे जैसा होती जाती है वैसे ही वह और अधिक बढ़ जातीं हैं।

यश्चैतान्प्राघ्नु यात्सर्वान्यश्चैतान्केवलांस्त्यजेत्
प्रापणात्सर्वकामानां परित्यागों विशिष्यते


एक व्यक्ति जो सब विषयों को प्राप्त कर ले और दूसरा जो सबका त्याग कर दे उनमें त्यागी को ही श्रेष्ठ कहा जा सकता है।

आज के संदर्भ में व्याख्या-मनुस्मृति के इन दोनों श्लोंकों का आशय यही है कि हमें अपनी इच्छाओं का दास बनने की बजाय उनका मालिक होना चहिए। जब हम अपने अंदर तमाम तरह की इच्छाएं पाल लेते हैं तो उनको पूरा करने के लिये इधर-उधर भटकने लगते हैं और तब हमारें सामने अनेक प्रकार के तनाव उपस्थित हो जाते हैं। हमारा काम कई चीजों के बिना भी चल सकता है पर हम उनको पाने की चेष्टा करते है। कई चीजें तो हमारे लिये क्षणिक काम या समय के लिये उपयोग में आतीं हैं और बाद में उनको कबाड़ में रख दिया जाता है पर हम उसे पाने में अपनी बेशकीमती समय और ऊर्जा नष्ट कर देते हैं। इसकी बजाय हम अपनी उन व्यर्थ की इच्छाओं और कामनाओं के स्वामी बनकर उन्हें रोंकें तो हम अपने जीवन में न केवल अपार आनन्द प्राप्त करेंगे बल्कि अपने आसपास ही दूसरे मनुष्यों के लिये आदर्श भी बन सकते है।
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नोट-उपरोक्त श्लोक कृतिदेव 10 में टंकित कर परिवर्तित टूल से युनिकोड में किये गये हैं अतः इसमें कुछ अलग के दिखाई दे रहे है। सुधि पाठक इसे अवगत हों।
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Friday, June 13, 2008

मनुस्मृतिःपानी का आचमन करने से आती है शुद्धता

सुप्त्वा क्षुत्वा च भुक्तवा च निष्ठीव्योक्त्वाऽनतानि च।
पीत्वाऽपोध्यध्यमाणश्च आचामेत्प्रयतोऽपि सन्।।


हिंदी में भावार्थ-सोने, छींकने, खाने, थूकने और झूठ बोलने के बाद अपनी शुद्धि पानी पीकर करनी चाहिए। इसके बाद भी अध्ययन करने से पहले एक बार जल का आचमन करना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-समय के साथ हमने कई पुराने संदेशों को भुला दिया है। पानी का सेवन करने से शरीर में कई प्रकार से शुद्धता आती है और तन की शुद्धता से ही मन में शुद्धता का भाव स्थापित हो पाता है। आजकल तो लोग अपने शरीर के साथ अधिक खिलवाड़ करते हैं। कंप्यूटर और टीवी में अपनी आंखों से निरंतर देखते रहते हैं इससे जो तन और मन में हानि होती है उसकी जानकारी उनको नहीं होती है। अनेक जानकार कहते हैं कि कंप्यूटर और टीवी पर एक संक्षिप्त अवधि से दृष्टिपात करने के बाद पानी पीना चाहिए और मूंह में कुल्ला भरकर आंखों में छींटे मारना चाहिए। हमारे देश में किसी भी वस्तु के उपभोग पर लोग उतारू तो हो जाते है पर उससे संबंधित सावधानियों पर ध्यान नहीं देते। कंप्यूटर पर काम करने के बाद अपनी आंखों पर पानी के छींटे मारने से जो राहत मिलती है उससे मस्तिष्क में आये तनाव से मुक्ति मिलती है। सबसे बड़ी बात यह है कि लोगों को यही पता नहीं होता कि तनाव क्या होता है? जब इस तरह पानी के छींटें मारें तब जो राहत मिलती है उस से ही पता लगता है कि कोई तनाव भी होता है।

Thursday, June 12, 2008

मनुस्मृतिःबड़े भाई, पत्नी और पुत्र के साथ विवाद न करें

न पाणिपादचपलो न नेत्रचपलोऽनृजः।
न स्याद्वाक्चपलश्चैव न परद्रोहकमैधीः।।


हिंदी में भावार्थ-अकारण हाथ-पैर नहीं हिलाना चाहिये न नेत्रों या शरीर को मटकाना चाहिए। स्वभाव से कुटिल, दूसरों की निंदा करने वाला भी नहीं बनना चाहिए।

आकाशेशास्तु विज्ञेयाः बालवृद्धकृशातुराः।
भ्राता ज्येष्ठः समः पित्रा भार्या पुत्रः स्वका तनुः


हिंदी के भावार्थ बालक, बूढ़े, कमजोर और आतुर भाव से हमारी और आशा से देखने वाले लोग आकाश के स्वामी होते हैं। अतः इनका पालन-पोषण करना सामान्य मनुष्य का का धर्म है। बड़ा भाई पिता के समान तथा पत्नी एवं पुत्र अपने शरीर के समान है। इनके साथ किसी तरह का विवाद करना व्यर्थ है।

Wednesday, June 11, 2008

मनुस्मृतिःपरस्त्रीगमन से आयु कम होती है

न हीदृशमनायुष्य्र लोके किञ्चन विद्वते।
यादृशं पुरुषस्येह परदारोपसेवनम्


हिंदी में भावार्थ- किसी दूसरे की स्त्री के साथ संपर्क करने जैसा कोई निकृष्ट कर्म नहीं है, उससे व्यक्ति की आयु कम हो जाती है। इसलिये पुरुषों का इस तरह की प्रवृत्ति से दूर ही रहना चाहिए।

नात्मानमवमन्येत पूर्वाभिरसमृद्धिभिः
आमृत्योः श्रियमन्विच्छेन्नैनां मन्येत दुर्लभाम्


हिंदी में भावार्थ-अपनी समृद्धि के लिये सभी प्रयास करते हैं पर अगर किसी को अपने प्रयत्नों से भी सफलता नहीं मिलती तो उसे अपनी भाग्यहीनता की निंदा स्वयं नहीं करना चाहिए। अपने प्रयत्न जारी रखना ही मनुष्य का धर्म है और कभी न कभी उसमें सफलता मिलती है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस विश्व में सभी आदमी अमीर बनना चाहते हैं पर यह संभव नहीं है। किसी को इसमे सफलता मिलती है तो किसी को नर्हीं। जिनको सफलता नहीं मिलती उनमें कुछ लोग तो चुप बैठ जाते हैं पर कुछ लोग व्याकुल होकर सभी के सामने अपनी भाग्यहीनता को कोसने लगते हैं। इससे कोई लाभ नहीं होता बल्कि ऐसा कर वह अपना ही खून जलाते हैं। जिस तरह विद्वान लोग अपनी आत्मप्रवंचना से बचने की सलाह देते हैं वैसे ही आत्मनिंदा से भी बचना चाहिए।

समय के साथ समृद्धि बढ़ी है तो देखिये समाज में नैतिक आचरण में भी कमी आती गयी है। लोगों की मित्रता के रिश्ते बदनाम हो रहे हैं। अनेक मामलों में समृद्ध लोगों पर दूसरे की स्त्री से संपर्क रखने के आरोप भी लगते हैं। कहा जाता है कि बड़े लोगों के पाप तो छिपे रहते हैं पर प्रकृति का नियम है कि सभी के लिये पाप का दंड समान है। आदमी से किसी के पाप छिप जाये पर अपने आपसे वह छिपा नहीं सकता। परस्त्रीगमन से आदमी के अंदर एक डर बैठा रहता है जो धीरे-धीरे उसकी आयु को कम करता है। कहने को बड़े और समृद्ध लोगों को सामने कुछ नहीं कहता पर स्वयं उनके मन में तो डर रहता ही है।

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