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Saturday, July 26, 2008

संत कबीर वाणीःअलख ने ही रचा है यह सब संसार

काम कनागत कारटा, आनदेव का खाय
कहैं कबीर समुझै नहीं, बांधा जमपुर जाय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो श्राद्ध का काम कराते हैं और अन्य देवों को चढ़ायी हुई सामग्री खाते हैं वह अज्ञानी नहीं जानते कि अपने साथ पाप बांधकर यमपुर जाना है।

देवि देव मानै सबै, अलख न मानै कोय
जा अलेख का सब किया, तासों बेमुख होय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि सभी मनुष्य अपने सामने देवी देवताओं को तो मानते हैं परंतु जो निराकार परमात्मा उसे कोई नहीं मानता जिसने इस सारे संसार की रचना की है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-संत कबीरदास जी भारतीय समाज में व्याप्त अंधविश्वास के अत्यंत विरोधी थे। जीवन और मृत्यु को लेकर जितना ढोंग हमारे समाज में हैं वह कहीं अन्यत्र दृष्टिगोचर नहीं होता है। इनमें एक हैं श्राद्ध कर्म करवाना और उसका भोजन करना। देखा जाये तो यह देह पांच तत्वों से बनी है जिसका संचालन इसे धारण करने वाला जीवात्मा करता है और उसके निकल जाने के बाद यह देह तो मिट्टी है पर इसी को लेकर लोग अपने प्रियजनों की मृत्यु पर जो दिखावे का शोक व्यक्त करते हुए जो भोजन आदि कराते हैं उसका कोई औचित्य नहीं है। इससे जीवित लोग केवल अपनी आर्थिक शक्ति का प्रदर्शन करते हैं ताकि जो विपन्न लोग ऐसा करने मेंे असमर्थ हैं वह उनसे प्रभावित रहें।

सच तो यह है कि इस दृश्व्य जगत को देखकर लोग पत्थर की मूर्तियों को पूजते हैं पर इसका निर्माण करने वाले निरंकार अलख ईश्वर की उपासना कोई नहीं करता। सभी मनुष्य केवल जीवन भर अपनी आंखों से देखी माया के इर्दगिर्द ही घूमते हैं। जो निराकार परब्रह्म हैं उसमें ध्यान लगाकर उसकी भक्ति करने के लिये कोई तैयार नहीं होता जबकि भक्ति और ज्ञान की प्राप्ति उसी निष्काम भक्ति से प्राप्त होता है।

संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Thursday, July 24, 2008

रहीम के दोहे-परमात्मा का चरित्र वर्णनातीत

रहिमन बात अगम्य की, कहन सुनन की नाहिं
जो जानत सो कहत नहिं, कहत त जानत नाहिं

कविवर रहीम कहते हैं कि परमात्मा का वर्णन करना कठिन है। उसका स्वरूप अगम्य है और कहना सुनना कठिन है जो जानते हैं वह कहते नहीं हैं जो कहते हैं वह जानते नहीं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-सच तो यह है कि परमात्मा के स्वरूप कोई समझ नहीं सकता । उसकी व्याख्या हर कोई अपने अनुसार हर कोई करता है पर वास्तविकता का वर्णन करना कठिन है। अनेक लोग अपने अनुसार भगवान के स्वरूप की व्याख्या करते है। पर सच तो यह है कि उनके स्वरूप का वर्णन कहना और सुनना कठिन है। उनको तो केवल भक्ति से ही धारण किया जा सकता है। परमात्मा का चरित्र वर्णनातीत है और सच्चे भक्त इस बात को जानते हैं पर कहते नहीं है और जो कहते हैं वह जानते नहीं है। अनेक लोग परमात्मा के अनेक स्वरूपों में से हरेक के जीवन चरित्र पर व्याख्या करते हुए अपना ज्ञान बघारते हैं पर सच तो यह है कि यह उनका व्यवसाय है और वह उसके बारे में कुछ नहीं जानते हैं। उनके वास्तविक स्वरूप को सच्चे भक्त ही जानते हैं पर वह उसका बखान कर अपने अहंकार का प्रदर्शन नहीं करते। अनेक लोग तमाम तरह की खोज का दावा करते हैं तो कुछ लोग कहीं एकांत में तपस्या कर सिद्धि प्राप्त कर फिर समाज में अपना अध्यात्मिक सम्राज्य कायम करने के लिये जुट जाते हैं। ऐसे ढोंगी लोग परमात्मा के स्वरूप का उतना ही बखान करते है जितने से उनका हित और आय का साधन बनता हो।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Friday, June 13, 2008

मनुस्मृतिःपानी का आचमन करने से आती है शुद्धता

सुप्त्वा क्षुत्वा च भुक्तवा च निष्ठीव्योक्त्वाऽनतानि च।
पीत्वाऽपोध्यध्यमाणश्च आचामेत्प्रयतोऽपि सन्।।


हिंदी में भावार्थ-सोने, छींकने, खाने, थूकने और झूठ बोलने के बाद अपनी शुद्धि पानी पीकर करनी चाहिए। इसके बाद भी अध्ययन करने से पहले एक बार जल का आचमन करना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-समय के साथ हमने कई पुराने संदेशों को भुला दिया है। पानी का सेवन करने से शरीर में कई प्रकार से शुद्धता आती है और तन की शुद्धता से ही मन में शुद्धता का भाव स्थापित हो पाता है। आजकल तो लोग अपने शरीर के साथ अधिक खिलवाड़ करते हैं। कंप्यूटर और टीवी में अपनी आंखों से निरंतर देखते रहते हैं इससे जो तन और मन में हानि होती है उसकी जानकारी उनको नहीं होती है। अनेक जानकार कहते हैं कि कंप्यूटर और टीवी पर एक संक्षिप्त अवधि से दृष्टिपात करने के बाद पानी पीना चाहिए और मूंह में कुल्ला भरकर आंखों में छींटे मारना चाहिए। हमारे देश में किसी भी वस्तु के उपभोग पर लोग उतारू तो हो जाते है पर उससे संबंधित सावधानियों पर ध्यान नहीं देते। कंप्यूटर पर काम करने के बाद अपनी आंखों पर पानी के छींटे मारने से जो राहत मिलती है उससे मस्तिष्क में आये तनाव से मुक्ति मिलती है। सबसे बड़ी बात यह है कि लोगों को यही पता नहीं होता कि तनाव क्या होता है? जब इस तरह पानी के छींटें मारें तब जो राहत मिलती है उस से ही पता लगता है कि कोई तनाव भी होता है।

Friday, May 30, 2008

संत कबीर वाणी:अहिरन की चोरी कर, सुई का करें दान

संत कबीर दास ने कहा है कि
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अहिरन की चोरी करै, करे सुई का का दान
ऊंचा चढि़ कर देखता, केतिक दूर विमान
      संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य अपने जीवन में तमाम तरह के अपराध और चालाकियां कर धन कमाता है पर उसके अनुपात में नगण्य धन दान कर अपने मन में प्रसन्न होते हुए फिर आसमान की ओर दृष्टिपात करता है कि उसको स्वर्ग मेेंं ले जाने वाला विमान अभी कितनी दूरी पर रह गया है।
संत कबीर दास ने कहा है कि
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आंखि न देखि बावरा, शब्द सुनै नहिं कान
सिर के केस उज्जल भये, अबहुं निपट अजान

      संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं आंखों से देख नहीं पाता, कानों से शब्द पर रहे जाते हैं और सिर के बाद सफेद होने के बावजूद भी मनुष्य अज्ञानी रह जाता है और माया के जाल में फंसा रहता है।
      वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-हमारे देश आधुनिक समय में अंग्रेजों की सृजित अर्थ, राजकीय, शैक्षिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक व्यवस्था पद्धति का अनुकरण कर रहा है उसके ही एक प्रमुख विद्वान का मानना है कि  कोई भी धनी नहीं बन सकता है-ऐसा मानने वाले बहुत हैं तो हम स्वयं देख भी सकते हैं। धनी होने के बाद समाज में प्रतिष्ठा पाने के मोह से लोग दान करते हैं। कहीं मंदिर में घंटा चढ़ाकर, पंखे या कूलर लगवाकर या बैंच बनवाकर उस पर अपना नाम खुदवाते हैं। एक तीर से दो शिकार-दान भी हो गया और नाम भी हो गया। फिर मान लेते हैं कि उनको स्वर्ग का टिकट मिल गया। यह दान कोई सामान्य वर्ग के व्यक्ति नहीं कर पाते बल्कि जिनके पास तमाम तरह के छल कपट और चालाकियों से अर्जित माया का भंडार है वही करते हैं। उन्होंने इतना धन कमाया होता है कि उसकी गिनती वह स्वयं नहीं कर पाते। अगर वह इस तरह अपने नाम प्रचारित करते हुए दान न करें तो समाज में उनका कोई नाम भी न पहचाने। कई धनपतियों ने अपने मंदिरों के नाम पर ट्रस्ट बनाये हैं। वह मंदिर उनकी निजी संपत्ति होते हैं और वहां कोई इस दावे के साथ प्रविष्ट नहीं हो सकता कि वह सार्वजनिक मंदिर है। इस तरह उनके और कुल का नाम भी दानियों में शुमार हो जाता है और जेब से भी पैसा नहीं जाता। वहां भक्तों का चढ़ावा आता है सो अलग। ऐसे लोग हमेशा इस भ्रम में जीते हैं कि उनको स्वर्ग मिल जायेगा।

Tuesday, May 20, 2008

भृतहरि शतक:सज्जन की मित्रता पूर्वान्ह की छाया की तरह धीरे-धीरे बढ़ती है

दुर्जनः परिहर्तवयो विद्ययाऽलङ्कृतोऽपि सन्
मणिनाः भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकर

इसका आशय यह है कि कोई दुर्जन व्यक्ति विद्वान भी तो साथ छोड़ देना चाहिए। विषधर में मणि होती है पर इससे उससे उसका भयंकर रूप प्रिय नहीं हो जाता।

आरंभगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लघ्वी पुरा वृद्धिमति च पश्चात्
दिनस्य पूर्वाद्र्धपराद्र्ध-भिन्ना छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्



जिस तरह दिन की शुरूआत में छाया बढ़ती हुई जाती है और फिर उतराद्र्ध में धीरे-धीरे कम होती जाती है। ठीक उसी तरह सज्जन और दुष्ट की मित्रता होती है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-सज्जन व्यक्तियों से मित्रता धीरे-धीरे बढ़ती है और स्थाई रहती है। सज्जन लोग अपना स्वार्थ न होने के कारण बहुत शीघ्र मित्रता नहीं करते पर जब वह धीरे-धीरे आपका स्वभाव समझने लगते हैं तो फिर स्थाई मित्र हो जाते हैं-उनकी मित्रता ऐसे ही बढ़ती है जैसे पूर्वाद्ध में सूर्य की छाया बढ़ती जाती है। इसके विपरीत दुर्जन लोग अपना स्वार्थ निकालने के लिए बहुत जल्दी मित्रता करते हैं और उसके होते ही उनकी मित्रता वैसे ही कम होने लगती है जैसे उतराद्र्ध में सूर्य का प्रभाव कम होने लगता है।

Friday, April 4, 2008

रहीम के दोहे:राम-राम करने वाले सभी मित्र नहीं हो जाते

सब को सब कोऊ करै, कै सलाम कै राम
हित रहीम तब जानिए, जब कछु अटकैं काम


कविवर रहीम कहते है कि कभी लोग एक दूसरे को सलाम और राम-राम तो करते हैं पर मित्र वही जब काम पड़ने पर अपना कर्तव्य निभाता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अब पहले की तरह लोगों के काम के दायरे सीमित नहीं रहे। वर्तमान शिक्षा पद्धति से सब जगह नौकरी करने वालों की संख्या बढ़ रही है। अक्सर लोग जहां नौकरी करते हैं वहां अनेक लोग उनके साथ काम करने वाले साथी जुड़ने लगते हैं। प्रतिदिन आपस में हाथ मिलाते और सब एक दूसरे को अपना दोस्त कहने लगते हैं पर उनके यह संबंध कार्यस्थल तक ही सीमित रहते हैं और किसी पर्र अगर घरेलू परेशानी आतीं है तो वह उसके किसी काम के नहीं होते। बीमारी वगैरह की खबर आने पर कभी यह नहीं सोचते कि उसके घर जाकर हालचाल जाने। कहीं उसे किसी डाक्टर के यहां जाने या दवा लाने के लिये सहयोग की जरूरत तो नहीं है।

ऐसे ही किसी के घर में शादी या गमी का अवसर हो तो सहकर्मी से कोई न तो मदद के लिये कहता है न ही वह कोई प्रस्ताव करते हैं। आजकल ऐसे बहुत सारे औपचारिक संबंध बन जाते हैं जिनमें हम आत्मीयता ढूंढते हैं पर निराशा हाथ लगती है। ऐसे में यह भी सोचना चाहिए कि हर एक सहकर्मी के रूप में हम किसी के साथ मित्रता निभाते है।

इस निराशाजनक स्थिति के बचने के लिये लोगों को अपने काम करने के स्थान पर भी अपने साथियों के साथ व्यक्तिगत संबंध बनाने चाहिए और न केवल समय-असमय उनके काम आने के लिये तैयार होना चाहिए बल्कि उनसे भी काम पड़ने पर सहयोग का आग्रह करना चाहिए।

Tuesday, April 1, 2008

संत कबीर वाणी:माया वृक्ष की छाया की भांति अस्थिर

तीन गुनन की बादरी, ज्यों तरुवर की छांहि
बाहर रहै सो ऊबरै, भींजै मन्दिर मांहि


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं तीनों वाली माया रूपी बदली ऐसे ही जैसै वृक्ष की छाया स्थिर नहीं रहती। जो इस माया के जंजाल से परे रहता है। उसी का उद्धार होता है।

सूम सदा ही उद्धरै, दाता जाय नरवक
कहैं कबीर यह साखि सुनि, मति कोय जाव सरक्क


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने वीर्य को कंजूसी से व्यय करने वाला तो स्वर्ग में जा सकता है पर जो कामी इसका दान करता है नरक में ही जायेगा। इस साखी को जो लोग सुनकर सरकें नहीं बल्कि विचार करें।

व्याख्या-कबीरदास जी व्यंजना विधा में अपनी बात कहने के सिद्ध थे इसलिये कई जगह उनकी बात का अर्थ समझना पड़ता है और उपरोक्त साखी में कबीरदास जी ने जो बात कही है उसका आशय यही है कि अपनी ऊर्जा पर नियंत्रण रखकर ही अपना उद्धार हो सकता है।

Saturday, February 9, 2008

रहीम के दोहे:विपदा में ही होती है हितैषी की पहचान

रहिमन बिपदाहू भली, जो थोरे दिन होय
हित अनहित या जगत में, जनि परत सब कोय

कविवर रहीम कहते हैं की विपता का समय भी अच्छा है. वह भले ही काम समय के लिए आता है पर तब पता लगता है कि कौन अपना हितैषी है और कौन शत्रु है, यह भली भाँती समझ में आ जाता है.

रहिमन सुधि सबतें भली लगै जो बांरबार
बिछुरै मानुष फिरि मिलें, यही जान अवतार


कविवर रहीम कहते हैं कि स्मृति तो सबसे प्यारी है, जो बार-बार आती है. इसके द्वारा बिछुड़े मानवों का मिलन हो जाता है. यह बात सभी मनुष्यों को समझ लेना चाहिऐ.

Saturday, December 8, 2007

मनु स्मृति: धर्म के होते हैं दस लक्षण

  1. वेद स्मृति के अनुसार चारों आश्रमों में गृहस्थाश्रम श्रेष्ठ है। इसका कारण यह है कि गृहस्थाश्रम में रहने वाला ही आदमी इन तीन आश्रमों में रहने वालों का पालन करता है।
  2. वेद मंत्रों का जाप सभी को अभीष्ट फल प्रदान करता है, चाहे ज्ञानी करें या अज्ञानी, स्वर्ग के सुखों की इच्छा करने वाला करे अथवा मोक्ष की इच्छा करने वाला।
  • संकलन कर्ता का अभिमत है यहाँ स्वर्ग के सुखों से आशय यह नहीं है जो मरने के बाद प्राप्त होते है वरन इस इहलोक में भी हम वह तमाम आनंद इन मंत्रों के हृदय से उच्चारण कर प्राप्त कर सकते हैं जो इस देह के लिए अभीष्ट होते हैं।

3. धर्म के दस लक्षण हैं १.धैर्य रखना २.क्षमा करना ३.मन पर नियंत्रण करना ४,चोरी नहीं करना ५.मन,वचन और कर्म करना ६.ज्ञानेद्रियाँ एवं कामेद्रियाँ अर्थात सभी इन्द्रियों पर नियंत्रण करना ७.शास्त्र का ज्ञान प्राप्त करना ८.ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करना ९.सच बोलना १०.क्रोध नहीं करना।

4. आत्म साक्षात्कार कर लेने वाला योगी कर्मों के बंधनों में नहीं पड़ता। जो ब्रह्म के दर्शन नहीं कर पाता वही कर्तापन के अहंकार से अच्छे-बुरे कर्मों के परिणाम स्वरूप आवागमन के चक्र में पड़ता है।

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