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Monday, December 29, 2008

कबीर वाणी: कायर पीठ पीछे ही वार करता है

कबीर तो सांचै मतै, सहै जू सनमुख वार
कायर अनी चुभाय के, पीछे झखै अपार


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहत हैं कि सच्चा वीर तो वह है जो सामने आकर लड़ता है पर जो कायर है वर पीठ पीछे से वार करता है।

तीर तुपक सों जो लड़ैं, सो तो सूरा नाहिं
सूरा सोइ सराहिये, बांटि बांटि धन खांहि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो अस्त्र शस्त्र से लड़ते है। उनको वीर नहीं कहा जा सकता है। सच्चे शूरवीर तो हैं जो आपस में मिल बैठकर खाते हैं। वह जो भी कमाते हैं उसे समान रूप से आपस में बांटते हैं।

वर्तमान सन्दर्भ में संपादकीय व्याख्या-शूरवीर हमेशा उसे ही माना जाता है जो अस्त्र शस्त्र का उपयोग करता है। उनमें भी वही वीर है जो सामने से वार करता है पर जो कायर हैं वह पीठ पीछे वार करते हैं। वैसे अस्त्र शस्त्र से लड़ने में भी साहस की आवश्यकता कहां होती है। अगर अस्त्र शस्त्र हाथ में हों तो वेसे भी मनुष्य के मन में दुस्साहस आ ही जाता है और कोई भी उपयोग कर सकता है। कुछ लोग कहते हैं कि हथियार रखने से क्या होता है उसे चलाने के लिये साहस भी होना चाहिये-विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर लोहे से बना कोई हथियार मनुष्य के हाथ में हो तो उसमें आक्रामता आ ही जाती है।

असली साहस तो अपने कमाये धन का दूसरे के साथ बांटकर खाने में दिखाना चाहिये। आदमी जब धन कमाता है तो उसके प्रति उसका मोह इतना हो जाता है कि वह उसे किसी को थोड़ा देने में भी हिचकता है। मिलकर बांटने की बात तो छोडि़ये अपनी रोटी का छोटा टुकड़ा देने में भी आदमी की जान जाती है।

हमारे प्राचीन मनीषियों ने दान की महिमा को इसलिये प्रतिपादित किया कि समाज में सामाजिक समरसता का भाव रहे। हमारे अध्यात्म में इतना तक कहा गया है कि किसी को दान देते हुए आंखें नीची करना चाहिये ताकि दूसरे को हमारा अहंकार नहीं दिखाई दे और उसके अंदर अपने प्रति कुंठा भाव न उत्पन्न हो। मगर अब तो समाज कल्याण की बात राज्य के भरोसे छोड़ दी गयी है और वही लोग जन कल्याण के लिये मैदान में उतर रहे हैं जिनको उससे कुछ आर्थिक फायदा है। यह लोग कायर होते हैं क्योंकि दान और कल्याण क लिये प्राप्त धन का वह हरण करते हैं।

कलुषित तरीके से प्राप्त धन का भी वह दान करने का साहस नहीं कर पाते। अपने धन देने में सभी का हृदय कांपने लगता है। सच है कि जो दानी है वही सच्चा शूरवीर है। वह भी सच्चा वीर है जो अस्त्र शस्त्र लेकर कहकर सामने से प्रहार करता है पर आजकल तो कायरों की पूरी फौज है जो पीठ पीछे से वार करती है। चोर और डकैतों द्वारा किये गये और अपराध और निरंतर बम धमाकों की बढ़ती घटनायें इस बात का प्रमाण हैं।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Saturday, July 26, 2008

संत कबीर वाणीःअलख ने ही रचा है यह सब संसार

काम कनागत कारटा, आनदेव का खाय
कहैं कबीर समुझै नहीं, बांधा जमपुर जाय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो श्राद्ध का काम कराते हैं और अन्य देवों को चढ़ायी हुई सामग्री खाते हैं वह अज्ञानी नहीं जानते कि अपने साथ पाप बांधकर यमपुर जाना है।

देवि देव मानै सबै, अलख न मानै कोय
जा अलेख का सब किया, तासों बेमुख होय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि सभी मनुष्य अपने सामने देवी देवताओं को तो मानते हैं परंतु जो निराकार परमात्मा उसे कोई नहीं मानता जिसने इस सारे संसार की रचना की है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-संत कबीरदास जी भारतीय समाज में व्याप्त अंधविश्वास के अत्यंत विरोधी थे। जीवन और मृत्यु को लेकर जितना ढोंग हमारे समाज में हैं वह कहीं अन्यत्र दृष्टिगोचर नहीं होता है। इनमें एक हैं श्राद्ध कर्म करवाना और उसका भोजन करना। देखा जाये तो यह देह पांच तत्वों से बनी है जिसका संचालन इसे धारण करने वाला जीवात्मा करता है और उसके निकल जाने के बाद यह देह तो मिट्टी है पर इसी को लेकर लोग अपने प्रियजनों की मृत्यु पर जो दिखावे का शोक व्यक्त करते हुए जो भोजन आदि कराते हैं उसका कोई औचित्य नहीं है। इससे जीवित लोग केवल अपनी आर्थिक शक्ति का प्रदर्शन करते हैं ताकि जो विपन्न लोग ऐसा करने मेंे असमर्थ हैं वह उनसे प्रभावित रहें।

सच तो यह है कि इस दृश्व्य जगत को देखकर लोग पत्थर की मूर्तियों को पूजते हैं पर इसका निर्माण करने वाले निरंकार अलख ईश्वर की उपासना कोई नहीं करता। सभी मनुष्य केवल जीवन भर अपनी आंखों से देखी माया के इर्दगिर्द ही घूमते हैं। जो निराकार परब्रह्म हैं उसमें ध्यान लगाकर उसकी भक्ति करने के लिये कोई तैयार नहीं होता जबकि भक्ति और ज्ञान की प्राप्ति उसी निष्काम भक्ति से प्राप्त होता है।

संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Wednesday, July 23, 2008

रहीम के दोहेःअपनी देह की चिंताग्नि में मत जलो

जसी परै सो सहि रहै, कहि रहीम यह देह
धरती पर ही परत है, शीत घाम और मेह

कविवर रहीम कहते हैं कि इस मानव काया पर जैसी परिस्थिति आती है वैसा ही वह सहन भी करती है। इस धरती पर ही सर्दी, गर्मी और वर्षा ऋतु आती है और वह सहन करती है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-पश्चिमी चिकित्सा विशेषज्ञों तमाम तरह के शोधों के बाद यह कह पाये कि हमारी देह बहुत लोचदार है उसमें हालतों से निपटने की बहुत क्षमता है। इसके लिये पता नहीं कितने मेंढकों और चूहों को काटा होगा-फिर इस निष्कर्ष पर पहुंचे । हमारे मनीषियों ने अपनी योग साधना और भक्ति से अर्जित ज्ञान से बहुत पहले यह जान लिया कि इस देह में बहुत शक्ति है और वह परिस्थितियों के अनुसार अपने को ढाल लेती है। ज्ञान या तो योग साधना से प्राप्त होता है या भक्ति से। रहीम तो भक्ति के शिखर पुरुष थे और अपनी देह पर कतई ध्यान नहीं देते थे पर फिर भी उनको इस मनुष्य देह के बारे में यह ज्ञान हो गया पर आजकल अगर आप किसी सत्संग में जाकर बैठें तो लोग अपनी दैहिक तकलीफों की चर्चा करते हैं, और वहां ज्ञान कम आत्मप्रवंचना अधिक करते हैं। कोई कहेगा ‘मुझे मधुमेह हो गया है’ तो कोई कहेगा कि मुझे ‘उच्च रक्तचाप’ है। जिन संत लोगों का काम केवल अध्यात्मिक प्रवचन करना है वह उनकी चिकित्सा का ठेका भी लेते हैं। यह अज्ञान और भ्रम की चरम परकाष्ठा है।

मैने अपने संक्षिप्त योग साधना के अनुभव से यह सीखा है कि देह में भारी शक्ति होती है। मुझे योगसाधना का अधिक ज्ञान नहीं है पर उसमें मुझे अपने शरीर के सारे विकार दिखाई देते हैं तब जो लोग बहुत अधिक करते हैं उनको तो कितना अधिक ज्ञान होगा। पहले तो मैं दो घंटे योगसाधना करता था पर थोड़ा स्वस्थ होने और ब्लाग लिखने के बाद कुछ कम करता हूं (वह भी एक घंटे की होती है)तो भी सप्ताह में कम से कम दो बार तो पूरा करता हीं हूं। पहले मुझे अपना शरीर ऐसा लगता था कि मैं उसे ढो रहा हूं पर अब ऐसा लगता है कि हम दोनों साथ चलते हैं। मेरे जीवन का आत्मविश्वास इसी देह के लड़खड़ाने के कारण टूटा था आज मुझे आत्मविश्वास लगता है। आखिर ऐसा क्या हो गया?

इस देह को लेकर हम बहुत चिंतित रहते हैं। गर्मी, सर्दी और वर्षा से इसके त्रस्त होने की हम व्यर्थ ही आशंका करते हैं। सच तो यह है कि यह आशंकाएं ही फिर वैसी ही बीमारियां लातीं हैं। हम अपनी इस देह के बारे में यह मानकर चलें यह हम नहीं है बल्कि आत्मा है तो ही इसे समझ पायेंगे। इसलिये दैहिक तकलीफों की न तो चिंता करें और न ही लोगों से चर्चा करें। ऐसा नहीं है कि योगसाधना करने से आदमी कभी बीमार नहीं होता पर वह अपने आसनों से या घरेलू चिकित्सा से उसका हल कर लेता है। यह बात मैने अपने अनुभव से सीखी है और वही बता रहा हूं। योगसाधना कोई किसी कंपनी का प्राडक्ट नहीं है जो मैं बेच रहा हूं बल्कि अपना सत्य रहीम के दोहे के बहाने आपको बता रहा हूं।
दीपक भारतदीप, संकलक एवं संपादक

Thursday, July 17, 2008

रहीम के दोहे:स्वारथ के अनुसार लोग गुण-दोष ढूंढते हैं

स्वारथ रचत रहीम सब, औगनहूं जग मांहि
बड़े बड़े बैठे लखौ, पथ रथ कूबर छांहि

कविवर रहीम कहते हैं कि लोग अपने स्वार्थ के लिये दूसरे में गुण दोष निकालते हैं। जो कभी अपनी हित साधने के लिये मार्ग में रुके रथ के हरसे की टेढ़ी-मेढ़ी छाया को अशुभ कहा करते थे वही लोग उसी हरसी की छाया में बैठ कर अपने को धूप से बचाते हैं।

सर सूखै पंछी उड़ै, औरे सरन समाहि
दीन मीन बिन पंख के, कहु रहीम कहं जाहिं


कविवर रहीम कहते हैं कि तालाब का पानी सूखते ही पक्षी उड़कर दूसरे तालाब में चले जाते हैं पर उसमें रहने वाली मछली का क्या? वह तो असमर्थ होकर वहीं पड़ी रहती है। परमात्मा का ही उसे आसरा होता है।

साधु सराहै साधुता, जती जोखिता जान
रहिमन सांचे सूर को, बैरी करे बखान


सज्जन लोग ही सज्जनता की सराहना करते हैं दुष्ट नहीं। जो योगी हैं वही ज्ञान और ध्यान की सराहना करते है जबकि सामान्य जन उससे परे रहते हैं। पर जो शूरवीर हैं उनकी वीरता की प्रशंसा सभी करते हैं।

Wednesday, June 25, 2008

चाणक्य नीतिःकपट रहित शुद्ध आचरण ही होता है धर्म

1.आज के युग में अर्थ की प्रधानता है और धन संचय प्रमुख आधर है। धन संचय हर मनुष्य के लिये आवश्यक है क्योंकि समय पड़ने पर कब उसकी जरूरत होती है पता ही नहीं पड़ता।
2.संसार में कोैन ऐसा व्यक्ति है जिसके कुल में दोष नहीं है। अगर गौर से देखों तो सभी कुलों में कहीं न कहीं कोई दोष दिखाई देता है। उसी प्रकार इस भूतल पर ऐसा कौनसा प्राणी है जो कभी रोग से पीडि़त नहीं होता या उस पर विपत्ति नहीं आती। इस प्रथ्वी पर ऐसा प्राणीनहीं मिल सकता जिसने हमेशा सुख ही देखा हो
3.किसी भी व्यक्ति के कुल का अनुमान उसके व्यवहार से लग जाता है। उसकी भाषा से उसके प्रदेश का का ज्ञान होता है। उसके शरीर को देखकर उसके खानपान का अनुमान किया जा सकता है। इस तरह किसी भी व्यक्ति से बातचीत में उसके बारे में बहुत कुछ जाना जा सकता है।
4.वह भोजन पवित्र कहलाता है जो विद्वानों के भोजन करने पर शेष रह जाता है। दूसरे का हित करने वाली वृत्ति ही सच्ची सहृदयता है। श्रेष्ठ और बुद्धिमान पुरुष वही होता है जो पापकर्मों में प्रवृत्त नहीं होता। कल्याण क लिये वह धर्म और कर्म श्रेष्ठ है जो अहंकार के बिना किया जाये। छलकपट से दूर रहकर शुद्ध आचरण ही करना धर्म है।

Saturday, May 10, 2008

संत कबीर वाणी:शब्द का महत्व चुम्बक समान


यही बड़ाई शब्द की, जैसे चुम्बक भाय
बिना शब्द नहिं ऊबरै, केता करै उपाय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि शब्द का महत्व तो चुम्बक के समान है जो आदमी को अपनी आकर्षित करता है। बिना शब्द के कोई भी अपने जीवन में उबर नहीं सकता चाहे जितने भी उपाय कर ले।

सीखै सुनै विचार ले, ताहि शब्द सुख देय
बिना समझै शब्द गहे, कछु न लोहा लेय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो शब्द सुनकर कुछ सीखता और उस पर विचार करता है उसे वह सुख प्रदान करते हैं। बिना सोचे समझे ग्रहण कर बोलने वाला व्यक्ति कोई लाभ नहीं ले पाता।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-कई बार कुछ लोगों को देखकर हमें यह लगता होगा कि कि अधिक बोल जाते हैं। कई बार यह अनुभव भी होता है कि वह कुछ कार्यों को समय रहते सीख नहीं पाये। यह अनुभव हमें अपने बारे में भी होता है। मनुष्य का एक दूसरे से संपर्क वार्तालाप को माध्यम से होता है और आजकल अंतर्जाल पर संपर्क होता है तो शब्द लिखकर भी संपर्क होता है। शब्द बोला जाय या लिखा जाये उसमें आकर्षण होता है। इन पंक्तियों का लेखक अंतर्जाल पर लिखता है और कई बार दूसरे का लिखा ही दिल को ऐसा छू जाता है जैसे उसने बोला हो। कई लोग ऐसे भी है जो दुःख पहुंचाने वाले शब्द लिखते हैं। ऐसे लोग अज्ञान के अंधेरे में होते हैं। वह सोचते हैं कि इस तरह शब्द लिखने या कहने से किसी पर कोई प्रभाव नहीं होता या हम अपने मन की भडास निकाल लें दूसरे पर उसका जो प्रभाव होता है उसकी हम चिंता क्यों करें? यह ऐसे लोग होते हैं जो जिनको जीवन का ज्ञान देने वाला गुरू नहीं मिला होता या फिर उन्होने उसके ज्ञान को गंभीरता से ग्रहण नहीं किया होता।

कई बार लोग एक दूसरे के लिए पीठ पीछे अभद्र शब्द का करते हुए निंदा करते हैं सोचते हैं कि कौन वह सुन रहा है या जाकर उससे कहेगा। यह सच भी होता है पर ऐसा कर वह अपने मन और देह को भी भारी कष्ट देते हैं। अपना खून जलाते हैं। अतः उनकी कमियों से सीखकर हमें अपने अंदर सुधार कर लेना चाहिए।

Saturday, May 3, 2008

रहीम के दोहे:अहंकार है आदमी के छोटे होने का प्रमाण

बड़े पेट के भरन को, है रहीम देख बाढि
यातें हाथी हहरि कै, दया दांत द्वे काढि

कविवर रहीम कहते हैं कि जो आदमी बड़ा है वह अपना दुख अधिक दिन तक नहीं छिपा सकता क्योंकि उसकी संपन्नता लोगों ने देखी होती है जब उसके रहन सहन में गिरावट आ जाती है तब लोगों को उसके दुख का पता लग जाता है। हाथी के दो दांत इसलिये बाहर निकल आये क्योंकि वह अपनी भूख सहन नहीं कर पाया।

बड़े बड़ाई नहिं तजैं, लघु रहीम इतराइ
राइ करौंदा होत है, कटहर होत न राइ

कविवर रहीम कहते हैं कि बड़े आदमी कभी अपने मुख से स्वयं अपनी बड़ाई नहीं करते जबकि छोटे लोग अहंकार दिखाते है। करौंदा पहले राई की तरह छोटा दिखाई देता है परंतु कटहल कभी भी राई के समान छोटा नजर नहीं आता।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-कहा जाता है कि धनाढ्य व्यक्ति इतना अहंकार नहीं दिखाता जितना नव धनाढ्य दिखाते हैं। होता यह है कि जो पहले से ही धनाढ्य हैं उनको स्वाभाविक रूप से समाज में सम्मान प्राप्त होता है जबकि नव धनाढ्य उससे वंचित होते हैं इसलिये वह अपना बखान कर अपनी प्रभुता का बखान करते हैं और अपनी संपत्ति को उपयोग इस तरह करते हैं जैसे कि किसी अन्य के पास न हो।

वैसे बड़ा आदमी तो उसी को ही माना जाता है कि जिसका आचरण समाज के हित श्रेयस्कर हो। इसके अलावा वह दूसरों की सहायता करता हो। लोग हृदय से उसी का सम्मान करते हैं जो उनके काम आता है पर धन, पद और बाहुबल से संपन्न लोगों को दिखावटी सम्मान भी मिल जाता है और वह उसे पाकर अहंकार में आ जाते हैं। आज तो सभी जगह यह हालत है कि धन और समाज के शिखर पर जो लोग बैठे हैं वह बौने चरित्र के हैं। वह इस योग्य नहीं है कि उस मायावी शिखर पर बैठें पर जब उस पर विराजमान होते हैं तो अपनी शक्ति का अहंकार उन्हें हो ही जाता है। जिन लोगों का चरित्र और व्यवसाय ईमानदारी का है वह कहीं भी पहुंच जायें उनको अहंकार नहीं आता क्योंकि उनको अपने गुणों के कारण वैसे भी सब जगह सम्मान मिलता है।
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Rahim's couplets: arrogance of the small man's testimony
Rahim says that big man who is suffering more days, it can not hide its prosperity because people have seen a decline in tolerance when his life is his grief to the people it takes to address it. So two out of elephant teeth come because he could not tolerate their hunger.


Rahim says that the big man his mouth sometimes do not boast their own people while the small show of arrogance. Like the first gooseberry mustard small but appears like a small mustard jackfruit ever is missing.

In the context of the current interpretation - is said that such a wealthy person does not show arrogance as the newly rich show. It appears that they are already naturally rich in the society honours is the newly wealthy are deprived of it because his deeds to his mastery of his deeds, and to use the property as a way to Others have not.

However, the big man is considered to be the same as that which best practice in the interest of society. In addition, he helps others. The heart of the same people who respect their work comes on the money, rank and power from rich people to get respect is to mock him and he is satisfied they are in arrogance. Today, all that money and place the condition of society are sitting on top of what the people of the dwarf character. He is not eligible to sit on top of that illusory when he sits on are, they have the arrogance of his power is. The people of character and integrity of the business, is the arrogance they do not go anywhere access to their properties because they are coming because even though there is respected everywhere.

Wednesday, April 23, 2008

रहीम के दोहे:अपने मन की वेदना सबके सामने मत प्रगट करो

रहिमन आंसुवा नैन ढरि, जिस दुख प्रगट करेइ
जाहिं निकारो गेह तें, कस न भेद कहिं देइ


कविवर रहीम कहते हैं कि अपने दिल का हाल हर किसी से मत कहो। सबके सामने आपने आंसु गिराने से कोई लाभ नहीं। यहां लोग दूसरे की वेदना का रहस्य सबके सामने कहकर उपहास उड़ाते हैं। अपने दुःख भुलाने के लिये दूसरों की वेदना का मजाक उड़ाने में उनको मजा आता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-समाज सिकुड़ रहा छोटे और विघटित परिवारों तथा अन्यत्र स्थानों पर कार्य करने की वजह से कई लोग अकेलेपन को झेल रहे हैं। ऐसे में जब उनकी पीड़ा असहनीय हो जाती है तब वह अपने आसपास के लोगों को अपना समझकर कहने लगते हैं जबकि वही लोग बाद में उनका उपहास उड़ाते है। उसके बाद होता यह है कि अपनी समरूया का हल तो होता नहीं उल्टे लोग हंसी उड़ाकर तकलीफ और देते हैं। सच बात तो यह है कि सभी लोग अनेक प्रकार के तनाव झेल रहे हैं पर जब कोई उनको तकलीफ सुनाता है तो वह यह सोचकर तसल्ली कर लेते हैं कि चलो दूसरा भी दुःखी है। अपना दर्द पीते हैं फिर कोई अपनी तकलीफ सुना जाये तो सबके सामने उसका मजाक कर अपना मनोरंजन करते हैं। उसके साथ यह हुआ। देखो उसने यह गलती कर डाली।

ऐसे में अच्छा यही है कि अपनी पीड़ा आप झेलते रहो। समय कभी एक जैसा नहंी रहता। अच्छा समय निकल गया तो बुरा भी निकल जायेगा-यही सोचकर दिल को तसल्ली देना ठीक है। अगर कोई सोचता है कि दिल का हाल सुनाकर तसल्ली हो जाये तो वह संभव नहीं है। हां, अगर यह विश्वास हो जाये कि कोई व्यक्ति वाकई समस्या का हल कर देगा तो फिर उसे सच बता देना चाहिए।

Saturday, April 19, 2008

संत कबीर वाणी:खेत में फ़ैली मिसरी को हाथी नहीं चुन सकता

मिसरी बिखरी खेत में, हस्ती चुनी न जाए
कीड़ी ह्वै कर सब चुनै, तब साहिब कू पाए


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते है कि यदि खेत में मिसरी बिखरी पड़ी है तो हाथ उसे नहीं चुन सकता जबकि चींटी उसे चुन कर खाती है। व्यक्ति नम्रता से ही कुछ पा सकता है अहंकार से नहीं।

कबीर नवै सो आपको, परको नवै न कोय
घालि तराजू तोलिये, नवै सो भारी होय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यदि कोई अपने अगर किसी में नम्रता का गुण के कारण झुकता है तो वह उसके संस्कारों और योग्यता का मापदंड है जैसे तराजू वह पलड़ा जिसमें वजन होता है नीचे झुकता और जिसमें नहीं वह उठा रहता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-जैसे हमारा समाज अपने अध्यात्मिक ज्ञान से दूर होता जा रहा है वैसे ही तमाम तरह का तनाव बढ़ रहा है। लोगों को विद्यालयों में अर्थशास्त्र, गणित, विज्ञान, सांख्यिकी, भौतिकी, इतिहास तथा अन्य विषयों की शिक्षा तो दे रहे हैं पर संस्कारों के लिये जिस अध्यात्मिक शिक्षा की आवश्यकता है उससे सब परे हैं। जिन माता पिता ने यह शिक्षा अपने बुजुर्गों से प्राप्त की है वह भी अब उसे भूल कर इस मायामय संसार में अपने बच्चों को मायावी बनाना चाहते हैं। उनसे अपेक्षा करते हैं कि वह किसी भी तरह धनार्जन कर समाज में उनकी प्रतिष्ठा बढ़ायें इसलिये उनको अध्यात्मिक शिक्षा देना तो दूर उससे परे रखना चाहते हैं। परिणाम सबके सामने है।
अहंकार ऐसा गुण है जो इस देह के साथ पैदा होते ही आता है इसलिये उस पर नियंत्रण के लिये बच्चे को छोटे में ही अध्यात्मिक शिक्षा की आवश्यकता होती है। उससे परे रहने के कारण उनमें हिंसक प्रवृति छोटी आयु मेंे ही घर करने लगती हैं। आजकल हम स्कूलों में बच्चों द्वारा अपने साथी छात्रों की हत्या के समाचार पढ़ते रहते है वह इसी अहंकार की प्रवृत्ति का परिणाम है अब हम भले ही यह कहते रहें कि बच्चे हैं हो जाता है पर वास्तविकता यह है कि बड़ों का कोई भी गुण या दुर्गुण बच्चे जल्दी ग्रहण करते हैं और जिन बच्चों में हिसा और घृणा का भाव है वह उनके परिजनों की ही देन है।

इसलिये अपने तथा बच्चों के अंदर नम्रता का भाव आये इसके लिये उनको शुरू में ही अध्यात्म की तरफ प्रेरित करना चाहिए। उनके सामने घर में भगवान की आरती गानी चाहिए और समय समय पर उनको मंदिर भी ले जाना चाहिए ताकि भगवान की मूर्ति के आगे शीश नवाने से उनमें नम्रता का भाव आये।
नोट-यह इस ब्लोग की २०० वीं पोस्ट है। पाठकों और मित्रों के स्नेह और ईश्वरीय प्रेरणा के यह संभव नहीं था क्योंकि यह ब्लोग मैंने क्यों शुरू किया मुझे स्वयं भी पता नहीं था। मैं इस पर क्यों और कैसे लिखता हूँ यह भी नहीं मालुम। कोई अदृश्य शक्ति है जो मुझसे यह लिखवाती है ऐसा लगता है और वह मित्रों और और पाठकों के स्नेह और ईश्वरीय प्रेरणा के और कौन हो सकता है।

Friday, April 18, 2008

संत कबीर वाणी:खुद को पानी नहीं मिले दूसरों को बांटे खीर

पानी मिले न आपको, औरन बकसत छीर
आपन मन निहचल नहीं और बंधावत धीर


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कुछ लोगों को पानी तक नहीं मिलता और दूसरों को खीर प्रदान करने की बात करते हैं और अपनी बुद्धि निश्चयात्मक नहीं है और दूसरों को धीरज प्रदान करते हैं।

पढि पढि के समुझावई, मन नहीं धरि धीर
रोटी का संसै पड़ा, यौं कहें दास कबीर

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कई लोग धर्मग्रंथों को पढ़कर उसे रट लेते हैं और दूसरों को समझाने लगते हैं पर उनका आचरण भी कोई अच्छा नहीं होता। सदैव अपनी रोटी की जुगाड़ में रहते हैं दूसरों को ज्ञान बघारते हैं

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आजकल धर्मोंपदेश करना व्यवसाय हो गया है। ऐसे अनेक संत हैं जो केवल धन कमाने के लिए ही कथा या उपदेश काम काम करते हैं। ऐसी बातें करते हैं जैसे कि बहुत बड़े ज्ञानी हों और अनेक लोग उनको गुरू मानकर उनकी चरण वंदना करने लगते हैं। यह उनका भ्रम होता है। कई धर्मोपदेशक तो स्वयं भी उस ज्ञान को ग्रहण नहीं करते और अपने अपना काम समाप्त कर उसका दाम वसूल करते हैं। कई जगह जाने से पहले ही दाम तय कर लेते हैं।

यहां हमारा आशय किसी की निंदा करना नहीं है। हम तो बस यह कहना चाहते हैं कि वह व्यवसाय करते हैं यह सभी भक्तों को समझ लेना चाहिए। इन पंक्तियों का लेखक स्वयं ही कई कथाओं में समय पास करने या ज्ञान पाने के लिये जाता है पर उसका उद्देश्य केवल धर्मग्रंथें में पढ़े हुए ज्ञान को स्मरण करना मात्र होता है। ऐसे धर्मोपदेशकों को साधु या संत मानकर सेवा करने या दान से कोई लाभ नहीं होता। उनकी चरणवदंना के कभी भक्ति प्राप्त नहीं होता और जो उनको गुरू बनाते हैं वह भी कोई भगवान का आर्शीवाद नहीं पाते। इनके प्रवचन तो सुनना चाहिए पर फिर भगवान का ध्यान लगाना चाहिए न कि इनके आकर्षण में बंधकर भगवान की भक्ति से विमुख होना जरूरी है। ऐसे लोगों पर माया की कृपा तो होती है पर भगवान की कृपा तो गरीब की सहायता करने, प्यासे को पानी पिलाने और परमार्थ के अन्य काम करने से होती है।

Wednesday, January 23, 2008

रहीम के दोहे:पुरुषार्थ प्रकट करने से धन मिलता है

जो पुरुषार्थ ते कहूं, संपत्ति मिलत रहीम
पेट लागि वैराट कर तपत रसोई भीम
कविवर रहें कहते हैं की पुरुषार्थ करने से मनुष्य को धन-संपत्ति प्राप्त होती है. अज्ञातवास के समय विराट राजा के घर पांडव भीम पेट की खातिर रसोईये का कार्य करते रहे.
भावार्थ-कुछ लोग सोचते हैं कि उनको कितनी मेहनत करें पर उनको कोई लाभ नहीं होगा उनका यह सोचना गलत है. अगर हम अपने कार्य में नियमित रूप[ से लगे रहें अपने मन को इधर-उधर न भागने दें तो हमें सफलता अवश्य मिलेगी.
नोट-सहृदय सज्जनों मेरे ब्लागस्पाट के ब्लोगों का कंपोज मोड़ काम नहीं कर रहा इस में सीधे इंडिक टूल से लाकर पेस्ट कर रहा हूँ अत: पहले की तरह सजा कर नहीं पेश कर पा रहा हूँ.

Tuesday, January 22, 2008

रहीम के दोहे:शरीर रुपी बाजार में मन बिक गया

यों रहीम तन हाट में, मनुआ गयो बिकाय
ज्यों जल में छाया परे, काया भीतर नांव
कविवर रहीम कहते हैं की शरीर-रुपी बाजार में मन बिक गया, जैसे पानी में व्यक्ति का प्रतिबिबं पड़ने से जल के अन्दर समाहित व्यक्ति का शरीर वास्तविक नहीं होता. वह केवल परछाईं मात्र होता है,

Sunday, January 13, 2008

रहीम के दोहे:पाँसे अपने हाथ पर दांव नहीं

जेहि रहीम तन मन लियो, कियों हिए बिच भीन
तासों दुख सुख कहन की, रही बात अब कौन


कवि रहीम का कथन है कि जिस व्यक्ति ने तन मन पर अधिकार कर लिया है, उसने हृदय में स्थान बना लिया है, ऐसे प्रेमी से दुख, सुख कहने की अब कौन सी बात शेष रह गयी .

निज कर क्रिया रहीम कहीं, सुधि भावी के हाथ
पाँसे अपने हाथ में, दांव न अपने हाथ

कवि रहीम कहते हैं कि अपने हाथ में तो कर्म करना है परिणाम भविष्य के गर्भ में है जैसे जुआरी के हाथ में खेल के पाँसे कौडी तो अपने हाथ में होते हैं, परन्तु दाव अपने वश में नहीं होता.

Saturday, January 12, 2008

रहीम के दोहे:याचना करने से चाक कभी दीपक नहीं बना देता

रहिमन चाक कुम्हार को, मांगे दिया ना देह
छेद में डंडा डारि कै, चहै नांद लै लेइ


कविवर रहीम कह्ते हैं कि कुम्हार का चाक याचना करने से दीपक नहीं बंना देता। चाक में छेद में डंडा डालकर घुमाने से दीपक तो क्या पूरी नांद (मिट्टी का बडा पात्र) का पात्र बना जाता है।

भावार्थ- आजकल सहजता से कोई काम नही होता। कई बार ऐसे अवसर आते हैं जब हमें कठोर होना पड्ता। हालांकि ऐसा हमेशा नहीं होता और कई बार सह्जता से काम भी होते हैं, पर कुछ लोगों का यह स्वभाव होता है कि वह कठोर होने पर ही आपकी बात
मानते हैं।

रहिमन खोटी आदि की, सो परिनाम लखाय
जैसे दीपक तम भखै, कज्जल वमन कराय


कविवर रहीम कहते हैं कि बुराई होने पर उसका फ़ल अवश्य दिखाई देता है। जैसे दीपक अंधकार को दूर कर देता है, परंतु शीघ्र ही कालिमा उगलने लगता है।

Friday, April 6, 2007

जीं हाँ, मैं बबूल को भी सहलाता हूँ!

कहा जाता है बोए पेड बबूल के तो आम कहॉ से होय। यह कहावत अपने आप में बहुत बड़ा दर्शन है इसमें कोई संदेह नहीं है , पर केवल इसी बात को लेकर बबूल से नफ़रत करना मुझे कभी नहीं अच्छा नहीं लगता। वजह! बबूल के सहारे ही उन पेड-पोधों की रक्षा की जाती है जिनके आवारा पशुओं द्वारा खाए जाने का खतरा रहता है। जहाँ भी कोइ पेड लगाया जाता है तो उसके चारों और बबूल की झाडियाँ रख जाती हैं है ताकी कोई पशु न खा सके।
मुझे याद है जब हमने कालोनी में मकान बनाया था तब एक संस्स्था द्वारा पूरी कालोनी में तमाम तरह के पेड-पोधे लगाए गए। हमारे घर के बाहर दो पोधे लगाए गए । हमने उनको दोतीन पानी दिया । एक दिन देखा कि गाय ने एक पौधा खा लिया है। तब वहां से एक मजदूर निकल रहा था। उसे हम जानते तक नहीं थे। उसने उस गाय को वहां से हटाया और हमें आवाज़ दीं। हम पति-पत्नी बाहर निकल आये। उसने गाय द्वारा एक पौधा खाने की जानकारी दीं और सुझाव दिया कि ' इस पौधे की रक्षा के लिए उसके चारों तरफ बबूल की डालियाँ लगा दें। हमारी श्रीमतीजी ने उससे कहीं से बबूल की डालियाँ लाने को कहा तो वह हंसकर बोला-"यहां बबूल की क्या कमी?"
ऐसा कहकर वह वहन से चला गया और थोडी दूर जाकर बबूल की डालियाँ ले आया और उसने उसके चारों और इस तरह लगा दीं कोइ पशु उसे न खा सके। उसके बाद हमने देखा वय पौधा फल-फूलकर एक वृक्ष के रुप में आज भी हमें शुद्ध प्राणवायु प्रदान करता है। एक गुरूजी की सलाह पर हमने अपनी ज़िन्दगी से तनाव और संभावित बिमारियों से बचने के लिए पांच वर्ष पूर्व हमने योग्साधना शुरू की। हमने देखा जब कभी हमें सुबह उठने में देरी हो जाती है तब जब हम उस पेड के नीचे बैठाकर योगासन और प्राणायाम करते है तो यह साफ समझने में आता है कि इस पेड की वजह से ही हमें शुद्ध वायू मिल रही है। फिर याद करता हूँ उस बबूल की डालियों और उसे लाने वाले उस मजदूर को जिसे न हमने पहले देखा और न उससे बाद। दोनों पेड भगवान् की तरह थे- जिन्होंने उसे जीवन दिया। फिर में सोचता होंन कि बबूल के पेड को उससे जिस दुर्गुण की वजह से सम्मान नहीं दिया जाता वही उसका गुन भी तो है वरना वह पेड की रक्षा कैसे करत। फिर मैं उस मजदूर के बारे में सोचता हूँ। लोग गरीबों को हे द्रष्टि से देखते हीं, पर अगर वह मजदूर गरीब न होता तो पैदल नहीं निकलता और हमारे पोधे की रक्षा का वह प्रयास नही करता। यकीनन कोइ स्कूटर, मोटर सायकल या कर में चलने वाला इस पच्दे में नहीं पडता।
वैसे भी मैं कभी बबूल से नफरत नहीं करता। में जनता हूँ कि चुभाना उसका गुन है। इसी तरह यहां किसी में गुन या अवगुण नहीं होता। देखने का हमारा नज़रिया होता है। हमें उस पर विचार करना चाहिऐ। दोष हमें अपने विचार में नहीं रखना चाहिऐ । हमारी द्रष्टि में दोष होता है जो हमें किसी में दोष दिखाता है। जब हम अपने विचारों को साफ करेंगे तब हमें किसी में दोष दिखाई नहीं देगा। इसीलिये मैं कभी बबूल से भी नही चिढ़ता। जब कही उसकी डाली मेरे सामने आ जाती है तो उसे सहलाता हूँ उससे बीच काँटों में उंगली रखकर - मैं यह नही भूल सकता कि उसने मेरे घर के बाहर लगे पेड की रक्षा की थी।

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