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Tuesday, July 15, 2008

रहीम के दोहेःसमय के अनुसार कर्म का फल प्रकट होता है

समय पाय फल होत है, समय पाय झरि जात
सदा रहै नहीं एक सौ, का रहीम पछितात?

कविवर रहीम कहते हैं कि समय चक्र तो घूमता रहता है और उसी के अनुसार मनुष्य को अपने कर्मो का फल मिलता है। समय कभी एक जैसा नहीं रहता इसलिये बुरा समय आने पर परेशान होने से कोई लाभ नहीं है।

उत्तम जाती ब्राह्मनी, देखत चित्त लुभाय
परम पाप पल में हरत, परसत वाके पास

कविवर रहीम कहते हैं कि मनुष्य की पहचान उसके उत्तम गुणों से होती है। ब्रह्मज्ञानी को देखते ही हृदय में प्रसन्नता के भावों का प्रवाह होता है। ऐसे विद्वान के सामने सिर झुकाने मात्र से ही सारे पाप धुल जाते है।

आदि रूप की परम दुति, घट घट रही समाई
लघु मति ते मो मन रसन, अस्तुति कही न जाई


कविवर रहीम कहते हैं कि आदि रूप परमात्मा का प्रकाश चारों तरफ फैला है। वह कणकण में समाया हुआ है। उसके प्रभाव करने में किसी का भी बौद्धिक ज्ञान कम पड़ जायेगा। उसकी महिमा गाने में तो शब्द भी कम पड़ जाते हैं।

Wednesday, July 9, 2008

चाणक्य नीतिःहृदय में जगह नहीं तो पास वाला भी दूर लगता है

1.राजा, अग्नि, गुरु, स्त्री इनसे निकटता खतरनाक होती है। इनसे थोड़ा परे रहकर संपर्क रखना चाहिए। अग्नि, जल, सर्प, मूर्ख, और राजा कभी भी रुष्ट होने पर मनुष्य के प्राण तक ले सकते हैं।
2.सच्चा ज्ञानी तो वही है जो प्रसंग के अनुसार वार्तालाप में अपने तर्क उचित ढंग से प्रस्तुत करता है। वह अनुकूल होने पर प्रेम करता है और अपनी शक्ति के अनुसार क्रोध प्रदर्शन करने वाला भी होता है।
3.हृदय में रहने वाला दूर रहकर भी पास है और हृदय में न रहने वाला पास रहकर भी दूर रहता है। परे और निकट के संबंध का आधार हृदय के भाव से है।
4.जल में तेल पड़ते ही कम होने के बावजूद तेल का विस्तार हो जाता है। उसी तरह दुष्ट के साथ गोपनीय विषय पर की गयी वार्ता विद्युत गति से फैल जाती है। उसी तरह सुदान की चर्चा भी विस्तार पाती है। विस्तार की शक्ति अपने पात्र के कार्य करने पर निर्भर रहती है।
5.निर्धन को पत्नी, मित्र, सेवक, भाई और परिजन सब छोड़ देते हैं।

Wednesday, June 25, 2008

चाणक्य नीतिःकपट रहित शुद्ध आचरण ही होता है धर्म

1.आज के युग में अर्थ की प्रधानता है और धन संचय प्रमुख आधर है। धन संचय हर मनुष्य के लिये आवश्यक है क्योंकि समय पड़ने पर कब उसकी जरूरत होती है पता ही नहीं पड़ता।
2.संसार में कोैन ऐसा व्यक्ति है जिसके कुल में दोष नहीं है। अगर गौर से देखों तो सभी कुलों में कहीं न कहीं कोई दोष दिखाई देता है। उसी प्रकार इस भूतल पर ऐसा कौनसा प्राणी है जो कभी रोग से पीडि़त नहीं होता या उस पर विपत्ति नहीं आती। इस प्रथ्वी पर ऐसा प्राणीनहीं मिल सकता जिसने हमेशा सुख ही देखा हो
3.किसी भी व्यक्ति के कुल का अनुमान उसके व्यवहार से लग जाता है। उसकी भाषा से उसके प्रदेश का का ज्ञान होता है। उसके शरीर को देखकर उसके खानपान का अनुमान किया जा सकता है। इस तरह किसी भी व्यक्ति से बातचीत में उसके बारे में बहुत कुछ जाना जा सकता है।
4.वह भोजन पवित्र कहलाता है जो विद्वानों के भोजन करने पर शेष रह जाता है। दूसरे का हित करने वाली वृत्ति ही सच्ची सहृदयता है। श्रेष्ठ और बुद्धिमान पुरुष वही होता है जो पापकर्मों में प्रवृत्त नहीं होता। कल्याण क लिये वह धर्म और कर्म श्रेष्ठ है जो अहंकार के बिना किया जाये। छलकपट से दूर रहकर शुद्ध आचरण ही करना धर्म है।

Tuesday, June 10, 2008

संत कबीर वाणीःजिनके बाल सफेद हो गये वह भी अज्ञानी हैं

आंखि न देखि बावरा,शब्द सुनै नहिं कान
सिर के केस उज्जल भये, अबहूं निपट अजान
संत शिरोमिणि कबीरदास जी कहते हैं कि संसार के लोग अपनी देह की अवस्था का विचार नहीं करते। इन बावलों को आंख से दिखते नहीं है और कानों से उपदेश और संतों के प्रवचन सुनाई नहीं देते है। सिर के बाल पूरी तरह सफेद हो और तब भी अज्ञानी हैं।

मूरख शब्द न मानई, धर्म न सुनै विचार
सत्य शब्द नहिं खोजई, जावैं जम के द्वारा


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मूर्ख व्यक्ति सत्य शब्द नहीं मानता न ही धर्म आदि का विचार करता। वह बिना सत्संग और भगवान भक्त के बिना ही मृत्यू को प्राप्त होता है।

संक्षिप्त व्याख्या-इस देश में इतने सारे कथित संत और उनके शिष्य हैं और इतने सारे धार्मिक अनुष्ठान होते हैं पर फिर भी समाज निरंतर संस्कृति, संस्कार और साहित्य के क्षेत्र में पतन की तरफ जा रहा है। लोग अपने संस्कारों को निरर्थक, संस्कृति को पिछड़ा और धार्मिक साहित्य को अप्रासंगिक मानने लगे हैं। इसका कारण यह है कि हमारे देश में पाखंड बहुत बढ़ चुका है। लोग ऐसे धार्मिक कार्यक्रमों में जाते हैं पर आखें होते हुए भी देखते नहीं, कान से सुनी बात दूसरे कान से निकाल देते हैं और बुद्धि का उपयोग करना तो उनको निरर्थक समय नष्ट करना होता है। वैसे वह फिल्मी और राजनीतिक विषयों पर बातचीत कर अपने आपको विद्वान और ज्ञानी समझते हैं पर सत्संग की बात करो तो कहते हैं-‘इनसे कोई संसार थोड़े ही चलता है।’

आधुनिक शिक्षा से भारतीय अध्यात्म विषय को दूर रखने की वजह से आजकल लोगों में मानसिक विकृतियां जन्म ले चुकी हैं। ऐसे में वही लोग थोड़ा बहुत ज्ञान धारण किये हुए हैं जिनको माता पिता या किसी योग्य गुरू द्वारा उससे परिचित कराया गया है वरन लोग तो मन की आखों से दृष्टिहीन, कान से बहरे और बुद्धि से विवेकहीन हो गये हैं। उनको केवल सांसरिक विषय ही प्रिय लगते हैं।

Sunday, June 8, 2008

भृतहरि शतकःसंतोष होने पर अमीर-गरीब समान हो जाते हैं

वयमहि परितृष्टा वल्कलैस्त्वं दृकूलैस्सम इह परितोषो निर्विशेषो विशेषः।
स तु भवतु यस्य तृष्णा विशाला मनसि च परितुष्टे कोऽर्थवान् को दरिद्र

भावार्थ-इस भौतिक संसार में कोई मनुष्य वृक्ष की छाल के वस्+त्र पहनकर ही संतुष्ट होता है तो किसी का मन रेशमी सूत के बने वस्त्र धारण कर ही प्रसन्न होता है। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। धनी और निर्धन के संतोष में कोई अंतर नही। जिसकी बहुत बड़ी इच्छाएं वह दरिद्र होते हुए भी मन के संतुष्ट हो जाता है तो भला किसे धनी कहा जाये और किसे दरिद्र।

संक्षिप्त व्याख्या-यहां कोई धनी अपने धन पर इतराता है तो कोई अपनी निर्धनता को लेकर त्रस्त रहता है। अपनी देह में विचरने वाले मन की ओर कोई दृष्टिपात नहीं करता। अगर मन में संतोष है तो फिर किस बात की चिंता रह जाती है। कुछ लोग ऐसे है जो अपने पास भौतिक साधनों के अभाव की परवाह न करते हुए भक्ति भाव से अपना जीवन व्यतीत करते हैं। वह परमात्मा द्वारा दिये गये धन से संतुष्ट हो जाते हैं पर कई धनिक हैं जो धन क पीछे सदैव पड़े रहते हैं पर मन की शांति उनसे कोसों दूर रहती है। इतना ही नहीं अपनी कम आवश्यकताओं के कारण संतुष्ट लोगों के मन की शांति उनको नहीं सुहाती और तब वह सोचते हैं कि काश! हमें मन की शांति मिल जाये।

आज का भौतिक संसार तो आपने देखा होगा मनुष्य की अशांति पर ही अधिक चल रहा है। टीवी चैनलों पर एक विज्ञापन आता है जिसमें एक अभिनेता कहता है-‘डोंट बी संतुष्ट‘। मतलब यह कि आज के युग के व्यवसायी अपने हित के लिऐ ऐसे प्रयास करते हैं कि आम आदमी के मन में असंतोष भड़काकर उन्हें माया के ऐसे चक्कर में फंसाया जहां से वह निकल नहीं सके।

अगर आदमी के मन में संतोष है इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि वह धनी है या निर्धन। हमारा काम कम आवश्यकता से चल जाता है तो उससे संतुष्ट हो जाना चाहिए। संतोष ही सबसे बड़ा धन है।

Wednesday, January 9, 2008

चाणक्य नीति:लघु व्यक्ति से भी ज्ञान ग्रहण करें

1.ईर्ष्या असफलता का दूसरा नाम है। अपनी असफलता और दूसरे की सफलता से मनुष्य ईर्ष्यालु हो जाता। ईर्ष्याग्रस्त मनुष्य महत्वहीन होता है, अतएव ईर्ष्या करना अपना महत्व घटाता है,हजारों गायों के बीच बछ्दा केवल अपने माँ के पास जाता है, इसी प्रकार मनुष्य का कर्म भी उसी में पाया जाता है, जो उसका कर्ता होता है। कर्ता कर्म का फल भोगे बिना कैसे रह सकता है ।

2.ईश्वर ने सोने में सुगंध नहीं डाली, गन्ने में फल नहीं लगाए, चन्दन के पेड को फूलों से नहीं सजाया , विद्वान को धन से संपन्न नहीं बनाया और राजा को दीर्घायु प्रदान नहीं की। इनके साथ इस तरह के अभाव का रहस्य का कारण यही है इन वस्तुओं के उपयोग के साथ और मनुष्यों में उसकी प्रवृति में दुरूपयोग और अहंकार का भाव पैदा न हो। अगर इससे ज्यादा गुण होते तो यह दोनों के लिए घातक होता।

3.यदि गंदे स्थान पर सोना पडा है उसे उठाने में गुरेज नहीं करना नहीं चाहिए, क्योंकि वह कीमती हैं। यदि विद्या निम्न कोटि के व्यक्ति से भी सीखना पडे तो संकोच नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह उपयोगी होती है। यदि विष से अमृत मिलता है जरूर प्राप्त करना चाहिए।
*इसका आशय यह है हमें अगर ज्ञान अपने लघु व्यक्ति से मिलता हो तो उसे ग्रहण करना चाहिऐ। सज्जन व्यक्ति से अगर वह गरीब भी है तो संपर्क करना चाहिए। आगे व्यक्ति गुणी है पर निम्न जति या वर्ग है तो भी उसकी प्रशंसा करना चाहिए।
युवावस्था में काम-क्रोध हावी होते हैं, इसी कारण व्यक्ति की विवेक शक्ति निष्क्रिय हो जाती है। काम वासना से व्यक्ति को कुछ नहीं सूझता। काम-क्रोध व्यक्ति को अँधा कर देता है।
4.धूर्तता, अन्याय और बैईमानी आदि से अर्जित धन से संपन्न आदमी अधिक से अधिक दस वर्ष तक संपन्न रह सकता है, ग्यारहवें वर्ष में मूल के साथ-साथ पूरा अर्जित धन नष्ट हो जाता है।

*इसका सीधा आशय यह है कि भ्रष्ट और गलत तरीके से कमाया गया पैसा दस वर्ष तक ही सुख दे सकता है, हो सकता है कि इससे पहले ही वह नष्ट हो जाय।

Friday, April 6, 2007

जीं हाँ, मैं बबूल को भी सहलाता हूँ!

कहा जाता है बोए पेड बबूल के तो आम कहॉ से होय। यह कहावत अपने आप में बहुत बड़ा दर्शन है इसमें कोई संदेह नहीं है , पर केवल इसी बात को लेकर बबूल से नफ़रत करना मुझे कभी नहीं अच्छा नहीं लगता। वजह! बबूल के सहारे ही उन पेड-पोधों की रक्षा की जाती है जिनके आवारा पशुओं द्वारा खाए जाने का खतरा रहता है। जहाँ भी कोइ पेड लगाया जाता है तो उसके चारों और बबूल की झाडियाँ रख जाती हैं है ताकी कोई पशु न खा सके।
मुझे याद है जब हमने कालोनी में मकान बनाया था तब एक संस्स्था द्वारा पूरी कालोनी में तमाम तरह के पेड-पोधे लगाए गए। हमारे घर के बाहर दो पोधे लगाए गए । हमने उनको दोतीन पानी दिया । एक दिन देखा कि गाय ने एक पौधा खा लिया है। तब वहां से एक मजदूर निकल रहा था। उसे हम जानते तक नहीं थे। उसने उस गाय को वहां से हटाया और हमें आवाज़ दीं। हम पति-पत्नी बाहर निकल आये। उसने गाय द्वारा एक पौधा खाने की जानकारी दीं और सुझाव दिया कि ' इस पौधे की रक्षा के लिए उसके चारों तरफ बबूल की डालियाँ लगा दें। हमारी श्रीमतीजी ने उससे कहीं से बबूल की डालियाँ लाने को कहा तो वह हंसकर बोला-"यहां बबूल की क्या कमी?"
ऐसा कहकर वह वहन से चला गया और थोडी दूर जाकर बबूल की डालियाँ ले आया और उसने उसके चारों और इस तरह लगा दीं कोइ पशु उसे न खा सके। उसके बाद हमने देखा वय पौधा फल-फूलकर एक वृक्ष के रुप में आज भी हमें शुद्ध प्राणवायु प्रदान करता है। एक गुरूजी की सलाह पर हमने अपनी ज़िन्दगी से तनाव और संभावित बिमारियों से बचने के लिए पांच वर्ष पूर्व हमने योग्साधना शुरू की। हमने देखा जब कभी हमें सुबह उठने में देरी हो जाती है तब जब हम उस पेड के नीचे बैठाकर योगासन और प्राणायाम करते है तो यह साफ समझने में आता है कि इस पेड की वजह से ही हमें शुद्ध वायू मिल रही है। फिर याद करता हूँ उस बबूल की डालियों और उसे लाने वाले उस मजदूर को जिसे न हमने पहले देखा और न उससे बाद। दोनों पेड भगवान् की तरह थे- जिन्होंने उसे जीवन दिया। फिर में सोचता होंन कि बबूल के पेड को उससे जिस दुर्गुण की वजह से सम्मान नहीं दिया जाता वही उसका गुन भी तो है वरना वह पेड की रक्षा कैसे करत। फिर मैं उस मजदूर के बारे में सोचता हूँ। लोग गरीबों को हे द्रष्टि से देखते हीं, पर अगर वह मजदूर गरीब न होता तो पैदल नहीं निकलता और हमारे पोधे की रक्षा का वह प्रयास नही करता। यकीनन कोइ स्कूटर, मोटर सायकल या कर में चलने वाला इस पच्दे में नहीं पडता।
वैसे भी मैं कभी बबूल से नफरत नहीं करता। में जनता हूँ कि चुभाना उसका गुन है। इसी तरह यहां किसी में गुन या अवगुण नहीं होता। देखने का हमारा नज़रिया होता है। हमें उस पर विचार करना चाहिऐ। दोष हमें अपने विचार में नहीं रखना चाहिऐ । हमारी द्रष्टि में दोष होता है जो हमें किसी में दोष दिखाता है। जब हम अपने विचारों को साफ करेंगे तब हमें किसी में दोष दिखाई नहीं देगा। इसीलिये मैं कभी बबूल से भी नही चिढ़ता। जब कही उसकी डाली मेरे सामने आ जाती है तो उसे सहलाता हूँ उससे बीच काँटों में उंगली रखकर - मैं यह नही भूल सकता कि उसने मेरे घर के बाहर लगे पेड की रक्षा की थी।

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