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Sunday, June 8, 2008

भृतहरि शतकःसंतोष होने पर अमीर-गरीब समान हो जाते हैं

वयमहि परितृष्टा वल्कलैस्त्वं दृकूलैस्सम इह परितोषो निर्विशेषो विशेषः।
स तु भवतु यस्य तृष्णा विशाला मनसि च परितुष्टे कोऽर्थवान् को दरिद्र

भावार्थ-इस भौतिक संसार में कोई मनुष्य वृक्ष की छाल के वस्+त्र पहनकर ही संतुष्ट होता है तो किसी का मन रेशमी सूत के बने वस्त्र धारण कर ही प्रसन्न होता है। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। धनी और निर्धन के संतोष में कोई अंतर नही। जिसकी बहुत बड़ी इच्छाएं वह दरिद्र होते हुए भी मन के संतुष्ट हो जाता है तो भला किसे धनी कहा जाये और किसे दरिद्र।

संक्षिप्त व्याख्या-यहां कोई धनी अपने धन पर इतराता है तो कोई अपनी निर्धनता को लेकर त्रस्त रहता है। अपनी देह में विचरने वाले मन की ओर कोई दृष्टिपात नहीं करता। अगर मन में संतोष है तो फिर किस बात की चिंता रह जाती है। कुछ लोग ऐसे है जो अपने पास भौतिक साधनों के अभाव की परवाह न करते हुए भक्ति भाव से अपना जीवन व्यतीत करते हैं। वह परमात्मा द्वारा दिये गये धन से संतुष्ट हो जाते हैं पर कई धनिक हैं जो धन क पीछे सदैव पड़े रहते हैं पर मन की शांति उनसे कोसों दूर रहती है। इतना ही नहीं अपनी कम आवश्यकताओं के कारण संतुष्ट लोगों के मन की शांति उनको नहीं सुहाती और तब वह सोचते हैं कि काश! हमें मन की शांति मिल जाये।

आज का भौतिक संसार तो आपने देखा होगा मनुष्य की अशांति पर ही अधिक चल रहा है। टीवी चैनलों पर एक विज्ञापन आता है जिसमें एक अभिनेता कहता है-‘डोंट बी संतुष्ट‘। मतलब यह कि आज के युग के व्यवसायी अपने हित के लिऐ ऐसे प्रयास करते हैं कि आम आदमी के मन में असंतोष भड़काकर उन्हें माया के ऐसे चक्कर में फंसाया जहां से वह निकल नहीं सके।

अगर आदमी के मन में संतोष है इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि वह धनी है या निर्धन। हमारा काम कम आवश्यकता से चल जाता है तो उससे संतुष्ट हो जाना चाहिए। संतोष ही सबसे बड़ा धन है।

Tuesday, May 27, 2008

संत कबीर वाणी:विचार कर बोलने वाला कभी अपमानित नहीं होता

सहज तराजू आनि के, सब रस देख तोल
सब रस माहीं जीभ रस, ज कोय जानै बोल

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस दुनिया मेे विभिन्न प्रकार के रस है पर भी को परख लिया। इमने सबसे अधिक वजन जीभ के रस का है। जो मीठे वचन बोलता है वही इस रस का महत्व जानता है।

बौलै बोल विचारि के, बैठे ठौर संभारि
कहैं कबीर ता दास को, कबहू न आवै हारि

संत कबीरदास जी कहते हैं कि जो सोच समझकर समय के अनुसार बोलता है और उपयुक्त स्थान पर बैठता है तो वह कभी पराजित नहीं कर सकता।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-हमने कुछ लोग ऐसे देखे होंगे जो शांत भाव से जीवन जीते हैं और उनको किसी की परवाह नहीं रहती। दरअसल वह समय के अनुसार उचित और अनुचित का महत्व जानते हुए कार्य करते हैं। अनावश्यक रूप से किसी से वार्ता नहीं करते और जब बोलते हैं तो बहुत ही सधे शब्दों में का उपयोग करते है। ऐसे लोग कभी भी कहीं अपमानित नहीं होते। ऐसे लोग अंर्तमुखी होते हैं और बहुत सोच विचार कर बोलते हैं। जीवन में सफलता उनके कदम चूमती है।
इस संसार में ऐसे भी बहुत लोग हैं जो जीवन में बहुत काम करते हैं। उनका पूरा जीवन परिश्रम करते हुए निकल जाता है और फिर भी समाज में सम्मान नहीं प्राप्त कर पाते वजह यह कि वह अपने मुख से अनर्गल प्रलाप कर अपने ही किये पर पानी फेर देते हैं। बहुत काम करते हैं पर फिर भी अनुभव के नाम पर कोरे रह जाते हैं। अपनी सारी ऊर्जा व्यर्थ बोलने में लगाते है।

Monday, July 2, 2007

संत कबीर वाणी:कोयला भी हो उजळा

NARAD:Hindi Blog Aggregator

कोयला भी हो उजळा, जरि बरि है जो सेव
मूरख हो न उजळा, ज्यों कालर का खेत
संत कबीरदास जी का कहना है कि भली-भांति जलकर कोयला भी उजला हो जाता है, परन्तु मूर्ख का सुधरना उसी प्रकार नहीं होता जैसे ऊसर खेत में बीज नहीं उगते।

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