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Saturday, August 30, 2008

संत कबीर वाणीःजहां घड़ा नहीं डूबता वहां हाथी नहा लेता है

तीन गुनन की बादरी, ज्यों तरुवर की छाहिं
बाहर रहे सौ ऊबरे, भींजैं मंदिर माहिं

संत शिरोमणि कबीरदास कहते हैं कि तीन गुणों वाली माया के नीचे ही सभी प्राणी सांस ले रहे हैं। यह एक तरह का वृ+क्ष है जो इसकी छांव से बाहर रहेगा वही भक्ति की वर्षा का आनंद उठा पायेगा।

जिहि सर घड़ा न डूबता, मैंगल मलि मलि न्हाय
देवल बूड़ा कलस सौं, पंछि पियासा जाय
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जहां कभी न सर और घड़ा नहीं डूबता वहां वहां मस्त हाथी नहाकर चला जाता है। जहां कलसी डूब जाती है वहां से पंछी प्यासा चला गया।

संपादकीय व्याख्या-यहां भक्ति और ज्ञान के बारे में कबीरदास जी ने व्यंजना विद्या में अपनी बात रखी है। वह कहते हैं कि प्रारंभ में आदमी का मन भगवान की भक्ति में इतनी आसानी से नहीं लगता। उसे अपने अंदर दृढ़ संकल्प धारण करना पड़ता है। ज्ञान और भक्ति की बात सुनते ही आदमी अपना मूंह फेर लेता है क्योंकि उसका मन तोत्रिगुणी माया में व्याप्त होता है। यह विषयासक्ति उसे भक्ति और ज्ञान से दूर रहने को विवश करती है ऐसे वह भगवान का नाम सुनते ही कान भी बंद कर लेता है। जब उसका मन भक्ति और ज्ञान में रमता है तब वही आदमी संपूर्ण रूप से उसके आंनद में लिप्त हो जाता है-अर्थात जहां सिर रूपी घड़ा नहीं डूबता था ज्ञान प्राप्त होने पर वहां लंबा-च ौड़ा हाथी नहाकर चला जाता है। जिसे ज्ञान नहीं है वह हमेशा ही प्यासा रहता है। माया के फेरे में ही अपना जीवन गुजार देता है। इस त्रिगुणी माया की छांव में जो व्यक्ति बैठा रहेगा वह भक्ति कभी नहीं प्राप्त कर सकता है।
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Sunday, November 4, 2007

संत कबीर वाणी:शराब आदमी को पशु बना देती है

जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय
यह आपा तो दल दे, दया करे सब कोय

संत शिरोमणि कबीरदास जे कहते हैं की अगर व्यक्ति के मन में शांति है तो उसका कोई बैरी नहीं है, और वह घमंड करना छोड़ दे तो सब उस पर दया करेंगे।
अवगुण कहूं शराब का, आप अहमक साथ
मानुष से पशुआ कर दे, गाँठ से खात

संत शिम्रोमानी कबीरदास जी कहते हैं के शराब पीकर आदमी अपने आप पागल हो जाता है, मूर्खो और पशुओं जैसा व्यवहार करता है अपनी जेब से पैसा खर्च करता है सो अलग।

बाजीगर का बांदरा, ऐसा जीव मन के साथ
नाना नाच दिखे कर, राखे अपने साथ

कबीर दास जी कहते हैं की जिस तरह बाजीगर का अपने बन्दर से तरह-तरह के नाच दिखाकर अपने साथ रखता है उसी तरह मन भी जीव के साथ है वह भी जीव को अपने इशारे पर चलाता है।

Saturday, November 3, 2007

संत कबीर वाणी:कलि का स्वामी लोभिया

कलि का स्वामी लोभिया, पीतलि भरी खटाइ
राज-दुबारा यौं फिरै, ज्यूँ हरिहाई गाइ

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कलियुग के स्वामी बडे लोभी हो गए हैं और उनमें विकार आ गया है, जैसे पीपल के बल्टोई में खटाई रख देने से आता है। राज द्वारों पर ये लोग मान-सम्मान पाने के लिए घुमते हैं रहते हैं, जैसे खेतों मैं बिगडैल गायें घुस आती हैं।

स्वामी हवा सीतका, पिलाकर पचास
राम-नाम काठे रह्मा, करै सिपां की आँस

कविवर कबीरदास जी कहते हैं कि स्वामी आज-कल मुफ्त में, या पैसे के पचास मिल जाते हैं, मतलब यह कि सिद्धिया और चमत्कार दिखाने वाले स्वामी और बाबा बहुत है। राम नाम को तो रख देते हैं किनारे और शिष्यों से लाभ की आशा करते हैं।

Friday, July 13, 2007

संत कबीर वाणी: गंगा जल शीतल भया

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कुटिल वचन नहिं बोलिए, शीतल बैन ले चीन्हि
गंगा जल शीतल भया, परबत फोडा तीन्हि
कभी भी कड़वे वचन मत बोलो, शीतल वचनों को समझो तथा उन्हीं का प्रयोग करो। पावन गंगा जल को देखो। उस शीतल जल ने पर्वत फोड़कर अपना मार्ग भी बना लिया, अर्थात मधुर वचनों द्वारा कठोर हृदय वाले व्यक्ति को भी अपने अनुकूल बनाकर कार्य सिद्ध कर सकते हैं।

Wednesday, July 11, 2007

संत कबीर वाणी: छलिया लोगों का हश्र

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बाना पहिरे सिंह का, चले भेड़ की चाल
बोली सियार की, कुता खावै काल
जो सिंह का वेश धारण कर , भेड़ की चाल चलते हैं और सियार की बोली बोलते हैं उन्हें अवश्य कुता फाड़ कर खा जाएगा।
कबीरदास जीं का आशय यह है कि जिनका वेश कुछ और है, कहते कुछ और हैं, एसे लोग छलिया प्रवृति के लोग अवश्य ही पिटते हैं।

Monday, July 9, 2007

संत कबीर वाणी:भोजन और पानी

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जैसा भोजन खाइये, तैसा ही मन होय
जैसा पानी पीजिये, तैसी वाणी होय
संत शिरोमणि कबीरदास कहते हैं कि जैसा भोजन करोगे, वैसा ही मन का निर्माण होगा और जैसा जल पियोगे वैसी ही वाणी होगी अर्थात शुद्ध-सात्विक आहार तथा पवित्र जल से मन और वाणी पवित्र होते हैं इसी प्रकार जो जैसी संगति करता है वैसा ही बन जाता है।

Sunday, July 8, 2007

संत कबीर वाणी: कौवा कभी हंस नहीं बन सकता

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दाग जू लागा नील का, सौ मन साबुन धोय
कोटि जतन परमोघिये, कागा हंस न होय
नील का दाग लग जाने पर, उसे सौ मन साबुन से धोने पर भी वह साफ नहीं किया जा सकता इसी प्रकार कौवा
करोडों प्रयास कर ले वह हंस नहीं बन सकता।

Saturday, July 7, 2007

संत कबीर वाणी:सरवर तरवर संत जन

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सरवर तरवर सन्त जन, चौथा बरसे मेह
परमारथ के कारने, चारों धारी देह
सरोवर,वृक्ष, संतजन और चौथा मेह का बरसना ये चारों परोपकार के लिए ही प्रकट है सरोवर, वृक्ष और बादल तो जड़ हैं। संतों की परोपकारिता से किसी की बराबरी नहीं हो सकती।

Friday, July 6, 2007

संत कबीर वाणी: ज्यों नैनन में पुतली

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ज्यों नैनन में पुतली, त्यों मालिक घर माँहि
मूरख लोग न जानिए , बाहर ढूँढत जाहिं
संत शिरोमणि कबीरदास कहते हैं कि जिस प्रकार नेत्रों के अन्दर पुतली रहती है और वह सारे संसार को देख सकती है किन्तु अपने को नहीं, उसी प्रकार भगवान हृदय में विराजमान हैं और मूर्ख लोग बाहर ढूंढते हैं।

Thursday, July 5, 2007

संत कबीर वाणी: जा घट प्रेम न संचारे

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जा घट प्रेम न संचारे, सो घट जान समान
जैसे खाल लुहार की, सांस लेतु बिन प्रान

जिस आदमी के हृदय में प्रेम नहीं है वह श्मशान के सदृश्य भयानक एवं त्याज्य होता है। जिस प्रकार के लुहार की धौंकनी के भरी हुई खाल बग़ैर प्राण के सांस लेती है उसी प्रकार उस आदमी का कोई महत्व नहीं है





Wednesday, July 4, 2007

संत कबीर वाणी:साधू और सिद्ध में अन्तर

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साधू सिद्ध बहु अंतरा, साधू मता प्रचंड
सिद्ध जू बारे आपको, साधू तारे नौ खण्ड
संत शिरोमणि कबीरदास जीं कहते हैं कि साधू और सिद्ध में अन्तर है, दोनों में साधू ही श्रेष्ठ है। सिद्ध तो केवल अपना ही कल्याण करता है लेकिन साधू लोग पूरे विश्व का उद्धार करते हैं।

Tuesday, July 3, 2007

संत कबीर वाणी: बगुला और हंस की बुद्धि

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  • कबीरा लहर समुद्र की, निष्फल कभी न जाय
  • बगुला परख न जानई, हंसा चुग-चुग खाय

इसका आशय यह है समुद्र की लहर भी निष्फल नहीं आती । बगुला ज्ञान रहित होने के कारण उसे मत्स का आहार कर अपना जीवन व्यतीत करता है- परन्तु हंस बुद्धिमान होने के कारण मोतियों का आहार का अपने जीवन को व्यतीत करता है।

*लेखक का मत है कि मनुष्य में जो बुद्धिमान होते हैं वह अपना जीवन अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए भगवान् की भक्ति भी करते हैं जबकि अन्य लोग अपना पूरा जीवन माया के पीछे भागते हुए गुजार देते हैं ।

Monday, July 2, 2007

संत कबीर वाणी:कोयला भी हो उजळा

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कोयला भी हो उजळा, जरि बरि है जो सेव
मूरख हो न उजळा, ज्यों कालर का खेत
संत कबीरदास जी का कहना है कि भली-भांति जलकर कोयला भी उजला हो जाता है, परन्तु मूर्ख का सुधरना उसी प्रकार नहीं होता जैसे ऊसर खेत में बीज नहीं उगते।

Saturday, June 30, 2007

संन्त कबीर वाणी:बाहर क्या दिखराइये

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बाहर क्या दिखराइये, अन्तर जानिए राम
कहा काज संसार से, तुझे घनी से काम
संत शिरोमणि कबीरदास कहते हैं कि बाहर दिखाकर भगवान् का स्मरण करने से क्या लाभ, राम का स्मरण तो अपने ह्रदय में करना चाहिए। जब भगवान् के भक्ती करनी है फिर इस संसार से क्या काम ।
*लेखक का मत है कि अगर हमें भगवान् की पूजा या भक्ती करनी है तो उसका दिखावा करने कई जरूरत नहीं है। कई लोग अपने इष्ट और उसकी भक्ती के दावा लोगों के सामने करते हैं, ऐसे लोग ढोंगी होते हैं।
प्रेमभाव एक चाहिए, भेष अनेक बजाय
चाहे घर में बात कर, चाहे बन को जाय
इसका आशय यह है कि अगर भगवान की भक्ती करनी है तो घर-गृहस्थी में रहते हुए भी की जा सकती है उसके लिए वेशभूषा बदलने की कोई जरूरत नहीं है और न वन जाने की। बस मन में प्रेमभाव होना चाहिए।

Friday, June 29, 2007

कहे कबीर बादल फटा, क्यों कर सीवे दर्जी

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दिल का मरहम कोई न मिला, जो मिला मर्जी
कहे कबीर बादल फटा, क्यों कर सीवे दर्जी
कबीर दास जीं कहते हैं कि इस संसार में ऐसा कोई नहीं मिला जो मेरे हृदय को शांति प्रदान कर सके। जो भी मिले सब अपने मतलब से मिले । स्वार्थियों को देखकर मन जब बादल की तरह फट गया तो उसे दरजी क्यों सीयेगा।

Thursday, June 28, 2007

संत कबीर वाणी

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भांग तमाखू छूतरा , इनसे करे पियार
कहै कबीर सो जीयरा, बहुत सहै सिर मार
इसका आशय यह है कि भांग, तंबाकू और छूतरा इन गंदे ओर नशीले पदार्थों का जो सेवन करता है वह अपने किये हुए पाप-कर्मों से होने वाले दण्ड को बड़ी कठिनाई से झेल पाता है।

Wednesday, June 27, 2007

संत कबीर वाणी:तन के योगी

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तन को जोगी सब करै , मन को करै न कोय
सह्जै सब सिधि पाइये, जो मन जोगी होय
वेश धारण कर शरीर को योगी जैसा बनाते हैं पर मन को वश कर कोई योगी नहीं बनता। यदी कोई मन से भी योगी हो जाये तो साज़-भाव से सब कल्याण मयी सिद्धियाँ प्राप्त कर सकता है

Tuesday, June 26, 2007

संत कबीर वाणी

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निन्दक दूर न कीजिये, कीजै आदर मान
निर्मल तन मन सब करे , बाकी आन्ही आन्
अपनी निंदा करना वाले को कभी अपने से दूर मत करो, सदैव उसका आदर करो। वह आपके जीवन, कर्म और आचरण के विषय में कुछ भी बकता रहेगा और आप सतर्कता बरतेंगे और इससे आपका तन और मन निर्मल बना रहेगा।
तिनका कबहूँ न निन्दिये, पाँव तले जो होय
कबहूँ उड़ी आंखों पडी, पीर घनेरी होय
इसका आशय यह है कि कभी भी किसी कि निंदा मत करो। अपने पाँव तले आये तिनके की भी नहीं। पता नहीं कब उड़कर आंखों में पड़ जाये तो फिर भारी पीडा देगा

Monday, June 25, 2007

संत कबीर वाणी

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नारी नरक न जानिए, सब संतन की खान
जामें हरिजन ऊपजे, सोई रतन की खान
प्रत्येक नारी को विषय-वासना का नरक नही समझना चाहिए, वह तो सब संत और महापुरुषों की जननी है। उससे सब परमात्मा प्रेम भक्त और संत उत्पन्न हुए। सब मानवता के अनमोल रत्नों की वही जन्मदायिनी है।
दीपक झोला पवन का, नर का झोला नारि
साधू झोला शब्द का, बोलै नाहिं विचारि
इसका आशय यह है वायु का झोला दीपक के लिए भयप्रद है, नारी का झोला पुरुष के लिए भयप्रद है। उसी तरह ठीक से विचार कर न बोला जाये तो शब्दवाणी का झोला साधू के लिए भी भयप्रद है। गलत शब्द के उपयोग से उसका साधू के रुप में महत्व कम हो जाता है।

Saturday, June 23, 2007

संत कबीर वाणी

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कबीर तहां न जाइए, जहाँ कपट का हेत
जानो काले अनार के, तन राता मन से त
इसका आशय यह है कि वहां कदापि न जाइए जहाँ कपट का प्रेम हो। उस प्रेम को ऐसे ही समझो जैसे अनार की कली, जो ऊपरी भाग से लाल परंतु भीतर से सफ़ेद होती है। वैसे हे कपटी लोग मुहँ पर प्रेम दिखाते हैं पारु उनके भीतर कपट की सफेदी पुती रहती है ।
कबीर तहां न जाइए, जहाँ कपट को हेत
नौ मन बीज जू बोय के, खालि रहिगा खेत

इसका आशय यह है कि वहाँ कतई न जाएँ जहां कपट भरे प्रेम मिलने की संभावना हो। जैसे ऊसर वाले खेत में नौ मन बीज बोने पर भी खेत खाली रह जाता है, वैसे ही कपटी से कितना भी प्रेम कीजिये परन्तु उसका हृदय प्रेम-शून्य ही रहता है।




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