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Thursday, August 28, 2008

रहीम के दोहे:राम का नाम है कई विकारों को परे करने का उपाय

रहिमन राम न उर धरै, रहत विषय लपटाय
पसु खर खात सवाद सों, गुर बुलियाए खाय


कविवर रहीम कहते है कि भगवान राम को हृदय में धारण करने की बजाय भोग और विलास में डूबे रहते है। पहले तो अपनी जीभ के स्वाद के लिए जानवरों की टांग खाते हैं और फिर उनको दवा भी लेनी पड़ती है।

वर्तमान सदंर्भ में व्याख्या-वर्तमान समय में मनुष्य के लिये सुख सुविधाएं बहुत उपलब्ध हो गयी है इससे वह शारीरिक श्रम कम करने लगा हैं शारीरिक श्रम करने के कारण उसकी देह में विकार उत्पन्न होते है और वह तमाम तरह की बीमारियों की चपेट में आ जाता है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन भी रहता है। इसके अलावा जैसा भोजन आदमी करता है वैसा ही उसका मन भी होता है।

आज कई ऐसी बीमारिया हैं जो आदमी के मानसिक तनाव के कारण उत्पन्न होती है। इसके अलावा मांसाहार की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। मुर्गे की टांग खाने के लिय लोग बेताब रहते हैं। शरीर से श्रम न करने के कारण वैसे ही सामान्य भोजन पचता नहीं है उस पर मांस खाकर अपने लिये विपत्ति बुलाना नहीं तो और क्या है? फिर लोगों का मन तो केवल माया के चक्कर में ही लगा रहता है। आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान कहता है कि अगर कोई आदमी एक ही तरफ ध्यान लगाता है तो उसे उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसे विकास घेर लेते हैं। माया के चक्कर से हटकर आदमी थोड़ा राम में मन लगाये तो उसका मानसिक व्यायाम भी हो, पर लोग हैं कि भगवान श्रीराम चरणों की शरण की बजाय मुर्गे के चरण खाना चाहते हैं। यह कारण है कि आजकल मंदिरों में कम अस्पतालों में अधिक लोग शरण लिये होते हैं। भगवान श्रीराम के नाम की जगह डाक्टर को दहाड़ें मारकर पुकार रहे होते है।

अगर लोग शुद्ध हृदय से राम का नाम लें तो उनके कई दर्दें का इलाज हो जाये पर माया ऐसा नहीं करने देती वह तो उन्हें डाक्टर की सेवा कराने ले जाती है जो कि उसके भी वैसे ही भक्त होते हैं जैसे मरीज।
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Sunday, August 24, 2008

संत कबीर वाणी: परमात्मा को जाने वही है शिक्षित कहलाने योग्य

मैं जानौं पढ़ना भला, पढ़ने ते भल लोग
रामनाम सों प्रीति कर, भावे निन्दो लोग

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मैं पहले पढ़ना लिखना अच्छा समझता था पर अब तो ऐसा लगता है कि पढ़ने लिखने से तो योग साधना, ध्यान और भक्ति ही करना अच्छा है। रामनाम से प्रेम करना ही ठीक है चाहे लोग उसकी कितनी भी निंदा करें।
नहिं कागद नहिं लेखनी, निहअच्छर है सोय
बांचहि पुस्तक छोडि़के, पंडित कहिये सोय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि न तो उसके पास कागज है न कलम है और वह एकदम निरक्षर है पर अगर उसने भगवान से प्रेम कर लिया तो वह ज्ञानी हो गया। उसने पुस्तक पढ़ना छोड़ दिया हो पर अगर वह ध्यान करता है तो उसे ही विद्वान मान लेना चाहिए।

पढ़ी गुनी पाठक भये, कीर्ति भई संसार
वस्तु की तो समुझ नहिं, ज्यूं खर चंदन भार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि पढ़ लिखकर शिक्षित हो गये संसार में कीर्ति फैल गयी परंतु जब तक परमात्मा की समझ नहीं आयी तब सब व्यर्थ हैं। उसे तो यू समझना चाहिए जैसे गधे के ऊपर चंदन का तिलक लगा हो।
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Friday, August 22, 2008

संत कबीर वाणी:मन फटने पर कहीं ठिकाना नहीं मिलता

धरती फाटे मेघ मिलै, कपड़ा फाटे डौर
तन फाटे को औषधि, मन फाटे नहिं ठौर


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब पानी बरसता है तो फटी हुई धरती आपस में मिल जाती है और फटा हुआ कपडा डोरे से सिल जाता है और बीमार देह को औषधि से स्वस्थ किया जा सकता है पर अगर कही मन अगर फट गया तो उसके लिये कोई ठिकाना नहीं है।

बिना सीस का मिरग है, चहूं दिस चरने जाय
बांधि लाओ गुरुज्ञान सूं, राखे तत्व लगाय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यह मन तो तो बिना सिर के मृग की तरह है जो चारों तरफ भागता रहता है। इस पर नियंत्रण करने के लिये किसी ज्ञानी गुरू से तत्वज्ञान प्राप्त कर नियंत्रण करना चाहिए तभी जीवन का आनंद लिया जा सकता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या- सब भौतिक चीजों पर हम अपना नियंत्रण कर लेते हैं पर मन पर कोई नियंत्रण नहीं कर पाता। वह चारों तरफ आदमी की दौड़ाता है। अपने देहाभिमान के चलते हम कभी नहीं अनुभव कर पाते कि अकारण तमाम तरह की उपलब्धियों के लिये दौड़ लगा रहे हैं। भक्ति भाव से दूर रहकर हम अपने आपको बहुत तकलीफ देते हैं। कोई भौतिक चीज मिल जाती है तो उसे पाकर पुलकित हो उठते हैं पर जल्द ही उससे ऊब जाते हैं फिर किसी नयी चीज की तलाश में लग जाते हैं। फिर सब चीजों से ऊब जाते हैं उससे बचने के लिये निरर्थक बोलने लगते हैं तमाम तरह के स्वांग रचते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि हम अपने आपको धोखा देने लगते हैं।

हम अपने मन के साथ भागते हैं पर अपने अंदर बैठे जीवात्मा को नहंी देखते जो भगवान भक्ति के लिये ताकता रहता है। हम भटकते हुए ऐसे गुरूओं की शरण में जाते हैं जो स्वयं तत्वज्ञान से रहित हैं और किताबों से रटकर हमें सुनाते हैं। ज्ञान का मतलब रटने से नहीं है बल्कि उसे धारण करने से है। ऐसे में हमें निष्काम भाव से ज्ञान देने वाले गुरूओं की शरण लेकर अपने मन पर नियंत्रण करने का प्रयास करना चाहिए।
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Wednesday, August 6, 2008

संत कबीर वाणीःनिराश्रित के ग्राहक तो दीनानाथ होते हैं।

संसारी में प्रीतड़ी, सरै न एकौ काम
दुविधा में दोनो गये, माया मिली न राम


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस संसार में लोगों से प्रेम करने पर कए भी काम नहीं बनता। इससे न तो धन का लाभ होता है और न ही भक्ति प्राप्त होती है।

माया कू माया मिले, कर लम्बे हाथ
निस्प्रेही निरधार को, गाहक दीनानाथ


संत शिरोमणि कहते हैं कि जिसके पास माया होती है उसके पास और चली आती है। वह उसके यहां विस्तार लेती है। उसी तरह मायापति भी मायापतियों से संपर्क रखते हैं। जिनका कोई सहारा नहीं है और जो निस्वार्थ और निष्काम से कार्य करते हुए भक्ति में लीन रहते हैं उनके पास तो दीनानाथ स्वयं ग्राहक बनकर जाते हैं।
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Monday, November 12, 2007

चिल्ला कर शांति की कोशिश बेकार

जब किसी विषय पर एक से अधिक लोगों के मध्य विचार होता है तब असहमति भी होती है और होना भी चाहिए क्योंकि उससे ही किसी नए मत के निर्माण की संभावना होती है। जब कोई अपना विचार किसी विषय पर व्यक्त इस उद्देश्य से करता है कि लोग उसकी बात को माने तो उसे इस बात के लिए भी तैयार रहना चाहिऐ कि उस पर कहीं सहमति तो कहीं असहमति होगी-और उसे दोनों पर दृष्टि रखते हुए ही अपने विचार का पुन:निरीक्षण भी करना चाहिए। पर ऐसा होता नहीं है। जिन लोगों के पास पद, प्रतिष्ठा और पैसा होता है उन्हें कभी कोई चुनौती स्वीकार्य नहीं है। जिनके पास अपने विचार व्यक्त करने के साधन है वह किसी असहमति को सुनने को तैयार नहीं होते और यहीं से शुरू होता है संघर्ष। विचारों का यह संघर्ष अनंतकाल से चल रहा है और आज तक कोई एक धारा- जिससे इस धरती पर शांति और विश्वास स्थापित हो सके-नहीं बह सकी।
कहते हैं कि झूठ मत बोलो पर बोलते सभी हैं। कहते हैं जीवन में आराम नहीं काम करना चाहिए पर आराम की तलाश सभी कर रहे हैं। दूसरे को सुख दो तो सुख मिलेगा और दुख दोगे तो वह भी तुम्हारे हिस्से में आयेगा, पर वास्तविकता में सभी अपने सुख जुटाने में लगे हैं और अवसर पाते ही दूसरे को दुख देते हैं। ज्ञान बघारने को सब तैयार पर चलने को तैयार नहीं है। आदमी का अहंकार उसे कभी अपने विचार से पीछे नहीं हटने देता। मानसिक अंतर्द्वंद में फंसा आदमी कभी भला किसी को सुख दे सकता है? रचना से अधिक विध्वंस में उसकी रूचि होती है। कहीं शांति हो उसका ध्यान नहीं जाता जहाँ द्वंद हो वहाँ वह मन और तन के साथ उपस्थित होने में उसे बहुत आनन्द आता है।
मेरा विचार सब माने-यह विचार हर आदमी का है। असहमति उसे उतेजित कर देती है और वह लड़ने पर आमादा हो जाता है। इस पूरे विश्व में तमाम तरह के वर्ग, जातियाँ, धर्म और भाषाएं हैं उनके आधार पर मनुष्यों ने अपने को अलग-अलग समूहों में बाँट लिया है, और इन समूहों के आपसी संघर्ष से इतिहास भरा पड़ा है । कहते हैं हम यह हैं और तुम वह हो ।कही लड़ते हैं तो कहीं एकता की बात करते हैं। यह दोनों ही बाते भ्रम हैं क्योंकि कहीं जब एकता की चर्चा होती है तो सब अपनी गाते हैं और इसमें असहमति है और फिर बात इस निष्कर्ष पर ख़त्म होती है कि समूहों में एकता क्यों होना चाहिए? कहीं कहीं तो शांति और समझौते के लिए एकत्रित लोग पहले से और झगडा करने लगते हैं।
कहते हैं शांति के लिए आपस में संवाद करेंगे पर निष्कर्ष आखिर निकलता है की शांति क्यों हो? क्योंकि लडाई हो रही है? आदमी हमेशा अपने मन में विचारों का अंतर्द्वंद पाले रहता है जब वह शांत रह नहीं रह सकता समाज कैसे शांत रह सकता है। समाज भी तो आदमी की इकाई से बना है।
भला अशांत मन कभी शांति ला सकते हैं। सहज नहीं होना चाहते बल्कि शांति चाहते हैं। हम चिल्लायें और बाकी लोग शांत हो जाएँ। हम कहें उसे सब माने और शांत हो जाएँ। कहीं लडाई विचारों की तो कहीँ शांति के लिए है। असहमति को खत्म करने के लिए सहमति बना रहे हैं और अधिक असहमत होते जा रहे हैं। भला सहमत हुए बिना भी कभी सहमति बन सकती है। अपने विचारों में बदलाव के बिना कभी हम जब किसी से सहमत नहीं हो सकते तो दूसरा कैसे हो जायेगा कभी सोचा है।

Sunday, November 11, 2007

घर में टीवी पर है क्रिकेट देखने का मजा

हमारे बुजुर्ग कहते हैं कि जब तक जरूरी न हो जहाँ भीड़ हो मत जाओ, क्योंकि उसमें समय नष्ट होता है और अकारण शारीरिक परेशानी भी झेलनी पड़ती है। मगर आजकल लोग वहीं भागते हैं जहाँ भीड़ होती है। बात क्रिकेट की कर रहा हूँ। कहीं भी मैच होता है वहाँ भारी संख्या में लोग पहुँचते हैं। होता यह है कि कई लोगों को टिकिट होने के बावजूद अन्दर प्रवेश नहीं मिल पाता-और धक्के खाकर उनको घर लौटना पड़ता है।
मैंने जितनी क्रिकेट मैदान पर खेली है उससे अधिक रेडियो पर सुनी और टीवी पर देखी है। मैदान पर ऐसे मैच देखे हैं जो अंतर्राष्ट्रीय नहीं थे और अगर थे तो अनौपचारिक और जिनमें प्रवेश मुफ्त था। एक बार एक अंतर्राष्ट्रीय एक दिवसीय मैच मैदान पर देखने का भूत सवार हुआ और हमने अपने पैसे से टिकिट खरीदी और सुबह आठ बजे घर से मैदान की तरफ रवाना हुए। वहाँ देखा तो होश फाख्ता हो गए-सभी गेटों पर घुसने वालों की लाइन लगी हुई थी और चूंकि पैसे खर्च चुके इसलिए लाइन में लग गए। इतनी बड़ी लाइन हमने कभी राशन की दुकान पर भी नहीं देखी थी। बहरहाल मैच शुरू हो चुका था और भारत की बैटिंग पहले थी और भारतीय बल्लेबाजों द्वारा रन जुटाने पर स्टेडियम के अन्दर मौजूद दर्शकों की हो-हो की आवाज हमारे कानों में गूंग रही थी और हमें पहली बार लगा कि हम पूरा मैच देखने से चूक रहे हैं। घर पर टीवी पर मैच पहली गेंद से ही देखते थे और कहाँ यह पता ही नहीं लग रहा था कि क्या स्कोर चल रहा है।
जब हम किसी तरह अन्दर पहुचे तो बीस ओवर का मैच निकल चुका था। हमने अपने लिए बड़ी मुश्किल से बैठने की जगह ढूंढी। मैच देखना शुरू किया तब लगा ही नहीं कि मैच देख रहे हैं। बल्लेबाज आउट हुआ तो यह पता ही नहीं लगता कि सही आउट हुआ या गलत-क्योंकि वहाँ रिप्ले देखने की वहाँ कोई व्यवस्था नहीं थी। भारत की इनिंग ख़त्म हुई तो हम बाहर गए। पानी के लगी टंकियों पर भारी भीड़ थी। चाय के ठेलों पर जो चाय मिल रही थी वह दूने दाम पर और बेकार- यह पहले पी चुके लोगों ने बताया। उस समय पानी के पाउच का सिस्टम शुरू नहीं हुआ था। अब तो हमारी हालत बिगडी। एक बार ख्याल लाया कि घर वापस लौट जाएं पर फिर पैसे खर्च कर घर जाकर देखना गवारा नहीं हुआ।

स्टेडियम में वापस लौटे। फिर मैच शुरू हुआ तो अपनी तकलीफे मन से गायब हो गईं-पर मैच समाप्त होते-होते वह फिर परेशान करने लगीं। भारत वह मैच हारा तो हम भी अपने को हारा अनुभव करने लगे। पैसे खरीद कर देखा गया वह हमारा पहला और आखिरी मैच रहा। इसके कम से कम पांच वर्ष और बाद और छः वर्ष पहले फ्री में वहाँ कुछ मैच देखने गए। एक बार दक्षिण अफ्रीका और भारत के युवाओं का मैच देखने गए। दूधिया रोशनी में खेले गए मैच में बड़ा आनंद आया। लोग भी परिवार समेत ऐसे आ-जा रहे थे जैसे कि पार्क में आ रहे हों। पुलिस किसी को आने-जाने से नहीं रोक रही थी। परिवार सहित उस मैच का कुछ देर आनंद लेकर हम घर लौट आये। ऐसी तसल्ली से मैच देखना अब कहीं संभव नहीं है। अब लोग जिस तरह इन मैचों को देखने के लिए टूट रहे हैं उससे तो लगता ही नहीं है कि देश में कोई गंभीर समस्या है। टीवी पर उनके साक्षात्कारों में उनकी तकलीफ देखकर कोई सहानुभूति भी नहीं होती। जिस मैच को घर पर आसानी से और रिप्ले के साथ देखा जा सकता है उसके लिए धक्के खाने जाने वालों के साथ कैसी सहानुभूति? समाचार देने वाले इसे संवेदनशील बनाने की करते हैं पर मुझे नहीं लगता कि उसकी कोई लोगों पर प्रतिक्रिया होती है। क्योंकि कई जगह ऐसा हो चुका है और लोग देखते हुए भी अगर इसका अनुमान नहीं कर चलते तो क्या कहा जाये?
सच तो यह है की जितना मजा घर पर मैच देखने में आता है हमें मैदान पर कभी नहीं आया। फिर आजकल तो वातावरण में गर्मी भी अधिक है और मैदान में अपना पसीना बहाने से कोई फायदा नजर नहीं आता।

Thursday, November 8, 2007

दूध की नदी तो अब भी बह रही है

आज एक टीवी चैनल पर रसायनों से दूध बनाने के संबंध में एक रिपोर्ट प्रसारित की गयी जा रही थी। कपडे धोने की सोडा, नकली आयल तथा अन्य खतरनाक वस्तुएं नकली दूध बनाने के लिए इस्तेमाल हो रहीं थीं। शरीर को भयानक हानि पहुँचाने का यह कार्यक्रम बाकायदा कैमरे में रिकार्ड किया और दुष्कर्म करने वाले अपने बयान इस तरह दे रहे थे जैसे उनके लिए आम बात हो।

वैसे सिंथेटिक दूध बनाकर बेचने की बात कोई नई नहीं है और उसके खतरनाक होने की बात भी कही जाती रही है पर अब यह एक संगठित उद्योग बन गया है। सबसे बड़ी बात यह है की यह अब उन गावों में खुलेआम होने लगा है जिन्हें भारतीय समाज का मुख्य आधार माना जाता है। वैसे दीपावली के आते कई कार्यक्रम ऐसे प्रसारित हुए हैं जो भयभीत तो करते हैं पर मन में चेतना भी लाते हैं। नकली खोये की भी चर्चा बहुत हो रही है और उसकी जगह अन्य स्वीट-जैसे छेने की मिठाई और फल आदि-के इस्तेमाल का सुझाव दिया जा रहा है। विशेषज्ञ शहरों में बिक रही खोये की मिठाई और वहाँ के दुग्ध उत्पादन की मात्रा के आंकडे देकर यही कह रहे हैं की बहुत बडे पैमाने पर नकली खोये की मिठाई बिक रही है। नकली और मिलावट वस्तुओं का मिलना कोई बड़ी बात नहीं थी पर अब उसका अनुपात इतना बढ गया है कि असल और शुद्ध का अस्तित्व ढूंढना कठिन हो गया है।

वैसे तो इस धरती पर धर्म के साथ अधर्म,सच के साथ झूठ और शुद्ध के साथ अशुद्ध, विष के साथ अमृत और असल के साथ नकल रहा है पर जब सहअस्तित्व के साथ। समाज में अच्छे के साथ बुरा भी होता है पर अब तो शुद्धता को जिस तरह अस्तित्व के संकट में डाल दिया गया है उससे भारी चिंता हो रही है।

महात्मा गांधी कहते थे की असल भारत तो गाँवों में रहता है-और टीवी पर प्रसारित कार्यक्रम में देखा जाये तो यह सब गाँवों में हो रहा है मतलब असल भारत जहाँ दूध की नदियाँ बह रहीं थीं वहाँ अब विष की नदियाँ बहने लगीं हैं। कहा जाता है की गाँवों में अभी शुद्ध वायु और खाने-पीने की सामग्री मिलती है रिपोर्ट उसका खंडन करती है। वैसे गाँवों में गरीबी बहुत है पर लगता है ऐसे कामों से वह दूर हो जायेगी। देश में आबादी बढ़ी है, कृषि योग्य और पशुओं के लिए चरनोई की जमीन कम होती जा रही है-और जहाँ है भी तो उसमें मेहनत अधिक और आय काम होती है- ऐसे में बिना पशुओं के और कम मेहनत के नकली दूध और खोवा बनाकर आय ज्यादा अर्जित करना बहुत आसान है।

याद रखने वाली बात यह है की यह दूध बाजार में बिकता है और लोग इसे पीते हैं। बच्चों को दूध पिलाकर उन्हें भविष्य के एक विजेता बनाने के सपने देखे जाते हैं, पर यह दूध तो उनके स्वास्थ्य के लिए ही बडा संकट है इसलिए ही आजकल छोटी उम्र में बड़ी बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। शीत पेय कंपनियों पर अपने उत्पाद में कीटाणु नाशक तय मात्र से अधिक डालने का आरोप लगा तो कई समझदार लोगों ने युवाओं को दूध पीने की सलाह दी थी पर ऐसी रिपोर्ट देखकर क्या सलाह देंगे? दूसरा सहारों में मिलावट और नकली सामान बेचने की जो बीमारी थी वह अब गावों में भी पहुंच गयी है-मतलब असल भारत के सामने अब नकली भारत भी चुनौती के रूप ने खडा है। आशय यह की नैतिकता और सदाशयता का भाव अब हमारे रक्त में कम होता जा रहा है। जब दूध में ऐसे विष होगा तो खून में क्या होगा यह आसानी से समझा जा सकता है। हमारे देश के बारे में कहा जाता था की यहाँ कभी दूध की नदियाँ बहती थीं-बह तो अब भी रही हैं पर असली नहीं नकली दूध की वह भी विष लिए हुए।

Sunday, November 4, 2007

संत कबीर वाणी:शराब आदमी को पशु बना देती है

जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय
यह आपा तो दल दे, दया करे सब कोय

संत शिरोमणि कबीरदास जे कहते हैं की अगर व्यक्ति के मन में शांति है तो उसका कोई बैरी नहीं है, और वह घमंड करना छोड़ दे तो सब उस पर दया करेंगे।
अवगुण कहूं शराब का, आप अहमक साथ
मानुष से पशुआ कर दे, गाँठ से खात

संत शिम्रोमानी कबीरदास जी कहते हैं के शराब पीकर आदमी अपने आप पागल हो जाता है, मूर्खो और पशुओं जैसा व्यवहार करता है अपनी जेब से पैसा खर्च करता है सो अलग।

बाजीगर का बांदरा, ऐसा जीव मन के साथ
नाना नाच दिखे कर, राखे अपने साथ

कबीर दास जी कहते हैं की जिस तरह बाजीगर का अपने बन्दर से तरह-तरह के नाच दिखाकर अपने साथ रखता है उसी तरह मन भी जीव के साथ है वह भी जीव को अपने इशारे पर चलाता है।

Saturday, November 3, 2007

संत कबीर वाणी:कलि का स्वामी लोभिया

कलि का स्वामी लोभिया, पीतलि भरी खटाइ
राज-दुबारा यौं फिरै, ज्यूँ हरिहाई गाइ

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कलियुग के स्वामी बडे लोभी हो गए हैं और उनमें विकार आ गया है, जैसे पीपल के बल्टोई में खटाई रख देने से आता है। राज द्वारों पर ये लोग मान-सम्मान पाने के लिए घुमते हैं रहते हैं, जैसे खेतों मैं बिगडैल गायें घुस आती हैं।

स्वामी हवा सीतका, पिलाकर पचास
राम-नाम काठे रह्मा, करै सिपां की आँस

कविवर कबीरदास जी कहते हैं कि स्वामी आज-कल मुफ्त में, या पैसे के पचास मिल जाते हैं, मतलब यह कि सिद्धिया और चमत्कार दिखाने वाले स्वामी और बाबा बहुत है। राम नाम को तो रख देते हैं किनारे और शिष्यों से लाभ की आशा करते हैं।

Thursday, November 1, 2007

कभी-कभी ऐसा भी समय आता है

कभी दिन खराब हो सकता है और तो कभी समय! ऐसे में दिमाग मी तनाव आता है पर अगर हम मान लें की जब अच्छा समय नहीं रहा तो बुरा समय भी नहीं रहेगा तो अपने अन्दर आत्मविश्वास उत्पन्न हो जाता है।

हुआ यूं कि एक शाम मैं एटीएम से पैसे निकालता भूल गया। रात को एक बार ख्याल आया कि जाकर पैसे निकाल लाऊँ पर फिर आलस्य आ गया। आज सुबह जब मैं घर से निकला तो मेरे में ढाई सौ रूपये थे। स्कूटर पर मैं अपने काम से इधर-उधर चलता गया। कई जगह एटीएम मिलने के बावजूद यह सोचता रहा कि अभी तो मेरे पास समय है और काम समाप्त करने के बाद निकाल लूंगा। होते-होते शाम हो गई और घर वापस लौटने का समय हो गया और फिर मैं एक एटीएम में गया तो वहाँ भीड़ थी। तब मुझे ध्यान आया कि आज एक तारीख को वेतन आदि के भुगतान का समय होने के कारण भीड़ अधिक रहती है। अब मेरा माथा ठनका। मैं अन्य भी एटीएम पर गया पर पर सब जगह भीड़ थी। आखिर एक एटीएम पर मन मसोस कर रुकना पडा सोचा-'आज पैसे निकालना जरूरी है, अब जितनी बडी लाइन है उसमें लग ही जाता हूँ।

वहाँ एक बार तो एटीएम मशीन लोगों के कार्ड को तो स्वीकार नहीं कर रहा था और दूसरी बार पर करने पर ही काम चल रहा था। लोग पैसे क्या निकाल रहे थे। कहा जाये कि जूझ रहे थे। कुछ लोगों ने अपने नोट गिने तो पांच-पांच सौ से नोट भी पन्नी से जुडे हुए थे। मतलब वह कटे-फटे नोटों की श्रेणी के थे पर एटीएम से निकल रहे थे। अब मेरा माथा ठनका। हालांकि लोग कह रहे थे कि 'बाद में बैंक इसे बदल देगा।'

अब समस्या थी कि उस एटीएम के रास्ते पर मेरा प्रतिदिन का आना-जाना नहीं होता। भला मैं कब वहाँ नोट बदलवाने आता? मैंने निर्णय लिया कि अब तो कल ही पैसे निकाल लूंगा। अपने स्कूटर पर वहाँ भी चल पडा। एक रास्ते पर मैं उलटा चल पडा और इसकी वजह से पडा और थोडा रास्ता तय किया तो सामने से आ रहे ट्रैफिक में फंस गया और आगे ट्रेफिक वैन मैं कि खडे देखा। मुझे लगा कि वहाँ से किसी की मुझ पर नजर पड़ सकती है इसलिए तत्काल एक नमकीन की दुकान की तरफ मुड़ गया ताकि किसी ने देखा हो उसको लगे के मैं वहाँ कुछ खरीदने के रुका हूँ। स्कूटर खडा कर उससे आधा किलो नमकीन खरीद लिया जिसमें मुझे चालीस रूपये खर्च करना पडा। अब मैं वहीं से स्कूटर लेकर निकला सीधे रास्ते चला। थोडा आगे चला तो स्कूटर का साइलेंसर खराब हो गया और वह भयानक आवाज करने लगा। किसी तरह तीन किलोमीटर चलने पर एक मैकनिक मिला। उससे वह स्कूटर ठीक कराया। जब स्कूटर खराब हुआ तो मैं सोच रहा था कि काश मेरे पास अधिक पैसे होते! हालांकि थोडी देर के तनाव आया पर मैं जल्दी अपने पर यह सोचकर नियंत्रण पाया कि" आखिर समय और दिन है। कभी-कभी ऐसा भी हो जाता है-"।

जो बात मेरे मन में आई और उस पर मैं स्वयं भी मुस्काया कि'पैसे का महत्त्व है या नहीं यह अलग चिंतन का विषय है पर इसमें कोई शक नहीं है कि वह आदमी के लिए आत्मविश्वास का बहुत बड़ा स्त्रोत होता है, इसलिए अपनी जेब पर भी नजर रखना चाहिए कि वह उसमें पर्याप्त मात्रा में हो।

Thursday, October 11, 2007

मनु स्मृति: राज्य के दण्ड से ही अनुशासन संभव

  1. देश, काल, विद्या एवं अन्यास में लिप्त अपराधियों की शक्ति को देखते हुए राज्य को उन्हें उचित दण्ड देना चाहिए।
  2. सच तो यह है कि राज्य का दण्ड ही राष्ट्र में अनुशासन बनाए रखने में सहायक तथा सभी वर्गों के धर्म-पालन कि सुविधाओं की व्यवस्था करने वाला मध्यस्थ होता है।
  3. सारी प्रजा के रक्षा और उस पर शासन दण्ड ही करता है, सबके निद्रा में चले जाने पर दण्ड ही जाग्रत रहता है।
  4. भली-भांति विचार कर दिए गए दण्ड के उपयोग से प्रजा प्रसन्न होती है। इसके विपरीत बिना विचार कर दिए गए अनुचित दण्ड से राज्य की प्रतिष्ठा तथा यश का नाश हो जाता है।
  5. यदि अपराधियों को साजा देने में राज्य सदैव सावधानी से काम नहीं लेता, तो शक्तिशाली व्यक्ति कमजोर लोंगों को उसी प्रकार नष्ट कर देते हैं, जैसे बड़ी मछ्ली छोटी मछ्ली को खा जाती है।
  6. संसार के सभी स्थावर-जंगम जीव राजा के दण्ड के भय से अपने-अपने कर्तव्य का पालने करते और अपने-अपने भोग को भोगने में समर्थ होते हैं ।

Friday, April 6, 2007

जीं हाँ, मैं बबूल को भी सहलाता हूँ!

कहा जाता है बोए पेड बबूल के तो आम कहॉ से होय। यह कहावत अपने आप में बहुत बड़ा दर्शन है इसमें कोई संदेह नहीं है , पर केवल इसी बात को लेकर बबूल से नफ़रत करना मुझे कभी नहीं अच्छा नहीं लगता। वजह! बबूल के सहारे ही उन पेड-पोधों की रक्षा की जाती है जिनके आवारा पशुओं द्वारा खाए जाने का खतरा रहता है। जहाँ भी कोइ पेड लगाया जाता है तो उसके चारों और बबूल की झाडियाँ रख जाती हैं है ताकी कोई पशु न खा सके।
मुझे याद है जब हमने कालोनी में मकान बनाया था तब एक संस्स्था द्वारा पूरी कालोनी में तमाम तरह के पेड-पोधे लगाए गए। हमारे घर के बाहर दो पोधे लगाए गए । हमने उनको दोतीन पानी दिया । एक दिन देखा कि गाय ने एक पौधा खा लिया है। तब वहां से एक मजदूर निकल रहा था। उसे हम जानते तक नहीं थे। उसने उस गाय को वहां से हटाया और हमें आवाज़ दीं। हम पति-पत्नी बाहर निकल आये। उसने गाय द्वारा एक पौधा खाने की जानकारी दीं और सुझाव दिया कि ' इस पौधे की रक्षा के लिए उसके चारों तरफ बबूल की डालियाँ लगा दें। हमारी श्रीमतीजी ने उससे कहीं से बबूल की डालियाँ लाने को कहा तो वह हंसकर बोला-"यहां बबूल की क्या कमी?"
ऐसा कहकर वह वहन से चला गया और थोडी दूर जाकर बबूल की डालियाँ ले आया और उसने उसके चारों और इस तरह लगा दीं कोइ पशु उसे न खा सके। उसके बाद हमने देखा वय पौधा फल-फूलकर एक वृक्ष के रुप में आज भी हमें शुद्ध प्राणवायु प्रदान करता है। एक गुरूजी की सलाह पर हमने अपनी ज़िन्दगी से तनाव और संभावित बिमारियों से बचने के लिए पांच वर्ष पूर्व हमने योग्साधना शुरू की। हमने देखा जब कभी हमें सुबह उठने में देरी हो जाती है तब जब हम उस पेड के नीचे बैठाकर योगासन और प्राणायाम करते है तो यह साफ समझने में आता है कि इस पेड की वजह से ही हमें शुद्ध वायू मिल रही है। फिर याद करता हूँ उस बबूल की डालियों और उसे लाने वाले उस मजदूर को जिसे न हमने पहले देखा और न उससे बाद। दोनों पेड भगवान् की तरह थे- जिन्होंने उसे जीवन दिया। फिर में सोचता होंन कि बबूल के पेड को उससे जिस दुर्गुण की वजह से सम्मान नहीं दिया जाता वही उसका गुन भी तो है वरना वह पेड की रक्षा कैसे करत। फिर मैं उस मजदूर के बारे में सोचता हूँ। लोग गरीबों को हे द्रष्टि से देखते हीं, पर अगर वह मजदूर गरीब न होता तो पैदल नहीं निकलता और हमारे पोधे की रक्षा का वह प्रयास नही करता। यकीनन कोइ स्कूटर, मोटर सायकल या कर में चलने वाला इस पच्दे में नहीं पडता।
वैसे भी मैं कभी बबूल से नफरत नहीं करता। में जनता हूँ कि चुभाना उसका गुन है। इसी तरह यहां किसी में गुन या अवगुण नहीं होता। देखने का हमारा नज़रिया होता है। हमें उस पर विचार करना चाहिऐ। दोष हमें अपने विचार में नहीं रखना चाहिऐ । हमारी द्रष्टि में दोष होता है जो हमें किसी में दोष दिखाता है। जब हम अपने विचारों को साफ करेंगे तब हमें किसी में दोष दिखाई नहीं देगा। इसीलिये मैं कभी बबूल से भी नही चिढ़ता। जब कही उसकी डाली मेरे सामने आ जाती है तो उसे सहलाता हूँ उससे बीच काँटों में उंगली रखकर - मैं यह नही भूल सकता कि उसने मेरे घर के बाहर लगे पेड की रक्षा की थी।

Thursday, April 5, 2007

मैं करोड़पति नही बनना नहीं चाहता

मैं कोई मोबाइल फोन नहीं खरीदना नहीं चाहता था। एक पुराना फोन होने के बावजूद लोगों ने फोन करना ही बंद कर दिया। कहते थे कि लैंड लायन फोन पर मोबाइल से बात करना महंगा पडता है। घर पर भी दबाव बढने लगा तो हमने सोचा कि इस तरह तो सारे मित्रों और रिश्तेदारों से कट जायेंगे । और दुनियां भर के खर्च तो हो ही रहे हैं क्यों न एक सिरदर्द और बड़ा लें ताकि अपने लोगों यह कहने का अवसर न मिले यार हमने तुम्हें घर पर फोन किया था तुम थे नहीं। शादी पर बुलाना भूल गये और बहाना यह कि तुम्हें फोन किया था पर लग नहीं रहा था। मकान के मुहूर्त पर नहीं बुलाया बहना वही तुम्हें फोन पर बुलाया था।
एक दिन ताव आ गया और हमने मोबाइल फोन खरीद लिया । हमे फोन की ज्यादा ख़ुशी नहीं थी क्योंकि एक तरह से वह हम पर थोपा गया था। जिन लोगों ने फोन रखने को प्रेरित किया था वह नाटकीय ढंग से प्रसन्नता व्यक्त करने लगे । कहने लगे कि -'यार मिठाई खिलाओ।
हमने कहा-'' भयी जब तुमने खरीदा था तब तो तुमने कोइ मिठाई नहीं खिलायी । आज हमसे क्यों माँग रहे हो?
कहने लगे हमने -"हमने तो महंगा खरीदा था तुमने सस्ता खरीदा है, हम तो लुट गये थे। मिठाई कहॉ से खिलते .''
बहरहाल ऐसा कहने वाले कहते रहे और हमने किसी को मिठाई नहीं खिलायी ।
इसमें खुश होने जैसी कोइ बात नही थी । बहुत जल्द हमें फोन एक बोझ लगने लगा । समस्या यह नहीं है कि उसे रखने से कोइ हमें तंग कर रहा है। हमें परशानी तो उन कालों से है जो हमें करोड़पति बनाने का प्रस्ताव देते हैं। पिश्ले दो महीने में हमें उन लोगों ने कोइ फोन नहीं किया जो इसके लिए हमने उकसाते रहे , हाँ हमें ऐसे कालों से परेशान है जो हमें तमाम तरह के प्रलोभन दे रहे हैं। हमने मोबाइल फोन लिया ही था कि क्रिकेट .का मौसम शुरू हो चुका था तो ऐसे काल आनी लगे थे कि जवाब दो इनाम्म जीतो या लाइव स्कोर जानने के लिए लोड करें । हमने देख लिया था कि ओप्शन बटन दबाने का मतलब है नब्बे रुपये से टोक टाइम् कम करना । यह तो भला हो टीम इंडिया का जो उसने जल्दी बाहर आकर इस संकट से बचा लिया।
इधर कंप्यूटर में भी स्पैम में कई ऐसे संदेश रखे हैं। इस हिसाब से तो मुझे एक माह में ही करोड़पति बन जाना चाहिये । पर जनाब मैं करोड़पति बनना ही नहीं चाहता। लोग पता क्यों नहीं बिना सोचे समझे मुझे करोड़पति बनाना । यह दौर चल रहा है उससे तो ऐसा लग रहा है कि हमारे देश में देश में करोड़पति का जमघट लगाने वाला है। हालांकि देश का विकास चाहने वालों को यह अच्छा लगे, पर मैं जनता हूँ कि जो कम्पनियाँ अपने यहां कार्यरत युवकों को मामूली वेतन देने से कतराती हैं वह मुझे क्या करोड़पति बनाएँगी। वैसे भी मुझे करोड़पति बनना होता तो यह लेखन के रस्ते पर क्यों चलता॥

Wednesday, April 4, 2007

क्रिकेट पर एक फालतू संपादकीय

आख़िर सचिन प्रकट हो गये। उनके भक्त उन्हें भारत के विश्व कप से बाहर होने के बाद से से ढूँढ रहे थे। उन्हें भी इंतज़ार था कि कब मोका मिले और बयाँ देकर यह जटाएं कि भईया हम अभी क्रिकेट खेलेंगे। वह ग्रेग चैपल के ऐसे बयाँ पर प्रतिक्रिया देने के लिया बाहर आये जिसकी पुष्टि होना बाकी है कि वह उन्होने दिया भी कि नहीं। यह बयां टीवी और अखबारों में प्रकाशित हुआ था। ऐसा लगता है कि सचिन के ऐसे भक्त पत्रकारों ने लीक करवाया जो उन्हें बाहर आने का अवसर देना चाहते थे । उनकी मदद क्रिकेट से जुडे ऐसे लोगों ने की जिनके हाथ वह रिपोर्ट हाथ लग गयी जिसमें उन्होने सचिन सहित पांच खिलाड़ियों को अनुशासन हीनता में लिप्त बताया था।
ऐसा लगता है कि बोर्ड केलोगों ने शायद विदेशी कोच इसलिये रखा था कि बडे नाम वाले इन खिलाड़ियों को तो हटा नहीं सकते क्यौंकी इनके आका सभी जगह बैठें हैं और क्रिकेट उनके पैसे या ताकत के बिना चल भी नहीं सकता।
एक बात और है कि भारतीय टीम की ऎसी दुर्दशा का अंदेशा उन्हें पहले से ही था यही वजह थी कि उन्होने विदेशी कोच रखा ताकी खिलाडी उस पर बरस कर देश के लोगों का ध्यान बँटा सकें।
मैं सचिन के इस बयां के बाद टीवी चैनलों पर उनके समर्थक खेलप्रेमियों के संदेश देखकर यह समझ सकता हूँ कि अब लोगों के जज्बातों से खेलने का दूसरा दौर शुरू हो चूका है। सचिन जिस तरह बाहर आया है वह उसकी अपनी योजना का हिस्सा नहीं हो सकता। कल जब मैंने चैपल का बयां देखा था तभी यह समझ में आ गया था कि अब देशी विदेशी का मामला बनेगा। सचिन अभी भी यह सोच रहे हैं कि लोगों के वह हीरो हैं तो अपनी गलतफहमी दूर कर लें । काठ की हांडी एक बार चढ़ती है वह तो भाग्शाली हैं कि चार बार इसे चार बार चडा गये। अब कहते हैं कि मैंने देश के लिया बहुत क्रिकेट खेली है। क्रिकेट मेरा जीवन है , इसके द्वारा मैंने देश की भारी सेवा की है।
हम उनका हर दावा मान लेते हैं। पर हमारा कहना है कि आप अब दुसरे खिलाड़ियों को अवसर देने के लिए वहन से हटने की घोषणा क्यों नहीं कर देते/ जाहिर है वह ऐसा नही करेंगे क्योंकि उनके लोगों ने बढ़ी कठिनाई से उन्हें जनता के सामने आनी का मौका बनाया है इसीलिये नही कि वह सन्यास ले लें ।
बहुत कम लोगों का ध्यान इस तरफ जाएगा कि अभी भी एक मौका और आने वाला है टीम इंडिया की लुटिया डुबोने का। अभी कुछ दिनों में दखिन अफ्रीका में बीस-बीस ओवेरों का एक विश्वकप होने वाला है। यह उसकी तैयारी है। एक बात और बता दूं एक दिवसीय क्रिकेट के समय बीट गया। अब बीस-बीस ओवेरों का समय आने वाला है। अपने सचिन भईया अ ब उस पर अपनी द्रष्टि जमाये हुए हैं। उनके साथ जुडे लोगों को अभी भी उन पर भरोसा है। इस समय जो विज्ञापन आऊट देतेद हो गये भारतीय टीम के बाहर होने से वह उस समय काम आएंगे।

Sunday, April 1, 2007

क्षणिका, छोटी कविता, हंसिकाएं और कुछ रुलायें

कभी पूजे जाते थे जो देवताओं की तरह
आज मुहँ छिपाये घूम रहे हैं वह
सच कहते हैं क्रिकेट भी जुआ है
लग गया तो पोबारह
नहीं लगे तो एक पाँव
रखने के लिए नहीं मिलती जगह
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लो आगया वादों का मौसम
चुनाव में वोट देने का मौसम
तुम अब अपने कान बंद कर लो
आंखों से देखना बंद कर लो
झूठा वादा
कभी पूरा न हो सकने वाले सपना
यही परोसा जाएगा तुम्हारे सामने
फिर भी तुम अपने मूहं से
सत्य कह नही पाओगे
अपनी जुबान खुद बंद रखोगे
बेहतर है बुला लो
खामोशी का मौसम
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वह क्रिकेट में देश की हार पर
नहीं शरमाते हैं
कहते हैं हार तो इंडिया की हुई है
हम तो भारत कहलाते हें
जीते तो इंडिया भी हमारा है
नहीं तो भारत ही हमारा है
जिसकी नही होती कभी हार
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