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Saturday, December 15, 2007

मनुस्मृति:बिडाल, बक और अज्ञानी को दिया दान फलदायक नहीं

न वार्यपि प्रयच्छेतु बैडालव्रतिके द्विजे
न बकव्रतिके विप्र नावेदविदी धर्मवित

धर्मं ज्ञाता को ऐसे किसी ढोंगी साधू को पानी तक नहीं पिलाना चाहिऐ जो दूसरों को मूर्ख बनाकर लूटते हैं या जो ऊपर से साधू दिखते हैं पर उनके मन में दुष्ट भाव होता है और धर्म के ज्ञान से रहित होते हैं।

त्रिष्वप्येतेषु दत्तं ही विधिनाsप्यर्जितं धनम्
दातुर्भावत्यांर्थय परत्रादातुरेव च


इन तीनों तरह के लोगों (बिडाल वृत्ति वाले अर्थात दूसरों को मूर्ख बनाकर लूटने वाले, बक वृति वाले अर्थात ऊपर से दुष्ट और वेद ज्ञान से रहित) को न्याय तथा धर्म से कमाया दान देने और लेने वाले को नरकगामी बनता है.

Thursday, October 11, 2007

मनु स्मृति: राज्य के दण्ड से ही अनुशासन संभव

  1. देश, काल, विद्या एवं अन्यास में लिप्त अपराधियों की शक्ति को देखते हुए राज्य को उन्हें उचित दण्ड देना चाहिए।
  2. सच तो यह है कि राज्य का दण्ड ही राष्ट्र में अनुशासन बनाए रखने में सहायक तथा सभी वर्गों के धर्म-पालन कि सुविधाओं की व्यवस्था करने वाला मध्यस्थ होता है।
  3. सारी प्रजा के रक्षा और उस पर शासन दण्ड ही करता है, सबके निद्रा में चले जाने पर दण्ड ही जाग्रत रहता है।
  4. भली-भांति विचार कर दिए गए दण्ड के उपयोग से प्रजा प्रसन्न होती है। इसके विपरीत बिना विचार कर दिए गए अनुचित दण्ड से राज्य की प्रतिष्ठा तथा यश का नाश हो जाता है।
  5. यदि अपराधियों को साजा देने में राज्य सदैव सावधानी से काम नहीं लेता, तो शक्तिशाली व्यक्ति कमजोर लोंगों को उसी प्रकार नष्ट कर देते हैं, जैसे बड़ी मछ्ली छोटी मछ्ली को खा जाती है।
  6. संसार के सभी स्थावर-जंगम जीव राजा के दण्ड के भय से अपने-अपने कर्तव्य का पालने करते और अपने-अपने भोग को भोगने में समर्थ होते हैं ।

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