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Saturday, September 13, 2008

संत कबीर वाणीः शराब तो इंसान को पशु बना देती है

औगुन कहूं सराब का, ज्ञानवंत सुनि लेय
मानुष सों पसुवा करै, द्रव्य गांठि का देय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि शराब में ढेर सारे अवगुण हैं। ज्ञानी लोगों को यह बात समझ लेना चाहिये। शराब तो मनुष्य को एक तरह से पशु बना देती है और इसके लिये वह अपनी गांठ से पैसा भी नष्ट करता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सैंकड़ों वर्ष पहले कबीरदास जी ने शराब के अवगुणों का वर्णन किया था। कहने को आज समाज सभ्य होता जा रहा है पर उसके रीति रिवाजों में जिस तरह तमाम तरह के व्यसन भाग बन रहे हैं उस पर किसी को चिंता नहीं है। मजे की बात यह है कि लोग धर्म के नाम पर तमाम तरह की रिवाज अपनाये हुए हैं पर उसमें शराब आदि का उपयोग धड़ल्ले से किया जाता है। कई जगह तो मूर्तियों पर ही शराब चढ़ाने की प्रथा भी शुरू की गयी है। कहने को भारतीय संस्कृति और संस्कारों का दावा तो तमाम तरह के प्रचार माध्यमों में किया जाता है पर वर्तमान में समाज किस तरह अंधा होकर दुव्र्यसनों को अपने रीति रिवाजों का हिस्सा बना बैठा है उस पर कोई ध्यान नहीं देता। सगाई, शादी, पिकनिक या कही बैठक होने पर शराब की बोतल खोलकर लोग अपनी खुशियों का इजहार करते हैं। क्रिकेट टीम जीतने पर बीयर खोलने के दृश्य कई जगह दिखाई देते हैं। हालांकि कहने वाले कहते हैं कि बीयर शराब नहीं होती पर यह अपने आप में एक व्यर्थ का तर्क है। नशा सभी में हैं और आदमी उसे जब पीता है तो वह पशु भाव को प्राप्त हो जाता हैं लज्जा और सम्मान से परे होकर वह बात करता है। शराब पीने से कई घरों की आर्थिक और सामाजिक स्थिति खराब हूई है इस तथ्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

तमाम तरह के ऐसे लोग हैं जो अपनी जाति, भाषा और धर्म के समूहों के नेतृत्व का दावा करते हैं पर वह ऐसी बुराईयों की तरफ ध्यान नहीं देते जिससे उनके लोगों की मानसिकता विकृत हो रही है। आजकल तो समाज में शराब का सेवन इस मात्रा में बढ़ गया है लोग एक दूसरे से खुलेआम काकटेल पार्टी मांगते हैं। पहले लोग पीते थे तो छिपाते थे पर आजकल तो दिखाकर पीते हैं कि देखो हम आधुनिक हो गये हैं। शराब पीने की बढ़ती प्रवृत्ति ने समाज को अंदर से बहुत खोखला कर दिया है। समाज विज्ञानी इस बात को कहते हैं पर जिनके हाथ में समाजों का नियंत्रण है वह केवल अपने नारे लगाने और झूठा स्वाभिमान दिखाकर अपने लोगों की बुराईयों को छिपाते हैं।
सच बात तो यह है कि शराब पीना निजी मामला नहीं है। जो शराब पीते हैं उन पर विश्वास तो कतई नहीं करना चाहिये। इस पाठ के संपादक का मत तो यह है कि अगर हम स्वयं भी शराब पीयें तो हमें अपने पर ही विश्वास नहीं करना चाहिये। जब किसी से किसी काम का वादा करें तो मान लेना चाहिये कि झूठा वादा कर रहे हैं। न भी माने तो दूसरे लोग ऐसा ही समझते हैं। शराब पीने से जो मानसिक और बौद्धिक क्षति होती है उसकी अनुभूति तभी हो सकती है जब पीने वाले उसे छोड़ कर देखें।

कहने वाले कहते हैं शराब पीने से गम कहते हैं पर स्वास्थ्य विज्ञानी कहते हैं कि इसके सेवन से मनुष्य की इच्छा शक्ति में कमी आती है और वह जीवन संघर्ष से बहुत जल्दी घबड़ा जाता है।
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Thursday, August 28, 2008

रहीम के दोहे:राम का नाम है कई विकारों को परे करने का उपाय

रहिमन राम न उर धरै, रहत विषय लपटाय
पसु खर खात सवाद सों, गुर बुलियाए खाय


कविवर रहीम कहते है कि भगवान राम को हृदय में धारण करने की बजाय भोग और विलास में डूबे रहते है। पहले तो अपनी जीभ के स्वाद के लिए जानवरों की टांग खाते हैं और फिर उनको दवा भी लेनी पड़ती है।

वर्तमान सदंर्भ में व्याख्या-वर्तमान समय में मनुष्य के लिये सुख सुविधाएं बहुत उपलब्ध हो गयी है इससे वह शारीरिक श्रम कम करने लगा हैं शारीरिक श्रम करने के कारण उसकी देह में विकार उत्पन्न होते है और वह तमाम तरह की बीमारियों की चपेट में आ जाता है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन भी रहता है। इसके अलावा जैसा भोजन आदमी करता है वैसा ही उसका मन भी होता है।

आज कई ऐसी बीमारिया हैं जो आदमी के मानसिक तनाव के कारण उत्पन्न होती है। इसके अलावा मांसाहार की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। मुर्गे की टांग खाने के लिय लोग बेताब रहते हैं। शरीर से श्रम न करने के कारण वैसे ही सामान्य भोजन पचता नहीं है उस पर मांस खाकर अपने लिये विपत्ति बुलाना नहीं तो और क्या है? फिर लोगों का मन तो केवल माया के चक्कर में ही लगा रहता है। आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान कहता है कि अगर कोई आदमी एक ही तरफ ध्यान लगाता है तो उसे उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसे विकास घेर लेते हैं। माया के चक्कर से हटकर आदमी थोड़ा राम में मन लगाये तो उसका मानसिक व्यायाम भी हो, पर लोग हैं कि भगवान श्रीराम चरणों की शरण की बजाय मुर्गे के चरण खाना चाहते हैं। यह कारण है कि आजकल मंदिरों में कम अस्पतालों में अधिक लोग शरण लिये होते हैं। भगवान श्रीराम के नाम की जगह डाक्टर को दहाड़ें मारकर पुकार रहे होते है।

अगर लोग शुद्ध हृदय से राम का नाम लें तो उनके कई दर्दें का इलाज हो जाये पर माया ऐसा नहीं करने देती वह तो उन्हें डाक्टर की सेवा कराने ले जाती है जो कि उसके भी वैसे ही भक्त होते हैं जैसे मरीज।
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Wednesday, August 27, 2008

विदुर नीति:मित्र निर्धन हो तो भी उसका सम्मान करें

१.जो मित्रों से सत्कार और सहायता पाकर कृतार्थ होकर भी उनका साथ नहीं निभाते ऐसे कृत्घ्नों के मरने पर उनका मांस तो मांसाहारी पशु भी नहीं खाते।
२.धनवान हो धनहीन मित्र का सम्मान करें। मित्रों से न तो किसी प्रकार की याचना करें और न ही उनकी परीक्षा लें।
३.दुष्ट पुरुषों का स्वभाव मेघ के समान चंचल होता है, वे सहसा क्रोध कर बैठते हैं और अकारण ही प्रसन्न हो जाते हैं।
४.हंस जिस प्रकार सूखे सरोवर के पास मंडरा कर रह जाते हैं उनके अन्दर प्रवेश नहीं करते उसी प्रकार जिसके ह्रदय में चंचलता का भाव विद्यमान है और अज्ञानी हैं वह भी इन्द्रियों के वश में रहता है अरु उसे अर्थ की प्राप्ति नहीं होती।
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Saturday, August 23, 2008

रहीम के दोहे: मनुष्य को उसके कर्म नचाते हैं

ज्यों नाचत कठपूतरी, करम नचावत गात
अपने हाथ रहीम ज्यों, नहीं आपुने हाथ


कविवर रहीम कहते हैं कि जैसे नट कठपुतली को नचाता है वैसे ही मनुष्य को उसके कर्म नाच करने के लिऐ बाध्य करते हैं। जिन्हें हम अपने हाथ समझते हैं वह भी अपने नियंत्रण में नही होते हैं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-जब मैं रहीम के दोहे देखता हूं तो सोचता हूं कि इस संत ने जीभर कर जीवन का आनंद लिया होगा। किसी प्रकार के भ्रम में नहीं जीना ही मनुष्य की पहचान है और रहीम हमेशा सत्य के साथ जिये। सामान्य आदमी कितना भ्रम में जीता है यह उनके दोहे पढ़कर समझा जा सकता है। सभी लोग और आपको कर्ता समझते है जबकि सभी जीवों का शरीर पांच तत्वों से बना वह पुतला है जिसमें तीन प्रकृतियां-मन, बुद्धि और अहंकार -अपना काम करती हैं। आंख है तो देखेगी, कान है तो सुनेंगे, नाक है तो सूंघेगी, पांव है तो चलेंगे और हाथ हैं तो हिलेंगे। मन विचार करता है, बुद्धि योजना बनाती है और अहंकार उकसाता है। हम सोचते हैं कि हम करते हैं जबकि हम तो एक तरह से सोये हुए हैं। अपने आपको देखते ही नहीं। हमारी आत्मा तो परमार्थ से प्रसन्न होती है पर हम अपने कर्मों के अधीन होकर स्वार्थ में लगे रहते हैं जबकि यह काम तो हमारी इंद्रियां तब भी करेंगी जब इन पर नियंत्रण करेंगे। मतलब हम जो कर रहे हैं वह तो करेंगे ही पर जो हमें करना चाहिए परमार्थ वह करते नहीं। सत्संग और भक्ति केवल दिखावे की करते है। कुल मिलाकर कठपुतली की तरह नाचते रहते हैं।
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Friday, August 22, 2008

संत कबीर वाणी:मन फटने पर कहीं ठिकाना नहीं मिलता

धरती फाटे मेघ मिलै, कपड़ा फाटे डौर
तन फाटे को औषधि, मन फाटे नहिं ठौर


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब पानी बरसता है तो फटी हुई धरती आपस में मिल जाती है और फटा हुआ कपडा डोरे से सिल जाता है और बीमार देह को औषधि से स्वस्थ किया जा सकता है पर अगर कही मन अगर फट गया तो उसके लिये कोई ठिकाना नहीं है।

बिना सीस का मिरग है, चहूं दिस चरने जाय
बांधि लाओ गुरुज्ञान सूं, राखे तत्व लगाय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यह मन तो तो बिना सिर के मृग की तरह है जो चारों तरफ भागता रहता है। इस पर नियंत्रण करने के लिये किसी ज्ञानी गुरू से तत्वज्ञान प्राप्त कर नियंत्रण करना चाहिए तभी जीवन का आनंद लिया जा सकता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या- सब भौतिक चीजों पर हम अपना नियंत्रण कर लेते हैं पर मन पर कोई नियंत्रण नहीं कर पाता। वह चारों तरफ आदमी की दौड़ाता है। अपने देहाभिमान के चलते हम कभी नहीं अनुभव कर पाते कि अकारण तमाम तरह की उपलब्धियों के लिये दौड़ लगा रहे हैं। भक्ति भाव से दूर रहकर हम अपने आपको बहुत तकलीफ देते हैं। कोई भौतिक चीज मिल जाती है तो उसे पाकर पुलकित हो उठते हैं पर जल्द ही उससे ऊब जाते हैं फिर किसी नयी चीज की तलाश में लग जाते हैं। फिर सब चीजों से ऊब जाते हैं उससे बचने के लिये निरर्थक बोलने लगते हैं तमाम तरह के स्वांग रचते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि हम अपने आपको धोखा देने लगते हैं।

हम अपने मन के साथ भागते हैं पर अपने अंदर बैठे जीवात्मा को नहंी देखते जो भगवान भक्ति के लिये ताकता रहता है। हम भटकते हुए ऐसे गुरूओं की शरण में जाते हैं जो स्वयं तत्वज्ञान से रहित हैं और किताबों से रटकर हमें सुनाते हैं। ज्ञान का मतलब रटने से नहीं है बल्कि उसे धारण करने से है। ऐसे में हमें निष्काम भाव से ज्ञान देने वाले गुरूओं की शरण लेकर अपने मन पर नियंत्रण करने का प्रयास करना चाहिए।
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Tuesday, August 19, 2008

रहीम के दोहे:छाहँ देने वाले बड़े पेड़ अब कहाँ होते हैं

रहिमन अब वे बिरछ कहं जिनकी छांह गंभीर

बागन बिच बिच देखिअत, सेंहुड, कुंज करीर

कवीवर रहीम कहते हैं की अब इस संसार रुपी बैग में अब वह वृक्ष कहाँ है जो घनी छाया देते हैं। अब तो इस बगीचे में सेमल और घास फूस के ढेर या करील के वृक्ष ही दिखाई देते हैं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-हम कहते हैं कि ज़माना बहुत खराब हैं पर देखें तो यह केवल हमारा एक नजरिया है। इस कलियुग में तो झूठे और लघु चरित्र के लोगों का बोलबाला है। रहीम जी के समय तो फिर भी सात्विक भाव कुछ अधिक रहा होगा पर अब तो स्थिति बदतर है।

पहले तो लोग दान -पुण्यके द्वारा समाज के गरीब तबके पर दया करते थे और अन्य भी तमाम तरह की समाज सेवा करते थे। आपने देखा होगा कि अनेक धर्म स्थलों पर तीर्थ यात्रियों के लिए धर्मशालाएं बनीं हैं जो अनेक तरह के दानी सेठों और साहूकारों ने बनवाईं पर आज उन जगहों पर फाईव स्टारहोटल बन गए हैं। कहने का तात्पर्य अब वह लोग नहीं है जो समाज को अपने पैसे, पद और प्रतिष्ठा से छाया देते थे। अगर कुछ लोग दानवीर या दयालू बनने का दिखावा करते हैं तो उनके निज स्वार्थ होते हैं। ऐसे लोगों से सतर्क रहने की जरूरत है।

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