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Friday, March 13, 2009

रहीम दर्शन: कथनी और करनी में भेद अज्ञान का प्रमाण

अनकीन्ही बातें करै, सोवत जागै जोय
ताहि सिखाय जगायबो, रहिमन उचित न होय

कविवर रहीम कहते हैं कि कई लोग ऐसे हैं जो कहते कुछ और हैं और करते कुछ और हैं। ऐसे लोग जागते हुए भी सोते हैं। ऐसे अहंकार व्यक्ति को सिखाना या जागृत करना बिल्कुल व्यर्थ है।

कदल सीप भुजंग मुख, स्वाति एक गुन तीन
जैसी संगति बैठिए, तैसोई फल दीन

कविवर रहीम कहते हैं कि कि स्वाति नक्षत्र की वर्षा की बूंदें कदली में प्रवेश कर कपूर बना जाता है, समुद्र की सीपी में जाकर मोती का रूप धारण कर लेता है और वही जल सर्प के मुख में जाकर विष बन जाता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में ऐसे व्यक्तियों की अभाव नहीं है जो अपनी कथनी और करनी में भारी भेद प्रकट करते हुए थोड़ा भी संकोच अनुभव नहीं करते। एक तरफ वह आदर्श की बात करते हुए नहीं थकते पर दिन भर वह माया के फेरे में सारी नैतिकता को तिलांजलि देते हैंं। अगर ऐसा न होता तो इस देश में इतने सारे साधु और संत और उनके करोड़ों शिष्य हैं फिर भी पूरे देश मेंे अनैतिकता, भ्रष्टाचार, गरीबों और परिश्रमियों का दोहन तथा अन्य अपराधों की प्रवृतियों वाले लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। आजकल ईमादारी से संग्रह करना कठिन हो गया है। इसका आशय यह है कि जो कमा रहे हैं वही दान कर रहे हैं और अपने गुरुओं के आश्रमों में भी उपस्थिति दिखाते हैं। हर जगह धन सम्राज्य है पर माया से दूर रहने की बात सभी करते हैं। अपराधी हो या सामान्य आदमी भक्ति जरूर करते दिखते हैं। अपराधी अपने दुष्कर्म से बाज नहीं आता और सामान्य आदमी को अपने काम से ही समय नहीं मिलता। बातें सभी आदर्श की करते हैं। यही भेद है जिसके कारण देश में अव्यवस्था फैली है।

इसके अलावा सभी लोग भले आदमी से संगति तो करना ही नहीं चाहते। जो समाज को अपनी शक्ति से आतंकित कर सकता है लोग उससे अपने संपर्क बनाने को लालायित रहते हैं। वह सोचते हैं कि ऐसे असामाजिक तत्व समय पर उनके काम में आयेंगे पर धीरे-धीरे उनके संपर्क में रहते हुए उनका स्वयं का नैतिक आचरण पतन की ओर अग्रसर हो जाता है। संगति का प्रभाव होता है-यह बात निश्चित है। अगर किसी शराबी के पास कोई व्यक्ति बैठ जाये तो उसकी बातें सुनकर उसका स्वयं का मन वितृष्णा से भर जाता है और वही व्यक्ति किसी सत्संगी के पास बैठे तो उसमें अच्छे और सुंदर भावों का प्रवाह अनभूति कर सकता है। अतः अपने लिये हमेशा अच्छी संगति ही ढूंढना चाहिए।
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Monday, January 5, 2009

रहीम संदेश: दरिद्र पर दया करे वही है महान

जे गरीब पर हित करै, ते रहीम बड़लोग
कहाँ सुदामा बापुरो, कृष्ण मिताई जोग


कविवर रहीम कहते हैं जो छोटी और गरीब लोगों का कल्याण करें वही बडे लोग कहलाते हैं। कहाँ सुदामा गरीब थे पर भगवान् कृष्ण ने उनका कल्याण किया।

आज के संदर्भ में व्याख्या- आपने देखा होगा कि आर्थिक, सामाजिक, कला, व्यापार और अन्य क्षेत्रों में जो भी प्रसिद्धि हासिल करता है वह छोटे और गरीब लोगों के कल्याण में जुटने की बात जरूर करता है। कई बडे-बडे कार्यक्रमों का आयोजन भी गरीब, बीमार और बेबस लोगों के लिए धन जुटाने के लिए कथित रूप से किये जाते हैं-उनसे गरीबों का भला कितना होता है सब जानते हैं पर ऐसे लोग जानते हैं कि जब तक गरीब और बेबस की सेवा करते नहीं देखेंगे तब तक बडे और प्रतिष्ठित नहीं कहलायेंगे इसलिए वह कथित सेवा से एक तरह से प्रमाण पत्र जुटाते हैं। मगर असलियत सब जानते हैं इसलिए मन से उनका कोई सम्मान नहीं करता।

जिन लोगों को इस इहलोक में आकर अपना मनुष्य जीवन सार्थक करना हैं उन्हें निष्काम भाव से अपने से छोटे और गरीब लोगों की सेवा करना चाहिऐ इससे अपना कर्तव्य पूरा करने की खुशी भी होगी और समाज में सम्मान भी बढेगा। झूठे दिखावे से कुछ नहीं होने वाला है।वैसे भी बड़े तथा अमीर लोगों को अपने छोटे और गरीब पर दया के लिये काम करते रहना चाहिये क्योंकि इससे समाज में समरसता का भाव बना रहता है।

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Wednesday, December 31, 2008

रहीम संदेश: काम निकाल कर मुहँ फेरना नीच लोगों का स्वभाव

रहिमन धरिया रहंट की, त्यों ओछे की डीठ
रीतेहि सन्मुख होत है, भरी दिखावै पीठ


कविवर रहीम कहते हैं कि नीच आदमी की प्रवृत्ति रहंट की घडि़या की तरह होती है जब पानी भरना होता है तो वह उसके आगे अपना सिर झुकाती है और जब जब भर जाता है तो उससे मूंह फेर लेती है। ऐसे ही नीच आदमी जब किसी में काम पड़ता है तो उसके आगे सिर झुकाता है और कम करते ही मूंह फेर लेता है।

रहिमन खोटि आदि की, सो परिनाम लखाय
जैसे दीपक तम भरवै, कज्जल वमन कराय


कविवर रहीम कहते हैं कि अगर किसी काम का आरंभ जैसे होता है वैसे ही उसके अनुसार परिणाम पर उसका अंत होता है। जैसे दीपक अपने प्रज्जवलित होते ही ऊपर के अंधेरे को अंदर भरता है और रोशनी करने के बावजूद उसके तल में अंधेरा ही रहता है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अपना काम निकाल कर मूंह फेरना नीच लोगों की प्रवृत्ति है। अपना आत्ममंथन कर देखना चाहिये कि यह प्रवृत्ति कहीं हमारे अंदर भी तो नहीं है। वैसे आजकल चाटुकारिता और चमचागिरी का समय है। जब तक कोई आदमी धनी,प्रतिष्ठित और बड़े ओहदे पर है उसके आगे चाटुकारों का जमावड़ा होता है जैसे ही वह पतन की ओर अग्रसर होता हैं वैसे ही सभी साथ छोड़ जाते हैं। आदमी की यह प्रवृित्त चूहों की तरह ही है जो डूबते जहाज को सबसे पहले छोड़कर भागते हैं।

किसी भी काम को बिना सोचे समझे प्रारंभ नहीं करना चाहिये क्योंकि जिस काम की जैसी शुरुआत होती है वैसे ही उसका अंत भी होता है। किसी अभियान या लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये उसका अध्ययन कर लेना चाहिये और फिर अपने साधन और सहयोगियों को चयन करें। उतावली से शुरु किये गये काम का परिणाम भी निराशाजनक होता हैं। इसके अलावा अपने अंदर यह अहंकार भी नहीं पालना चाहिये कि ‘मुझे सभी कुछ आता है’। जहां सीखने का अवसर मिले वह दिल लगाना चाहिये। यह जीवन बहुत लंबा और संघर्षमय होता है पता नहीं कब किस ज्ञान या सीख की हमें आवश्यकता पड़ जाये।
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Saturday, October 11, 2008

रहीम सन्देश: दिल से काम करें तो इन्सान क्या भगवान बस में होते हैं

रहिमन मनहि लगाईं कै, देखि लेहू किन कोय
नर को बस करिबो कहा, नारायन बस होय

कविवर रहीम के मतानुसार मन लगाकर कोई काम कर देखें तो कैसे सफलता मिलती है। अगर अच्छी नीयत से प्रयास किया जाये तो नर क्या नारायण को भी अपने बस में किया जा सकता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-लोग बहुत जल्दी सफलता हासिल करना चाहते हैं। काम में मन कम उससे होने वाली उपलब्धि पर अधिक दृष्टि रखते हैं यही कारण है कि उनको सफलता नहीं मिलती। भक्ति हो या सांसरिक काम उसमें मन लगाकर ही आदमी कोई उपलब्धि प्राप्त कर सकता है। अधिकतर लोग अपना काम करते हुए केवल इस बात की चिंता करते हैं कि उससे उनको क्या मिलेगा? जो भक्ति करते हैं वह सोचते हैं कि भगवान बस तत्काल उनका काम बना दें। मन भक्ति में कम अपने काम में अधिक होता है। न उनको इससे भक्ति का लाभ होता है और न काम बनने की संभावना होती है। भक्ति में काम का भाव और जो काम है उससे करने की बजाय भगवान की भक्ति में लगने से दोनों में उनकी सफलता संदिग्ध हो जाती है और फिर ऐसा करने वाले लोग अपनी नाकामी का दोष दूसरों को देते हैं।

अगर मन लगाकर भक्ति या सांसरिक काम किया जाये तो उसमें सफलता मिलती है। आदमी क्या भगवान भी बस में किये जा सकते हैं।
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Thursday, October 9, 2008

रहीम संदेशः राम का नाम मूंह में धोखे से भी आ जाये तो मिलती है परमगति

रहिमन धोखे भाव से, मुख से निकले राम
पावत पूरन परम गति, कामादिक कौ धाम


कविवर रहीम कहते हैं कि अगर धोखे से भी किसी के मुख में राम का नाम आ जाये तो उसे परमगति प्राप्त होती है भले ही वह व्यक्ति काम के धाम का रहने वाला हो।

रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि
जहां काम आवै सुई, कहा करै तलवारि


कविवर रहीम कहते हैं कि बड़े आदमी को देखकर छोटे की अपेक्षा न करें क्योंकि समय का पता नहीं कब किसकी आवश्यकता पड़ जाये। जहां सुई की आवश्यकता होती है वहां तलवार काम नहीं आती-यह बात ध्यान में रखना चाहिये।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भगवान की भक्ति का भाव अगर एक बार भी हृदय में उपस्थित हो जाये तो आदमी को महान सुख की प्राप्त होती है। रहीम जी का यह कहना कि एक बार भी धोखे से मूंह में राम का नाम आ जाये तो आदमी को परमगति प्राप्त होती है-एकदम सत्य है। उनका आशय यही है कि आदमी कभी एक बार भी हृदय से भगवान का नाम स्मरण करे तो उसे पुण्य प्राप्त होता है। वैसे लेने को तो कई लोग राम का नाम लेते हैं पर वह उनके हृदय से नहीं निकलता। उनके लिये यह केवल एक शब्द है नाम नहीं। मुख से राम शब्द निकलने का तात्पर्य यही है कि वह हृदय से निकलकर आता हो। राम के नाम की महिमा अपरंपार है इसे वही समझ सकते हैं जो उनकी भक्ति करते हैं।

अक्सर हमारे सामने कोई विशिष्ट व्यक्ति आता है तब हम अपने पास मौजूद स्थित सामान्य आदमी की अपेक्षा कर देते हैं यह सोचकर कि उसका कोई महत्व नहीं हैं। देखा जाये तो यहां कोई न विशिष्ट है न सामान्य। हर व्यक्ति की समयानुसार उपयोगिता होती है। जिन्हें हम विशिष्ट समझकर उनकी सेवा जीवन भर करते हैं वह हमारे किसी काम के नहीं होते जबकि जो छोटे लोग हैं उनमें हमारा प्रतिदिन काम पड़ता है। कथित विशिष्ट लोग तो कई बार काम की मना भी कर देते हैं और कई विशिष्ट तो हमारे साथ इसलिये संपर्क रखते हैं कि वह समाज में अपनी विशिष्टता का बोध सभी लोगों को कराते रहें कि देखो हमारे पीछे बहुत से लोग हैं-हमारा जीवन हमेशा छोटी घटनाओं और कर्मों के साथ ही आगे बढ़ता है जिसमें छोटे आदमी की आवश्यकता ही अधिक होती है। इसलिये किसी के साथ व्यवहार करते उसे छोटा या बड़ा नहीं समझना चाहिये।
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Sunday, September 21, 2008

रहीम के दोहे: मूर्खों को दण्डित करना भी आवश्यक

खीरा सिर तें काटिए, मलियत नमक बनाय

रहिमन करुए मुखन को , चाहिअत इहै सजाय

कविवर रहीम कहते हैं कि जिस तरह खीरे का मुख काटकर उस पर नमक घिसा जाता है तभी वह खाने में स्वाद देता है वैसे ही मूर्खों को अपनी करनी की सजा देना चाहिऐ ताकि वह अनुकूल व्यवहार करें।

नये संदर्भ में व्याख्या-यह सही है कि बडों को छोटों के अपराध क्षमा करना चाहिए, पर कुछ लोग ऐसे होते हैं जो नित्य मूर्खताएं करते रहते हैं। कभी किसी की मजाक उडाएंगेतो कभी किसी को अपमानित करेंगे। कुछ तो ऐसी भी मूर्ख होते हैं जो दूसरे व्यक्ति को शारीरिक, आर्थिक और मानसिक हानि पहुँचने के लिए नित्य तत्पर रहते हैं। ऐसे लोगों को बर्दाश्त करना अपने लिए तनाव मोल लेना है। ऐसे में अपने क्रोध का प्रदर्शन कर उनको दण्डित करना चाहिए। अगर ऐसा नहीं करेंगे तो उनका साहस बढ़ता जायेगा।

व्याख्याकार स्वयं कई बार ऐसा देख चुका है कि कई लोग तो इतने नालायक होते हैं कि उनको प्यार से समझाओ तो और अधिक तंग करने लगते हैं और जब क्रोध का प्रदर्शन कर उन्हें धमकाया जाये तो वह फिर दोबारा वह बदतमीजी करने का साहस नहीं कर पाते। हालांकि इसमें अपनी सीमाओं का ध्यान अवश्य रखना चाहिऐ और क्रोध का बहाव बाहर से बाहर होना चाहिए न कि उसकी पीडा हमारे अन्दर जाये।
कुछ लोगों की आदत होती है कि वह दूसरों की मजाक उड़ाकर यह अभद्र व्यवहार कर उन्हें अपमानित करते हैं। अनेक लोग उनसे यह सोचकर झगड़ा मोल नहीं लेते कि इससे तो मूर्ख और अधिक प्रज्जवलि हो उठेगा पर देखा गया है कि जब ऐसे लोगों को किसी से कड़े शब्दिक प्रतिकार का सामना करना पड़े पर पीछे हट जाते हैं। अगर प्रतिकार नहीं किया जाये तो वह निरंतर अपमानित करते रहते हैं। अगर हमें ऐसा लगता है कि कोई हमारा निरंतर अपमान या अपेक्षा कर अपने को श्रेष्ठ साबित कर हमारे साथ बदतमीजी कर रहा है तो उसका प्रतिकार करने में अधिक सोचना नहीं चाहिये।


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Thursday, September 18, 2008

रहीम के दोहे:लोगों के कहने पर ध्यान न देकर अपने मार्ग पर चलें

कहते को कहिं जान दे, गुरू की सीख तू लेय
साकट जन और स्वान को, फेरि जवाब न देय


कविवर रहीम कहते है कि कहने वालों को कुछ भी कहने दो अपने गुरू की सीख लें और फिर अपने मार्ग पर चलें। अज्ञानी लोग और श्वान के भौंकने पर ध्यान न दें

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-लोगों का काम है कहना। सच तो यह है कि अपने जीवन में वह लोग कोई भी उपलब्धि प्राप्त नहीं कर पाते जो जो इस तरह कहने पर ध्यान देकर कोई कदम नहीं उठाते। अपने गुरू से चाहे वह आध्यात्मिक हो या सांसरिक ज्ञान देने वाला उसे शिक्षा ग्रहण कर अपने जीवन पथ पर बेखटके चल देना चाहिए। अगर उसके बाद अगर किसी के कहने पर ध्यान देते हैं तो अकारण व्यवधान पैदा होगा और अपने मार्ग पर चलने में विलंब करने से हानि भी हो सकती है। एक बात मान कर चलिए यहां ज्ञान बघारने वालों की कमी नहीं है। ऐसे लोग जिन्हें किसी भक्ति या सांसरिक क्षेत्र का खास ज्ञान नहीं होता वह खालीपीली अपनी सलाहें देते हैं और अपने अनुभव भी ऐसे बताते हैं जो उनके खुद नहीं बल्कि किसी अन्य व्यक्ति ने उनको सुनाये होते हैं।


इतना ही नहीं जब अपने मार्ग पर चलेंगे तो दस लोग टोकेंगे। आपके कार्यो की मीनमीेख निकालेंगे और तमाम तरह के भय दिखाऐंगे। इन सबकी परवाह मत करो और चलते जाओ। यही जीवन का नियम है। हम देख सकते हैं जो लोग अपने जीवन में सफल हुए हैं उन्होंने अन्य लोगों की क्या अपने लोगों भी परवाह नहीं की। जिन्होनें परवाह की ऐसे असंख्य लोगों को हम अपने आसपास देख सकते हैं।

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Thursday, August 28, 2008

रहीम के दोहे:राम का नाम है कई विकारों को परे करने का उपाय

रहिमन राम न उर धरै, रहत विषय लपटाय
पसु खर खात सवाद सों, गुर बुलियाए खाय


कविवर रहीम कहते है कि भगवान राम को हृदय में धारण करने की बजाय भोग और विलास में डूबे रहते है। पहले तो अपनी जीभ के स्वाद के लिए जानवरों की टांग खाते हैं और फिर उनको दवा भी लेनी पड़ती है।

वर्तमान सदंर्भ में व्याख्या-वर्तमान समय में मनुष्य के लिये सुख सुविधाएं बहुत उपलब्ध हो गयी है इससे वह शारीरिक श्रम कम करने लगा हैं शारीरिक श्रम करने के कारण उसकी देह में विकार उत्पन्न होते है और वह तमाम तरह की बीमारियों की चपेट में आ जाता है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन भी रहता है। इसके अलावा जैसा भोजन आदमी करता है वैसा ही उसका मन भी होता है।

आज कई ऐसी बीमारिया हैं जो आदमी के मानसिक तनाव के कारण उत्पन्न होती है। इसके अलावा मांसाहार की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। मुर्गे की टांग खाने के लिय लोग बेताब रहते हैं। शरीर से श्रम न करने के कारण वैसे ही सामान्य भोजन पचता नहीं है उस पर मांस खाकर अपने लिये विपत्ति बुलाना नहीं तो और क्या है? फिर लोगों का मन तो केवल माया के चक्कर में ही लगा रहता है। आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान कहता है कि अगर कोई आदमी एक ही तरफ ध्यान लगाता है तो उसे उच्च रक्तचाप और मधुमेह जैसे विकास घेर लेते हैं। माया के चक्कर से हटकर आदमी थोड़ा राम में मन लगाये तो उसका मानसिक व्यायाम भी हो, पर लोग हैं कि भगवान श्रीराम चरणों की शरण की बजाय मुर्गे के चरण खाना चाहते हैं। यह कारण है कि आजकल मंदिरों में कम अस्पतालों में अधिक लोग शरण लिये होते हैं। भगवान श्रीराम के नाम की जगह डाक्टर को दहाड़ें मारकर पुकार रहे होते है।

अगर लोग शुद्ध हृदय से राम का नाम लें तो उनके कई दर्दें का इलाज हो जाये पर माया ऐसा नहीं करने देती वह तो उन्हें डाक्टर की सेवा कराने ले जाती है जो कि उसके भी वैसे ही भक्त होते हैं जैसे मरीज।
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Saturday, August 23, 2008

रहीम के दोहे: मनुष्य को उसके कर्म नचाते हैं

ज्यों नाचत कठपूतरी, करम नचावत गात
अपने हाथ रहीम ज्यों, नहीं आपुने हाथ


कविवर रहीम कहते हैं कि जैसे नट कठपुतली को नचाता है वैसे ही मनुष्य को उसके कर्म नाच करने के लिऐ बाध्य करते हैं। जिन्हें हम अपने हाथ समझते हैं वह भी अपने नियंत्रण में नही होते हैं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-जब मैं रहीम के दोहे देखता हूं तो सोचता हूं कि इस संत ने जीभर कर जीवन का आनंद लिया होगा। किसी प्रकार के भ्रम में नहीं जीना ही मनुष्य की पहचान है और रहीम हमेशा सत्य के साथ जिये। सामान्य आदमी कितना भ्रम में जीता है यह उनके दोहे पढ़कर समझा जा सकता है। सभी लोग और आपको कर्ता समझते है जबकि सभी जीवों का शरीर पांच तत्वों से बना वह पुतला है जिसमें तीन प्रकृतियां-मन, बुद्धि और अहंकार -अपना काम करती हैं। आंख है तो देखेगी, कान है तो सुनेंगे, नाक है तो सूंघेगी, पांव है तो चलेंगे और हाथ हैं तो हिलेंगे। मन विचार करता है, बुद्धि योजना बनाती है और अहंकार उकसाता है। हम सोचते हैं कि हम करते हैं जबकि हम तो एक तरह से सोये हुए हैं। अपने आपको देखते ही नहीं। हमारी आत्मा तो परमार्थ से प्रसन्न होती है पर हम अपने कर्मों के अधीन होकर स्वार्थ में लगे रहते हैं जबकि यह काम तो हमारी इंद्रियां तब भी करेंगी जब इन पर नियंत्रण करेंगे। मतलब हम जो कर रहे हैं वह तो करेंगे ही पर जो हमें करना चाहिए परमार्थ वह करते नहीं। सत्संग और भक्ति केवल दिखावे की करते है। कुल मिलाकर कठपुतली की तरह नाचते रहते हैं।
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Wednesday, August 20, 2008

रहीम के दोहे:राम का नाम न जानने वालों का जीवन व्यर्थ

राम नाम जान्यो नहीं, जान्यो सदा उपाधि
कहि रहीम तिहिं आपुनो, जनम गंवायो वादि


कविवर रहीम कहते हैं कि जिन लोगों ने नाम का नाम धारण न कर अपने धन, पद और उपाधि को ही जाना और राम के नाम पर विवाद खडे किये उनका जन्म व्यर्थ है. वह केवल वाद-विवाद कर अपना जीवन नष्ट करते हैं।

राम नाम जान्यो नहीं, भइ पूजा में हानि
कहि रहीम क्यों मानिहै, जम के किंकर कानि


कविवर रही कहते हैं कि जिस मानव ने राम की महिमा नहीं समझी और अन्य देवों की ही पूजा की तो उसमें उसे हानि ही होती है। ऐसे में यमराज के सेवक किसी मर्यादा को नहीं मानेंगे।
भाव-राम का नाम ही सत्य है और बाक़ी अन्य देवों की पूजा से क्या लाभ. उससे तो मन इधर उधर भटकता है ऐसे में जब मृत्यु आती है तो बहुत तकलीफ होती है और पूरा जीवन भी राम का नाम लिए बिना बडे कष्ट से बीतता है।

rahim,hindi

Tuesday, August 19, 2008

रहीम के दोहे:छाहँ देने वाले बड़े पेड़ अब कहाँ होते हैं

रहिमन अब वे बिरछ कहं जिनकी छांह गंभीर

बागन बिच बिच देखिअत, सेंहुड, कुंज करीर

कवीवर रहीम कहते हैं की अब इस संसार रुपी बैग में अब वह वृक्ष कहाँ है जो घनी छाया देते हैं। अब तो इस बगीचे में सेमल और घास फूस के ढेर या करील के वृक्ष ही दिखाई देते हैं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-हम कहते हैं कि ज़माना बहुत खराब हैं पर देखें तो यह केवल हमारा एक नजरिया है। इस कलियुग में तो झूठे और लघु चरित्र के लोगों का बोलबाला है। रहीम जी के समय तो फिर भी सात्विक भाव कुछ अधिक रहा होगा पर अब तो स्थिति बदतर है।

पहले तो लोग दान -पुण्यके द्वारा समाज के गरीब तबके पर दया करते थे और अन्य भी तमाम तरह की समाज सेवा करते थे। आपने देखा होगा कि अनेक धर्म स्थलों पर तीर्थ यात्रियों के लिए धर्मशालाएं बनीं हैं जो अनेक तरह के दानी सेठों और साहूकारों ने बनवाईं पर आज उन जगहों पर फाईव स्टारहोटल बन गए हैं। कहने का तात्पर्य अब वह लोग नहीं है जो समाज को अपने पैसे, पद और प्रतिष्ठा से छाया देते थे। अगर कुछ लोग दानवीर या दयालू बनने का दिखावा करते हैं तो उनके निज स्वार्थ होते हैं। ऐसे लोगों से सतर्क रहने की जरूरत है।

Saturday, August 16, 2008

रहीम के दोहे:नीच लोगों का साथ करने से स्वयं पर भी कलंक लगता है

रहिमन उजली प्रकृति को, नहीं नीच को संग
करिया वासन कर गहे, कालिख लागत अंग

कविवर रहीम कहते हैं कि जिनकी प्रवृत्ति उजली और पवित्र है अगर उनकी संगत नीच से न हो तो अच्छा ही है। नीच और दुष्ट लोगों की संगत से कोई न कोई कलंक लगता ही है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-सज्जन और उज्जवन प्रकृति के लोग शांत रहते हैं इसलिये उनको ऐसे लोगों की संगत नहीं करना चाहिये जो दुष्टता और अशांत प्रवृत्ति के होते हैं। वैसे आजकल के लोगों में यह प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है कि वह दलाल और दादा प्रवृत्ति के लोगों की संगत चाहते हैं ताकि कोई उनका कोई बिगाड़ नहीं सके। फिल्म देखकर यह धारणा बना लेते हैं कि दादा लोग किसी से किसी की भी रक्षा कर सकते हैं। कई सज्जन परिवार को लड़के भी भ्रमित होकर दादा किस्म के लड़कों के चक्कर में पड़ जाते हैं तो कई लड़कियां भी अपने लिये ऐसे मित्र चुनती है जो दादा टाईप के हों। उनको लगता है कि वह दादा किस्म के मित्र इस समाज में प्रतिष्ठित होते हैं। देश में इसलिये ही सभी जगह अपराधीकरण का बोलबाला हो रहा है क्योंकि जो उज्जवल और शांत प्रकृत्ति के हैं वह अपना विवेक खोकर ऐसे लोगों को संरक्षण देते हैं जो समाज के लिये खतरा है।

यह बात समझ लेना चाहिये कि बुरे का अंत बुरा ही होता है। दादा और दलाल आकर्षक लगते हैं पर उनकी समाज में कोई सम्मान नहीं होता। बुराई का अंत होता है और ऐसे में जो दुष्ट लोगों की संगत करते हैं उनको भी दुष्परिणाम भोगना पड़ता है।
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Friday, August 15, 2008

रहीम के दोहेः जीवन में समय ही लाभ और हानि है

समय लाभ सम लाभ नहिं, समय चूक सम चूक
चतुरन चित रहिमन लगी, समय चूक की हूक

कविवर रहीम कहते हैं कि समय ही लाभ है तथा समय ही हानि भी है। चतुर लोग समय का लाभ उठा लेते हैं और अगर चूक जाते हैं तो उनके मन में त्रास हमेशा ही बना रहता है।

समय पाय फल होत है, समय पाय झरि जात
सदा रहै नहीं एक सी, का रहीम पछतात


कविवर रहीम कहते हैं कि समय के अनुसार अपने निश्चित समय पर ही पेड़ पर फल लगता है और समय के अनुसार ही झड़ जाता है। समय कभी एक जैसा नहीं रहता इसलिये कभी अपने बुरे समय को देखकर परेशान नहीं होना चाहिये।

वतंमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-समय चक्र घूमता रहता है और मनुष्य की जीवन धारा भी उसी के अनुसार बहती जाती है। अपने जीवन से असंतुष्ट लोग अक्सर कहते हैं कि ‘मैंने अमुक की बात मान ली होती तो आज मैं कुछ और होता‘,या मैंने अमुक काम किया होता तो धनाढ्य होता‘। समय और सृष्टि का यह नियम होता है कि एक बार आदमी को इस संसार में उपलब्धि प्राप्त कराने के लिये अवसर अवश्य आता है बस उसे पहचान कर उसका उपयोग करने की बुद्धि होना चाहिए। कई लोग जो दूसरों की बुद्धि के अनुसार चलने के आदी हैं वह ऐसी शिकायतें करते हैं हमने अमुक की बात मानकर गलती की थी। यह सब अपनी गलतियां और बौद्धिक आलस्य की कमी छिपाने का बहाना है। जो लोग अपने कर्तव्य पथ पर चलने के लिये दृढ़संकल्पित होते हैं वह बिना किसी की परवाह किये चलते जाते हैंं और अपने लक्ष्य का चरम शिखर प्राप्त करते हैं।
समय का पहिया ऊपर नीचे घूमता है और राजा हो या रंक उसके लिये अच्छा बुरा समय आता रहता है। ज्ञानी लोग इस रहस्य को जानते हैं और इसलिये विचलित नहीं होते।
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Wednesday, August 13, 2008

रहीम के दोहेःमन से काम करें तो नर क्या नारायण बस में हो जाते हैं

रहिमन मनहि लगाईं कै, देखि लेहू किन कोय
नर को बस करिबो कहा, नारायन बस होय

कविवर रहीम के मतानुसार मन लगाकर कोई काम कर देखें तो कैसे सफलता मिलती है। अगर अच्छी नीयत से प्रयास किया जाये तो नर क्या नारायण को भी अपने बस में किया जा सकता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-लोग बहुत जल्दी सफलता हासिल करना चाहते हैं। काम में मन कम उससे होने वाली उपलब्धि पर अधिक दृष्टि रखते हैं यही कारण है कि उनको सफलता नहीं मिलती। भक्ति हो या सांसरिक काम उसमें मन लगाकर ही आदमी कोई उपलब्धि प्राप्त कर सकता है। अधिकतर लोग अपना काम करते हुए केवल इस बात की चिंता करते हैं कि उससे उनको क्या मिलेगा? जो भक्ति करते हैं वह सोचते हैं कि भगवान बस तत्काल उनका काम बना दें। मन भक्ति में कम अपने काम में अधिक होता है। न उनको इससे भक्ति का लाभ होता है और न काम बनने की संभावना होती है। भक्ति में काम का भाव और जो काम है उससे करने की बजाय भगवान की भक्ति में लगने से दोनों में उनकी सफलता संदिग्ध हो जाती है और फिर ऐसा करने वाले लोग अपनी नाकामी का दोष दूसरों को देते हैं।

अगर मन लगाकर भक्ति या सांसरिक काम किया जाये तो उसमें सफलता मिलती है। आदमी क्या भगवान भी बस में किये जा सकते हैं।
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Monday, August 11, 2008

रहीम के दोहे:दीन का सहायक कौन होता है

संतत संपंति जानि कै, सबको सब कुछ देत
दीप बंधु बिन दीन की, को रहीम सुधि लेत


कविवर रहीम कहते हैं कि जिनके पास संपत्ति और धन है लोूग उनकी जानबूझकर सहायता करते हैंैं क्योंकि उससे उनको अधिक प्राप्त होने वाला होता है, वरना यहां गरीबोंं की सुध कौन लेता है, उनका रक्षक तो दीनबंधु स्वयं है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अमीरों के लिये कोई थोड़ी परेशानी आये तो लोग उनकी सहायता के लिये दौड़ जाते हैं क्योंकि उनसे उनको लाभ की आशा होती है। गरीब का संकट बड़ा भी हो तो कोई उसकी तरफ नहीं देखता। समाज के साथ होने का भ्रम वही लोग पालते हैं जिन्होंने जीवन की सच्चाई को देखा नहीं होता। सभी जानते हैं कि समाज के नाम पर केवल अमीरों का शासन चलता है। अगर बड़े आदमी के कुत्ते को भी छींक आ जाये तो लोग उसको पूछने के लिये दौड़ जाते हैं कि पता नहीं कब उसमें काम पड़ जाये और गरीब का बेटा भी अगर बीमारी से तड़प रहा हो तो उसको कोई नहीं पूछता। अक्सर अमीरों के काम मुफ्त में हो जाते हैं क्योंकि करने वाले जानते हैं कि कभी उससे अधिक मिलेगा और गरीब के काम पर कोई दृष्टिपात नहीं करता क्योंकि उससे अधिक पाने की आशा नहीं होती।


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Sunday, August 10, 2008

रहीम के दोहेःभजन में आलस्य करना मनुष्य का स्वभाव

रहिमन आलस भजन में, विषय सुखहिं लपटाय
घास चरै पसु स्वाद तै, गुरु गुलिलाएं खाय


कविवर रहीम कहते हैं कि मनुष्य भजन में तो आलस्य कर जाता है पर जिन विषयों में सुख लिप्त है उनको अपने साथ सदैव लिपटाये रहता है। जैसे पशू बेस्वाद घास को तो स्वयं ही खाते हैं पर जो गुड़ उनके स्वास्थ्य के लिये हितकर है वह कभी भी अपने आप नहीं खाते। वह तभी खाते हैं जब उनके मूंह में जबरन ठूंसा जाता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-यह मनुष्य स्वभाव है जहां से उसे थोड़ी बहुत प्रसन्नता या धन मिलने की संभावना होती है वहां वह दौड़ा चला जाता है पर जहां मन की शांति और एकांत मिलता है वहां से वह भागता है। उसे लगता है कि धन और मान पाने में ही सारे सुख अंतर्निहित हैं और वह जीवन भर उसके पीछे दौड़ता है। भगवान का भजन, ध्यान, स्मरण और सत्संग उसको सुखद नहीं लगते क्योंकि उसमें कोई देखने वाला नहीं होता और एकांत में मिलने वाले उस सुख के लिये अपने मित्रों, रिश्तेदारों और परिवार के सदस्यों से उसे कुछ देर अपना मन विरक्त करना पड़ता है और सभी लोग इससे घबड़ाते हैं। उनको लगता है कि इस विरक्ति के दौरान कहीं उनके मन में पूर्ण सन्यास भाव न पैदा हो जाये और फिर वह अपने पर आश्रित लोगों को दुःख में छोड़ कर संसार में स्वतंत्र रूप से विचरण करने लगें। मतलब वह अपने ही मन से स्वयं डरते हैं और विषयों की गुलामी में उनको अपना हित लगता है। अगर कोई व्यक्ति उनको ज्ञान देता है तो कहते हैं कि हमें तो भजन आदि के लिये फुरसत ही नहीं मिल पाती। सच तो यह है कि सच्ची भक्ति में कोई आकर्षण नहीं है इसलिये लोग उससे कतराते हैं।
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Saturday, August 9, 2008

रहीम के दोहेःपरोपकारी लोग अपने पराये का भेद नहीं करते

रहिमन पर उपकार के, करत न यारी बीच
मांस दियो शिवि भूप ने, दीन्हो हाड़ दधीच

कविवर रहीम कहते हैं कि जिस मनुष्य का परोपकार करना है वह जरा भी नहीं हिचकता। वह परोपकार करते हुए यारी दोस्ती का विचार नहीं करते। राजा शिवि ने ने प्रसन्न मुद्रा में अपने शरीर का मांस काट कर दिया तो महर्षि दधीचि ने अपने शरीर की हड्डियां दान में दीं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-विश्व का हर बड़ा आदमी परोपकार करने का दावा करता है पर फिर भी किसी का कार्य सिद्ध नहीं होता। अभिनेता, कलाकार, संत, साहुकार तथा अन्य प्रसिद्ध लोग अनेक तरह के परोपकार के दावों के विज्ञापन करते हैं पर उनका अर्थ केवल आत्मप्रचार करना होता है। आजकल गरीबों, अपंगों,बच्चों,बीमारों और वृद्धों की सेवा करने का नारा सभी जगह सुनाई देता है और इसके लिये चंदा एकत्रित करने वाली ढेर सारी संस्थायें बन गयी हैं पर उनके पदाधिकारी अपने कर्मों के कारण संदेह के घेरे में रहते हैं। टीवी चैनल वाले अनेक कार्यक्रम कथित कल्याण के लिये करते हैं और अखबार भी तमाम तरह के विज्ञापन छापते हैं पर जमीन की सच्चाई यह है कि जो परोपकार भी एक तरह से व्यापार हो गया है और इसके माध्यम से प्रचार और आय अर्जित करने की योजनाओं को पूरा किण जाता है।

जिन लोगों को परोपकार करना है वह किसी की परवाह नहीं करते। न तो वह प्रचार करते हैं और न ही इसमें अपने पराये का भेद करते हैं। उनके लिये परोपकार करना एक नशे की तरह होता है। सच तो यह है कि यह मानव जाति अगर आज भी चैन की सांस ले रही है तो वह ऐसे लोगों की वजह से ले रही हैं ऐसे लोग न केवल बेसहारा की मदद करते हैं बल्कि पर्यावरण और शिक्षा के लिये भी निरंतर प्रयत्नशील होते हैं। वरना तो जिनके पास पद, पैसे और प्रतिष्ठा की शक्ति है वह इस धरती पर मौजूद समस्त साधनों का दोहन करते हैं पर परोपकारी लोग निष्काम भाव से उन्हीं संसाधनों में श्रीवृद्धि करते है। जिनका परोपकार करने का संकल्प लेना है उन्हें यह तय कर लेना चाहिए कि वह प्रचार और पाखंड से दूर रहेंगे।

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Thursday, July 24, 2008

रहीम के दोहे-परमात्मा का चरित्र वर्णनातीत

रहिमन बात अगम्य की, कहन सुनन की नाहिं
जो जानत सो कहत नहिं, कहत त जानत नाहिं

कविवर रहीम कहते हैं कि परमात्मा का वर्णन करना कठिन है। उसका स्वरूप अगम्य है और कहना सुनना कठिन है जो जानते हैं वह कहते नहीं हैं जो कहते हैं वह जानते नहीं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-सच तो यह है कि परमात्मा के स्वरूप कोई समझ नहीं सकता । उसकी व्याख्या हर कोई अपने अनुसार हर कोई करता है पर वास्तविकता का वर्णन करना कठिन है। अनेक लोग अपने अनुसार भगवान के स्वरूप की व्याख्या करते है। पर सच तो यह है कि उनके स्वरूप का वर्णन कहना और सुनना कठिन है। उनको तो केवल भक्ति से ही धारण किया जा सकता है। परमात्मा का चरित्र वर्णनातीत है और सच्चे भक्त इस बात को जानते हैं पर कहते नहीं है और जो कहते हैं वह जानते नहीं है। अनेक लोग परमात्मा के अनेक स्वरूपों में से हरेक के जीवन चरित्र पर व्याख्या करते हुए अपना ज्ञान बघारते हैं पर सच तो यह है कि यह उनका व्यवसाय है और वह उसके बारे में कुछ नहीं जानते हैं। उनके वास्तविक स्वरूप को सच्चे भक्त ही जानते हैं पर वह उसका बखान कर अपने अहंकार का प्रदर्शन नहीं करते। अनेक लोग तमाम तरह की खोज का दावा करते हैं तो कुछ लोग कहीं एकांत में तपस्या कर सिद्धि प्राप्त कर फिर समाज में अपना अध्यात्मिक सम्राज्य कायम करने के लिये जुट जाते हैं। ऐसे ढोंगी लोग परमात्मा के स्वरूप का उतना ही बखान करते है जितने से उनका हित और आय का साधन बनता हो।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Wednesday, July 23, 2008

रहीम के दोहेःअपनी देह की चिंताग्नि में मत जलो

जसी परै सो सहि रहै, कहि रहीम यह देह
धरती पर ही परत है, शीत घाम और मेह

कविवर रहीम कहते हैं कि इस मानव काया पर जैसी परिस्थिति आती है वैसा ही वह सहन भी करती है। इस धरती पर ही सर्दी, गर्मी और वर्षा ऋतु आती है और वह सहन करती है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-पश्चिमी चिकित्सा विशेषज्ञों तमाम तरह के शोधों के बाद यह कह पाये कि हमारी देह बहुत लोचदार है उसमें हालतों से निपटने की बहुत क्षमता है। इसके लिये पता नहीं कितने मेंढकों और चूहों को काटा होगा-फिर इस निष्कर्ष पर पहुंचे । हमारे मनीषियों ने अपनी योग साधना और भक्ति से अर्जित ज्ञान से बहुत पहले यह जान लिया कि इस देह में बहुत शक्ति है और वह परिस्थितियों के अनुसार अपने को ढाल लेती है। ज्ञान या तो योग साधना से प्राप्त होता है या भक्ति से। रहीम तो भक्ति के शिखर पुरुष थे और अपनी देह पर कतई ध्यान नहीं देते थे पर फिर भी उनको इस मनुष्य देह के बारे में यह ज्ञान हो गया पर आजकल अगर आप किसी सत्संग में जाकर बैठें तो लोग अपनी दैहिक तकलीफों की चर्चा करते हैं, और वहां ज्ञान कम आत्मप्रवंचना अधिक करते हैं। कोई कहेगा ‘मुझे मधुमेह हो गया है’ तो कोई कहेगा कि मुझे ‘उच्च रक्तचाप’ है। जिन संत लोगों का काम केवल अध्यात्मिक प्रवचन करना है वह उनकी चिकित्सा का ठेका भी लेते हैं। यह अज्ञान और भ्रम की चरम परकाष्ठा है।

मैने अपने संक्षिप्त योग साधना के अनुभव से यह सीखा है कि देह में भारी शक्ति होती है। मुझे योगसाधना का अधिक ज्ञान नहीं है पर उसमें मुझे अपने शरीर के सारे विकार दिखाई देते हैं तब जो लोग बहुत अधिक करते हैं उनको तो कितना अधिक ज्ञान होगा। पहले तो मैं दो घंटे योगसाधना करता था पर थोड़ा स्वस्थ होने और ब्लाग लिखने के बाद कुछ कम करता हूं (वह भी एक घंटे की होती है)तो भी सप्ताह में कम से कम दो बार तो पूरा करता हीं हूं। पहले मुझे अपना शरीर ऐसा लगता था कि मैं उसे ढो रहा हूं पर अब ऐसा लगता है कि हम दोनों साथ चलते हैं। मेरे जीवन का आत्मविश्वास इसी देह के लड़खड़ाने के कारण टूटा था आज मुझे आत्मविश्वास लगता है। आखिर ऐसा क्या हो गया?

इस देह को लेकर हम बहुत चिंतित रहते हैं। गर्मी, सर्दी और वर्षा से इसके त्रस्त होने की हम व्यर्थ ही आशंका करते हैं। सच तो यह है कि यह आशंकाएं ही फिर वैसी ही बीमारियां लातीं हैं। हम अपनी इस देह के बारे में यह मानकर चलें यह हम नहीं है बल्कि आत्मा है तो ही इसे समझ पायेंगे। इसलिये दैहिक तकलीफों की न तो चिंता करें और न ही लोगों से चर्चा करें। ऐसा नहीं है कि योगसाधना करने से आदमी कभी बीमार नहीं होता पर वह अपने आसनों से या घरेलू चिकित्सा से उसका हल कर लेता है। यह बात मैने अपने अनुभव से सीखी है और वही बता रहा हूं। योगसाधना कोई किसी कंपनी का प्राडक्ट नहीं है जो मैं बेच रहा हूं बल्कि अपना सत्य रहीम के दोहे के बहाने आपको बता रहा हूं।
दीपक भारतदीप, संकलक एवं संपादक

Tuesday, July 22, 2008

रहीम के दोहेःमन पर नियंत्रण हो तो चिंता की बात नहीं

जो रहीम होती कहूं, प्रभू गति अपने हाथ
तो काधों केहि मानतो, आप बढ़ाई साथ

कविवर रहीम कहते हैं कि यदि परमात्मा ने मनुष्य को अपना भाग्य स्वयं लिखन की शक्ति दी होती तो जाने क्या होता? सभी अपनी महिमा बढ़ाने करने का प्रयास करते और कोई किसी को नहीं मानता।

जो रहीम मन हाथ है, तो तन कहुं किन जाहिं
ज्यों जल में छाया परे, काया भीजत नाहिं


कविवर रहीम कहते हैं कि यदि मन अपने वश में है तो चाहे जहां जायें उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। चाहे कोई कितना भी प्रेरित करे अगर मन पर नियंत्रण है तो कोई बुरे मार्ग पर चलने के लिये प्रेरित नहीं कर सकता।

संपादकीय व्याख्या-मनुष्य की पहचान उसके मन से ही है। वह उसका संचालन करता है और मनुष्य को स्वयं ही चलने का भ्रम होता है। परमात्मा ने मन की गति को बहुत तीव्र बनाया है पर मनुष्य की देह की शक्ति को सीमित रखा है अगर वह ऐसा नहीं करता तो इस पूरी दुनियां में सिवाय खून खराबे के कुछ नहीं होता। मनुष्य को अपनी नियति तय करने की शक्ति नहीं है तब यह हाल है कि अहंकार को त्यागने को तैयार नहीं होता अगर होती तो वह सिवाय अपने किसी को सहन नहीं करता।

जो मनुष्य अपने मन पर नियंत्रण करते हैं वह आत्मसंयम के साथ जीवन सुख पूर्वक व्यतीत करते हैं पर जो अनियंत्रित गति के साथ दौड़ रहे मन के साथ चलने का प्रयास करते हैं उनको भारी कष्ट उठाने पड़ते हैंं। दुर्घटनाओं का भय तो लगा ही रहता है। मन के मार्ग में भला कोई आता है पर देह का मार्ग में तो अन्य देह और वाहन आ जाते हैं और उनसे टक्कर होने की आशंक रहती है।
दीपक भारतदीप, संकलक एवं संपादक

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