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Friday, March 13, 2009

रहीम दर्शन: कथनी और करनी में भेद अज्ञान का प्रमाण

अनकीन्ही बातें करै, सोवत जागै जोय
ताहि सिखाय जगायबो, रहिमन उचित न होय

कविवर रहीम कहते हैं कि कई लोग ऐसे हैं जो कहते कुछ और हैं और करते कुछ और हैं। ऐसे लोग जागते हुए भी सोते हैं। ऐसे अहंकार व्यक्ति को सिखाना या जागृत करना बिल्कुल व्यर्थ है।

कदल सीप भुजंग मुख, स्वाति एक गुन तीन
जैसी संगति बैठिए, तैसोई फल दीन

कविवर रहीम कहते हैं कि कि स्वाति नक्षत्र की वर्षा की बूंदें कदली में प्रवेश कर कपूर बना जाता है, समुद्र की सीपी में जाकर मोती का रूप धारण कर लेता है और वही जल सर्प के मुख में जाकर विष बन जाता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में ऐसे व्यक्तियों की अभाव नहीं है जो अपनी कथनी और करनी में भारी भेद प्रकट करते हुए थोड़ा भी संकोच अनुभव नहीं करते। एक तरफ वह आदर्श की बात करते हुए नहीं थकते पर दिन भर वह माया के फेरे में सारी नैतिकता को तिलांजलि देते हैंं। अगर ऐसा न होता तो इस देश में इतने सारे साधु और संत और उनके करोड़ों शिष्य हैं फिर भी पूरे देश मेंे अनैतिकता, भ्रष्टाचार, गरीबों और परिश्रमियों का दोहन तथा अन्य अपराधों की प्रवृतियों वाले लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। आजकल ईमादारी से संग्रह करना कठिन हो गया है। इसका आशय यह है कि जो कमा रहे हैं वही दान कर रहे हैं और अपने गुरुओं के आश्रमों में भी उपस्थिति दिखाते हैं। हर जगह धन सम्राज्य है पर माया से दूर रहने की बात सभी करते हैं। अपराधी हो या सामान्य आदमी भक्ति जरूर करते दिखते हैं। अपराधी अपने दुष्कर्म से बाज नहीं आता और सामान्य आदमी को अपने काम से ही समय नहीं मिलता। बातें सभी आदर्श की करते हैं। यही भेद है जिसके कारण देश में अव्यवस्था फैली है।

इसके अलावा सभी लोग भले आदमी से संगति तो करना ही नहीं चाहते। जो समाज को अपनी शक्ति से आतंकित कर सकता है लोग उससे अपने संपर्क बनाने को लालायित रहते हैं। वह सोचते हैं कि ऐसे असामाजिक तत्व समय पर उनके काम में आयेंगे पर धीरे-धीरे उनके संपर्क में रहते हुए उनका स्वयं का नैतिक आचरण पतन की ओर अग्रसर हो जाता है। संगति का प्रभाव होता है-यह बात निश्चित है। अगर किसी शराबी के पास कोई व्यक्ति बैठ जाये तो उसकी बातें सुनकर उसका स्वयं का मन वितृष्णा से भर जाता है और वही व्यक्ति किसी सत्संगी के पास बैठे तो उसमें अच्छे और सुंदर भावों का प्रवाह अनभूति कर सकता है। अतः अपने लिये हमेशा अच्छी संगति ही ढूंढना चाहिए।
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Saturday, January 24, 2009

मनुस्मृति:राज्य दंड सचेत हो तभी जनता सुखी रहती है

  1. देश, काल, विद्या एवं अन्यास में लिप्त अपराधियों की शक्ति को देखते हुए राज्य को उन्हें उचित दण्ड देना चाहिए।
  2. सच तो यह है कि राज्य का दण्ड ही राष्ट्र में अनुशासन बनाए रखने में सहायक तथा सभी वर्गों के धर्म-पालन कि सुविधाओं की व्यवस्था करने वाला मध्यस्थ होता है।
  3. सारी प्रजा के रक्षा और उस पर शासन दण्ड ही करता है, सबके निद्रा में चले जाने पर दण्ड ही जाग्रत रहता है।
  4. भली-भांति विचार कर दिए गए दण्ड के उपयोग से प्रजा प्रसन्न होती है। इसके विपरीत बिना विचार कर दिए गए अनुचित दण्ड से राज्य की प्रतिष्ठा तथा यश का नाश हो जाता है।
  5. यदि अपराधियों को सजा देने में राज्य सदैव सावधानी से काम नहीं लेता, तो शक्तिशाली व्यक्ति कमजोर लोंगों को उसी प्रकार नष्ट कर देते हैं, जैसे बड़ी मछ्ली छोटी मछ्ली को खा जाती है।
  6. संसार के सभी स्थावर-जंगम जीव राजा के दण्ड के भय से अपने-अपने कर्तव्य का पालने करते और अपने-अपने भोग को भोगने में समर्थ होते हैं ।

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Monday, January 19, 2009

कबीर के दोहे: जंग से अधिक मिल बांटकर खाने में होती है साहस की आवश्यकता

कबीर तो सांचै मतै, सहै जू सनमुख वार
कायर अनी चुभाय के, पीछे झखै अपार


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहत हैं कि सच्चा वीर तो वह है जो सामने आकर लड़ता है पर जो कायर है वर पीठ पीछे से वार करता है।

तीर तुपक सों जो लड़ैं, सो तो सूरा नाहिं
सूरा सोइ सराहिये, बांटि बांटि धन खांहि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो अस्त्र शस्त्र से लड़ते है। उनको वीर नहीं कहा जा सकता है। सच्चे शूरवीर तो हैं जो आपस में मिल बैठकर खाते हैं। वह जो भी कमाते हैं उसे समान रूप से आपस में बांटते हैं।

वर्तमान सन्दर्भ में संपादकीय व्याख्या-शूरवीर हमेशा उसे ही माना जाता है जो अस्त्र शस्त्र का उपयोग करता है। उनमें भी वही वीर है जो सामने से वार करता है पर जो कायर हैं वह पीठ पीछे वार करते हैं। वैसे अस्त्र शस्त्र से लड़ने में भी साहस की आवश्यकता कहां होती है। अगर अस्त्र शस्त्र हाथ में हों तो वेसे भी मनुष्य के मन में दुस्साहस आ ही जाता है और कोई भी उपयोग कर सकता है। कुछ लोग कहते हैं कि हथियार रखने से क्या होता है उसे चलाने के लिये साहस भी होना चाहिये-विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर लोहे से बना कोई हथियार मनुष्य के हाथ में हो तो उसमें आक्रामता आ ही जाती है।

असली साहस तो अपने कमाये धन का दूसरे के साथ बांटकर खाने में दिखाना चाहिये। आदमी जब धन कमाता है तो उसके प्रति उसका मोह इतना हो जाता है कि वह उसे किसी को थोड़ा देने में भी हिचकता है। मिलकर बांटने की बात तो छोडि़ये अपनी रोटी का छोटा टुकड़ा देने में भी आदमी की जान जाती है।

हमारे प्राचीन मनीषियों ने दान की महिमा को इसलिये प्रतिपादित किया कि समाज में सामाजिक समरसता का भाव रहे। हमारे अध्यात्म में इतना तक कहा गया है कि किसी को दान देते हुए आंखें नीची करना चाहिये ताकि दूसरे को हमारा अहंकार नहीं दिखाई दे और उसके अंदर अपने प्रति कुंठा भाव न उत्पन्न हो। मगर अब तो समाज कल्याण की बात राज्य के भरोसे छोड़ दी गयी है और वही लोग जन कल्याण के लिये मैदान में उतर रहे हैं जिनको उससे कुछ आर्थिक फायदा है। यह लोग कायर होते हैं क्योंकि दान और कल्याण क लिये प्राप्त धन का वह हरण करते हैं।

कलुषित तरीके से प्राप्त धन का भी वह दान करने का साहस नहीं कर पाते। अपने धन देने में सभी का हृदय कांपने लगता है। सच है कि जो दानी है वही सच्चा शूरवीर है। वह भी सच्चा वीर है जो अस्त्र शस्त्र लेकर कहकर सामने से प्रहार करता है पर आजकल तो कायरों की पूरी फौज है जो पीठ पीछे से वार करती है। चोर और डकैतों द्वारा किये गये और अपराध और निरंतर बम धमाकों की बढ़ती घटनायें इस बात का प्रमाण हैं।
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Wednesday, December 24, 2008

कबीर वाणी:अपना ऊंचा आवास देख कर घमंड न करें

कबीर गर्व न कीजिए, ऊंचा देखि आवास
काल परौं भूईं लेटना, ऊपर जमसी घास


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं की अपना शानदार मकान और शानशौकत देख कर अपने मन में अभिमान मत पालो जब देह से आत्मा निकल जाती हैं तो देह जमीन पर रख दी जाती है और ऊपर से घास रख दी जाती है।

आज के संदर्भ में व्याख्या-यह कोई नैराश्यवादी विचार नहीं है बल्कि एक सत्य दर्शन है। चाहे अमीर हो या गरीब उसका अंत एक जैसा ही है। अगर इसे समझ लिया जाये तो कभी न तो दिखावटी खुशी होगी न मानसिक संताप। सबमें आत्मा का स्वरूप एक जैसा है पर जो लोग जीवन के सत्य को समझ लेते हैं वह सबके साथ समान व्यवहार करते हैं। हम जब किसी अमीर को देखते हैं तो उसको चमत्कृत दृष्टि से देखते हैं और कोई गरीब हमारे सामने होता है तो उसे हेय दृष्टि से देखते हैं। यह हमारे अज्ञान का प्रतीक है। यह अज्ञान हमारे लिए कष्टकारक होता है। जब थोडा धन आता है तो मन में अंहकार आ जाता है और अगर नहीं होता तो निराशा में घिर जाते हैं और अपने अन्दर मौजूद आत्मा को नहीं जान पाते। यह आत्मा जब हमारी देह से निकल जाता है तो फिर कौन इस शरीर को पूछता है, यह अन्य लोगों की मृतक देह की स्थिति को देख सीख लेना चाहिये।
कई शानदार मकान बनते हैं पर समय के अनुसार सभी पुराने हो जाते हैं। कई महल ढह गये और कई राजा और जमींदार उसमें रहते हुए पुजे पर समय की धारा उनको बहा ले गयी। इनमें से कई का नाम लोग याद तक नहीं करते। हां, इतिहास उन लोगों को याद करता है जो समाज को कुछ दे जाते हैं। वैसे अपने इहकाल में भी किसी धनी को वही लोग सम्मान देते हैं जो उससे स्वार्थ की पूर्ति करते हैं पर जो ज्ञानी,प्रतिभाशाली और दयालु है समाज उसको वैसे ही सम्मान देता है यह जाने बगैर कि उसका घर कैसा है?
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Thursday, August 14, 2008

चाणक्य नीति:जिसके पास अक्ल उसी के पास होती है ताकत

१.इतने भारी शरीर वाला हाथी छोटे से अंकुश सा वश में किया जाता है. सब जानते हैं की अंकुश परिमाण में हाथी से बहुत छोटा होता है. प्रज्जवलित दीपक आसपास अंधकार को ख़त्म कर देता है. जबकि परिमाण में अन्धकार तो दीपक से कहीं अधिक विस्तृत एवं व्यापक होता है.वज्र के प्रभाव से बडे-बडे पर्वत टूट जाते हैं. जबकि वज्र पर्वत से बहुत छोटा होता है.
चाणक्य के इस कथन से आशय यह है की अंकुश से इतने बडे हाथी को बाँधना, छोटे से वज्र से विशाल एवं उन्मत पर्वतों का टूटना, इतने घने अन्धकार का छोटे से प्रज्जवलित दीपक से समाप्त हो जाना इसी सत्य के प्रमाण है की तेज ओज की ही विजय होती है. तेज में ही अधिक शक्ति होती है.
२.जिस प्राणी के पास बुद्धि है उसके पास सभी तरह का बल भी है. वह सभी कठिन परिस्थितियों का मुकाबला सहजता से करते हुए उस पर विजय पा लेता है. बुद्धिहीन का बल भी निरर्थक है, क्योंकि वह उसका उपयोग ही नहीं कर पता. बुद्धि के बल पर ही के छोटे से जीव खरगोश ने महाबली सिंह को कुएँ में गिराकर मार डाला. यह उसकी बुद्धि के बल पर ही संभव हो सका.
३.यह एक कटु सच्चाई है की किसी भी ढंग से समझाने पर भी कोई दुष्ट सज्जन नहीं बन जाता, जैसे घी-दूध से सींचा गया, नीम का वृक्ष मीठा नहीं हो जाता.
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Wednesday, July 30, 2008

विदुर नीतिःदूसरों की मजाक उड़ाने वाला महादरिद्र

1.दूसरों के अभद्र शब्द सुनकर भी स्वयं उन्हें न कहे। क्षमा करने वाला अगर अपने क्रोध को रोककर भी बदतमीजी करने वाले का नष्ट कर और उसके पुण्य भी स्वयं प्राप्त कर लेता है।
2.दूसरों से न तो अपशब्द कहे न किसी का अपमान करें, मित्रों से विरोध तथा नीच पुरुषों की सेवा न करें।सदाचार से हीन एवं अभिमानी न हो। रूखी तथा रोष भरी वाणी का परित्याग करं।
3.इस जगत में रूखी या शुष्क वाणी, बोलने वाले मनुष्य के ही मर्मस्थान हड्डी तथा प्राणों को दग्ध करती रहती है। इस कारण धर्मप्रिय लोग जलाने वाली रूखी वाणी का उपयोग कतई न करें।
4.जिसकी वाणी रूखी और शुष्क है, स्वभाव कठोर होने के साथ ही वह जो दूसरों के मर्म कटु वचन बोलकर दूसरों के मन पर आघात और मजाक उड़ाकर पीड़ा पहुंचाता है वह मनुष्यों में महादरिद्र है और वह अपने साथ दरिद्रता और मृत्यु को बांधे घूम रहा है।
5.कोई मनुष्य आग और सूर्य के समान दग्ध करने वाले तीखे वाग्बाणों से बहुत चोट पहुंचाए तो विद्वान व्यक्ति को चोट खाकर अत्यंत वेदना सहते हुए भी यह समझना कि बोलने वाला अपने ही पुण्यों को नष्ट कर रहा है।
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Monday, July 28, 2008

विदुर नीति:स्त्रियों पर अनाचार करने वाले नीचे गिरते हैं

1.प्रतिदिन सींचने से जिस तरह पतली लताएं संख्या में बहुत होने के कारण हवाओं को झौंके बहुत समय तक झेलती है उसी प्रकार सत्य पुरुष दुर्बल होने पर भी अपने गुणों की शक्ति पर बलवान हो जाते हैं।
2.विद्वान और सत्पुरुषों, स्त्रियों, स्वजातीय बंधुओं और गायों पर अपनी शूरता प्रकट करते हैं वे डण्ठल से पके हुए फलों की भांति नीचे गिरते हैं।
3.बीमारी हुए बिना ही उत्पन्न, कड़वा, सिर में दर्द पैदा करने वाला और पाप से जोड़ने वाला, कठोर, तीखा और गरम है तथा सज्जनों द्वारा ग्रहण करने योग्य नहीं है उस क्रोध को पी जाना ही बेहतर है।
4.अपनी उन्नति चाहने वाले को चाहिए कि वह उत्तम पुरुषों की सेवा करे, समय आने पर मध्यम पुरुषों की भी सेवा करे परंतु अधम पुरुषों की सेवा कदापि न सुने।
5दुष्ट पुरुष बल से तो अन्य पुरुष निरंतर उद्योग , बुद्धि के प्रयोग तथा पुरुषार्थ से धन भले ही प्राप कर ले परंतु उत्तम कुल का आचरण और सदाचार प्राप्त करना आसान नहीं है।
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Friday, July 25, 2008

संत कबीर वाणीःअपना इष्टदेव बदलकर भक्ति करने वाला तर नहीं सकता

कामी तरि, क्रोधी तरै, लोभी तरै अनन्त
आन उपासी कृतधनी, तरै न गुरु कहन्त

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कामी और क्रोधी तर सकते हैं और लोभी भी इस भव सागर से तरकर परमात्मा को पा सकते हैं पर जो अपने इष्ट देव की उपासना त्यागता है और गुरु का संदेश नहीं मानता वह कभी तर नहीं सकता।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अगर कबीरदास जी के इस दोहे का आशय समझें तो उनके अनुसार वह उस हर व्यक्ति को अपने इष्ट देव की उपासना न छोड़ने का संदेश दे रहे हैं। एक तरह से धर्म परिवर्तन को एक भ्रम बता रहे हैं। उस समय धर्म शब्द उस रूप में प्रचलित नहीं था जिस तरह आज है बल्कि लोगों को अपने अपने इष्ट देवों को उपासक के रूप में पहचान थी यही कारण है कि कबीरदास जी के साहित्य में धर्मों के नाम नहीं मिलते बल्कि सभी लोगों को एक समाज मानकर उन्होंने अपनी बात कही है।
दरअसल धर्म का आशय यह है कि निंरकार परमात्मा की उपासना, परोपकार, दान और सभी के साथ सद्व्यवहार करना। वर्तमान समय में इष्ट देवों की उपासना के नाम पर धर्म बनाकर भ्रम फैला दिया गया है और विश्व के अनेक भागों में कई लोगोंं को धन तथा रोजगार का लालच या जीवन का भय दिखाकर धर्म परिवर्तन करवाने की प्रवृत्ति बढ़ी है। ऐसे कई समाचार आते हैं कि अमुक जगह धर्म अमुक ने धर्म परिवर्तन कर लिया। ऐसा समाचार केवल भारत में नहीं अन्य देशों से भी आते है। यह केवल कुछ लोगों का भ्रम है या वह भ्रम फैलाने और प्रचार पाने के लिये ऐसा करते हैं।

देख जाये तो परमात्मा एक ही है सब मानते हैं। लोग उसे विभिन्न रूपों और नामों से जानते हैं। ऐसे में उसके किसी स्वरूप का बदलकर दूसरे स्वरूप में पूजने का आशय यही है कि आदमी भ्रमित हैं। हमारे देश में तो चाहे आदमी कैसा भी हो किसी न किसी रूप में उसकी उपासना करता है। कोई न कोई पवित्र ग्रंथ ऐसा है जिसे पढ़ता न हो पर मानता है। ऐसे में वह एक स्वरूप को छोड़कर दूसरे की उपासना और एक पवित्र ग्रंथ को छोड़कर दूसरा पढ़ने लगता है तो इसका आशय यह है कि उसकी नीयत ठीक नहीं और जो इसके लिये प्रेरित कर रहे हैं उन पर भी संदेह होता है। संत कबीरदास जी के कथानुसार ऐसे लोग कभी जीवन में तर नहीं सकते भले ही दुष्ट और कामी लोग तर जायें। संत कबीरदास जी तो निरंकार के उपासक थे और वर्तमान में तो पूरा विश्व एक ही परमात्मा को मानता है और ऐसे में उसके स्वरूप को बदलकर दूसरे के रूप में पूजना वह स्वार्थ और लोभ का परिणाम मानकर सभी को उसके लिये रोकने का संदेश कबीरदास जी देते थे।
आशय यह यही है कि बचपन से जिस इष्ट का माना उसे छोड़कर दूसरे की उपासना नहीं करना चाहिए। न ही अपने गुरु, माता पिता और बंधुओं द्वारा सुझाये गये इष्ट के अलावा किसी और का विचार नहीं करना चाहिए। अगर कोई ऐसा करता है तो वह स्वार्थ से प्रेरित है और स्वार्थ से की गयी भक्ति से कोई लाभ नहीं होता। सबसे बड़ी आवश्यकता इस बात की चाहे जो भी इष्ट हो उसकी निष्काम भक्ति करना चाहिए।

संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Thursday, July 24, 2008

रहीम के दोहे-परमात्मा का चरित्र वर्णनातीत

रहिमन बात अगम्य की, कहन सुनन की नाहिं
जो जानत सो कहत नहिं, कहत त जानत नाहिं

कविवर रहीम कहते हैं कि परमात्मा का वर्णन करना कठिन है। उसका स्वरूप अगम्य है और कहना सुनना कठिन है जो जानते हैं वह कहते नहीं हैं जो कहते हैं वह जानते नहीं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-सच तो यह है कि परमात्मा के स्वरूप कोई समझ नहीं सकता । उसकी व्याख्या हर कोई अपने अनुसार हर कोई करता है पर वास्तविकता का वर्णन करना कठिन है। अनेक लोग अपने अनुसार भगवान के स्वरूप की व्याख्या करते है। पर सच तो यह है कि उनके स्वरूप का वर्णन कहना और सुनना कठिन है। उनको तो केवल भक्ति से ही धारण किया जा सकता है। परमात्मा का चरित्र वर्णनातीत है और सच्चे भक्त इस बात को जानते हैं पर कहते नहीं है और जो कहते हैं वह जानते नहीं है। अनेक लोग परमात्मा के अनेक स्वरूपों में से हरेक के जीवन चरित्र पर व्याख्या करते हुए अपना ज्ञान बघारते हैं पर सच तो यह है कि यह उनका व्यवसाय है और वह उसके बारे में कुछ नहीं जानते हैं। उनके वास्तविक स्वरूप को सच्चे भक्त ही जानते हैं पर वह उसका बखान कर अपने अहंकार का प्रदर्शन नहीं करते। अनेक लोग तमाम तरह की खोज का दावा करते हैं तो कुछ लोग कहीं एकांत में तपस्या कर सिद्धि प्राप्त कर फिर समाज में अपना अध्यात्मिक सम्राज्य कायम करने के लिये जुट जाते हैं। ऐसे ढोंगी लोग परमात्मा के स्वरूप का उतना ही बखान करते है जितने से उनका हित और आय का साधन बनता हो।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Wednesday, July 23, 2008

रहीम के दोहेःअपनी देह की चिंताग्नि में मत जलो

जसी परै सो सहि रहै, कहि रहीम यह देह
धरती पर ही परत है, शीत घाम और मेह

कविवर रहीम कहते हैं कि इस मानव काया पर जैसी परिस्थिति आती है वैसा ही वह सहन भी करती है। इस धरती पर ही सर्दी, गर्मी और वर्षा ऋतु आती है और वह सहन करती है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-पश्चिमी चिकित्सा विशेषज्ञों तमाम तरह के शोधों के बाद यह कह पाये कि हमारी देह बहुत लोचदार है उसमें हालतों से निपटने की बहुत क्षमता है। इसके लिये पता नहीं कितने मेंढकों और चूहों को काटा होगा-फिर इस निष्कर्ष पर पहुंचे । हमारे मनीषियों ने अपनी योग साधना और भक्ति से अर्जित ज्ञान से बहुत पहले यह जान लिया कि इस देह में बहुत शक्ति है और वह परिस्थितियों के अनुसार अपने को ढाल लेती है। ज्ञान या तो योग साधना से प्राप्त होता है या भक्ति से। रहीम तो भक्ति के शिखर पुरुष थे और अपनी देह पर कतई ध्यान नहीं देते थे पर फिर भी उनको इस मनुष्य देह के बारे में यह ज्ञान हो गया पर आजकल अगर आप किसी सत्संग में जाकर बैठें तो लोग अपनी दैहिक तकलीफों की चर्चा करते हैं, और वहां ज्ञान कम आत्मप्रवंचना अधिक करते हैं। कोई कहेगा ‘मुझे मधुमेह हो गया है’ तो कोई कहेगा कि मुझे ‘उच्च रक्तचाप’ है। जिन संत लोगों का काम केवल अध्यात्मिक प्रवचन करना है वह उनकी चिकित्सा का ठेका भी लेते हैं। यह अज्ञान और भ्रम की चरम परकाष्ठा है।

मैने अपने संक्षिप्त योग साधना के अनुभव से यह सीखा है कि देह में भारी शक्ति होती है। मुझे योगसाधना का अधिक ज्ञान नहीं है पर उसमें मुझे अपने शरीर के सारे विकार दिखाई देते हैं तब जो लोग बहुत अधिक करते हैं उनको तो कितना अधिक ज्ञान होगा। पहले तो मैं दो घंटे योगसाधना करता था पर थोड़ा स्वस्थ होने और ब्लाग लिखने के बाद कुछ कम करता हूं (वह भी एक घंटे की होती है)तो भी सप्ताह में कम से कम दो बार तो पूरा करता हीं हूं। पहले मुझे अपना शरीर ऐसा लगता था कि मैं उसे ढो रहा हूं पर अब ऐसा लगता है कि हम दोनों साथ चलते हैं। मेरे जीवन का आत्मविश्वास इसी देह के लड़खड़ाने के कारण टूटा था आज मुझे आत्मविश्वास लगता है। आखिर ऐसा क्या हो गया?

इस देह को लेकर हम बहुत चिंतित रहते हैं। गर्मी, सर्दी और वर्षा से इसके त्रस्त होने की हम व्यर्थ ही आशंका करते हैं। सच तो यह है कि यह आशंकाएं ही फिर वैसी ही बीमारियां लातीं हैं। हम अपनी इस देह के बारे में यह मानकर चलें यह हम नहीं है बल्कि आत्मा है तो ही इसे समझ पायेंगे। इसलिये दैहिक तकलीफों की न तो चिंता करें और न ही लोगों से चर्चा करें। ऐसा नहीं है कि योगसाधना करने से आदमी कभी बीमार नहीं होता पर वह अपने आसनों से या घरेलू चिकित्सा से उसका हल कर लेता है। यह बात मैने अपने अनुभव से सीखी है और वही बता रहा हूं। योगसाधना कोई किसी कंपनी का प्राडक्ट नहीं है जो मैं बेच रहा हूं बल्कि अपना सत्य रहीम के दोहे के बहाने आपको बता रहा हूं।
दीपक भारतदीप, संकलक एवं संपादक

Thursday, July 17, 2008

रहीम के दोहे:स्वारथ के अनुसार लोग गुण-दोष ढूंढते हैं

स्वारथ रचत रहीम सब, औगनहूं जग मांहि
बड़े बड़े बैठे लखौ, पथ रथ कूबर छांहि

कविवर रहीम कहते हैं कि लोग अपने स्वार्थ के लिये दूसरे में गुण दोष निकालते हैं। जो कभी अपनी हित साधने के लिये मार्ग में रुके रथ के हरसे की टेढ़ी-मेढ़ी छाया को अशुभ कहा करते थे वही लोग उसी हरसी की छाया में बैठ कर अपने को धूप से बचाते हैं।

सर सूखै पंछी उड़ै, औरे सरन समाहि
दीन मीन बिन पंख के, कहु रहीम कहं जाहिं


कविवर रहीम कहते हैं कि तालाब का पानी सूखते ही पक्षी उड़कर दूसरे तालाब में चले जाते हैं पर उसमें रहने वाली मछली का क्या? वह तो असमर्थ होकर वहीं पड़ी रहती है। परमात्मा का ही उसे आसरा होता है।

साधु सराहै साधुता, जती जोखिता जान
रहिमन सांचे सूर को, बैरी करे बखान


सज्जन लोग ही सज्जनता की सराहना करते हैं दुष्ट नहीं। जो योगी हैं वही ज्ञान और ध्यान की सराहना करते है जबकि सामान्य जन उससे परे रहते हैं। पर जो शूरवीर हैं उनकी वीरता की प्रशंसा सभी करते हैं।

Monday, July 14, 2008

रहीम के दोहे: जब तक मिले मान, तभी तक रहो मेहमान

रहिमन जा डर निसि परै, ता दिन डर सब कोय
पल पल करके लागते, देखु कहां धौ होय

कविवर रहीम कहते हैं भारी संकट झेलने वाला व्यक्ति न तो रात को चैन से सो पाता है और न दिन में जाग पाता है। उसके हर अपने सामने संकट आता दिखता है। तमाम तरह की आशंकायें और भय उसके मन में समा जाते हैं।
रहिमन ठठरी धूर की, रही पवन ते पूरि
,गांठ युक्ति की खुलि गई, अन्त धूरि की धूरि

कविवर रहीम कहते हैं कि यह देह एक धूल की भरी हुई गठरी है जिसमें पांचो तत्व समाहित है। जब वह सब बिखर कर अलग हो जाते हैं तब यह अस्थि पंजर पड़ा रहता है और उसी धूल में मिल जाता है जहां से उत्पन्न हुआ था।

रहिमन तब लगि ठहरिये, दान, मान, सम्मान
घटत मान देखिए जबहि, तुरतहि करिय पयान

कविवर रहीम कहते हैं कि किसी भी स्थान पर तब तक ठहरिये आपको मान और सम्मान के साथ कुछ मिलता है। जब अपना मान सम्मान वहां कम होते देखें तो वहां से पलायन कर जाईये।

Saturday, July 12, 2008

रहीम के दोहे:जैसी होती संगति वैसी हो जाती प्रवृति

अनकीन्ही बातें करै, सोवत जागै जोय
ताहि सिखाय जगायबो, रहिमन उचित न होय

कविवर रहीम कहते हैं कि कई लोग ऐसे हैं जो कहते कुछ और हैं और करते कुछ और हैं। ऐसे लोग जागते हुए भी सेाते हैं। ऐसे अहंकार व्यक्ति को सिखाना या जागृत करना बिल्कुल व्यर्थ है।

कदल सीप भुजंग मुख, स्वाति एक गुन तीन
जैसी संगति बैठिए, तैसोई फल दीन

कविवर रहीम कहते हैं कि कि स्वाति नक्षत्र की वर्षा की बूंदें कदली में प्रवेश कर कपूर बना जाता है, समुद्र की सीपी में जाकर मोती का रूप धारण कर लेता है और वही जल सर्प के मुख में जाकर विष बन जाता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में ऐसे व्यक्तियों की अभाव नहीं है जो अपनी कथनी और करनी में भारी भेद प्रकट करते हुए थोड़ा भी संकोच अनुभव नहीं करते। एक तरफ वह आदर्श की बात करते हुए नहीं थकते पर दिन भर वह माया के फेरे में सारी नैतिकता को तिलांजलि देते हैंं। अगर ऐसा न होता तो इस देश में इतने सारे साधु और संत और उनके करोड़ों शिष्य हैं फिर भी पूरे देश मेंे अनैतिकता, भ्रष्टाचार, गरीबों और परिश्रमियों का दोहन तथा अन्य अपराधों की प्रवृतियों वाले लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। आजकल ईमादारी से संग्रह करना कठिन हो गया है। इसका आशय यह है कि जो कमा रहे हैं वही दान कर रहे हैं और अपने गुरुओं के आश्रमों में भी उपस्थिति दिखाते हैं। हर जगह धन सम्राज्य है पर माया से दूर रहने की बात सभी करते हैं। अपराधी हो या सामान्य आदमी भक्ति जरूर करते दिखते हैं। अपराधी अपने दुष्कर्म से बाज नहीं आता और सामान्य आदमी को अपने काम से ही समय नहीं मिलता। बातें सभी आदर्श की करते हैं। यही भेद है जिसके कारण देश में अव्यवस्था फैली है।

इसके अलावा सभी लोग भले आदमी से संगति तो करना ही नहीं चाहते। जो समाज को अपनी शक्ति से आतंकित कर सकता है लोग उससे अपने संपर्क बनाने को लालायित रहते हैं। वह सोचते हैं कि ऐसे असामाजिक तत्व समय पर उनके काम में आयेंगे पर धीरे-धीरे उनके संपर्क में रहते हुए उनका स्वयं का नैतिक आचरण पतन की ओर अग्रसर हो जाता है। संगति का प्रभाव होता है-यह बात निश्चित है। अगर किसी शराबी के पास कोई व्यक्ति बैठ जाये तो उसकी बातें सुनकर उसका स्वयं का मन वितृष्णा से भर जाता है और वही व्यक्ति किसी सत्संगी के पास बैठे तो उसमें अच्छे और सुंदर भावों का प्रवाह अनभूति कर सकता है। अतः अपने लिये हमेशा अच्छी संगति ही ढूंढना चाहिए।

Wednesday, June 25, 2008

चाणक्य नीतिःकपट रहित शुद्ध आचरण ही होता है धर्म

1.आज के युग में अर्थ की प्रधानता है और धन संचय प्रमुख आधर है। धन संचय हर मनुष्य के लिये आवश्यक है क्योंकि समय पड़ने पर कब उसकी जरूरत होती है पता ही नहीं पड़ता।
2.संसार में कोैन ऐसा व्यक्ति है जिसके कुल में दोष नहीं है। अगर गौर से देखों तो सभी कुलों में कहीं न कहीं कोई दोष दिखाई देता है। उसी प्रकार इस भूतल पर ऐसा कौनसा प्राणी है जो कभी रोग से पीडि़त नहीं होता या उस पर विपत्ति नहीं आती। इस प्रथ्वी पर ऐसा प्राणीनहीं मिल सकता जिसने हमेशा सुख ही देखा हो
3.किसी भी व्यक्ति के कुल का अनुमान उसके व्यवहार से लग जाता है। उसकी भाषा से उसके प्रदेश का का ज्ञान होता है। उसके शरीर को देखकर उसके खानपान का अनुमान किया जा सकता है। इस तरह किसी भी व्यक्ति से बातचीत में उसके बारे में बहुत कुछ जाना जा सकता है।
4.वह भोजन पवित्र कहलाता है जो विद्वानों के भोजन करने पर शेष रह जाता है। दूसरे का हित करने वाली वृत्ति ही सच्ची सहृदयता है। श्रेष्ठ और बुद्धिमान पुरुष वही होता है जो पापकर्मों में प्रवृत्त नहीं होता। कल्याण क लिये वह धर्म और कर्म श्रेष्ठ है जो अहंकार के बिना किया जाये। छलकपट से दूर रहकर शुद्ध आचरण ही करना धर्म है।

Tuesday, June 24, 2008

चाणक्य नीतिःस्त्री में होता है पुरुष से छह गुना अधिक साहस

1.कोयल की मधुर वाणी उसका रूप है। वह भी कौए की तरह काली और कुरूप होती है पर उसका कर्णप्रिय स्वर मनुष्य को अपनी ओर आकर्षित करता है लोग उसके कुरूप होने का दुर्गुण भूल जाते हैं। वह उसके काले और भद्दे होने की उपेक्षा कर उससे प्रेम करने लगते हैं।
2.नारी में पुरुष से दोगुना भोजन करने की क्षमता होती है जबकि लज्जा चार गुना अधिक होती है। साहस छह गुना अधिक होता है।
3.नदी के तेज बहाव के कारण उसके किनारे खडे पेड़ पौधे जिस तरह नष्ट हो जाते हैं उसी तरह दूसरे के घर में रहने वाली स्त्री भी लांछित हो जाती है क्योंकि उसके लिये अपनी रक्षा करना अत्यंत कठिन होता है।
4.किसी भी पुरुष का घर स्त्री के कारण ही बसता है इसलिये नारी में कुल गुण और सहृदयता का होना आवश्यक है। जहां उसका पति के प्रति अनुराग नहीं होगा वहां जीवन की गाड़ी नहीं चल पायेगी। इसलिये स्त्री मन और वचन से सत्य बोलने, सदुव्यवहार करने और श्रेष्ठ गुणों वाली होना आवश्यक है।
5.धरती से निकलने वाला जल, पवित्र व शुद्ध होता है उसी तरह पतिव्रता नारी सदैव शुद्ध और पवित्र होती है। प्रजा के हित के संलिप्त रहने वाला राज तथा संतोष करने वाला विद्वान हमेशा पवित्र होता है।

Monday, June 23, 2008

संत कबीर वाणी:नाक तक खाना भरे वह साधू नहीं

जीभ स्वाद के कूप में, जहां हलाहल काम
अंग अविद्या ऊपजै, जाय हिये ते नाम


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब तक जीभी स्वाद के गहरे कुऐं में है तब तक आदमी में अज्ञान रहेगा और वह परमात्मा के नाम से दूर ही रहेगा क्योंकि उसमें विष अपना काम करता है।


अहार करै मन भावता, जिभ्या केरे स्वाद
नाक तलक पूरन भरै, क्यों कहिये वे साध


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि आदमी जीभ के स्वाद में पड़कर अपने मन को पसंद आने वाले आहार की खोज में लगा रहता है। वह नाक तक खाना भर लेता है फिर उसे साधु कैसे कहा जा सकता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अगर देखें तो अब सामान्य आदमी केवल खाने के लिये ही अपना जीवन गुजार रहा है। लोग अपने घर के बने भोजन से कहीं अधिक बाहर के भोजन को पसंद करने लगे हैं। चटपटे मसालेदार व्यंजन जो खाने में स्वादिष्ट लगते हैं पर उनका प्रभाव स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा नहीं माना जाता उनको उदरस्थ करने में जुटी भीड़ कहीं भी देखी जा सकती हैं। कितनी विचित्र बात है कि आदमी अपने घर में अपने खाने की सामग्री ढंक कर रखता है और अगर कहीं वह खुली छूट जाये तो उसको बाहर फैंक देता है क्योंकि उसमें कीड़ों के होने की आशंका हो जाती है पर वही बाहर दुकानों और होटलों पर खुले में रखे व्यंजन खाने में बहुत रुचि लेता है जिसके बारे में उस स्वयं पता ही नहीं होता कि कब से वह खुले पड़ें हैं। अधिकतर स्वास्थ्य विशेषज्ञ लोगों को बाहर की चीजें खाने से रोकने की राय देते हैं पर लोग उनकी अनदेखी कर विषैले पदार्थ स्वाद के ग्रहण करते है और फिर बीमार पड़ते हैं। आजकल जिस तरह बीमार लोगों की संख्या बढ़ रही है उसको देखकर यह चिंता का विषय है। अगर देह में विकार हों तो आदमी के मन में भक्ति और सत्संग की भावना पैदा नहीं होती यह समझ लेना चाहिए।

Saturday, June 21, 2008

भृतहरि शतकःकाल्पनिक स्वर्ग का विचार करना व्यर्थ

स्वपरप्रतारकोऽसौ निन्दति योऽलीकपण्डितो युवतीः
यस्मात्तपसोऽपि फलं स्वर्गस्तयापि फलं तथाप्सरसः


हिंदी में भावार्थ- जो शास्त्र ज्ञान में अधकचरे पण्डित स्त्रियों की निंदा करते हैं वे अपने और पराए सभी को धोखा देते हैं, क्यों तपस्या से जिस स्वर्ग की प्राप्ति होती है, उस स्वर्ग का फल भी अप्सराओं के साथ भोग विलास ही है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- अनेक कथित ज्ञानी लोग स्त्री को नरक का द्वार कहते हुए उससे दूर रहने का उपदेश देते हैं। ऐसे लोग केवल पाखंड के अलावा कुछ नहीं करते। वास्तविकता यह है कि वह अपने कथित ज्ञान से वह जिस तपस्या आदि करने का प्रचार करते हैं वह केवल कल्पित स्वर्ग की प्राप्ति करवाने वाला होता है। उसमें भी अप्सराओं से मिलन का सुख बखान किया जाता है। भर्तुहरि कहते हैं कि जब अप्सराओं जैसी सुंदर स्त्रियां इस धरती पर ही मिल जातीं हैं तो उनकी अवहेलना क्यों की जाये। एक तरफ स्वर्ग में अप्सराओं से मिलने के मोह में तप आदि का उपदेश करना और इस धरती की नारी से दूर रहने की बात करना पाखंड के सिवाय कुछ नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में इस बात का उल्लेख करना दिलचस्प रहेगा कि फिल्मों और टीवी चैनलों से जुड़ी अभिनेत्रियों को कहीं सैक्सी और सर्वाधिक सुंदर कहकर इसी संसार में काल्पनिक स्वर्ग की अनुभूति करवाकर यह दिखाने का प्रयास करते हैं कि अन्य कहीं भी स्त्री सुंदर नहीं है। यह भी एक एसा भ्रम है जिसमें युवक अपने हृदय में उनके चेहरे स्थापित कर लेते हैं। सामान्य लड़कियों में भी पर्दे की कथित सुंदरियों जैसा आकर्षण ढूंढने लगते है। अपनी जेब में उनके फोटो रखने लगते हैं। वह जिस सौंदर्य को वास्तविक समझते हैं केवल उन कथित पर्दे वाली सुंदरियों द्वारा उपयोग में लायी गयी सौदर्य प्रसाधन सामग्री और कैमरे का कमाल होता है। अतः कथित अप्सराओं के सौदर्य की कल्पना-चाहे वह धार्मिक संतों द्वारा प्रचारित हो या अन्य प्रचार माध्यमों द्वारा-में बहना नहीं चाहिए क्योंकि ऐसा करना व्यर्थ है।
दीपक भारतदीप

Friday, June 13, 2008

मनुस्मृतिःपानी का आचमन करने से आती है शुद्धता

सुप्त्वा क्षुत्वा च भुक्तवा च निष्ठीव्योक्त्वाऽनतानि च।
पीत्वाऽपोध्यध्यमाणश्च आचामेत्प्रयतोऽपि सन्।।


हिंदी में भावार्थ-सोने, छींकने, खाने, थूकने और झूठ बोलने के बाद अपनी शुद्धि पानी पीकर करनी चाहिए। इसके बाद भी अध्ययन करने से पहले एक बार जल का आचमन करना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-समय के साथ हमने कई पुराने संदेशों को भुला दिया है। पानी का सेवन करने से शरीर में कई प्रकार से शुद्धता आती है और तन की शुद्धता से ही मन में शुद्धता का भाव स्थापित हो पाता है। आजकल तो लोग अपने शरीर के साथ अधिक खिलवाड़ करते हैं। कंप्यूटर और टीवी में अपनी आंखों से निरंतर देखते रहते हैं इससे जो तन और मन में हानि होती है उसकी जानकारी उनको नहीं होती है। अनेक जानकार कहते हैं कि कंप्यूटर और टीवी पर एक संक्षिप्त अवधि से दृष्टिपात करने के बाद पानी पीना चाहिए और मूंह में कुल्ला भरकर आंखों में छींटे मारना चाहिए। हमारे देश में किसी भी वस्तु के उपभोग पर लोग उतारू तो हो जाते है पर उससे संबंधित सावधानियों पर ध्यान नहीं देते। कंप्यूटर पर काम करने के बाद अपनी आंखों पर पानी के छींटे मारने से जो राहत मिलती है उससे मस्तिष्क में आये तनाव से मुक्ति मिलती है। सबसे बड़ी बात यह है कि लोगों को यही पता नहीं होता कि तनाव क्या होता है? जब इस तरह पानी के छींटें मारें तब जो राहत मिलती है उस से ही पता लगता है कि कोई तनाव भी होता है।

Monday, June 9, 2008

भृतहरि शतक:गुप्त रहस्य उजागर न करे वही मित्र

पापान्निवारयति योजयते हिताय
गुह्मं निगूहति गुणान्प्रकटीकरोति।
आपद्गतं च न जहाति ददाति काले
सन्मित्रलक्षणमिदं प्रवदन्ति सन्तः


हिन्दी में भावार्थ- अपने मित्र को अधर्म और पाप से बचाना, उसके हित में संलग्न रहते हुए उसके गुप्त रहस्य किसी अन्य व्यक्ति के सामने प्रकट न करना, विपत्ति काल में भी उसके साथ रहना और आवश्यकता पड़े तो उसकी तन, मन और धन से सहायता करना यही मित्रता का लक्षण है।

संक्षिप्त व्याख्या-अक्सर हम लोग कहते है कि अमुक हमारा मित्र है और यह दावा करते हैं कि समय आने पर वह हमारे काम आयेगा। आजकल यह दावा करना मिथ्या है। देखा जाये तो लोग अपने मित्रों पर इसी विश्वास के कारण संकट में आते हैं। सभी परिचित लोगों को मित्र मानने की प्रवृत्ति संकट का कारण बनती है। कई बार हम लोग अपने गुप्त रहस्य किसी को बिना जांचे-परखे मित्र मानकर बता देते हैं बाद में पता लगता है कि उसका वह रहस्य हजम नहीं हुए और सभी को बताता फिर रहा है। वर्तमान में युवा वर्ग को अपने मित्र ही अधिक भ्रम और अपराध के रास्ते पर ले जाते हैं।

आजकल सच्चे और खरे मित्र मिलना कठिन है इसलिये सोच समझकर ही लोगों को अपना मित्र मानना चाहिए। वैसे कहना तो पड़ता ही है कि‘अमुक हमारा मित्र है’ पर वह उस मित्रता की कसौटी पर वह खरा उतरता है कि नहीं यह भी देख लेना चाहिए। भले जुबान से कहते रहे पर अपने मन में किसी को मित्र मान लेने की बात बिना परखे नहीं धारण करना चाहिए।

Wednesday, June 4, 2008

संत कबीर वाणी:प्रपंची गुरूओं से कोई लाभ नहीं


शब्द कहै सौ कीजिये, बहुतक गुरु लबार
अपने अपने लाभ को, ठौर ठौर बटपार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो सत्य का शब्द हो उसी के अनुसार कार्य करो। इस संसार में कई ऐसे गुरू हैं जो पांखडी और प्रपंची होते हैं। वह अपने स्वार्थ के अनुसार कार्य करते हुए उपदेश देते हैं और उनसे कोई लाभ नहीं होता।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस संबंध में मेरे द्वारा एक आलेख अन्य ब्लाग पर लिखा गया था जो यहां प्रस्तुत है।

आज के कथित संत और भक्त प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा का प्रतीक नहीं
भगवान श्रीराम ने गुरु वसिष्ठ से शिक्षा प्राप्त की और एक बार वहाँ से निकले तो फिर चल पड़े अपने जीवन पथ पर। फिर विश्वामित्र का सानिध्य प्राप्त किया और उनसे अनेक प्रकार का ज्ञान प्राप्त किया। फिर उन्होने अपना जीवन समाज के हित में लगा दिया न कि केवल गुरु के आश्रमों के चक्कर काटकर उसे व्यर्थ किया। भगवान श्री कृष्ण ने भी महर्षि संदीपनि से शिक्षा पाई और फिर धर्म की स्थापना के लिए उतरे तो वह कर दिखाया। न गुरु ने उन्हें अपने पास बाँध कर रखा न ही उन्होने हर ख़ास अवसर पर जाकर उनंके आश्रम पर कोई पिकनिक नहीं मनाई। अर्जुन ने अपने गुरु से शिक्षा पाई और अवसर आने पर अपने ही गुरु को परास्त भी किया। आशय यह है कि इस देश में गुरु-शिष्य की परंपरा ऐसी है जिसमें गुरु अपने शिष्य को अपना ज्ञान देकर विदा करता है और जब तक शिष्य उसके सानिध्य में है उसकी सेवा करता है। उसके बाद चल पड्ता है अपने जीवन पथ पर और अपने गुरु का नाम रोशन करता है।

भारत की इसी प्राचीनतम गुरु-शिष्य परंपरा का बखान करने वाले गुरु आज अपने शिष्यों को उस समय गुरु दीक्षा देते हैं जब उसकी शिक्षा प्राप्त करने की आयु निकल चुकी होती है और फिर उसे हर ख़ास मौके पर अपने दर्शन करने के लिए प्रेरित करते हैं। कई तथाकथित गुरु पूरे साल भर तमाम तरह के पर्वों के साथ अपने जन्मदिन भी मनाते हैं और उस पर अपने इर्द-गिर्द शिष्यों की भीड़ जमा कर अपनी आध्यात्मिक शक्ति का प्रदर्शन करते हैं. यहाँ इस बात का उल्लेख करना गलत नहीं होगा की भारतीय जीवन दर्शन में जन्मदिन मनाने की कोई ऐसी परंपरा नहीं है जिसका पालन यह लोग कर रहे हैं.

भारत में गुरु शिष्य की परंपरा एक बहुत रोमांचित करने वाली बात है, पूरे विश्व में इसकी गाथा गाई जाती है पर आजकल इसका दोहन कुछ धर्मचार्य अपने भक्तो का भावनात्मक शोषण कर रहे हैं वह उसका प्रतीक बिल्कुल नहीं है। हर व्यक्ति को जीवन में गुरु की आवश्यकता होती है और खासतौर से उस समय जब जीवन के शुरूआती दौर में एक छात्र होता है। अब गुरुकुल तो हैं नहीं और अँग्रेज़ी पद्धति पर आधारित शिक्षा में गुरु की शिक्षा केवल एक ही विषय तक सीमित रह गयी है-जैसे हिन्दी अँग्रेज़ी, इतिहास, भूगोल, विज्ञानआदि। शिक्षा के समय ही आदमी को चरित्र और जीवन के गूढ रहस्यों का ज्ञान दिया जाना चाहिए। यह देश के लोगों के खून में ही है कि आज के कुछ शिक्षक इसके बावजूद अपने विषयों से हटकर शिष्यों को गाहे-बगाहे अपनी तरफ से कई बार जीवन के संबंध में ज्ञान देते हैं पर उसे औपचारिक मान कर अनेक छात्र अनदेखा करते हैं पर कुछ समझदार छात्र उसे धारण भी करते हैं.

यही कारण है कि आज अपने विषयक ज्ञान में प्रवीण तो बहुत लोग हैं पर आचरण, नैतिकता और अध्यात्म ज्ञान की लोगों में कमी पाई जाती है। इस वजह से लोगों के दिमाग में तनाव होता है और उसको उससे मुक्ति दिलाने के लिए धर्मगुरू आगे आ जाते हैं। आज इस समय देश में धर्म गुरु कितने हैं और उनकी शक्ति किस तरह राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में फैली है यह बताने की ज़रूरत नहीं है। तमाम तरह के आयोजनों में आप भीड़ देखिए। कितनी भारी संख्या में लोग जाते हैं। इस पर एक प्रख्यात लेखक जो बहुत समय तक प्रगतिशील विचारधारा से जुडे थे का मैने एक लेख पढ़ा था तो उसमें उन्होने कहा था की ''हम इन धर्म गुरुओं की कितनी भी आलोचना करें पर यह एक वास्तविकता है कि वह कुछ देर के लिए अपने प्रवचनों से तनाव झेल रहे लोगों को मुक्त कर देते हैं।''

मतलब किसी धार्मिक विचारधारा के एकदम विरोधी उन जैसे लेखक को भी इनमें एक गुण नज़र आया। यह आज से पाँच छ: वर्ष पूर्व मैने आलेख पढ़ा था और मुझे ताज्जुब हुआ-मेरा मानना था कि उन लेखक महोदय ने अगर भारतीय आध्यात्म का अध्ययन किया होता तो उनको पता लगता कि भारतीय आध्यात्म में वह अद्वितीय शक्ति है जिसके थोड़े से स्पर्श में ही आदमी का मन प्रूफुल्लित हो जाता है। मगर वह कुछ देर के लिए ही फिर निरंतर अभ्यास नो होने से फिर तनाव में आ जाते हैं।

एक बात बिल्कुल दावे के साथ मैं कहता हूँ कि अगर किसी व्यक्ति में बचपन से ही आध्यात्म के बीज नहीं बोए गये तो उमरभर उसमें आ नहीं सकते और जिसमें आ गये उसका कोई धर्म के नाम पर शोषण नहीं कर सकता।

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